सौभाग्यवती भव – अध्याय चौदह

चौदह – दादी का नजीबाबाद पहुँचना

दादी ने केशव गार्ड के हाथ खबर भिजवाई “अब हमारी सेहत ठीक नहीं रहती | हम चाहते हैं कि अब तुम लोगों के पास आकर रहें | किसी रोज़ आकर हमारा सामान और हमें ले जाओ यहाँ से…”

सरोज को बुआ के हवाले छोड़ पिताजी और भाभी धामपुर चले गए | गाज़ियाबाद चाचा को भी खबर भिजवा दी थी पिताजी ने सो वे लोग भी आ पहुँचे थे | अब तक चाची की भी गोद हरी हो चुकी थी और उनके यहाँ भी दो लड़कियाँ पैदा हो चुकी थीं – सरसुती और अंजना | हर चाची की जचकी में भाभी को ही जाना पड़ा था जच्चा बच्चा की देखभाल के लिये और सरोज रहती थी दिन में बुआ के घर और रात को पिताजी के पास | भाभी ने जी जान से चाची की सेवा की थी | पर भाभी शायद ये नहीं जानती थीं कि वो नागिन को पाल रही थीं – जानती भी थीं शायद – पर विशवास नहीं करना चाहती थीं अपने दिल पर – था कौन वहाँ उनकी सुनने वाला ?

बहरहाल, इस बार भी सरोज बुआ के पास रहने चली गई | बुआ बात बात पर सरोज का मुँह देखतीं और ठण्डी हाय भर कर बोलतीं “हे भगवान, लल्ली के दिन फिरा दे किसी रोज़ तो… करमजली ऐसे भाग लेके पैदा हुई अक जी माँ भाई कू तो खा गई, अब ना जाने इसका क्या होवेगा…” फिर अचानक से आँखों में आँसू भरकर धोती के पल्ले से एक आँख से पोंछती हुई और दूसरी आँख से सरोज को देखती हुई आगे बोलतीं “इसकी चिंता खाए जावे है मुझे तो | वो लियाया है गंगा उस राण्ड संभल वाल्ली कू | अब जो भी हो रैवेगी तो सोतेल्ली ही | छिनाल हर बखत पीच्छे पड़ी रे है लाड्डो के | पता ना क्या करेगी इसका…? हाँ नईं तो… इसकी रच्छा करियो भगवान उस चुड़ैल से…”

सरोज समझ तो नहीं पाती थी इन सब बातों का मतलब, पर दुखी ज़रूर होती थी | बहुत बुरा लगता था जब कोई उसे करमजली या फूटे भाग वाली बोलता था | कभी कभी सोचती थी कि भगवान जी के पास जाऊँगी तो पूछूँगी ज़रूर कि अगर किसी लड़के की माँ बाप या भाई बहन मर जाएँ तो उसे कोई करमजला या अभागा नहीं बोलता, फिर अगर लड़की के साथ ऐसा हो जाए तो उसे करमजली या अभागी क्यों बोला जाता है ? जामुन वाली बड़ी भाभो मरी थीं तो क्या विपिन को किसी ने कहा था कि वो करमजला है या अभागा है ? और विपिन की तो एक बहन भी मर गई थी | याद आ रहा था सरोज को वो मनहूस दिन आज भी जब विपिन और कम्मो – दोनों भाई बहन खेल रहे थे बाहर दूसरे बच्चों के साथ | सरोज भी तो साथ ही थी | तभी न जाने कहाँ से एक मरखना बिजार उनके पीछे पड़ गया था | सारे बच्चे शोर मचाते हुए भागे थे | विपिन और सारे बच्चे तो भाग कर कोई पटवारी के घर में तो कोई सुल्लड़ के घर में घुस गया था | न जाने कैसे कम्मो पीछे छूट गई थी | बिजार को वही सामने पड़ी और उसने जाकर उसी के पेट में सींग घुसेड़ दिया | सारे बच्चे दरवाजों की ओट में पत्थर के बुत बने खड़े थे | बच्चों का शोर सुनकर मुहल्ले वाले भी लाठी डंडे लेकर आ चुके थे | बिजार को तो मार मार कर भगा दिया लोगों ने, पर कम्मो को जब तक डाक्टर के पास ले जाते तब तक वो साँस तोड़ चुकी थी | काफ़ी खून बह चुका था उसका | कृष्णकुमार चाचा जी के यहाँ ले जाने से पहले वहीँ सड़क पर ही दरबारी जी ने कम्मो की बाहर निकली आँत हाथों से भीतर दबाकर उसके ऊपर अपने सर से साफ़ा उतार कर बाँध दिया था | पर उससे भी कोई बात नहीं बनी थी |

मुहल्ले वालों ने डरे सहमे बच्चों को दरवाज़े की ओट से बाहर निकाला | सबके घरवाले बच्चों को लेकर अपने अपने घर चले गए | भाभी तब कहीं से वापस लौट रही थीं | रिक्शा से उतरीं तो देखा था कि मुहल्ले वाले कम्मो को रिक्शा में लादकर ले जा रहे थे | उधर बदहवास बनी भाभो दरवाज़े की चौखट पर बेहोश से पड़ी थीं | भाभी दौड़कर भाभो के पास पहुँचीं तो सुल्लड़ की माँ ने सारी बात बताई | दूसरी औरतों की मदद से भाभी ने भाभो को उठाया और भीतर ले गईं | भाभो तब भी बेहोश सी ही थीं | तभी कोई डरी सहमी सरोज को लेकर भाभी के पास पहुँच गया | भाभी को देखते ही सरोज उनकी साड़ी में ऐसे दुबक गई जैसे उनकी गोद से ज़्यादा महफ़ूज़ जगह और कोई हो ही नहीं सकती थी, और भाभी ने प्यार से उसके बालों में ऊँगली फिरानी शुरू कर दी |

कई दिनों तक बच्चे बाहर नहीं गए आए थे खेलने | इक तो उस दिन के हादसे का डर ऊपर से कम्मो की दर्दनाक मौत का ग़म – बच्चों को सामान्य होने में काफ़ी वक़्त लगा था | पर सरोज को आश्चर्य होता था ये देखकर कि भाभो को कम्मो की मौत पर सान्त्वना देने आई औरतें यही बोलती थीं “अरी भागवान, कम्मो की कमी तो कोई पूरी ना कर सके है | बड़ी होनहार छोकरी ही | पर ख़ैर मना अक बिजार ने उसेई मारा | अगर जो विपिन कू मार गिराता तो सोच कित्ता बड़ा पहाड़ टूट पड़ता तेरे ऊप्पर… अरी अगर विपिन कू कुछ हो हवा जाता तो क्या कोई बचता मूँ में आखिर के बखत दो बूँद पानी डालने वाला भी ? भगवान ने फिर भी भौत ख़ैर कर दी अक कम्मो पे ही गुजरी | धी का क्या है – जाना तो दूसरे घरी है | और फेर अभी तो गुटल और गुना दो दो छोकरियाँ बची हैं – पर लौंडा चला जावे पाला पनासा तो हो जावे ना घर सुन्ना… और तुम तो यो सोच्चो अक भागवान थी कम्मो जो खुद चली गई जमराज के पास पर भाई कू जिंदगी दे गई…” और सरोज सब कुछ सुनकर सोचती कि क्या कम्मो इन्सान नहीं थी जो लोग ऐसा बोलते हैं ? क्या लड़की को ज़िंदा रहने का कोई हक़ नहीं ? विपिन को तो कभी किसी ने नहीं कहा कि वो करमजला है या अभागा है जो अपनी बहन को खा गया ? और फिर बेटी के ग़म में भाभो चल बसीं तब भी किसी ने नहीं कहा कि विपिन अपनी माँ को भी खा गया ? फिर लड़की को ही ऐसा क्यों बोलते हैं ? तभी तो जब कोई उसे करमजली या अभागी बोलता तो वो यही सोचती कि भगवान जी से जब भी मिलना होगा तो पूछूँगी ज़रूर कि लड़की के बारे में ही हमेशा ऐसा क्यों बोलते हैं ? और वो भी ख़ासकर औरतें ही बोलती हैं, आदमी नहीं…

आज सरोज सोचती है कि क्या कभी कोई उस माँ के दुःख को समझने की कोशिश करता है जो बेटी को भी बेटे की ही तरह नौ महीने कोख में पालती है और अपना हाड़ माँस उसे देती है उसका आकार बनाने को और उसे जनने में भी उतनी ही प्रसव पीड़ा होती है जितना बेटा जनने में होती है ? वही बेटी अगर उसकी आँखों के आगे चली जाए तो क्या गुज़रेगी उस पर इस बात को कोई समझना चाहता है कभी ? या वो भाई जो पिछले आठ दस बरस से बहन के साथ खेलता था आज वही दर्दनाक मौत की शिकार हो गई – क्या गुज़री होगी उसके दिंल पर, किसी ने सोचने की कोशिश की कभी ? या, माँ और बहन के बाद कोई उसका अपना नहीं रहा | चाची के टुकड़ों पर पला | वो तो चाची अच्छी थी उसकी, वरना रह जाता वो भी बगौरा होकर जैसे सरोज रह जाया करती थी भाभी के पीछे से | तो क्यों लोग माँ और बहन को करमजली और अभागन जैसे सम्बोधनों से सुशोभित करते हैं ? क्यों भूल जाते हैं उस वक़्त कि कभी इसी औरत को “सौभाग्यवती रहो” के आशीर्वचनों से नहलाया गया था ? काश कोई समझ पाता…

