सौभाग्यवती भव – अध्याय पन्द्रह

पन्द्रह – जवान होती सरोज और भाभी

चुलबुली सरोज न जाने किन किन कल्पनाओं के पंख लगाती खुले आकाश में उड़ी चली जा रही थी – सारी दुनिया से बेखबर – हाँ इतना ज़रूर था कि उसकी दुनिया में उसके अलावा बस तीन लोगों की ही जगह और थी – सबसे पहले पिताजी, फिर दादी और फिर भाभी | भाभी…? हाँ भाभी… सरोज को शायद समझ आ चुका था कि घर को अगर बाँधे रखना है तो भाभी के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता… दादी चली भी जाएँ तो भी भाभी के बिना घर अधूरा ही रहेगा…

“अरी बड़ी गर्मी है री आज तो हेमा…” बड़ी बहू सरोज को सरोज ने आवाज़ लगाई “बिजली ना आ रई क्या ?” थोड़ी नींद ले चुकी सरोज ने हेमा से पूछा |

“अभी धनीराम गया है जेनरेटर चलाने…” किसी के ब्लाउज़ पर तुरपाई करती हेमा ने जवाब दिया |

“अभी फोन किसका था…?”

“नीलम मौसी का था | कल आ रही हैं | बता रही थीं कि धामपुर आई हुई हैं तो नानी को साथ लेके आवेंगी…” दाँत से तुरपाई का धागा काटती हेमा ने जवाब दिया |

“ये ब्लाउज़ वो अरुणा वाला है क्या…?”

“हाँ अम्मा…”

“अरी मत ना किया कर उसका काम | मरी ना तो, लूटने में लगी है | वो राय की बीवी बता रई थी कि बीस रूपये लेवे है | पर तुझे क्या दे है… बस दस रूपये ही न ? पूछ तो उससे ज़रा किसी रोज़ कि किस बात के रखे है दस रूपये ? मेहनत सारी करे तू और आधा पैसा खा जावे वो | अरे भगवान सब देख रहा है ऊपर बैठा | विद्यावती बहन जी का कितना कितना किया था पिताजी ने – सब कुछ पता है अरुणा को | ये सिला दे रही है उस सबका ?” बदन के दर्द से थोड़ा कराहती सरोज बोली |

“अम्मा तुम इस सबकी फिकर मत ना किया करो | तुम तो बस दुआ करती रहो कि ये दोनों छूट के आ जावें, फिर हमें क्या ज़रूरत पड़ी किसी का अहसान लेने की ? पर अभी तो अरुणा काम लाके दे रही है तो हम कह भी क्या सकते हैं उससे ?”

“हाँ सो भी ठीक है… चल कल आ ही रही है नीलम… देखो क्या खबर लावेगी…” हेमा की तरफ़ सहानुभूति की नज़रों से देखती सरोज बोली | सोचने लगी सरोज “जिस दिन से ब्याह के आई एक दिन भी चैन ना नसीब हुआ हेमा को तो | ब्याह के तीन महीने पीछे मेरी पैरों की हड्डियाँ टूट गई थीं – मेरठ में यो ही लगी रहवे ही मेरे सारे काम काज में | नई नवेली बहू की सारी उमंगों पे पानी फिर गया था | दो बरस लगी रही मेरी सेवा में | पप्पू तो नौकरी पे था मसूरी – इसी ने किया सब | हाँ बाद के कुछ दिन मसूरी में अच्छे गुज़रे इनके | पर पता ना कहाँ से उस मरे ने केस खुलवा दिया दुबारा | वरना तो ठीक ठाक चल ही रहा था सब कुछ | पप्पू भी आज मैनेजर होता | रग्घू मैनेजर था ही पेपर मिल में | वैसे पिताजी ने तो शादी के वक़्त ही समझाया था कि जब तक केस के बरी हो जाने के कागज़ हाथ में न आ जाएँ शादी मत करो – मेरी ही अकल मारी गई थी – वही हमेशा की तरह सोच लिया कि भाभी ने सिखाया होगा पिताजी को… क्यों समझती हूँ भाभी को हमेशा सौतेला ही…?”

