सौभाग्यवती भव – अध्याय उन्नीस

उन्नीस – सरोज और जयन्त का रिश्ता

“आज दिवाली है…” बिस्तर पर पड़ी पड़ी सरोज सोच रही थी “बताओ कैसे धीरज धराऊँ इन लोगों को ? आज भी छुट्टी ना मिली पप्पू रग्घू को तो | मरा नाश होवे इन सरकारी अफ़सरों का जो यो भी ना देखते कि कैसे इनके बीवी बच्चे आज चैन की साँस लेवेंगे… उस मरे जज ने तो पैरोल के बखत ही बोल दिया था “मर्डर करते वक़्त नहीं सोचा था कि जिसे मार रहे हो वो भी किसी का बेटा है ?” अरे कोई पूछे बिना ज़िरह के, बिना सबूतों के कैसे कह दी जज ने इतनी बड़ी बात ? कैसे ठहरा दिया इन्हें मुज़रिम बिना बात के ? पर पूछेगा भी कौन ? बाप थोड़े बैठा है मेरा पैरवी करने को… अब बताओ कौन तो नए कपड़े बनवावे बच्चों को, कौन पटाखे फुलझड़ी लाके देवेगा ? वो तो कल भाभी ने गुप्ता जी के हाथ भिजवा दी थीं गुझियाँ, बहुओं के लिये चूड़ी और थोड़ी सी फुलझडियाँ तो ये बच्चे छुड़ा छुडू लेवेंगे | और बहुओं का भी क्या मन करेगा पूजा करने का ? करवाचौथ को भी भाभी आ गई थीं मेंहदी और चूड़ी लेके तो इन्होंने कुछ कर लिया था | वरना तो…

“अम्मा फिर तुम कुछ सोचने लगीं | क्या सोचने से वे बाहर आ जावेंगे ? हेमा चाय लेकर आ चुकी थी “उधर देखा ना तुमने अम्मा कितनी सुन्दर दीवाली बनाई है मिनी ने | रात को तीन बजे सोई थी पूरी करके | कह रही थी कि अम्मा को बहुत पसन्द आएगी | अरे धनीराम, आइये इधर…” और सरोज के पलंग के सामने वाली दीवार की तरफ़ इशारा करके धनीराम की मदद से सरोज को बिस्तर पर बैठाकर चाय का प्याला पकड़ा दिया | सरोज ने सामने दीवार की तरफ़ देखा और प्यार से मुस्कुराई “और ना तो, बिल्कुल भाभी पे और इनपे गई गई इन कामों में तो | तुझे पता है भाभी बड़ी अच्छी दिवाली बनाया करें थीं | शहर भर के लोग आवें थे भाभी की दीवाली देखने | और मेरे ब्याह के बाद से तो ये भी भाभी के साथ बनाने लगे थे | जितनी देर भाभी घर के काम निबटाती थीं उतनी देर ये बना लेवें थे | बाद में फिर भाभी बैठ जावें थीं | हफ़्ता दस दिन लग जावें थे दोनों को दिवाली बनाने में | महेंदर मास्टर ने तो एक बार दिवाली की फोटो भी खींच के उनके ग्रीटिंग कार्ड्स बनाए थे | इनकी तो कई सारी पेंटिंग्स तूने भी देखी हैं ना ?” और बोलते बोलते फिर से वहीँ पहुँच गई थी सरोज |

“लाली, कब तक सोती रहेगी ? चल उठ, पुताई वाले आ जाएँगे | जल्दी से कमरा ख़ाली कर जीराज के साथ मिलके | और सुन, बैठक का वो दीवान हटवाके बरामदे में डलवा दे | कल से जयन्त आवेंगे दिवाली बनवाने | उस दिन आए थे तो कह गए थे…” सोती सोती सरोज जयन्त का नाम सुनते ही फट से उठ कर बैठ गई | बाहर सूरज सर पर चढ़ आया था | जल्दी से बिस्तर से नीचे उतरी, नल पर जाकर हाथ मुँह धोया और जा पहुँची रसोई में चाय पीने | चाय पीने के बाद काफ़ी काम भी तो करवाना था | बैठक आज पूरी हो जाएगी तो कल से बाक़ी कमरों में करानी है | और बैठक में भाभी दिवाली बनाना शुरू कर देंगी हर साल की तरह | पर इस बार तो जयन्त भी होंगे | कल ही तो कहके गए थे “भाभी, इस बार जितनी देर आप घर के काम निबटाओगी उतनी देर अगर आप कहो तो मैं थोड़ा सा कुछ बना दिया करूँगा हर रोज़ आकर…” और कनखियों से सरोज को देखना शुरू कर दिया था | अभी भी सोच सोच कर सरोज का चेहरा शर्म से लाल हुआ जा रहा था | जानती थी दिवाली तो बहाना था घर आने का |

और अगले दिन से भाभी ने दिवाली बनानी शुरू कर दी थी | दीवार के क़रीब तीन फुट लम्बे और दो फुट चौड़े हिस्से को पहले चावल के पेस्ट से लीपा गया था | फिर उसके सूखने पर भाभी ने फिट्टा और पेंसिल लेकर पहले चारों तरफ़ बार्डर बनाया और फिर उसके भीतर धन की वर्षा करती और कमल पुष्प पर विराजमान लक्ष्मी, चूहे पर बैठे और हाथ में लड्डू पकड़े गणेश, और एक हाथ में वीणा और दूसरे में पुस्तक लिये सरस्वती के रेखाचित्र बनाया | पूरा दिन इसी में लग गया था | दूसरे दिन से रंग भरने का काम शुरू होना था | रंगों और कूचियों के साथ भाभी ऐसे खेलती थीं जैसे रसोई में चकले बेलन के साथ खेल रही हों | जितने दिन भाभी ये पेंटिंग बनाती थीं उतने दिन सरोज सारा सारा दिन भाभी के पास ही बैठी रहती थी और भाग भाग कर घर के भी सारे कामों में भाभी का हाथ बँटाती रहती थी | इन दिनों पढ़ाई का भी ज़ोर नहीं रहता था तो सरोज मस्त रहती थी | पर इस बार तो…

अगले दिन से भी भाभी सुबह से ही कुछ ख़ास बनाने में जुट जाया करती थीं | कितने सारे काम निबटाने होते थे भाभी को भी – घर में सबका खाना बनाना रात का भी और दिन का भी, आया गया भी देखना, दिवाली के पकवान – गुझिया, समोसे, पापड़ी, नमकपारे, शक्करपारे, अन्दरसा, फर, दालबीजी, बेसन के सेव – न जाने क्या क्या बनता था इस दौरान घर में – पूरी हलवाई की दुकान खुली रहती थी | फिर इस सबके साथ साथ दिवाली भी बनानी | और दिवाली भी ऐसी कि महेंदर मास्टर के कहने पर मुरादाबाद की एक एजेंसी से प्रस्ताव आया था उस दिवाली की फोटो कैलेण्डर पर छापने का – पर भाभी ने मना कर दिया था – हालाँकि पता लग गया था कि काफ़ी अच्छी क़ीमत मिल रही थी उसकी | ये तो हर बार का काम था ही | इस बार तो ठेकेदार साहब के घर के बच्चे भी रोज़ आएँगे तो उन्हें कुछ ख़ास बनाकर ही तो खिलाना होगा न…

भाभी अभी रसोई में कुछ बना ही रही थीं कि दरवाज़े की कुण्डी खड़की | धड़कते दिल से सरोज ने दरवाज़ा खोला तो सामने जयन्त खड़े थे दोनों बहनों के साथ | शर्म से सर झुकाकर उन लोगों के भीतर आने पर दरवाज़ा वापस बंद करने लगी तो जयन्त ने अपना हाथ सरोज के हाथ पर रख दिया | सरोज के दिल की धड़कनें और तेज़ हो गई थीं | जयन्त थे कि एकटक उसे निहारे चले जा रहे थे – जैसे सारा रूप आज ही पी जाएँगे | तभी शीला ने ज़ोर से खँखारा | भीतर से भाभी की आवाज़ आई “कौन है लाली…?” और बोलती बोलती भाभी दरवाज़े पर आ पहुँचीं | जयन्त ने फुर्ती से अपना हाथ सरोज के हाथ पर से हटा लिया | सरोज घबराकर पीछे मुड़ी तो गिरते गिरते बची – शीला ने उसे सहारा दिया था |

“क्या हुआ लाली…?”

“कुछ नहीं भाभी, ठोकर खा गई थी…” नमस्ते करते हुए शीला ने जवाब दिया | सरोज के कारण भाभी सारी सुनिया की भाभी बन गई थीं – उनकी पहचान अब “भाभी” सम्बोधन ही बन गया था – और उन्हें अच्छा भी लगता था “संभल कर तो चल ही नहीं सकती ना…” भाभी हँसते हुए बोलीं | जयन्त ने झुककर भाभी के पैर छुए और उन्हें आशीर्वाद देकर भाभी तीनों बच्चों को लेकर भीतर आ गईं | सरोज को उनके पास बैठने को बोल खुद रसोई में चली गईं जीराज के हाथ कुछ नाश्ता पानी भिजवाने | इसी मौके की तो तलाश थी जयन्त को | “शीला, किरन तुम लोग भी जाकर हाथ बँटाओ ना भाभी का…” बहनों ने कहा तो दोनों शैतानी में मुँह बनाकर वहाँ से चली गईं | अब एक बार फिर दोनों अकेले थे – आमने सामने | सरोज उठकर बाहर जाने लगी तो जयन्त ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश की और वो वैसे ही निष्पन्द खड़ी रही | कुछ पल दोनों ऐसे ही रहे | फिर जयन्त ने उसकी मुट्ठी खोलकर कुछ रख दिया उसके हाथ पर | सरोज ने देखा – मुड़ा हुआ एक कागज़ था | घबराकर सरोज वहाँ से बाहर भागी तो जयन्त को उसका हाल देखकर बेसाख्ता हँसी फूट पड़ी | उनकी हँसी सुनकर भाभी के साथ सब लोग भीतर आए | कारण पूछने पर जयन्त से कुछ बताते नहीं पण पड़ रहा था – बस लोटपोट हुए हँसे ही जा रहे थे | “लाली कहाँ गई…” अचानक भाभी को ध्यान आया कि सरोज वहाँ नहीं थी | जयन्त ने उसी तरह हँसते हुए बाहर की तरफ़ इशारा कर दिया | सरोज इस बीच टायलेट में जाकर वो खत अपनी ब्रा में छिपाकर वापस आ गई थी | सरोज का हाल देखकर तो वाक़ई हर कोई बेसाख्ता हँसने को मजबूर हो रहा था | असल में हुआ ये था कि दरवाज़े की कुण्डी खड़की तब सरोज भाभी के कहने पर सरियों में रंग घोल रही थी ब्रश से | अलग अलग रंग के लिये ब्रश अलग होता था | सरोज उस वक़्त हरा रंग घोल रही थी | कुण्डी खड़कने पर ब्रश लिये लिये ही दरवाज़ा खोलने चली गई | जयन्त ने जब उसके हाथ में खत पकड़ाया तो घबराहट में उसने ब्रश वाला हाथ ही मुँह पर रख लिया और उसके गोरे गलों पर हरे रंग की आड़ी तिरछी रेखाएँ खिंच गई थीं जिन्हें देखकर सब हँसे चले जा रहे थे | सबको हँसता देख सरोज पहले तो अचकचा गई | अब तक उसकी घबराहट भी दूर हो गई थी “क्या देख रहे हो सबके सब इस तरह मेरी तरफ़ ? जोकर हूँ क्या मैं…?” उसने पूछा |

“किरन शीशा तो दिखाइये इसे…” भाभी ने उसी तरह हँसते हँसते कहा और फिर बाहर रसोई में चली गईं | सरोज ने खुद ही शीशे के पास जाकर देखा तो जयन्त की तरफ़ मीठे गुस्से से देख खुद भी हँस पड़ी | और जयन्त – वो तो हँसना भूलकर हँसती हुई सरोज के मोती जैसे करीने से टंके दाँतों को देख रहे थे और हरे रंग से पुते उसके गोरे गालों के गड्ढों में डूबते जा रहे थे…

चाय नाश्ते से निबट कर सब लोग बैठक में चले गए | भाभी जयन्त को समझाने लगीं कि किस तरह उन्हें कलर करना है | शीला के हाथ में कागज़ का एक बड़ा सा लिफाफा था | सरोज को पकड़ाते हुए बोली “माता जी ने दिया है | कहा है दिवाली के दिन इसे ही पहन कर घर आन फिर सब मिलकर फुलझड़ी छुड़ाएँगे…” सरोज ने लिफाफ खोला तो उसमें एक लाल रंग का ज़री के काम का लहँगा था | भाभी ने काफ़ी हील हुज्जत की शीला और किरन के साथ कि वे लोग इसे नहीं रख सकते – पर उन लोगों ने कह दिया “माता जी से कहना आप भाभी | और क्या हम लोगों का कोई हक़ नहीं बनता अपनी सहेली पर…?” पितजी भी आ गए थे बाज़ार से वापस तो उन्होंने भी भाभी को यही समझाया कि शाम को चलकर ठेकेदारनी से बात कर लेंगे | बच्चों से क्या बात करनी इस बारे में | शाम को ये लोग उनके घर गए भी थे | पर ठेकेदारनी ने न जाने क्या क्या दलीलें देकर इन लोगों को समझा दिया था | पर अब भाभी को शक होने लगा था – जयन्त और सरोज पर नहीं – वो तो भाभी की नज़र में दूध के धुले बच्चे थे – ठेकेदार और ठेकेदारनी पर – यों ही तो कोई किसी को इस तरह कुछ नहीं दे देता… और शायद भाभी के कानों में एक बार फिर से पण्डित ब्रह्मदत्त का कहा हुआ “पर…” गूँजने लगा था, और साथ ही ये भी कि घर से उत्तर पूर्व के कोने में किसी सम्पन्न घराने में लड़की की शादी होगी | पर इस घर में बात चलाने की तो सोची भी नहीं जा सकती थी | कहाँ से इतने बड़े घर में ब्याह सकते हैं | फिर अभी तो पढ़ाना भी है | उम्र भी नहीं है अभी ब्याह लायक | पर फिर वाही पण्डित ब्रह्मदत्त जी की बात – पढ़ाई तो बड़ी उम्र में जाकर पूरी होगी, पर शादी भी हो | आखिर पिताजी ने समझाया “जिस बात पर अपना वश न हो हो उसमें ज़्यादा सर नहीं खपाना चाहिये – वक़्त और ऊपर वाले पर छोड़ देना चाहिये… भाभी ने कहा भी एक बार ठेकेदार साहब के सामने अपनी बात स्पष्ट कर दें, तो पिताजी ने कहा कि अपनी तरफ़ से हमें कुछ नहीं कहना है, हाँ अगर वो लोग कोई बात करते हैं तब की तब सोचेंगे…

दिवाली का वो हफ़्ता जैसे पंख लगाकर उड़ गया था सरोज और जयन्त की चाहतों को परवाज़ देता | दिवाली आई | भाभी और पिताजी का इस दिन व्रत होता था और वो कुछ “सत्ती ऊतों” की पूजा करते थे – जिसे बच्चे नहीं देखते थे | ठेकेदारनी जानती थीं इस बात को सो उन्होंने कहला भेजा कि सरोज उस दिन उन्हीं के यहाँ खाना खाएगी | उन पर पिताजी और भाभी दोनों को ही श्रद्धा थी – तो उनकी बात ताल्नेका तो प्रश्न ही नहीं था | और जयन्त खुद दोनों लड़कियों के साथ आकर सरोज को लिवा ले गए थे | सरोज की झिझक भी धीरे धीरे दूर होती जा रही थी जयन्त से | उस दिन उसने पण्डित ब्रह्मदत्त जी की बात अक्षरशः जयन्त को बताई थी | जयन्त इन सब बातों को नहीं मानते थे | पर भाभी और पिताजी की तसल्ली के लिये उन्होंने सरोज से कहा कि “हम लोग जन्मपत्री मिलाकर ही शादी करेंगे | पर मेरी शादी होगी तो तुमसे – वरना ज़िंदगी भर कुंआरा रहूँगा…” और सरोज ने हमेशा हमेशा के लिये अपने मन मन्दिर में जयन्त को बसा लिया था – देवता की तरह – और वो अपने इस रूप में सच भी साबित हुए थे |

उस बरस की दिवाली तो सरोज कभी भूल ही नहीं सकती | कितना तूफ़ान खड़ा हो गया था | एक तो गर्भ ऊपर से दिमागी परेशानी – भाभी ने एक बार तो बिस्तर ही पकड़ लिया था | बुआ को भी मौक़ा मिल गया था बोलने का | पिताजी और सरोज को डर भी था – इससे पहले दो बार गर्भपात हो चुका था भाभी को और एक बार पाला पनासा चला गया था – जिसके लिये सरोज कभी खुद को माफ़ नहीं कर पाई थी – हालाँकि भाभी, पिताजी और चाचा ने काफ़ी समझाया भी था कि तेरी कोई गलती नहीं थी – पर जब विनोद गया तब तो बिल्कुल बच्ची ही थी | और बालमन पर जो भी छप जाए – कहाँ धुलता है ?

तो बात चल रही थी सन् १९५४ की दिवाली की | कुछ ख़ास था इस बार दिवाली पर – कुछ अच्छा तो कुछ बुरा…

जयन्त ने अपने घर में साफ़ साफ़ बोल दिया था कि शादी करेंगे तो सरोज के साथ वरना करेंगे ही नहीं | उनके घर में भी सरोज सबको पसन्द थी | ठेकेदारनी तो पहले से ही सोचे बैठी थीं कि सही वक़्त आने पर मास्टरनी जी से बात करेंगी सरोज का हाथ माँगने के बारे में | अब जयन्त का भी मन देखा तो उनकी सरोज को बहू बनाने की इच्छा और दृढ़ हो गई और तुरन्त उन्होंने ठेकेदार साहब से कह दिया “भैया को तो पसन्द है ही – हमें भी बहुत पसन्द है पण्डित जी की लड़की लाला जी… आपको बात चलानी होगी…” ठेकेदार साहब भी मन ही मन यही चाहते थे | पत्नी की बात सर आँखों पर लेते हुए बोले “अरे सरोज को भला कोई नापसंद कर भी सकता है ? सारी दुनिया घूम आओगी तब भी उस जैसी ख़ूबसूरत और शालीन लड़की कहाँ मिलेगी ? हम कल ही बात चला लेंगे | कल आप सरोज को बुला रही हैं न घर…?” और तब दिवाली के दिन ठेकेदारनी ने सरोज को बुलवाया था |

पिछले क़रीब दस दिन तो दिवाली बनाने में और भाभी के साथ दिवाली के पकवान बनाने में गुज़र गए थे | साथ में जयन्त और सरोज का आँखों आँखों में लुका छिपी का खेल भी चलता रहा था | दिवाली के दिन काफ़ी लोग भाभी की दिवाली देखने आते थे | उस साल भाभी ने बड़े गर्व से सबको बताया था कि “जयन्त जी” ने इस बार काफ़ी काम किया दिवाली रखने में | जयन्त की कला प्रतिभा का भी सारा शहर क़ायल था | साथ ही दिवाली की मिठाइयाँ और गुझियाँ भी मिलने जुलने वालों के यहाँ भिजवाई जा रही थीं | कई दिनों से यही सब चल रहा था | समय निकाल कर पिताजी सरोज को हर साल की दिवाली की तरह नए सैंडल, चूडियाँ, लहँगे से मैच करता चुटीला वगैरा भी दिलवा लाए थे | दिवाली के दिन सुबह को चाय के साथ जल्दी जल्दी सरोज ने दो गुझियाँ खाईं | आज तो उसके लिये ख़ास दिन था – ठेकेदारनी ने बुलवाया था ख़ासतौर पर सरोज को | जयन्त खुद आने वाले थे बहनों के साथ उसे लिवा ले जाने | भाभी ने भी जल्दी मचा रखी थी – जल्दी तैयार हो जाओ… अच्छा नहीं लगता किसी को इंतज़ार कराना… वो इतने बड़े लोग तुम्हें खुद लिवाने आ रहे हैं… और हाँ, जयन्त की माँ का भिजवाया लहँगा और सारा सामान पलंग पर रख दिया है, वही पहन कर जाना… बड़े मन से भिजवाया है माता जी ने… और इस तरह माता जी का भिजवाया लहँगा, साथ में मैचिंग चूडियाँ और लम्बी मोटी चोटी में लहँगे का मैचिंग चुटीला लटकाए एक हाथ में चोटी को संभाले हुए गुलाबी गुलाबी सरोज – जयन्त के साथ चलने के कारण जिसके गाल और भी लाल होते चले जा रहे थे – सज धज कर जयन्त के घर चल पड़ी | सारे रास्ते शीला और किरन ही बतियाती रहीं – जयन्त और सरोज के पास आज शब्द ही नहीं थे कुछ भी बोलने के लिये…

सारा दिन माता जी ने ख़ूब लाड़ लड़ाया सरोज का | शाम को पिताजी लिवाने आए थे तब चाह कर भी ठेकेदारनी चाह कर भी कुछ ख़ास नहीं कह सकी थीं उनसे क्योंकि उन्हें घर जाकर पूजा करनी थी | बस उनकी लाई मिठाई की टोकरी रखकर एक दूसरी टोकरी उन्हें पकड़ा दी थी घर ले जाने के लिये | हाँ ठेकेदार साहब ने इतना ज़रूर कहा था चलते समय “पण्डित जी आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है जयन्त के बारे में… कल अगर समय हो तो हम आ जाएँ…?”

“आप भी कैसी बातें करते हैं लाला जी ? आपके लिये तो समय ही समय है | जब चाहें आ जाएँ – हमारा घर भी पवित्र हो जाएगा आपके चरणों से | वैसे अगर आप कहें तो हम ही जाएँगे यहाँ | जैसा आप चाहें…” हँस कर पिताजी ने जवाब दिया |

“नहीं पण्डित जी, काम हमारा है तो हम ही आएँगे | मैं और माता जी दोनों आएँगे अगर आपको परेशानी न हो…” ठेकेदार साहब ने जवाब दिया और पिताजी सरोज कोलेकर वहाँ से रुखसत हो गए | रास्ते भर दोनों बाप बेटी अपनी ही उधेड़ बुन में चले जा रहे थे | बाप को चिंता थी कि कहीं पण्डित जी कुछ ऐसा न कह बैठें जो उनके वश में न हो | बेटी को चिंता थी कि कल अगर उन लोगों ने उसका हाथ मांग लिया पिताजी और भाभी से तो क्या होगा ? कहीं कोहराम तो नहीं मच जाएगा ?

दिवाली पूजन पिताजी ने पूरे उत्साह से किया था हमेशा की ही तरह | पर उस रात सरोज सो नहीं पाई थी | कभी खुश होती थी कि कल उसके भाग जाग जाएँगे | कभी डरती थी कि पता नहीं भाभी और पिताजी क्या कहेंगे | उधर पिताजी और भाभी भी नहीं सो पाए थे | मन में शक तो था ही – सो सारी रात यही सोचते रहे थे कि कल क्या बात करेंगे वो लोग जयन्त के बारे में | दूसरे दिन का सूरज निकला तो शायद आज कुछ ज़्यादा ही लाल था – या सरोज को लग रहा था – क्योंकि उस दिन काफ़ी कुछ घटना था | सारा दिन भाभी और पिताजी मेहमानों के नाश्ते पानी की तैयारी में लगे रहे | शाम को क़रीब चार बजे ठेकेदारनी और ठेकेदार साहब आ पहुँचे | चाय पीने के बाद वक़्त आया असली बात का | सरोज का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था | पिताजी और भाभी की भी वही स्थिति थी कि जाने अब ये लोग क्या बात करेंगे | यों जयन्त और उनका घर पिताजी और भाभी को नापसन्द होने का कोई सवाल ही नहीं था | पर दोनों को याद आ रही थी बस एक ही बात – वही जो पण्डितब्रह्मदत्त जी ने कही थी – “पर…”

ठेकेदारनी ने सरोज को बुलाकर प्यार से अपने पास ही दीवान पर बैठा लिया | सरोज सर झुका कर और पैर नीचे लटका कर बैठ रही | अब ठेकेदार साहब ने दीवान पर ही बैठे बैठे लाठी अपनी ठोड़ी के नीचे रखकर दोनों हाथों से पकड़ कर बोलना शुरू किया “पण्डित जी, हमें घुमा फिराकर बात करनी तो आती नहीं – आप जानते हैं अच्छी तरह | सीधी सीधी बात करेंगे हम आपसे | और आशा रखते हैं कि आप भी हमारी बात पर विचार ज़रूर करेंगे |”

“हम जानते हैं पण्डित जी कि आप ऐसा कुछ भी नहीं कहेंगे जो किसी को भी मंज़ूर न हो | आप बेफ़िक्री से कहिये क्या बात है ?” धड़कते दिल से गला साफ़ करते हुए पिताजी बोले |

“पण्डित जी, आपके पास एक हीरा है | और वो हीरा हम अपने घर में जड़ना चाहते हैं | बोलिये, दान देंगे हमें वो हीरा…?” ठेकेदार साहब बोले और आशा भरी नज़रों से पिताजी की तरफ़ देखने लगे |

“जी माफ़ कीजियेगा, हम कुछ समझे नहीं…” सब कुछ समझ कर भी अनजान बनते पिताजी बोले |

“पण्डित जी, आपकी सरोज हमारे घर भर में सबको पसंद है | हम अपने जयन्त के लिये उसका हाथ माँगते हैं आपसे…” याचना के स्वर में ठेकेदार साहब बोल रहे थे, और कमरे में सन्नाटा पसर गया था एकदम से | सरोज कुछ शरमाकर और कुछ घबराकर वहाँ से भीतर भाग गई थी और बिस्तर पर गिरकर सोचती रही थी कि पिताजी और भाभी ने क्या जवाब दिया होगा ? उसके बाद पता नहीं क्या बातें हुईं दोनों तरफ़ के लोगों के बीच – उसे कुछ नहीं मालूम | काफ़ी देर बाद भाभी भीतर आईं तो सरोज को पलंग पड़ी देख उठाते हुए बोलीं “वे लोग जा रहे हैं | बाहर आकर उनसे मिल तो ले… पिताजी बुला रहे हैं बाहर…” और उसी तरह शर्माती लजाती चित्रलिखित सी सरोज बैठक में वापस पहुँच गई | ठेकेदारनी ने चलते समय बड़े प्यार से सरोज के सर पर हाथ फिराया और साथ में लाई डिबिया में से एक जड़ाऊ चमचमाती अँगूठी निकाल कर सरोज को पहनाते हुए बोलीं “देखिये मास्टरनी जी, हम तो आज से सरोज को अपनी अमानत ही समझते हैं | हम सच में उन सारी बैटन को नहीं मानते जो अभी आपने हमें बताईं | और भैया तो बिल्कुल ही अँगरेज़ हैं इस मामलेमें | और फिर सरोज जैसी भाग्यशाली लड़की का अनर्थ तो हो ही नहीं सकता | इज्स घर में जाएगी उजाला भर देगी | इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा इसका कि माँ के मरने के बाद आप जैसी समझदार और पढ़ी लिखी औरत माँ के रूप में इसे मिली | चिंता मत कीजिये, हमेशा सुखी रहेगी खुद भी, और सारे घर को भी सुखी रखेगी…”

“वो सब तो ठीक है माता जी, पर अभी ये अँगूठी आप रहने ही दीजिए | पहले हम जन्मपत्री मिलाकर संतुष्टि तो कर लें अपनी | ये सब तो होता ही रहेगा | ख़ाली औपचारिकता भर है ये तो – बाद में भी होती रहेगी…” पिताजी ने जवाब दिया और सरोज की उँगली से अँगूठी निकाल कर वापस ठेकेदारनी को पकड़ाने के लिये सामने की तो उन्होंने पिताजी के हाथ से लेकर फिर से सरोज को पहना दी और बोलीं “तो ये तो मत निकालिये पण्डित जी | ये सिर्फ़ औपचारिकता ही नहीं है – शगुन की अँगूठी भी नहीं है ये – वो तो बाद की बातें हैं | ये तो हमारी तरफ़ से एक छोटी सी भेंट भर है | आप संतुष्टि करते रहिये अपनी, पर सरोज को तो हमने अपना मान लिया है | आप चाहे इसे हमारी जबरदस्ती कह लें…”

“आप भी कैसी बातें करती हैं माता जी ? आपके घर से रिश्ता जोड़ने का तो हम सपना भी नहीं देख सकते थे | कहाँ रजा भोज और कहाँ गंगू तैली… पर…”

“पण्डित जी…” पिताजी को बीच में ही रोकते हुए लाला जी बोले “ये बात तो हमें कहनी चाहिये | असल में तो राजा भोज तो आप हैं – इतने विद्वान दम्पति – जिन पर सारे शहर को नाज़ है और सारा शहर जिनकी पूजा करता है उस घर की लड़की को हम अपने बेटे के लिये माँगने का दुस्साहस कर रहे हैं | और लड़की भी ऐसी कि जिसके लिये किसी भी अच्छे से अच्छे घर के लोग आँखें बिछाए बैठे होंगे अपने घर ले जाने को | तो गंगू तैली तो हम हैं पण्डित जी और आज आपके खज़ाने से एक हीरे की भीख माँगने आए हैं… देखिये अब इनकार मत कीजिये… और बाक़ी बात की फ़िक्र मत कीजिये पण्डित जी, आप चाहेंगे तो गौना देर से कर लेंगे | रही सरोज की पढ़ाई की बात, तो अगर इसका मन होगा तो हम इसकी पढ़ाई ज़ारी रखेंगे | बस हमें ये भीख दे दीजिए…” और पिताजी के सामने ऐसे झुक गए जैसे किसी देवता की चरण वंदना करना चाहते हों |

पिताजी, सरोज और भाभी सभी हतप्रभ खड़े थे | ये आज क्या हो रहा था ठेकेदार साहब को ? जिसके कड़क और रौबीले व्यक्तित्व के सामने किसी की मुँह खोलने की हिम्मत नहीं होती थी वही बेटे की ख़ातिर एक गरीब मास्टर के सामने झुक रहा था | आखिर पिताजी ने उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिये और सम्मान के साथ बोले “लाला जी, आपके घर में लड़की चली जाए इससे बड़ा सौभाग्य हमारा और हमारी लड़की का और क्या होगा ? लेकिन हम वास्तव में डरते हैं | जो कुछ ब्रह्मदत्त जी ने हमें कहा हमने आपको बता ही दिया | हम नहीं चाहते कि ऐसा कुछ भी हो जिससे कि सारी उम्र दोनों परिवार दुखी रहें कुछ दिनों की खुशी के बदले | आप जयन्त की जन्मपत्री भिजवा दीजिये | भिजवा क्या दीजिये, हम खुद ही आकर ले जाएँगे | प्यासा कुंए के पास जाता है न कि कुंआ प्यासे के पास | लड़की वाले जाते हैं चलकर लड़के वालों के दरवाज़े | हमारा तो सौभाग्य है कि लड़के वाले चलकर हमारे पास आए हैं | कुंआ प्यासे के पास आया है लाला जी, अगर ये रिश्ता जुड़ गया तो हम तो सच में गंगा नहा जाएँगे…” बोलते बोलते भावातिरेक में पिताजी की आँखें भर आई थीं और गला भर्रा गया था | लगभग वही हाल वहाँ खड़े बाक़ी सब लोगों का भी था – माता जी, लाला जी, भाभी, सरोज…

कुछ पल ऐसे ही गुज़र गए तब माहौल को हल्का करते हुए लाला जी ही बोले “पंडित जी, शादी तो जयन्त की सरोज के साथ ही होगी | हाँ जन्मपत्री हम भिजवा देंगे आपके पास – तसल्ली कर लीजियेगा…” और सरोज के सर पर प्यार से हाथ फेर कर लाला जी और माता जी घर लौट गए थे |

क्रमशः……….

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सौभाग्यवती भव – अध्याय अठारह

अठारह – सरोज और जयन्त

नीलम सरोज को देखने आई थी | मिनी के स्कूल में वार्षिकोत्सव था और उसने जो डाँस किया था सबने उसकी सराहना की थी | एक कप मिला था पुरुस्कार स्वरूप | मिनी ने घर आकर सबसे पहले सरोज को दिखाया तो सरोज की खुशी उस दिन देखते ही बनती थी | अचानक मिनी पूछ बैठी “अम्मा, तुमने अपने सारे प्राइज़ क्यों दे दिए लोगों को ? आज होते तो में भी तो देखती…”

“अरी मैंने कहाँ दे दिये, भगवान ने छीन लिये एक एक करके सारे…” सरोज ने जवाब दिया और खो गई फिर से अतीत में |

सरोज के स्कूल में वार्षिकोत्सव था | डिबेट, निबंध जैसे पढ़ाई लिखाई से सम्बन्धित गतिविधियों में या स्पोर्ट्स में तो उसकी कभी रूचि थी ही नहीं | हाँ नाच गाने के जितने भी कार्यक्रम होते थे उनकी वो जान थी | कोई भी छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कार्यक्रम उसके बिना हो ही नहीं सकता था | पिताजी के लिखे गीतों की खुद ही धुन बनाती, हारमोनियम पर बजाकर देखती, स्कूल में जाकर दूसरी लड़कियों को सिखाती, डाँस तैयार कराती – और फ़ाइनल डे पर चढ़ जाती स्टेज पर धूम मचाने | सारा शहर कार्यक्रम देखने आता और सरोज की तारीफ़ों के पुल बंध जाते | दूसरे दिन हर किसी की जुबान पर बस उसी का नाम होता | पिताजी और भाभी को गर्व होता था अपनी लाडली पर | भाभी भी खुद अपने हाथों से कार्यक्रम के लिये ड्रेसेज़ तैयार करती थीं | स्कूल की सारी लड़कियाँ उससे दोस्ती गाँठने को बेताब रहतीं | पर उसकी ख़ास सहेलियाँ थीं ठेकेदार साहब और डाक्टर साहब की लड़कियाँ | इन दोनों ही घरों में उसका सपरिवार आना जाना था | डाक्टर साहब तो ख़ैर पिताजी को अपना बड़ा बेटा ही मानते थे | तीनों घरों की लड़कियाँ किसी भी एक घर में इकठ्ठा हो जातीं और मचाया करतीं धमा चौकड़ी | जयन्त भी जान बूझ कर ऐसे मौकों पर सरोज के रूप का मधुपान करने के लिये वहाँ मौजूद रहने की कोशिश करते थे और लड़कियों की धमा चौकड़ी में अक्सर खुद भी शामिल हो जाया करते थे | ऐसे में कई बार जाने अनजाने सरोज से टकरा भी जाया करते थे – और सरोज के बदन में झुरझुरी सी दौड़ जाया करती थी | जयन्त का क्या होता था – भगवान जाने | ठेकेदारनी जयन्त के दिल की बात जानती थीं या नहीं – पर उन्हें सरोज बहुत पसंद थी और गाहे बगाहे उसके मना करने पर भी उसे कुछ न कुछ भेंट देती रहती थीं | पिताजी और भाभी ने कई बार मना भी करना चाहा तो ठेकेदारनी ने चुप कर दिया “पण्डित जी आपकी लड़की को तो जितना दें कम है | उसे कुछ भी देकर हमें सुख मिलता है | आप क्यों छीनना चाहते हैं वो सुख हमसे ?”

जयन्त ? हाँ, ठेकेदार साहब की दो बेटियों में से बड़ी बेटी शीला शक्ल सूरत में बिल्कुल अपनी माँ पर गई थी | छोटी किरण ठेकेदार साहब पर गई थी | बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी और छोटी की भी शादी तो हो चुकी थी पर गौना अभी बाक़ी था | दोनों बहनें आराम से अपने पिता के घर रहने आई हुई थीं और सोचती थीं की भाई का ब्याह करवाके ही वापस जाया जाए अपनी अपनी ससुरालों को | सरोज से काफ़ी बड़ी थीं, पर अच्छी सहेलियाँ थीं उसकी | शीला की शादी के वक़्त तो सुना चार चार हाथियों के क़ाफिले के साथ पूरे गाजे बाजे से बारात चढ़वाई गई थी | और ये भी कि ठेकेदार साहब ने बाड़े में ढेर सारे गुलाब के फूलों का गुलाबजल तैयार करवाया था और जगह जगह बाल्टियों में भरवाकर रखवा दिया था | महावतों के इशारों पर हाथी अपनी सूँड में वो गुलाबजल भरकर बारातियों पर और सड़कों पर छिड़काव करते चल रहे थे | ये बात खुद शीला बुआ जी के देवर गोस्वामी जी ने बताई थी नीलम को जब वो पप्पू रग्घू के केस के सिलसिले में उनसे मिलने गई थी | खो गए थे गोस्वामी जी भी अपने भाई और ठेकेदार साहब की बेटी शीला के भव्य विवाहोत्सव की यादों में | ठेकेदार साहब का इकलौता बेटा जयन्त दोनों बहनों से छोटा था और माँ बाप दोनों का एक ख़ूबसूरत सम्मिलन था – बाप जैसा साँवला रंग, चौड़ा भरे भरे बालोब वाला सीना, लम्बा कद तो माँ जैसे नैन नक्श | सरोज ने पिताजी के बाद अगर किसी को “कामदेव का अवतार” कहा था तो वो जयन्त ही थे | जयन्त सरोज के घर तो कभी नहीं आए थे – पर स्कूल की पढ़ाई पिताजी के ही स्कूल में हुई थी और बाद में तीन साल लखनऊ में रहकर पढ़े थे – होस्टल में | पिताजी के होनहार विद्यार्थियों में से थे | एक बात और थी – संगीत का ख़ासा शौक़ रखते थे और जिन उस्ताद जी से पिताजी ने सितार और जलतरंग की शिक्षा ली थी उन्हीं से जयन्त बाँसुरी सीख रहे थे | नीलम को याद है कि जीजा जी जब गाते थे तो रफ़ी साहब की तस्वीर उसकी आँखों के सामने आ जाती थी | बिल्कुल उस्तादों की ही तरह निपुण हो गए थे बाँसुरी बजाने में और कई बार गोष्ठियों में फ़र्माइश होती थी पिताजी के सितार या जलतरंग के साथ जयन्त की बाँसुरी कि जुगलबन्दी की | साँस रोके लोग सुनते रहते थे और रस में भरे झूमते रहते थे | सरोज तो हर गोष्ठी में होती थी – और उसके सौंदर्य की तरफ़ जयन्त का सहज आकर्षण था |

तो, मार्च सन् १९५४ की एक शाम, सरोज के स्कूल में वार्षिकोत्सव था और सरोज को उसमें डाँस करना था | मुख्य अतिथि थे ठेकेदार भगवानदास | सरोज पन्द्रह की पूरी होकर सोलह में चल रही थी और नौवीं क्लास में पढ़ती थी | आज के फंक्शन के लिये सरोज ने स्वागतगान और कुछ दूसरे कार्यक्रमों के अलावा एक लोकनृत्य भी तैयार किया था ग्रुप में – “काले भौंरे ने कली चटकाई रस लूटा तमाम…” भाभी ने भी नृत्य के भाव को समझते हुए सरोज के लिये अपनी एक साड़ी की सिलाई करके लहँगा बनाया था और नेफे तक ऊँची फिटिंग वाली मैचिंग चोली बनाई थी | मनिहार से मैचिंग चूड़ियाँ भी ख़रीद ली थीं | चुटीला उनके पास था ही | स्कूल जाकर खुद ही उसे ड्रेस पहनाकर पिन वगैरा लगाकर फिट की थी | वशिष्ठ बहन जी ने मेक अप किया तो भाभी और वशिष्ठ बहन जी एकटक देखती ही रह गईं – सरोज का खिला खिला रूप और भी खिल उठा था और उसकी चढ़ती जवानी बंधन तोड़ कर बह जाना चाहती थी | नज़र से बचाने के लिये वशिष्ठ बहन जी ने उसकी ठोड़ी पर दाहिनी तरफ़ काजल का एक छोटा सा तिल भी बैठा दिया था |

कार्यक्रम आरम्भ हुआ | सरोज को मुख्य अतिथि के लिये आरते का थाललेकर दूसरी कुछ लड़कियों के साथ स्कूल के गेट पर जाना था और मेहमानों का आरता उतारना था | दूसरी लड़कियों के हाथों में फूलमालाएँ थीं मेहमानों को पहनाने के लिये | दो मालाएँ सरोज के आरते के थाल में भी रखी थीं | बड़ी बहन जी और वाइस प्रिंसिपल बहन जी मेहमानों के साथ थीं | मेन गेट से भीतर आकर दाहिने हाथ को चार पाँच सीढ़ियाँ चढ़कर स्कूल के आर्ट्स ब्लाक के बरामदे में आया जाता था – जहाँ के मैदान में कार्यक्रम होना था – और उन सीढ़ियों पर ही मेहमानों का स्वागत होना था | नई नई जवानी, रूप और श्रृंगार के बोझ तले दबी सरोज आरते का थाल लिये इस तरह धीरे धीरे चलकर सीढ़ियों तक पहुँची मानों दूल्हे को जयमाल डालने जा रही हो स्वयंवर में – सखियों से घिरी | आज पहली बार न जाने क्यों उसका दिल धड़क रहा था – शायद वशिष्ठ बहन जी की बात पर “संभल के रहना सरोज, आज ज़रूर कोई तुम्हें अपना दिल दे बैठेगा…” और भाभी ने घुड़क कर उन्हें चुप करा दिया था और फिर दर्शकों में जाकर अपने लिये रिज़र्व सीट पर बैठ गई थीं | दिल शायद आज भाभी का भी धड़क रहा था – पण्डित ब्रह्मदत्त जी की बात याद आ रही थी उन्हें रह रह कर |

सरोज सहेलियों से घिरी सीढ़ियों पर पहुँची | सामने से मेहमान भी पहुँच गए थे – ठेकेदार साहब, बड़े कुँवर साहब, पिताजी और जयन्त | जयंत्की नज़र गई सरोज पर – आगे बढ़ना ही भूल गए और सीढ़ियों पर गिरते गिरते बचे | सरोज की नज़र गई जयन्त पर – अपनी आदत के मुताबिक उन्हें लड़खड़ाते देख उसे हँसी आनी चाहिये थी – – पर ये क्या – दिल और तेज़ धड़कने लगा था…

सरोज ने मेहमानों का आरता उतारा तो दीपक की जलती लौ में उसका चेहरा और भी दमकने लगा | दम साधे मेहमानों का टीका किया | फिर थाल साथ वाली लड़की को पकड़ाकर उसमें से माला उठाकर ठेकेदार साहब के गले में पहना दी | ठेकेदार साहब ने अपने गले से उतार कर वापस सरोज के गले में डाल दी “अरे बिटिया, हमारी तरफ़ से छोटा सा इनाम…” फिर दूसरी माला उठाई और जयन्त की ओर बढ़ने लगी पहनाने – जयन्त के सर तक हाथ पहुँचे ही थे कि – जयन्त ने उसका हाथ पकड़ कर माला अपने हाथ में ले ली और शरारत से मुस्कुराते हुए सरोज के गले में डाल दी | क्लिक… फोटोग्राफ़र फोटो ले चुका था…