ख़ैर, ज़िंदगी को ऐसे ही चलना था – लोगों को ऐसा ही रहना था – बल्कि आगे शायद अभी और भी बहुत कुछ होना था – जिसका दूर दूर तक भी सनगुमान नहीं था किसी को…

पिताजी और भाभी दादी के ताम झाम के साथ नजीबाबाद पहुँच चुके थे और रात को ही पिताजी बुआ के घर से सरोज को लिवा लाए थे | दादी के आने के बाद कुछ दिन बड़े आराम से गुज़रे थे | पिताजी और भाभी भाग भाग कर दादी की सारी ज़रूरतें पूरी करते थे | भाभी तो थीं ही सेवा की प्रतिमूर्ति | और सरोज… उसके तो मज़े ही आ गए थे | सारे मुहल्ले में उसने ढोल पीट रखा था “मेरी दादी आने वाली हैं – देखना कितना अच्छा गाती हैं… कितनी अच्छी ढोलक बजाती हैं… और हारमोनियम भी… और डाँस…? उसमें तो जवाब नहीं दादी का…” और मुहल्ले के बच्चे और सरोज के दूसरे दोस्त दादी के आने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे – जैसे कोई वी आई पी आने वाला हो…

दादी की लाडली तो थी ही सरोज, सो हर वक़्त बस दादी और पोती की छनती थी | भाभी ने सरोज के लिये सुन्दर सुन्दर गुड़िया गुड्डे और दूसरे खिलौने बनाए थे – कुछ कपड़े में रुई भरकर और कुछ कागजकी लुगदी से | सुन्दर सुन्दर लंहगे, गरारे शरारे, फ्राक और कुर्ते पायजामे सिले थे उसके लिये | सरोज का काम था सारा सारा दिन ट्रंक खोलकर उसमें से कपड़े निकाल निकाल कर दादी को दिखाना | फिर एक एक कपड़े को पहनकर चारों तरफ़ घूम घूम कर दिखाना | कभी दादी को अपने साथ खिलौनों से खेलने के लिये बैठा लेना | सरोज की सहेलियाँ भी आ जाती थीं और मचती थी धमा चौकड़ी | दादी को सरोज जबरदस्ती हारमोनियम पर बैठा देती | दादी भी मस्ती में भरकर बच्चों के साथ गाती बजाती रहतीं | कभी सरोज के ज़िद करने पर डाँस भी करके दिखा देतीं | थोड़ा सा नाचकर थक जातीं और बैठ जातीं और धोती के पल्ले से पसीना पोंछती हुई पंखा झलती बोलतीं “अरी पगली अब इस उम्र में हमारा नाच क्या देखती हो भला ? हूँ ? अरे हम तो नदी किनारे के पेड़ हैं भईया | अब तो तुम लोगों के दिन हैं…” फिर कुछ गर्व के साथ भाभी से मसखरी करती बोलतीं “हाँ नाचते थे हम ख़ूब जब उम्र थी हमारी | मुहल्ले पड़ोस के लड़के छिप छिप कर देखा करते थे हमारा नाच | कितनों पर बिजली गिराई हमने अपनी उम्र में | अब तुम्हारी माँ की तरह थोड़े हैं कि न नाचना आता है न गाना बजाना | अरे ये सब तो हम औरतों का गहना है लाली | इसी सब पर तो रीझते हैं हमारे मर्द | तुम्हारे दादा जी बेहद गुस्सैल थे पर हम अपनी अदाओं से उन्हें शान्त रखते थे | पर तुम अभी बच्ची हो, नहीं समझोगी | अच्छा चलो अब बहुत हो चुका | अब तुम लोग खेलो कूदो और हम जाते हैं तुम्हारी माँ के साथ छत पर | चलो भई संभल वाली…” और यों हँसती हुई सास बहू ऊपर छत पर चली जातीं | सरोज की सहेलियाँ उसकी तरफ़ ऐसे देखतीं मानों कहना चाहती हों “कितनी खुशनसीब है तू सरोज जो इतनी अच्छी और प्यार करने वाली दादी और इतना ख़याल करने वाली माँ मिली है तुझे | तेरे घर में सब लोग कितने हिल मिल कर रहते हैं…”

“हिलमिल कर… ऊँ हूँ…” पलँग पर लाचार पड़ी पड़ी सरोज ने एक ठण्डी साँस भरी और फिर से यादों की दुनिया में पहुँच गई | उसे याद आ रहा था कि दादी के आने के बाद भाभी कुछ दिनों तक घर से बाहर नहीं गई थीं | वैसे भी घर से बाहर कम ही जाती थीं | ज़्यादातर तो घर में ही बैठी या तो कुछ लिखती पढ़ती रहती थीं या फिर घर के दूसरे कामों में लगी रहती थीं | सरोज के ही काम क्या कम होते थे ? बाहर तो बस तभी जाती थीं जब पिताजी ज़िद करते थे किसी गोष्ठी वगैरा में चलने की | भाभी हर वक़्त चुपचाप रहा करती थीं और काम में लगी रहा करती थीं | हाँ बातें होती थीं तो या तो दादी से और सरोज से पूछा जाता था कि खाने में क्या बनेगा या फिर बस सरोज के साथ बातें होती थीं | हाँ, दादी को बातों की आदत थी तो वे भी या तो बाहर चबूतरे पर चारपाई डलवाकर अड़ोसनों पड़ोसनों से बतियाती रहती थीं या फिर सरोज को किस्से कहानियाँ सुनाती रहती थीं – जिनमें ज़्यादातर दादा जी की ही बातें होती थीं, या फिर पिताजी के चुलबुले किस्से और चाचा के गुस्से की बातें | दादी ने ही सुनाया था कि किस तरह पिताजी चाचा और दोस्तों के साथ कलियावाले जाया करते थे और वहाँ आरती के बाद परिक्रमा के वक़्त दण्डवत करने के बहाने नीचे नीचे लेटे लेटे सारे दोस्त केले खा लिया करते थे औए छिलके वहीँ फेंक देते थे | परिक्रमा करते लोग देखकर खुश होते थे “कितने धार्मिक स्वभाव के लौंडे हैं | मन्दिर में दण्डवत करते हैं भगवान की मूर्ति के आगे | वरना आजकल के जवान लौंडे…” आरती खत्म होने के बाद जब पण्डित जी प्रसाद के लिये केले उठाने जाते तो काफ़ी सारे केले के छिलके पड़े देखकर गिलहरी पर गुस्सा उतारते “देखो महाराज जी कितनी चालाक गिलहरी है… केले खा जावे है और छिलके फेंक जावे है वहीँ…” चाचा घर आकर पिताजी पर गुस्सा करते थे “पंडत जी, अगर किसी ने देख लिया किसी दिन तो बेभाव की पड़ेंगी…” पर किसी ने कभी देखा ही नहीं था और ये शरारत ऐसे ही चलती रही थी काफ़ी अरसा |

सदाशिव चाचा जी की शादी का किस्सा – बारात सिव्हारा गई थी | वहाँ किस तरह सारे दोस्तों ने मिलकर फेरों से पहले सदाशिव चाचा जी को भाँग पिला दी | फिर तो बस मज़ा आ गया था – दूल्हे को पकड़ कर फेरे लगवाए गए थे | और वो बात जब उसी बारात में गए सारे बारातियों ने भाँग पी ली थी विदा वाली रात को | वहाँ किसी घर में ठहराया गया था रात में बारात को | भाँग ने ऐसा जल्वा दिखाया कि सबके पेट ख़राब हो गए थे | सारी रात सब लोग लोटा लेके जाते रहे थे | कोई आँगन में लगे चूल्हे को ही संडास समझ बैठा और भाँग के नशे में वहीँ बैठ गया | अलस्सुबह जब आँख खुली तो सबको रात के कारनामे पता चले और दूल्हे से पहले ही अपना बोरिया बिस्तर लपेट कर भाग खड़े हुए बैलगाड़ियों में सवार हो | और हाँ वो किस्सा जब पिताजी मुहल्ले के बच्चों से बदन दबवाने के लिये नाटकबाज़ी किया करते थे | धामपुर में बाहर चबूतरे पर बैठ जाते चारपाई पर और ज़ोर ज़ोर से बोलना शुरू कर देते “अरे बालकों, मुझे पिताजी मत ना बुलइयो… चिढ़ है मुझे पिताजी कहलाने से…” बस फिर क्या था ? अड़ोस पड़ोस के लौंडे लबारे इकठ्ठा हो जाते और “पिताजी पिताजी…” का शोर मचाते पिताजी के ऊपर चढ़ जाया करते | पिताजी तो खुश हो जाते बदन दबवाते हुए – पर उन लौंडों की अम्माएँ लाज से मरी जातीं और अपनी अपनी खिड़कियों से झाँककर एक हाथ से घूँघट में आधा माथा दबाकर और दूसरे हाथ की उँगलियाँ अपनी अपनी ठोडियों के नीचे रखकर गालियों की बौछार शुरू कर देतीं “अरे कमबखतमारे… अरे सत्यानास जावे तुम्हारा… आए हाए देक्खो तो मरे कू… अरे क्या मारा कलजुग आ गिया है…? अरे तुम्हारे घर की लुगाइयों कू क्या हो गिया रे…? अरे भौत बड़े भगवान के भगत बने फिरो हो, क्या योई भगतई रे गई है तुम्हारी…? हैं…? अरे सरम ना आवे यूँ हमारे बच्चों का बाप बनते हुए…? सच्ची सारी सरम हया बेचके धर दी इस दरोग्ग्न के लौंडे ने तो… अरे पंडत जी एसई सौक हैगा बदन दबवाने का तो बिया क्यूँ ना कर लो हो…” पर शायद मन ही मन खुश होती थीं इस तरह की छेड़खानियों से… वो भी पिताजी जैसा ख़ूबसूरत लौंडा अगर करे तो किसे अच्छा नहीं लगेगा…? और शायद ये सब भी मनोरंजन का एक ज़रिया था उन घरघुसनी औरतों की रोज़मर्रा की उबाऊ दिनचर्या से थोड़ी सी राहत का, जिनके घरवाले रात को घर आते आते भी अपनी बहियों में उलझे रहते थे और दीया बाती बढ़ा दिये जाने पर ही इनके पास आते थे | और पिताजी भी कब रुकने वाले थे उन लुगाइयों की बातों से ? बल्कि उन्हें तो और शह मिलती थी इस सबसे | और ये सारी शैतानियाँ ब्याह के बाद और सरोज के पैदा होने के बाद तक भी ज़ारी रहीं | पर माँ के मरने के बाद तो पिताजी जैसे सब कुछ भूल गए थे – एक ठहराव सा आ गया था उनमें… पर पलँग पर पड़ी पड़ी सरोज सोच रही थी काश माँ ना मरती तो… और मन ही मन मुस्कुरा भी रही थी कि कितना मज़ा आता होगा पिताजी को ये सब करने में… और पिताजी की वो सुरमा डली बिल्लोरी आँखें शरारत के वक़्त कितनी ख़ूबसूरत लगती होंगी… काश मैं होती तब और पिताजी के उस रूप को देखती… सरोज को याद है हर रोज़ सुबह नहाने के बाद चाँदी की सलाई से आँखों में सुरमा डाला करते थे… और यह भी कि सुरमा डालने के बाद पिताजी की भूरी झील सी गहरी आँखें और भी गहरी और आकर्षक लगने लगती थीं और सरोज उन्हें एकटक निहारती रहती थी…