“अम्मा लो चाय पी लो… ये क्या… रो रही थीं…? कितनी बार समझाया कि ऐसे मत किया करो… तुम ही ऐसा करोगी तो हमें कौन देखेगा…?” सरोज को तब पता लगा कि सोचते सोचते उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे | उसे पता भी नहीं लगा तुरपाई बीच में ही छोड़के कब में हेमा रसोई में जाके चाय बना लाई थी और साथ में कल की बासी पूरियों का हलवा “ये कब बनाया तूने ?” सरोज ने पूछा तो हेमा ने जवाब दिया “मिनी को भूख लग आई थी पढ़ते पढ़ते तो सोचा ज़रा सा हलवा ही बना दूँ…” और सरोज को पीछे से सहारा देकर थोड़ा सा बैठाकर एक चम्मच सरोज के मुँह में डालकर पूछा “ठीक बना…?”

“हाँ बहुत बढ़िया…” हलवा खाती सरोज ने जवाब दिया “पर जो हलवा भाभी बनाती थीं उसका जवाब नहीं था | रस था भाभी के हाथों में | हम भी मरे कभी ना बना पाए वैसा कुछ | कोशिश भी ना की कभी | भाभी ने कितना कितना सर मारा सब कुछ सिखाने का पर मैं… यहाँ इतने नौकर चाकर थे कि कभी फली भी ना फोड़ी उनके सामने… क्या पता था कभी ये दिन भी देखने मिलेंगे…” और फिर खाती खाती खो गई…

“लाली, फिर वाही…? चलो पहले वो गणित के सवाल पूरे करो, इतनी देर में मैं हलवा बना कर लाती हूँ | पूरी का हलवा खाएगी…?” सरोज के कानों में आज भी भाभी की वो आवाज़ गूँज रही थी |

“पूरी का हलवा…?” घेर वाली फ्राक सँभालती हुई सरोज ने लालच में होठों पर जीभ फिराई और मानों हलवे का स्वाद मुँह में भरती बोली “ठीक है भाभी तुम हलवा बनाकर लाओ, में तब तक पूरे करती हूँ ये सवाल…”

सरोज के बस बीजगणित के तीन सवाल बाक़ी बचे थे | इतनी देर में भाभी हलवा और ठण्डाई बनाकर लाईं इतनी देर में सरोज ने सवाल पूरे कर लिये और फिर मस्ती में भरकर फ्राक को गोल गोल घुमाकर नूरजहाँ की फिल्म का गीत गाकर नाचना शुरू कर दिया “उड़नखटोले में उड़ जाऊँ तेरे हाथ ना आऊँ…” नाचने गाने में उसे पता ही नहीं लगा कि कब में भाभी उसे नाचती देखकर दादी को उनके कमरे से बुला लाई थीं और दोनों सास बहू जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखती सरोज का ये अल्हड़पना देख देख कर धीमे धीमे मुस्कुरा रही थीं | अचानक नाचती नाचती पीछे घूमी तो दादी और भाभी को मुस्कुराते देख झेंप गई | पर भाभी के हाथ में हलवे की कटोरियों और ठण्डाई के ग्लासों का थाल देखकर पल भर में उसकी झेंप गायब हो गई और हलवा खाने के लिये वहीँ फ़र्श पर बैठ गई | लाल लाहौरी ईंटों का फ़र्श था | आज जैसी ही गर्मी थी उस दिन भी – पर तब घर में बिजली कहाँ थी | बिजली तो आई है नीलम के भी पैदा होने के बाद – वो भी उसकी ससुराल में – पिताजी के घर तो जब नीलम नौवीं में थी तब लगी थी बिजली बुआ वाले घर में | उस समय तो हाथ के पंखों से हवा की जाती थी | बाज़ार से पंखे लाकर उन पर रंग बिरंगे कपड़ों की झालर बनाकर सी दिया करती थीं भाभी – जिससे वो पंखे हवा भी अच्छी देते थे और लगते भी ख़ूबसूरत थे |