बड़ी बहन जी और अग्रवाल बहन जी और साथ की लड़कियाँ हक्की बक्की ये सब देख रही थीं – कुँवर साहब को मज़ा आ रहा था – पिताजी भूरी आँखों से और मोती जैसे दाँत दिखाते हुए हौले से हँस रहे थे – ठेकेदार साहब पर जैसे कोई असर ही नहीं हुआ था इस सबका – पर सरोज…? लाज से गढ़ी जा रही थी और उसके गुलाबी गाल और लाल होकर तपने लगे थे और वो दोनों हाथ आपस में फँसाकर सर झुकाए खड़ी थी | सरोज के पास वो श्वेत श्याम चित्र फ्रेम किया हुआ काफ़ी अरसा रहा था | जयन्त के बाद विन्नी ने कहीं उठाकर रख दिया था जो बाद में कोठार में मिला था – दीमकों का खाया हुआ |

सभी मेहमान और टीचर्स स्टेज के सामने कुर्सियों पर जाकर बैठ गए थे | पिताजी भी भाभी के पास जाकर बैठ गए थे और उनके दिल में घिर आए तूफ़ान को उनके चेहरे पर पढ़ते हुए पूछा था “क्या हुआ…?” तो भाबी ने जवाब दिया था “खुद ही देख लेना अभी…” और चुप होकर बैठ गई थीं |

सरोज स्टेज के पीछे चली गई थी सहलियों के साथ – कार्यक्रम जो शुरू होना था – पर दिल संभाले नहीं संभल रहा था | वशिष्ठ बहन जी ने एनाउन्समेन्ट शुरू किया और सरोज ने ग्रुप के साथ स्टेज पर आकर स्वागत गान शुरू किया | हारमोनियम पर ज्वालाप्रसाद मास्टर थे और टेबल पर मुन्ना मिरासी | प्रोग्राम्स के दौरान ख़ासतौर पर इन्हें बुलाया जाता था | गाते गाते जब भी नज़र मेहमानों की तरफ़ जाती तो जयन्त को एकटक अपनी तरफ़ देखता पाकर सरोज की साँसें थम जातीं | कुछ दूसरे कार्यक्रम हुए | और अब बारी थी सरोज के ख़ास आइटम – काले भौंरे की | एनाउंसमेंट पूरा हुआ – ज्वालाप्रसाद मास्टर और मुन्ना मिरासी ने हारमोनियम और टेबल पर म्यूज़िक शुरू किया – गाने वाली लड़कियों ने गाना शुरू किया “काले भौंरे ने कली चटकाई रस लूटा तमाम | कैसे कली ये सब सह पाई हँसी महफ़िल तमाम…” और सरोज और उसकी सहेलियाँ धूम मचाती नाचती स्टेज पर पहुँच गईं |

डाँस खत्म हुआ | बाद में इन लड़कियों को स्टेज पर ही रहना था | क़रीब एक हज़ार दर्शक – जिनमें स्कूल के बच्चे भी थे और उनके माता पिता भी – अपनी अपनी सीट्स से उठकर खड़े हो गए थे और तालियों की गड़गड़ाहट खुले मैदान में दूर दूर तक गूँजती रही थी काफ़ी देर तक | पर सरोज और जयन्त तो कहीं और ही खोए हुए थे…

दूसरे दिन स्कूल की छुट्टी थी | आज सरोज की हिम्मत पिताजी और भाभी के पास जाने की नहीं हो रही थी | न जाने क्यों – उसे लग रहा था कि कल जो नहीं होना चाहिये था वही कुछ हुआ | पर पिताजी और भाभी ऐसे बने हुए थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं | पर क्या ये सब सरोज का भ्रम था…? अपने आप से ही पूछने लगी सरोज |

जयन्त और सरोज के दिलों में लगी आग अब बढ़ने लगी थी | दोनों ही एक दूसरे के सामने आने का कोई न कोई मौक़ा ढूँढ ही लेते थे – जाने या अनजाने | हो सकता था बात शायद यहीं शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती अगर उस दिन “वो” न हुआ होता | हुआ यों कि उस दिन संगीत सन्ध्या थी | गोष्ठी ठेकेदार साहब ने अपने घर ही रखी थी | ज़ाहिर सी बात थी पिताजी के बिना तो कोई संगीत गोष्ठी हो ही नहीं सकती थी | माता जी ने मिश्रानी जी क्व हाथ कहला भेजा था कि मास्टरनी जी और सरोज को ज़रूर आना है | भाभी तो नहीं गई थीं – पर सरोज को पिताजी साथ लिवा ले गए थे | ठकेदार साहब की हवेली की उसी बाहर वाली बड़ी बैठक में इंतज़ाम किया गया था | सरोज पहुँची तो शीला और किरन उसे भीतर लिवा ले गईं | डाक्टर साहब की लड़कियाँ भी वहीं थीं | शान्ति को तो ख़ैर सितार भी बजाना था वहाँ – पिताजी की बहन होने के साथ साथ उनकी प्रिय शिष्या भी थी वो | सारी लड़कियाँ अन्दर अपनी बातों में मशगूल थीं कि बाहर से खबर आई कि गोष्ठी शुरू होने वाली है – सब लोग बैठक में आ जाएँ – और ठेकेदारनी को छोड़कर सारी लड़कियाँ बैठक में जा पहुँचीं | ठेकेदारनी रसोई में मिश्रानी जी को आदेश दे रही थीं कि क्या कुछ बनाना है और कैसे | ऐसे मोकों पर बैठक के सारे झाड़ फ़ानूस चमकाकर रोशनी कर दी जाया करती थी | रोशनी में नहाई छपाईदार जाजमों पर सफ़ेद मसनदें और उनके सहारे बैठे संगीत के शौकीन – माहौल पूरा बना हुआ था | सरोज बीच बीच में जयन्त को भी देख लेती थी कनखियों से – सफ़ेद अलीगढ़कट पायजामे और उस पर सुनहरे काम वाले कुर्ते में ख़ासे आकर्षक लग रहे थे | वो भी बार बार सरोज को ही देखे जा रहे थे – फ़ीरोज़ी शरारे पर रानी कलर की कुर्ती, उस पर ऊपर को मुड़ी हुई लम्बी लम्बी दो चोटियाँ फ़ीरोज़ी रिबन का फूल बनाए हुए – मानों दो काले नाग कुण्डली मारे बैठे हों और उनके माथों पर कोई फ़ीरोज़ी मणि चमक रही हो | सिटिंग शुरू हुई तो सबसे पहले शान्ति का सितार हुआ | तबले पर पिताजी ही थे | अब बारी थी सरोज की | पिताजी के कहने पर उसने भी दो चार ग़ज़लें सुना दीं | उसके बाद जयन्त से कहा गया “अरे भई जयन्त जी, बाँसुरी तो आपकी सुनेंगे ही, पर आज कुछ लाइट भी हो जाए तो कैसा रहे…?”

“जी जैसी आप सबकी मर्ज़ी… आज्ञाकारी बच्चे की तरह सर झुकाकर जयन्त ने कहा “अभी कुछ रोज़ पहले ही कुछ लिखा है अगर इज़ाज़त हो तो वही…”

“इरशाद इरशाद…” समवेत स्वर में सबने कहा और पिताजी ने सरोज को इशारे से आगे बुलाकर उसे हारमोनियम पकड़ा दिया और खुद तबला सँभाल लिया | जानते थे कि जयन्त के गाने पर ज्वालाप्रसाद जी तो बजाएँगे नहीं – ये ग़ज़लों वज़लों पर बजाना उन्हें पसन्द नहीं था | धड़कते दिल और कांपते हाथों से सरोज ने हारमोनियम सँभाल लिया | बचपन से ही किसी के भी साथ संगत कर सकती थी – सुरों की ग़ज़ब की पहचान थी उसे | जयन्त ने गौर से सरोज को देखा और उसकी हालत देख मुस्कुरा दिये | फिर गला खँखार कर आलाप भरके शुरू हो गए “ज़िंदगी में बहार लाने को तेरी मुस्कुराहट के तलबगार हैं हम | शर्मगीं नज़रें उठाके देख ज़रा, निगाहे मस्त के तलबगार हैं हम |” शेर सुनते ही पिताजी के मुँह से अनायास ही “वाह…” निकल पड़ी | सरोज मतलब समझ रही थी शेर का और उसकी देल की धड़कन और बढ़ती जा रही थी | अब जयन्त ने पूरी ग़ज़ल पेश की –

“कितनी ख़ूबसूरत हो, कभी देखा क्या आईना ?
नहीं देखा, तो मेरी नज़रों को समझ लो आईना ||
तुम्हें बनाया है फ़ुर्सत में देखो तो मुसव्विर ने |
नहीं सानी तेरा कोई, यही कहता है आईना ||
तुम्हारी ज़ुल्फ़ देखें तो फ़रिश्तों की उड़ें नींदें |
ये कजरारी निगाहें बोलती हैं, देखो आईना ||
वो मीठा सा तबस्सुम इन लरज़ते से लबों पर है |
क़यामत देंगे ये बरपा, यही कहता है आईना ||
जहाँ तुम ये क़दम रख दो, बहारें ही बहारें हैं |
बिना तेरे खिज़ां भर है, यही कहता है आईना ||
बुत-ए-मरमर कभी तो दे मुहब्बत की सदा तू भी
कि डूबूँ तेरी मस्ती में, यही कहता है आईना ||”

सरोज समझ रही थी कि ये ग़ज़ल किसके लिये गाई जा रही थी – और इसीलिये हारमोनियम बजाती बजाती खुद में ही सिमटती चली जा रही थी |

ग़ज़ल खत्म हुई और सभी श्रोताओं की वाह वाही के साथ पिताजी ने आश्चर्य से कहा “भई छुपे रुस्तम निकले जयन्त जी ? अभी तक तो हम बस यही जानते थे कि गाने बजाने का ही शौक़ है | पर आज तो आपने क़माल ही कर दिया…” और जयन्त शरमाई हँसी हँस कर रह गए |

अब बारी थी शुद्ध शास्त्रीय संगीत की | ज्वालाप्रसाद जी बीच में आ गए थे गाने के लिये | पिताजी ने हारमोनियम सँभाला, मुन्ना मिरासी ने तबला और दिनेश तानपूरे पर आया | सुर मिलाए गए | ज्वालाप्रसाद जी ने सुर छेड़ा | ये सब चल ही रहा था कि सरोज को बाथरूम जाना पड़ा | सरोज हवेली के चप्पे चप्पे से वाकिफ़ थी तो कोई दिक्क़त होने का प्रश्न ही नहीं था | काम करके बाहर निकली तो दिल धक् से रह गया – बाथरूम के दरवाज़े पर जयन्त खड़े थे – सरोज के बाहर निकलने के इंतज़ार में बाथरूम की दीवार का सहारा लिये और दोनों हाथ कोहनी से बाँधे हुए | दोनों की नज़रें मिलीं | जयन्त की आँखों में कुछ ऐसा था कि सरोज ने शरमाकर नज़रें झुका लीं और दूसरी दीवार की तरफ़ से वहाँ से जाने लगी | जयन्त के पीछे पहुँची ही थी कि – जयन्त ने कोहनी से उसका हाथ पकड़ लिया और पीछे घूम कर उसकी तरफ़ देखने लगे | होस्टल के पढ़े हुए थे तो संकोच कुछ था ही नहीं | पर सरोज की हालत पतली हुई जा रही थी | न हाथ छुड़ाते बनता था न वहाँ से जाते | जाना चाहती थी पर जा नहीं पा रही थी | चौड़े माथे पर पसीने की बूँदें छलक आई थीं | दिल इतनी ज़ोरों से धड़क रहा था कि खुद अपनी ही धड़कनें – धक् धक् धक् धक् – सुनाई पड़ रही थीं | जयन्त की तरफ़ देखते भी नहीं बन रहा था | सर इतनी नीचे झुकाया हुआ था कि जैसे ज़मीन में गढ़ जाएगी | अचानक लगा कि शरीर जवाब दे रहा था | गिरने से बचने के लिये दूसरे हाथ से बाथरूम की दीवार पकड़ ली और पीठ जयन्त की ओर किये हुए चेहरा पूरी तरह दीवार की तरफ़ फेर लिया |

“सामने देखो वरना नीचे गिर पड़ोगी…” मुस्कुराते हुए जयन्त बोल रहे थे और सरोज और भी ज़्यादा ज़मीन में गढ़ी जा रही थी |

कुछ पल ऐसे ही गुज़र गए | जयन्त आगे बढ़े और दूसरे हाथ से सरोज की ठुड्डी पकड़ कर उसका चेहरा अपनी तरफ़ घुमा लिया | सरोज उसी तरह से निष्पन्द – एक हाथ जयन्त के हाथ में – दूसरे से दीवार का सहारा – चेहरा जयन्त की तरफ़ – आँखें बंद – होंठ लरज़ते हुए – माथे पर पसीने की बूँदें – दिल की धड़कनें और तेज़…

“डर लगता है मुझसे…?” जयन्त ने पूछा | सरोह अभी भी निष्पन्द – जड़ बनी हुई | जयन्त ने सरोज का हाथ छोड़ दिया और दोनों हाथों में सरोज का चेहरा भरकर ऊपर उठाकर एकटक देखते रहे | सरोज ने धीरे से जयन्त के हाथ अपने चेहरे से हटाए और पास ही खड़े एक पेड़ का सहारा लेकर शरीर का भार उसी पर डाल दिया |

आँखें अभी भी बन्द – भीतर पुतलियों में कंपकंपाहट थोड़ी थोड़ी – जयन्त थोड़ा और आगे बढ़े और सरोज के सर के ऊपर से उसी पेड़ को पकड़ कर खड़े हो गए “कुछ तो बोलो… हम आज पहली बार तो मिल नहीं रहे…” याचना सी करते जयन्त बोले |

सरोज अभी भी उसी तरह आँखें बन्द किये जड़ बनी खड़ी…

“तुम इतनी सुन्दर क्यों हो सरोज…? जब भी तुम्हें देखता हूँ तो खुद को रोक नहीं पाता…”

सरोज के होंठ थोड़ा और लरज़े…

“तुम्हारे ये लरज़ते से होंठ – दिल चाहता है इन्हें चूम लूँ…”

सरोज के पूरे बदन में कंपकंपी सी दौड़ पड़ी…

“तुम्हारा ये तराशा हुआ संगमरमरी बदन – जी चाहता है कसके बाँहों में जकड़ लूँ…”

सरोज की पुतलियाँ बन्द आँखों के भीतर ही थोड़ा और फड़की…

“तुम्हारी आँखें बहुत कुछ बोल देती हैं सरोज – इन्हें खोलकर देखो तो…”

सरोज ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया…

“शादी करोगी मुझसे…?” सीधा सा प्रश्न – बिना किसी लग लपेट के…

अचानक लगा कोई आ रहा था उसी तरफ़ | सरोज तुरंत वहाँ से भागी तो सीधी बैठक में ही पहुँचकर साँस ली |

थोड़ी देर बाद जयन्त भी वापस आ गए थे | उनकी और पिताजी की बाँसुरी और सितार की जुगलबन्दी भी हुई थी | पर सरोज जैसे वहाँ थी ही नहीं | जयन्त की तरफ़ देखने का साहस भी नहीं जूता पा रही थी आज वो |

खुद सरोज और जीजा जी कि मुँह से ही नीलम ने ये सारे किस्से सुने थे – जीजा जी उन बातों को याद करके ख़ूब हँसते थे और सरोज “हटो भी – क्या बच्चों के सामने ये सारी बातें कर रहे हो…?” बोलकर झिड़क देती थीं जीजा जी को | और नीलम को लगता था जैसे कोई मीना कुमारी और दिलीप कुमार या मधुबाला और दिलीप कुमार की फ़िल्म देख रही हो |

और वो किस्सा जब जयन्त सरोज को घुड़सवारी पर ले गए थे | हुआ यों कि जब सरोज और जयन्त का मेल जोल बढ़ा तो अपने ही घर पर एक दिन जयन्त सारी लड़कियों को अपनी घुड़सवारी के किस्से सुना रहे थे कि किस तरह जंगल जाते वक़्त घोड़ी के पैर फ़िसल गया था और वो नीचे खाई में गिरते गिरते बची थी | कुछ देर को तो घबरा सी गई थी वो भी – औरत ज़ात थी न… फिर जयन्त ने प्यार से थपथपाया तब कहीं जाकर शांत हुई | “औरत जात…” कुछ इस तरह से कहा जयन्त ने जिसे सुनकर सरोज ने मुँह बिचका दिया और बोली “हम क्या जानें ? हमें कभी कराओ घुड़सवारी तब तो जानें भी हम…” बस जयन्त तो जैसे इसी बात के इंतज़ार में थे | माता जी भी कहने लगीं कि हाँ हाँ घुमा ला न… और तुरंत जयन्त ने सईस को भेजकर घोड़ी बुलवा ली | घोड़ी जनानखाने के आँगन के बाहर पहुँचा दी गई | सरोज ने पहले तो ना नुकर की कि वो तो ऐसे ही मज़ाक कर रही थी | फिर ज़्यादा ज़िद करने पर जयन्त के साथ बाहर आ गई | जयन्त ने दोनों हाथों से सँभाल कर सरोज को घोड़ी पर बैठाया तो सरोज के पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गई | बाद में जयन्त बैठे और पैर फँसा कर घोड़ी को एड़ लगाई तो वो सरपट फाटक से बाहर | उन दिनों सड़कें ज़्यादातर ख़ाली ही रहा करती थीं | कोटद्वार रोड पर घोड़ी दौड़ा दी | घोड़ी की लगाम कुछ इस तरह पकड़ी हुई थी जयन्त ने कि सरोज पूरी तरह उनके आगोश में समाई जा रही थी और उसके भीतर कहीं कुछ हलचल भी बढ़ती जा रही थी | रेलवे फाटक के पार पहुँच कर एक जगह पेड़ की छाया में जयन्त ने घोड़ी रोक ली और और सरोज – जो अभी तक सर झुकाए ही बैठी थी – की ठुड्डी सीधे हाथ की ऊँगली से पकड़ कर उसका चेहरा ऊपर उठाया | एक नज़र उसने जयन्त की तरफ़ देखा | न जाने क्या था उन आँखों में कि फिर से शरमाकर निगाहें झुका लीं |

“डर लगता है मुझसे…?”

“ऊँ हूँ…”

“फिर, न बात करती हो न देखती हो | क्यों…?” और घोड़ी पर बैठे बैठे ही पेड़ से एक पीला फूल तोड़कर सरोज के बालों में खोंस दिया |

सरोज फिर से पागल… धीरे से बोली “घर चलें…?”

“जल्दी है…?”

“नहीं वो… भाभी ने जल्दी लौटने को कहा था…”

“ऐसा क्या…?” सरोज की हालत पर धीरे धीरे प्यार से मुस्कुराते हुए जयन्त ने कहा और घोड़ी वापस घुमा दी | घोड़ी शायद दो प्रेमियों के दिलों की बात जानकर ही अब तक धेरे धीरे नीचे सर झुकाए हिला रही थी – अब वापस घर के रास्ते चल पड़ी थी – जैसे मंज़िल का पता था उसे |

जयन्त को डायरी लिखने का शौक़ था | पहले तो सिर्फ़ शेरो शायरी ही लिखते थे | पर सरोज से मिलने के बाद से तो उसके रूप के चर्चे ही ज़्यादा होते थे | ऐसे ही एक दिन कुछ लिख रहे थे | सरोज पहुँच गई थी – माता जी ने बुलवाया था | देखा डायरी लिये बैठे हैं | सरोज ने माँगी पढ़ने को तो मना कर दिया और कहीं जाकर छिपा दी | सरोज ने नज़र बचाकर देख ली | बाद में चुपके से निकाल लाई | पढ़ने बैठी तो थोड़ी ही पढ़कर शरमा गई | वापस रखने जा रही थी कि जयन्त किसी काम से वापस आ गए | शर्म से लाल सरोज के चेहरे को देखा तो बीच में ही कोहनी से पकड़ लिया “पढ़ ली…?”

“छोड़ो न…”

“ऊँ हूँ, पहले चोरी की सज़ा…”

“क्या…?”

“इधर देखो मेरी तरफ़…” और अपने हाथ से सरोज की ठोड़ी पकड़ कर अपनी तरफ़ की कि तभी किसी के आने की आहट हुई और जयन्त पीछे हट गए सरोज को छोड़कर “ये ग़ज़ल उस सिटिंग के लिये लिखी थी मैंने… पढ़ी…?”

जयन्त को बात बदलते देख सरोज खिलखिलाकर हँस पड़ी और जयन्त खो गए डायरी और सारा काम भूलकर उसकी सितार की झनकार सी मीठी हँसी में…

ऐसी ही छोटी छोटी बातें जो सरोज के जीने का सहारा बनी रही थीं मरते दम तक… वरना तो उछ बचा ही नहीं था…

ख़ैर, समय पंख लगाकर उड़ता जा रहा था | जयं और सरोज का मेल जोल बढ़ चला था | इसके लिये जयन्त की बहन शीला ने ही जुगाड़ बैठाया था | हुआ यों कि सिटिंग वाले दिन जब किसी के आने की आहट सुन सरोज वहाँ से भागी थी तो वो शीला की ही आहट थी – जो जयन्त और सरोज को काफ़ी देर से गायब देखकर उन्हें ढूँढती वहाँ आ पहुंची थी और सरोज को दूसरे रास्ते से बैठक की तरफ़ भागते देख लिया था | जयन्त की तरफ़ देखकर पूछा था “ये सब क्या है ?”

“देख शीला तू समझ तो गई ही है सब कुछ | अब एक बात और साफ़ कर देता हूँ – शादी करूँगा तो सरोज के साथ वरना किसी के साथ नहीं…”

“हूँ… सरोज क्या कहती है…?” सोचती हुई शीला ने पूछा |

“उसने बात करने का मौक़ा ही कहाँ दिया ठीक से ? बस गर्दन ज़मीन में गढ़ाए खड़ी रही | तू कुछ कर ना…” बहन की मनुहार सी करती जयन्त बोले |

“अब मैं क्या कर सकती हूँ ?” थोड़ी अकड़ के साथ शीला बोली |

“बस एक बार मिलवा दे अपनी सहेली से | एक बार खुलकर पूछ लूँ उससे तो फिर लाला जी से बात करूँगा…” बहन को मनाते जयन्त बोले | ठेकेदार साहब को ये तीनों भाई बहन “लाला जी” कहा करते थे |

“और अगर उसने मना कर दिया ? या माता जी और लाला जी नहीं माने ? या हो सकता है गुरु जी ही मना कर दें… तब क्या करोगे ?” शरारत से आँखें मटकाती शीला ने पूछा – हालाँकि सरोज के दिल की बात वो अच्छी तरह समझती थी | साथ ही जानती थी कि माता जी का बहुत स्नेह है सरोज पर और वे सरोज को अपनी बहू बनाना चाहती हैं | हाँ सरोज के घरवालों की तरफ़ से वो निश्चित रूप से वो कुछ नहीं कह सकती थी | पर शायद उसे भी अनुमान था कि उन लोगों की हैसियत देखकर शायद गुरु जी उनके घर लड़की देना अपना सौभाग्य ही समझें |

“तब की तब देखि जाएगी | पर एक बार सरोज से तो बात करवा ना…”

“सोचेंगे…” अपनी चोटी नचाते हुए हाथ आगे करके शीला ने जवाब दिया | जयन्त बहन को समझते थे – बोले “अरे बाबा पहले बात करवाओ, बाद में नेग भी दे देंगे… मरी क्यों जा रही है ?”

और तब शीला ने रमा के साथ मिलकर बात बनाई थी | उनके घर दुमंजले पर बने कमरे अक्सर ख़ाली ही पड़े रहते थे | तो सरोज और जयन्त का मिलाप उन्हीं में से एक कमरे में करवाने की सोची गई | और जयन्त को बताकर एक दिन सरोज को बहाने से वहाँ बुला लिया |

सरोज आजकल कुछ खोई खोई सी रहने लगी थी | भाभी को कुछ कुछ शक तो होने लगा था कि कोई चक्कर ज़रूर है | पर पिताजी से कहा तो मन का वहम बताकर टाल दिया था उन्होंने | उस दिन शीला और रमा बुलाने आईं तो उनसे पूछने की भी कोशिश की भाभी ने, पर उन्होंने भी यही कहा कि सब ठीक चल रहा है |

सरोज को लेकर दोनों लड़कियाँ ऊपर वाले कमरे में चली गईं | थोड़ी देर बाद जयन्त भी पहुँच गए | नीचे माता जी को प्रणाम करके उनके पास ही तख़्त पर बैठने लगे तो माता जी ने बताया कि सारी लड़कियाँ ऊपर हैं – वे चाहें तो वे भी जा सकते हैं – और इस तरह जयन्त के ऊपर जाने का रास्ता साफ़ हो गया | जयन्त वैसे भी इनके घर आते जाते रहते थे और लड़कियों से घर के सदस्य की तरह ही बतियाते रहते थे | लिहाज़ा किसी को शक भी नहीं हुआ |

इन सारी बातों से बेखबर सरोज ऊपर सबके कहने पर कोई गीत सुना रही थी | जयन्त चुपचाप पहुँचकर दरवाज़े पर खड़े हो गए | गाना खत्म हुआ तो जयन्त ने ताली बजाई और सरोज ने घबराकर उधर देखा | जयन्त को देखते ही सरोज जड़ बनकर खड़ी हो गई | लड़कियाँ बाहर निकलने लगीं – पर सरोज से हिला भी नहीं जा रहा था | जयन्त धीरे धीरे उसके पास पहुँच चुके थे | सरोज को कन्धे से पकड़ कर उन्होंने वहीँ पलंग पर बैठा लिया | चित्रलिखित सी सरोज पलंग पर बैठ गई | जयन्त थोड़ी देर उसका रूप निहारते रहे – बिना किसी मेकअप के सरोज के गुलाबी गाल लाल हो गए थे और छूने पर तमतमा रहे थे | जयन्त का हठ सरोज के गालों पर गया तो उसके बदन में झुरझुरी दौड़ गई और तभी उसे ध्यान आया कि सारी लड़कियाँ बाहर जा चुकी हैं और यहाँ कमरे में बस वे दोनों ही हैं | सरोज अचकचा कर बाहर जाने को उठी तो जयन्त ने उसे फिर से पकड़ कर बैठा लिया | “कोई देख लेगा…” पहली बार सरोज के मुँह से बोल फूटा था |

“कोई नहीं आएगा | रिलैक्स…” सरोज जड़ बनी बैठी थी “उस दिन मेरी बात का जवाब दिये बिना तुम चली गई थीं | मैं चैन से नहीं बैठ पाया हूँ उस दिन से | तभी शीला और राम से कहके तुम्हें यहाँ बुलवाया है |” सरोज आँखें फाड़े जयन्त को देख रही थी “देखो सरोज, घुमा फिराकर बात करनी मुझे नहीं आती | में तुम्हें हमेशा से चाहता हूँ और तुमसे शादी करना चाहता हूँ | मैं पसन्द हूँ तुम्हें ? अगर नहीं भी हो तो भी चलेगा | पर जो भी दिल में हो मेरी ही तरह साफ़ साफ़ बोल देना प्लीज़… एक बात और, अगर तुम मुझे पसन्द नहीं भी करती हो या मुझसे शादी नहीं करना चाहती हो तो भी मेरी ही तरह साफ़ साफ़ बता देना – कम से कम किसी उम्मीद में तो नहीं रहूँगा…” सरोज का हलक सूख रहा था | कुछ बोलते नहीं बन रहा था उससे | बस पत्थर बनी एकटक जयन्त को निहारे जा रही थी | आज उसकी गर्दन उस दिन की तरह ज़मीन में गढ़ी हुई नहीं थी पर एक आश्चर्य का भाव ज़रूर था आँखों में कि कोई इंसान इस तरह साफ़ साफ़ कैसे पूछ सकता है किसी लड़की से ?

“सरोज…” जयन्त ने सरोज का हाथ अपने हाथों में लिया तो जैसे सरोज सोते से जागी | जयन्त एक हाथ में उसका हाथ पकड़ कर दूसरे हाथ से सहला रहे थे “कुछ तो बोलो… देखो मेरी जान निकल जाएगी अगर तुम कुछ नहीं बोलीं…”

“वो… मैंने… तो… कभी ऐसा… सोचा ही… नहीं…” थूक गटकती और अटकती अटकती सरोज बोली |

“सच बताना, उस दिन के बाद क्या चैन से सो पाई तुम…?”

“वो…” और सरोज फिर चुप |

“देखो सरोज जैसा मैंने साफ़ साफ़ कहा है वैसा ही स्पष्ट में तुमसे जानना चाहता हूँ… हाँ या ना…”

सरोज के दिल की धड़कनें बहुत तेज़ तेज़ चल रही थीं | उसी दिन की तरह उसके माथे पर पसीना घिर आया था | हाथ पाँव ठंडे पड़ गए थे | बदन काँप रहा था | वो तो गनीमत हुई कि नीचे से चाय पकौड़े लेकर भीमसिंह आ गया था जिसे देख रखवाली कर रही सारी लड़कियाँ कमरे में वापस आ गई थीं | सरोज ने कुछ राहत की साँस ली थी |

फिर तो आए दिन का काम हो चला था | कहीं भी कैरम या ताश लगा लेते, तो कभी भाभी से ज़िद करके शतरंज की बिसात ही बिछ जाती – भाभी और जयन्त दोनों ही शतरंज में माहिर थे | भाभी जब सामने नहीं होतीं तो नाश्ता पानी करते करते आँखों आँखों में सरोज और जयन्त का प्रेमालाप चलता रहता…

और फिर आई १९५४ की दिवाली – वो वक़्त जिसका इंतज़ार सरोज और जयन्त दोनों को ही था | जिसके कारण एक बार तो घर में कोहराम मच गया था और अगर वो सब न हुआ होता और पंडित ब्रह्मदत्त जी के “पर…” पर भाभी की ही तरह ध्यान दिया होता रो शायद सरोज आज इस हाल को न होती…

क्रमशः………….

सौभाग्यवती भव – अध्याय सत्रह

सत्रह – ठेकेदार भगवानदास

पप्पू रग्घू के केस के सिलसिले में नीलम आज गोस्वामी जी से मिलके आई थी कि राज्यपाल के यहाँ माफ़ी की अर्ज़ी लगा रहे हैं तो शायद वे कुछ मदद कर सकें | गोस्वामी जी बिब्बी की बड़ी ननद शीला बुआ जी के देवर हैं | किसी ऊँचे सरकारी ओहदे पर हैं | शीला बुआ जी और फूफा जी तो नहीं रहे पर रग्घू के कहने पर नीलम नरेश के साथ उनके घर गई थी | पहली बार मिल रही थी तो कुछ संकोच था कि पता नहीं पहचानेंगे भी या नहीं | पर देखते ही पहचान गए “सरोज भाभी जी से काफ़ी रिजेंम्बलेंस है आपकी…”

“हाँ कहते तो सब यही हैं…” शरमाते हुए नीलम ने जवाब दिया और सोचने लगी वो तो बिब्बी की दस प्रतिशत भी नहीं है | कहाँ बिब्बी शहर की सबसे ख़ूबसूरत लड़की – अगर उस ज़माने में सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का चलन होता और बिब्बी उसमें भाग लेतीं तो वही चुनी जातीं | तभी तो जीजा जी ने प्रपोज़ किया था उन्हें | वरना कहाँ उनका घर और कहाँ हमारा एक गरीब मास्टर का घर ? ज़मीन आसमान का फ़र्क | पर होनी को कौन टाल सकता है ? बिब्बी के सौन्दर्य पर फ़िदा होकर कभी ठेकेदार भगवानदास के इकलौते बेटे जयन्त ने ज़िद पकड़ ली थी कि शादी करनी है तो सरोज के साथ वरना करनी ही नहीं |

ठेकेदार भगवानदास – शहर के सबसे पुराने खानदानी रईस और रौब दाब वाले आदमी – व्यवसाय से जंगलात के ठेकेदार, साथ ही शहर में कई साडी दुकानें, आटाचक्की, स्पेलर, सिनेमाघर और शहर के बाहर दो दो गन्ने के क्रेशर – आधे से ज़्यादा नजीबाबाद के मालिक –लम्बा चौड़ा आकर्षक व्यक्तित्व – रंग कुछ कुछ साँवला, लम्बे चेहरे पर रौबदार मूँछें, बड़ी बड़ी सुरमा डाली हुई आँखें, पहनावा हर मौके के लिये अलग – शहर की आम सभाओं में और घर में धोती और शुद्ध सोने चाँदी की ज़री के काम का कुर्ता, सर पर पगड़ी और हाथ में सोने की जड़ाऊ मूँठ वाली छड़ी, पैरों में कामदार जूतियाँ, कुर्ते की ऊपर की ज़ेब में सोने की चेन वाली ज़ेबघड़ी – जिसकी चेन ज़ेब के बाहर लटकती रहती थी | राजा साहब और रायबहादुर साहब के साथ शिकार पर जाना हो तो ढीली ढीली पैंट जो कमर पर से ऐसी लगती थी जैसे घेर वाली हो और जिसके पाँयचे घुटनों तक लम्बे जूतों में दबे रहते थे और ऊपर पैंट के भीतर दबी शर्ट और उसके ऊपर बिन बाजू की ऊँची बंडी जैसी कोई चीज़ और सर पर हैट | किसी दूसरी तरह के फंक्शन में जाना हो – जैसे किसी मुशायरे या कवी सम्मेलन में या संगीत गोष्ठियों में या फिर स्कूल के फंक्शन्स में तो अलीगढ़कट या चूड़ीदार पायजामे के ऊपर ज़री का लम्बा कुर्ता और सर पर टोपी और कुर्ते के ऊपर की ज़ेब में वही सोने की चेन वाली घड़ी और हाथ में वही जड़ाऊ मूँठ वाली छड़ी |

ठेकेदार साहब की बहुत बड़ी हवेली थी | अंग्रेज़ों के ज़माने में लालढांग से लेकर देहरादून तक के कत्थे और बाँस के सारे जंगलात का ठेका उन्हें ही मिलता था | लालढांग से लेकर देहरादून तक ऊपर पहाड़ ही पहाड़ काफ़ी घना बाँसों का जंगल था | लालढांग में ठेकेदार साहब के पिताजी – जिनका नाम नीलम को कभी पता नहीं चल सका सिवाय “पण्डत जी” के – सपरिवार रहा करते थे | कोई ज़्यादा बड़ा परिवार नहीं था उनका | दो भाई थे जो कभी राजस्थान शिफ़्ट हुए तो पलट कर वापस नहीं आए | बहन कोई थी नहीं ता हुई नहीं ये किसी को नहीं मालूम | परिवार में बस पत्नी, बेटा भगवानदास और दो बेटियाँ थीं | उन्हीं दो बेटियों में से एक की बाटी थी शकुंतला – जिसका ज़िक्र कथा के आरम्भ में ही आया था | पंडत जी के जो दो भाई राजस्थान शिफ़्ट हो गए थे वो तो व्यापार में घाटों के बाद मर खप गए थे | उनकी सन्तानें लालढांग वापस आ गई थीं अपने चाचा के पास रोज़ी रोटी की तलाश में और उन्हीं के पास रहकर मुनीमी कर रही थीं | बहुत बड़ा कारोबार था उनका – बाँसों के जंगल, कत्थे का काम, गन्ने के खेत, गुड़ चीनी का काम वगैरा वगैरा | पंडत जी के बारे में बस इतना ही पता है सरोज को भी और नीलम को भी | सरोज को ससुर सुनाया करते थे ये सारी बातें | नीलम को याद है वो किस्सा जो मौसा जी यानी सरोज के ससुर बड़ा रस लेकर सुनाया करते थे |

मौसा जी की दो शादियाँ हुई थीं | जीजा जी दूसरी शादी से थे | पहली शादी जब हुई तब दोनों पति पत्नी बच्चे ही थे | शादी के चार बरस पीछे तो गौना हुआ था | अभी गौना होकर बहू घर में आई ही थी… बहू के आने की खुशी में पंडत जी ने जी भरकर जश्न मनाया था जो तीन दिन रात तक चला था और न केवल गाँव भर को बल्कि आस पास के सेठ साहूकारों, ज़मींदारों और अंग्रेज़ों को भी उस जश्न में दावत दी गई थी | | लखनऊ से उस ज़माने की प्रसिद्द “बाई जी” को बुलाया गया था नाच गाकर मेहमानों का स्वागत करने के लिये | देसी घी के कनस्तर पर कनस्तर उंडेले गए थे पकवान बनाने में | तीन रातों का जश्न खत्म हुआ और सारे मेहमान उस जश्न की याद दिलों में सँजोए अपने अपने घरों को वापस लौट गए | अगली सुबह जब घर के लोग जागे और हवेली से बाहर निकले तो देखकर सन्न रह गए – हवेली की सारी दीवारों पर कुछ कागज़ चिपके हुए थे | तुरत फुरत घर के सभी लोग बाहर इकठ्ठा हो गए | मुँशी जी ने एक कागज़ पढ़कर सुनाया जिसका मजमून चाहे जो रहा हो, पर मतलब यही था “आज से तीन रोज़ बाद आती मावस को आपका नंबर है | अपनी तरफ़ से जो भी तयारी करनी हो कर लो…” नोटिस सुल्ताना डाकू की तरफ़ से था | कागज़ पढ़कर हर कोई दहशत में आ गया | पर पंडित जी निश्चिन्त थे | ऐसे ही वक़्त के लिये तो उन्होंने इतनी लम्बी चौड़ी पहलवानों की फौज़ पाली हुई थी | सुल्ताना डाकू उस वक़्त का शायद इनामी डाकू था | किसी अँगरेज़ अफ़सर ने उसे पकड़ने की क़सम खाई हुई थी | उन दिनों सुल्ताना डाकू का आतंक कुछ ऐसा फैला हुआ था जैसा कि फ़िल्म शोले में डाकू गब्बरसिंह का देखने को मिला था | सुल्ताना डाकू की कहानियों पर तो काफ़ी नौटंकी वगैरा भी जगह जगह देखने को मिल जाया करती थीं |

बहरहाल, पंडत जी को तीन दिन मिले तयारी करने के लिये जो उनके लिहाज़ से काफ़ी थे | अपने सारे पहलवानों के हाथों में पंडत जी ने बन्दूकें थमा दिन | हवेली के आगे पीछे के दोनों भीमकाय फाटक बंद कर दिये गए | हवेली की चरों तरफ़ की ज़मीन से लेकर छत तक अँगरेज़ सिपाहियों ने घेरा डाल दिया था | तभी पंडत जी को ख़याल आया कि क्यों बेटा बहू को नजीबाबाद वाली हवेली में भेज दिया जाए कुछ सामान देकर | अँगरेज़ अफ़सर के मना करते करते भी पंडत जी ने कुछ गठरियों में ज़ेवर रुपया पैसा वगैरा बाँध कर कुछ नौकरों के साथ बेटे बहू को फाटक से बाहर कर दिया | पर होनी तो कुछ और ही थी | इस सारी तैयारी में पंडत जी भूल गए थे कि इज्स दिन बाते बहू को भेज रहे हैं उसी दिन तो डाकुओं का हमला होने वाला था |

घोड़ों पर चढ़कर काफ़िला बढ़ चला पहाड़ी रास्ते से नजीबाबाद की तरफ़ | अभी कुछ दूर ही पहुँचा होगा गाँव की सीमा से कि सामने से धूल का गुबार उठता दिखाई दिया और घोड़ों की टापें सुनाई पड़ीं | मौसा जी और उनकी पत्नी तो बच्चों जैसे ही थे पर साथ वालों को समझते देर न लगी कि डाकू पहुँचने वाले हैं | आनन फानन में घोड़ों की पीठ पर खड़ा करके दोनों पति पत्नी को माल असबाब के साथ पास ही के विशालकाय पेड़ पर चढ़ा कर आदेश दिया गया कि जब ताज सब कुछ शांत न हो जाए क़तई न हिलें डुलें न ही कोई आवाज़ निकालें | साथ आए कुछ बंदूकधारी भी पेड़ों पर ही छिप गए और अपनी अपनी बन्दूकें सँभाल लीं | बाक़ी लोग घोड़ों पर सरपट दौड़ते पहाड़ी के दूसरी तरफ़ से हवेली की तरफ़ निकल गए सूचना देने | इसी बीच डाकुओं का क़ाफ़िला आ पहुँचा | दोनों तरफ़ से जमकर गोलियाँ चलीं – एक तरफ़ थे पंडत जी के सुरक्षाकर्मी और अँगरेज़ सिपाही और दूसरी तरफ़ थी मुट्ठी भर मगर आतंक का पर्याय बन चुके डाकुओं की फौज़ | दोनों तरफ़ के कई लोग मारे गए |पुलिस ने जबरदस्त किलेबंदी की थी मगर सुल्ताना डाकू तो एक ही था – कोई किलेबंदी उसे रोकने में नाक़ाम थी | हवेली का फ़ाटक तोड़कर डाकू भीतर घुस ही गए और काफ़ी लूट पाट मचाकर गोलियाँ चलाते अपनी नियत जगह – नजीबाबाद के पत्थरगढ़ के किले की तरफ़ भाग निकले | सिपाहियों ने भी पीछा शुरू किया | सिपाही पास आते चले जा रहे थे | सुल्ताना डाकू के कारतूस शायद खत्म हो गए थे, उसके घोड़े के एक पर में भी गोली लग गई थी और वो अकेला भी पड़ गया था | मौसा जी बताते थे कि बाद में पता लगा था कि उसे ज़िंदा ही पकड़ लिया गया था और सुना बाद में उसे फाँसी दे दी गई थी | उन्हें पता लगा था कि ये उसके जीवन का शायद आखरी डाका था |

उसके जीवन का तो ये आखरी डाका रहा होगा, पर मौसा जी यानी ठेकेदार भगवानदास के जीवन की ये सबसे दुखद घटना थी | गोलीबारी देखकर और गोलियों की आवाज़ें सुनकर उनकी पत्नी डरकर चीखने को हुईं कि उन्होंने कसकर उसका मुँह बन्द कर दिया जिससे डाकुओं को उनके पेड़ पर छिपे होने का पता न लग सके और तब तक उनके मुँह पर हाथ रखे रहे जब तक नीचे सब कुछ शान्त नहीं हो गया | बाद में जब उसके मुँह पर से हाथ हटाया तो पता चला वो बेहोश हो चुकी थी – कुछ डर से और कुछ मुँह दबाए जाने से | तुरंत पेड़ पर चढ़े दूसरे लोगों की मदद से उन्हें नीचे उतरा गया | हवेली के फाटक भी अब खुल चुके थे | सिपाही मुँशियों को साथ लेकर जहाँ हवेली में हुए जान माल के नुकसान का ज़ायज़ा लेने में लगे थे, वाहन पंडत जी शायद भीतर से डाके से दुखी पर ऊपर से सीना चौड़ा किये और गर्व से मूँछों पर ताव देते लोगों को यही समझाने में लगे हुए थे कि डाका भी तो बड़े लोगों के यहाँ ही डाला जाता है – भुक्खड़ों के यहाँ कोई क्या डाका डालेगा ? जो लोग मारे गए थे उनके घरवालों के लिये उसी वक़्त आर्थिक मदद की घोषणा भी कर दी थी | किसी ने सच ही कहा है कि पैसे का इतना गुरूर भी अच्छा नहीं होता – लक्ष्मी का स्वभाव बड़ा चंचल होता है | हर रात चाँदी की रात ही नहीं हुआ करती – बीच बीच में कभी कभी अमावस भी आती है… और न हर दिन ही सोने का दिन होता है – चमचमाते सूरज को भी कभी कभी बादलों की फौज़ अपने गुबार में छिपा लेती है | दुनिया में पैसे से भी बड़ी दौलत होती है – और वो है सुख शान्ति की दौलत | मग़रूर पंडत जी की नज़र फाटक की तरफ़ गई तो देखकर सन्न रह गए – भगवानदास जी अपनी बेहोश पत्नी को हाथों में उठाए मुँह लटकाए बंदूकधारियों के साथ वापस आ रहे थे | देखते ही गर्व से चौड़ा उनका सीना पल भर में नीचे बैठ गया | जल्दी जल्दी बहू को वहीँ तख़्त पर लिटा दिया गया और उसकी नब्ज़ टटोली गई तो पता चला कि वो तो न जाने कब की उस “भगवान” के पास पहुँच चुकी थी और ये “भगवानदास” तो पत्नी का निर्जीव शरीर हाथों में उठाकर ला रहे थे | सुल्ताना डाकू हवेली में डाका डालने के साथ साथ घर की सुख शान्ति पर भी डाका दाल गया था | तीन दिन पहले जहाँ जश्न का माहौल था, आज सुबह तक भी जो पंडत जी अपने पहलवानों और अँगरेज़ सिपाहियों के बल पर मूँछों पर ताव देते घूम रहे थे वही अब अफ़सोस कर रहे थे कि क्यों उनकी अक्ल मारी गई थी ? न वे बेटे बहू को वहाँ से सुरक्षित जगह भजने की सोचते न ये सब होता | उनकी सुरक्षा ही उनकी बहू की मौत का कारण बन गई थी | क्यों उन्होंने अपने बेटे बहू का विधाता बनने की सोची ? पर अब क्या हो सकता था… अब तो भाग्य ने अपना खेल दिखा ही दिया था…

इस घटना के बाद युवक भगवानदास का मन शादी से उठ गया था | अपने पिता के साथ व्यवसाय पर ध्यान देना शुरू कर दिया था – क्योंकि भले ही बहुत बड़ा डाका डला था, पर वो कहावत है न “हाथी तो मारा हुआ भी सवा लाख का” इस परिवार पर अक्षरशः चरितार्थ हो रही थी | भगवानदास ने नजीबाबाद तक अपना व्यापार फैलाते हुए वहीँ की हवेली में जाकर रहने की ठान ली थी | पिता की ज़िद थी कि नजीबाबाद जाना है तो जाओ, पर दूसरी शादी करके | इधर आज़ादी का संघर्ष चल ही रहा था और पंडत जी को अंग्रेज़ों का पिट्ठू माना जा रहा था | कोई भगवानदास को अपनी लड़की देने को राज़ी नहीं था | आखिर अपने ही एक मुँशी – जो जात से बामन ही था – की ख़ूबसूरत लड़की देखकर शुभ मुहूर्त में सादगी के साथ भगवानदास का विवाह संपन्न कर दिया गया | उअसके कुछ सालों बाद भगवानदास के पिता का भी स्वर्गवास हो गया | माँ पिता से पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं | भगवानदास का जी लालढांग से उकता गया था | वहाँ की हवेली राजस्थान से आए अपने रिश्तेदारों को सौंप कर कभी सन् तीस में वे नजीबाबाद आ गए और वहीँ बस गए |

तो, बात चल रही थी बिब्बी यानी सरोज के जयंत से मिलने की | कहाँ ठेकेदार भगवानदास और कहाँ पिताजी – एक स्कूल में अध्यापक | एक राजा भोज तो दूसरा गंगू तैली | पर जैसा कि कहते हैं – जोड़ियाँ स्वर्ग से बनकर आती हैं, तो इन दोनों की जोड़ी खुद ईश्वर ने बनाई थी – लाख कोशिशें हुईं इसे न बनने देने की – कारण बाद में बताएँगे – पर जोड़ी तो बनकर ही रही | पिताजी के घर एक गढ़वाली पण्डित आया करतेथे – ब्रह्मदत्त जी | पिताजी और भाभी उन्हें बहुत मानते थे | वे बहुत अच्छे ज्योतिषी भी थे और योगिनी (विंशोत्तरी की ही तरह एक दशा) लगाते थे | गढ़वाल में कहाँ रहते थे मालूम नहीं | बस यों ही घूमते फिरते जब मन होता था तो पिताजी और भाभी से मिलने चले आया करते थे | ऐसे ही एक बार आए तो भाभी ने सरोज की जन्मपत्री उनके सामने रख दी – कि लड़की बड़ी हो रही है – कुछ इसके भविष्य के बारे में पता लग जाए तो…

पण्डित जी ने जन्मपत्री देखी – कुछ गणनाएँ कीं उँगलियों पर, कुछ कागज़ों पर कुछ जोड़ भाग लगाकर देखा – और थोड़ी देर गम्भीरता से कुछ सोचते रहे | पिताजी और भाभी ब्रह्मदत्त जी के चेहरे के चढ़ते उतरते भावों को एकटक देख रहे थे और मन ही मन कुछ परेशान भी हो रहे थे | आखिर पिताजी ने पूछा “क्या बात है पण्डित जी, सब ठीक तो है ना…?”