ख़ैर, तो होता यों था कि दादी सुनाती रहतीं और हँसती रहतीं | गोरी गोरी सुन्दर नैन नक्श वाली दादी जब हँसती थीं तो उनके गालों में गड्ढे पड़ जाया करते थे जो सरोज को बहुत अच्छे लगते थे | असल में तो सरोज को दादी किसी परी से कम नहीं लगती थीं – जो नाच सकती थीं, गा सकती थीं, बजा सकती थीं, मुहल्ले भर की खबर रख सकती थीं, और सबसे बड़ी बात ये कि सरोज को भाभी के साथ पढ़ने से बचा भी सकती थीं… भाभी घर का सारा काम निबटाकर सरोज की कापी किताबें लेकर आ बैठतीं और सरोज को भी हाथ पकड़ कर दादी के पास से खींच लातीं | भाभी पढ़ाना शुरू करतीं | कुछ देर तो सरोज मन मार कर लगी रहती, पर फिर ऊब जाती और कभी आँखें मलनी शुरू कर देती तो कभी कान खुजाना शुरू कर देती | कभी पढ़ते पढ़ते कोई गाना याद आ जाता और गुनगुनाना शुरू कर देती | कभी बिना वजह ही इधर उधर ताकना शुरू कर देती | गरज कि पढ़ने से किसी तरह जान छूटे | भाभी कुछ देर तो उसे बाँध कर रखतीं | वो आँख मलती तो भाभी उसके हाथ आन्ख्पर से हटाकर आँख में फूँक मार देतीं कि अब खुजली नहीं होगी – तुम पढ़ाई पर ध्यान दो – और फिर जहाँ से शुरू किया था वहीँ से दोबारा शुरू करतीं | कान खुजाती तो कान पर से हाथ हटाकर सरोज को गोद में लिटाकर हलके हाथ से कान मलतीं और फिर हलकी सी घुड़की देकर पढ़ाना शुरू कर देतीं | सरोज गाना गुनगुनाती तो हल्का सा डपट देतीं “लाली, गाना पढ़ने के बाद… अभी पढ़ाई… बाद में मैं खाना बनाऊँगी तो तुम दादी के साथ ख़ूब गीत गाना… चलो अभी बताओ क्या बताया था…?” अब सरोज ने कुछ ध्यान से सुना होता तो बताती भी | पढ़ाई छोड़ कुसुम, लक्ष्मी और न जाने किस किस की बात लेकर बहलाने बैठ जाती | भाभी कुछ देर सुनतीं, मुस्कुरातीं, पर फिर अपनी बात पर आ जातीं “लाली अभी जो बताया था उसमें से कुछ तो बताओ…” अब सरोज को भूख लग आती | भाभी उसे पाठ याद करने की हिदायत देकर उसके पढ़ाई में मन न लगने पर मन ही मन झुँझलाती हुई उठतीं – रसोई में जातीं – कुछ उसके खाने के लिये लेकर आतीं – सरोज चाव से खाती तब तक भाभी जेलर की तरह वहीँ जमी रहतीं | सरोज खा चुकती तो फिर भाभी शुरू हो जातीं “तो, भर गया पेट ? अब एक घंटा कुछ नहीं… चलो अब शुरू हो जाओ… कहाँ थे हम…” सरोज सोचती “क्या जेलर की तरह बैठी हैं सामने… हे भगवान कुछ तो करो…” पर भगवान कुछ नहीं करते | तब सरोज इधर उधर देखना शुरू कर देती | आखिर भाभी का सब्र जवाब दे जाता और वे उसे डाटना शुरू कर देतीं “कितनी बार कहा है कम से कम एक घंटा तो मन लगाकर पढ़ लिया करो, पर जूँ नहीं रेंगती कानों पर | अरे कैसे चलेगा ऐसे ? फेल हो जाओगी | आने दो आज पिताजी को… बताऊँगी सब कुछ…” भाभी की आवाज़ सुनकर दादी दौड़ी चली आतीं | दादी को देख सरोज आँखें मलती ज़ोर ज़ोर से रोने का नाटक शुरू कर देती | देखते ही दादी भाभी पर भड़क उठतीं “ये क्या संभल वाली ? ऐसे पढ़ाया जाता है क्या बच्चों को ? तुम्हें इसी तरह पढ़ाया होगा तुम्हारे घरवालों ने ? ठीक ही कहती थीं कावेरी…”

“तो फिर ठीक है, आप कावेरी बीवी जी के पास चली जाया कीजिए इसकी पढ़ाई के वक़्त और मेरी बुराइयाँ सुन सुन कर खुश हो जाया कीजिये | पर माता जी पढ़ाई के मामले में आप बीच में न ही बोलें तो अच्छा होगा…” तड़प कर भाभी बोलतीं “ये सब आपकी और बीवी जी की शह का ही नतीज़ा है | पढ़ने में मन ही नहीं लगता इसका | ऐसे कैसे चलेगा ? फेल हो जाएगी तो फिर ?”

“अरे हाँ हाँ बहुत देखे हैं फेल करने वाले | अरे कुछ अंधेरगर्दी है क्या जो जिसे चाहे फेल कर दिया ? अरे हमारे गंगा की बेटी है, देखना कितनी बड़ी बनेगी एक दिन | और फिर हम पढ़ाने को कब मना कर रहे हैं ? पर प्यार से पढ़ाओ ना | यों डाट फटकार क्यों करती हो ?”

“मैं कोई डाट फटकार नहीं कर रही माता जी | लाली तो पढ़ना चाहती ही नहीं…”

“तो कौन बच्चा पढ़ना चाहता है बताओ हमें… हैं…? अरे पढ़ाई से हर बच्चा ही भागता है | अपनी लाली भी भागती है तो कौन बड़ी बात हो गई ? प्यार से समझाओगी इसे तो क्या समझेगी नहीं ? पर तुम तो सीधा डाटना ही शुरू कर देती हो | ऐसे करते हैं क्या बच्चों के साथ ? अच्छा चलो अब थोड़ी देर तुम दोनों ही आराम कर लो | पढ़ाई बाद में होगी | चलो लाली हम दोनों छोटी जामुन वालों के घर होकर आते हैं तब तक तुम्हारी माँ शाम के खाने का इंतज़ाम कर लेगी…” और भाभी हक्की बक्की खड़ी देखती रहतीं | दादी सरोज का हाथ पकड़ कर वहाँ से ले जातीं | सरोज को यही तो चाहिये था | काश उस समय सरोज भाभी की बात मान लेती और कुछ कर लेती तो आज इस हाल में तो न होती… “हेमा… अरी सुनिये इधर…” सरोज ने एक ठण्डी आह भरी और हेमा को आवाज़ लगाई |

“क्या हुआ अम्मा…” कहती हुई दुपट्टे से हाथ पोंछती हेमा आ खड़ी हुई |

“अरी ज़रा पौट लगइए री… बड़ी ज़ोर से पिशाब आ रिया है… क्या मरा ये भी हर वक़्त का रोना हो गया…”