भाभी ने थाल नीचे फ़र्श पर ही रख दिया और तीनों बैठ गईं वहीँ नीचे बोरी पर | वैसे वो लाहौरी ईंटों का फ़र्श भी किसी कारीगर ने बड़ी ख़ूबसूरती से बनाया था – उसके खानों में कंकड़ फेंक फेंक कर सरोज अपने दोस्तों के साथ पाटिक्का खेला करती थी | ईंटों का होते हुए भी चिकना था | गर्मियों में तो अक्सर दादी पोती और भाभी नीचे ही बैठी रहा करती थीं | भाभी सरोज की पढ़ाई लिखाई पूरी करवा के और अपना लिखना पढ़ना पूरा करके कोई काम लेकर बैठ जाती थीं और ये दादी पोती अपनी मस्ती में लग जाया करती थीं | भाभी बीच में इन्हें देखकर मुस्कुरा लेती थीं और फिर अपने काम में लग जाती थीं | एक बात अच्छी हो गो थी आजकल – बुआ का आना काफ़ी कम हो गया था | उनके भी हरिओम पैदा हो चुका था और वे उसके कामों में लग गई थीं |

भाभी ने सरोज की गणित की कापी उठाकर देखा – काफ़ी सारी गलतियाँ थीं सवालों में | सरोज हल्वा खा चुकी तो पूछा “गुटल के घर जाऊँ…?”

“पहले इधर आ… ये क्या किया…?” गलतियाँ दिखाती भाभी बोलीं “पहले इसे सही कर… ये ऐसे होगा…” और सरोज का हाथ पकड़ कर नीचे वापस बैठाकर उसे समझाने लगीं | अब सरोज के सर में खुजली शुरू हो चुकी थी | तब दादी बोलीं “दुलहिन अब बस भी करो… थोड़ी देर को जाने दो… वापस आएगी तब करा देना…” भाभी को शायद अपना कुछ काम याद अ गया था तो सरोज को जाने दिया “ठीक है जाओ… पर देखो चार बजे से पहले आ जाना वापस…”

“ठीक है…” बाहर भागती भागती सरोज ने जवाब दिया और भाभी न जाने कैसी नज़रों से सरोज को देखने लगी थीं | शायद सोच रही थीं कि अब इसके बदन के उठान शुरू हो चुके हैं किसी का भी ईमान फिसलाने के लिये… कुछ करना होगा सब कुछ सही सलामत रखने के लिये…”