“आँ… हाँ… वैसे तो सब ठीक है… बस कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना होगा | पहली बात तो ये है कि लड़की घोर मंगली है इसलिये अच्छी तरह जन्मपत्री मिलाकर किसी मंगली लड़के से ही इसकी शादी करनी होगी | दशा मंगल की चल रही है और मंगल बैठा है सातवें… गोचर भी वहीं कर रहा है… गुरु महाराज और शनिदेव की भी दृष्टि आ रही है सप्तम पर… और… ये… गोचर का मंगल शुक्र को भी देख रहा है पण्डित जी… तो ऐसा है कि इस साल के आखिर तक लाली के विवाह के योग तो बन रहे हैं…”

लेकिन पंडित जी अभी तो हम सोच भी नहीं सकते विवाह की | अभी तो लाली का हाईस्कूल भी नहीं हुआ, उसे आगे भी पढ़ाना है | कुछ पढ़ लिख कर किसी लायक बन जाए तभी तो सोचेंगे शादी का – अभी से क्या…” भाभी परेशान थीं |

“पर अगर विवाह का समय आ ही गया तो क्या आप रोक सकेंगी मास्टरनी जी…?” सीधे हाथ की पहली ऊँगली से नाक पर से चश्मा ठीक करते पण्डित बोले “ऐसा भी तो हो सकता है कि रिश्ता इसी वर्ष के अंत तक हो जाए और विवाह अगले वर्ष कभी हो जाए | तब तक लाली की हाईस्कूल की परीक्षा भी हो जाएगी | अभी ज़्यादा पढ़ाई का योग तो बन भी नहीं रहा | कुछ ऐसे योग बन रहे हैं कि पढ़ेगी तो बहुत – पर बड़ी उम्र में जाकर…”

“बड़ी उम्र में ? पर ऐसा कैसे…?” परेशां भाभी ने पूछा |

“देखिये पण्डित जी, मास्टरनी जी, हम कोई विधाता तो हैं नहीं कि हमारी बताई सारी बातें अक्षरशः सच ही हो जाएँ | आप लोग तो पढ़े लिखे लोग हैं | आप जानते ही हैं कि ज्योतिष सम्भावनाओं का शास्त्र है | पिछले हज़ारों वर्षों पहले रचे गए सूत्रों और गणित के आधार पर हम लोग फलकथन करते आ रहे हैं | अब देखा कि मंगल-गुरु-शनि सप्तम को प्रभावित कर रहे हैं और दशा भी कुछ ऐसी ही कुछ है तो पिछले देखे हुए के आधार पर बता दिया कि भाई विवाह हो सकता है इस अवधि में | पर होगा वही जो भाग्य में लिखा होगा | ख़ैर, जो हो, एक बात आपसे अवश्य कहना चाहूँगा | लाली का घट और पीपल विवाह आप ज़रूर करवा देना विवाह से पूर्व | और हाँ, प्रयास करना कि विवाह अच्छी तरह कुण्डली मिलाकर हो…”

“कुछ गड़बड़ नज़र आ रही है क्या ?” भाभी ने फिर पूछा |

“नहीं कुछ विशेष बात नहीं है, पर…” इस “पर” के बाद जो कहा पण्डित जी ने उसकी चर्चा अभी नहीं – बाद में ज़रूरत पड़ने पर – क्योंकि सरोज भी उस “पर”… को सोचकर ही जीवन भर दुखी होती रही और खुद को कोसती रही – क्योंकि उस “पर” के बाद सब कुछ ऐसा जल्दी जल्दी हुआ कि सपने में भी किसी ने नहीं सोचा था |

भाभी ने आगे पूछा “पण्डित जी, एक बात और बताइए… क्या जन्मपत्री से पता लग सकता है कि विवाह किस दिशा में हो सकता है, ताकि वक़्त आने पर लड़का देखें तो उसी तरफ़ कोशिश करें…”

“हाँ हाँ क्यों नहीं… इस कुण्डली के हिसाब से लड़का होगा इसी शहर का और उसका घर आपके घर के नज़दीक ही उत्तर-पूर्व के कोने की दिशा में होगा | लड़का अच्छे सम्पन्न परिवार का होगा और लाली राज करेगी | बस उस बात का ध्यान अवश्य रखियेगा जो आपको अभी बताई थी…” पण्डित जी ने बताया और अपनी राह ली |

सरोज ने नीलम को बताया था कि किस तरह कई रोज़ तक पण्डित जी के कहे उस “पर…” की वजह से भाभी और पिताजी रातों को सो नहीं सके थे और न जाने क्या क्या पूजा पाठ करवाते तहे थे गृह नक्षत्रों की शांति के लिए और साथ ही सोचते रहे थे कि उनके घर से उत्तर-पूर्व की दिशा में किस सम्पन्न परिवार के लड़के का रिश्ता आ सकता था सरोज के लिये | ठेकेदार साहब के परिवार के बारे में तो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था | फिर सोचा कि शायद पण्डित जी की ये भविष्य वाणी सच नहीं है – क्योंकि घर के पास उत्तर-पूर्व के कोने में तो ऐसा कोई सम्पन्न ब्राह्मणों का परिवार है ही नहीं| भाभी और पिताजी ने सोच लिया था कि हो सकता है पण्डित जी से गणना वगैरा में कुछ भूल हो गई हो | पर किस्मत फूटी हो तो कैसी भी गृह नक्षत्रों की शान्ति क्या कर सकती है ? अकल पर पत्थर पड़ जाते हैं जब बुरा वक़्त आता है तो | ऐसा ही तो उसके साथ हुआ था…

बात चल रही थी ठेकेदार भगवानदास की | जब नजीबाबाद आए थे तो उस पूरे मुहल्ले में या तो एक हवेली इनकी थी – जो इनके पुरखों के वक़्त से थी – क़रीब सौ साल पुरानी हवेली | दूसरी हवेली थी रायबहादुर डाक्टर साहब की | हवेली के सामने थोड़ा हटकर भवन का माँ दुर्गा का प्राचीन मन्दिर था जो “बड़ी माता का मन्दिर” कहा जाता था और मान्यता थी कि कबी रजा मोरध्वज के युग का मन्दिर था वो जिसका बाद में कई राजा महाराजा और खुद नवाब भी जीर्णोद्धार करवाते रहते थे और इसी कारण आज भी सही सलामत है और लोगों की श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है | उसके आगे ढाली और टीले से होकर रास्ता मालिनी नदी को जाता था जो बरसाती नदी थी और आगे बिजनौर के आस पास कहीं गंगा से मिल जाती थी जहाँ आज बहुत बड़ा बाँध बन चुका है | नदी जब बरसात में वेग में होती थी तो भवन तक पानी चढ़ आता था और सारा कछियाना पानी में डूब जाता था | दो बार तो मालिनी का प्रकोप खुद नीलम ने अपनी आँखों से देखा था – जब एक बार रियासत से हाथी बुलाकर स्कूल में से बच्चों को निकाला गया था क्योंकि स्कूल में काफ़ी ऊपर तक पानी भर आया था | रियासत… हाँ उसी नदी के उस पार एक गाँव था जो एक जाट राजा की रियासत थी | जिस तरह रायबहादुर साहब अंग्रेज़ों के “पिट्ठू” बने रहे रायबहादुरी के चक्कर में उसी तरह ये राजा साहब भी अंग्रेज़ों के ख़ास दोस्तों में गिने जाते थे | ठेकेदार साहब तो ख़ैर अंग्रेज़ों की पसंद थे ही | लिहाज़ा शहर के इन तीनों रईसों की आपस में अच्छी पटती थी | एक बात ज़रूर थी, अंग्रेज़ों के साथ चाहे जैसे भी सम्बन्ध रहे हों इन लोगों के, पर शहर गाँव की जनता का पूरा पूरा ख़याल रखते थे ये लोग |

फिर वापस आते हैं ठेकेदार भगवानदास की हवेली पर | हवेली क्या थी पूरा महल था | जिसमें सबसे बाहर भारी भरकम बहुत ऊँचा बड़ा लोहे का फाटक था, जिसे दो आदमी मिलकर खोलते थे | भीतर पहुँचने पर एक बहुत बड़ा बागीचा जैसा था जिसमें तरह तरह के ऊँचे नीचे फलों और फूलों के वृक्ष अपनी टहनियाँ हिला हिलाकर हर आने वाले का स्वागत करते थे और हर जाने वाले को विदाई देते थे | और ये बागीचा सड़क के नुक्कड़ पर जाकर खत्म होता था और उस तरफ़ हवेली का दूसरा वैसा ही एक और फाटक था | हवेली की चहारदीवारी को सड़क की तरफ़ से ऊँचे ऊँचे पेड़ों और बेलों से आच्छादित किया गया था | वो बागीचा पार करने के बाद इस सिरे से उस सिरे तक फैला चौड़ा बरामदा था जिसमें कुछ कमरों में लाल हरे पीले रंगों के आकर्षक डिज़ाइनों के शीशे वाले दरवाज़े खिड़कियाँ और बिल्कुल बीचों बीच बनी बड़ी दहलीज़ का गेट खुलते थे और जिसकी क़रीब १५-१५ फीट की दूरी पर खड़े गोल कटावदार खम्भों के सहारे टिकी ऊँची सफ़ेद छत में भी जगह जगह रंग बिरंगी लुभावनी कलाकृतियाँ बनी हुई थीं | दहलीज़ क्या थी, एक अच्छा ख़ासा कमरा बनाया जा सकता था उसमें | उसके एक तरफ़ दाहिने हाथ पर लम्बा चौड़ा एक कमरा था – जिसमें हर वक़्त बड़े बड़े ख़ूबसूरत क़ालीन बिछे रहते थे और चारों तरफ़ दीवार के सहारे सहारे झक सफ़ेद कवर चढ़ी मसनदें बिछी रहती थीं | ऊँची सफ़ेद छत में बीचों बीच और चार कोनों पर ख़ूबसूरत झाड़ फ़ानूस लटके हुए थे | इसी कमरे के तीन दरवाज़े और चार खिड़कियाँ बाहर की तरफ़ और दो दरवाज़े दहलीज़ में खुलते थे | खिड़की दरवाज़ों के शीशे पर रंग बिरंगी नक्काशी आने वालों का ध्यान बरबस ही अपनी तरफ़ खींचती थीं | इसे “बैठक” कहा जाता था | इसके रख रखाव से ही पता चलता था कि बाहर से आने वाले “ख़ास मेहमानों” की आव भगत यहीं की जाती थी | दहलीज़ के बाँयी तरफ़ भी लगभग उतनी ही जगह थी, जिसमें दो कमरे बने हुए थे | दोनों कमरों में बैठक के जैसे ही नक्काशीदार शीशों वाले दो दो दरवाज़े और दो दो खिड़कियाँ बाहर की तरफ़ ही खुलती थीं | पहले कमरे के दो दरवाज़े बैठक की ही तरह दहलीज़ में भी खुलते थे और दूसरे कमरे के दो दरवाज़े इस पहले कमरे में खुलते थे | इनमें से पहले कमरे में ठेकेदार साहब आम आदमी से मिलते जुलते थे और दूसरे कमरे में मुँशी बद्रीप्रसाद तथा उसके लग्गू भग्गू बैठते थे | पहले कमरे में दीवान और चौकियाँ पड़ी हुई थीं और दूसरे कमरे में नीचे क़ालीन बिछाकर चारों तरफ़ मसनदें और सामने वाली दीवार के सामने दवात क़लम के खाँचों वाली चार चौकियाँ रखी हुई थीं | हर हर कमरे में बड़ी बड़ी अलमारियाँ दीवार में बनी हुई थीं और उनकी चाभियाँ मुँशी बद्रीप्रसाद के के जनेऊ की शोभा बढ़ाती थीं – जो सारा दिन सफ़ेद धोती और आधी बाजू का घर का सिला ज़ेब वाला सफ़ेद बनियान पहने अपनी मसनद के सहारे बैठे रहा करते थे और पीली कमानी वाले चश्मे के ऊपर से हर आने जाने वाले को अजीब सी नज़रों से देखते रहते थे | नीलम कई बार उनकी नक़ल उतारा करती थी जब छोटी थी |

दहलीज़ से भीतर जाने पर बड़ा सा आँगन था, जिसमें चरों तरफ़ ज़मीन पर ही क्यारियाँ बनी हुई थीं और जिनमें तुलसी और गुलाब शोभायमान होते थे | चारों तरफ़ फिर से एक बाहर जैसा ही गोल कटावदार खम्भों के सहारे टिका सफ़ेद और रंग बिरंगी कलाकृतियों से सुसज्जित छत वाला बरामदा था | इनमें भी एक बरामदे में बाहर की बैठक और कमरों के दरवाज़े खुलते थे | बाक़ी तीन तरफ़ कमरे बने हुए थे | ये सारे कमरे केवल मेहमानों के ठहरने के लिये थे | दहलीज़ के दरवाज़े के सामने ही आँगन पार करके बरामदे से दूसरी दहलीज़ शुरू हो जाती थी जिसका दरवाज़ा भीतर वाले बरामदे मं खुलता था | घर के नौकर चाकर ही इस दरवाज़े से बाहर भीतर आते जाते थे | घर की औरतों के बाहर भीतर जाने के लिये बाहर दोनों तरफ़ के फाटकों के साथ ही चौड़ी लाल ईंटों की सड़क शुरू हो जाती थी जो भीतर वाले आँगन तक जाती थी | इस सड़क को दोनों तरफ़ से ऊँचे ऊँचे छायादार वृक्ष घेरे रहते थे | आँगन के ठीक बीचों बीच ऊँचे गोल चबूतरे पर तुलसी विराजमान थीं – ठेकेदार साहब की धर्मपत्नी रोज़ सुबह शाम जिसकी पूजा पूरे श्रद्धाभाव से करती थीं | गोरी चिट्टी – गोल मटोल – ज़रा छोटे कद की गुड़िया जैसी – आँखों में सबके लिये स्नेह का भाव लिये – सीधे पल्ले की सफ़ेद ज़री वाली साड़ी या लहँगा पहने – सर ढके हुए साक्षात् देवी की प्रतिमूर्ति ठेकेदारनी अपने लाव लश्कर के साथ जब पूजा करती थीं तो उन्हें बस देखते ही रहने का मन होता था | हँसती थीं तो गालों में गड्ढे पड़ते थे | छोटे छोटे मोती जैसे दाँत हँसते हुए उनके चेहरे को दूधिया आभा प्रदान करते थे | बेटा और बड़ी लड़की उन्हीं पर गए थे | आरती के वक़्त ठेकेदार साहब भी आ जाते थे और पण्डित जी और उनके साथी ज़ोर ज़ोर से घंटा घड़ियाल और मजीरे बजा बजा कर ज़ोर ज़ोर से आरती गाते थे | ठेकेदार साहब और ठेकेदारनी आँखें बन्द किये पूरे भक्तिभाव से आरती करते थे | फिर उस चबूतरे की परिक्रमा करते थे | अन्त में पण्डित जी ठेकेदार युगल को आशीर्वाद देते थे और ठेकेदारनी पहले ठेकेदार साहब और बाद में बच्चों को और घर के दूसरे लोगों को प्रसाद वितरित करती थीं | परिवार तो छोटा ही था – पति, पत्नी और तीन बच्चे – पर नाते रिश्तेदारों और नौकरों की अच्छी ख़ासी फौज़ थी | दीपावली पर इस गोल चबूतरे पर गोलाई से रखे दीयों की ख़ूबसूरती देखते ही बनती थी |

सामने फिर एक बरामदा था और उसके भीतर बाक़ी घर – एक छोटा आँगन, चारों तरफ़ कमरे, मन्दिर, रसोई, भण्डार, गुसलखाना, फिर पीछे थोड़ी सी कच्ची जगह पार करके पाखाना – जिसकी सफ़ाई के लिये जमादार के आने जाने का रास्ता पीछे घेर की तरफ़ से था | घेर में आम, कटहल और न जाने किस किस चीज़ के पेड़ लगे हुए थे और माली के रहने के लिये दो कमरों का पूरा घर बना हुआ था | उधर नुक्कड़ से बाँयी तरफ़ मुड़ने पर काफ़ी भीतर जाकर इस हवेली की चहारदीवारी थी | इस हवेली के बाद था ठेकेदार साहब का जानवरों का बाड़ा जिसमें कई साडी गायें भैंसें और दो घोड़ियाँ – लाल वाली गौरी और काले रंग की काली बँधती थीं | इनमें गौरी ठेकेदार की और काली जयन्त की ख़ास पसंद थीं | साथ ही इन पशुओं की देखभाल के लिये नौकर चाकर भी यहीं रहते थे | जानवरों का चारा रखने के लिये भण्डार भी यहीं था | जंगलात से हर रोज़ काफ़ी सारे मज़दूर आया करते थे जिन्हें ठेकेदार साहब के यहाँ ही रात्रिभोज कराया जाता था | उनके भोजन का भण्डार, बर्तन रखने की जगह, महाराज के रहने की जगह, मजदूरों की रसोई – सब कुछ इसी बाड़े में बना हुआ था | आज वहाँ अच्छा ख़ासा आलीशान बँगला बना हुआ है मिश्रा जी का | नीलम ने सुना था कि कुँवर साहब जब अपनी अँगरेज़ दुलहिन के साथ ठेकेदार साहब की हवेली पर “बाई जी” का नाच देखने डिनर पर आए थे तब उनके चार हाथी इसी बाड़े में ठहराए गए थे महावतों के साथ | पूरे बाज़ार में ठेकेदार साहब की दुकानें थीं – जिनमें से कुछ उनके पास ही थीं और कुछ “कहने भर को” किराए पर उठा रखी थीं – क्योंकि उन्हीं के दूर पास के नाते रिश्तेदार उन दुकानों को चलाते थे | ठेकेदार साहब की तो ख़ास दुकान थी अनाज की आढ़त की दुकान | इसके अलावा मोरी पर, क्ल्लूगंज में और रण्डियों के मुहल्ले में एक एक सरसों के तेल का स्पेलर और आटा चक्की थी | बांसमंडी में बाँसों की दोनों बड़ी दुकानें इन्हीं की थीं | थोड़ा आगे बढ़ने पर शहर का एकमात्र सिनेमाहाल इन्हीं का था – दिलीप कुमार और मीना कुमारी की सारी फिल्में नीलम ने यहीं देखी थीं और बिब्बी उसे मीना कुमारी से कम नहीं लगती थीं – यों कहने वाले नीलम को भी मीना कुमारी की नक़ल बताते थे | इन सबके अलावा पास ही के दो एक गाँवों में काफ़ी ज़मीन जायदाद और खेत खलिहान थे | लालढांग में तो ख़ैर ज़मीन जायदाद थी ही इनकी काफ़ी – सुल्ताना डाकू के डाके के बाद जो बाद में बाढ़ की भेंट चढ़ गए थे और काफ़ी कुछ और जो बाक़ी बचा था उसे जयन्त के बाद रिश्तेदार हड़प कर गए थे | उधर मालिनी नदी के किनारे दूर दूर तक फैले धान के खेत थे ठेकेदार साहब के और उनकी देखभाल करने वाले किसान वहीं कछियाने में रहा करते थे | अबकी बार जब बिब्बी की बरसी में गई थी नीलम तो गाड़ी किसी ने नदी के रास्ते से ही निकलवा दी थी | नीलम ने देखा कि अब वहाँ पक्की सड़क बन गई थी जो सीधी हरिद्वार रोड पर जाकर खुलती थी | टीला वगैरा सब कुछ खत्म हो चुके थे | हाँ खेत बाक़ी थे |

तो, मौसा जी यानि ठेकेदार साहब स्कूल की मैनेजिंग कमेटी में अच्छा ख़ासा रुतबा रखते थे और पिताजी पर दूसरे नागरिकों की ही तरह पूरी श्रद्धा रखते थे | पिताजी के दंगलों और अखाड़ों को देखने आने वालों में और नगर की दूसरी संगीत या साहित्य संध्याओं में ख़ास मेहमान भी हुआ करते थे | सरोज पिताजी की लाडली तो थी ही | अब पिताजी कहीं जाएँ और सरोज को भूल जाएँ ऐसा तो मुमकिन ही नहीं था | दंगल हो, अखाड़ा हो या कोई दूसरा कार्यक्रम – सरोज पिताजी की पूँछ बनी साथ साथ | ठेकेदार साहब की लड़कियाँ, डाक्टर साहब की लड़कियाँ और सरोज – साब एक साथ आगे ही बैठते थे | ऐसे ही किन्हीं क्षणों में जयन्त और सरोज की नज़रों ने एक दूसरे से कुछ कह दिया था – जिसकी ही सज़ा शायद अन्तिम समय तक भुगती सरोज ने…

क्रमशः………….

सौभाग्यवती भव – अध्याय सोलह

सोलह – जवान होती सरोज

डा. साहब के घर रहकर भाभी का शरीर का ज़ख्म तो भर चुका था | हाँ, दिल का ज़ख्म गहरा था जिसका भरना आसान नहीं था | पर शायद उन्होंने उसे भूल जाने में ही सारे घर भर की भलाई समझी और जला हुआ ठीक हो जाने के बाद घर वापस आ गई थीं | उन्होंने पिताजी को भी माफ़ कर दिया था | हालाँकि सरोज नहीं चाहती थी कि भाभी पिताजी को माफ़ करें | एक बार दबी जबान में उसने भाभी से ऐसा ही कुछ कहा भी था | तब भाभी ने प्यार से उससे कहा था “अभी तू ये सब नहीं समझ सकती लाली… समझेगी एक दिन जब खुद किसी की पत्नी और किसी की माँ बनेगी…” और वास्तव में भाभी सही थीं… सरोज भी काफ़ी कुछ समझ गई थी… पर काफ़ी देर बाद…

आज बिब्बी के शरीर के पास पप्पू रग्घू के इंतज़ार में बैठी नीलम सोच रही थी कि बिब्बी जब भी कोई किस्सा सुनाने बैठती थीं अपनी शादी से पहले का, और काफ़ी हद तक बाद का भी, तो इतने सारे लोगों के होते हुए भी बिब्बी की दुनिया ख़ासतौर से तीन ही लोगों के इर्द गिर्द सिमट कर रहा जाती थी – भाभी, पिताजी और दादी – और उन लोगों की ही बातें बताने के लिये कुछ पात्र और थे, जिनमें थीं बुआ, फूफा जी, चाचा, चाची और कुछ और लोग – जैसे दरबारन – जिनके बारे में बिब्बी बताती थीं कि वे छिप छिप कर सिगार और शराब पिया करती थीं जान पहचान वालों से मँगवा कर और बेहद ख़ूबसूरत थीं – पड़ोस के बन्ने से छिप छिप कर मिला करती थीं – रात को कई बार कुछेक ने छत पर बन्ने के साथ देखा था उन्हें – और ये भी कि तब भी लोग बिब्बी की ख़ूबसूरती के सामने दरबारन की ख़ूबसूरती को फीका ही मानते थे… और इस बात का अफ़सोस दरबारन को हमेशा रहा… क्योंकि बिब्बी की शादी के बाद वो उनकी रिश्ते की जेठानी भी बन गई थी और कभी दम भरती थी कि जयन्त उस पर जान देते थे…

ख़ैर, ये बातें बाद में… अभी तो बात चल रही है सरोज की चढ़ती जवानी की… सरोज की फोटो देखकर चुलबुली मिनी ने अपनी माँ को आँख मारकर कहा था “देखा मम्मी, अम्मा कितनी ख़ूबसूरत थीं अपनी जवानी के दिनों में | हैं तो नीलम मौसी भी अम्मा के जैसी ही – बिल्कुल डुप्लीकेट लगती हैं अम्मा की – पर अम्मा की फोटो में जो बात है वो नीलम मौसी में…? ऊँ हूँ… कभी नहीं… अच्छा अम्मा, तुम्हारे आगे पीछे तो लड़के चाँस लेने को घूमते होंगे…? नहीं…?” मचलती हुई मिनी ने पूछा तो हेमा ने डपट दिया “चुप कर मरी, ऐसी मसखरी की बातें पूछें हैं कोई बड़ों से…?”

“तो क्या हुआ ? अम्मा ही तो हैं हमारी… बताओ ना अम्मा…” और हेमा के डाटते डाटते भी मिनी वहीँ सरोज के पलँग से सट कर स्टूल पर बैठ गई |

“अरी अब क्या सुनेगी… अब तो बस मरी ये टूटी हड्डियाँ भर बची हैं बस… अब क्या…” मन ही मन उन दिनों की मीठी यादों में खोती हुई और मन में गुदगुदाती हुई सरोज बोली |

“मिनी जा जाके अपना होमवर्क पूरा कर… मारूँगी नहीं तो… चल यहाँ से…” हेमा ने डाट कर मिनी को वहाँ से भगा दिया | शायद उसे लगा होगा कि दादी को बिना वजह परेशान करने में लगी हुई है | पर सरोज तो खो चुकी थी सरीन के खत में…

एक तरफ़ जहाँ भाभी सरोज के रूप रंग को सजाने सँवारने में लगी रहती थीं – उसे एक से एक आकर्षक कुर्ते पायजामे, लहँगे कुर्ती, फ्राक पायजामे, गरारे, शरारे सिल सिल कर पहनाती रहती थीं – ऐसी फिटिंग कि उसके बदन पर किसी की नज़र पड़े तो बस फ़िसलती ही चली जाए और सामने वाला एक आह भरकर रातों को जागने को मजबूर हो जाए | कई बार बुआ ने भाभी को रोका था इस तरह के कपड़े सरोज को न पहनाएँ पर भाभी ने जवाब दिया था “मैं कुछ नया नहीं कर रही हूँ बीवी जी | ज़माने के साथ तो चलना ही पड़ेगा ना | अच्छे घर में ब्याह शादी करना हो तो अच्छे घरों के तौर तरीके भी तो सीखने होंगे ना… और देखो तो लगती कितनी प्यारी है… जैसे कोई राजकुमारी… सच बताऊँ बीवी जी मेरी सरोज तो किसी राजा घर जाएगी…”

“हाँ हाँ एक तू रानी और एक तेरी यो राजकुमारी… बस बस इत्ती ऊँची मत ना उड़ अक गिरे तो ज़मीन भी नसीब ना हो…”

और शायद बुआ की वो हाय पूरी तरह लगी थी सरोज को | वास्तव में इतनी ऊँची उड़ान भरी थी सरोज ने कि हर किसी के मुँह से बस यही निकलता था “भगवान इस राजकुमारी को बुरी नज़र से बचाना…” और भाभी पिताजी ने भी सहारा दिया था उसके पंखों में हवा भरने में | पर शायद हवा कम थी या फिर पंख ही कमज़ोर थे कि ऐसी गिरी कि बिल्कुल ही टूट गई | एक एक पंख छितरा के ना जाने कहाँ कहाँ को बिखर गया – सरोज की पहुँच से बहुत दूर कहीं – जिन्हें अब बीनना भी मुश्किल…

भाभी लगी थीं सरोज का भविष्य सँवारने की कोशिश में और सरोज कल्पनाओं के पंखों पर न जाने कहाँ उड़ी चली जा रही थी | पिक्चर देखने का शौक़ तो था ही | पिताजी को सिनेमा हाल के फ्री में पास मिलते थे | ठेकेदार पण्डित भगवानदास का सिनेमाहाल था और वे खुद थे स्कूल की मैनेजिंग कमेटी में | शहर के दूसरे लोगों की तरह वे भी पिताजी को बहुत मानते थे | इसीलिये सम्मानस्वरूप जो भी नई पिक्चर लगती थी उसके पास खुद ही भिजवा दिया करते थे घर पर | पिताजी सबको लेकर पिक्चर देखने जाते थे | दादी को बेहद शौक़ था पिक्चरों का | तो वे सबसे पहले तैयार होकर और सर से लेकर टखनों तक की चादर ओढ़कर रिक्शा में जाकर बैठ जाया करती थीं | भाभी बहुत कम जाती थीं | उन्हें लगता था कि अगर पिक्चर देखने चली गई तो घर के सारे काम रह जाएँगे | हाँ कभी रात का शो देखने जाते थे तो दादी नहीं जाती थीं – बस सरोज पिताजी और भाभी के साथ जाती थी और दोनों के बीच बैठकर पिक्चर देखा करती थी | पिक्चर देखते देखते उसे महसूस होता था जैसे उसके कन्धे पर कुछ छू रहा है | पीछे घूम कर देखती थी तो पाती थी कि रसिक हृदय पिताजी सरोज की पीठ के पीछे कुर्सी पर हाथ रखकर भाभी की गर्दन सहला रहे होते थे और भाभी अपने में सिकुड़ी जाती थीं | सरोज सोचती थी कि भाभी के कन्धे में दर्द हो रहा होगा तभी पिताजी सहला रहे हैं… बाद में जब समझना शुरू किया तब खुद ही शरमा कर हँस पड़ती थी और पिताजी के आशिक़मिजाज़ होने पर बलिहारी जाती थी… वापसी में रिक्शा में बैठे पिताजी पिक्चर के किसी रोमांटिक सीन की बात करते थे भाभी से और भाभी सकुचा कर बोलती थीं “कुछ तो शरम कर लो… बच्ची पास में है…”

“अरे तो हम किसी दूसरे की औरत से बात थोड़े ही कर रहे हैं… अपनी बीवी से ही तो बोल रहे हैं… क्यों भई लाली…?” पिताजी शरारत से हँसते हुए पूछते और सरोज ऐसे “हाँ” में सर हिलती जैसे दादी अम्मा सब कुछ समझ रही थी… वैसे काफ़ी कुछ समझने भी लगी थी फिल्में देख देख कर और नई नई ब्याही गुटल की सुहागरात की बातें सुन सुनकर…

“हटो भी…” भाभी शरमाती हुई बोलतीं और पिताजी मीठी हँसी हँस देते | पिताजी हँसते थे तो उनके दूधिया क़रीने से जड़े हुए दाँतों की पंक्ति से मानों रोशनी की किरणें फूट फूट पड़ती थीं | सारी दुनिया की खुदाई एक तरफ़ और पिताजी की वो लुभावनी हँसी एक तरफ़… पिताजी की भूरी आँखों और उस मनमोहक हँसी का ही तो कमाल था कि शहर की जवान लड़कियों से लेकर पढ़ी लिखी मास्टरनियाँ तक उन पर मरती थीं | गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल जो पिताजी के साथ स्कूल में पढ़ी भी थीं – उनके बारे में तो लोग कहते थे कि उनका बस चले तो पति को छोड़ पिताजी के साथ आ बैठें | भाभी इन सब बातों को सुनकर हँस भर देती थीं – जानती थीं कि पिताजी आशिक़मिज़ाज़ तो हैं पर हैं एकपत्नीव्रती और परिवार का ख़याल रखने वाले | यों पिताजी को लड़कियों और औरतों के साथ चुहल करने में मज़ा बहुत आता था | एक बार तो स्कूल की मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग थी | पिताजी टीचर्स की तरफ़ से रिप्रेजेंटेटिव थे | असल में गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल पर किसी ने इल्ज़ाम लगाया था कि उनके किसी के साथ रिलेशन हैं तो वे लड़कियों का चरित्र क्या बनाएँगी ? इसी बात को लेकर इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई थी | वहाँ गम्भीर चर्चा चल रही थी कि पिताजी बीच में खड़े होकर बोलते हैं “अरे भाई क्या आप लोगों को कुछ अक्ल भी है ? उस भद्दे चेचक के दागों वाले आदमी के साथ इतनी ख़ूबसूरत बला का रिश्ता जोड़ रहे हो | अरे हमारे साथ जोड़ते तो कुछ बात भी थी… हम तो हैं ही स्कूल के वक़्त से ही इनके दीवाने… पर इन्होंने घास ही नहीं डाली…” और प्रिंसिपल बहन जी “क्या पंडत जी आप भी…?” कहकर और शायद मन ही मन खुश होती उन परेशानी के क्षणों में भी हौले से शरमा कर मुस्कुरा दी थीं और इस तरह हलके फुल्के माहौल में मीटिंग खत्म हो गई थी |

तो, ज़िंदगी गुज़रती जा रही थी अपनी रफ़्तार से | भाभी के साथ घटी उस दुर्घटना के बाद काफ़ी दिनों बड़े मामा जी और मामा जी वहाँ रहे थे | जब उन्हें लगा कि अब सब ठीक है और भाभी का मन अच्छा हो चला है – या जैसा कि सरोज सोचती है कि भाभी मन अच्छा होने का बस दिखावा भर कर रही थीं जिससे पिताजी को अपराधबोध न हो – तो संभल वाले वापस लौट गए थे | जाते जाते सरोज के लिये सोने की पतली पतली चार चूडियाँ और कानों के कुण्डल मक्खन सर्राफ़ से बनवाकर उसे पहना गए थे | सरोज कई दिनों तक मुहल्ले भर में दिखाती फिरी थी “मेरे मामा जी ने दिलवाए हैं… हैं न कितने सुन्दर…?”