“तुम फ़िकर मत ना किया करो अम्मा, सब ठीक हो जावेगा | कल जब गई थी इनसे मिलने तो कह रहे थे कि ज़ल्दी ही पैरोल हो जावेगी | फिर तुम्हें मेरठ लेके जावेंगे | सब ठीक हो जाएगा | धनीराम आइये ज़रा…” पौट उठाकर धनीराम आवाज़ लगाई हेमा ने | धनीराम आ गया तो उसने कूल्हे से पकड़ कर सरोज को कुछ ऊँचा किया और पकड़े रहा | हेमा ने सरोज की चादर के नीचे पौट घुसा दिया | सरोज पिशाब कर चुकी तो इशारा किया | हेमा ने पौट हटा लिया और नाक पर दुपट्टे का ठुक्का लपेट कर पौट लेकर बाहर निकल गई साफ़ करने | धनीराम ने सरोज को वापस पहले वाली स्थिति में लिटाया और वो भी बाहर निकल गया | सरोज ने दरवाज़े से बाहर देखा – साँझ ढल आई थी | ढलते हुए सूरज की किरणें भी सरोज की परिस्थितियों की ही तरह बोझिल जान पड़ रही थीं – मानों दिन भर दुनिया भर को उजाला लुटाते लुटाते थक चुकी थीं और अब गहरी नींद में जाना चाहती थीं |

“लाली… देखो भई हम क्या लाए हैं लाली के लिये | अरे कहाँ हो भाई | अरे भई लाली की भाभी कहाँ चली गई ? माँ…” सरोज को लगा पिताजी आवाज़ लगा रहे थे |

“तुम भी न बाहर से ही आते हो शोर मचाते | ऐसा किया करो, बाज़ार से ही आवाज़ लगा दिया करो, हम सब तुम्हारे आने से पहले ही दरवाज़े पर खड़े मिलेंगे | ठीक ?” भाभी रसोई में से बाहर आईं कपड़े से हाथ पोंछती हुई | पीछे पीछे दादी और सरोज भी आकर खड़ी हो गई |

“अरे संभल वाली, इनके हाल तो हमेशा से यही रहे…” पिताजी को लाड़ से निहारती दादी बोलीं “क्या लाए हो दिखाओ तो सही | बड़ा शोर मचाते आ रहे थे…” लाड़ से झिड़कती हुई दादी बोलीं | भाभी माँ बेटे को देख मंद मंद मुस्कुरा रही थीं |

“क्या माँ तुम भी…” कुछ झेंपते हुए पिताजी बोले “अरे राधेलाल के यहाँ गया था | यो पकी हुई खीस भेजी है उसकी बीवी ने…” कहते हुए पिताजी ने खीस की डोलची भाभी को पकड़ा दी |

“खीस…?” सुनते ही सरोज के मुँह में पानी भर आया और फ़ौरन भाभी का पल्ला पकड़ उनके पीछे पीछे रसोई में चली गई | “क्यों अब क्यों आ रही हो ? दादी के पास ही जाओ न जैसे पढ़ते से उठकर गई थीं…” मीठी झिड़की देती भाभी बोलीं | पिताजी कपड़े बदलने और दादी उनका हाल चाल पूछने कमरे में चली गई थीं | “अच्छा भाभी आज खीस दे दो | कल से ऐसा नहीं होगा | कान पकड़ती हूँ…” कहते हुए अपने दोनों हाथों से दोनों कान पकड़ लिये | फिर बोली “कल से मन लगाकर पढ़ाई करूँगी, सच्ची…” फिर भाभी को आँख मारकर कान छोड़कर कटोरा उठा लाई | सरोज का नाटक देखकर एक बार तो भाभी की हँसी फूट पड़ी | धोती का पल्ला मुँह में दबा हँसी रोकने की कोशिश करती भाभी ने कटोरे में गरम गरम खीस डाल दी | सरोज ने खीस खानी शुरू की तब भाभी ने भी बोलना शुरू कर दिया “देखो लाली, अब ये बचपना छोड़ो | अगर पढ़ोगी लिखोगी नहीं तो कैसे काम चलेगा ? मैं तो चाहती हूँ तुम पढ़ लिख कर किसी लायक बन जाओ | तुम्हें पता है मैं पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी | पर शादी हो गई, और सब कुछ होने से रह गया | पर चाहती हूँ तुम्हारे साथ ऐसा न हो | अपनी पढ़ाई की हसरत तुम्हें पढ़ाकर पूरी काटना चाहती हूँ…” लम्बी साँस लेकर भाभी चुप हो गईं |

“तो तुम तो अभी भी पढ़ रही हो भाभी फ़िकर क्यों करती हो ? देखना, मेरा मन कहता है तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाएगी…” मगन भाव से खीस खाती सरोज ने जवाब दिया |

“नहीं पगली, अब नौकरी किसे करनी है | अब तो बस एक ही चिंता है – तुम किसी लायक बन जाओ बस | मेरी ज़िन्दगी का तो अब बस यही मकसद रह गया है – तुम किसी लायक बन जाओ, तुम्हारे पिताजी का काम ठीक ठाक चलता रहे, तुम्हारी दादी ठीक रहे – और क्या चाहिये अब | मेरी ज़िंदगी तो अब तुम लोगों की ही है बेटा…” शून्य में ताकती भाभी बोल रही थीं | ना जाने ऐसा क्या था भाभी की आवाज़ में कि सरोज खीस खाना भूलकर एकटक भाभी की तरफ़ देखे जा रही थी और मन ही मन सोच रही थी “भाभी इतनी पढ़ी लिखी हैं फिर भी हम सबका इतना ध्यान रखती हैं | क्यों नहीं लगता मेरा मन पढ़ाई में ? भाभी ठीक ही तो कहती हैं | पढ़ाई लिखाई मेरे काम ही तो आएगी | ठीक है, कल से कोई शैतानी नहीं, बस पढ़ाई…” मन ही मन सरोज संकल्प कर रही थी |

“हाँ भई… तो लगाओ खाना लगाओ…” पिताजी ने रसोई के दरवाज़े पर आकर कहा तो दोनों माँ बेटी की तन्द्रा भंग हुई “कैसी लगी खीस ?” पिताजी और दादी रसोई में आ चुके थे | पिताजी एक तप्पड़ खींच कर वहीँ सरोज के पास बैठ गए थे | | हूँ… बहुत अच्छी है, पर भाभी जैसी नहीं…” मुँह में खीस भरे भाभी की तरफ़ आँख मारकर सरोज ने जवाब दिया | अब तक दादी भी अपनी चौकी सरका कर वहीँ सबके पास बैठ गई थीं | भाभी ने थालियाँ और कटोरियाँ उठाकर उनमें खाना परोस कर पिताजी और दादी को दिया | अब तक सरोज भी खीस खत्म कर चुकी थी और पिताजी के थाल में ही खाने के लिये बैठ गई थी | अभी तक भी उसे पिताजी के ही थल में खाने में मज़ा आता था |

“हूँ… भई वाह… केला तो बड़ा अच्छा बना है…” मुँह में गस्सा रखते पिताजी बोले | फिर अचानक सरोज की तरफ़ देखकर बोले “अरे आज लाली कैसे गुमसुम खाना खा रही है ? क्या हुआ तुम्हारी उस चाण्डाल चौकड़ी का ? क्या क्या ऊधम मचाया आज ?” पिताजी खाते जा रहे थे और सरोज से बातें भी करते जा रहे थे |

“अम्मा खाना खा लो…” हेमा दरवाज़े पर खाने का थाल लिये खड़ी थी “ओ धनीराम, आइये इधर… आ खाना खिला अम्मा को…” कहते हुए हेमा ने धनीराम को आवाज़ लगाई | धनीराम ने आकर सरोज को पीछे से सहारा देकर थोड़ा सा अधलेटा सा बैठाया और हेमा ने एक एक टुकड़ा खिलाना शुरू किया |

“नीना आ गई…?” खाते खाते सरोज ने छोटी बहू के बारे में पूछा |

“हाँ आ गई… नहाने गई है…”

“और ये मिनी विनी ना दिखाई दे रए… कहाँ गए…?”

मिनी पीसीओ पे बैठी है… भरत वरत खेल रहे हैं… तुम खाना खा लो तो इन सबको भी खिला दूँगी…” सास के मुँह में गस्सा देते हुए हेमा ने जवाब दिया |

“अरे पहले बच्चों को खिला दिया कर…” हलके से कराहते हुए सरोज बोली “मेरा क्या है, सारा दिन पड़ी तो रहूँ हूँ अपाहज बनी… और काम ही क्या है मुझे…? खा लूँगी कभी भी… पहले बच्चों को दिया कर…”

“ठीक है दे दिया करूँगी… पर अभी तो तुम खाओ…” हेमा सरोज को खिला रही थी और सरोज खोई हुई थी यादों में | पलँग पर सारा दिन पड़े पड़े सरोज को और काम ही क्या था ? बच्चे और बहुएँ चले जाते थे अपने अपने काम पर और स्कूल | रह जाती थी सरोज अकेली… अपाहज… बिस्तर में पड़ी… ऐसे में पुरानी यादें और भी तड़पाती थीं…