हर रात की तरह उस रात भी खाने से निबट कर सरोज छत पर चारपाई पर लेटी लेटी तारों को गिन रही थी और साथ ही सप्तऋषिमण्डल में अरुन्धती खोज खोज कर खुश हो रही थी | उन दिनों गर्मियों में सब लोग अपने अपने घरों की छतों पर सोया करते थे चारपाइयाँ बिछाकर | इन के घर भी जीराज शाम को धूप ढल जाने पर छत पर पानी का अच्छे से छिड़काव करता था | फिर इधर दोनों कमरों और रसोई की छतों पर दादी, पिताजी, सरोज और भाभी की चारपाइयाँ लगा दी जाती थीं और बैठक की छत पर जीराज अपनी चारपाई डाल लेता था | चारपाइयों पर दरी और भाभी के हाथों की कढ़ाई वाली चादरें बिछा दी जाती थीं | रात को दादी सबसे पहले खाना खाकर अपना पंखा और पानदान लेकर छत पर पहुँच जाती थीं और चारपाई पर पानदान खोलकर अपने और भाभी के लिये पान बनाती थीं | कभी कभी सरोज को भी मिल जाया करता था | पिताजी सरोज और भाभी बाद में खाना खाते थे | पिताजी खाने के बाद अपनी मित्र मण्डली में चले जाते थे और भाभी नीचे बाक़ी के काम निबटाने को रुक जाती थीं | जब मित्र मण्डली घर पर आती थी तो भाभी सबके खाने पीने के काम में लग जाती थीं | बाद में पिताजी सबके साथ बाहर जाते थे और हरिया ताऊ जी की दुकान पर कढ़ाही का दूध पीते पीते दोस्तों के साथ दुनिया भर की राजनीति और साहित्य चर्चाएँ करने के बाद घर वापस आते थे | इस बीच भाभी ऊपर आकर सबके सोने का इंतज़ाम देखती थीं और दादी से पान लेकर खाती थीं | सरोज कप दादी तो पान खाती अच्छी लगती थीं – गोरा रंग उस पर बिल्ली आँखों वाली दादी मुँह में पान रखकर किसी अप्सरा जैसी लगती थीं | पर भाभी अच्छी नहीं लगती थीं | पर सरोज को अब आदत हो चुकी थी उन्हें पान चबाते देखने की | ये सब देखती देखती सरोज तारे गिनती गिनती और उन तारों में अपना एक आलिशान बंगला बनाती कब सपनों की दुनिया में पहुँच जाती थी पता ही नहीं चलता था | सुबह जब भाभी झकझोर कर उठाती थीं स्कूल के लिये तब ही उसकी आँख खुलती थी | और तब उसे बस यही याद रहता था कि कोई राजकुमार घोड़े पर सवार होकर आया था रात को और उसे अपने घोड़े पर बैठाकर किसी ऐसी जगह ले गया था जहाँ चारों तरफ़ तरह तरह के रंग बिरंगे ख़ूबसूरत फूल खिले थे और जिनकी खुशबू से सरोज का तन मन महका महका जाता था | जहाँ रंग बिरंगी मस्त तितलियाँ उसे अपने साथ नाचने का निमंत्रण देती थीं | सरोज उस फुलवारी में उन मस्त तितलियों के साथ न जाने कितनी देर तक नाचती गाती इठलाती फिरती रहती थी और वो ख़ूबसूरत राजकुमार सरोज का वो मदमस्त और अल्हड़ रूप एकटक निहारता रहता था – मानों आँखों आँखों में ही उस रूप को पी जाना चाहता हो | वहाँ से वापस तभी आती थी जब भाभी उसे वापस बुलाती थीं | सारा दिन सरोज सोचती रहती थी कि कहाँ होगी वो फुलवारी, वो मस्त तितलियाँ और वो राजकुमार… फिर रात को तारे गिनते गिनते सोचने लगती कि इन्हीं तारों में से कोई है वो राजकुमार – शायद वो सबसे चमकीला सफ़ेद तारा… और शायद वे छोटे छोटे टिमटिमाते तारे वो तितलियाँ हैं… उनके चरों तरफ़ की रौशनी का जो घेरा है वही शायद वो फुलवारी है… और यही सब सोचते सोचते नींद आ जाती थी और फिर पहुँच जाती थी उसी सपनों की दुनिया में…

“भाभी…” एक रात पिताजी का इंतज़ार करते हुए भाभी के पास लेटी लेटी सरोज ने पूछा “तुम्हें पता है कहीं पे एक ऐसी जगह है जहाँ ढेर सारे रंग बिरंगे फूल खिले रहते हैं हर वक़्त… भीनी भीनी खुशबू आती रहती है… रंग बिरंगी तितलियाँ चारों तरफ़ नाचती रहती हैं… तुम गई हो कभी वहाँ…?”

भाभी कुछ समझ पाईं या नहीं, पर एक ठण्डी आह भरकर इतना ज़रूर बोलीं “मेरी तो फुलवारी तुझसे है लाली… इस घर के सिवा और कहाँ जा सकती हूँ में…?”

“आपको जाना है क्या लाली…?” गालों में गड्ढे डालती अर्थपूर्ण मुस्कुराहट लिये दादी ने पूछा और भाभी और दादी दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं | सरोज कुछ समझ ना सकी और खिसिया कर रह गई | फिर से अरुन्धती को देखना शुरू कर दिया | न जाने उस दिन क्या हुआ की थोड़ी देर भाभी सरोज को एकटक देखती रहीं | फिर नीचे गईं और हाथ में एक शीशी और अँगोछा लेकर ऊपर आईं “लाली, लो इसकी मालिश करो मुँह पर और फिर अँगोछे से पोंछ लो…” सरोज को शीशी और अँगोछा पकड़ाती भाभी बोलीं |

“क्या है इसमें…?”

