नूपुरपाश

सेठ जी चले तो गए, पर उस लड़की को नीचा दिखाने की, उसको उसकी औक़ात बताने की आग मन में सुलगती रही | उनकी बेटी अपने सवा महीने के बेटे को लेकर फेरा डालने मायके आई थी | सेठ जी को लगा कि इससे अच्छा मौक़ा और क्या हो सकता है उस कोठे वाली लड़की को उसकी औक़ात बताने का | लिहाज़ा उन्होंने पैगाम भिजवा दिया कि वे अपने नवासे के आने की ख़ुशी में एक बहुत बड़ी दावत दे रहे हैं | वे चाहते हैं कि कान्ता इस मौक़े पर वहाँ आकर मुजरा करे | सेठ जी का पत्र देखकर कान्ता ने पहले तो सोचा कि हेमन्त को सेठ जी की वो चिट्ठी दिखाए | पर फिर उसे लगा कि ऐसा करने से बाप बेटे के बीच की दरार और बढ़ जाएगी, और हेमन्त से खत का कोई ज़िक्र नहीं किया | वैसे भी, जानती थी कि उससे पूछने पर जवाब वही मिलेगा कि नाच गाना तो एक कला है और कला के प्रदर्शन में कोई बुराई नहीं | लिहाज़ा कान्ता ने जवाब भेज दिया “पूज्य सेठ जी, सादर चरण स्पर्श… आपकी बेटी अपने सवा महीने के बेटे को लेकर मायके आई हुई है फेरा डालने, इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात और भला क्या हो सकती है ? मैं इस मौक़े पर अपनी ख़ुशी का इज़हार करने ज़रूर आऊँगी | बच्चे को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनाएँ… आपकी… कान्ता…”

ख़त भेजकर सोच में डूब गई | याद आ रहा था कि वो दिन जब हेमन्त उसके पास अपना सब कुछ छोड़कर आया था और उसने उसे  वापस लौट जाने को कहा था तो हेमन्त ने साफ़ कह दिया था कि अगर कान्ता उसे साथ रखने को मना कर देगी तो सन्यासी हो जाएगा पर घर वापस नहीं जाएगा | और तब उर्वशी ने ही अपनी और जुगल की मिसाल देकर कान्ता से कहा था “अगर किसी भले घर का लड़का हाथ थामे तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है ? बात रूपये पैसे की नहीं होती, बात होती है किस तरह इज़्ज़त की ज़िन्दगी बसर की जा सकती है | तू हेमन्त का हाथ थाम ले… इसी में तुम दोनों की भलाई है…”

हेमन्त ने उसे नई ज़िन्दगी दी थी, ऐसे में भला वो हेमन्त से कैसे कह सकती थी कि मैं अकेली कहाँ तक कमाऊँगी…? कहाँ तक तुम्हारे शौक़ पूरे करती रहूँगी…? तुम भी तो कुछ हाथ बँटाओ… और यों चाह कर भी कान्ता ये नाच गाने का पेशा नहीं छोड़ पाई थी | अपने गुज़ारा तो जैसे तैसे कर लेती, पर हेमन्त के शौक़ – उसकी शराब और पेंटिंग्स के सामान के लिए पैसा कहाँ से लाती…? क्या विडम्बना थी कि अब एक बार फिर उसी के घरवालों के सामने मुजरा करना था…

कान्ता ये सब सोच ही रही थी कि हेमन्त पीछे से आ गया | कान्ता के कन्धे पर प्यार से हाथ रखकर मुस्कुराता हुआ बोला “लगता है जाने बहार आज फिर किसी बात से दुखी हैं… कितनी बार समझाया है कि कुछ मत सोचा करो… अरे पगली मैं हूँ न तुम्हारे साथ… फिर क्यों दुखी होती हो…? देखना, सारी दुनिया की दौलत एक दिन तुम्हारे क़दमों पर लाकर न डाल दी तो मेरा भी नाम नहीं… देख लेना…”

कान्ता ने कोई जवाब नहीं दिया, बस सर पीछे घुमा कर उसकी तरफ़ देखा और अपने कन्धे पर रखे उसके हाथ को सहलाती हुई मुस्कुरा भर दी | जानती थी कि दो वक़्त की रोटी के लिए भी मेहनत करना हेमन्त के बस की बात नहीं थी, दुनिया की दौलत तो दूर की बात थी…

हेमन्त अब उसके सामने आ गया था और उसे बाँहों में भरकर सीने से लगा लिया था | थोड़ी देर के लिए कान्ता जैसे सारे दुःख दर्द भूल गई थी | स्वर्ग तो जीते जी किसी ने नहीं देखा, पर जितना भी सिना स्वर्ग के बारे में, हेमन्त की बाँहों में उसे उससे भी ज़्यादा सुख मिलता था | हेमन्त ने एक हाथ से उसकी ठोड़ी उठाकर उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा “तुम इसीलिए उदास हो न कि क़ानूनी तौर पर उस घर की बहू नहीं कहा सकतीं…? पर मैं तो सब कुछ छोड़ छाड़ कर हमेशा के लिए तुम्हारे पास चला आया हूँ… यों जी छोटा नहीं करते… ईश्वर पर भरोसा रखो, देखना सब ठीक हो जाएगा…” और इतना कहकर कान्ता की आँखें चूम लीं | कान्ता उसी तरह उसकी बाँहों में जकड़ी खड़ी रही – यही दुआ मनाती कि ऐसे ही एक दिन उसे  मौत आ जाए तो इससे अच्छी और सौभाग्य की बात और क्या होगी…