जैसे आजकल बहू खिलाती है इसी तरह भाभी खिलाया करती थीं प्यार से | बहू के खिलाने में फ़र्ज़ की भावना है, पर भाभी के हाथ से खाने में तो उनके दिल का सारा प्यार ही छलक पड़ता था | वो तो वही पागल थी जो उनकी बातों पर तब ध्यान नहीं दिया | कितना तूफ़ान खड़ा हो गया था उस दिन जब भाभी सरोज को पढ़ाने बैठी थीं और पहले दिन मन लगाकर पढ़ने का वादा करके भी सरोज का मन नहीं लग रहा था पढ़ने में | आखिर भाभी को गुस्सा आ गया “कल तुमने वादा किया था फिर अब क्या हुआ ? देखो मान जाओ वरना क्या फ़ायदा एक दिन परेशान होकर मुझे तुम पर हाथ उठाना पड़ जाए…” बुआ उस दिन घर आई हुई थीं | भाभी की डाट की आवाज़ बाहर गई तो वहीँ से चीखती चिल्लाती बुआ भीतर भागी आईं जैसे इसी वक़्त के इंतज़ार में थीं “अरे अरे देक्खो तो क्या जुलम ढा रई है संभल वाली लल्ली पे… हाथ उठावेगी लल्ली पे…? आने दे गंगा कू, सारी बात बताऊँगी आज | वो तो भला हो मैं आ गई इंगे वरना यो तो छेत गेरती लल्ली कू | अरी लुच्ची राण्ड, अरे मरी कीड़े पड़ें तेरे… ठीकरे फूटें तुझपे… अरी ऐसे पढ़ावें हैं क्या बच्चों कू…? हाय हाय देक्खो तो क्या शकल बना दी है लल्ली की…? आ री मेरे पास आ…” कहते हुए बुआ सरोज को अपनी तरफ़ खींचने लगीं |

“बीवी जी, बार बार आपसे और माता जी से कहती हूँ कि आप और चाहे जो कर लिया करो मेरे साथ, पर पढ़ाते वक़्त बीच में मत बोला करो | हाथ जोड़ती हूँ तुम दोनों के आगे आगे…” सरोज को बुआ से छुड़ाते हुए भाभी थोड़ी तल्ख़ी से बोलीं | सारा दिन सरोज को लाड़ लड़ाओ, सर पे चढ़ाओ, मुझे क्या ? पर पढ़ाते वक़्त मैं किसी की बात बर्दाश्त नहीं करूँगी… आप बाहर माता जी के पास जाकर बैठो…”

अब तक दादी भी आ चुकी थीं | उन्हें देखते ही बुआ ने त्रिया चरित्र दिखाना शुरू कर दिया | धोती का ठुक्का मुँह में दबाकर रोने का नाटक करती बोलीं “हाँ हाँ अब योई कसर बाकी रह गई ही | अरे मेरे भाई के घर से ही मुझे बाहर निकालना चाहो हो | मरी ना है अभी मेरी माँ | ज़िंदा है वो अभी | निकाल के दिखाओ मुझे घर से…”

सरोज हक्की बक्की खड़ी थी बुआ का ये रूप देखकर | और भाभी – वो भी हक्की बक्की थीं और रिरियाती हुई बुआ से बोल रही थीं “बीवी जी मैंने ऐसा कब कहा ? मैं तो बस आपसे यही कह रही थी कि जितनी देर सरोज को पढ़ाती हूँ उतनी देर आप बाहर माता जी के पास जाकर बैठ जाओ | ऐसा क्या कह दिया मैंने जो आप इस तरह कर रही हो…”

“हाँ हाँ बोल दे संभल वाली अक मैं झूठ बोल रई हूँ | हे भगवान अब यो दिन भी देखना लिखा हा | या तो लल्ली पे जुलम ढावेगी या फेर मुझे झूठा बतावेगी…” और हाथों में मुँह छिपाए एक उँगली एक आँख से हटाकर चुपचाप दादी का रिएक्शन देखने की भी कोशिश कर रही थीं | दादी को लगा ज़रूर भाभी ने कुछ उल्टा सीधा बोल दिया होगा, तभी तो बुआ ऐसे कर रही हैं | लिहाज़ा बुआ को प्यार करती हुई बोलीं “ना ना कावेरी | हम देखते हैं अभी | क्यों री दुलहिन, हम तो समझते थे कि तुम सारे घर में समझदार हो, तहज़ीबयाफ़्ता हो | क्या यही समझदारी है तुम्हारी ? क्या यही तहज़ीब है तुम्हारी ? छोटी ननद घर आई है और तुम उसे घर से निकल जाने के लिये बोल रही हो ? मत भूलो अभी हम ज़िंदा हैं…”

“माता जी मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा | ना मानो तो आप सरोज से पूछ लो…” लगभग रुंआसी हो चुकी भाभी ने जवाब दिया “क्यों सरोज क्या कहा था मैंने बुआ से बताओ तो दादी को…”

अब तक सरोज को अहसास हो चुका था कि दादी और भाभी को लड़वाने के लिये बुआ भाभी पर झूठा इलज़ाम लगा रही हैं लिहाज़ा वो बोली “दादी भाभी तो बस मुझे पढ़ा रही थीं और बस यही कहा था कि…”

“टू चुप कर लल्ली…” सरोज की बात पूरी होने से पहले ही बुआ अपना रोना बन्द करके सरोज को डाटती बोलीं “बड़ों के बीच में नईं बोलते | और संभल वाली क्यूँ लल्ली कू बीच में डाल्लो हो ? और कुछ उसे सिखाओ ना सिखाओ पर यो लड़ाई झगड़ा और सिखा दो…”

पर बुआ भाभी ने कहा क्या था आपसे ?” बुआ की बातों पर खीझती सरोज बोली “यही न कि जब तक सरोज को पढ़ाती हूँ तब तक आप बाहर दादी के पास जाकर बैठो ? आपको घर से बाहर निकलने की बात कब कही थी भाभी ने ? वो तो आपने ही खुद कहना शुरू कर दिया…?

“देखा माँ, लल्ली कू भी इत्ता डरा के रक्खा हुआ है संभल वाली ने अक सच बोलते हुए भी डरे है…” लगता था बुआ हार मानने वाली नहीं थीं |

“बुआ क्यों ऐसा करती हो…?” सरोज ने कुछ इस तरह कहा कि दादी को भी दाल में कुछ काला नज़र आने लगा | पर शायद अपनी इकलौती बेटी को भी नाराज़ नहीं करना चाहती थीं | शायद मन में कहीं डर समाया हुआ था कि दूसरे घरों की तरह अगर बाप बेटी दोनों संभल वाली की तरफ़ हो गए और उन्हें भूल गए तो बेटी का ही तो सहारा होगा उन्हें | इसलिए बात को समाप्त करने के इरादे से बोलीं “कोई बात नहीं कावेरी, आज के बाद दुलहिन ऐसा कुछ नहीं करेगी | तुम जाओ हाथ मुँह साफ़ करके आ जाओ | गंगा आता ही होगा…” और बुआ अपनी जीत समझ ठुनकती हुई चली गईं नल पर और भाभी दादी के व्यवहार से दुखी होती सरोज की किताब वहीँ पलँग पर पटक चुपचाप रसोई में जा घुसीं | दादी कमरे में पलँग पर अपना सर पकड़ कर बैठ गईं | नहीं समझ पा रही थीं क्या इलाज़ करें रोज़ रोज़ के इन झगड़ों का | वे अच्छी तरह जानती थीं कि संभलवाली लायक है और सरोज को भी अपने जैसी ही लायक बनाना चाहती है | पर बुढ़ापे में अकेली पड़ जाने का भी डर था – अगर बेटा पूरी तरह से बहू की तरफ़ हो गया तो ? जानती थीं कि उनकी बेटी उनके बेटे बहू में फूट डलवाना चाहती है और सरोज और संभलवाली में सौतेलापन देखना चाहती है – ऐसा करने से शायद उसके भीतर बैठी “ननदरूपा” औरत को तसल्ली मिलती थी |

बुआ हाथ मुँह साफ़ करके आ चुकी थीं और भाई के आने का इंतज़ार कर रही थीं | शायद भाई से भाभी की जी भरके शिक़ायत करना चाहती थीं | पर जब दादी के पास आकर बैठीं तो दादी उन्हें समझाती बोलीं “देखो कावेरी जो हुआ उसे भूल जाओ | हम किसी की गलती नहीं निकालना चाहते | पर हम गंगा के घर को भी उजड़ता हुआ नहीं देखना चाहते | तो गंगा के आने पर शान्त ही रहना | हम हाथ जोड़ते हैं तुम्हारे आगे | मत भूलो कि आज जहाँ कहीं भी तुम हो गंगा की बदौलत हो | कुछ तो अहसान मानो भाई का…”

“तो माँ मैं कब इन्कार करूँ हूँ गंगा के किये धरे से ? मैं तो जान्नूँ हूँ अक गंगा ने ही हम दोनों भाई बहनों की परवरिश की | पर यो संभलवाल्ली जो सलूक करे है लल्ली के साथ वो ना देक्खा जा है मुझसे बस… और देख तो कितना डरा धमका के रक्खा है लल्ली कू अक साफ़ मुकर गई…”

“ठीक है इस बारे में भी बात कर लेंगे – पर अभी नहीं | और जब तुम कह रही हो कि सरोज संभलवाली के बस में है तो कुछ वक़्त तो दो उसे कि वो तुम्हारी बात कर सके…”

“ठीक है माँ, तेरी खात्तर मूँ सी लूँगी – पर आगे से कुछ ऐसा वैसा हुआ तो मैं चुप ना बैट्ठूँगी हाँ…” मुँह अजीब सा बनाती बुआ बोलीं |

सरोज सब कुछ देख सुन रही थी पर बुआ या दादी से कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पा रही थी | जानती थी कि अगर उसने सच बात बताने के लिये मुँह खोला तो बुआ फिर वही बात दोहराएँगी कि भाभी ने उसे डरा धमका रखा है | थोड़ी देर भाभी के पास जाने का भी साहस नहीं जुटा सकी थी | मन में अपराध बोध था कि उसकी वजह से भाभी के साथ इतनी बदसलूकी की बुआ ने | पर वो ये भी जानती थी कि भाभी निश्चित रूप से रसोई में बैठी रो रही होंगी और अगर उन्हें चुप नहीं कराया गया तो उन्हें दौरा भी पड़ सकता है | सो बुआ और दादी को वहीँ बैठा छोड़ डरती डरती रसोई में जा पहुँची | वहाँ जाकर देखा तो उसका ख़याल सही निकला | भाभी सच मैं चूल्हे के सामने ज़मीन पर घुटनों पर मुँह रखे बैठी थीं और ज़मीन पर कोयले से आड़ी तिरछी लकीरें बना रही थीं साथ ही धार धार आँसुओं से रोए चली जा रही थीं | “मुझे माफ़ नहीं करोगी भाभी…?” आँखों में आँसू भरे सरोज ने भाभी के कन्धे पर हाथ रखा तो भाभी ने आँसू पोंछते हुए उसकी तरफ़ देखा और धीरे से पूछा “कुछ चाहिए ?”