“अरे कुछ नहीं, बस ज़रा सा शहद, गुलाबजल और नींबू का रस…”

“पर क्यों लगवा रही हो ? सारा चिप चिप करेगा…”

“कुछ चिप चिप नहीं करेगा | अच्छे से मालिश करके फिर इस अँगोछे से रगड़ कर पोंछ लेना बस | चलो अब लगा लो जल्दी से और सो जाओ | सुबह स्कूल जाना है…”

“भाभी…” सरोज ने चमलाते हुए वो लोशन लगाने से इन्कार करना चाहा पर भाभी ने बीच में ही टोक दिया “सारा सारा दिन घर से बाहर धूप और धूल धानी में खेलती रहती हो | सारा रंग ख़राब हो जाएगा मिट्टी बैठ जाएगी तो | चलो लगा लो जल्दी से | और देख कल से नीचे से ही लगाकर आना समझी…”

हाँ सारा सारा दिन शैतानियों के अलावा और काम ही क्या था सरोज को ? आज भी अपनी शैतानियों की सोच सोच कर हँसती है और मिनी को बड़े मज़े से वो किस्से सुनाती है | याद है उसे बगल वाले मकान में वो मास्टर जी आके रहे थे किराए पर | उनका साला था अभय | पिताजी के ही स्कूल में पढ़ता था | देखने भालने में अच्छा सुन्दर था पर लड़कियों से ज़रा शरमाता था | बस, सरोज और उसकी सारी भूतनियाँ भाभी से छिपकर जा चढ़तीं छत पर | अभय के कमरे की खिड़की इन्हीं की छत पर खुला करती थी | वो भी शायद इंतज़ार में रहता था इन लोगों की | उसकी खिड़की के सामने पहुँच कर नसीमबानो या नूरजहाँ की फिल्मों के गीत ज़ोर ज़ोर से गाने शुरू कर देतीं | वो खिड़की में ही बैठकर पढ़ाई करता था | पढ़ता क्या था, असल में तो इन लोगों की छेड़खानियों का मज़ा लेने आता था | ये लोग गीत गातीं उसे सुना सुनाकर, डाँस करतीं उसे दिखा दिखाकर, और जब वो क़िताब थोड़ी सी सरकाकर उधर देखता तो सरोज आँखें भेंगी करके और जीभ बाहर निकाल कर उसे मुँह चिढ़ाकर सारी सहेलियों को साथ ले नीचे उतर आती | कभी ये लोग प्लास्टिक का बिच्छू या साँप उसकी खिड़की से भीतर फेंक देते | वो पहले तो घबराया | पर जब नीचे से चिमटा लाकर उन्हें उठाने चला तो गुस्सा आया और इन लोगों की तरफ़ देखकर बन्दर का सा मुँह बनाकर बन्दर जैसी आवाज़ निकाल कर चिल्लाया ज़ोर से | ये लोग ताबड़ तोड़ नीचे भागीं, कहीं इसकी बहन न आ जाएँ छत पर | फिर एक दिन बदला लेने के लिये जा पहुँचा दोनों स्कूलों के बीच में बने गेट से निकल कर सरोज के स्कूल कि साइंस के किसी प्रयोग के लिये वहाँ से पत्ते तोड़ने हैं | सरोज सामने खड़ी फिर से उसे चिढ़ा रही थी | किसी पेड़ का पत्ता तोड़ उसका दूध निकाल कर मल दिया सरोज के हाथ पर जबरदस्ती | उसी दिन जाकर भाभी से बोली “भाभी वो मास्टर जी भी रहते हैं पड़ोस में, कभी उनकी वाइफ़ को भी बुला लिया करो न…” और भाभी के “ठीक है…” बोलते ही भागी गई अभय के घर | उसकी बहन घर पर नहीं थी | वही मिला तो समझा फिर कुछ गड़बड़ करने आई है | और उसकी लम्बी मोटी चोटी पकड़ कर बोला “सरोज की बच्ची, गुरु जी की वजह से चुप हूँ | अब कोई शैतानी की तो और भी लम्बी कर दूँगा तेरी ये चोटी…”