तभी दरवाज़े पर दास्तक हुई | हेमन्त ने धीरे से कान्ता को अपन से अलग करके स्टूल पर बैठाया और जाकर दरवाज़ा खोला तो… “भैया आप…?” दरवाज़े पर उसका चहेरा भाई हरीश खड़ा था | भीतर आकर उसने बताया कि वो हेमन्त को लेने आया था | सेठ जी ने अकेले ही बुलाया था | कहलाया था कान्ता को साथ न लाये | उन्होंने कहलाया था “हमें तुम्हारे कान्ता कके साथ रहने में कोई ऐतराज़ नहीं है | पर तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है | “बिजनेस” का भी कुछ सोचना है |” हेमन्त ने पीछे घूमकर देखा, कान्ता भीतर कमरे में खड़ी सब कुछ सुन रही थी | हेमन्त के देखने पर वो भी पास आकर खड़ी हो गई |

हरीश की बात सुन पहले तो हेमन्त कुछ हिचकिचाया | पर कान्ता सब समझ गई थी | वो समझ गई थी कि एक तरफ़ तो सेठ जी ने उसे मुजरे के लिए बुलाया है, और दूसरी तरफ़ हेमन्त को इस बारे में कुछ नहीं बताया है और उसे अकेले आनेको कहा है… इससे साफ़ ज़ाहिर था कि वो कान्ता को हेमन्त की नज़रों में गिराना चाहते थे | कान्ता ने सोचा इससे बड़ा इम्तहान उसके प्यार का और क्या हो सकता है, सो समझा बुझाकर हेमन्त को उसके भाई के साथ कलकत्ते भेज दिया |

कान्ता भी दूसरे दिन अपने साज़िन्दों और रामकिशन जी के साथ कलकत्ते के लिए रवाना हो गई | लक्ष्मी देवी ने पण्डित जी को भी आग्रहपूर्वक कान्ता के साथ भेज दिया था | कलकत्ता पहुँचने पर पण्डित जी के ठहरने के लिए सेठ जी ने अपनी दूसरी हवेली में इंतज़ाम करवाया था, सो वे तो “कल मुजरे में  मिलूँगा…” बोलकर दूसरी हवेली चले गए थे | लेकिन कान्ता और उसके लाव लश्कर के लिए बाज़ार में ही एक धर्मशाला में इंतज़ाम किया गया था | स्टेशन से रिक्शों में बैठाकर उन सबको धर्मशाला ले जाया गया | कान्ता को याद आया कि जब हेमन्त की शादी में आई थी तब सेठ जी ने सम्मानपूर्वक अपनी कारों में बैठाकर इन सबको किसी बड़ी कोठी में ठहराया था | सब वक़्त वक़्त की बात है | भीड़ भरे बाज़ार में अपने हाथों से रिक्शे खींचते हुए रिक्शा वालों ने जैसे तैसे इन लोगों को धर्मशाला पहुँचाया | वहाँ पहुँचने पर आव भगत खूब की गई | अगले दिन सुबह नित्य कर्म से निबट कर सबने नाश्ता किया और फिर कुछ देर रियाज़ किया | दोपहर को खाना खाकर कुछ देर आराम किया | शाम हुई तो सेठ जी के घर जाने की तैयारी करने लगे | इस बीच सेठ जी की गाड़ी पहुँच चुकी थी और सजी धजी कान्ता सबके साथ सेठ जी की हवेली पहुँच गई | बड़ी ज़िंदादिली से सेठ जी ने इन सबका स्वागत किया | पर उस आव भगत में घुला हुआ छुआ छूट का बर्ताव कोई भी देख सकता था |

रात हुई… महफ़िल सजने का वक़्त हो चला था… शमाएँ रोशन की जा चुकी थीं… सेठ जी की सारी चालों से बेख़बर साज़िन्दों ने अपने साज़ मिलाने शुरू किये… सुरा-सुराही-जाम आपस में टकराने लगे… एक बड़े हॉल में ये सारा कार्यक्रम चल रहा था | हॉल में पहुँच कर कान्ता ने एक बार नज़रें घुमाकर चारों तरफ़ देखा, सामने बिल्कुल बीचों बीच बिछी ज़रीदार कालीन पर दीवार के सहारे कुछ मसनदें टिकी हुई थीं – जहाँ हेमन्त की बहन अपने पति के साथ बच्चे को गोद में लिए सजी सँवरी बैठी थी | उसी के साथ बैठी थी हेमन्त की ब्याहता | दूसरी तरफ़ हेमन्त और उसके माता पिता बैठे थे | उनके सामने सारे कमरे में चारों ओर दीवार के सहारे बिछी ख़ूबसूरत जाजमों पर मेहमानों के बैठने के लिए मसनदें टिकी हुई थीं | बिल्कुल बीच में मुजरे के लिए जगह बनी थी | साज़िन्दे वहीं बैठ अपने साज़ मिलाने में लगे थे | कान्ता को उसके लिए बनाई जगह पर ले जाया गया | हेमन्त ने देखा… दोनों की नज़रें मिलीं… कान्ता की नज़रों में बेबसी साफ़ झलक रही थी | एक बार तो हेमन्त उसे देख भौंचक रह गया, परफिर उसे अपने माता पिता की चाल समझते देर न लगी |

कान्ता ने रिवाज़ के मुताबिक़ सबसे पहले बच्चे को गोद में लेकर प्यार किया, आशीर्वाद दिया, फिर बच्चा उसकी माँ को पकड़ाकर मुजरे पर बैठ हेमन्त की ओर इज़ाज़त लेने की गरज से देखा…

क्रमशः……………………

 

 

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