“नहीं भाभी कुछ नहीं चाहिए…” पास बैठते हुए सरोज ने जवाब दिया “बस तुम रोओ मत | मैं जानती हूँ सब कुछ मेरी वजह से ही हो रहा है | मैं हर दिन बहुत सताती हूँ न तुम्हें ? सब ठीक ही तो कहते हैं कि मैं अभागन हूँ… करमजली हूँ… तभी तो सब कुछ उल्टा पुल्टा होता रहता है |” सुबकती हुई सरोज बोली |

“मैंने ऐसा क्या कह दिया था बीवी जी से जो उन्होंने इस तरह घर सर पर उठा लिया ? मैंने कब कहा था उनसे कि घर से निकल जाएँ ?” भाभी रो रही थीं |

“तुमने ऐसा कुछ नहीं कहा भाभी | पर तुम तो जानती ही हो बुआ की आदत – बात का बतंगड़ बनाने में उन्हें मज़ा आता है | सब ठीक हो जाएगा भाभी | तुम कुछ मत सोचो…” सरोज बोल रही थी और भाभी रोना भूलकर एकटक उसकी तरफ़ देखे जा रही थीं मानों सोच रही हों कि इत्ती सी उम्र में इतनी बड़ी बड़ी बातें बनाने लगी…

सरोज ने पीछे घूमकर देखा तो दादी और बुआ दरवाज़े से सटी खड़ी सब कुछ सुनने की कोशिश कर रही थीं | तभी दरवाज़े की कुण्डी खड़की | “पिताजी…” कहती हुई सरोज दरवाज़े की तरफ़ भागी तो दादी बुआ एकदम वहाँ से हटकर कमरे में पलँग के पास जा खड़ी हुईं | सरोज ने दरवाज़े की कुण्डी खोली और “पिताजी…” बोलती पिताजी से कुछ इस तरह लिपट गई मानों सदियों की बिछड़ी हुई हो | “अच्छा अच्छा अब भीतर तो आने दो…” सरोज के सर पर हाथ फिराते पिताजी बोले और उसके हाथ में साथ लाया थैला पकड़ा दिया | सरोज थैला लेकर रसोई में भाग गई | पिताजी भीतर कमरे में पहुँचे तो बुआ को देखकर बोले “अच्छा कावेरी आई है | आज क्या नई बात सुनानी है भई…” पिताजी कुछ इस तरह बोले जैसे समझ गए हों कि आज भी बुआ कुछ तीया पाँचा करने के चक्कर में हैं | वैसे पिताजी और दादी दोनों ही बुआ की आदत से अच्छी तरह वाकिफ़ थे इसलिए कम से कम पिताजी तो उनकी बातों पर अधिक ध्यान नहीं देते थे | हाँ दादी ज़रा कच्चे कानों की थीं इसलिये उन पर ज़ोर चल जाता था बुआ का भी और चाची का भी | पिताजी ने कई बार समझाया भी था दादी को, पर दादी कुछ दिन ठीक रहकर फिर बुआ की बातों में आना शुरू कर देती थीं |

पिताजी खूँटी पर छतरी टांग कर बाहर नलके पर आ गए थे हाथ मुँह धोने | उन दिनों नजीबाबाद में टोंटी वाले नल हर घर में नहीं थे – कुछ पैसे वाले घरों में ही थे | और सरोज का घर तो था भी किराए का | हैण्डपंप भी हर किसी के बस की बात नहीं थी – क्योंकि वहाँ की ज़मीन में पत्थर बहुत थे | काफ़ी नीचे तक खुदाई करने पर भी पत्थर ही निकलते रहते थे | कई रोज़ की खुदाई के बाद काफ़ी नीचे जाकर पानी निकलता था | इस काम में मज़दूरी और समय दोनों ही बहुत लगते थे | और वो पानी भी खारा होता था जिसे नहाने धोने के काम ही लिया जा सकता था | पीने के लिये तो अधिकतर घरों में कुंए थे | जिन घरों में नहीं थे वे बाहर के कुँओं से पानी लाते थे | उनमें भी अगर सुबह सुबह चार बजे तक पानी भर लिया तो मिल गया, वरना तो लोग पानी खींच कर ले जाते थे और बाद में आने वालों के लिये नीचे की गाद ही नसीब होती थी | जिसे घरों में पकाकर फिर छानकर पिने के पानी का इंतज़ाम होता था | ऐसे मीठे पानी के कुंए थे भी बस तीन ही – एक यहाँ स्कूल के सामने, दूसरा छोटे जैन मन्दिर के बाहर, और तीसरा रण्डियों के मुहल्ले में | कुछेक घरों में और थे पर वहाँ बाहर के लोग नहीं जाते थे | बहरहाल, जीराज मुँह अँधेरे ही पीने का पानी कुंए से भरकर रख देता था और बाक़ी कामों के लिये हैण्डपंप था ही – खरे पानी का | जिसके चरों तरफ़ चबूतरी बनी हुई थी | पिताजी सुबह उसी पर बैठकर नहाते थे | भाभी, दादी और सरोज के लिये जीराज बाल्टियों में भरकर पानी रसोई में रख आता था और ये तीनों वहीँ नहाया करती थीं | तो, पिताजी नलके पर चले गए हाथ मुँह धोने और भाभी वहीँ उनके लिये ग्लास में पानी लेकर अ गईं | हर रोज़ का यही नियम था – दरवाज़े पर पिताजी की खड़काई कुण्डी की आवाज़ सुनते ही सरोज भाग कर दरवाज़ा खोलती थी | पिताजी बाहर से लाया थैला सरोज को पकड़ाते थे जिसमें बाज़ार से लाई कुछ सब्ज़ियाँ और फल वगैरा होते थे | फिर छाता कमरे की खूँटी पर टांग कर नल पर जाकर हाथ मुँह धोते थे | भाभी उन्हें वहीँ पानी देती थीं | पानी पीकर फिर सारे दिन की बातें होती थीं पिताजी और सरोज के बीच | इस बीच भाभी का खाना तैयार हो जाया करता था | फिर सब रसोई में बैठकर खाना खाते थे | बाहर से कोई आया होता था तो पिताजी उन लोगों के साथ बैठक में खाना खाते थे और जीराज रसोई और बैठक के बीच खाना खिलने के लिये दौड़ लगाता रहता था |

आज भी भाभी पिताजी के लिये पानी का ग्लास लेकर आईं | तभी बुआ पिताजी के पास आ खड़ी हुईं | पिताजी ने भाभी की तरफ़ देखा और उनकी रो रोकर सूज चुकी आँखों को देखकर उनका माथा ठनका कि आज कावेरी फिर कुछ ज़हर घोलना चाहती है | लिहाज़ा बुआ को टालते हुए सरोज को आवाज़ लगाई “अरे लाली आज दिन भर के किस्से नहीं सुनाने क्या…” और सरोज रसोई से भाग कर बाहर आई |

“अरे गंगा लल्ली और उसकी माँ से तो रोज़ ही बतियावे है | कदी कदी अपनी बहन से भी बात कर लिया कर…” उलाहना सा देती बुआ बोलीं |

“देख भई लल्ली, अगर किसी की शिक़ायत करनी है तो मैं थका हुआ हूँ | और हाँ, वैसे तेरा घर है ये, जब जी चाहे आ जब जी चाहे जा…”

“अरे भाई, भौजाई के आने के बाद क्या हक़ बहन का ?” ठण्डी साँस लेती बुआ अपनी बात पूरी करतीं कि दादी ने बीच में ही टोक दिया “कावेरी, अभी जीराज ने बताया कि हरिया के बेटा आया था | पुजारी जी ने घर बुलाया है…”

“मैं छोड़के आऊँ ? चलेगी लाली ?” पिताजी ने पूछा और हाथ मुँह धोकर चप्पल पहन कर बुआ और सरोज के साथ बाहर निकल गए | भाभी ने पीछे से आवाज़ लगाई “बीवी जी, खाना तो खाती जातीं…”

“आज जी ना है, फिर कभी…” बुआ ने जवाब दिया और जल्दी जल्दी घर से बाहर निकल गईं |

ऐसा आज पहली बार नहीं हुआ था | जबसे दादी आई थीं तब से अक्सर ही ऐसा होता था | बुआ अक्सर ही आती थीं और किसी न किसी बात पे भाभी से लड़ाई करके और दादी के कान भरकर ही वापस जाती थीं | पिताजी थक गए थे इन रोज़ रोज़ की बातों से | तभी एक दिन घर में महाभारत हो गया…