सरोज तुरंत कान पकड़ कर बोली “ठीक है बाबा अब नहीं करूँगी | पर पहले मेरी चोटी तो छोड़ो…” और तब सरोज का ख़ूबसूरत मुखड़ा वो भी बस देखता ही रहा गया था | बगल में दूसरा मकान बन रहा था | वहाँ से बजरी मुट्ठी में छिपाकर लाई थी सरोज | अभय के चोटी छोड़ते ही डाल दी उसकी शर्ट के भीतर | अब शर्ट के भीतर हाथ डालकर बजरी बाहर निकालने की कोशिश करता अभय पीछे पीछे “रुक जा भूतनी अभी बताता हूँ…” और उसे मुँह चिढ़ाती सरोज आगे आगे “क्यों लगाया था वो दूध मेरे हाथ पे ? पता है कितनी खुजली हुई थी ?” और अभय एक बार फिर सरोज के रूप को पीता रहा था आँखों से | बाद में तो दोनों की अच्छी ख़ासी दोस्ती हो गई थी | मन ही मन वो शायद चाहने भी लगा था सरोज को…

इसी तरह वो अनिल – जो ज़रा ज़रा सी बात पर सरोज की चोटी खींचने को दौड़ता था | अपने स्कूल के उसी बीच के गेट से आ जाता था चोरी छिपे लड़कियों को छेड़ने | सरोज शिक़ायत कर देती टीचर से और उसे सज़ा मिल जाती | वो तो चाहता ही यही था | बस छुट्टी के वक़्त बाहर ही मिल जाता और भागता सरोज की चोटी खींचने | अब सरोज आगे आगे और वो पीछे पीछे सीधे अनिल के चबूतरे पर | वहीँ से शोर मचाती “चाचा जी अनिल को देख लो…” और चाचा जी महा गुस्सैल… बाहर निकलते ही ताबड़ तोड़ अनिल की धुनाई कर देते | अगले दिन फिर उस धुनाई का बदला लेने पहुँच जाता अनिल |

ऐसे ही उस दिन जब मिनी ने राय की बीवी की चुगली लगाई थी शकुंतला बीवी जी से तब भी सरोज ने उसे समझाया था कि ऐसा नहीं करते | सरोज ने बताया था मिनी को कि भाभी कहा करती थीं “दूती दूती कहाँ चली, खसम पूत कुसवाने चली…”

“मतलब…?” भोलेपन से मिनी ने उसी तरह पूछा था सरोज से जिस तरह उसने उस दिन भाभी से पूछा था | सरोज के स्कूल से घर के रास्ते में दो घर ऐसे पड़ते थे जिनके यहाँ सरोज के परिवार का काफ़ी आना जाना था | एक थे विजय जैन चाचा जी और चाची जी, और दूसरे थे रिषभ चाचा जी और सरिता चाची | दोनों चाची आपस में तो अच्छी सहेलियाँ थीं ही, सरोज से भी दोनों की ख़ासी दोस्ती थी | दोनों नई नई शादियाँ होकर आई थीं | सरोज उनके साथ बैठकर अपने स्कूल के सारे किस्से, सहेलियों के किस्से, मुहल्ले के लड़कों की ऐसी तैसी करने के किस्से, गुना गुटल से सुने उनकी सुहाग रात के किस्से और शीला किरन की सुहाग रातों के किस्से – सब कुछ बड़े चटखारे लेकर सुनाती थी और दोनों उसके गालों में गड्ढे पड़ते गोरे गोरे मासूम चेहरे को एकटक निहारती रहती थीं | दोनों का कभी खाना पकाने का मन नहीं होता था तो भाभी के पास आकर खा लिया करती थीं | चाय चीनी तो अक्सर की बात थी माँगना | भाभी भी उनसे बच्चों की ही तरह लाड़ लड़ाती थीं | दोनों चाचा बैंक में थे और नजीबाबाद ट्रांसफ़र पर आए हुए थे | एक दिन की बात…