“जब तुम सुन्दर तो तुम्हारी हर चीज़ सुन्दर…” हर कोई यही जवाब देता था | और ये सच भी था – पूरा शहर सरोज की सुंदरता का दीवाना था | चाहे हमउम्र लड़के लड़कियाँ हों या फिर उनके माँ बाप | लड़कियाँ उससे दोस्ती करना चाहतीं तो लड़के उसे अपनी बनाकर अपने सीने में छिपा लेना चाहते हर किसी की नज़रों से बचाकर | और लड़कों के माँ बाप ? अपने घर की बहू बनाकर घर में उसके रूप का उजाला भरना चाहते और उसके अल्हड़पने पर निछावर हो जाना चाहते | कुदरत ने इतने सालों में तबीयत से पूरी फ़ुर्सत में गढ़ा था एक एक अंग सरोज का और सारे रंग रूप लुटा दिये थे उस सूरत को बनाने में – गुलाब की पंखुड़ियों से खिले खिले गुलाबी गुलाबी होंठ… झील सी गहरी बोलती सी आँखें कि हर किसी का दिल चाहे उनमें डूबकर बाहर न निकलने का… खिलते कमाल जैसे गोरे गोरे चेहरे पर गालों में पड़ते गड्ढे जिनमें फँसकर किसी का भी बाहर निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर… पिताजी जैसे दूधिया मोती से क़रीने से सजी दंतपंक्ति – जब मुस्कुराती तो चमेली के फूलों की वर्षा सी होती लगती… सुराहीदार गर्दन जिसे देखकर अच्छे अच्छों को सुरूर आ जाए… रेशम जैसे मुलायम काले घने लम्बे बालों की कमर पर लहराती बलखाती लम्बी नागिन सी चोटी किसी को भी डसने के लिये काफ़ी थी… बालों की एक लत मीना कुमारी के अंदाज़ में माथे पर गिरती हुई गोरे चौड़े मस्तक को धूप छाँव की सी आभा प्रदान करती हुई… सुडौल संगमरमरी बाँहें… पहाड़ की चोटी से नुकीले वक्ष के उठान जिन पर नज़र पड़े तो फिसलती चली जाए और सँभलने का मौक़ा भी ना मिले… एक एक सेंटीमीटर अनुपात में नपे हुए नितम्ब… सुन्दर गुलाबी पैर… कोयल सी पुरकशिश आवाज़ – गाती तो फिज़ां में मस्ती घुल जाती… दुपट्टा कमर से कसकर पैरों में घुँघरू बाँध फ़िल्मी गानों की नकल करती डोलती तो धरा आकाश झूम उठते… जहाँ खड़ी हो जाती अपने रूप रंग की रोशनी से उजाला भर देती और अपने चुलबुलेपन से रोतों को भी हँसा देती… नीलम को याद है बिब्बी का वो रूप रंग… फ़िदा थी वो उस राजकुमारी पर और सोचती थी काश बिब्बी के इस रूप का एक प्रतिशत भी उसे मिल जाता… बहरहाल…

सरोज ने सुनाया था वो किस्सा ख़ूब रस ले लेकर और नीलम भी सुनकर हँसी से लोट पोट हुई जाती थी | जिस मकान में ये लोग रहते थे उसके पास ही कुछेक मकान छोड़कर एक और परिवार रहता था – हरमेश सरीन का परिवार | दो तीन भाई बहन थे वे | बड़ा हरमेश ही था | दीवाना था सरोज का | पिताजी के पास ट्यूशन पढ़ने आया करता था | पिताजी सरोज को भी कुछ कुछ समझाने के लिये पास ही बैठा लेते थे | सरोज देखती थी कि हरमेश का मन पढ़ने में कम और सरोज को घूरने में ज़्यादा लगता था | पिताजी या तो कुछ समझते नहीं थे या फिर समझ कर भी बच्चों की नादानी समझकर ताल जाते थे | एक दिन की बात – सरोज स्कूल से घर वापस आ रही थी | स्कूल था तो सामने ही पर मेन गेट दूसरी तरफ़ को था | लिहाज़ा ढाली से सीढ़ियाँ चढ़कर तब घर के सामने वाली सड़क पर आया जा सकता था | घूम थोड़ा लम्बा हो जाता था और बीच में कुछ ख़ाली जगह पड़ जाया करती थी | वहीँ उस रोज़ हरमेश खड़ा था | हरमेश की बहन सुमन सरोज की अच्छी सहेली थी और दोनों साथ साथ ही आ रही थीं | रास्ते में ही हरमेश ने सरोज का हाथ कोहनी से पकड़ कर रोक लिया | सरोज हक्की बक्की – ये क्या है भई…? ज़िंदगी में पहली बार ऐसा कुछ हुआ था उसके साथ | सुमन की तरफ़ देखा अचकचाकर तो बस वो धीरे धीरे मुस्कुरा ही रही थी | वो शायद भाई के मन की बात जानती थी | सरोज का हाथ पकड़ कर हरमेश ने उसकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करनी शुरू कर दी | सरोज इस सबसे परेशान अपना हाथ छुड़ाने में लगी थी | तब हरमेश बोला “हाथ छोड़ने के लिये नहीं पकड़ा जाता सरोज… अब तो मरकर भी नहीं छूटेगा ये हाथ…”

“हरमेश, मेरा हाथ छोड़ो, दुःख रहा है…”

“ओ, दुःख रहा है ? चलो छोड़ देते हैं | पर पहले एक वादा – कल दोपहर साढ़े दो बजे यहीं मिलोगी | बोलो हाँ…”

“साढ़े दो बजे” सुनकर सरोज को हँसी आ गई और उसने शैतानी में हाँ कर दी | घर वापस आई तो किसी काम में मन ही नहीं लगा | सोच रही थी क्या था वो सब ? सोचा भाभी को बता दे | पर फिर सोचा कि देखें कल क्या होता है | बाद में बताएँगे | इसी उधेड़बुन के चलते वो दिन जैसे तैसे गुज़ारा | अगले दिन स्कूल की तो छुट्टी थी पर सुमन आ गई थी सरोज को बुलाने | दोनों ढाली पर पहुँचीं तो हरमेश पहले से ही वहाँ खड़ा था | सुमन हरमेश और सरोज को अकेला छोड़कर पास ही कहीं जाकर बैठ गई | सरोज की धड़कनें तेज़ तेज़ चल रही थीं | समझ नहीं पा रही थी क्या होगा | दोनों कुछ देर चुप खड़े रहे | न तो हरमेश ही कुछ बोलने की हिम्मत जुटा पा रहा था न ही सरोज कुछ बोल पा रही थी | आखिर हिम्मत जुटा कर हरमेश ही बोला “सरोज मैं तुमसे… मेरा मतलब…” और फिर थूक गटक कर जल्दी से सरोज का हाथ पकड़ कर एक मुड़ा हुआ कागज़ उसके हाथ में रख दिया और चुपचाप वहाँ से चला गया | सरोज जहाँ बिल्कुल भोली थी वहीँ सुमन कुछ तेज़ चालाक थी | भाई का ये संकोच देखकर उसने माथा पीट लिया और हतप्रभ खड़ी सरोज के पास आकर उसके कन्धे पर हाथ रख दिया तब सरोज ने चौंक कर उधर देखा | कुछ देर वो समझ ही नहीं पाई कि ये सब हुआ क्या था | दोनों सहेलियाँ घर वापस लौट चलीं | सरोज के हाथ में वो पेपर उसी तरह जकड़ा हुआ था और हथेली के पसीने से काफ़ी भीग भी चुका था |

सुमन का घर पहले आता था सो वो रास्ते में ही रुक गई थी | सरोज खोई खोई सी चित्रलिखित सी ना जाने कब में घर के दरवाज़े पर पहुँच गई | पिताजी घर आ चुके थे और सरोज का ही इंतज़ार कर रहे थे | चाँस की बात थी कि बुआ भी आई हुई थीं |

“आ गई लल्ली…? आ जल्दी आ… देख तेरी भाभी ने पकौड़ियाँ बनाई हैं अँगूर के पत्तों की… आ जा जल्दी…” पिताजी की आवाज़ कानों में पड़ी तो सरोज को पता चला कि घर पहुँच चुकी थी | पिताजी की बात सुनकर धीरे से मुस्कुराई और सीधी रसोई में जा बैठी | भाभी सबको पकौड़ियाँ देने में लगी थीं | पिताजी ने खोई खोई सरोज को देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ | फिर उसके हाथ में पकड़े कागज़ पर नज़र गई – जो सरोज ने अभी तक फेंका नहीं था | “ये क्या है…?” पिताजी ने पूछा तो सरोज ने बिना पढ़े ही पिताजी को पकड़ा दिया | पिताजी ने खोलकर पढ़ा – सरोज की तरफ़ देखा – भाभी और बुआ असमंजस में पिताजी को ही देखे जा रही थीं | बुआ शायद कुछ समझ रही थीं तो प्रश्न दाग दिया “क्या बात है… सब ठीक तो है… देक्खूँ तो…” न जाने क्या बात आई पिताजी के मन में कि वो ठठाकर हँस पड़े | बुआ बार बार पर्चा देखने की ज़िद कर रही थीं | भाभी और सरोज असमंजस में पड़ी बस पिताजी का मुँह ताके जा रही थीं | आखिर पिताजी बोले “अरे कुछ नहीं बस… बाद में बात करेंगे… लाओ जी अभी तो पकौड़ी खिलाओ सरोज की भाभी…”

दूसरे दिन पिताजी के सारे स्टूडेंट्स आए थे ट्यूशन पर लेकिन हरमेश नहीं आया था | तीन चार दिन ऐसे ही गुज़र गए | सरोज समझ नहीं पा रही थी कि हरमेश आ क्यों नहीं रहा था | उस पर्चे में क्या लिखा था ये भी उसे मालूम नहीं था | आखिर उमेश से पिताजी ने एक दिन पूछ ही लिया “भई आजकल हरमेश नहीं आ रहा ? पता तो लगाओ क्या बात है ? कल बुलाकर लाना उसे…” और अगले दिन हरमेश पिताजी के पास पढ़ने आया था | दूसरे बच्चों के साथ सरोज भी बैठी हुई थी | पिताजी ने ज़ेब से वही पर्चा निकाला तो सरोज का दिल धक धक करने लगा – ना जाने पिताजी क्या करेंगे अब ? कितनी पागल है वो भी जो ये पर्चा चुपचाप बिना पढ़े ही पिताजी को थमा दिया… “मेरे सपनों की रानी, मेरा दिल हर पल तुम्हारे लिये ही धड़कता है | तुम हर वक़्त मेरे ख़यालों में बसी रहती हो | रातों को मेरे सपनों में आती हो | मुझे सारी रात सोने नहीं देतीं तुम | देखो अगर मेरे दिल पर ज़रा सा भी तरस आता है तुम्हें तो प्लीज़ किसी दिन ख़ूब देर के लिये मुझसे आकर मिलो | मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता – मर जाऊँगा तुम्हारे बिना | आज जयशंकर प्रसाद पढ़ते वक़्त मैं तुम्हें ही देखे जा रहा था | पढ़ने में मन ही नहीं लगता | अगर तुम मुझे नहीं मिलीं तो मैं जान दे दूँगा अपनी | लिखता हूँ ये ख़त तुम्हें दिल के लहू से, टुकड़ों में न बिखर जाए इतना ख़याल रखना | पढ़ कर फाड़ कर फेंक देना | किसी के हाथ न पड़ने पाए | तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा | तुम्हारा और सिर्फ़ तुम्हारा – आशिक़ |”

पिताजी ने चिट्ठी पढ़नी शुरू की तो पहले तो सरोज घबरा रही थी – पर फिर चिट्ठी में लिखी बातें सुनकर उसे हँसी भी आ रही थी | पिताजी पढ़ रहे थे और सरे स्टूडेंट्स हैरत में पड़े पिताजी को देख रहे थे | पिताजी पढ़ चुके तो किसी ने पूछ ही लिया “गुरू जी ये क्या था…?”

“कुछ नहीं, बस ऐसे ही रास्ते में पड़ा मिल गया था | किसी आशिक़मिज़ाज़ ने लिखा है | आजकल के लौंडे, अरे भई पहले पढ़ लिख लो बाद में सोचना ये इश्क विश्क के बारे में… हमने भी किये हैं अपनी उम्र में – पर पहले अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करके…” पिताजी मुस्कुराते हुए बोल रहे थे, सरोज नीचे मुँह किये हँस रही थी, सारे स्टूडेंट्स साँस रोके सुन रहे थे – और हरमेश…? वो नीचे मुँह झुकाए पसीना पसीना हो रहा था |

“फिर उसका क्या हुआ…?” नीलम ने पूछा तो सरोज पहले तो ख़ूब हँसी थी, फिर बताया था “कुछ दिन तो वो आया ही नहीं पढ़ने | बाद में आता भी था तो मेरे सामने नज़रें झुकाए रहता था | फिर तीजों पर उसकी झिझक दूर हुई थी झूला झूलते वक़्त… वो भी तेरे जीजा जी छेड़खानी कर रहे थे तो उनका साथ देते हुए | फिर तो सब ठीक हो गया था | उसे भी समझ आ गया था कि गलत जगह हाथ डाला था उसने…

क्रमशः……..

सौभाग्यवती भव – अध्याय पन्द्रह

पन्द्रह – जवान होती सरोज और भाभी

चुलबुली सरोज न जाने किन किन कल्पनाओं के पंख लगाती खुले आकाश में उड़ी चली जा रही थी – सारी दुनिया से बेखबर – हाँ इतना ज़रूर था कि उसकी दुनिया में उसके अलावा बस तीन लोगों की ही जगह और थी – सबसे पहले पिताजी, फिर दादी और फिर भाभी | भाभी…? हाँ भाभी… सरोज को शायद समझ आ चुका था कि घर को अगर बाँधे रखना है तो भाभी के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता… दादी चली भी जाएँ तो भी भाभी के बिना घर अधूरा ही रहेगा…

“अरी बड़ी गर्मी है री आज तो हेमा…” बड़ी बहू सरोज को सरोज ने आवाज़ लगाई “बिजली ना आ रई क्या ?” थोड़ी नींद ले चुकी सरोज ने हेमा से पूछा |

“अभी धनीराम गया है जेनरेटर चलाने…” किसी के ब्लाउज़ पर तुरपाई करती हेमा ने जवाब दिया |

“अभी फोन किसका था…?”

“नीलम मौसी का था | कल आ रही हैं | बता रही थीं कि धामपुर आई हुई हैं तो नानी को साथ लेके आवेंगी…” दाँत से तुरपाई का धागा काटती हेमा ने जवाब दिया |

“ये ब्लाउज़ वो अरुणा वाला है क्या…?”

“हाँ अम्मा…”

“अरी मत ना किया कर उसका काम | मरी ना तो, लूटने में लगी है | वो राय की बीवी बता रई थी कि बीस रूपये लेवे है | पर तुझे क्या दे है… बस दस रूपये ही न ? पूछ तो उससे ज़रा किसी रोज़ कि किस बात के रखे है दस रूपये ? मेहनत सारी करे तू और आधा पैसा खा जावे वो | अरे भगवान सब देख रहा है ऊपर बैठा | विद्यावती बहन जी का कितना कितना किया था पिताजी ने – सब कुछ पता है अरुणा को | ये सिला दे रही है उस सबका ?” बदन के दर्द से थोड़ा कराहती सरोज बोली |

“अम्मा तुम इस सबकी फिकर मत ना किया करो | तुम तो बस दुआ करती रहो कि ये दोनों छूट के आ जावें, फिर हमें क्या ज़रूरत पड़ी किसी का अहसान लेने की ? पर अभी तो अरुणा काम लाके दे रही है तो हम कह भी क्या सकते हैं उससे ?”

“हाँ सो भी ठीक है… चल कल आ ही रही है नीलम… देखो क्या खबर लावेगी…” हेमा की तरफ़ सहानुभूति की नज़रों से देखती सरोज बोली | सोचने लगी सरोज “जिस दिन से ब्याह के आई एक दिन भी चैन ना नसीब हुआ हेमा को तो | ब्याह के तीन महीने पीछे मेरी पैरों की हड्डियाँ टूट गई थीं – मेरठ में यो ही लगी रहवे ही मेरे सारे काम काज में | नई नवेली बहू की सारी उमंगों पे पानी फिर गया था | दो बरस लगी रही मेरी सेवा में | पप्पू तो नौकरी पे था मसूरी – इसी ने किया सब | हाँ बाद के कुछ दिन मसूरी में अच्छे गुज़रे इनके | पर पता ना कहाँ से उस मरे ने केस खुलवा दिया दुबारा | वरना तो ठीक ठाक चल ही रहा था सब कुछ | पप्पू भी आज मैनेजर होता | रग्घू मैनेजर था ही पेपर मिल में | वैसे पिताजी ने तो शादी के वक़्त ही समझाया था कि जब तक केस के बरी हो जाने के कागज़ हाथ में न आ जाएँ शादी मत करो – मेरी ही अकल मारी गई थी – वही हमेशा की तरह सोच लिया कि भाभी ने सिखाया होगा पिताजी को… क्यों समझती हूँ भाभी को हमेशा सौतेला ही…?”

“अम्मा लो चाय पी लो… ये क्या… रो रही थीं…? कितनी बार समझाया कि ऐसे मत किया करो… तुम ही ऐसा करोगी तो हमें कौन देखेगा…?” सरोज को तब पता लगा कि सोचते सोचते उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे | उसे पता भी नहीं लगा तुरपाई बीच में ही छोड़के कब में हेमा रसोई में जाके चाय बना लाई थी और साथ में कल की बासी पूरियों का हलवा “ये कब बनाया तूने ?” सरोज ने पूछा तो हेमा ने जवाब दिया “मिनी को भूख लग आई थी पढ़ते पढ़ते तो सोचा ज़रा सा हलवा ही बना दूँ…” और सरोज को पीछे से सहारा देकर थोड़ा सा बैठाकर एक चम्मच सरोज के मुँह में डालकर पूछा “ठीक बना…?”

“हाँ बहुत बढ़िया…” हलवा खाती सरोज ने जवाब दिया “पर जो हलवा भाभी बनाती थीं उसका जवाब नहीं था | रस था भाभी के हाथों में | हम भी मरे कभी ना बना पाए वैसा कुछ | कोशिश भी ना की कभी | भाभी ने कितना कितना सर मारा सब कुछ सिखाने का पर मैं… यहाँ इतने नौकर चाकर थे कि कभी फली भी ना फोड़ी उनके सामने… क्या पता था कभी ये दिन भी देखने मिलेंगे…” और फिर खाती खाती खो गई…

“लाली, फिर वाही…? चलो पहले वो गणित के सवाल पूरे करो, इतनी देर में मैं हलवा बना कर लाती हूँ | पूरी का हलवा खाएगी…?” सरोज के कानों में आज भी भाभी की वो आवाज़ गूँज रही थी |

“पूरी का हलवा…?” घेर वाली फ्राक सँभालती हुई सरोज ने लालच में होठों पर जीभ फिराई और मानों हलवे का स्वाद मुँह में भरती बोली “ठीक है भाभी तुम हलवा बनाकर लाओ, में तब तक पूरे करती हूँ ये सवाल…”

सरोज के बस बीजगणित के तीन सवाल बाक़ी बचे थे | इतनी देर में भाभी हलवा और ठण्डाई बनाकर लाईं इतनी देर में सरोज ने सवाल पूरे कर लिये और फिर मस्ती में भरकर फ्राक को गोल गोल घुमाकर नूरजहाँ की फिल्म का गीत गाकर नाचना शुरू कर दिया “उड़नखटोले में उड़ जाऊँ तेरे हाथ ना आऊँ…” नाचने गाने में उसे पता ही नहीं लगा कि कब में भाभी उसे नाचती देखकर दादी को उनके कमरे से बुला लाई थीं और दोनों सास बहू जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखती सरोज का ये अल्हड़पना देख देख कर धीमे धीमे मुस्कुरा रही थीं | अचानक नाचती नाचती पीछे घूमी तो दादी और भाभी को मुस्कुराते देख झेंप गई | पर भाभी के हाथ में हलवे की कटोरियों और ठण्डाई के ग्लासों का थाल देखकर पल भर में उसकी झेंप गायब हो गई और हलवा खाने के लिये वहीँ फ़र्श पर बैठ गई | लाल लाहौरी ईंटों का फ़र्श था | आज जैसी ही गर्मी थी उस दिन भी – पर तब घर में बिजली कहाँ थी | बिजली तो आई है नीलम के भी पैदा होने के बाद – वो भी उसकी ससुराल में – पिताजी के घर तो जब नीलम नौवीं में थी तब लगी थी बिजली बुआ वाले घर में | उस समय तो हाथ के पंखों से हवा की जाती थी | बाज़ार से पंखे लाकर उन पर रंग बिरंगे कपड़ों की झालर बनाकर सी दिया करती थीं भाभी – जिससे वो पंखे हवा भी अच्छी देते थे और लगते भी ख़ूबसूरत थे |

भाभी ने थाल नीचे फ़र्श पर ही रख दिया और तीनों बैठ गईं वहीँ नीचे बोरी पर | वैसे वो लाहौरी ईंटों का फ़र्श भी किसी कारीगर ने बड़ी ख़ूबसूरती से बनाया था – उसके खानों में कंकड़ फेंक फेंक कर सरोज अपने दोस्तों के साथ पाटिक्का खेला करती थी | ईंटों का होते हुए भी चिकना था | गर्मियों में तो अक्सर दादी पोती और भाभी नीचे ही बैठी रहा करती थीं | भाभी सरोज की पढ़ाई लिखाई पूरी करवा के और अपना लिखना पढ़ना पूरा करके कोई काम लेकर बैठ जाती थीं और ये दादी पोती अपनी मस्ती में लग जाया करती थीं | भाभी बीच में इन्हें देखकर मुस्कुरा लेती थीं और फिर अपने काम में लग जाती थीं | एक बात अच्छी हो गो थी आजकल – बुआ का आना काफ़ी कम हो गया था | उनके भी हरिओम पैदा हो चुका था और वे उसके कामों में लग गई थीं |

भाभी ने सरोज की गणित की कापी उठाकर देखा – काफ़ी सारी गलतियाँ थीं सवालों में | सरोज हल्वा खा चुकी तो पूछा “गुटल के घर जाऊँ…?”

“पहले इधर आ… ये क्या किया…?” गलतियाँ दिखाती भाभी बोलीं “पहले इसे सही कर… ये ऐसे होगा…” और सरोज का हाथ पकड़ कर नीचे वापस बैठाकर उसे समझाने लगीं | अब सरोज के सर में खुजली शुरू हो चुकी थी | तब दादी बोलीं “दुलहिन अब बस भी करो… थोड़ी देर को जाने दो… वापस आएगी तब करा देना…” भाभी को शायद अपना कुछ काम याद अ गया था तो सरोज को जाने दिया “ठीक है जाओ… पर देखो चार बजे से पहले आ जाना वापस…”

“ठीक है…” बाहर भागती भागती सरोज ने जवाब दिया और भाभी न जाने कैसी नज़रों से सरोज को देखने लगी थीं | शायद सोच रही थीं कि अब इसके बदन के उठान शुरू हो चुके हैं किसी का भी ईमान फिसलाने के लिये… कुछ करना होगा सब कुछ सही सलामत रखने के लिये…”

हर रात की तरह उस रात भी खाने से निबट कर सरोज छत पर चारपाई पर लेटी लेटी तारों को गिन रही थी और साथ ही सप्तऋषिमण्डल में अरुन्धती खोज खोज कर खुश हो रही थी | उन दिनों गर्मियों में सब लोग अपने अपने घरों की छतों पर सोया करते थे चारपाइयाँ बिछाकर | इन के घर भी जीराज शाम को धूप ढल जाने पर छत पर पानी का अच्छे से छिड़काव करता था | फिर इधर दोनों कमरों और रसोई की छतों पर दादी, पिताजी, सरोज और भाभी की चारपाइयाँ लगा दी जाती थीं और बैठक की छत पर जीराज अपनी चारपाई डाल लेता था | चारपाइयों पर दरी और भाभी के हाथों की कढ़ाई वाली चादरें बिछा दी जाती थीं | रात को दादी सबसे पहले खाना खाकर अपना पंखा और पानदान लेकर छत पर पहुँच जाती थीं और चारपाई पर पानदान खोलकर अपने और भाभी के लिये पान बनाती थीं | कभी कभी सरोज को भी मिल जाया करता था | पिताजी सरोज और भाभी बाद में खाना खाते थे | पिताजी खाने के बाद अपनी मित्र मण्डली में चले जाते थे और भाभी नीचे बाक़ी के काम निबटाने को रुक जाती थीं | जब मित्र मण्डली घर पर आती थी तो भाभी सबके खाने पीने के काम में लग जाती थीं | बाद में पिताजी सबके साथ बाहर जाते थे और हरिया ताऊ जी की दुकान पर कढ़ाही का दूध पीते पीते दोस्तों के साथ दुनिया भर की राजनीति और साहित्य चर्चाएँ करने के बाद घर वापस आते थे | इस बीच भाभी ऊपर आकर सबके सोने का इंतज़ाम देखती थीं और दादी से पान लेकर खाती थीं | सरोज कप दादी तो पान खाती अच्छी लगती थीं – गोरा रंग उस पर बिल्ली आँखों वाली दादी मुँह में पान रखकर किसी अप्सरा जैसी लगती थीं | पर भाभी अच्छी नहीं लगती थीं | पर सरोज को अब आदत हो चुकी थी उन्हें पान चबाते देखने की | ये सब देखती देखती सरोज तारे गिनती गिनती और उन तारों में अपना एक आलिशान बंगला बनाती कब सपनों की दुनिया में पहुँच जाती थी पता ही नहीं चलता था | सुबह जब भाभी झकझोर कर उठाती थीं स्कूल के लिये तब ही उसकी आँख खुलती थी | और तब उसे बस यही याद रहता था कि कोई राजकुमार घोड़े पर सवार होकर आया था रात को और उसे अपने घोड़े पर बैठाकर किसी ऐसी जगह ले गया था जहाँ चारों तरफ़ तरह तरह के रंग बिरंगे ख़ूबसूरत फूल खिले थे और जिनकी खुशबू से सरोज का तन मन महका महका जाता था | जहाँ रंग बिरंगी मस्त तितलियाँ उसे अपने साथ नाचने का निमंत्रण देती थीं | सरोज उस फुलवारी में उन मस्त तितलियों के साथ न जाने कितनी देर तक नाचती गाती इठलाती फिरती रहती थी और वो ख़ूबसूरत राजकुमार सरोज का वो मदमस्त और अल्हड़ रूप एकटक निहारता रहता था – मानों आँखों आँखों में ही उस रूप को पी जाना चाहता हो | वहाँ से वापस तभी आती थी जब भाभी उसे वापस बुलाती थीं | सारा दिन सरोज सोचती रहती थी कि कहाँ होगी वो फुलवारी, वो मस्त तितलियाँ और वो राजकुमार… फिर रात को तारे गिनते गिनते सोचने लगती कि इन्हीं तारों में से कोई है वो राजकुमार – शायद वो सबसे चमकीला सफ़ेद तारा… और शायद वे छोटे छोटे टिमटिमाते तारे वो तितलियाँ हैं… उनके चरों तरफ़ की रौशनी का जो घेरा है वही शायद वो फुलवारी है… और यही सब सोचते सोचते नींद आ जाती थी और फिर पहुँच जाती थी उसी सपनों की दुनिया में…

“भाभी…” एक रात पिताजी का इंतज़ार करते हुए भाभी के पास लेटी लेटी सरोज ने पूछा “तुम्हें पता है कहीं पे एक ऐसी जगह है जहाँ ढेर सारे रंग बिरंगे फूल खिले रहते हैं हर वक़्त… भीनी भीनी खुशबू आती रहती है… रंग बिरंगी तितलियाँ चारों तरफ़ नाचती रहती हैं… तुम गई हो कभी वहाँ…?”

भाभी कुछ समझ पाईं या नहीं, पर एक ठण्डी आह भरकर इतना ज़रूर बोलीं “मेरी तो फुलवारी तुझसे है लाली… इस घर के सिवा और कहाँ जा सकती हूँ में…?”

“आपको जाना है क्या लाली…?” गालों में गड्ढे डालती अर्थपूर्ण मुस्कुराहट लिये दादी ने पूछा और भाभी और दादी दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं | सरोज कुछ समझ ना सकी और खिसिया कर रह गई | फिर से अरुन्धती को देखना शुरू कर दिया | न जाने उस दिन क्या हुआ की थोड़ी देर भाभी सरोज को एकटक देखती रहीं | फिर नीचे गईं और हाथ में एक शीशी और अँगोछा लेकर ऊपर आईं “लाली, लो इसकी मालिश करो मुँह पर और फिर अँगोछे से पोंछ लो…” सरोज को शीशी और अँगोछा पकड़ाती भाभी बोलीं |

“क्या है इसमें…?”

“अरे कुछ नहीं, बस ज़रा सा शहद, गुलाबजल और नींबू का रस…”

“पर क्यों लगवा रही हो ? सारा चिप चिप करेगा…”

“कुछ चिप चिप नहीं करेगा | अच्छे से मालिश करके फिर इस अँगोछे से रगड़ कर पोंछ लेना बस | चलो अब लगा लो जल्दी से और सो जाओ | सुबह स्कूल जाना है…”

“भाभी…” सरोज ने चमलाते हुए वो लोशन लगाने से इन्कार करना चाहा पर भाभी ने बीच में ही टोक दिया “सारा सारा दिन घर से बाहर धूप और धूल धानी में खेलती रहती हो | सारा रंग ख़राब हो जाएगा मिट्टी बैठ जाएगी तो | चलो लगा लो जल्दी से | और देख कल से नीचे से ही लगाकर आना समझी…”

हाँ सारा सारा दिन शैतानियों के अलावा और काम ही क्या था सरोज को ? आज भी अपनी शैतानियों की सोच सोच कर हँसती है और मिनी को बड़े मज़े से वो किस्से सुनाती है | याद है उसे बगल वाले मकान में वो मास्टर जी आके रहे थे किराए पर | उनका साला था अभय | पिताजी के ही स्कूल में पढ़ता था | देखने भालने में अच्छा सुन्दर था पर लड़कियों से ज़रा शरमाता था | बस, सरोज और उसकी सारी भूतनियाँ भाभी से छिपकर जा चढ़तीं छत पर | अभय के कमरे की खिड़की इन्हीं की छत पर खुला करती थी | वो भी शायद इंतज़ार में रहता था इन लोगों की | उसकी खिड़की के सामने पहुँच कर नसीमबानो या नूरजहाँ की फिल्मों के गीत ज़ोर ज़ोर से गाने शुरू कर देतीं | वो खिड़की में ही बैठकर पढ़ाई करता था | पढ़ता क्या था, असल में तो इन लोगों की छेड़खानियों का मज़ा लेने आता था | ये लोग गीत गातीं उसे सुना सुनाकर, डाँस करतीं उसे दिखा दिखाकर, और जब वो क़िताब थोड़ी सी सरकाकर उधर देखता तो सरोज आँखें भेंगी करके और जीभ बाहर निकाल कर उसे मुँह चिढ़ाकर सारी सहेलियों को साथ ले नीचे उतर आती | कभी ये लोग प्लास्टिक का बिच्छू या साँप उसकी खिड़की से भीतर फेंक देते | वो पहले तो घबराया | पर जब नीचे से चिमटा लाकर उन्हें उठाने चला तो गुस्सा आया और इन लोगों की तरफ़ देखकर बन्दर का सा मुँह बनाकर बन्दर जैसी आवाज़ निकाल कर चिल्लाया ज़ोर से | ये लोग ताबड़ तोड़ नीचे भागीं, कहीं इसकी बहन न आ जाएँ छत पर | फिर एक दिन बदला लेने के लिये जा पहुँचा दोनों स्कूलों के बीच में बने गेट से निकल कर सरोज के स्कूल कि साइंस के किसी प्रयोग के लिये वहाँ से पत्ते तोड़ने हैं | सरोज सामने खड़ी फिर से उसे चिढ़ा रही थी | किसी पेड़ का पत्ता तोड़ उसका दूध निकाल कर मल दिया सरोज के हाथ पर जबरदस्ती | उसी दिन जाकर भाभी से बोली “भाभी वो मास्टर जी भी रहते हैं पड़ोस में, कभी उनकी वाइफ़ को भी बुला लिया करो न…” और भाभी के “ठीक है…” बोलते ही भागी गई अभय के घर | उसकी बहन घर पर नहीं थी | वही मिला तो समझा फिर कुछ गड़बड़ करने आई है | और उसकी लम्बी मोटी चोटी पकड़ कर बोला “सरोज की बच्ची, गुरु जी की वजह से चुप हूँ | अब कोई शैतानी की तो और भी लम्बी कर दूँगा तेरी ये चोटी…”

सरोज तुरंत कान पकड़ कर बोली “ठीक है बाबा अब नहीं करूँगी | पर पहले मेरी चोटी तो छोड़ो…” और तब सरोज का ख़ूबसूरत मुखड़ा वो भी बस देखता ही रहा गया था | बगल में दूसरा मकान बन रहा था | वहाँ से बजरी मुट्ठी में छिपाकर लाई थी सरोज | अभय के चोटी छोड़ते ही डाल दी उसकी शर्ट के भीतर | अब शर्ट के भीतर हाथ डालकर बजरी बाहर निकालने की कोशिश करता अभय पीछे पीछे “रुक जा भूतनी अभी बताता हूँ…” और उसे मुँह चिढ़ाती सरोज आगे आगे “क्यों लगाया था वो दूध मेरे हाथ पे ? पता है कितनी खुजली हुई थी ?” और अभय एक बार फिर सरोज के रूप को पीता रहा था आँखों से | बाद में तो दोनों की अच्छी ख़ासी दोस्ती हो गई थी | मन ही मन वो शायद चाहने भी लगा था सरोज को…

इसी तरह वो अनिल – जो ज़रा ज़रा सी बात पर सरोज की चोटी खींचने को दौड़ता था | अपने स्कूल के उसी बीच के गेट से आ जाता था चोरी छिपे लड़कियों को छेड़ने | सरोज शिक़ायत कर देती टीचर से और उसे सज़ा मिल जाती | वो तो चाहता ही यही था | बस छुट्टी के वक़्त बाहर ही मिल जाता और भागता सरोज की चोटी खींचने | अब सरोज आगे आगे और वो पीछे पीछे सीधे अनिल के चबूतरे पर | वहीँ से शोर मचाती “चाचा जी अनिल को देख लो…” और चाचा जी महा गुस्सैल… बाहर निकलते ही ताबड़ तोड़ अनिल की धुनाई कर देते | अगले दिन फिर उस धुनाई का बदला लेने पहुँच जाता अनिल |

ऐसे ही उस दिन जब मिनी ने राय की बीवी की चुगली लगाई थी शकुंतला बीवी जी से तब भी सरोज ने उसे समझाया था कि ऐसा नहीं करते | सरोज ने बताया था मिनी को कि भाभी कहा करती थीं “दूती दूती कहाँ चली, खसम पूत कुसवाने चली…”

“मतलब…?” भोलेपन से मिनी ने उसी तरह पूछा था सरोज से जिस तरह उसने उस दिन भाभी से पूछा था | सरोज के स्कूल से घर के रास्ते में दो घर ऐसे पड़ते थे जिनके यहाँ सरोज के परिवार का काफ़ी आना जाना था | एक थे विजय जैन चाचा जी और चाची जी, और दूसरे थे रिषभ चाचा जी और सरिता चाची | दोनों चाची आपस में तो अच्छी सहेलियाँ थीं ही, सरोज से भी दोनों की ख़ासी दोस्ती थी | दोनों नई नई शादियाँ होकर आई थीं | सरोज उनके साथ बैठकर अपने स्कूल के सारे किस्से, सहेलियों के किस्से, मुहल्ले के लड़कों की ऐसी तैसी करने के किस्से, गुना गुटल से सुने उनकी सुहाग रात के किस्से और शीला किरन की सुहाग रातों के किस्से – सब कुछ बड़े चटखारे लेकर सुनाती थी और दोनों उसके गालों में गड्ढे पड़ते गोरे गोरे मासूम चेहरे को एकटक निहारती रहती थीं | दोनों का कभी खाना पकाने का मन नहीं होता था तो भाभी के पास आकर खा लिया करती थीं | चाय चीनी तो अक्सर की बात थी माँगना | भाभी भी उनसे बच्चों की ही तरह लाड़ लड़ाती थीं | दोनों चाचा बैंक में थे और नजीबाबाद ट्रांसफ़र पर आए हुए थे | एक दिन की बात…

भाभी ने उस दिन बड़ी स्वाद केले की रसे वाली सब्ज़ी, बेसन के आलू, चटनी और खस्ता पराँठे बनाए थे | अभी पिताजी और दादी के साथ सरोज बैठी ही थी खाने कि रिषभ चाचा जी और सरिता चाची आ पहुँचे “भाभी क्या बनाया है, बड़े ज़ोरों की भूख लगी है…” घुसते ही चाचा बोले |

“अरे रिषभ, भैया इधर रसोई में ही आ जाओ | देखो आपकी भाभी ने कितनी बढ़िया सब्ज़ी बनाई है…” इससे पहले कि भाभी कुछ जवाब देतीं, दादी ने दो पटरे रखकर उन दोनों के लिये भी जगह बना दी | भाभी गरम गरम पराँठे सकती रहीं और सब खाते रहे | खाते खाते चाचा ने बताया कि पिक्चर देखकर लौट रहे थे तो पहले तो जैन साहब के घर चले गए | फिर सोचा कि अब घर क्या जाएँ, चलो भाभी के पास चलकर ही कुछ खा लेते हैं | और खाना खाकर कुछ देर गप्पें लगाकर दोनों वापस चले गए | दूसरे दिन सरोज स्कूल से वापस लौट रही थी कि जैन चाची दरवाज़े पर खड़ी दिखाई दीं | बस देखते ही आवाज़ लगा दी | चाची दिखें और सरोज उन्हें कोई किस्सा सुनाने को न रुके ऐसा तो हो ही नहीं सकता था | बातों बातों में चाची ने बताया कि कल रिषभ और सरिता पिक्चर देखकर वापस लौट रहे थे तो आकर पिक्चर की पूरी कहानी सुनाकर गए |

“हाँ वो घर भी आए थे न | पता है चाची, भाभी ने कल इतनी स्वाद सब्ज़ी बनाई थी | और चाचा की आदत तो आप जानती ही हो | आते ही दरवाज़े से बोलना शुरू कर दिया “भाभी जी क्या बनाया है, बड़े ज़ोर की भूख लगी है…” और फिर पता है काफ़ी देर तक बैठे रहे…” चिहुँकती हुई और ऋषभ चाचा और सरिता चाची की नक़ल उतारती सरोज बोली |

“ज़ोर की भूख लगी थी ? पर मैंने तो कहा था खाने का वक़्त है | बना रही हूँ | खाते जाओ | फिर यहाँ क्यों मना कर दिया था ? कहने लगे कि घर पे बना रखा है…” हैरानी से चाची बोलीं |

अब सरोज को लगा कि कुछ गड़बड़ हो गई | फ़ौरन दाँत से जीभ काटकर बात बदलती बोली “अरे नहीं चाची, खाना तो घर से खाकर आए थे | वो तो भाभी के हाथ की सब्ज़ी खानी थी तो कुछ तो बोलना ही था न…” और अपने हिसाब से चाची को समझाकर सरोज वापस आ गई | निकलते निकलते सरोज को चाची ने बताया था कि उन्होंने अपनी नई साड़ी दिखाई थी सरिता चाची को बस तभी उन्हें कुछ शायद कुछ जलन सी हुई थी | घर लौटते लौटते सरोज सोच रही थी कि किसी की नई साड़ी देखकर कोई भला कैसे जल सकता है ? चाचा से कहकर वो भी नई साड़ी मंगा लें | घर आकर भाभी को सारी बातें बताईं तो उन्होंने झिड़कते हुए कहा था “तू भी न कहीं भी कुछ भी बोल देती है बिना कुछ सोचे समझे | अरे दोनों की नई नई शादियाँ हुई हैं | दोनों एक दूसरी से बढ़ चढ़कर दिखाना चाहती हैं | क्या ज़रूरत पड़ी थी ऊपर से ऊपर ही बताने की कि हमारे घर खाना खाया उन लोगों ने ? अब बता अगर कमला ने पूछ लिया सरिता से तो तुझे सही सहारे करने पड़ेंगे न | याद रख लाली एक कहावत है कि दूती दूती कहाँ चली, खसम पूत कुसवाने चली…

“मतलब…?” मिनी की ही तारह भोलेपन से पूछा था सरोज ने |

“मतलब ये पगली कि जो लोग इधर की बात उधर करते हैं न उन्हें कभी चैन नहीं मिलता…” दोनों चाचियों ने तो किसी से कुछ नहीं पूछा था, पर सरोज ने भाभी की बात गाँठ बाँध ली थी |

इसी तरह की न जाने कितनी शरारतें… कितनी शैतानियाँ… भाभी कई बार प्यार से बोलती भी थीं “जवान होने को आई पर बचपना न जाने कब जाएगा…”

तो उस दिन भाभी ने कहा लोशन लगाने को और मन न होते हुए भी सरोज को वो लोशन लगाना ही पड़ा | सुबह नहा धोकर स्कूल की यूनीफार्म – नीले रंग की फ्राक पर सफ़ेद बैल्ट कसे और सफ़ेद जुराबें पहनकर जब रसोई से बाहर आई और कमरे में जाकर शीशा देखा तो मन ही मन झूम कर सोचने लगी – वाक़ई भाभी के नुस्खे होते तो असरदार हैं – अब तो रोज़ ही लगाऊँगी वो लोशन… कितना गुलाब जिस चमक रहा है चेहरा… “लाली देर हो रही है स्कूल को… जल्दी आके दूध पी लो…” और भाभी की आवाज़ सुन शीशा पलँग पर फेंककर बाहर आई तो भाभी हाथ में दूध का ग्लास और पीतल की प्लेट में मूँग की दाल लिये खड़ी थीं | वहीँ आँगन में पड़े तख़्त पर सरोज बैठ गई | नाश्ता कर चुकी तो भाभी ने उसके काले घने लम्बे बालों को कंघे से सुलझाकर दो मोटी मोटी चोटियाँ बनाईं और फिर यूनीफार्म के ही सफ़ेद रिबनों से उन्हें ऊपर फोल्ड करके रिबनों के फूल बना दिये | सरोज ने जूते पहने, बसता उठाया “भाभी आज वो कुर्ता सलवार पूरे कर दियो | हरिओम के गीतों में पहनूँगी…” भाभी को आदेश दिया और उछलती कूदती दरवाज़े से बाहर हो गई | “सच कितनी अच्छी अच्छी ड्रेसें बनाया करती थीं भाभी… और उस वक़्त तो सिलाई की मशीन भी नहीं थी भाभी के पास – सारा काम हाथ से ही करती थीं…” सरोज सोच रही थी “सिलाई कढ़ाई में तो हेमा भी भतेरी होशियार है | तभी तो इतना काम मिल जावे है उसे अपने स्कूल की मास्टरनियों का और मधु के स्कूल की मास्टरनियों का | पर वो मरी अरुणा ठगे बोहोत है | अब दोपहर को स्कूल से आने के बाद मुझे और बच्चों को खाना खिलाकर बर्तन भाँडे निबटाकर सिलाई लेके बैठ जावे है आजकल | एक मिनट की फ़ुर्सत ना है उसे भी | पर मरती क्या न करती… चार सौ रुपल्ली स्कूल से मिले हैं बस | क्या होवे है चार सौ में आजकल ? वो तो गर्ग प्रिंसिपल ने बच्चों की फ़ीस पूरी माफ़ करा दी है वरना तो और भी मुश्किल हो जाती | कहाँ से लाते हम फ़ीस ? अब नीना तो फिर भी महीने की बंधी अच्छी तनखाह ले आवे है – सरकारी महकमे में काम का योई तो फ़ायदा है – पर वो सारी निकल जावे है वकीलों के चक्करों में | मेरी पेंशन है तीन के क़रीब – उसमें से काफ़ी तो मेरे इलाज़ में ही निकल जावे है | थोड़ी बहुत बचे है सो उसी से जैसे तैसे घर का काम चले है | अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा | कल भाभी और नीलम आवेंगी तो बात करूँगी नीलम से | अब उस बेचारी ने तो रग्घू के हाथ मेरे वास्ते व्हील चेयर भी भिजवा दी है | पता ना कित्ते की आई होगी | हेमा की मशीन को भी पाँच हज़ार उसी ने दिये थे | कितना तो कर रही है | हमारे ही भाग ऐसे हैं तो क्या करें ? छोटी बहन का करने से तो गए उल्टा उससे करवा रहे हैं…”

“अम्मा देखो इस बार मेरे लहँगे पे मुझे सबसे ज़्यादा मार्क्स मिले…” सरोज सोच ही रही थी कि मिनी होमसाइंस की क्लास में अपनी गुड़िया के लिये बनाया लहँगा चोली लेकर सरोज को दिखाने आ पहुँची | “दिखइए…” मिनी के हाथ से लेकर सरोज ने वो लहँगा चोली घुमा फिरा कर देखा फिर खुशी से हँसती हुई हेमा को दिखाने लगी “देख हेमा मरी ने कितना अच्छा बनाया है | पता है मिनी जब में तेरे जितनी थी – बल्कन तुझसे भी बड़ी होऊंगी – भाभी ने मेरे लिये और मेरी गुड़िया के लिये एक जैसा लहँगा चोली बनाया था | एक काम कर, अभी उठा के रख दे | कल आवेंगी नानी और नीलम मौसी, उन्हें दिखइए | देखिये कितनी खुश होवेंगी दोनों…” मिनी की सफलता पर आज सरोज चहक रही थी | हमेशा यही होता है – मिनी पढ़ाई लिखाई में भी और इस तरह के कामों में भी बहुत होशियार है – बिलकुल अपनी माँ पर गई है | हर बार अपनी चीज़ें और इनाम लाकर दादी को दिखाती है और इसी बहाने दादी सरोज बिस्तर में पड़ी पड़ी भी कुछ देर खुश होकर चहक लेती है |

“अम्मा तुम नानी के बारे में बताती हो कि कितना कुछ करती थीं वे | पर अब उन्हें क्या हो गया ? कितनी अजीब सी नहीं लगतीं ?” बाल सुलभ जिज्ञासा से मिनी पूछने लगी |