हर साल वसन्त पंचमी पर नगर के साहित्यिक और सांस्कृतिक वर्ग मिलकर नगर में सरस्वती पूजन और निराला जयन्ती का आयोजन करते थे | सरस्वती पूजा अक्सर “गुरु जी” के ही घर पर होती थी | बाद में सारा दिन सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रमों की धूम रहती थी | स्कूल में दिन में कवि गोष्ठी होती थी जिसमें भाग लेने के लिये शहर से बाहर के भी कविगण आते थे | रात को संगीत गोष्ठी होती थी | जो या तो “गुरु जी” यानि सरोज के घर या फिर स्कूल के ही हाल में होती थी | कभी कभी दो रोज़ पहले से कार्यक्रम आरम्भ हो जाते थे | दो दो दिन साहित्य संगोष्ठियों और बच्चों की प्रतियोगिताओं का आयोजन चलता रहता था | अन्तिम दिन यानी वसंत पंचमी के दिन बच्चों को पुरूस्कार देने के साथ ही कार्यक्रमों का समापन होता था | इस दिन सभी छोटे बड़े बसंती कपड़े पहनकर आया करते थे | घर घर में तीन चार दिन पहले से कपड़े रँगने शुरू कर दिये जाते थे | प्रकृति के साथ साथ मानों जन मानस भी बसंती रंग में रंग जाना चाहता था | ऐसा उमंग-उल्लास भरा वातावरण होता था कि पत्थरदिल इन्सान भी बौराया सा डोलने लग जाए |

सरोज के घर में इस दिन काफ़ी रौनक रहती थी | सुबह सरस्वती पूजा में शहर के काफ़ी लोग आते थे इसलिये पहले दिन ही बैठक की साफ़ सफ़ाई करवाके क़ालीन और जाजम बिछा दी जाती थीं | चारों तरफ़ मसनदें लगवा दी जाया करती थीं | घर को पीले फूलों से सजाया जाता था | आँगन में पूजा के लिये वेदी बनाई जाती थी | पूजा का सारा सामान इकठ्ठा किया जाता था | और इस सारे कार्य में पिताजी को बस दिशा निर्देश देना होता था – बाक़ी का सारा काम तो जीराज के साथ मिलकर पिताजी के शिष्य भाग भाग कर बड़े उत्साह से किया करते थे | भाभी भी पहले दिन से ही प्रसाद की तैयारी में लग जाया करती थीं | चावल बीन चुनकर साफ़ करती थीं | बादाम भिगाकर और छीलकर उनका लच्छा काटती थीं | दूसरे मेवे भी इसी तरह तैयार करती थीं | सुबह सुबह चावल चढ़ा दिया करती थीं | डेढ़ दो सौ आदमियों के लिये केसर वाले मीठे पीले चावलों का प्रसाद बनाया जाता था | हर किसी को भाभी के हाथ के ये चावल बहुत भाते थे | वाकई बेहद स्वाद होते थे | आज भी सरोज याद करती है तो मुँह में पानी आने लगता है | इतने सारे चावलों को बनाने के लिये हरिया ताऊ जी के यहाँ से दुकान के भगौने और बड़ी कढ़ाही मँगाई जाती थी | भाभी चावल तैयार करके सब्ज़ी पूरी भी बना लेती थीं | बुआ और रस्तोगी डाक्टर की बेटी कृष्णा भाभी का हाथ बँटाने आ जाया करती थीं | उधर बाहर के लोग आने शुरू हो जाते थे | पिताजी सबके साथ सरस्वती पूजा करते थे | गा गाकर मंत्रोच्चार करते थे तो जैसे सारा वातावरण गुंजायमान हो जाता था | पूजा समाप्त हो जाने के बाद पत्तलें लगा दी जाती थीं और सबको चावल के प्रसाद के साथ साथ सब्ज़ी पूरी भी खाने के लिये दी जाया करती थीं | दोपहर एक बजे तक ये आयोजन पूर्ण हो जाता था | उसके बाद स्कूल जाने का समय हो जाया करता था | वहाँ कवि गोष्ठी का आयोजन जो होता था | शाम तक वही सब चलता था | रात को संगीत गोष्ठी होती थी जो सारी रात चला करती थी | भाभी बुआ और कृष्णा के साथ रात भर चूल्हे पर चाय चढ़ाकर रखती थीं | एक हफ्ते पहले ही लड्डू मठरी बना कर रख दिया करती थीं जो आज की रात चाय के साथ मेहमानों को दिये जाते थे | शहर के सभी ख़ासो आम वहाँ आते थे | सुबह छः बजे तक गोष्ठी संपन्न होती थी और सब अपने अपने घरों को लौट जाते थे आज के दिन भर के कार्यक्रमों की खुमारी आँखों में लिये और अगले दिन की अच्छी शुरुआत करने | सरोज इस दिन वसंती लहँगा या सलवार कुरता पहने सजी धजी सहेलियों के साथ मस्ती मारती घूमती थी | आज वो खुद को किसी राजकुमारी से कम न समझती थी | आखिर को सारे कार्यक्रमों के कर्ता धर्ता उसके पिताजी और भाभी जो होते थे |

इस बार भी कुछ बड़ा कार्यक्रम ही आयोजित हुआ था | तीन दिन तक प्रतियोगिताएँ चली थीं – वाद विवाद प्रतियोगिता, काव्यपाठ प्रतियोगिता, लेखन प्रतियोगिता वगैरा वगैरा | और इन सबके आयोजन में पिताजी का पूरा साथ दिया था भाभी ने | पिताजी ने बुआ को घर बुला लिया था घर सँभालने के लिये तीन दिन | दादी भी थीं ही | सरोज भाभी की ही पूँछ बनी घूमती रही थी | बस यही बात बुआ के भीतर बैठी नागिन को रास नहीं आ रही थी | बसंत का काम तो राज़ी खुशी हो गया | बुआ को पिताजी ने और एक दो दिन के लिये रोक लिया | उन एक दो दिनों में भाभी ने पिछले तीन दिनों की सारी कोर कसर पूरी कर दी थी | मन लगाकर बुआ की सेवा की थी | बुआ भी भाभी के हाथ के बनाए पकवान खाकर तारीफ़ें करती नहीं अघा रही थीं | ये सब देखकर न जाने क्यों सरोज को लग रहा था कि ज़रूर कुछ न कुछ अशुभ घटने वाला है | क्योंकि बुआ बिना किसी कारण तो तारीफ़ करती नहीं किसी की | और उसकी ये आशंका सही निकली |

बुआ चलने लगीं तो भाभी ने नई ज़री की साड़ी बुआ को भेंट दी | फूफा जी और हरिओम के लिये भी कपड़े दिये | सारा सामान लेकर बुआ ने “सौभाग्यवती रह, दूधों नहाए पूतों फले…” के आशीर्वचनों से भाभी को नहलाया, पर साथ ही अपनी बोली बोलना नहीं भूलीं “मेरी मान संभलवाल्ली, तेरे भले की ही कहूँ हूँ | देख कभी कभी तुझे कुछ बुरा भला कह बैठूँ हूँ तो उसका बुरा ना माना कर | क्या करूँ मरी मेरी जीभ है ही काली | बार बार सोच्चूँ हूँ अक ऐसा वैसा कुछ ना करूँ – फिर ना जाने क्यों मेरी मति मारी जा है | मेरी बात्तों कू दिल से मत ना लगाया कर | मैं तो बस योई चाहूँ हूँ अक इस घर के भाग खुल जावें…”

“इस घर के भाग तो खुले हुए ही हैं बीवी जी | आपके भाई का काम ठीक चल रहा है | माता जी भी हमारे साथ हैं तो इनकी तरफ़ से भी बेफ़िक्री है | सरोज भी कुछ कुछ मन लगाने लगी है पढ़ने में | आठवीं में आ ही गई है | अब बस आपका आशीर्वाद रहा तो सब ठीक ही रहेगा…” कार्यक्रमों से मिली सफलता से भाभी खुश थीं और उनकी ये खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी |

“तू तो समझना ही ना चावे है | देख मेरा वो मतलब नहीं हा | मैं तो यो कहना चाहूँ हूँ अक तेरे कोई लड़का बाला हो जावे तो पितरों कू मुक्ति मिल जावेगी…”

“अब ये तो बीवी जी अपने हाथ में थोड़े ही है | भाग्य में होता तो विनोद ही क्यों जाता…” दुखी स्वर में भाभी ने जवाब दिया |

“हे… भाग की बात करे है…” कलपती हुई बुआ बोलीं “तू रेवेगी निरी बेवकूफ़ की बेवकूफ़ ही | पढ़ाई लिखाई की समझ तुझे है, पर दुनियादारी की ना है | अरी विनोद भाग की खात्तर ना गया | वो गया इस अभाग्ग्न सरोज की खात्तर जिसे तू हर बखत अपने सीने से लगाओ फिरे जा है…”

“बीवी जी…” बुआ की बात समझती हुई भाभी का स्वर सख्त हो चला था “देखो आज आखरी बार कह रही हूँ सरोज के बारे में फिर कभी ऐसी बात मत बोलना | अब अगर विनोद नहीं रहा तो उस बेचारी का क्या कसूर ? आपको पता है बच्चे के दिल पर कितना बुरा असर पड़ता है इस तरह की बातों का ? हीन भावना भर जाती है बच्चे के दिल में…?”

