नूपुरपाश

उर्वशी और जुगल की बेटी कंचन तब सात बरस की हो चुकी थी | उसने भी लक्ष्मी देवी और उर्वशी से तालीम लेते हुए अच्छा भला नाचना शुरू कर दिया था | पर पिछले तीन दिनों से उसे बुख़ार हो रहा था | बाहर के शोर से उसके सर का दर्द बढ़ता जा रहा था |

उर्वशी बेटी के माथे की पट्टी बदलते बदलते बाहर की भी सारी बातें सुन चुकी थी, सो गुस्से से सेठ जी की तरफ़ देखती बोली “वैसे सेठ जी आप किस पैसे की बात कर रहे हैं ? आप शायद समझते हैं कि आपके बेटे के पैसों से हम लोगों का गुज़ारा चल रहा है ? अगर ऐसा है तो आप ग़लत सोच रहे हैं | आपका पैसा आपको मुबारक़ हो | हम लोगों में अभी इतनी ताक़त है कि आपके बेटे जैसे कुछ और लोगों को भी पाल सकते हैं | ज़रा पूछिये अपने बेटे से कि आज तक कितनी रक़म ली है हमने इससे ? अरे ये करता ही क्या है जो कुछ दे सकेगा ? सच पूछिये तो इसके शराब और पेंटिंग्स के शौक़ हम लोगों की इस कला से ही पूरे हो रहे हैं | आप ताव दिखाते हैं अपने पैसे की, तो बताइये आपको कितना पैसा चाहिए… हम देते हैं आपको… अरे हम लोग कोठे पर ज़रूर बैठी हैं, पर अपनी इज़्ज़त के साथ किसी को खिलवाड़ नहीं देतीं…”

बात बढती देख हेमन्त बोला “पिताजी, अभी आप यहाँ से चले जाएँ तो ठीक रहेगा… मैं आऊँगा जल्दी ही आपसे मिलने, तब डिटेल में बात करेंगे…”

सेठ जी गुस्से में तिलमिलाते हुए बोले “तू इस दो कौड़ी की लौंडी के लिए हमारी बेइज्ज़ती करवा रहा है…? कोई बात नहीं बेटा, इसकी असलियत एक दिन तुम्हारी आँखों के सामने ज़रूर आएगी… अभी तो हम चलते हैं… हाँ तुम हमारे इकलौते बेटे हो, तो अगर ये लड़की कभी तुम्हें धोखा दे और तुम्हारा मन वापस आने को करे तो हमारे घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए हमेशा खुले रहेंगे… वैसे हमारे इकलौते बेटे होने का और हमारे लाड़ प्यार का ही नाज़ायज़ फ़ायदा तुम उठा रहे हो… पछताओगे एक दिन, पर बेटा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी… चलो खैर, जैसी तुम्हारी क़िस्मत…” सेठ जी का गला भर्रा आया था | फिर भी कान्ता और लक्ष्मी देवी की तरफ़ गुस्से से देखते हुए बोले “तुम लोगों को तो मैं देख लूँगा…” और यों पैर पटकते हुए वापस लौट गए | महन्त जी भी उन्हीं के साथ वापस लौट गए |

वे लोग तो चले गए, पर हॉल में एकदम सन्नाटा पसर गया | हर कोई जैसे एक दूसरे से आँख मिलाते हुए भी घबरा रहा था | बड़ा बोझिल वातावरण हो गया था |

उर्वशी अपने कमरे में वापस आ गई | कंचन के माथे पे हाथ लगाया तो वो तप रहा था | पानी में से पट्टी निकाल कर निचोड़ी और कंचन के माथे पर रखती सोचने लगी “क्या कभी ख़त्म होगा ये सब…? या ऐसे ही मरते दम तक यही ज़िल्लत झेलते रहेंगे…?” आज उसे अपने आप पर भी गुस्सा आ रहा था… क्यों उस समय जुगल की बातों में आ गई थी…? क्यों नहीं तब अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण रख सकी…? न तब ख़ुद को यों बह जाने देती और न बिन ब्याही माँ बनती… अब कहाँ जाए…? इस बच्ची का क्या करे…? अकेली जान होती तो कहीं भी कैसे भी गुज़ारा कर लेती, और जब कुछ नहीं बन पाता तो दुनिया छोड़ कर चली जाती… पर अब तो ये भी नहीं सोच सकती… अब उसे कुछ हो गया तो कौन सँभालेगा उसकी बच्ची को…? हे भगवान्, बस इस बच्ची को किसी लायक़ बना दे… कम से कम इसे ये ज़िन्दगी न जीनी पड़े… मेरी ग़लती की सज़ा इस बच्ची को मत देना भगवान्……..

तेज़ बुखार के कारण कंचन कुछ बडबडा रही थी | उर्वशी लगातार उसके माथे की ठण्डी पट्टियाँ बदलती जा रही थी | सोचना लगातार ज़ारी था “वो बरेली वाले सेठ जी गोद माँग रहे थे कंचन को, दे देती तो ठीक रहता… कम से कम शरीफ़ों की ज़िन्दगी तो मिल जाती… उस सेठानी के तो कोई आस औलाद थी नहीं… पर नहीं, मैं अपनी बच्ची क्यों दूँ किसी को…? जैसे भी हालात हैं मेरे, पाल लूँगी इसे… इसी का मुँह देखकर तो ज़िंदा हूँ, वरना तो कभी की… कोई बात नहीं, अभी से ज़िन्दगी की धूप में चलेगी तो दुःख को सहना भी सीख जाएगी… इसे अभी समझ आ जाएगा कि ज़िन्दगी थाली में रखा माँ के हाथ का बनाया लड्डू नहीं है कि उठाया और गप्प… ज़िन्दगी जीना एक कठोर साधना है… आग में तपकर ही तो सोना कुन्दन बनता है… कोई बात नहीं मेरी बच्ची, इसी धूप में तपाकर मैं तुम्हारा जीवन संवारूँगी… नहीं चाहिए मुझे किसी बाहर वाले का सहारा… देखना, एक दिन कितनी ऊंचाइयाँ छू लोगी तुम… इतनी ऊँची हो जाओगी… इतनी ऊँची… कि दुनिया के सारे शरीफ़ज़ादे ख़ुद को तुमसे बहुत नीचा महसूस करेंगे… तुम्हारी ऊंचाईयों को छूने को तरसेंगे, पर छूने की हिम्मत किसी में नहीं होगी… मेरा आशीर्वाद है ये तुम्हें… माँ हूँ तुम्हारी… मर भी गई तो आकाश में तारा बनी तुम्हें हर पल निहारती रहूँगी और आशीर्वाद देती रहूँगी… पर मरने से पहले तुम्हें इतना शक्तिशाली तो बना ही दूँगी कि हालात की आँधियों में तुम्हारे क़दम न डगमगा सकें… कभी कमज़ोर न पड़ने पाओ तुम… और अपनी मंज़िल पा सको…”

कंचन फिर कुछ बड़बड़ाई… उर्वशी ने उसके माथे की पट्टी बदली और उसके माथे से लगकर फफक उठी….

क्रमशः………………