“अरी यो भाग होवे है ना हमारा यो हमें कुछ भी बना सके है | परेशानियाँ झेलते झेलते भाभी बस एक ज़िंदा लाश बनके रह गई हैं | भूल गईं सब कुछ – सारी सज धज – अब मुझे हो देख ले ना | भीतर वाले कोठार में से वो लाल वाली एलबम तो निकाल के ला ज़रा | देख कुछ दिखाऊँगी तुझे | हेमा तू जा ऊपर से सन्दूक हटा दे तो ये निकाल लेवेगी | अभी उस दिन देखते देखते विन्नी निम्मी वहीँ रख गई थीं…”

हेमा की मदद से मिनी एक बहुत पुरानी लाल रंग की एलबम निकाल कर ले आई और सरोज को पकड़ा दी | सरोज ने एलबम में फोटो देखनी शुरू कीं | सारी फोटो गोंद से ऐसे कसके चिपकाई गई थीं कि फटना भी मुश्किल था उनका | हाँ वक़्त के साथ साथ धुँधली ज़रूर पड़ गई थीं | सरोज ने एक फोटो खोली और मिनी और हेमा को दिखाने लगी “ये देख, तू भी आ हेमा… ते देख ये हैं जयपुर वाले नरेंदर जीजा जी – संभल वाले बड़े मामा जी की लड़की हैं सावित्री जीजी, उनके हसबैंड | अब तो ख़ैर गुज़रे भी अरसा हो गया उन्हें | पता है बड़े ऊँचे पड़ पर थे किसी बड़ी फैक्ट्री में | फैक्ट्री की तरफ़ से कई बार रूस भी जाया करते थे | वहीँ से कैमरा खरीद कर लाए थे | मेरी शादी ना हुई थी तब तक | शादी मेरी हुई १५ मई को | हम सब संभल गए थे गर्मियों की छुट्टियों में – दो महीने हम सब वहीँ बितावें थे | ख़ूब मज़ा आवे था वहाँ | उस साल गर्मियों में तो शादी थी मेरी तो शादी से कोई दो महीने पहले भात नौतने गए थे हम सब – मतलब बुआ, चाची, चाचा जी, पिताजी, हरिओम, संतोष, महेश मामा और मामी, चाचा जी की अंजना और रजनी और मैं | भाभी ना गई थीं क्योंकि नीलम होने को थी | मेरे ब्याह के महीने भर बाद तो हो ही गई थी वो पैदा | ख़ूब हुड़दंग मचाया हम सबने वहाँ | तो ये जीजा जी फ़िदा थे मुझपे | और ये… ये देख…” पेज पलट कर अगली फोटो निकाली “देखा ? बता कौन है…?” सरोज ने चिहुंकते हुए पूछा तो हेमा और मिनी ध्यान से फोटो देखने लगीं – ख़ूब घेर वाला फ्राकनुमा कुर्ता और चूड़ीदार पायजामा पहने ऊपर से जाली का दुपट्टा और एक हाथ दरवाज़े की चौखट पर रखकर दूसरा कमर पर रखकर मानों किसी पर बिजली गिराना चाहती हो ऐसी अदा में बला की ख़ूबसूरत कोई फ़िल्मी हीरोइन खड़ी थी “अम्मा ये तो तुम हो…” मिनी और हेमा एक साथ चीख पड़ीं |

“हाँ मरी मैं ही तो हूँ…” खिलखिलाकर हँसती सरोज बोली | काफ़ी देर वैसे ही खिलखिलाती रही | फिर अचानक ख़ामोश हो गई और कुछ देर बाद बोली “अब बता कोई पहचान सकेगा आसानी से मुझे ? नहीं ना… तो फिर भाभी तो मुझसे भ बड़ी हैं – माँ हैं मेरी | ना जाने कितने बच्चे हो होके मरे तब कहीं जाके यो नीलम बची | फिर घर के क्लेश… हो ही जानी थीं ऐसी…” और सरोज की आँखों में फिर आँसू भर आए “तुझे पता है भाभी की आवाज़ तो बेहद महीन थी शुरू से ही | थोड़ी से भी ज़ोर से बोलें तो ऐसा लगे जैसे चीं चीं कर रही हों | पर माइक पर इतनी ज़ोर से ना बोलना पड़े है – तू तो जाने ही है | तो भाभी भी जाया करें थीं कहीं कुछ कुछ बोलने | रात दिन बस लिखने पढ़ने में ही लगी रहवें थीं… पर घरवालों को चैन ना था…”

बोलते बोलते सरोज चुप हो गई | बिजली आ चुकी थी और पंखा चलने लगा था | हेमा ने समझा अम्मा सो गई हैं दवा के नशे में तो धीरे से मिनी को वहाँ से बाहर कर दिया और वापस अपने काम में लग गई | सरोज की आँखें बंद ज़रूर थीं पर नींद गायब थी | याद आ रहा था उसे कि कितना कितना ख़याल रखती थीं भाभी | सरोज को तो अपने दोस्तों के साथ खेल कूद से ही फ़ुर्सत नहीं थी | जब खेल कूद से मन भर जाता तो दादी के साथ मिलकर सारे बच्चे भाभी की साड़ियां निकाल कर किसी किसी तरह से बाँध बूँध लेते और लग जाते या तो कोई नाटक खेलने या फिर पिताजी के साथ कोई पिक्चर देखकर आती सरोज तो उसकी हीरोइन की एक्टिंग करने लगती | एक कोई पिक्चर देखी थी – नाम याद नहीं | नसीम बानो और सहगल की थी | नसीम बानो काफ़ी माडर्न लड़की बनी थी उसमें – उल्टे पल्ले की साड़ी के पल्ला एक हाथ पे झूलता – दूसरे हाथ में पर्स – कढ़ाईदार ब्लाउज़ – बालों में एक फूल खोंसा हुआ – कहीं किसी पार्क में वो और सहगल कोई गाना गा रहे थे | सरोज को अब उस गाने के बोल याद नहीं, तब पूरा का पूरा गीत याद था | बस बन गई सरोज नसीम बानो और विपिन बन गया सहगल और लगे दोनों गा गाकर उनकी नकलें उतारने | फिर मीना कुमारी की किसी पिक्चर का गाना याद आ गया और मीना कुमारी की ही तरह एक हाथ में पल्ला लपेटे उसकी नक़ल शुरू कर दी | भाभी सरोज का ये सारा अल्हड़पना देखकर हँसती रहती थीं | बल्कि कभी कभी तो सरोज खुद उन्हें सामने बैठाकर डाँस करके दिखाया करती थी और भाभी उसकी बलाएँ लेती न अघाती थीं | धमा चौकड़ी मचाने के बाद सारे बच्चे अपने अपने घरों को चले जाते तो भाभी सारे कपड़े वापस तह लगाकर रखतीं ट्रंक में | सारा फैला हुआ सामन सिंघवातीं | फिर सरोज को हाथ मुँह साफ़ करके आने की हिदायत देतीं | सरोज भाभी के बनाए उसी घोल से मुँह साफ़ करती | चेहरा और हाथ चमक जाया करते थे |

भाभी ने सरोज को बहुत कुछ सिखाया था | जब उसे पहली बार दादी के शब्दों में “लाल बुखार” आया था और खून देखकर घबरा गई थी और रोना शुरू कर दिया था तब भाभी ने ही उसे समझाया था कि इसमें घबराने की बात नहीं है, और ये भी समझाया था कि ऐसा होना हर लड़की के लिये क्यों ज़रूरी है | और ये भी कि अबसे हर महीने ऐसा ही हुआ करेगा और इसमें क्या करते हैं | और इसके न होने से क्या क्या बीमारियाँ हो सकती हैं – सब कुछ समझाया था तब कहीं जाकर सरोज सामान्य हुई थी | सरोज को अच्छी तरह समझाकर जब भाभी अपने कामों में लग गई थीं तब दादी ने कहा था कि अब दो दिन रसोई में मत जाना | नई नई बात थी, सो सारा दिन सोती ही रही थी | धीरे धीरे उसकी समझ में आ गया था कि इन दिनों शुरू के दो दिन वो अछूत रहा करेगी जैसे भाभी रहती हैं | भाभी को “लाल बुखार” आने पर दादी और पिताजी मिलकर रसोई का सारा काम करते थे | भाभी को खाना भी अलग बर्तनों में दिया जाता था | बाद में राख़ से रगड़ रगड़ कर उन्हें साफ़ किया जाता था | फिर तीसरे दिन घर भर में गंगाजल के छींटे मारे जाते थे शुद्धिकरण के लिये | सरोज भी धीरे धीरे इस सबकी अभ्यस्त हो चली थी | नीलम से एक बार सरोज ने इस घटना का ज़िक्र किया था कि आजकल तो लड़कियों को सब कुछ पता होता है, पता नहीं उसे क्यों कुछ पता नहीं था | नीलम को झुंझलाहट हुई थी उस समाज के बारे में सोचकर जहाँ लड़कियों से सब कुछ छिपाकर रखा जाता था, जहाँ लड़कियाँ अपने माँ बाप के सामने अपने शादी ब्याह की बात करते सकुचाती थीं | तब तो अभय, अनिल और विपिन के साथ सरोज की दोस्ती पर भी लोग बाग उँगलियाँ उठाते थे, पर उसके पिताजी और भाभी ध्यान ही नहीं देते थे किसी की बात पर – अपनी राजकुमारी को दुखी जो नहीं कर सकते थे – और फिर सरोज तो थी भी एक निहायत ही भोली भाली गुड़िया जैसी – माँ बाप के लाड़ और अपनी कल्पनाओं के संसार में मस्त अल्हड़ सुकुमारी…

इसी तरह भाभी ने ही उसे ब्रा पहननी सिखाई थी | एक दिन उसे पास बैठाकर इंचटेप से उसका नाप लिया और सफ़ेद मलमल के कपड़े की एक ब्रा उसके लिये सिली | उसकी कटोरियों पर हाथ से कढ़ाई की | फिर उसमें पीछे बाँधने के लिये डोरी लगाई और सरोज को समझाया कि कैसे बाँधते हैं | सरोज को याद है जब उस दिन वो काफ़ी देर तक कमरा भीतर से बंद करके बार बार उसी ब्रा को उतारती पहनती रही थी | बीच बीच में शीशे के सामने – जो आदमकद तो नहीं था पर जितना वो देखना चाहती थी उतना आराम से देखा जा सकता था – खड़ी होकर अपने वक्ष निहारती रही थी और बार बार हाथों से छू छू कर देखती रही थी – खुद अपने से ही शर्माती हुई – पर मन ही मन गुदगुदाती हुई सी… कभी शीशे से अपने दोनों वक्ष सटा लेती और तब जो कुछ उसे भीतर महसूस होता था उसका वर्णन करने के लिये उसे कभी शब्द नहीं मिल पाए थे – पर कुछ ऐसा था जो उसके खिले खिले रूप पर और निखार ला रहा था | अपने उठानों पर धीरे धीरे हाथ फिराती तो उस कसाव को छूकर उसे बड़ा आनंद मिल रहा था | भाभी शायद सब कुछ समझ गई थीं – या शायद उनकी भी आप बीती रही होगी – तभी चुपचाप अपने काम में लगी रही थीं और एक बार भी सरोज को आवाज़ नहीं लगाई थी | वो तो पिताजी आ गए थे और आदतन दरवाज़े से ही आवाज़ लगाईं थी “लाली… अरे भई कहाँ गई हमारी बंदरिया…?” सरोज ने जल्दी जल्दी कपड़े पहन दरवाज़ा खोला था कमरे का तब तक भाभी उनसे सामान ले चुकी थीं “पढ़ते पढ़ते थक गई थी तो मैंने ही सोने भेज दिया था… लो आ गई… संभालो अपनी बंदरिया को…” और सरोज भागकर पिताजी की धोती में दुबक गई थी – मानों भाभी से नज़र मिलाते शर्म आ रही थी | पिताजी हैरान थे आज सरोज का व्यवहार देखकर पर भाभी ने उन्हें आँखों आँखों में शायद सब कुछ समझा दिया था | तभी तो पिताजी सरोज का चेहरा अपने सामने करके बोले थे “भई देखो लाली, तुम्हारी भाभी चाहे जो कहे – पर हमें तो तुम बंदरिया ही अच्छी लगती हो… जाओ देखो क्या लाए हैं हम…” और नई नई जवानी की चंचलता, शर्म, हया सब भूलकर सरोज एक बार फिर बच्चों की तरह चहकने लगी थी |

बुआ जब भी आतीं तो माँ बेटी को ऐसे घुलते मिलते देख उनकी छाती पर साँप लोटने लगता | पर अभी उन्हें लगता था कि भाभी के खिलाफ़ बोलने का सही वक़्त नहीं था – सरोज और दादी दोनों ही उनके वश में थीं | तो वो मौक़ा तलाश रही थीं, और वो मौक़ा उन्हें उस दिन मिल गया था…

सरोज हर रोज़ की तरह वो लोशन मल रही थी मुँह पर और भाभी और दादी को सारे दिन के किस्से मज़े ले लेकर सुना रही थी | भाभी भी वहीँ आँगन में बैठकर सब्ज़ी काट रही थीं | जीराज पिट्ठी पीसने में लगा हुआ था उड़द की दाल की – पिताजी ने कहा था कि आज दही बड़े और गुझिया की चाट ज़रूर बनानी है | उसी सबकी तैयारी चल रही थी | आज कुछ लोग बाहर से भी आए हुए थे – जिनमें पिताजी के एक ख़ास दोस्त हरीश चाचा जी भी लखनऊ से आए हुए थे | कुछ और लोग भी थे | शहर में कोई संगोष्ठी थी उसी में भाग लेने वे सब आए थे | भाभी भी दिन में वहाँ गई थीं | उस दिन वे एक श्रोता की हैसियत से वहाँ गई थीं और जब घर वापस आईं तो सरोज के और उसकी सहेलियों के वही कार्यक्रम चल रहे थे | इत्तेफ़ाकन बुआ भी आई हुई थीं | भाभी घर आईं तो हरीश चाचा जी साथ ही थे और दोनों किसी बात पर हँसते बतियाते आ रहे थे | घर की लुगाई और पराए मर्द के साथ हँसी ठट्ठा…? बुआ के तो तन बदन में आग लग गई थी पर अपने मुँह बंद ही रखा था कुछ सोचकर |

हरीश चाचा जी भाभी को छोड़कर किसी से मिलने चले गए थे | बुआ को आया देख भाभी ने उनके पैर छुए और बुआ ने आशीर्वाद दिया “जीती रह… भगवान करे जल्दी ही तेरी गोद में एक चाँद सा लल्ला खेले – मेरे हरिओम जैसा… भगवान करे इस घर के भाग जागें वरना हम तो…” और आगे क्या बोलना चाहती थीं सरोज नहीं समझी थी | पर शायद भाभी समझ गई थीं और बुआ को घर से बाहर जाने पर सफ़ाई देती बोली थीं कि वे तो जाना भी नहीं चाहतीं थीं पर पिताजी ने ज़िद की थी और अपनी क़सम दी थी इसीलिए गई थीं | वैसे भाभी कहीं भी जाती थीं तो चादर ओढ़कर जाती थीं | पर इस तरह के कार्यक्रमों में जाती थीं तो पिताजी की सख्त हिदायत थी कि इस तरह की वाहियातगिरी नहीं चाहिये | सलीके से चलना होगा | तो भाभी हरे रंग की लाल बार्डर वाली बनारसी साड़ी उल्टे पल्ले से पहनकर, बालों में नकली बालों का चुटीला लगाकर उसका जूड़ा बनाकर, जूड़े में सरोज ने जबरदस्ती एक फूल भी खोंस दिया था – नसीमबानो को देखा था न पिक्चर में, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और ब्लाउज़ में इत्र का फ़ाहा खोंसकर घर से निकली थीं | भाभी का ड्रेस सैंस काफ़ी कुछ उस ज़माने की हीरोइनों से मिला करता था – जब किसी फंक्शन में जाना होता था तब – वरना घर में तो सीधे पल्ले की करीने से बंधी हुई साड़ी और माँग में सिन्दूर और माथे पर छोटी सी लाल बिंदी – और बस… जबकि सरोज चाहती थी कि भाभी हर समय बनाव श्रृंगार करके रहा करें | तब भाभी भी कहती थीं “अरी पगली अब हमारे दिन कहाँ बनने संवरने के ? वैसे भी चूल्हे चौके में कहाँ ठहरता है बनाव श्रृंगार… और फिर तेरे भाइयों के जाने के बाद अब मन ही नहीं होता कुछ करने का…”

“फिर बाहर जाते पे क्यों करती हो…?”

“अब ये तो अपने पिताजी से पूछना | मानते ही नहीं तो क्या करूँ | अब तो लाली तुम लोगों का ज़माना है – तुम लोग करो अपने मन की | तुम्हारा जितना बटना मैंने किया हमारी माँ ने हमारा कब किया ? किया होता तो क्या मैं भी तेरी तरह गोरी न होती ?” फिर अपने ही मज़ाक पर मानों हँसती हुई बोलतीं “वैसे मैं तो जनम से ऐसी ही हूँ | हाँ तुझे को रूप मिला है – भगवान बुरी नज़र से बचाए – उसे बिगड़ने मत देना | तभी तो तुझे चेहरा साफ करने को ये कुछ कुछ देती रहती हूँ | सारा दिन बाहर भीतर करती रहती है | सूरज की गर्मी से रंग काला पड़ना शुरू हो जाता है | ये सब करती सहेगी तो सूरज की गर्मी का कोई असर नहीं होगा तेरे रंग पर | अरे भई बड़ी हो जा फिर तेरी शादी भी तो करनी है अच्छे से घर में…” भाभी चुहल करतीं तो अल्हड़ सरोज का गोरा गोरा मुखड़ा शर्म से लाल हो जाता और दोनों हाथों में मुँह छिपाकर शरमाकर बोलती “भाभी…” और भाभी हँसती हुई उसके सर पर चपत लगा देतीं |

तो, भाभी लग गईं खाना पकाने में | जीराज पिट्ठी पीस ही रहा था | बस बुआ को जैसे मौक़ा हाथ लग गया | भाभी के पास जाकर बोलीं “क्यों री संभल वाली, सारा नेम धरम भूल गई क्या…?”

“क्या हुआ बीवी जी…” सकपकाई भाभी ने पूछा तो बुआ कुछ गुस्से में बोलीं “यो जीराज पीस रिया है पिट्ठी | अरी कमबखतमारी तेरे हाथ टूट गए हैं क्या छिनाल राण्ड…?”

“पर बीवी जी वो तो अक्सर करता है… तुम्हारे भैया ही…”

“बस बस अब मेरे भाई पर बात मत ना डाल्लो | वो बिचारा इतना नेम धरम वाल्ला… माँ मेरी इतनी भगवान की भगत… और यो हो क्या रिया इनके साथ…?”

जीराज बुआ की बिना राई का पहाड़ बनाने की आदत को अच्छी तरह जानता था सो घबराकर सील से उठ गया था और हाथ धोने लगा था | सरोज भी घबराकर बाहर आँगन में आ गई थी कि आज ज़रूर कुछ न कुछ होगा | दादी ने बुआ को शांत करते हुए कहा “चुप हो जाओ कावेरी | क्यों बिना मतलब की बात बना रही हो ? करने दो न… हमेशा ही तो करता है… जीराज तुम करो…”

“राम राम राम राम… माँ… तुझसे यो उम्मीद ना ही मुझे अक तू इत्ती डरेगी इस सत्यानास्सन से अक सच्ची बात बोलते भी डरेगी…”

“कावेरी क्या हो गया है तुम्हें…?” अभी तक दादी बुआ को समझाने में ही लगी थीं | भाभी चुपचाप रसोई में घुस गई थीं कि माता जी अपने आप समझा लेंगी | दादी बुआ को समझा बुझाकर भीतर ले जाना चाहती थीं पर बुआ थीं कि टस से मस नहीं हो रही थीं | उनका नाटक बढ़ता ही जा रहा था “अरे बाहर भीत्तर आती ना थके है कभी पर घर गिरस्ती के कामों में थक जावे है… भेज रक्खा है संभल वाल्लों ने भी अक ले यो चमार की जात घर में घुसा ले और इसके हाथ से सबका धरम भिरस्ट करवा दे… उन चोद्दों की तो माँ की…” पीहर वालों के लिये इस तरह की भद्दी गाली सुनना शायद भाभी से बर्दाश्त नहीं हुआ और रसोई से बाहर आकर बोल पड़ीं “उन लोगों कि क्यों बीच में खींचती हो बीवी जी ? जो बात करनी है सीधे मुझसे करो ना | तुम्हारे भैया ने ही कह दिया है कि इस तरह के काम जीराज से करवा लिया करो | और फिर वो चमार नहीं है – दूधिया है – उसी के हाथों का निकाला दूध पीते हो तुम सब | और वो श्यामा गाय भी उन्हीं संभल वालों की भिजवाई हुई है जिन्होंने जीराज को भेजा है…”

“ले अम्मा और सुन… सुन लिया ना कैसा ताना मारा इसने अपने पीहर का…? अब बोल… अब कर इसकी तरफ़दारी… अरे इसके घरवालों के टुकड़ों पे ना पल रिया मेरा भाई हाँ नईं तो… अरी लुच्ची राण्ड साफ़ साफ़ क्यूँ ना बोलती अक यारों से फ़ुर्सत ना है तुझे तो इससे काम करावेगी ही…”

“बीवी जी आप हद से आगे बढ़ी जा रही हो…”

“एल्लो बोल्लो, अब तू सिखावेगी छिनाल मुझे मेरी हद ? आन दे आज गंगा कू, ना तुझे चुटिया घसिटवाके घर से बाहर निकलवाया तेरा जलूस तो मेरा नाम भी कावेरी नईं… देख लिया माँ अपनी लाडली कू…? भौत इसी का कहे जा ही, लेल्ले परसाद अब…”

“तुम्हें हो क्या गया है बीवी जी जो यों… आज लड़कर आई हो क्या घर से…? कम से कम सरोज को तो देख लो कैसी सहमी खड़ी है इन बातों से…”

सबने देखा, सरोज वाक़ई दरवाज़े में डरी सहमी खड़ी थी | उसे देखकर बुआ ने और भी ज़ोर ज़ोर से बोलना शुरू कर दिया “अरे सब जान्नूँ हूँ मैं… ये दीददे खुले रेवें हैं मेरे और कान भी… अरे सारे नजीबाबाद में थू थू हो रई है छिनाल… एसई जवानी का बुखार है तो निकल जा ना मूँ काला करा के… सब जान्नें हैं अक उस कुत्ते हरीश के साथ क्या गुलछर्रे उड़ा के आई है… जा जाके पूछ ले सहर में किसी से भी… तुझे ना पता माँ कुछ भी, यो तो जब मुर्दाबाद में पढ़े ही तभी हरीश आया हा उंगे किसी ऐसेई काम कू, बस वहीँ से चक्कर चल रिया हा इसका हरीश के साथ… अरे तभी तो दुहेज्जू से बिया दिया घरवाल्लों ने अक नाक बची रेवेगी… अरे सारे करम पता लग गए हैं मुझे अमरू से…”

“क्या करम पता लग गए हैं मेरे अमरू से ज़रा मैं भी तो सुनूँ…” चरित्र पर लगाए इल्ज़ाम से भाभी तिलमिला गई थीं “अरे किस्मत फूटी थी मरी जो इस घर में आई – मरद की बीवी मर गई थी और सौतेली धी गोद में डाल दी थी मेरी… मेरा भगवान जानता है जो मैंने कभी इसे सौतेला या उन्हें दुहेजू समझा हो | तुम सबकी जी जान से सेवा की और तुम सब ही… माता जी तुम चुप क्यों हो…?”

दादी सर पकड़े ज़मीन पर बैठी थीं | लगता था जैसे उन पर बुआ की बातों का असर हो रहा था | बुआ ने दादी को देख, और अपनी बात बनते देख सर हिला हिलाकर फिर बोलने लगीं “हाँ सोतेल्ली… रंडुआ खसम… आ गई ना बात जुबान पे… अरी बिया तून्ने भी योई सोचके किया हा अक जी सोतेल्ली धी और रंडुआ खसम की जबान बंद रैवेगी… और तू जान्ने ही अक वो हरीश गंगा का दोस्त है… तुन्ने सोच्चा अक जी उससे भी वैसेई बनी रैवेगी… हाय हाय घर की इज्जत नीलाम करके रख दी इस छिनाल ने तो…”

जब भी इस तरह की कोई बात होती थी भाभी पर हिस्टीरिया का अटैक होता था | उस दिन भी इतना सब सुनकर और इतनी बुरी तरह अपमानित होकर भाभी खड़ी खड़ी काँपने लगी थीं | सरोज ने दौड़कर उन्हें संभाला पर वो धम्म से नीचे बैठ गईं | उनकी मुट्ठियाँ भिंचनी शुरू हो गई थीं | इस बीच हरीश चाचा जी, फूफा जी, पिताजी और दूसरे लोग दहलीज़ में पहुँच चुके थे और सब कुछ सुन चुके थे | भाभी का हाल देखा तो हरीश चाचा चुपचाप भाभी की तरफ़ बढ़े और सरोज के हाथ से पानी का ग्लास लेकर उनके मुँह पर छींटे मारने लगे | पिताजी चुपचाप सर झुकाए अपराधी बने खड़े थे – उनसे न कुछ बोलते बन रहा था न वहाँ खड़े होते – बहन आज सबके सामने अकारण ही उन्हें नंगा करने पर आमादा थी – माँ कुछ समझना नहीं चाहती थी – कुछ समझ ना पाते थे क्या करें – पर खड़े थे | फूफा जी भी अपनी पत्नी की इन हरकतों पर कुछ कहने सुनने लायक नहीं रहे थे लिहाज़ा उनके पास भी सर झुकाए खड़े रहने के अलावा कोई चारा नहीं था | हरीश चाचा जी को भाभी के मुँह पर पानी के छींटे मारते देख बुआ फिर बोलने लगीं “देख लिया अम्मा कित्ता लाड़ आ रिया है इस मर्दुए कू इस राण्ड पे… किस तरियों पानी मार रिया इस लुच्ची राण्ड के मूँ पे…”

“बहन जी बस…” अचानक से हरीश चाचा जी खड़े हुए और कड़क आवाज़ में बोले, फिर पिताजी की तरफ़ देखकर बोलने लगे “अगर मेरी अपनी बहन ने ऐसा किया होता तो लगाता एक उल्टे हाथ का और धक्का देता घर से बाहर | कभी का उससे सम्बन्ध खत्म कर चुका होता | घुसने ना देता कभी अपने घर में…”

अब अक फूफा जी साहस करके भीतर आ गए थे और उन्होंने गुस्से में आव देखा न ताव बस बुआ को झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया “हरामज़ादी मेरे ही पल्ले बांधनी थी… कहीं का नहीं छोड़ा इसने मुझे… ऐसी औरतें मेरे और सूरजप्रसाद की किस्मत में ही लिखी थीं…” और न जाने क्या क्या बोलने लगे फूफा जी | सारी शाम ख़राब हो चुकी थी | हरीश चाचा जी और बाक़ी के लोग बाहर निकल गए थे और जाते जाते पिताजी को बोलते गए थे “पण्डित जी, हमें ये उम्मीद नहीं थी कि आपके घर में भी ये सब देखने को मिलेगा… जाते हैं…”

फूफा जी ने गुस्से में बुआ का हाथ पकड़ा और लगभग घसीटते हुए बुआ को लेकर बाहर निकल गए | जीराज पता नहीं कहाँ चला गया था – आधी रात कभी लौट कर आया था वो | इधर भाभी बेहोश पड़ी थीं – बदन अकड़ा हुआ – मुट्ठियाँ भिंची हुई – मुँह से झाग निकलते हुए – पिताजी ने भाभी की बेहोशी खोलने की कोई कोशिश नहीं की – बस सर पकड़ कर वहीँ भाभी के पास ज़मीन पर उकडूँ बैठ गए सर पर हाथ रखकर – जैसे भाभी के मरने का सोग मना रहे हों | सरोज वहीँ एक तरफ़ सहमी खड़ी थी | जीराज देर रात जब घर वापस आया तो काफ़ी कुछ ऐसा देखा कि अगले दिन ही केशव गार्ड के मार्फ़त संभल मामा जी के पास कुछ सन्देश भिजवा दिया था | दादी ज़मीन पर बैठी थीं और न जाने क्या सोच सोच कर बस हिलती चली जा रही थीं | वक़्त थोड़ी देर के लिये जैसे ठहर सा गया था | सब कुछ ख़ामोश … एक डरावना सन्नाटा हर तरफ़… हरेक के खयालों में एक अजीब सा तूफ़ान… कभी कभी बाहर पेड़ पर बैठा उल्लू बोलता था तो पता चलता था जैसे रात काफ़ी हो चुकी थी… वरना तो सबके दिलों में ही इतना तूफ़ान चल रहा था कि शायद हवा भी रुकी हुई थी ये सोचकर कि अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं… और किसी पेड़ का एक पत्ता तक नहीं हिल रहा था…

थोड़ी देर बाद जैसे दादी को कुछ होश आया और उठकर पिताजी के पास जाकर उनके कन्धे पर हाथ रखकर बोलीं “जो हुआ सो हुआ, भूल जाओ, अब कम से कम दुलहिन को तो होश में लाने की कोशिश करो… ऐसे तो मर जाएगी… रुक जाएगी साँस इसकी…” और वहीँ पिताजी के पास बैठकर सुबकना शुरू कर दिया | पिताजी दुःख, अपमान, क्रोध और अपराधबोध के समन्दर में दूबे हुए थे | बहन ने उन्हें किसी के सामने मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा था | दादी की बात सुनकर फटाफट उठे “अभी हमेशा के लिये इसे होश में ला देता हूँ… तुम सबके कलेजों में ठण्डक पड़ जाएगी… जा बुलवा ले अपनी कावेरी को…” और तेज़ी से रसोई में घुसे – और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता – मिट्टी के तेल की बोतल लाकर भाभी पर उलट दी और दीयासलाई की तीली सुलगा कर उनके ऊपर फेंक दीं – सरोज और दादी पिताजी को पकड़ कर रोकते रहे – चीखते चिल्लाते रहे – पर पिताजी के भीतर जैसे कोई भूत घुस गया था…

पिताजी घर से बाहर निकल गए | दादी ने बचाओ बचाओ चिल्लाना शुरू कर दिया था… सरोज चीख़ चीख़ कर रो रही थी… इस दोनों की चीख़ पुकार सुनकर भाभो ने छत से झाँका तो सन्न से रह गईं… भागी भागी नीचे आईं “ए लल्ली, जल्दी से कम्बल ला… जल्दी कर…” और इतने घबराई हुई सरोज भीतर से कम्बल लेकर आई, भाभो ने भाभी के बदन से जलते कपड़े तार तार करके खींच कर फाड़ कर उतार फेंके थे… ऊपर से नीचे तक बिलकुल नंगे बदन भाभी भाभी को अभी भी कुछ होश नहीं था… उनका निचला हिस्सा काफ़ी जल चुका था… भाभो ने भाभी को कम्बल में लपेटा | तब तक लाला जी भी आ चुके थे | दोनों ने कम्बल में लिपटी पहले की ही तरह बेहोश नंगी भाभी को गोद में उठाया “चल लल्ली डाक्टर साहब के उंगे चल…” और तीनों जल्दी से भाभी को लेकर डा. रस्तोगी के अस्पताल की तरफ़ चल पड़े…डी दादी दरवाज़ा पकड़े ना जाने कब तक वैसे ही खड़ी रही होंगी कोई नहीं जानता…

डा. साहब के दरवाज़े की घण्टी बजाई सरोज ने | तब तक कोई सोया नहीं था उनके घर… शायद कोई डिनर वगैरा चल रहा था… कोई ख़ास मेहमान आए हुए थे वहाँ… भीमसिंह ने दरवाज़ा खोला तो सरोज को उस वक़्त आया देख चौंक गया हैरान भीमसिंह डा. साहब को आवाज़ देने ही वाला था कि उसे दरवाज़े पर देर लगती देख सफ़ेद चमचमाता कुरता पायजामा पहने, हाथ में ड्रिंक का ग्लास पकड़े और होठों के बीच में सिगार दबाए डा. साहब खुद ही वहाँ पहुँच गए “सरोज आप…? क्या हुआ…? ये लोग कौन हैं…? बेटा आप… आप रो क्यों रही हैं…? आओ आओ भीतर आओ… पंडत जी कहाँ हैं…? कौन हैं ये…?” ढेरों सवाल दागते दागते डा. साहब ने इन लोगों के भीतर आने के लिये रास्ता छोड़ दिया और अपना ग्लास वहीँ लॉबी में पड़े तख़्त पर रखकर भीतर की तरफ़ चल दिये, इन लोगों को अपने पीछे आने का इशारा करके |

सब लोग भीतर पहुँचे | “भीमसिंह जल्दी से माता जी (अपनी पत्नी को वे ऐसे ही बुलाते थे – सरोज इन लोगों को दादी जी और दादा जी बुलाती थी) को बुलाकर लाओ…” और इन लोगों को बरामदे की तरफ़ आने का इशारा किया |

बड़ा सा आलीशान बंगला था डॉ. साहब का | घर में बाहर बड़ा सा चबूतरा चहारदीवारी से घिरा हुआ था | बीचों बीच एक गेट था | वहीँ घण्टी लगी हुई थी | पूरे शहर में एक तो इनका घर, एक ठेकेदार भगवान दास का घर और दो एक और ऐसे घर थे – बड़े बड़े आलीशान बँगले | सबसे पहले बिजली भी इन्हीं घरों में लगी थी | तो, डा. साहब के यहाँ इस बड़े से चबूतरे पर चढ़कर थोड़ा आगे बढ़ने पर बीचों बीच फिर एक बड़ा सा दो पल्लों वाला लोहे का फाटक था और उसके एक पल्ले में एक कोने में छोटा दरवाज़ा बना हुआ था | इसी छोटे से दरवाज़े से हर कोई बाहर भीतर आता जाता था | पूरा फाटक ज़रूरत पड़ने पर ही खुलता था | आज भीमसिंह ने वही पूरा फाटक खोल दिया था इन लोगों के भीतर आने के लिये…

भीतर पहुँचने पर दहलीज़ – जिसे ये लोग लॉबी कहते थे और जिसमें ख़ूबसूरत क़ालीन बिछा तख़्त पड़ा रहता था – को पार करके ख़ूब बड़ा आँगन था – जिसके दाहिनी तरफ़ रसोई, एक बड़ा ड्राइंग रूम जिसका दरवाज़ा दहलीज़ में खुलता था, और रसोई और ड्राइंग रूम के बीच में डाइनिंग रूम था और वहीँ से बाहर की तरफ़ जाकर मोटर गैराज थी | आँगन में आने पर बाक़ी तीन तरफ़ कमरे बने हुए थे और हर कमरे के बाहर बरामदा | आँगन के बीचों बीच गोल क्यारी बनी हुई थी जिसमें तरह तरह के रंग बिरंगे फूल हर वक़्त खिले रहते थे | सरोज को उस क्यारी के पास बैठना बहुत भाता था और वहाँ बैठी बैठी वो सपना सजाती थी कि कभी उसका घर भी ऐसा ही होगा | पर आज कोई सपना उसकी आँखों में नहीं था | आज तो भयंकर दहशत हावी थी उस पर और बस जैसे भी हो भाभी को ठाक कराना चाहती थी | आँगन के बाँईं तरफ़ के बरामदे में बिल्कुल बीचों बीच एक झूला लटका रहता था जिस पर डा. साहब की लड़कियों के साथ बैठकर सरोज सारा सारा दिन बतियाती रहती थी – वहीँ बैठे बीते ये लोग खाना भी खा लिया करते थे | झूले के पास ही ज़रा हटके एज तख़्त पड़ा था और उस पर भी एक ख़ूबसूरत क़ालीन बिछा था और गाव तकिये रखे थे | भीमसिंह ने गाव तकिये हटाकर कम्बल में लिपटे शरीर को लिटाने के लिये जगह बनाई | तब तक माता जी भी आ चुकी थीं | डा. साहब ने सिगार ऐश ट्रे में रखकर उस बेहोश बदन के मुँह पर से कम्बल हटाया तो सकते में आ गए… ये क्या… मास्टरनी जी…?

“क्या दुलहिन…?” दादी ने चौंक कर उधर देखा तो जैसे एक बार उन्हें अपनी आँखों पर कतई विश्वास ही नहीं हुआ | भाभी को इस हाल में देखकर भीमसिंह भी सकते में आ गया था और फटाफट बड़े भैया और छोटे भैया को भी धीरे से ड्राइंग रूम से बाहर बुला लाया था | बाक़ी के नौकर मेहमानों की आवभगत में लगे थे | दादा जी ने अंग्रेज़ी में कुछ कहा दोनों चाचा लोगों से और भाभी को बड़े चाचा जी गोद में उठाकर क्लीनिक के भीतर वाले रूम में ले गए | इस बरामदे से ही बाँए हाथ को घर के लोगों और अस्पताल के स्टाफ के लिये क्लीनिक, भीतर वाले कमरे और एक्सरे रूम में आते जाते थे | दोनों चाचा भाभी के साथ उस रूम में थे और दादा जी भी मेहमानों से इज़ाज़त लेकर वहाँ पहुँच गए थे | उस वक़्त कोई कम्पाउन्डर भी नहीं था क्लीनिक में सो दोनों चाचा ही बाहर भीतर आ जा रहे थे कुछ न कुछ सामान लेकर और भीमसिंह रसोई में कुछ अस्पताल का सामान उबाल रहा था |

भीतर दादाजी और चाचा लोग भाभी को बचाने की कोशिश कर रहे थे और यहाँ दादी जी परेशान हो रही थीं कि आखिर दुलहिन को हुआ क्या था ? बहुत लाड़ लड़ाती थीं वो भाभी का और बुआ को इससे भी जलन होती थी कि वो भाभी से पहले से नजीबाबाद में रहती थीं फिर भी डाक्टर साहब के घर उनका आना जाना नहीं हो सका था, और भाभी के आते ही उन लोगों के साथ बिल्कुल घर के सम्बन्ध हो गए थे | दादी बार बार पूछ रही थीं सरोज से कि कुछ तो बताओ ये सब हुआ कैसे ? बड़े भैया कहाँ हैं ? दादी कहाँ हैं ? आज बुआ तो नहीं आई थीं ? दादी जी भी जानती थीं कि बुआ आएँगी तो कुछ न कुछ झमेला तो होगा ही | पर सरोज थी कि दहशत के मारे उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे | बस धार धार आँसू रोए चली जा रही थी | दादी ने उसे अपने सीने से लगा रखा था | भाभो से पूछा कि आप लोग कौन हैं तब लाला जी न बताया “हम तो माता जी इनके पड़ोस में रेवें हैं… वो सुना होगा तुमने छोट्टी जाम्मन वाला मकान… वोई घर है जी हमारा… हम तो जी सोने की खात्तर गए है छत पे अक इनके हाँ से चिल्ल पुकार सुनाई पड़ी… छत से देक्खा तो यो दोंनों दाद्दी पोत्ती रोए चली जा हीं… चिक्खे जा हीं अक बचाओ बचाओ… तब में इसे अपनी घरवाल्ली कू लेक्के निच्चे पहोंचा तो यो सब देक्खा… धू धू करके जल रई हीं मास्टरनी जी… इन्ने कपड़े फाड़ के फेंक्के फेर कम्बल डाल्ला और इंगे लिआए जी…”

“आज बड़े भैया की बहन आई थीं क्या…?” दादी जी ने पूछा तो भाभो ने जवाब दिया “मुझे कुछ ना पता जी, मास्टरनी जी कईंकू गई हीं दिन में | बाद कू क्या हुआ कुछ ना पता…” भाभो और लाला जी इस तरह झुक झुक कर बात कर रहे थे जैसे उनके नौकर हों – उनके लिये तो रायबहादुर डा. रस्तोगी साहब के घर में घुसना ही एक सपने के पूरे होने के जैसा था… भले ही किसी कारण से आना हुआ वहाँ – पर देखने को तो मिला वो घर जिसकी गिनती शहर के कुछ गिने चुने घरों में होती थी…

हूँ… तोये बात है..” भाभो की बात से कुछ अनुमान लगाती और सरोज का माथा चूमती दादी बोलीं “रोओ मत लाली, सब ठीक हो जाएगा | कुछ नहीं होगा आपकी भाभी को | हम सब हैं ना… चिंता क्यों करती हो…?”