“हमारा क्या भाई, हमारा फरज तो है तुझे समझाना | भाई के घर की बरबादी ना देक्खी जा है हमसे इसी खात्तर कह दें हैं हम भी कुछ | वरना हमें क्या… डूब मारो चाहे कुंए में…”

“मैं रसोई में जा रही हूँ बीवी जी, काम है मुझे…” बुआ की बात टालने की गरज़ से भाभी ने कहा तो बुआ जैसे शूर्पणखा बन बैठीं और चीख़ चीख़ कर बोलना शुरूकर दिया “अरी हमें क्या, हम हैं ही कौन इस घर के ? पराए हो गए हम तो भाइयों की बीवियाँ आने के बाद से…” और अ जाने क्या क्या बुआ बोले चली जा रही थीं | फूफा जी बुआ को लिवा ले जाने आए हुए थे | शोर सुनकर बैठक में से फूफा जी, दादी और पिताजी के साथ सरोज भी दौड़ी दौड़ी भीतर के कमरे में आ गई थी | सबने देखा कि भाभी हक्की बक्की खड़ी थीं | सरोज और पिताजी समझ गए थे कि आज फिर बुआ कुछ ऐसा वैसा करने वाली थीं | सरोज तो जैसे भाभी का रक्षा कवच बनकर उनके पास चिपक कर खड़ी हो गई थी | पिताजी ने बुआ को ठण्डा करते हुए कहा “शान्त हो जा लल्ली, क्या बात है मुझे बता | देख ज़रा ज़रा सी बात का बतंगड़ नहीं बनाया करते | शान्त होके बता क्या बात है…”

“अजी पंडत जी आप हटो | इसके रात दिन के ड्रामे मैं अच्छी तरह जानूँ हूँ | इतने बरसों से झेल रहा हूँ इसे | आप हटो, मैं देखता हूँ…” और आगे बढ़कर ज़ोर से बुआ का हाथ मरोड़ते हुए फूफा जी बोले “बोल क्या नाटक है ? चल घर अभी | सीधी सीधी चलती है घर या लगाऊँ एक ?” और जबरदस्ती बुआ को अपने साथ लिवा ले गए | पिताजी और दादी ने रोकना भी चाहा पर वे रुके नहीं |

बुआ तो चली गईं पर दादी को बुआ का इस तरह क्लेश में जाना बहुत अखरा | चढ़ बैठीं राशन पानी लेकर भाभी पर “सब संभल वाली का ही किया धारा है | न जाने क्या कह दिया उस बेचारी को कि ऐसे क्लेश में गई है…” भाभी अपनी सफ़ाई में कुछ बोलन चाहतीं कि दादी उन्हें चुप कराके कुछ न कुछ उल्टा सीधा बोलना शुरू कर देती थीं | ख़ूब रोना धोना हुआ | पिताजी भी दादी को तो कुछ कह नहीं सकते थे – सारा गुस्सा भाभी पर ही उतरा – लात घूसों की वो बौछारें हुईं कि कई रोज़ तक भाभी बिस्तर से न उठ सकीं | वो तो सरोज भाभी के ऊपर गिर पड़ी थी उन्हें बचाने के लिये वरना तो शायद पिताजी उनकी जान ही ले लेते | पिताजी की आँखों में उस दिन खून उतरा हुआ था | उनका वो रूप देखकर दादी चुप हो गई थीं और अपने कमरे में जा बैठी थीं | तब बाप बेटी को होश आया था कि भाभी बेहोश पड़ी थीं | हमेशा की तरह सारा बदन अकड़ा हुआ था उनका और मुँह से झाग निकल रहे थे | घबराकर सरोज ने रोना शुरू कर दिया | पिताजी ने उसे चुप कराया और भाभी को उठाकर पलँग पर डाला | सरोज रसोई में से पानी ले आई | जैसे तैसे भाभी का जबाड़ा खोलकर पानी डालने की कोशिश की सरोज की मदद से | भाभी होश में आईं तो फफक फफक कर रो रही थीं और पिताजी उन्हें बाँहों में जकड़े हुए उनसे माफ़ी माँग रहे थे |

अगले कुछ दिन भाभी और सरोज स्कूल नहीं जा पाए थे | भाभी की चोटों की सिकाई और दवा दारू में लगे रहे | दोनों बाप बेटी मिलकर खाना बनाते थे | दादी और पिताजी में बोल चाल बन्द थी | दादी भी इस सबसे तंग आकर खाना खाकर टखनों तक की चादर ओढ़कर बुआ के घर चली जाती थीं | फिर रात को फूफा जी उन्हें छोड़ने आते थे और काफ़ी देर तक घर में शान्ति बनाए रखने की नसीहत देकर वापस चले जाते थे | इन दिनों घर आने जाने वालों को भी जीराज अक्सर बाहर से ही लौटा देता था | कुछ लोग जो पिताजी के ख़ास थे जैसे महेंदरसिंह और डाक्टर साहब वगैरा घर के भीतर आते थे और पिताजी को नसीहतें देते थे कि क्यों अपनी माँ बहन की झूठी सच्ची बातों में आकर अपना घर बर्बाद करते हो ? उनके सामने पिताजी हताश से बोलते थे “क्या करें कुछ समझ नहीं आता | हमारे साथ तो हमेशा से यही रहा | यही हरयाने वाली के साथ हुआ और यही अब संभल वाली के साथ…” आखिर एक दिन जब फूफा जी दादी को छोड़ने आए तो साफ़ साफ़ कह दिया कि अगर अपने बेटे के घर में बेटी के साथ मिलकर ऐसी ही आग लगनी थी तो दूसरी शादी क्यों की थी उसकी ? इतना सुनना था कि दादी भड़क उठीं “आप क्या समझते हैं पुजारी जी हम आपके घर लाली के साथ मिलकर कोई षड्यंत्र रचाने जाते हैं | अरे चले जाते हैं दिल बहलाने के लिये कुछ देर को | आपको बुरा लगता है तो हम नहीं आएँगे आगे से | हमारा गंगा और संभल वाली अभी ज़िंदा हैं हमारी देखभाल के लिये…” और फूफा जी पिताजी की तरफ़ अर्थपूर्ण मुस्कुराहट से मुस्कुरा दिये थे | भाभी वैसे ही बिस्तर पर मानों सारी दुनिया से विरक्त हुई पड़ी थीं | दादी भाभी के पलँग पर जाकर बैठ गईं और उनके सर पर हाथ फिराती बोलने लगीं “अब तुमसे अच्छी दुलहिन और कहाँ मिलती हमें ? देखो ये तीनों बच्चे ज़रा ज़रा से थे जब दरोगा जी चल बसे थे | उस घटना ने हमें बहुत सदमा पहुँचाया था | तभी तो हमें कुछ पता ही नहीं लगता कि हम क्या बोल रहे हैं | हमारी बातों का बुरा मत माना करो दुलहिन | हम क्या नहीं जानते कि तुम लाली के भले के लिये ही कहती हो ? तुम खुद भी पढ़ी लिखी हो, बेटी को भी पढ़ाना चाहती हो – हम भी तो यही चाहते हैं | तुम भी इस बार मध्यमा में बैठोगी | लाली के नम्बर भी तुम्हारे ही कारण आठवीं में अच्छे आए हैं | हमें माफ़ कर दो दुलहिन…” भाभी इतने गहरे सदमे में थीं कि दादी से लिपट कर फिर से फूट फूट कर रो रही पड़ीं | दादी की आँखों में भी आँसू आ गए थे | फिर फूफा जी से बोलीं “पुजारी जी, कावेरी को यहाँ मत आने दिया कीजिये | देखिये हमारी बातों को गलत मत समझियेगा, पर जब भी वो यहाँ आती है या धनिया से मिलती है तो कुछ न कुछ आग लगाने की ही बात करती है | गलती हमारी भी है – हमें रोकना चाहिये इस सबको, पर हम नहीं रोक पाते, उल्टा बह जाते हैं इस सब में…” दादी कहीं खोई खोई कुछ कुछ बोल रही थीं और भाभी का सर सहला रही थीं | उनकी आँखों में भर आए पानी से उनकी भूरी बिल्ली जैसी आँखें और भी सुन्दर लग रही थीं | पिताजी भी शायद संतोष की साँस ले रहे थे कि चलो माँ को कुछ समझ तो आया | और फूफा जी तो चाहते ही यही थे…

ज़िंदगी की गाड़ी कुछ दिन बाद एक बार फिर से पटरी पर आ गई थी | सरोज फिर से चहकने लगी थी | पिताजी की महफ़िलें फिर से शुरू हो गई थीं | दादी ने फिर से चबूतरे पर चारपाई डलवाकर मुहल्ले की औरतों और बच्चों के साथ बतियाना शुरू कर दिया था और भाभी की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिये थे | और भाभी – वो एक बार फिर से उसी तरह रसोई – बैठक – चबूतरा और कमरे के बीच कुछ न कुछ करती डोलने लगी थीं | सरोज की वानर सेना ने फिर से घर में आना जाना शुरू कर दिया था | सरोज ने फिर से भाभी की साड़ियाँ बाक्स में से निकाल निकाल कर ट्राई करनी शुरू कर दी थीं | भाभी ने फिर से सरोज को पढ़ाने की पुरज़ोर कोशिशें शुरू कर दी थीं – और अब शायद उसका मन भी कुछ कुछ लगने लगा था पढ़ाई में…

ऐसा सब चलता रहता था तो सरोज को अपना घर स्वर्ग से भी बढ़कर लगता था…

क्रमशः………….

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