इसी बीच मोटी मिश्रानी जी भी आकर खड़ी हो गई थीं और अपना ही राग अलापने लगी थीं “हमने तो कई बार समझाया पंडत जी को भी और माता जी को भी अक पुजारन की बातों में मत ना आया करो | क्यों अपना घर ख़राब करने पर्तुले हुए हो ? वो तो अपने उन सीधे सादे जेठ जिठानी को ही ना निभा सकी | पर हमारी कोई सुने तब ना | सोचते होंगे अक इस मिश्रानी को क्या हक़ हमारे घर के मामलों में बोलने का…”

“अब इन सब बातों का वक़्त नहीं है मिश्रानी जी | अप्प वहाँ मेहमानों को संभालिये | खाना खा के जाने लगें तो हमें बता दीजियेगा | माफ़ी माँग लीजियेगा हमारी तरफ़ से | वैसे उन लोगों को पता है | डा. साहब ने बता दिया है | आप बस इन लोगों के लिये चाय बनाकर दे जाइये और लाली के लिये गरम दूध और साथ में कुछ खाने के लिये…” मिश्रानी जी को हिदायत देकर दादी जी फिर से लाली को सान्त्वना देने में लग गईं | लाला जी और भाभो वहीँ फ़र्श पर बैठने लगे तो दादी जी ने जबरदस्ती उन्हें उठाकर मूढ़ों पर बैठाया | दोनों ने सकुचाते हुए चाय नाश्ता किया | सरोज की साँस फूल चुकी थी रोते रोते तो दादी जी ने अपने हाथों से उसे गरम दूध पिलाया तब जाकर थोड़ी शांत हुई | फिर जो कुछ उसने बताया उसे सुनकर वास्तव में दादी जी का दिल दहल गया था |

भीतर भाभी शायद होश में आ चुकी थीं और पता चला कि लगातार रोए चली जा रही थीं | दादा जी दादी, भाभो और सरोज को उस कमरे में लिवा ले गए | भाभी को कुछ इंजेक्शन वगैरा लगे हुए थे | दादी जी और भाभो उन्हें चुप कराने में लगे थे | सरोज भी भाभी के मुँह पर प्यार से हाथ फिराती फूट फूट कर रो रही थी “भाभी रोओ मत तुम | तुम ठीक हो जाओगी जल्दी से फिर हम दोंनों संभल चलेंगे | नहीं रहेंगे यहाँ | सब गंदे लोग हैं यहाँ… पिताजी भी… में किसी से भी बात नहीं करूँगी…”

दादा जी ने दादी को समझाया कि भाभी नीचे से काफ़ी जल चुकी हैं क्योंकि जलता हुआ पेटीकोट वहाँ चिपक गया था, और जब इन लोगों ने कपड़े खींच कर निकाले तो वहाँ से जलती हुई खाल भी खिंच आई थोड़ी सी जिससे ज़ख्म भी हो गया है और ठीक होने में कुछ वक़्त लगेगा | अच्छा हो संभल खबर भिजवा दी जाए और जब तक कोई वहाँ से आता है तब तक दुलहिन को अपने पास ही रखा जाए…

ट्रिंग ट्रिंग… अभी ये लोग बात कर ही रहे थे कि दादा जी के फोन की घण्टी बज उठी | दादा जी ने फोन उठाया, बात की, फिर झुँझलाते हुए दादी को बताया “थाने से फोन था | महाराज जी बीवी को आग लगाकर खुद थाने जाकर बैठ गए कि भई अपनी बीवी को ज़िंदा आग की लपटों के हवाले करके आए हैं क्योंकि हमारी माँ और बहन यही चाहती थीं… अब आप हमें अरेस्ट कर लीजिए और फाँसी चढ़ा दीजिये… वाह… क्या ऊँची सोच है…? सारी दुनिया को रास्ता दिखाते हैं और खुद…? वो तो थानेदार अच्छी तरह वाकिफ़ है पण्डित से सो बोला जो भी हुआ उसे भूल जाइए और घर जाइए | घर के झगड़े घर ही में निबटाने की कोशिश कीजिये | दूर दूर तक लोग आपको पूजते हैं | ऐसा कुछ मत कीजिये कि आपके उस सम्मान को कोई ठेस लगे | अब रो रहे हैं वहाँ फोन पर कि पत्नी और बच्ची को क्या मुँह दिखाएँगे | ये सारी बातें पहले सोचने की होती हैं न कि बाद में पछताने की… ख़ैर आप सँभाल लीजियेगा | क्या फ़ायदा हम गुस्से में कुछ उल्टा सीधा बोल बैठें तो…” ये लोग पिताजी को अपने बड़े बेटे की तरह मानते थे और उसी तरह लाड़ भी लड़ाते थे और गलत होने पर डाट भी देते थे | पिताजी भी इन लोगों का अपने माता पिता की ही भाँति सम्मान करते थे |

उसके बाद कुछ दिन सरोज, भाभी और पिताजी वहीँ रहे थे | फूफा जी को वहीँ बुलाकर सारी बातें समझाई गई थीं और दादी को फूफा जी धामपुर छोड़ आए थे तब पिताजी सरोज और भाभी को लेकर घर गए थे | उधर जीराज के लौटने पर जब उसे दादी से सारी बातें पता लगीं तो उसने तुरन्त केशव गार्ड के हाथ संभल खबर भिजवा दी थी कि चाचा जी जल्दी से आकर बुआ को ले जाएँ… यहाँ उनकी जान को ख़तरा है… और दो इदं बाद ही बड़े मामा जी और मामी जी आ गए थे सरोज और भाभी को लिवाने… भाभी ज़ख्म ठीक होने तक बड़े घर ही रही थीं और दादी और बुआ लोगों ने उनकी ख़ूब सेवा की थी और उनका मन भी बहलाने की कोशिशें की थीं | पिताजी भाभी से लिपट कर ख़ूब रोए थे | दादा जी और दादी ने भी काफ़ी लानत मलानत की थी पिताजी की | पिताजी को अहसास तो था अपनी भूलों का… पर आज सरोज सोचती है कि काश कभी दादी और बुआ ने पिताजी के दिल का दर्द समझने की कोशिश की होती या कभी भाभी को ही समझने की कोशिश करता… पर कौन करता… आखिर को भाभी भी थी तो औरत ही… यानी कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में “अबला नारी…”

क्रमशः………..

सौभाग्यवती भव – अध्याय चौदह

चौदह – दादी का नजीबाबाद पहुँचना

दादी ने केशव गार्ड के हाथ खबर भिजवाई “अब हमारी सेहत ठीक नहीं रहती | हम चाहते हैं कि अब तुम लोगों के पास आकर रहें | किसी रोज़ आकर हमारा सामान और हमें ले जाओ यहाँ से…”

सरोज को बुआ के हवाले छोड़ पिताजी और भाभी धामपुर चले गए | गाज़ियाबाद चाचा को भी खबर भिजवा दी थी पिताजी ने सो वे लोग भी आ पहुँचे थे | अब तक चाची की भी गोद हरी हो चुकी थी और उनके यहाँ भी दो लड़कियाँ पैदा हो चुकी थीं – सरसुती और अंजना | हर चाची की जचकी में भाभी को ही जाना पड़ा था जच्चा बच्चा की देखभाल के लिये और सरोज रहती थी दिन में बुआ के घर और रात को पिताजी के पास | भाभी ने जी जान से चाची की सेवा की थी | पर भाभी शायद ये नहीं जानती थीं कि वो नागिन को पाल रही थीं – जानती भी थीं शायद – पर विशवास नहीं करना चाहती थीं अपने दिल पर – था कौन वहाँ उनकी सुनने वाला ?

बहरहाल, इस बार भी सरोज बुआ के पास रहने चली गई | बुआ बात बात पर सरोज का मुँह देखतीं और ठण्डी हाय भर कर बोलतीं “हे भगवान, लल्ली के दिन फिरा दे किसी रोज़ तो… करमजली ऐसे भाग लेके पैदा हुई अक जी माँ भाई कू तो खा गई, अब ना जाने इसका क्या होवेगा…” फिर अचानक से आँखों में आँसू भरकर धोती के पल्ले से एक आँख से पोंछती हुई और दूसरी आँख से सरोज को देखती हुई आगे बोलतीं “इसकी चिंता खाए जावे है मुझे तो | वो लियाया है गंगा उस राण्ड संभल वाल्ली कू | अब जो भी हो रैवेगी तो सोतेल्ली ही | छिनाल हर बखत पीच्छे पड़ी रे है लाड्डो के | पता ना क्या करेगी इसका…? हाँ नईं तो… इसकी रच्छा करियो भगवान उस चुड़ैल से…”

सरोज समझ तो नहीं पाती थी इन सब बातों का मतलब, पर दुखी ज़रूर होती थी | बहुत बुरा लगता था जब कोई उसे करमजली या फूटे भाग वाली बोलता था | कभी कभी सोचती थी कि भगवान जी के पास जाऊँगी तो पूछूँगी ज़रूर कि अगर किसी लड़के की माँ बाप या भाई बहन मर जाएँ तो उसे कोई करमजला या अभागा नहीं बोलता, फिर अगर लड़की के साथ ऐसा हो जाए तो उसे करमजली या अभागी क्यों बोला जाता है ? जामुन वाली बड़ी भाभो मरी थीं तो क्या विपिन को किसी ने कहा था कि वो करमजला है या अभागा है ? और विपिन की तो एक बहन भी मर गई थी | याद आ रहा था सरोज को वो मनहूस दिन आज भी जब विपिन और कम्मो – दोनों भाई बहन खेल रहे थे बाहर दूसरे बच्चों के साथ | सरोज भी तो साथ ही थी | तभी न जाने कहाँ से एक मरखना बिजार उनके पीछे पड़ गया था | सारे बच्चे शोर मचाते हुए भागे थे | विपिन और सारे बच्चे तो भाग कर कोई पटवारी के घर में तो कोई सुल्लड़ के घर में घुस गया था | न जाने कैसे कम्मो पीछे छूट गई थी | बिजार को वही सामने पड़ी और उसने जाकर उसी के पेट में सींग घुसेड़ दिया | सारे बच्चे दरवाजों की ओट में पत्थर के बुत बने खड़े थे | बच्चों का शोर सुनकर मुहल्ले वाले भी लाठी डंडे लेकर आ चुके थे | बिजार को तो मार मार कर भगा दिया लोगों ने, पर कम्मो को जब तक डाक्टर के पास ले जाते तब तक वो साँस तोड़ चुकी थी | काफ़ी खून बह चुका था उसका | कृष्णकुमार चाचा जी के यहाँ ले जाने से पहले वहीँ सड़क पर ही दरबारी जी ने कम्मो की बाहर निकली आँत हाथों से भीतर दबाकर उसके ऊपर अपने सर से साफ़ा उतार कर बाँध दिया था | पर उससे भी कोई बात नहीं बनी थी |

मुहल्ले वालों ने डरे सहमे बच्चों को दरवाज़े की ओट से बाहर निकाला | सबके घरवाले बच्चों को लेकर अपने अपने घर चले गए | भाभी तब कहीं से वापस लौट रही थीं | रिक्शा से उतरीं तो देखा था कि मुहल्ले वाले कम्मो को रिक्शा में लादकर ले जा रहे थे | उधर बदहवास बनी भाभो दरवाज़े की चौखट पर बेहोश से पड़ी थीं | भाभी दौड़कर भाभो के पास पहुँचीं तो सुल्लड़ की माँ ने सारी बात बताई | दूसरी औरतों की मदद से भाभी ने भाभो को उठाया और भीतर ले गईं | भाभो तब भी बेहोश सी ही थीं | तभी कोई डरी सहमी सरोज को लेकर भाभी के पास पहुँच गया | भाभी को देखते ही सरोज उनकी साड़ी में ऐसे दुबक गई जैसे उनकी गोद से ज़्यादा महफ़ूज़ जगह और कोई हो ही नहीं सकती थी, और भाभी ने प्यार से उसके बालों में ऊँगली फिरानी शुरू कर दी |

कई दिनों तक बच्चे बाहर नहीं गए आए थे खेलने | इक तो उस दिन के हादसे का डर ऊपर से कम्मो की दर्दनाक मौत का ग़म – बच्चों को सामान्य होने में काफ़ी वक़्त लगा था | पर सरोज को आश्चर्य होता था ये देखकर कि भाभो को कम्मो की मौत पर सान्त्वना देने आई औरतें यही बोलती थीं “अरी भागवान, कम्मो की कमी तो कोई पूरी ना कर सके है | बड़ी होनहार छोकरी ही | पर ख़ैर मना अक बिजार ने उसेई मारा | अगर जो विपिन कू मार गिराता तो सोच कित्ता बड़ा पहाड़ टूट पड़ता तेरे ऊप्पर… अरी अगर विपिन कू कुछ हो हवा जाता तो क्या कोई बचता मूँ में आखिर के बखत दो बूँद पानी डालने वाला भी ? भगवान ने फिर भी भौत ख़ैर कर दी अक कम्मो पे ही गुजरी | धी का क्या है – जाना तो दूसरे घरी है | और फेर अभी तो गुटल और गुना दो दो छोकरियाँ बची हैं – पर लौंडा चला जावे पाला पनासा तो हो जावे ना घर सुन्ना… और तुम तो यो सोच्चो अक भागवान थी कम्मो जो खुद चली गई जमराज के पास पर भाई कू जिंदगी दे गई…” और सरोज सब कुछ सुनकर सोचती कि क्या कम्मो इन्सान नहीं थी जो लोग ऐसा बोलते हैं ? क्या लड़की को ज़िंदा रहने का कोई हक़ नहीं ? विपिन को तो कभी किसी ने नहीं कहा कि वो करमजला है या अभागा है जो अपनी बहन को खा गया ? और फिर बेटी के ग़म में भाभो चल बसीं तब भी किसी ने नहीं कहा कि विपिन अपनी माँ को भी खा गया ? फिर लड़की को ही ऐसा क्यों बोलते हैं ? तभी तो जब कोई उसे करमजली या अभागी बोलता तो वो यही सोचती कि भगवान जी से जब भी मिलना होगा तो पूछूँगी ज़रूर कि लड़की के बारे में ही हमेशा ऐसा क्यों बोलते हैं ? और वो भी ख़ासकर औरतें ही बोलती हैं, आदमी नहीं…

आज सरोज सोचती है कि क्या कभी कोई उस माँ के दुःख को समझने की कोशिश करता है जो बेटी को भी बेटे की ही तरह नौ महीने कोख में पालती है और अपना हाड़ माँस उसे देती है उसका आकार बनाने को और उसे जनने में भी उतनी ही प्रसव पीड़ा होती है जितना बेटा जनने में होती है ? वही बेटी अगर उसकी आँखों के आगे चली जाए तो क्या गुज़रेगी उस पर इस बात को कोई समझना चाहता है कभी ? या वो भाई जो पिछले आठ दस बरस से बहन के साथ खेलता था आज वही दर्दनाक मौत की शिकार हो गई – क्या गुज़री होगी उसके दिंल पर, किसी ने सोचने की कोशिश की कभी ? या, माँ और बहन के बाद कोई उसका अपना नहीं रहा | चाची के टुकड़ों पर पला | वो तो चाची अच्छी थी उसकी, वरना रह जाता वो भी बगौरा होकर जैसे सरोज रह जाया करती थी भाभी के पीछे से | तो क्यों लोग माँ और बहन को करमजली और अभागन जैसे सम्बोधनों से सुशोभित करते हैं ? क्यों भूल जाते हैं उस वक़्त कि कभी इसी औरत को “सौभाग्यवती रहो” के आशीर्वचनों से नहलाया गया था ? काश कोई समझ पाता…

ख़ैर, ज़िंदगी को ऐसे ही चलना था – लोगों को ऐसा ही रहना था – बल्कि आगे शायद अभी और भी बहुत कुछ होना था – जिसका दूर दूर तक भी सनगुमान नहीं था किसी को…

पिताजी और भाभी दादी के ताम झाम के साथ नजीबाबाद पहुँच चुके थे और रात को ही पिताजी बुआ के घर से सरोज को लिवा लाए थे | दादी के आने के बाद कुछ दिन बड़े आराम से गुज़रे थे | पिताजी और भाभी भाग भाग कर दादी की सारी ज़रूरतें पूरी करते थे | भाभी तो थीं ही सेवा की प्रतिमूर्ति | और सरोज… उसके तो मज़े ही आ गए थे | सारे मुहल्ले में उसने ढोल पीट रखा था “मेरी दादी आने वाली हैं – देखना कितना अच्छा गाती हैं… कितनी अच्छी ढोलक बजाती हैं… और हारमोनियम भी… और डाँस…? उसमें तो जवाब नहीं दादी का…” और मुहल्ले के बच्चे और सरोज के दूसरे दोस्त दादी के आने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे – जैसे कोई वी आई पी आने वाला हो…

दादी की लाडली तो थी ही सरोज, सो हर वक़्त बस दादी और पोती की छनती थी | भाभी ने सरोज के लिये सुन्दर सुन्दर गुड़िया गुड्डे और दूसरे खिलौने बनाए थे – कुछ कपड़े में रुई भरकर और कुछ कागजकी लुगदी से | सुन्दर सुन्दर लंहगे, गरारे शरारे, फ्राक और कुर्ते पायजामे सिले थे उसके लिये | सरोज का काम था सारा सारा दिन ट्रंक खोलकर उसमें से कपड़े निकाल निकाल कर दादी को दिखाना | फिर एक एक कपड़े को पहनकर चारों तरफ़ घूम घूम कर दिखाना | कभी दादी को अपने साथ खिलौनों से खेलने के लिये बैठा लेना | सरोज की सहेलियाँ भी आ जाती थीं और मचती थी धमा चौकड़ी | दादी को सरोज जबरदस्ती हारमोनियम पर बैठा देती | दादी भी मस्ती में भरकर बच्चों के साथ गाती बजाती रहतीं | कभी सरोज के ज़िद करने पर डाँस भी करके दिखा देतीं | थोड़ा सा नाचकर थक जातीं और बैठ जातीं और धोती के पल्ले से पसीना पोंछती हुई पंखा झलती बोलतीं “अरी पगली अब इस उम्र में हमारा नाच क्या देखती हो भला ? हूँ ? अरे हम तो नदी किनारे के पेड़ हैं भईया | अब तो तुम लोगों के दिन हैं…” फिर कुछ गर्व के साथ भाभी से मसखरी करती बोलतीं “हाँ नाचते थे हम ख़ूब जब उम्र थी हमारी | मुहल्ले पड़ोस के लड़के छिप छिप कर देखा करते थे हमारा नाच | कितनों पर बिजली गिराई हमने अपनी उम्र में | अब तुम्हारी माँ की तरह थोड़े हैं कि न नाचना आता है न गाना बजाना | अरे ये सब तो हम औरतों का गहना है लाली | इसी सब पर तो रीझते हैं हमारे मर्द | तुम्हारे दादा जी बेहद गुस्सैल थे पर हम अपनी अदाओं से उन्हें शान्त रखते थे | पर तुम अभी बच्ची हो, नहीं समझोगी | अच्छा चलो अब बहुत हो चुका | अब तुम लोग खेलो कूदो और हम जाते हैं तुम्हारी माँ के साथ छत पर | चलो भई संभल वाली…” और यों हँसती हुई सास बहू ऊपर छत पर चली जातीं | सरोज की सहेलियाँ उसकी तरफ़ ऐसे देखतीं मानों कहना चाहती हों “कितनी खुशनसीब है तू सरोज जो इतनी अच्छी और प्यार करने वाली दादी और इतना ख़याल करने वाली माँ मिली है तुझे | तेरे घर में सब लोग कितने हिल मिल कर रहते हैं…”

“हिलमिल कर… ऊँ हूँ…” पलँग पर लाचार पड़ी पड़ी सरोज ने एक ठण्डी साँस भरी और फिर से यादों की दुनिया में पहुँच गई | उसे याद आ रहा था कि दादी के आने के बाद भाभी कुछ दिनों तक घर से बाहर नहीं गई थीं | वैसे भी घर से बाहर कम ही जाती थीं | ज़्यादातर तो घर में ही बैठी या तो कुछ लिखती पढ़ती रहती थीं या फिर घर के दूसरे कामों में लगी रहती थीं | सरोज के ही काम क्या कम होते थे ? बाहर तो बस तभी जाती थीं जब पिताजी ज़िद करते थे किसी गोष्ठी वगैरा में चलने की | भाभी हर वक़्त चुपचाप रहा करती थीं और काम में लगी रहा करती थीं | हाँ बातें होती थीं तो या तो दादी से और सरोज से पूछा जाता था कि खाने में क्या बनेगा या फिर बस सरोज के साथ बातें होती थीं | हाँ, दादी को बातों की आदत थी तो वे भी या तो बाहर चबूतरे पर चारपाई डलवाकर अड़ोसनों पड़ोसनों से बतियाती रहती थीं या फिर सरोज को किस्से कहानियाँ सुनाती रहती थीं – जिनमें ज़्यादातर दादा जी की ही बातें होती थीं, या फिर पिताजी के चुलबुले किस्से और चाचा के गुस्से की बातें | दादी ने ही सुनाया था कि किस तरह पिताजी चाचा और दोस्तों के साथ कलियावाले जाया करते थे और वहाँ आरती के बाद परिक्रमा के वक़्त दण्डवत करने के बहाने नीचे नीचे लेटे लेटे सारे दोस्त केले खा लिया करते थे औए छिलके वहीँ फेंक देते थे | परिक्रमा करते लोग देखकर खुश होते थे “कितने धार्मिक स्वभाव के लौंडे हैं | मन्दिर में दण्डवत करते हैं भगवान की मूर्ति के आगे | वरना आजकल के जवान लौंडे…” आरती खत्म होने के बाद जब पण्डित जी प्रसाद के लिये केले उठाने जाते तो काफ़ी सारे केले के छिलके पड़े देखकर गिलहरी पर गुस्सा उतारते “देखो महाराज जी कितनी चालाक गिलहरी है… केले खा जावे है और छिलके फेंक जावे है वहीँ…” चाचा घर आकर पिताजी पर गुस्सा करते थे “पंडत जी, अगर किसी ने देख लिया किसी दिन तो बेभाव की पड़ेंगी…” पर किसी ने कभी देखा ही नहीं था और ये शरारत ऐसे ही चलती रही थी काफ़ी अरसा |

सदाशिव चाचा जी की शादी का किस्सा – बारात सिव्हारा गई थी | वहाँ किस तरह सारे दोस्तों ने मिलकर फेरों से पहले सदाशिव चाचा जी को भाँग पिला दी | फिर तो बस मज़ा आ गया था – दूल्हे को पकड़ कर फेरे लगवाए गए थे | और वो बात जब उसी बारात में गए सारे बारातियों ने भाँग पी ली थी विदा वाली रात को | वहाँ किसी घर में ठहराया गया था रात में बारात को | भाँग ने ऐसा जल्वा दिखाया कि सबके पेट ख़राब हो गए थे | सारी रात सब लोग लोटा लेके जाते रहे थे | कोई आँगन में लगे चूल्हे को ही संडास समझ बैठा और भाँग के नशे में वहीँ बैठ गया | अलस्सुबह जब आँख खुली तो सबको रात के कारनामे पता चले और दूल्हे से पहले ही अपना बोरिया बिस्तर लपेट कर भाग खड़े हुए बैलगाड़ियों में सवार हो | और हाँ वो किस्सा जब पिताजी मुहल्ले के बच्चों से बदन दबवाने के लिये नाटकबाज़ी किया करते थे | धामपुर में बाहर चबूतरे पर बैठ जाते चारपाई पर और ज़ोर ज़ोर से बोलना शुरू कर देते “अरे बालकों, मुझे पिताजी मत ना बुलइयो… चिढ़ है मुझे पिताजी कहलाने से…” बस फिर क्या था ? अड़ोस पड़ोस के लौंडे लबारे इकठ्ठा हो जाते और “पिताजी पिताजी…” का शोर मचाते पिताजी के ऊपर चढ़ जाया करते | पिताजी तो खुश हो जाते बदन दबवाते हुए – पर उन लौंडों की अम्माएँ लाज से मरी जातीं और अपनी अपनी खिड़कियों से झाँककर एक हाथ से घूँघट में आधा माथा दबाकर और दूसरे हाथ की उँगलियाँ अपनी अपनी ठोडियों के नीचे रखकर गालियों की बौछार शुरू कर देतीं “अरे कमबखतमारे… अरे सत्यानास जावे तुम्हारा… आए हाए देक्खो तो मरे कू… अरे क्या मारा कलजुग आ गिया है…? अरे तुम्हारे घर की लुगाइयों कू क्या हो गिया रे…? अरे भौत बड़े भगवान के भगत बने फिरो हो, क्या योई भगतई रे गई है तुम्हारी…? हैं…? अरे सरम ना आवे यूँ हमारे बच्चों का बाप बनते हुए…? सच्ची सारी सरम हया बेचके धर दी इस दरोग्ग्न के लौंडे ने तो… अरे पंडत जी एसई सौक हैगा बदन दबवाने का तो बिया क्यूँ ना कर लो हो…” पर शायद मन ही मन खुश होती थीं इस तरह की छेड़खानियों से… वो भी पिताजी जैसा ख़ूबसूरत लौंडा अगर करे तो किसे अच्छा नहीं लगेगा…? और शायद ये सब भी मनोरंजन का एक ज़रिया था उन घरघुसनी औरतों की रोज़मर्रा की उबाऊ दिनचर्या से थोड़ी सी राहत का, जिनके घरवाले रात को घर आते आते भी अपनी बहियों में उलझे रहते थे और दीया बाती बढ़ा दिये जाने पर ही इनके पास आते थे | और पिताजी भी कब रुकने वाले थे उन लुगाइयों की बातों से ? बल्कि उन्हें तो और शह मिलती थी इस सबसे | और ये सारी शैतानियाँ ब्याह के बाद और सरोज के पैदा होने के बाद तक भी ज़ारी रहीं | पर माँ के मरने के बाद तो पिताजी जैसे सब कुछ भूल गए थे – एक ठहराव सा आ गया था उनमें… पर पलँग पर पड़ी पड़ी सरोज सोच रही थी काश माँ ना मरती तो… और मन ही मन मुस्कुरा भी रही थी कि कितना मज़ा आता होगा पिताजी को ये सब करने में… और पिताजी की वो सुरमा डली बिल्लोरी आँखें शरारत के वक़्त कितनी ख़ूबसूरत लगती होंगी… काश मैं होती तब और पिताजी के उस रूप को देखती… सरोज को याद है हर रोज़ सुबह नहाने के बाद चाँदी की सलाई से आँखों में सुरमा डाला करते थे… और यह भी कि सुरमा डालने के बाद पिताजी की भूरी झील सी गहरी आँखें और भी गहरी और आकर्षक लगने लगती थीं और सरोज उन्हें एकटक निहारती रहती थी…

ख़ैर, तो होता यों था कि दादी सुनाती रहतीं और हँसती रहतीं | गोरी गोरी सुन्दर नैन नक्श वाली दादी जब हँसती थीं तो उनके गालों में गड्ढे पड़ जाया करते थे जो सरोज को बहुत अच्छे लगते थे | असल में तो सरोज को दादी किसी परी से कम नहीं लगती थीं – जो नाच सकती थीं, गा सकती थीं, बजा सकती थीं, मुहल्ले भर की खबर रख सकती थीं, और सबसे बड़ी बात ये कि सरोज को भाभी के साथ पढ़ने से बचा भी सकती थीं… भाभी घर का सारा काम निबटाकर सरोज की कापी किताबें लेकर आ बैठतीं और सरोज को भी हाथ पकड़ कर दादी के पास से खींच लातीं | भाभी पढ़ाना शुरू करतीं | कुछ देर तो सरोज मन मार कर लगी रहती, पर फिर ऊब जाती और कभी आँखें मलनी शुरू कर देती तो कभी कान खुजाना शुरू कर देती | कभी पढ़ते पढ़ते कोई गाना याद आ जाता और गुनगुनाना शुरू कर देती | कभी बिना वजह ही इधर उधर ताकना शुरू कर देती | गरज कि पढ़ने से किसी तरह जान छूटे | भाभी कुछ देर तो उसे बाँध कर रखतीं | वो आँख मलती तो भाभी उसके हाथ आन्ख्पर से हटाकर आँख में फूँक मार देतीं कि अब खुजली नहीं होगी – तुम पढ़ाई पर ध्यान दो – और फिर जहाँ से शुरू किया था वहीँ से दोबारा शुरू करतीं | कान खुजाती तो कान पर से हाथ हटाकर सरोज को गोद में लिटाकर हलके हाथ से कान मलतीं और फिर हलकी सी घुड़की देकर पढ़ाना शुरू कर देतीं | सरोज गाना गुनगुनाती तो हल्का सा डपट देतीं “लाली, गाना पढ़ने के बाद… अभी पढ़ाई… बाद में मैं खाना बनाऊँगी तो तुम दादी के साथ ख़ूब गीत गाना… चलो अभी बताओ क्या बताया था…?” अब सरोज ने कुछ ध्यान से सुना होता तो बताती भी | पढ़ाई छोड़ कुसुम, लक्ष्मी और न जाने किस किस की बात लेकर बहलाने बैठ जाती | भाभी कुछ देर सुनतीं, मुस्कुरातीं, पर फिर अपनी बात पर आ जातीं “लाली अभी जो बताया था उसमें से कुछ तो बताओ…” अब सरोज को भूख लग आती | भाभी उसे पाठ याद करने की हिदायत देकर उसके पढ़ाई में मन न लगने पर मन ही मन झुँझलाती हुई उठतीं – रसोई में जातीं – कुछ उसके खाने के लिये लेकर आतीं – सरोज चाव से खाती तब तक भाभी जेलर की तरह वहीँ जमी रहतीं | सरोज खा चुकती तो फिर भाभी शुरू हो जातीं “तो, भर गया पेट ? अब एक घंटा कुछ नहीं… चलो अब शुरू हो जाओ… कहाँ थे हम…” सरोज सोचती “क्या जेलर की तरह बैठी हैं सामने… हे भगवान कुछ तो करो…” पर भगवान कुछ नहीं करते | तब सरोज इधर उधर देखना शुरू कर देती | आखिर भाभी का सब्र जवाब दे जाता और वे उसे डाटना शुरू कर देतीं “कितनी बार कहा है कम से कम एक घंटा तो मन लगाकर पढ़ लिया करो, पर जूँ नहीं रेंगती कानों पर | अरे कैसे चलेगा ऐसे ? फेल हो जाओगी | आने दो आज पिताजी को… बताऊँगी सब कुछ…” भाभी की आवाज़ सुनकर दादी दौड़ी चली आतीं | दादी को देख सरोज आँखें मलती ज़ोर ज़ोर से रोने का नाटक शुरू कर देती | देखते ही दादी भाभी पर भड़क उठतीं “ये क्या संभल वाली ? ऐसे पढ़ाया जाता है क्या बच्चों को ? तुम्हें इसी तरह पढ़ाया होगा तुम्हारे घरवालों ने ? ठीक ही कहती थीं कावेरी…”

“तो फिर ठीक है, आप कावेरी बीवी जी के पास चली जाया कीजिए इसकी पढ़ाई के वक़्त और मेरी बुराइयाँ सुन सुन कर खुश हो जाया कीजिये | पर माता जी पढ़ाई के मामले में आप बीच में न ही बोलें तो अच्छा होगा…” तड़प कर भाभी बोलतीं “ये सब आपकी और बीवी जी की शह का ही नतीज़ा है | पढ़ने में मन ही नहीं लगता इसका | ऐसे कैसे चलेगा ? फेल हो जाएगी तो फिर ?”

“अरे हाँ हाँ बहुत देखे हैं फेल करने वाले | अरे कुछ अंधेरगर्दी है क्या जो जिसे चाहे फेल कर दिया ? अरे हमारे गंगा की बेटी है, देखना कितनी बड़ी बनेगी एक दिन | और फिर हम पढ़ाने को कब मना कर रहे हैं ? पर प्यार से पढ़ाओ ना | यों डाट फटकार क्यों करती हो ?”

“मैं कोई डाट फटकार नहीं कर रही माता जी | लाली तो पढ़ना चाहती ही नहीं…”

“तो कौन बच्चा पढ़ना चाहता है बताओ हमें… हैं…? अरे पढ़ाई से हर बच्चा ही भागता है | अपनी लाली भी भागती है तो कौन बड़ी बात हो गई ? प्यार से समझाओगी इसे तो क्या समझेगी नहीं ? पर तुम तो सीधा डाटना ही शुरू कर देती हो | ऐसे करते हैं क्या बच्चों के साथ ? अच्छा चलो अब थोड़ी देर तुम दोनों ही आराम कर लो | पढ़ाई बाद में होगी | चलो लाली हम दोनों छोटी जामुन वालों के घर होकर आते हैं तब तक तुम्हारी माँ शाम के खाने का इंतज़ाम कर लेगी…” और भाभी हक्की बक्की खड़ी देखती रहतीं | दादी सरोज का हाथ पकड़ कर वहाँ से ले जातीं | सरोज को यही तो चाहिये था | काश उस समय सरोज भाभी की बात मान लेती और कुछ कर लेती तो आज इस हाल में तो न होती… “हेमा… अरी सुनिये इधर…” सरोज ने एक ठण्डी आह भरी और हेमा को आवाज़ लगाई |

“क्या हुआ अम्मा…” कहती हुई दुपट्टे से हाथ पोंछती हेमा आ खड़ी हुई |

“अरी ज़रा पौट लगइए री… बड़ी ज़ोर से पिशाब आ रिया है… क्या मरा ये भी हर वक़्त का रोना हो गया…”

“तुम फ़िकर मत ना किया करो अम्मा, सब ठीक हो जावेगा | कल जब गई थी इनसे मिलने तो कह रहे थे कि ज़ल्दी ही पैरोल हो जावेगी | फिर तुम्हें मेरठ लेके जावेंगे | सब ठीक हो जाएगा | धनीराम आइये ज़रा…” पौट उठाकर धनीराम आवाज़ लगाई हेमा ने | धनीराम आ गया तो उसने कूल्हे से पकड़ कर सरोज को कुछ ऊँचा किया और पकड़े रहा | हेमा ने सरोज की चादर के नीचे पौट घुसा दिया | सरोज पिशाब कर चुकी तो इशारा किया | हेमा ने पौट हटा लिया और नाक पर दुपट्टे का ठुक्का लपेट कर पौट लेकर बाहर निकल गई साफ़ करने | धनीराम ने सरोज को वापस पहले वाली स्थिति में लिटाया और वो भी बाहर निकल गया | सरोज ने दरवाज़े से बाहर देखा – साँझ ढल आई थी | ढलते हुए सूरज की किरणें भी सरोज की परिस्थितियों की ही तरह बोझिल जान पड़ रही थीं – मानों दिन भर दुनिया भर को उजाला लुटाते लुटाते थक चुकी थीं और अब गहरी नींद में जाना चाहती थीं |

“लाली… देखो भई हम क्या लाए हैं लाली के लिये | अरे कहाँ हो भाई | अरे भई लाली की भाभी कहाँ चली गई ? माँ…” सरोज को लगा पिताजी आवाज़ लगा रहे थे |

“तुम भी न बाहर से ही आते हो शोर मचाते | ऐसा किया करो, बाज़ार से ही आवाज़ लगा दिया करो, हम सब तुम्हारे आने से पहले ही दरवाज़े पर खड़े मिलेंगे | ठीक ?” भाभी रसोई में से बाहर आईं कपड़े से हाथ पोंछती हुई | पीछे पीछे दादी और सरोज भी आकर खड़ी हो गई |

“अरे संभल वाली, इनके हाल तो हमेशा से यही रहे…” पिताजी को लाड़ से निहारती दादी बोलीं “क्या लाए हो दिखाओ तो सही | बड़ा शोर मचाते आ रहे थे…” लाड़ से झिड़कती हुई दादी बोलीं | भाभी माँ बेटे को देख मंद मंद मुस्कुरा रही थीं |

“क्या माँ तुम भी…” कुछ झेंपते हुए पिताजी बोले “अरे राधेलाल के यहाँ गया था | यो पकी हुई खीस भेजी है उसकी बीवी ने…” कहते हुए पिताजी ने खीस की डोलची भाभी को पकड़ा दी |

“खीस…?” सुनते ही सरोज के मुँह में पानी भर आया और फ़ौरन भाभी का पल्ला पकड़ उनके पीछे पीछे रसोई में चली गई | “क्यों अब क्यों आ रही हो ? दादी के पास ही जाओ न जैसे पढ़ते से उठकर गई थीं…” मीठी झिड़की देती भाभी बोलीं | पिताजी कपड़े बदलने और दादी उनका हाल चाल पूछने कमरे में चली गई थीं | “अच्छा भाभी आज खीस दे दो | कल से ऐसा नहीं होगा | कान पकड़ती हूँ…” कहते हुए अपने दोनों हाथों से दोनों कान पकड़ लिये | फिर बोली “कल से मन लगाकर पढ़ाई करूँगी, सच्ची…” फिर भाभी को आँख मारकर कान छोड़कर कटोरा उठा लाई | सरोज का नाटक देखकर एक बार तो भाभी की हँसी फूट पड़ी | धोती का पल्ला मुँह में दबा हँसी रोकने की कोशिश करती भाभी ने कटोरे में गरम गरम खीस डाल दी | सरोज ने खीस खानी शुरू की तब भाभी ने भी बोलना शुरू कर दिया “देखो लाली, अब ये बचपना छोड़ो | अगर पढ़ोगी लिखोगी नहीं तो कैसे काम चलेगा ? मैं तो चाहती हूँ तुम पढ़ लिख कर किसी लायक बन जाओ | तुम्हें पता है मैं पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी | पर शादी हो गई, और सब कुछ होने से रह गया | पर चाहती हूँ तुम्हारे साथ ऐसा न हो | अपनी पढ़ाई की हसरत तुम्हें पढ़ाकर पूरी काटना चाहती हूँ…” लम्बी साँस लेकर भाभी चुप हो गईं |

“तो तुम तो अभी भी पढ़ रही हो भाभी फ़िकर क्यों करती हो ? देखना, मेरा मन कहता है तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाएगी…” मगन भाव से खीस खाती सरोज ने जवाब दिया |

“नहीं पगली, अब नौकरी किसे करनी है | अब तो बस एक ही चिंता है – तुम किसी लायक बन जाओ बस | मेरी ज़िन्दगी का तो अब बस यही मकसद रह गया है – तुम किसी लायक बन जाओ, तुम्हारे पिताजी का काम ठीक ठाक चलता रहे, तुम्हारी दादी ठीक रहे – और क्या चाहिये अब | मेरी ज़िंदगी तो अब तुम लोगों की ही है बेटा…” शून्य में ताकती भाभी बोल रही थीं | ना जाने ऐसा क्या था भाभी की आवाज़ में कि सरोज खीस खाना भूलकर एकटक भाभी की तरफ़ देखे जा रही थी और मन ही मन सोच रही थी “भाभी इतनी पढ़ी लिखी हैं फिर भी हम सबका इतना ध्यान रखती हैं | क्यों नहीं लगता मेरा मन पढ़ाई में ? भाभी ठीक ही तो कहती हैं | पढ़ाई लिखाई मेरे काम ही तो आएगी | ठीक है, कल से कोई शैतानी नहीं, बस पढ़ाई…” मन ही मन सरोज संकल्प कर रही थी |

“हाँ भई… तो लगाओ खाना लगाओ…” पिताजी ने रसोई के दरवाज़े पर आकर कहा तो दोनों माँ बेटी की तन्द्रा भंग हुई “कैसी लगी खीस ?” पिताजी और दादी रसोई में आ चुके थे | पिताजी एक तप्पड़ खींच कर वहीँ सरोज के पास बैठ गए थे | | हूँ… बहुत अच्छी है, पर भाभी जैसी नहीं…” मुँह में खीस भरे भाभी की तरफ़ आँख मारकर सरोज ने जवाब दिया | अब तक दादी भी अपनी चौकी सरका कर वहीँ सबके पास बैठ गई थीं | भाभी ने थालियाँ और कटोरियाँ उठाकर उनमें खाना परोस कर पिताजी और दादी को दिया | अब तक सरोज भी खीस खत्म कर चुकी थी और पिताजी के थाल में ही खाने के लिये बैठ गई थी | अभी तक भी उसे पिताजी के ही थल में खाने में मज़ा आता था |

“हूँ… भई वाह… केला तो बड़ा अच्छा बना है…” मुँह में गस्सा रखते पिताजी बोले | फिर अचानक सरोज की तरफ़ देखकर बोले “अरे आज लाली कैसे गुमसुम खाना खा रही है ? क्या हुआ तुम्हारी उस चाण्डाल चौकड़ी का ? क्या क्या ऊधम मचाया आज ?” पिताजी खाते जा रहे थे और सरोज से बातें भी करते जा रहे थे |

“अम्मा खाना खा लो…” हेमा दरवाज़े पर खाने का थाल लिये खड़ी थी “ओ धनीराम, आइये इधर… आ खाना खिला अम्मा को…” कहते हुए हेमा ने धनीराम को आवाज़ लगाई | धनीराम ने आकर सरोज को पीछे से सहारा देकर थोड़ा सा अधलेटा सा बैठाया और हेमा ने एक एक टुकड़ा खिलाना शुरू किया |

“नीना आ गई…?” खाते खाते सरोज ने छोटी बहू के बारे में पूछा |

“हाँ आ गई… नहाने गई है…”

“और ये मिनी विनी ना दिखाई दे रए… कहाँ गए…?”

मिनी पीसीओ पे बैठी है… भरत वरत खेल रहे हैं… तुम खाना खा लो तो इन सबको भी खिला दूँगी…” सास के मुँह में गस्सा देते हुए हेमा ने जवाब दिया |

“अरे पहले बच्चों को खिला दिया कर…” हलके से कराहते हुए सरोज बोली “मेरा क्या है, सारा दिन पड़ी तो रहूँ हूँ अपाहज बनी… और काम ही क्या है मुझे…? खा लूँगी कभी भी… पहले बच्चों को दिया कर…”

“ठीक है दे दिया करूँगी… पर अभी तो तुम खाओ…” हेमा सरोज को खिला रही थी और सरोज खोई हुई थी यादों में | पलँग पर सारा दिन पड़े पड़े सरोज को और काम ही क्या था ? बच्चे और बहुएँ चले जाते थे अपने अपने काम पर और स्कूल | रह जाती थी सरोज अकेली… अपाहज… बिस्तर में पड़ी… ऐसे में पुरानी यादें और भी तड़पाती थीं…

जैसे आजकल बहू खिलाती है इसी तरह भाभी खिलाया करती थीं प्यार से | बहू के खिलाने में फ़र्ज़ की भावना है, पर भाभी के हाथ से खाने में तो उनके दिल का सारा प्यार ही छलक पड़ता था | वो तो वही पागल थी जो उनकी बातों पर तब ध्यान नहीं दिया | कितना तूफ़ान खड़ा हो गया था उस दिन जब भाभी सरोज को पढ़ाने बैठी थीं और पहले दिन मन लगाकर पढ़ने का वादा करके भी सरोज का मन नहीं लग रहा था पढ़ने में | आखिर भाभी को गुस्सा आ गया “कल तुमने वादा किया था फिर अब क्या हुआ ? देखो मान जाओ वरना क्या फ़ायदा एक दिन परेशान होकर मुझे तुम पर हाथ उठाना पड़ जाए…” बुआ उस दिन घर आई हुई थीं | भाभी की डाट की आवाज़ बाहर गई तो वहीँ से चीखती चिल्लाती बुआ भीतर भागी आईं जैसे इसी वक़्त के इंतज़ार में थीं “अरे अरे देक्खो तो क्या जुलम ढा रई है संभल वाली लल्ली पे… हाथ उठावेगी लल्ली पे…? आने दे गंगा कू, सारी बात बताऊँगी आज | वो तो भला हो मैं आ गई इंगे वरना यो तो छेत गेरती लल्ली कू | अरी लुच्ची राण्ड, अरे मरी कीड़े पड़ें तेरे… ठीकरे फूटें तुझपे… अरी ऐसे पढ़ावें हैं क्या बच्चों कू…? हाय हाय देक्खो तो क्या शकल बना दी है लल्ली की…? आ री मेरे पास आ…” कहते हुए बुआ सरोज को अपनी तरफ़ खींचने लगीं |

“बीवी जी, बार बार आपसे और माता जी से कहती हूँ कि आप और चाहे जो कर लिया करो मेरे साथ, पर पढ़ाते वक़्त बीच में मत बोला करो | हाथ जोड़ती हूँ तुम दोनों के आगे आगे…” सरोज को बुआ से छुड़ाते हुए भाभी थोड़ी तल्ख़ी से बोलीं | सारा दिन सरोज को लाड़ लड़ाओ, सर पे चढ़ाओ, मुझे क्या ? पर पढ़ाते वक़्त मैं किसी की बात बर्दाश्त नहीं करूँगी… आप बाहर माता जी के पास जाकर बैठो…”

अब तक दादी भी आ चुकी थीं | उन्हें देखते ही बुआ ने त्रिया चरित्र दिखाना शुरू कर दिया | धोती का ठुक्का मुँह में दबाकर रोने का नाटक करती बोलीं “हाँ हाँ अब योई कसर बाकी रह गई ही | अरे मेरे भाई के घर से ही मुझे बाहर निकालना चाहो हो | मरी ना है अभी मेरी माँ | ज़िंदा है वो अभी | निकाल के दिखाओ मुझे घर से…”

सरोज हक्की बक्की खड़ी थी बुआ का ये रूप देखकर | और भाभी – वो भी हक्की बक्की थीं और रिरियाती हुई बुआ से बोल रही थीं “बीवी जी मैंने ऐसा कब कहा ? मैं तो बस आपसे यही कह रही थी कि जितनी देर सरोज को पढ़ाती हूँ उतनी देर आप बाहर माता जी के पास जाकर बैठ जाओ | ऐसा क्या कह दिया मैंने जो आप इस तरह कर रही हो…”

“हाँ हाँ बोल दे संभल वाली अक मैं झूठ बोल रई हूँ | हे भगवान अब यो दिन भी देखना लिखा हा | या तो लल्ली पे जुलम ढावेगी या फेर मुझे झूठा बतावेगी…” और हाथों में मुँह छिपाए एक उँगली एक आँख से हटाकर चुपचाप दादी का रिएक्शन देखने की भी कोशिश कर रही थीं | दादी को लगा ज़रूर भाभी ने कुछ उल्टा सीधा बोल दिया होगा, तभी तो बुआ ऐसे कर रही हैं | लिहाज़ा बुआ को प्यार करती हुई बोलीं “ना ना कावेरी | हम देखते हैं अभी | क्यों री दुलहिन, हम तो समझते थे कि तुम सारे घर में समझदार हो, तहज़ीबयाफ़्ता हो | क्या यही समझदारी है तुम्हारी ? क्या यही तहज़ीब है तुम्हारी ? छोटी ननद घर आई है और तुम उसे घर से निकल जाने के लिये बोल रही हो ? मत भूलो अभी हम ज़िंदा हैं…”

“माता जी मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा | ना मानो तो आप सरोज से पूछ लो…” लगभग रुंआसी हो चुकी भाभी ने जवाब दिया “क्यों सरोज क्या कहा था मैंने बुआ से बताओ तो दादी को…”

अब तक सरोज को अहसास हो चुका था कि दादी और भाभी को लड़वाने के लिये बुआ भाभी पर झूठा इलज़ाम लगा रही हैं लिहाज़ा वो बोली “दादी भाभी तो बस मुझे पढ़ा रही थीं और बस यही कहा था कि…”

“टू चुप कर लल्ली…” सरोज की बात पूरी होने से पहले ही बुआ अपना रोना बन्द करके सरोज को डाटती बोलीं “बड़ों के बीच में नईं बोलते | और संभल वाली क्यूँ लल्ली कू बीच में डाल्लो हो ? और कुछ उसे सिखाओ ना सिखाओ पर यो लड़ाई झगड़ा और सिखा दो…”

पर बुआ भाभी ने कहा क्या था आपसे ?” बुआ की बातों पर खीझती सरोज बोली “यही न कि जब तक सरोज को पढ़ाती हूँ तब तक आप बाहर दादी के पास जाकर बैठो ? आपको घर से बाहर निकलने की बात कब कही थी भाभी ने ? वो तो आपने ही खुद कहना शुरू कर दिया…?

“देखा माँ, लल्ली कू भी इत्ता डरा के रक्खा हुआ है संभल वाली ने अक सच बोलते हुए भी डरे है…” लगता था बुआ हार मानने वाली नहीं थीं |

“बुआ क्यों ऐसा करती हो…?” सरोज ने कुछ इस तरह कहा कि दादी को भी दाल में कुछ काला नज़र आने लगा | पर शायद अपनी इकलौती बेटी को भी नाराज़ नहीं करना चाहती थीं | शायद मन में कहीं डर समाया हुआ था कि दूसरे घरों की तरह अगर बाप बेटी दोनों संभल वाली की तरफ़ हो गए और उन्हें भूल गए तो बेटी का ही तो सहारा होगा उन्हें | इसलिए बात को समाप्त करने के इरादे से बोलीं “कोई बात नहीं कावेरी, आज के बाद दुलहिन ऐसा कुछ नहीं करेगी | तुम जाओ हाथ मुँह साफ़ करके आ जाओ | गंगा आता ही होगा…” और बुआ अपनी जीत समझ ठुनकती हुई चली गईं नल पर और भाभी दादी के व्यवहार से दुखी होती सरोज की किताब वहीँ पलँग पर पटक चुपचाप रसोई में जा घुसीं | दादी कमरे में पलँग पर अपना सर पकड़ कर बैठ गईं | नहीं समझ पा रही थीं क्या इलाज़ करें रोज़ रोज़ के इन झगड़ों का | वे अच्छी तरह जानती थीं कि संभलवाली लायक है और सरोज को भी अपने जैसी ही लायक बनाना चाहती है | पर बुढ़ापे में अकेली पड़ जाने का भी डर था – अगर बेटा पूरी तरह से बहू की तरफ़ हो गया तो ? जानती थीं कि उनकी बेटी उनके बेटे बहू में फूट डलवाना चाहती है और सरोज और संभलवाली में सौतेलापन देखना चाहती है – ऐसा करने से शायद उसके भीतर बैठी “ननदरूपा” औरत को तसल्ली मिलती थी |

बुआ हाथ मुँह साफ़ करके आ चुकी थीं और भाई के आने का इंतज़ार कर रही थीं | शायद भाई से भाभी की जी भरके शिक़ायत करना चाहती थीं | पर जब दादी के पास आकर बैठीं तो दादी उन्हें समझाती बोलीं “देखो कावेरी जो हुआ उसे भूल जाओ | हम किसी की गलती नहीं निकालना चाहते | पर हम गंगा के घर को भी उजड़ता हुआ नहीं देखना चाहते | तो गंगा के आने पर शान्त ही रहना | हम हाथ जोड़ते हैं तुम्हारे आगे | मत भूलो कि आज जहाँ कहीं भी तुम हो गंगा की बदौलत हो | कुछ तो अहसान मानो भाई का…”

“तो माँ मैं कब इन्कार करूँ हूँ गंगा के किये धरे से ? मैं तो जान्नूँ हूँ अक गंगा ने ही हम दोनों भाई बहनों की परवरिश की | पर यो संभलवाल्ली जो सलूक करे है लल्ली के साथ वो ना देक्खा जा है मुझसे बस… और देख तो कितना डरा धमका के रक्खा है लल्ली कू अक साफ़ मुकर गई…”

“ठीक है इस बारे में भी बात कर लेंगे – पर अभी नहीं | और जब तुम कह रही हो कि सरोज संभलवाली के बस में है तो कुछ वक़्त तो दो उसे कि वो तुम्हारी बात कर सके…”

“ठीक है माँ, तेरी खात्तर मूँ सी लूँगी – पर आगे से कुछ ऐसा वैसा हुआ तो मैं चुप ना बैट्ठूँगी हाँ…” मुँह अजीब सा बनाती बुआ बोलीं |

सरोज सब कुछ देख सुन रही थी पर बुआ या दादी से कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पा रही थी | जानती थी कि अगर उसने सच बात बताने के लिये मुँह खोला तो बुआ फिर वही बात दोहराएँगी कि भाभी ने उसे डरा धमका रखा है | थोड़ी देर भाभी के पास जाने का भी साहस नहीं जुटा सकी थी | मन में अपराध बोध था कि उसकी वजह से भाभी के साथ इतनी बदसलूकी की बुआ ने | पर वो ये भी जानती थी कि भाभी निश्चित रूप से रसोई में बैठी रो रही होंगी और अगर उन्हें चुप नहीं कराया गया तो उन्हें दौरा भी पड़ सकता है | सो बुआ और दादी को वहीँ बैठा छोड़ डरती डरती रसोई में जा पहुँची | वहाँ जाकर देखा तो उसका ख़याल सही निकला | भाभी सच मैं चूल्हे के सामने ज़मीन पर घुटनों पर मुँह रखे बैठी थीं और ज़मीन पर कोयले से आड़ी तिरछी लकीरें बना रही थीं साथ ही धार धार आँसुओं से रोए चली जा रही थीं | “मुझे माफ़ नहीं करोगी भाभी…?” आँखों में आँसू भरे सरोज ने भाभी के कन्धे पर हाथ रखा तो भाभी ने आँसू पोंछते हुए उसकी तरफ़ देखा और धीरे से पूछा “कुछ चाहिए ?”

“नहीं भाभी कुछ नहीं चाहिए…” पास बैठते हुए सरोज ने जवाब दिया “बस तुम रोओ मत | मैं जानती हूँ सब कुछ मेरी वजह से ही हो रहा है | मैं हर दिन बहुत सताती हूँ न तुम्हें ? सब ठीक ही तो कहते हैं कि मैं अभागन हूँ… करमजली हूँ… तभी तो सब कुछ उल्टा पुल्टा होता रहता है |” सुबकती हुई सरोज बोली |

“मैंने ऐसा क्या कह दिया था बीवी जी से जो उन्होंने इस तरह घर सर पर उठा लिया ? मैंने कब कहा था उनसे कि घर से निकल जाएँ ?” भाभी रो रही थीं |

“तुमने ऐसा कुछ नहीं कहा भाभी | पर तुम तो जानती ही हो बुआ की आदत – बात का बतंगड़ बनाने में उन्हें मज़ा आता है | सब ठीक हो जाएगा भाभी | तुम कुछ मत सोचो…” सरोज बोल रही थी और भाभी रोना भूलकर एकटक उसकी तरफ़ देखे जा रही थीं मानों सोच रही हों कि इत्ती सी उम्र में इतनी बड़ी बड़ी बातें बनाने लगी…

सरोज ने पीछे घूमकर देखा तो दादी और बुआ दरवाज़े से सटी खड़ी सब कुछ सुनने की कोशिश कर रही थीं | तभी दरवाज़े की कुण्डी खड़की | “पिताजी…” कहती हुई सरोज दरवाज़े की तरफ़ भागी तो दादी बुआ एकदम वहाँ से हटकर कमरे में पलँग के पास जा खड़ी हुईं | सरोज ने दरवाज़े की कुण्डी खोली और “पिताजी…” बोलती पिताजी से कुछ इस तरह लिपट गई मानों सदियों की बिछड़ी हुई हो | “अच्छा अच्छा अब भीतर तो आने दो…” सरोज के सर पर हाथ फिराते पिताजी बोले और उसके हाथ में साथ लाया थैला पकड़ा दिया | सरोज थैला लेकर रसोई में भाग गई | पिताजी भीतर कमरे में पहुँचे तो बुआ को देखकर बोले “अच्छा कावेरी आई है | आज क्या नई बात सुनानी है भई…” पिताजी कुछ इस तरह बोले जैसे समझ गए हों कि आज भी बुआ कुछ तीया पाँचा करने के चक्कर में हैं | वैसे पिताजी और दादी दोनों ही बुआ की आदत से अच्छी तरह वाकिफ़ थे इसलिए कम से कम पिताजी तो उनकी बातों पर अधिक ध्यान नहीं देते थे | हाँ दादी ज़रा कच्चे कानों की थीं इसलिये उन पर ज़ोर चल जाता था बुआ का भी और चाची का भी | पिताजी ने कई बार समझाया भी था दादी को, पर दादी कुछ दिन ठीक रहकर फिर बुआ की बातों में आना शुरू कर देती थीं |

पिताजी खूँटी पर छतरी टांग कर बाहर नलके पर आ गए थे हाथ मुँह धोने | उन दिनों नजीबाबाद में टोंटी वाले नल हर घर में नहीं थे – कुछ पैसे वाले घरों में ही थे | और सरोज का घर तो था भी किराए का | हैण्डपंप भी हर किसी के बस की बात नहीं थी – क्योंकि वहाँ की ज़मीन में पत्थर बहुत थे | काफ़ी नीचे तक खुदाई करने पर भी पत्थर ही निकलते रहते थे | कई रोज़ की खुदाई के बाद काफ़ी नीचे जाकर पानी निकलता था | इस काम में मज़दूरी और समय दोनों ही बहुत लगते थे | और वो पानी भी खारा होता था जिसे नहाने धोने के काम ही लिया जा सकता था | पीने के लिये तो अधिकतर घरों में कुंए थे | जिन घरों में नहीं थे वे बाहर के कुँओं से पानी लाते थे | उनमें भी अगर सुबह सुबह चार बजे तक पानी भर लिया तो मिल गया, वरना तो लोग पानी खींच कर ले जाते थे और बाद में आने वालों के लिये नीचे की गाद ही नसीब होती थी | जिसे घरों में पकाकर फिर छानकर पिने के पानी का इंतज़ाम होता था | ऐसे मीठे पानी के कुंए थे भी बस तीन ही – एक यहाँ स्कूल के सामने, दूसरा छोटे जैन मन्दिर के बाहर, और तीसरा रण्डियों के मुहल्ले में | कुछेक घरों में और थे पर वहाँ बाहर के लोग नहीं जाते थे | बहरहाल, जीराज मुँह अँधेरे ही पीने का पानी कुंए से भरकर रख देता था और बाक़ी कामों के लिये हैण्डपंप था ही – खरे पानी का | जिसके चरों तरफ़ चबूतरी बनी हुई थी | पिताजी सुबह उसी पर बैठकर नहाते थे | भाभी, दादी और सरोज के लिये जीराज बाल्टियों में भरकर पानी रसोई में रख आता था और ये तीनों वहीँ नहाया करती थीं | तो, पिताजी नलके पर चले गए हाथ मुँह धोने और भाभी वहीँ उनके लिये ग्लास में पानी लेकर अ गईं | हर रोज़ का यही नियम था – दरवाज़े पर पिताजी की खड़काई कुण्डी की आवाज़ सुनते ही सरोज भाग कर दरवाज़ा खोलती थी | पिताजी बाहर से लाया थैला सरोज को पकड़ाते थे जिसमें बाज़ार से लाई कुछ सब्ज़ियाँ और फल वगैरा होते थे | फिर छाता कमरे की खूँटी पर टांग कर नल पर जाकर हाथ मुँह धोते थे | भाभी उन्हें वहीँ पानी देती थीं | पानी पीकर फिर सारे दिन की बातें होती थीं पिताजी और सरोज के बीच | इस बीच भाभी का खाना तैयार हो जाया करता था | फिर सब रसोई में बैठकर खाना खाते थे | बाहर से कोई आया होता था तो पिताजी उन लोगों के साथ बैठक में खाना खाते थे और जीराज रसोई और बैठक के बीच खाना खिलने के लिये दौड़ लगाता रहता था |

आज भी भाभी पिताजी के लिये पानी का ग्लास लेकर आईं | तभी बुआ पिताजी के पास आ खड़ी हुईं | पिताजी ने भाभी की तरफ़ देखा और उनकी रो रोकर सूज चुकी आँखों को देखकर उनका माथा ठनका कि आज कावेरी फिर कुछ ज़हर घोलना चाहती है | लिहाज़ा बुआ को टालते हुए सरोज को आवाज़ लगाई “अरे लाली आज दिन भर के किस्से नहीं सुनाने क्या…” और सरोज रसोई से भाग कर बाहर आई |

“अरे गंगा लल्ली और उसकी माँ से तो रोज़ ही बतियावे है | कदी कदी अपनी बहन से भी बात कर लिया कर…” उलाहना सा देती बुआ बोलीं |

“देख भई लल्ली, अगर किसी की शिक़ायत करनी है तो मैं थका हुआ हूँ | और हाँ, वैसे तेरा घर है ये, जब जी चाहे आ जब जी चाहे जा…”

“अरे भाई, भौजाई के आने के बाद क्या हक़ बहन का ?” ठण्डी साँस लेती बुआ अपनी बात पूरी करतीं कि दादी ने बीच में ही टोक दिया “कावेरी, अभी जीराज ने बताया कि हरिया के बेटा आया था | पुजारी जी ने घर बुलाया है…”

“मैं छोड़के आऊँ ? चलेगी लाली ?” पिताजी ने पूछा और हाथ मुँह धोकर चप्पल पहन कर बुआ और सरोज के साथ बाहर निकल गए | भाभी ने पीछे से आवाज़ लगाई “बीवी जी, खाना तो खाती जातीं…”

“आज जी ना है, फिर कभी…” बुआ ने जवाब दिया और जल्दी जल्दी घर से बाहर निकल गईं |

ऐसा आज पहली बार नहीं हुआ था | जबसे दादी आई थीं तब से अक्सर ही ऐसा होता था | बुआ अक्सर ही आती थीं और किसी न किसी बात पे भाभी से लड़ाई करके और दादी के कान भरकर ही वापस जाती थीं | पिताजी थक गए थे इन रोज़ रोज़ की बातों से | तभी एक दिन घर में महाभारत हो गया…

हर साल वसन्त पंचमी पर नगर के साहित्यिक और सांस्कृतिक वर्ग मिलकर नगर में सरस्वती पूजन और निराला जयन्ती का आयोजन करते थे | सरस्वती पूजा अक्सर “गुरु जी” के ही घर पर होती थी | बाद में सारा दिन सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रमों की धूम रहती थी | स्कूल में दिन में कवि गोष्ठी होती थी जिसमें भाग लेने के लिये शहर से बाहर के भी कविगण आते थे | रात को संगीत गोष्ठी होती थी | जो या तो “गुरु जी” यानि सरोज के घर या फिर स्कूल के ही हाल में होती थी | कभी कभी दो रोज़ पहले से कार्यक्रम आरम्भ हो जाते थे | दो दो दिन साहित्य संगोष्ठियों और बच्चों की प्रतियोगिताओं का आयोजन चलता रहता था | अन्तिम दिन यानी वसंत पंचमी के दिन बच्चों को पुरूस्कार देने के साथ ही कार्यक्रमों का समापन होता था | इस दिन सभी छोटे बड़े बसंती कपड़े पहनकर आया करते थे | घर घर में तीन चार दिन पहले से कपड़े रँगने शुरू कर दिये जाते थे | प्रकृति के साथ साथ मानों जन मानस भी बसंती रंग में रंग जाना चाहता था | ऐसा उमंग-उल्लास भरा वातावरण होता था कि पत्थरदिल इन्सान भी बौराया सा डोलने लग जाए |

सरोज के घर में इस दिन काफ़ी रौनक रहती थी | सुबह सरस्वती पूजा में शहर के काफ़ी लोग आते थे इसलिये पहले दिन ही बैठक की साफ़ सफ़ाई करवाके क़ालीन और जाजम बिछा दी जाती थीं | चारों तरफ़ मसनदें लगवा दी जाया करती थीं | घर को पीले फूलों से सजाया जाता था | आँगन में पूजा के लिये वेदी बनाई जाती थी | पूजा का सारा सामान इकठ्ठा किया जाता था | और इस सारे कार्य में पिताजी को बस दिशा निर्देश देना होता था – बाक़ी का सारा काम तो जीराज के साथ मिलकर पिताजी के शिष्य भाग भाग कर बड़े उत्साह से किया करते थे | भाभी भी पहले दिन से ही प्रसाद की तैयारी में लग जाया करती थीं | चावल बीन चुनकर साफ़ करती थीं | बादाम भिगाकर और छीलकर उनका लच्छा काटती थीं | दूसरे मेवे भी इसी तरह तैयार करती थीं | सुबह सुबह चावल चढ़ा दिया करती थीं | डेढ़ दो सौ आदमियों के लिये केसर वाले मीठे पीले चावलों का प्रसाद बनाया जाता था | हर किसी को भाभी के हाथ के ये चावल बहुत भाते थे | वाकई बेहद स्वाद होते थे | आज भी सरोज याद करती है तो मुँह में पानी आने लगता है | इतने सारे चावलों को बनाने के लिये हरिया ताऊ जी के यहाँ से दुकान के भगौने और बड़ी कढ़ाही मँगाई जाती थी | भाभी चावल तैयार करके सब्ज़ी पूरी भी बना लेती थीं | बुआ और रस्तोगी डाक्टर की बेटी कृष्णा भाभी का हाथ बँटाने आ जाया करती थीं | उधर बाहर के लोग आने शुरू हो जाते थे | पिताजी सबके साथ सरस्वती पूजा करते थे | गा गाकर मंत्रोच्चार करते थे तो जैसे सारा वातावरण गुंजायमान हो जाता था | पूजा समाप्त हो जाने के बाद पत्तलें लगा दी जाती थीं और सबको चावल के प्रसाद के साथ साथ सब्ज़ी पूरी भी खाने के लिये दी जाया करती थीं | दोपहर एक बजे तक ये आयोजन पूर्ण हो जाता था | उसके बाद स्कूल जाने का समय हो जाया करता था | वहाँ कवि गोष्ठी का आयोजन जो होता था | शाम तक वही सब चलता था | रात को संगीत गोष्ठी होती थी जो सारी रात चला करती थी | भाभी बुआ और कृष्णा के साथ रात भर चूल्हे पर चाय चढ़ाकर रखती थीं | एक हफ्ते पहले ही लड्डू मठरी बना कर रख दिया करती थीं जो आज की रात चाय के साथ मेहमानों को दिये जाते थे | शहर के सभी ख़ासो आम वहाँ आते थे | सुबह छः बजे तक गोष्ठी संपन्न होती थी और सब अपने अपने घरों को लौट जाते थे आज के दिन भर के कार्यक्रमों की खुमारी आँखों में लिये और अगले दिन की अच्छी शुरुआत करने | सरोज इस दिन वसंती लहँगा या सलवार कुरता पहने सजी धजी सहेलियों के साथ मस्ती मारती घूमती थी | आज वो खुद को किसी राजकुमारी से कम न समझती थी | आखिर को सारे कार्यक्रमों के कर्ता धर्ता उसके पिताजी और भाभी जो होते थे |

इस बार भी कुछ बड़ा कार्यक्रम ही आयोजित हुआ था | तीन दिन तक प्रतियोगिताएँ चली थीं – वाद विवाद प्रतियोगिता, काव्यपाठ प्रतियोगिता, लेखन प्रतियोगिता वगैरा वगैरा | और इन सबके आयोजन में पिताजी का पूरा साथ दिया था भाभी ने | पिताजी ने बुआ को घर बुला लिया था घर सँभालने के लिये तीन दिन | दादी भी थीं ही | सरोज भाभी की ही पूँछ बनी घूमती रही थी | बस यही बात बुआ के भीतर बैठी नागिन को रास नहीं आ रही थी | बसंत का काम तो राज़ी खुशी हो गया | बुआ को पिताजी ने और एक दो दिन के लिये रोक लिया | उन एक दो दिनों में भाभी ने पिछले तीन दिनों की सारी कोर कसर पूरी कर दी थी | मन लगाकर बुआ की सेवा की थी | बुआ भी भाभी के हाथ के बनाए पकवान खाकर तारीफ़ें करती नहीं अघा रही थीं | ये सब देखकर न जाने क्यों सरोज को लग रहा था कि ज़रूर कुछ न कुछ अशुभ घटने वाला है | क्योंकि बुआ बिना किसी कारण तो तारीफ़ करती नहीं किसी की | और उसकी ये आशंका सही निकली |

बुआ चलने लगीं तो भाभी ने नई ज़री की साड़ी बुआ को भेंट दी | फूफा जी और हरिओम के लिये भी कपड़े दिये | सारा सामान लेकर बुआ ने “सौभाग्यवती रह, दूधों नहाए पूतों फले…” के आशीर्वचनों से भाभी को नहलाया, पर साथ ही अपनी बोली बोलना नहीं भूलीं “मेरी मान संभलवाल्ली, तेरे भले की ही कहूँ हूँ | देख कभी कभी तुझे कुछ बुरा भला कह बैठूँ हूँ तो उसका बुरा ना माना कर | क्या करूँ मरी मेरी जीभ है ही काली | बार बार सोच्चूँ हूँ अक ऐसा वैसा कुछ ना करूँ – फिर ना जाने क्यों मेरी मति मारी जा है | मेरी बात्तों कू दिल से मत ना लगाया कर | मैं तो बस योई चाहूँ हूँ अक इस घर के भाग खुल जावें…”

“इस घर के भाग तो खुले हुए ही हैं बीवी जी | आपके भाई का काम ठीक चल रहा है | माता जी भी हमारे साथ हैं तो इनकी तरफ़ से भी बेफ़िक्री है | सरोज भी कुछ कुछ मन लगाने लगी है पढ़ने में | आठवीं में आ ही गई है | अब बस आपका आशीर्वाद रहा तो सब ठीक ही रहेगा…” कार्यक्रमों से मिली सफलता से भाभी खुश थीं और उनकी ये खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी |

“तू तो समझना ही ना चावे है | देख मेरा वो मतलब नहीं हा | मैं तो यो कहना चाहूँ हूँ अक तेरे कोई लड़का बाला हो जावे तो पितरों कू मुक्ति मिल जावेगी…”

“अब ये तो बीवी जी अपने हाथ में थोड़े ही है | भाग्य में होता तो विनोद ही क्यों जाता…” दुखी स्वर में भाभी ने जवाब दिया |

“हे… भाग की बात करे है…” कलपती हुई बुआ बोलीं “तू रेवेगी निरी बेवकूफ़ की बेवकूफ़ ही | पढ़ाई लिखाई की समझ तुझे है, पर दुनियादारी की ना है | अरी विनोद भाग की खात्तर ना गया | वो गया इस अभाग्ग्न सरोज की खात्तर जिसे तू हर बखत अपने सीने से लगाओ फिरे जा है…”

“बीवी जी…” बुआ की बात समझती हुई भाभी का स्वर सख्त हो चला था “देखो आज आखरी बार कह रही हूँ सरोज के बारे में फिर कभी ऐसी बात मत बोलना | अब अगर विनोद नहीं रहा तो उस बेचारी का क्या कसूर ? आपको पता है बच्चे के दिल पर कितना बुरा असर पड़ता है इस तरह की बातों का ? हीन भावना भर जाती है बच्चे के दिल में…?”

“हमारा क्या भाई, हमारा फरज तो है तुझे समझाना | भाई के घर की बरबादी ना देक्खी जा है हमसे इसी खात्तर कह दें हैं हम भी कुछ | वरना हमें क्या… डूब मारो चाहे कुंए में…”

“मैं रसोई में जा रही हूँ बीवी जी, काम है मुझे…” बुआ की बात टालने की गरज़ से भाभी ने कहा तो बुआ जैसे शूर्पणखा बन बैठीं और चीख़ चीख़ कर बोलना शुरूकर दिया “अरी हमें क्या, हम हैं ही कौन इस घर के ? पराए हो गए हम तो भाइयों की बीवियाँ आने के बाद से…” और अ जाने क्या क्या बुआ बोले चली जा रही थीं | फूफा जी बुआ को लिवा ले जाने आए हुए थे | शोर सुनकर बैठक में से फूफा जी, दादी और पिताजी के साथ सरोज भी दौड़ी दौड़ी भीतर के कमरे में आ गई थी | सबने देखा कि भाभी हक्की बक्की खड़ी थीं | सरोज और पिताजी समझ गए थे कि आज फिर बुआ कुछ ऐसा वैसा करने वाली थीं | सरोज तो जैसे भाभी का रक्षा कवच बनकर उनके पास चिपक कर खड़ी हो गई थी | पिताजी ने बुआ को ठण्डा करते हुए कहा “शान्त हो जा लल्ली, क्या बात है मुझे बता | देख ज़रा ज़रा सी बात का बतंगड़ नहीं बनाया करते | शान्त होके बता क्या बात है…”

“अजी पंडत जी आप हटो | इसके रात दिन के ड्रामे मैं अच्छी तरह जानूँ हूँ | इतने बरसों से झेल रहा हूँ इसे | आप हटो, मैं देखता हूँ…” और आगे बढ़कर ज़ोर से बुआ का हाथ मरोड़ते हुए फूफा जी बोले “बोल क्या नाटक है ? चल घर अभी | सीधी सीधी चलती है घर या लगाऊँ एक ?” और जबरदस्ती बुआ को अपने साथ लिवा ले गए | पिताजी और दादी ने रोकना भी चाहा पर वे रुके नहीं |

बुआ तो चली गईं पर दादी को बुआ का इस तरह क्लेश में जाना बहुत अखरा | चढ़ बैठीं राशन पानी लेकर भाभी पर “सब संभल वाली का ही किया धारा है | न जाने क्या कह दिया उस बेचारी को कि ऐसे क्लेश में गई है…” भाभी अपनी सफ़ाई में कुछ बोलन चाहतीं कि दादी उन्हें चुप कराके कुछ न कुछ उल्टा सीधा बोलना शुरू कर देती थीं | ख़ूब रोना धोना हुआ | पिताजी भी दादी को तो कुछ कह नहीं सकते थे – सारा गुस्सा भाभी पर ही उतरा – लात घूसों की वो बौछारें हुईं कि कई रोज़ तक भाभी बिस्तर से न उठ सकीं | वो तो सरोज भाभी के ऊपर गिर पड़ी थी उन्हें बचाने के लिये वरना तो शायद पिताजी उनकी जान ही ले लेते | पिताजी की आँखों में उस दिन खून उतरा हुआ था | उनका वो रूप देखकर दादी चुप हो गई थीं और अपने कमरे में जा बैठी थीं | तब बाप बेटी को होश आया था कि भाभी बेहोश पड़ी थीं | हमेशा की तरह सारा बदन अकड़ा हुआ था उनका और मुँह से झाग निकल रहे थे | घबराकर सरोज ने रोना शुरू कर दिया | पिताजी ने उसे चुप कराया और भाभी को उठाकर पलँग पर डाला | सरोज रसोई में से पानी ले आई | जैसे तैसे भाभी का जबाड़ा खोलकर पानी डालने की कोशिश की सरोज की मदद से | भाभी होश में आईं तो फफक फफक कर रो रही थीं और पिताजी उन्हें बाँहों में जकड़े हुए उनसे माफ़ी माँग रहे थे |

अगले कुछ दिन भाभी और सरोज स्कूल नहीं जा पाए थे | भाभी की चोटों की सिकाई और दवा दारू में लगे रहे | दोनों बाप बेटी मिलकर खाना बनाते थे | दादी और पिताजी में बोल चाल बन्द थी | दादी भी इस सबसे तंग आकर खाना खाकर टखनों तक की चादर ओढ़कर बुआ के घर चली जाती थीं | फिर रात को फूफा जी उन्हें छोड़ने आते थे और काफ़ी देर तक घर में शान्ति बनाए रखने की नसीहत देकर वापस चले जाते थे | इन दिनों घर आने जाने वालों को भी जीराज अक्सर बाहर से ही लौटा देता था | कुछ लोग जो पिताजी के ख़ास थे जैसे महेंदरसिंह और डाक्टर साहब वगैरा घर के भीतर आते थे और पिताजी को नसीहतें देते थे कि क्यों अपनी माँ बहन की झूठी सच्ची बातों में आकर अपना घर बर्बाद करते हो ? उनके सामने पिताजी हताश से बोलते थे “क्या करें कुछ समझ नहीं आता | हमारे साथ तो हमेशा से यही रहा | यही हरयाने वाली के साथ हुआ और यही अब संभल वाली के साथ…” आखिर एक दिन जब फूफा जी दादी को छोड़ने आए तो साफ़ साफ़ कह दिया कि अगर अपने बेटे के घर में बेटी के साथ मिलकर ऐसी ही आग लगनी थी तो दूसरी शादी क्यों की थी उसकी ? इतना सुनना था कि दादी भड़क उठीं “आप क्या समझते हैं पुजारी जी हम आपके घर लाली के साथ मिलकर कोई षड्यंत्र रचाने जाते हैं | अरे चले जाते हैं दिल बहलाने के लिये कुछ देर को | आपको बुरा लगता है तो हम नहीं आएँगे आगे से | हमारा गंगा और संभल वाली अभी ज़िंदा हैं हमारी देखभाल के लिये…” और फूफा जी पिताजी की तरफ़ अर्थपूर्ण मुस्कुराहट से मुस्कुरा दिये थे | भाभी वैसे ही बिस्तर पर मानों सारी दुनिया से विरक्त हुई पड़ी थीं | दादी भाभी के पलँग पर जाकर बैठ गईं और उनके सर पर हाथ फिराती बोलने लगीं “अब तुमसे अच्छी दुलहिन और कहाँ मिलती हमें ? देखो ये तीनों बच्चे ज़रा ज़रा से थे जब दरोगा जी चल बसे थे | उस घटना ने हमें बहुत सदमा पहुँचाया था | तभी तो हमें कुछ पता ही नहीं लगता कि हम क्या बोल रहे हैं | हमारी बातों का बुरा मत माना करो दुलहिन | हम क्या नहीं जानते कि तुम लाली के भले के लिये ही कहती हो ? तुम खुद भी पढ़ी लिखी हो, बेटी को भी पढ़ाना चाहती हो – हम भी तो यही चाहते हैं | तुम भी इस बार मध्यमा में बैठोगी | लाली के नम्बर भी तुम्हारे ही कारण आठवीं में अच्छे आए हैं | हमें माफ़ कर दो दुलहिन…” भाभी इतने गहरे सदमे में थीं कि दादी से लिपट कर फिर से फूट फूट कर रो रही पड़ीं | दादी की आँखों में भी आँसू आ गए थे | फिर फूफा जी से बोलीं “पुजारी जी, कावेरी को यहाँ मत आने दिया कीजिये | देखिये हमारी बातों को गलत मत समझियेगा, पर जब भी वो यहाँ आती है या धनिया से मिलती है तो कुछ न कुछ आग लगाने की ही बात करती है | गलती हमारी भी है – हमें रोकना चाहिये इस सबको, पर हम नहीं रोक पाते, उल्टा बह जाते हैं इस सब में…” दादी कहीं खोई खोई कुछ कुछ बोल रही थीं और भाभी का सर सहला रही थीं | उनकी आँखों में भर आए पानी से उनकी भूरी बिल्ली जैसी आँखें और भी सुन्दर लग रही थीं | पिताजी भी शायद संतोष की साँस ले रहे थे कि चलो माँ को कुछ समझ तो आया | और फूफा जी तो चाहते ही यही थे…

ज़िंदगी की गाड़ी कुछ दिन बाद एक बार फिर से पटरी पर आ गई थी | सरोज फिर से चहकने लगी थी | पिताजी की महफ़िलें फिर से शुरू हो गई थीं | दादी ने फिर से चबूतरे पर चारपाई डलवाकर मुहल्ले की औरतों और बच्चों के साथ बतियाना शुरू कर दिया था और भाभी की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिये थे | और भाभी – वो एक बार फिर से उसी तरह रसोई – बैठक – चबूतरा और कमरे के बीच कुछ न कुछ करती डोलने लगी थीं | सरोज की वानर सेना ने फिर से घर में आना जाना शुरू कर दिया था | सरोज ने फिर से भाभी की साड़ियाँ बाक्स में से निकाल निकाल कर ट्राई करनी शुरू कर दी थीं | भाभी ने फिर से सरोज को पढ़ाने की पुरज़ोर कोशिशें शुरू कर दी थीं – और अब शायद उसका मन भी कुछ कुछ लगने लगा था पढ़ाई में…

ऐसा सब चलता रहता था तो सरोज को अपना घर स्वर्ग से भी बढ़कर लगता था…

क्रमशः………….

सौभाग्यवती भव – अध्याय तेरह

तेरह – नजीबाबाद पिताजी की नौकरी

सरोज को आज दर्द कुछ ज़्यादा ही हो रहा था –कुछ तो शरीर का दर्द और कुछ दिल का दर्द… नीलम से बात हो गई थी – पर उसने बताया था कि पुनीत ठीक से बात नहीं कर रहा – इस बात से सरोज का मन ठगे जाने के दर से कुछ शंकित हो रहा था और वो आज काफ़ी परेशान थी | नीलम ने उस दिन कहा था “बिब्बी, बब्बू भैया कह रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट का कोई वकील उनकी जान पहचान का है – किसी तरह पुनीत कागज़ दे दे तो उस वकील की भी राय ले ली जाए…”

“बब्बू… हाँ वो महेंदरसिंह जी का बेटा… कितना किया उन सबने भी हमारे लिये…” सरोज सोचने लगी | कितनी ख़ामोश हो गई थीं भाभी विनोद के बाद… वो तो भला हो महेंदरसिंह का जो उन्होंने पिताजी को समझाया था “पंडत जी, पंडतानी होस्टल में रहकर पली बढ़ी है | अभी भी पढ़ने लिखने का शौक़ है | क्यों नहीं उन्हें आगे पढ़ने देते ? पढ़ाई में लग जाएँगी तो सारा दुःख भूल जाएँगी | और हाँ, भई वो सत्यप्रकाश जी काफ़ी ज़िद कर रहे थे | क्यों नहीं जाकर मिल लेते उनसे ? यहाँ रखा भी क्या है इस म्युनिसिपालिटी की नौकरी में ?” और पिताजी नजीबाबाद जाकर सत्यप्रकाश जी से मिले थे | सत्यप्रकाश जी तो पहले से ही चाहते थे कि पिताजी उनके स्कूल में पढ़ाने लग जाएँ | बस पिताजी की नौकरी लग गई वहाँ | इधर चाचा का तबादला भी गाज़ियाबाद हो गया था सो वे भी चाची के साथ बोरिया बिस्तर लपेट गाज़ियाबाद चले गए थे और वहीँ एक किराए का मकान लेकर रहना शुरू कर दिया था | अब समस्या थी दादी की | धामपुर छोड़ने को राज़ी ही नहीं थीं | पिताजी ने काफ़ी समझाया बुझाया “अब तुम ही बताओ यहाँ इतनी सी तनखाह में कैसे गुज़ारा हो ?

“तो जाओ, हमने कब मना किया है…” ज़िद पर अड़ी दादी ने जवाब दिया |

“पर माँ आपको यहाँ अकेले छोड़कर हम कैसे चले जाएँ ? कोई दुःख तकलीफ़ है तो भला कौन देखेगा…?”

“हमारी चिंता मत करो… यहाँ सारा कुटुम्ब है तो… तुम जाओ अपना काम सँभालो…”

“पर माँ आप भी जानती हो कि हम आपको छोड़कर नहीं जा सकते…”

“जब तुम्हारे पिताजी ही चले गए हमें छोड़कर दूसरी दुनिया में तो तुम तो फिर भी काम से जा रहे हो | अब जाओ तुम लोग | हमारा जब मन होगा खबर भेज देंगे | ले जाना हमें आकर | फकीरन, समझाओ भई गंगा को, ऐसे कैसे चलेगा ? अब गृहस्थी है तो काम तो करना ही पड़ेगा…” और फकीरन ताई के सहारे बात को ऐसे ही बीच में छोड़कर दादी भीतर वाली ताई के घर जाकर बैठ जातीं | कई रोज़ इसी तरह गुज़र गए | आखिर चाचा जी को गाज़ियाबाद से बुलाया गया | सारे कुटुम्ब वालों के साथ मीटिंग्स हुईं | ज़ोरदार बहसें हुईं दादी, चाचा और पिताजी के बीच | बुआ फूफा जी भी आ गए थे नजीबाबाद से | उन्होंने, कुटुम्ब वालों ने और फकीरन ताई ने इन बहसों में बीच बचाव करने का काम किया | आखिर चाचा ने अपनी कड़क आवाज़ में फ़ैसला सुना दिया “भाईसाहब, जब माँ यहाँ से कहीं नहीं जाना चाहतीं तो बेहतरी इसी में है कि इन्हें यहीं छोड़कर हम लोग अपने अपने काम पर चले जाएँ | आखिर हमें अपनी अपनी गृहस्थियाँ भी सँभालनी हैं | और फिर माँ यहाँ अकेली तो हैं नहीं… ये सब विशंभर लाल जी, वैद जी, कैलाश, लक्ष्मी, श्यामा, फ़कीरालाल जी, अतरसिंह, सदाशिव – सभी तो हैं यहाँ | देख भाल होती रहेगी | जब कभी हममें से किसी के पास रहने का मन होगा माँ का तो हम लोग आकर लिवा ले जावेंगे | माँ की उम्र है कि उन्हें उनकी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीने दी जाए और हम लोग अपने मन की न लादें उन पर…” चाचा जी की बात से सभी सहमत थे | लिहाज़ा दादी को छोड़कर बाक़ी सभी अपनी अपनी जगहों पर वापस चले गए | पिताजी भी अपनी गृहस्थी को लेकर नजीबाबाद चले आए थे |

नजीबाबाद – सांस्कृतिक, साहित्यिक और धार्मिक महत्त्व का शहर | साम्प्रदायिक एकता और सौहार्द का एक आदर्श नगर – जो कभी पठान नवाब नजीबुद्दौला ने बसाया था और कई दूसरे क़स्बों से लोगों को लाकर बसाया था – जैसे श्यामली से लोगों को लाकर बसाया तो उस मुहल्ले का नाम ही श्यामली पड़ गया | रामपुर से लाकर लोगों को बसाया तो उस मुहल्ले का नाम पड़ गया रमपुरा | पिताजी बताते थे कि नवाब खुद साम्प्रदायिक एकता की जीती जागती मिसाल था और मुसलमानों के त्यौहार हों या हिन्दुओं के – सबको बड़े उल्लास से मनाता था | यही कारण था कि सन १९४७ में जब लगभग सारा देश हिन्दू-मुस्लिम दंगों की आग में जल रहा था तो नजीबाबाद बचा रहा था – क्योंकि वहाँ के लोगों के खून में सौहार्द मिला हुआ था | नजीबाबाद – जिसने अपनी आँखों से मालिनी नदी के तट पर कण्व ऋषि के आश्रम में शकुंतला-दुष्यन्त के पुत्र भरत की बालक्रीड़ाएँ देखि थीं कि किस तरह वो नन्हा बालक सिंहशावकों के साथ खेलते खेलते उनकी दन्तपंक्ति गिन डालता था | जिसकी आँखों ने महाराजा मौरध्वज को अपने वचन का पालन करने के लिये अपने ही पुत्र की बलि देते देखा था – जिनका किला आज भी पास के जंगलों में छिपा पड़ा है और सरकारी रख रखाव के अभाव में नष्टप्राय हो गया है | वो बात अलग है कि उस समय नगर का नाम कुछ और रहा होगा और नजीबुद्दौला ने शहर को नया नाम दिया होगा – नजीबाबाद – जिस नवाब के ऐश्वर्य के अवशेष आज भी नजीबाबाद की गलियों में, बारादरी में जहाँ तहाँ बिखरे पड़े हैं | और जिस नवाब के सामरिक महत्त्व के किले “पत्थरगढ़” को सुल्ताना डाकू ने डाके डालने के बाद भागते हुए अपने छिपने की जगह बनाया था – जिसके कारण उस किले का दूसरा नाम पड़ गया “सुल्ताना डाकू का किला” | आज जिसकी एक एक ईंट निकाल कर आस पास के लोग अपने घरों की रौनक बढ़ाने में लगा रहे हैं और जिसकी ज़मीन पर कब्ज़ा करके वहाँ फ़सलें उगाते हैं | जहाँ सरोज और बाद में नीलम के वक़्त तक भी सड़कों पर सुबह शाम जमादार झाड़ू लगाकर बाद में जगह जगह बनाए नलकों से मशक में पानी भरकर दोनों वक़्त छिड़काव करते थे और दिन भर सड़कें चमकती नज़र आती थीं | जहाँ धामपुर की तरह गली की नालियों में टट्टियाँ नहीं बहा करती थीं, क्योंकि घर घर में चूल्हे के डिज़ाइन वाले कदमचों वाले पाखाने बने हुए थे और जिनमें हर सुबह जितनी बार कोई टट्टी जाता था उतनी ही बार राख़ डाली जाती थी जिससे मक्खियाँ न भिनकें और बाद में जमादार सर पर मैला धो कर ले जाया करते थे | इन साफ़ टट्टियों और सड़कों की वजह से सरोज को नजीबाबाद बहुत भाया था और मन ही मन उस बच्ची ने फ़ैसला कर लिया था कि कुछ भी हो, धामपुर वापस नहीं जाना ही…

खैर, तो इसी शहर के एक मुहल्ले में फूफा जी ने पिताजी को एक मकान किराए पर दिलवा दिया था | स्कूल के ठीक सामने था मकान | अच्छा बड़ा मकान था | बाहर बड़ी सी दहलीज़ थी | संभल से बड़े मामा जी ने एक गाय भेजकर बँधवा दी थी दहलीज़ में और एक नौकर “जीराज” को भेज दिया था गाय की देखभाल के लिये | जीराज सारा दिन गाय की देखभाल करता था | दूध दुहता था | गरम गरम झाग वाला दूध देखते ही सरोज के मुँह में पानी आ जाता था | भाभी एक बड़े भगोने में दूध औटाने चूल्हे पर रख देती थीं | उन दिनों चूल्हे मिट्टी के बना करते थे जिनमें लकड़ियाँ जलाई जाती थीं | लकड़ियों की धीमी धीमी आँच पर औटाए उस दूध में खुशबू भी बहुत अच्छी आया करती थी – आजकल के गैस के चूल्हे पर पकाए दूध में वो खुशबू और वो स्वाद कहाँ – आज भी सरोज सोचती है तो उसके मुँह में पानी भर आता है और मन ही मन धीमे से हँस देती है | गरम गरम दूध सरोज को और पिताजी को देकर भाभी बाक़ी के कामों में लग जाया करती थीं – सर पर क़रीने से बंधी साड़ी का पल्ला रखे और हाथों में पहनी सोने की चूड़ियों की मीठी खनक सुनाती हुई | सरोज को भाभी इस रूप में बहुत अच्छी लगती थीं | उसे आश्चर्य होता था कि भाभी दिन भर में कितना भी काम कर लेती थीं, पर क्या मज़ाल जो उनकी साड़ी कहीं से भी ज़रा भी गन्दी हो जाए |

तो, जीराज ही गाय के काम निबटा कर छबड़े में गोबर लेकर छत पर चला जाता था और वहाँ उपले पाथकर सूखने के लिये रख दिया करता था | फिर नीचे आकर दहलीज़ में ही ड्रम में रखे पानी से नहाता था | साफ़ धुले कपड़े पहनकर भीतर आ जाता था भाभी का हाथ बँटाने तो भाभी उसे भी एक ग्लास दूध और साथ में कुछ नाश्ता दिया करती थीं | उन दिनों ग्लास भी पीतल के नक्काशीदार और बड़े बड़े हुआ करते थे | एक ग्लास दूध पी लो, बस फिर सारा दिन चाहे कुछ न खाओ पीओ |

घर के भीतर आने के लिये एक दरवाज़ा दहलीज़ में से था – पर वहाँ क्योंकि गाय बंधी रहती थी इसलिये बाहर के लोगों के लिये दूसरा दरवाज़ा इस्तेमाल किया जाता था | मकान गली के नुक्कड़ पर था तो ये दूसरा दरवाज़ा में रोड की तरफ़ खुलता था | दोनों ही दरवाज़ों से भीतर आने पर एक बड़ा कमरा था जिसे बैठक कहते थे | बैठक में पिताजी ने दहलीज़ की दीवार के सहारे एक तख़्त डलवाया था जिस पर रुई के गद्दे के ऊपर भाभी के हाथ की काढ़ी हुई चादर बिछाई थी | तख़्त के सामने दूसरी दीवारों के साथ साथ कुछ लकड़ी की तांत की बुनी कुर्सियाँ और मूढ़े रखे थे – जो पिताजी के साथियों और शिष्यों ने रखवाए थे पिताजी को भेंट के रूप में | दहलीज़ की तरफ़ का दरवाज़ा अक्सर बन्द रहता था | लोग बाग मेन रोड वाले दरवाज़े से ही भीतर बाहर आते जाते थे | बैठक से फिर भीतर आँगन में जाने का रास्ता था – जिस बड़े से आँगन के बीचों बीच ख़ूब ऊँचा और फला फूला जामुन का पेड़ खड़ा था | जिसके कारण ये मकान जामुन वालों का मकान कहलाता था | सरोज को याद है कैसी बड़ी बड़ी काली काली रसीली मीठी जामुन हुआ करती थीं उस पेड़ की | मुहल्ले के सारे बच्चे जामुनों के मौसम में “छोटी जामुन वालों” की छत पर सारा सारा दिन चढ़े रहते थे |

“छोटी जामुन वाले…?” हाँ ये भी एक मज़ेदार बात है | जामुन का पेड़ था तो सरोज के घर में पर उसकी मोटी मोटी आधी से ज़्यादा शाखें गुटल के घर में जाती थीं – जो आँगन के दूसरी तरफ़ गली में था और जिसके कारण उस घर का नामकरण “छोटी जामुन वालों का घर” के रूप में हो गया था | तो, सरोज की छत पर तो चढ़ते हुए बच्चे डरते थे कि कहीं गुरु जी गुस्सा न करने लग जाएँ या बच्चों के घरवालों से शिकायत न कर दें – क्योंकि जामुन तोड़ने के चक्कर में कई बार बच्चे चोट भी खा जाया करते थे | गिर पड़ते थे | लिहाज़ा “छोटी जामुन वालों” की ही छत पर चढ़ते थे | “बड़ी भाभो” (गुटल की अम्मा) दिन भर शोर भी मचाती रहती थीं “अरे कमबखतमारों, अरे सत्यानास जा तुम्हारा… काए कू आओ हो इंगे चोट फेंट खाने…? जाओ भग जाओ इल्लंग से नईं तो कै दूँगी तुम्हारी महतारियों से…” पर बच्चे तो बन्दर, कहाँ सुनने वाले थे भाभो की फटकार | तब भाभो बड़ा सा बन्दर भगाने वाला डंडा लेकर सीधे पल्ले की मोटी धोती सँभालती सीढ़ी के सहारे छत पर चढ़तीं थीं | अब छत पर मचती थी धमाल – शोर मचाते बच्चे आगे आगे तो उन्हें फटकारती भाभो पीछे पीछे | दोनों घरों की छतें आपस में मिली हुई थीं और बच्चों और भाभो की ये चूहा दौड़ सरोज की छत पर आ जाया करती थी | तब नीचे आँगन में आकर छत की तरफ़ देखती और हँसती हुई भाभी बोलती थीं “छोड़ो भी गुटल की अम्मा… क्यों नाहक इनके पीछे पड़ी रहती हो ? ये तो बन्दर हैं पूरे के पूरे…” तब भाभो भाभी को समझातीं “अरे मास्टरनी जी तुम ना जानो हो इन कमबखतमारों कूँ | मरे नासपीट्टे जान बूझ के मुझे परेसान करने कू आ जावें हैं…” और ऐसे ही बातों बातों में बच्चों को भूलकर भाभी से बतियाना शुरू कर देतीं | सरोज कई बार भाभी और भाभो की तुलना करती थी मन ही मन – भाभी कितनी सुलझी हुई सुसंस्कृत और भाभो पूरी गँवार… पहनने ओढ़ने में भी और बातों में भी | भाभी बोलती थीं शुद्ध हिंदी – बस “शंतरा और मुर्दाबाद” को छोड़कर | भाभी पहनती थीं उल्टे पल्ले की साफ़ धुली और उस ज़माने में भी फाल – जो बाज़ार से कपड़ा लाकर भाभी घर पर ही बनाती थीं क्योंकि तब शायद ही कोई जनता हो कि फाल होती क्या है – लगी क़रीने से बंधी हुई साड़ी और उस पर मैचिंग ब्लाउज़ – और हाँ, घर पर ही हाथ की सिली ब्रेजरी भी पहनती थीं भाभी जिससे उनके वक्ष के उभार के अक्स जो ब्लाउज़ और साड़ी के पल्ले में से दिखाई देते थे बड़े कसे हुए और ख़ूबसूरत लगते थे | भाभो पहनती थीं मोटी सफ़ेद धोती सीधे पल्ले की, जिसका पल्ला आगे से एक कोने में पड़ा रहता था और दिखाई पड़ता रहता था मोटे कपड़े का सफ़ेद कुर्ता जिसके नीचे वो ब्रा भी नहीं पहनती थीं और उनके ढीले ढीले वक्ष उस कुर्ते के नीचे उनके मोटे पेट पर इधर उधर झूलते रहते थे |

तो, बात चल रही थी नजीबाबाद के मकान की – आँगन के बाद दो तरफ़ बरामदा था जिसमें से बाक़ी कमरों में और रसोई में रास्ता जाता था | बैठक से भीतर जाने पर आँगन की बाँए हाथ को रसोई थी और उसी तरफ़ के कोने में एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ था | जिस पर रोज़ सुबह सुबह जीराज स्कूल के कुंए से पानी खींच कर बड़ी सी लोहे की बाल्टी में भरकर रख देता था और पिताजी घुटन्ना पहने, छाती पर जनेऊ लटकाए लोटे से पानी डालकर नहाते जाते थे और कुछ मन्त्र बोलते जाते थे | फिर बरामदा पार करके रसोई थी जिसमें सरोज और भाभी के लिये और बाद में दादी के आ जाने पर उनके लिये भी नहाने का पानी भरकर रखा जाता था | सर्दियों में चूल्हे पर पानी गरम करके भाभी सरोज और पिताजी को नहाने के लिये दिया करती थीं | रसोई भी पूरा बड़ा सा कमरा ही थी जिसके भीतर दो छोटे कोठार थे – एक अनाज के लिये और दूसरा लकड़ियों के लिये – जो जीराज लाया करता था और बाहर चबूतरे पर रखकर कुल्हाड़ी से फाड़कर भीतर रख आया करता था | रसोई के आगे बढ़ने पर एक कमरा था जिसमें सरोज पिताजी और भाभी के साथ सोया करती थी | फिर बैठक के सामने वाले बरामदे से भीतर जाने पर दो कमरे और थे, जिनमें से एक दादी के आने पर उन्हें दे दिया गया था और दूसरा आए गयों के लिये रिज़र्व रहता था | हाँ पाखाना – मेन रोड साइड के दरवाज़े से भीतर बैठक की तरफ़ आते थे तो वहीँ दाहिने हाथ को दो चूल्हों वाला पाखाना बना हुआ था जिसमें सबके हो आने के बाद चूल्हे की राख़ डाली जाती थी और बाद में मुन्नी जमादारन मैला उठाकर ले जाया करती थी | जिसे, जब महीना दिया जाता था तो वो नीचे हाथ फैला देती थी और भाभी या दादी ऊपर से उसके हाथ पर पैसे दूर से रख देती थीं, जैसे कोई छूत लग जाएगी उन्हें | सरोज को भाभी की बस यही बात अच्छी नहीं लगती थी | वहीँ से छत पर जाने के लिये जीना था |

तो ये था एक छोटा सा लेकिन साफ़ सुथरा मकान | वैसे देखा जाए तो ऐसा छोटा भी नहीं था – धामपुर वाले मकान से तो बड़ा ही था और खुला खुला भी | जहाँ सरोज ने दादी और ख़ासकर बुआ के रहते घर की पॉलिटिक्स के चलते हुए भी हर रोज़ उत्सव का माहौल देखा था | गर्मियाँ होतीं तो भाभी सुबह नाश्ते में सबको घर की गे के दूध का मट्ठा देतीं गुड़ और मठरी के साथ | फिर सुबह का खाना बनता | पिताजी गर्मियों में स्कूल की छुट्टी होने पर घर आकर खाना खाते थे सरोज के साथ | इस बीच भाभी खाना बनाकर चूल्हा बढ़ा दिया करती थीं और रसोई के फ़र्श पर पोंछा लगा दिया करती थीं जिससे फ़र्श ठण्डा हो जाए | सर्दियों में स्कूल दस बजे लगता था तो पिताजी सरोज के साथ ही खाना खाकर स्कूल चले जाते थे | बाद में दादी और भाभी खाया करती थीं | फिर चूल्हे चौके से निबट कर कभी अपनी और कभी सरोज की पढ़ाई लेकर बैठ जाती थीं तो कभी अचार वगैरा बनाने में तो कभी सिलाई कढ़ाई बुनाई करने में लग जाती थीं | फिर चार बजे से शाम के नाश्ते की तैयारी में लगतीं | घर में पिताजी ने मानों भण्डारा खोला हुआ था, और भाभी थीं मानों अन्नपूर्णा – हर रोज़ दो तीन बाहर के लोग आए रहते थे खाने पर | और पिताजी “अजी सुनती हो, जीराज को भेजकर मुष्टिक के यहाँ से कन्ना घास और अँगूर के पत्ते मँगवा लो – कुछ पकोड़ी शकोड़ी खिला दो – देखो ये… आए हैं… ज़रा इन्हें भी तो पता चले तुम कितना कुछ बनाती हो…” या “आज मूँग की दाल के चीले हो जाएँ तो कैसा रहे ? नहीं, हम तो इसलिये कह रहे थे की तुम्हारा दिल कर रहा होगा चीले खाने का तो सोचा तुम्हें खिला दें…” या फिर “अरे भई लाली की भाभी, कुछ पतौड़ बना लो…” कभी ढेर सारी पत्ता गोभी जीराज के सर पर रखवाकर आ जाते और हँसते हुए बोलते थे “वो अच्छी दिखी तो सोचा काफ़ी दिनों से गोभी के पकोड़े या पतौड़ नहीं खाए हैं…” इसी तरह की किस्म किस्म के खाने की चीज़ों की फरमाइशें… तरह तरह की पकौड़ियाँ, चीले, गट्टे, मठरी, लड्डू, बर्फी, गाजर का हलवा, तरह तरह की चाट, सिंघाड़े की कचरी, कभी घर की बनाई करौली, आलू के चिप्स, आलू और साबूदाने के पापड़ और न जाने क्या क्या – गिनने बैठें तो गिनती भूल जाएँ – और खाने वाले घर के लोगों के साथ साथ पिताजी की मित्र मण्डली और सरोज की वानर सेना | भाभी कभी कभी पिताजी को छेड़ने की गरज़ से नकली गुस्सा दिखातीं तो पिताजी उन्हें मनाते हुए अपना तकियाकलाम दोहराते “अरे भई हम तो तुम्हारा ख़याल करके बनवा रहे हैं – फिर कहोगी चार औरतों में की हमने तुम्हें कुछ खाने को नहीं दिया…” और इस तरह की मीठी नोंक झोंक में उत्सवप्रिय ये परिवार काफ़ी सारी परेशानियों को हँसकर झेलते हुए इस मकान में आराम से रह रहा था | अपने सुनहरे दिनों में सरोज इन दिनों को भी शुमार करती है |

इस बीच महेश मामा की शादी रुड़की में किसी सरकारी महकमे में नौकरी लग गई थी और अच्छे पैसे वाले घर की लड़की के साथ उनकी शादी भी हो गई थी | शादी के बाद मामा कई महीना मामी जी के साथ धामपुर सरोज के परिवार के साथ ही रहे थे, क्योंकि रुड़की में उनके ससुराल से मिले घर में कुछ टूट फूट का काम चल रहा था | बाद में सपत्नीक रुड़की शिफ्ट हो गए थे |

बहरहाल, सरोज अपने परिवार के साथ इस घर में हँसी खुशी रह रही थी | पिताजी की स्कूल की पक्की नौकरी थी | सरोज भी स्कूल जाती थी | भाभी की भी पढ़ाई एक बार फिर से शुरू हो गई थी | सत्यप्रकाश जी ने ही स्कूल में भाभी के लिये एक सीट रिज़र्व कर दी थी और वे भी सरोज और पिताजी का काम निबटाने के बाद स्कूल जाने लगी थीं – ख़ासतौर से अर्थशास्त्र की पढ़ाई के लिये | बाक़ी इतिहास, हिंदी और समाजशास्त्र तो उनके बाँए हाथ का खेल था | वे बस अर्थशास्त्र की क्लास में बैठती थीं और फिर घर वापस आ जाती थीं | सरोज और पिताजी के आने से पहले खाने पीने का बंदोबस्त करके कुछ सीने पिरोने या काढने बुनने बैठ जाती थीं | या फिर अचार पापड़ बड़ी मंगोड़ी में लग जाती थीं | इन सब कामों में उनका कोई जवाब नहीं था | पिताजी, सरोज दादी सब भाभी के हाथों के बने कपड़े ही पहनना पसंद करते थे | दर्ज़ी से तो कभी भूले भटके ही कपड़े सिलवाए जाते थे – जब भाभी अपनी पढ़ाई के चक्कर में बना नहीं पाती थीं | रात को सबके सोने के बाद फिर अपनी पढ़ाई में लगती थीं टेबल लैम्प जलाकर – उन दिनों मिट्टी के तेल से लैम्प जलते थे | लालटेन घर में जहाँ तहाँ टाँगने के कम आती थीं और टेबल लैम्प इस तरह के कामों में | नाना जी ने एक बड़ा ही ख़ूबसूरत पीतल का नक्काशीदार लैम्प भाभी को दिया था – जिसका आकार मोर के जैसा था और मोरपंख जैसी ही रंग बिरंगी नक्काशी थी उस पर | भाभी ख़ूब रगड़ कर चमकाती थीं उस लैम्प को | उसी के लालच में सरोज भी उनके साथ पढ़ने बैठ जाती थी | पर उसे ज़रा ही देर में नींद आने लगती थी | भाभी बीच बीच में उसे गरम दूध या कुछ खाने पीने को देकर उसकी नींद भगाने की नाकाम कोशिश करती रहती थीं |

नजीबाबाद आते ही पिताजी के सारे यार दोस्त मिल गए थे | कुछ नए भी बन गए थे | उनका स्वभाव ही कुछ ऐसा था कि जो भी एक बार मिलता दोस्त बन जाता | सबका मानना था कि उनके पास बैठकर कुछ न कुछ सीखने को ही मिलता था | लिहाज़ा घर में रात दिन मेहमानों का ताँता लगा रहता था | भाभी को मेहमानों की भी आव-भगत का ध्यान रखना होता था | घर में गे के घी दूध की तो कोई कमी थी नहीं | अनाज कपड़ा लत्ता सब संभल से बिना बोले ही आ जाता था | “गुरु जी” के घर से कोई प्रसाद लिये बिना तो जा ही नहीं सकता था | घर में हर वक़्त चहल पहल रहती थी | कभी कवि गोष्ठियाँ तो कभी संगीत गोष्ठियाँ | कभी राजनीतिक सरगर्मियों पर बहसबाज़ी तो कभी साहित्य संगोष्ठियाँ – यही सब चलता रहता था | बीच बीच में भाभी के बनाए तरह तरह के पकवान – सरोज याद कर रही थी उस वक़्त को – सब कुछ कितना अच्छा चल रहा था | इधर पिताजी महावीर प्रसाद के अखाड़े से भी जुड़ गए थे – पहलवानी करना, कुश्ती लड़ना, दण्ड बैठकें लगाना – न जाने क्या क्या | अखाड़े की सवारी में पहलवान महावीर प्रसाद के साथ हाथी पर सवार होकर चलना | लोग लोहा मानते थे पिताजी का – एक तो पहलवान, ऊपर से पहलवान महावीर प्रसाद के सबसे चहेते शागिर्द, और उसके साथ साहित्य, संगीत, धर्मशास्त्र और दर्शन के विद्वान…

भाभी को भी लिखने पढ़ने का शौक़ था और काफ़ी कुछ लिखती भी रहती थीं | ख़ासतौर से साहित्यकारों पर लेख या फिर अर्थशास्त्र से सम्बन्धित मुद्दों पर लेख | बहुत पढ़ती भी थीं भाभी – हिंदी के साहित्यकार हों या फिर रूसी साहित्यकारों की रचनाओं के उपलब्ध हिंदी अनुवाद या फिर अर्थशास्त्र या समाजशास्त्र से सम्बन्धित लेख | भाभी लिखती थीं पर दिखाती किसी को नहीं थीं | एक दिन पिताजी ऐसे ही कुछ अपने कागज़ ढूँढ रहे थे कि मेज़ की नीचे की दरार में कुछ कागज़ों का बण्डल देखा तो उत्सुकतावश पढ़ने लगे | भाभी इसी बीच चाय का ग्लास लेकर आ गईं | पिताजी को कागज़ पढ़ते देखा तो मना करने लगीं – पर पिताजी कहाँ मानने वाले थे | भाभी ने कागज़ छीनने की कोशिश भी की – पर नाकाम रहीं | पिताजी कागज़ लिये लिये ही स्कूल चले गए | शाम को पिताजी के साथ सत्यप्रकाश जी भी घर आए थे | पिताजी के कहने पर भाभी ने सकुचाते हुए सारे कागज़ लाकर पिताजी पकड़ा दिये | काफ़ी देर तक सत्यप्रकाश जी और पिताजी पढ़ते रहे | इसी बीच महेंदर सिंह चाचा जी, फूफा जी, जाखेटिया ताऊ जी, मुष्टिक ताऊ जी और कुछ दूसरे लोग भी – जो अक्सर ही आते थे और शहर के “साहित्यिक और राजनीतिक” लोगों में गिने जाते थे – आ चुके थे | सरोज और जीराज को भाभी ने हर रोज़ की तरह खाने पीने का सामान लेकर भीतर भेजा तो सत्यप्रकाश जी ने भाभी को भीतर भेजने को कहा | बड़ी मुश्किल से भाभी भीतर गईं | उस दिन पता नहीं भीतर क्या बात हुई – भाभी बाहर निकलीं तो बेहद खुश थीं | उस दिन के बाद से भाभी की जैसे एक नई ज़िंदगी की शुरुआत हो गई थी – वो ज़िंदगी जिसकी कल्पना शायद उन्होंने अपने छात्रावास के दिनों में की थी | अब सबके नाश्ते पानी का इंतज़ाम करने के बाद भाभी भी भीतर उस मज़लिस का हिस्सा बन जाया करती थीं | आज सरोज सोचती है भाभी के उस रूप के बारे में और अब से तुलना करती है तो हैरानी होती है उसे कि अब वो कितनी बदल चुकी थीं | अब उन्हें देखकर कौन कह सकता था कि वो कभी इतनी पढ़ी लिखी, सलीकेदार और सामाजिक महिला रही होंगी | उल्टे पल्ले की रेशमी साड़ी पहने, बालों में लम्बा सा काला चुटीला डालकर मोटी लम्बी चोटी कमर पर लटकाए या फिर उसी से बड़ा सा जूडा बनाए, माथे पर बड़ी सी बिंदी, रुमाल में इत्र लगाकर उसे ब्लाउज़ में दबाए – क्या शानदार दिखती थीं भाभी | और अब ? सच, बेरहम वक़्त की मर कितना बदल देती है इंसान को…

सरोज ने एक ठण्डी लम्बी साँस ली और फिर अपनी यादों में खो गई…

ज़िंदगी बड़े आराम से कट रही थी | यहाँ भाभी का गोष्ठियों में आना जाना और अपने लेख प्रस्तुत करने का सिलसिला शुरू हो चुका था | सरोज, भाभी, पिताजी – सब मस्त थे | भाभी का लेखन, पठन पाठन, पिताजी का अखाड़ा, स्कूल, गोष्ठियाँ, मज़लिसें, और सरोज का…? सरोज हँसमुख और मस्त तो थी ही – लिहाज़ा पिताजी की ही तरह जो भी उसे मिलता उसका दोस्त बन जाता | काफ़ी सारी सहेलियाँ बन चुकी थीं उसकी भी – सरला सरीन, शशि, डा. रस्तोगी की बेटियाँ शांति, रमा, सुशीला और सावित्री, नीम वालों की चुनिया, बरगद वालों की शारदा, और… शहर के सबसे बड़े रईस ठेकेदार पण्डित भगवानदास की लड़कियाँ शीला और किरन | आस पड़ोस की और लड़कियाँ भी थीं जो सरोज से दोस्ती करने में फख्र महसूस करती थीं | क्यों न करतीं – एक तो पण्डित गंगाप्रसाद की बेटी, ऊपर से शहर की सबसे ख़ूबसूरत लड़की – जो भी देखे देखता रहा जाए | बड़ी बड़ी पलकों वाली बोलती सी आँखें मानों शराब से भरे दो प्याले जिनमें लाल गुलाबी डोरे मानों प्यालों में भरी शराब, ऊँची नुकीली नाक, लरज़ते से गुलाबी गुलाबी होंठ जैसे गुलाब की दो अधखिली सी पंखुड़ियाँ जो अभी खिल कर न जाने कितने अफ़साने बयाँ कर देना चाहती हों, चौड़े माथे पर गिरी हुई काले काले बालों की एक घुँघराली लट मानों मछली फँसाने को फेंका गया फांसा, पतली सुडौल कमर पर कभी नागिन सी लहराती काले घने रेशमी बालों की लम्बी मोटी चोटी या फिर कभी ज़मीन को बुहारते मगरूर से खुले बाल मानों कमर पर काली काली घटाएँ उतर आई हों, गोरे गोरे गुलाबी गालों पर हँसते हुए पड़ता गड्ढा जो किसी का भी ईमान फिसलाने के लिये काफ़ी था, गोल गोल सुडौल संगमरमरी बाँहें जिन्हें छूने को किसी का भी मन ललचा जाए, मस्ती में भरी अल्हड़ सी चाल, बोली ऐसी कि लैब खोले तो फूल झरें – पत्थर भी देख ले तो रूप की गर्मी से पिघल जाए – इंसान तो फिर इंसान – शहर की हर लड़की सरोज से दोस्ती करके निहाल – हर लड़का सरोज की झलक पाने को बेताब… ऊपर से भगवान का दिया मीठा सुरीला गला और अंग अंग में भरा लास्य…

सोचते सोचते सरोज को यक बयक हँसी आ गई… मन ही मन खुद को एक मीठी सी झिड़की दी… धत् पगली… इस हाल को हो गई पर बचपना नहीं गया…

एक दिन भाभी ने सुना – सरोज छत पर धूप में बिस्तर बिस्तर सुखाती सुखाती सिनेमा का कोई गीत गा रही थी | पिताजी घर पर ही थे | भाभी ने फ़ौरन इशारे से पिताजी को बुलाया और दोनों दबे पाँव छत पर पहुँच गए | अचानक सरोज पीछे घूमी तो भाभी और पिताजी को देखकर झेंप गई और गाना बंद कर दिया | पिताजी ने आगे बढ़कर सरोज को पकड़ लिया और प्यार से पूछा “गाना सीखोगी…?” जवाब में सरोज पिताजी से लिपट गई | बस तुरंत नीचे पहुँचकर भाभी ने फ़र्श पर दरी बिछाई और पिताजी ने पेटी में से हारमोनियम निकाला… और शुरू हो गई सरोज की गाने की तालीम… सुरों पर सरोज की पकड़ बहुत अच्छी थी | पिताजी को उसे सिखाना बहुत अच्छा लगता था | पिताजी शांति को सितार भी सिखाते थे | कई बार तो ऐसा भी होता था कि सरोज का गाना और शांति का सितार साथ साथ ही होता था | एक ही चीज़ पिताजी शांति को सितार पर सिखाते थे और सरोज को गाने में | धीरे धीरे दोनों इतना कुछ सीख गई थीं कि शहर में कहीं भी कोई फंक्शन हो – इन दोनों के कार्यक्रम ज़रूर होते थे | नगर संगीत और साहित्य का एक अच्छा ख़ासा केन्द्र रहा था | ये दोनों लड़कियाँ नगर की उस सांगीतिक परम्परा की हीरा साबित हो रही थीं |

इस सबके साथ साथ सरोज को गुड़ियों से खेलना, उनका ब्याह रचाना, घर में सहेलियों को बुलाकर दावतें करनी, घर में नाटक खेलने या रामलीला करनी, नाच गाने करना – ये सारी मौज मस्ती अच्छी लगती थी | उसे याद है अपनी गुड़िया की शादी – कितनी धूम धाम से की थी | दादी भी तब आई हुई थीं | सरोज की गुड़िया की शादी सुनील के गुड्डे के साथ तय हुई थी | बस जी, भाभी को लड़की वाला बनाया गया | भाभी ने शादी में आने वाली सरोज की सारी वानर सेना के लिये छोटी छोटी पूरियाँ और सब्ज़ियाँ बनाईं | दादी ने घर में से एक टीन का डिब्बा उठा लिया और दादी पोती के साथ पोती की सारी सहेलियों ने भी टीन का डिब्बा बजा बजा कर शादी के गीत गाने शुरू कर दिये | थोड़ी देर बाद सुनील भी अपने दोस्तों के साथ गुड्डे को एक छबड़े में रखकर सर पर उठाकर पहुँच गया | सारे लड़के अपने मुँह से तरह तरह के बाजों की आवाज़ें निकाल रहे थे | सरोज की भी सारी सहेलियाँ सजी धजी बैठी थीं | दादी ने सर पर भाभी की साड़ी की पगड़ी बनाकर बाँध ली और सरोज की सजी धजी गुड़िया का ब्याह सुनील के गुड्डे के साथ करा दिया – बाक़ायदा फेरे लगवाए गए जिनमें पण्डित की भूमिका निभाई दादी ने | बाद में सबने मिलकर खाना खाया | उसके बाद गुड़िया की विदाई हुई और सरोज और उसकी सहेलियों ने रो रोकर उसे विदा किया | वो अलग बात है कि दो तीन दिन “ससुराल” में रहने के बाद सरोज अपनी गुड़िया को वापस ले आई थी – भाभी ने अपने हाथों से जो बनाई थी | भाभी ने उसे मना भी किया इस बात के लिये कि जब ब्याह दी तो क्यों ला रही हो… दूसरी बना दूँगी – पर सरोज कहाँ मानने वाली थी |

बिस्तर पर पड़ी पड़ी सरोज को सारी बातें सोच कर हँसी आ रही थी | सोचने लगी “अभी उसी दिन की तो बात है जब मिनी रोती हुई आई थी घर में – भरत और श्याम ने मिलकर उसकी गुड़िया की शादी के लिये तैयार लंहगे से अपने कम्प्यूटर की धूल पोंछ ली थी | मिनी बेचारी ने बड़े उत्साह से अपनी गुड़िया के कपड़े बनाए थे खुद अपने हाथों से | सिलाई कढ़ाई में बहुत होशियार है हमारी मिनी – बिल्कुल अपनी माँ पर गई है | उमर है अभी बारह की, पर माँ ने कितना अच्छा काम सिखा दिया है | पढ़ने लिखने में भी किसी से कम नहीं है | भगवान किसी की नज़र ना लगे… वहाँ देहरादून में तो अच्छे अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ती थी | पप्पू का एक ही सपना था – किसी तरह से मिनी पढ़ लिख कर अपने पाँवों पे खड़ी हो जाए… पर किस्मत का क्या करें ? मरी कितनी अच्छी अंग्रेज़ी बोल लेवे ही…” सोचते सोचते सरोज के होठों पर हँसी की एक पतली सी रेखा खिंच गई |

“क्या बात है अम्मा, आज किस बात पर खुश हो रही हो…?” सरोज के होठों पर हँसी देख हेमा ने पूछा |

“अरी मुझे कभी दुखी देखा है क्या ? अब पता ना कित्ती और ज़िंदगी बची है | बोझ तो बन ही गई हूँ तुम सब पर | बस भगवान उन दोनों को दिखा दे तो रुखसत होऊँ…” वैसे ही मुस्कुराते हुए सरोज ने जवाब दिया |

“ऐसे मत बोलो अम्मा…” न जाने क्यों हेमा घबरा गई थी सरोज की बात सुनकर “तुम्हारा ही तो सहारा है अब हमें… तुम्हें भी कुछ हो गया तो…” इसके आगे कुछ बोल न सकी और भागकर ऊपर अपने कमरे में जा बैठी हेमा – शायद रोने के लिये, या फिर आँखों में भर आए आँसुओं को सास से छिपाने के लिये |

“पगली हो गई हैं दोनों की दोनों…” निराश सी हँसी हँसती सरोज मन ही मन बोली “अरी तुम दोनों पर बोझा नहीं तो और क्या हूँ मैं ? धनीराम ना हो तो कितनी मुश्किल हो जाए | मुझ जैसी अपाहिज का तो उठ जाना ही अच्छा है पगली…” और आँखें बंद करके लेट रही – सुमना की बात सोचती हुई | “कितनी रोई थी उस दिन जब भरत और श्याम ने गुड़िया के ब्याह का लंहगा गन्दा कर दिया था | तब क्या समझाया था मैंने उसे ? यही कि बेटा कोई बात नहीं, लंहगा ही गन्दा हुआ है न – और बना लेना… पर देखना गुड़िया को सँभाल कर रखना… खोने या टूटने मत देना…” गुड़िया टूटने का दुःख क्या होता है सरोज अच्छी तरह समझती है | वो भी तो घर भर के लिये गुड़िया ही थी – बभी, पिताजी, दादी, शहर के लोग, संभल वाले – सब कितना सँभाल कर रखते थे उसे | घर में किसी तरह की कोई रोक टोक नहीं थी | भाभी और पिताजी सरोज को खुश देखकर खुश होते थे | सरोज सोच सोच कर हँस पड़ती है कि किस तरह घर में सहेलियों को बुलाकर भाभी की साडियों का कबाड़ा किया करती थी | भाभी के पास साड़ियों का बड़ा अच्छा कलेक्शन था | खाते पीते घर की बेटी थीं, सो वे लोग किसी तरह की कोई कोर कसर नहीं रख छोड़ते थे | सरोज और उसकी सहेलियाँ घर में धमा चौकड़ी मचातीं और भाभी का ट्रंक खोलकर उनकी साड़ियां निकाल कर लपेट लेतीं और नाचना गाना शुरू कर देतीं | सारा दिन ढोलक की थाप और घुँघरुओं की झनकार और सहेलियों के साथ हँसी ठट्ठे… मैं ठीक होती और सब कुछ ठीक ठाक चलता रहता तो क्या मिनी को भी वैसी ही मस्ती न करवाती…?

भाभी को कुछ भी बुरा नहीं लगता था | बुरा लगता था तो बस ये कि सरोज का मन पढ़ने लिखने में नहीं था | इसी बात पर भाभी कभी कभी सरोज को फटकार भी दिया करती थीं | सरोज भाभी की किसी बात पर पलट कर जवाब तो नहीं देती थी, पर हाँ उसे अच्छा भी नहीं लगता था भाभी का यों फटकारना | उससे भी ज़्यादा बुरा लगता था भाभी का पिताजी से शिकायत लगाना | भाभी भी क्या करतीं ? उनकी तो सुनती नहीं थी वो | ऊपर से अगर बुआ आ जाती थीं – अगर क्या वो तो रोज़ ही आ धमकती थीं घर में आग लगाने – तो वो भी सरोज का पक्ष लेने लगतीं “अरी संभल वाली, क्यूँ पीछे पड़ी रे है लौंडिया के ? अरी अभी कौन उमर निकली जा रई है ? पढ़ लेगी | अभी तो खेलने कूदने के दिन हैं सो मारने मस्ती… कौन रोज़ रोज़ आवेंगे ये दिन…?” फिर सरोज का सर सहलाते हुए ठंडी साँस भरकर बोलतीं “भगवान ने माँ ना छीनी होती तो भला थी किसी में हिम्मत जो इसके यूँ पीच्छे पड़ता…?” और सरोज को उस समय बुआ दुनिया की सबसे अच्छी औरत लगतीं और उसकी सबसे अधिक भला चाहने वाली भी | और भाभी ? वो सौतेली माँ से ज़्यादा कुछ न लगतीं | सरोज आज सोच सोच कर दुखी होती है – काश तब उसके घरवालों ने ज़हर न भरा होता उसके मन में या उसने भाभी की सुनी होती तो शायद आज ये दिन न देखना पड़ता | पर अब पछताने से क्या…? जो होना था वो तो हो चुका था… शायद इसीलिये भगवान ने अकल पर पत्थर डाल दिये थे |

भाभी बुआ की बात का कोई जवाब नहीं देती थीं | सरोज को बुआ का पक्ष लेना अच्छा लगता था | आखिर एक ही रास्ता बचता था भाभी के पास – पिताजी को बताना कि सरोज पढ़ाई लिखाई में दिल नहीं लगाती | तब पिताजी सरोज को समझाने की नाकाम कोशिश करते | चौदह की हो चुकी थी सरोज – पर लगती थी पूरी जवान – भगवान ने रूप रंग और कद काठी जो बहुत अच्छा दिया था | भाभी और पिताजी चाहते थे कि सरोज पढ़ लिख जाए और किसी क़ाबिल बन जाए | पर बात कुछ बन नहीं पा रही थी |

भाई भाभी को साथ साथ खुश देखकर बुआ की छाती पर साँप लोटता था | ऊपर से इस बात पर भी शायद अपनी हार मानती थीं बुआ कि सरोज ने संभल वाली को स्वीकार कर लिया था | ऊपर से आग में घी का काम कर रही थी पढ़े लिखे तबके में भाभी की उठ बैठ और भाभी को मिलने वाली तारीफ़ें | फूफा जी भी भाभी के स्वभाव और उनके पढ़ने लिखने के क़ायल हो चले थे | बुआ से शायद एकाधी बार कहा भी चुके थे “कुछ सीखो अपनी भाभी से… देखो कितनी पढ़ी लिखी है… हर काम में कितनी होशियार है… एक तुम हो…” बुआ को शायद लगने लगा था कि फूफा जी सलहज की तरफ़ झुकने लगे हैं | लिहाज़ा उन्होंने सोचा कि दादी को बुला लिया जाए – नज़र रखेंगी संभल वाली पर | यों भाभी और पिताजी वक़्त वक़्त पर दादी को मिलने जाते रहते थे | दादी भी कभी कभी वहाँ रहने के लिये आ जाया करती थीं | उस वक़्त तक उन्हें ख़ुशी होती थी अपने गंगा का हँसता मुस्कुराता छोटा सा परिवार देखकर – शहर में बेटे बहू का नाम देखकर – लगता था जैसे सोचती हों “बाप के बाद बड़े पापड़ बेले हैं गंगा ने भाई बहन की परवरिश में | चलो अच्छा है देर से ही सही… भाग तो जागे गंगा के…” पर बुआ की छाती पर तो साँप लोट रहा था | जब भी दादी आतीं या बुआ धामपुर जातीं तो दादी के कान भरने की पूरी कोशिश करतीं भाभी के खिलाफ़ “माँ तू तो निरी नासमझी की बातें करे है | अरी पता है तुझे कित्ता कित्ता तड़पावे है वो संभलवाल्ली लल्ली कू ? हर बखत तो पीच्छे पड़ी रे है उसके अक पढ़ ले पढ़ ले | निराला नौकरी करावेगी ना लल्ली से ? कित्ता समझाया मैंने अक घरबसी पढ़ लेगी, काए कू पीच्छे पड़े जा है… पर उसके तो कानों पे जूँ ना रेंगे है | देख री माँ, भौत हो चुका अब | अब और ना देखा जा है लौंडिया का तड़पना मुझसे | अरे बिन माँ की है तो क्या उसे यूँ परेशान करके रक्खेगी ?”

“तुम तो कावेरी नाहक बात का बतंगड़ बनाती हो | बचपन की आदत है तुम्हारी | हम क्या जानते नहीं | अरे सरोज को पढ़ाना चाहती है तो कौन सा बुरा काम कर रही है ? गंगा ने तो तुम्हें भी पढ़ाना लिखाना चाहा था – पर तुम्हारा मन ही नहीं लगता था तो वो बेचारा भी क्या करता ? ना कभी तुम्हारा मन लगा न सूरज का | सूरज ने भी चार बरस में जाके किया बारहवीं पास | और तुम…? तुम तो पढ़के ही नहीं दीं | वो तो भाग्य अच्छे थे और कुछ गंगा की साख कि पुजारी जी जैसा अच्छा पति मिल गया | अब अगर वे लोग सरोज को कुछ बनाना चाहते हैं तो तुम्हें परेशानी क्यों होती है ? तुम्हें तो खुश होना चाहिये कि ऐसी बहू आई है जिसने सरोज को कभी अहसास तक नहीं होने दिया सौतेलेपन का | उल्टे हम देख रहे हैं कि तुम सरोज के मन में सौतेलापन भरना चाहती हो | क्यों कावेरी क्यों…? देखो, बड़े कष्ट झेले हैं हमारे गंगा ने… अब कहीं जाकर कुछ अच्छे दिन देखने को मिले हैं – शायद संभल वाली के भाग्य से – अब उसे परेशान मत करो…”

भाभी के लिये दादी के मन में कोमल भावनाएँ और अपने लिये कुछ कुछ आक्रोश का भाव देखकर बुआ के भीतर बैठी नागिन और भी फुफकार उठी | मन की कड़वाहट मन में ही दबाकर बुआ आगे बोलीं “ठीक है माँ आगे से मैं कुछ ना बोलूँगी | पर एक बारी तू जाके देखने की कोशिश तो कर | तुझे लगे अक मैं झूठ बोल रई हूँ तो वहीँ मेरे दो थप्पड़ मार लिये… पर समझने की कोशिश तो कर… तुझे पता है गंगा नईं जाना चावे हा तुझे यूँ अकेल्ली छोड़के | वो संभल वाली लेके गई घसीट के उसे | तू कब समझेगी कुछ…?”

बुआ आग लगाती रहीं और धीरे धीरे दादी के मन में बुआ की बातें बैठती चली गईं | बुआ का साथ देने के लिये वैदनी चाची भी आ जाती थीं | कभी कभी चाची भी आ जाती थीं गाज़ियाबाद से | सब एक साथ सुर में सुर मिलाकर भाभी के लिये ज़हर उगलती थीं |

दादी भी थी तो हाड़ माँस की इंसान ही – ऊपर से दिल भी भगवान ने कोमल ही दिया था | जो औरत क़ैदियों की तकलीफ़ नहीं देख पाती थी वो भला अपनी लाडली पोती की तकलीफ़ों के बारे में सुनकर कैसे चुप रहती ? धीरे धीरे दादी को लगने लगा कि कावेरी धनिया और वैदनी सही ही कहती होंगी…

और दादी ने एक दिन मन बना ही लिया हमेशा के लिये गंगा के पास जाकर रहने का | बुआ और चाची की योजना रंग लाई थी…

क्रमशः……….