भाभी ने उस दिन बड़ी स्वाद केले की रसे वाली सब्ज़ी, बेसन के आलू, चटनी और खस्ता पराँठे बनाए थे | अभी पिताजी और दादी के साथ सरोज बैठी ही थी खाने कि रिषभ चाचा जी और सरिता चाची आ पहुँचे “भाभी क्या बनाया है, बड़े ज़ोरों की भूख लगी है…” घुसते ही चाचा बोले |

“अरे रिषभ, भैया इधर रसोई में ही आ जाओ | देखो आपकी भाभी ने कितनी बढ़िया सब्ज़ी बनाई है…” इससे पहले कि भाभी कुछ जवाब देतीं, दादी ने दो पटरे रखकर उन दोनों के लिये भी जगह बना दी | भाभी गरम गरम पराँठे सकती रहीं और सब खाते रहे | खाते खाते चाचा ने बताया कि पिक्चर देखकर लौट रहे थे तो पहले तो जैन साहब के घर चले गए | फिर सोचा कि अब घर क्या जाएँ, चलो भाभी के पास चलकर ही कुछ खा लेते हैं | और खाना खाकर कुछ देर गप्पें लगाकर दोनों वापस चले गए | दूसरे दिन सरोज स्कूल से वापस लौट रही थी कि जैन चाची दरवाज़े पर खड़ी दिखाई दीं | बस देखते ही आवाज़ लगा दी | चाची दिखें और सरोज उन्हें कोई किस्सा सुनाने को न रुके ऐसा तो हो ही नहीं सकता था | बातों बातों में चाची ने बताया कि कल रिषभ और सरिता पिक्चर देखकर वापस लौट रहे थे तो आकर पिक्चर की पूरी कहानी सुनाकर गए |

“हाँ वो घर भी आए थे न | पता है चाची, भाभी ने कल इतनी स्वाद सब्ज़ी बनाई थी | और चाचा की आदत तो आप जानती ही हो | आते ही दरवाज़े से बोलना शुरू कर दिया “भाभी जी क्या बनाया है, बड़े ज़ोर की भूख लगी है…” और फिर पता है काफ़ी देर तक बैठे रहे…” चिहुँकती हुई और ऋषभ चाचा और सरिता चाची की नक़ल उतारती सरोज बोली |

“ज़ोर की भूख लगी थी ? पर मैंने तो कहा था खाने का वक़्त है | बना रही हूँ | खाते जाओ | फिर यहाँ क्यों मना कर दिया था ? कहने लगे कि घर पे बना रखा है…” हैरानी से चाची बोलीं |

अब सरोज को लगा कि कुछ गड़बड़ हो गई | फ़ौरन दाँत से जीभ काटकर बात बदलती बोली “अरे नहीं चाची, खाना तो घर से खाकर आए थे | वो तो भाभी के हाथ की सब्ज़ी खानी थी तो कुछ तो बोलना ही था न…” और अपने हिसाब से चाची को समझाकर सरोज वापस आ गई | निकलते निकलते सरोज को चाची ने बताया था कि उन्होंने अपनी नई साड़ी दिखाई थी सरिता चाची को बस तभी उन्हें कुछ शायद कुछ जलन सी हुई थी | घर लौटते लौटते सरोज सोच रही थी कि किसी की नई साड़ी देखकर कोई भला कैसे जल सकता है ? चाचा से कहकर वो भी नई साड़ी मंगा लें | घर आकर भाभी को सारी बातें बताईं तो उन्होंने झिड़कते हुए कहा था “तू भी न कहीं भी कुछ भी बोल देती है बिना कुछ सोचे समझे | अरे दोनों की नई नई शादियाँ हुई हैं | दोनों एक दूसरी से बढ़ चढ़कर दिखाना चाहती हैं | क्या ज़रूरत पड़ी थी ऊपर से ऊपर ही बताने की कि हमारे घर खाना खाया उन लोगों ने ? अब बता अगर कमला ने पूछ लिया सरिता से तो तुझे सही सहारे करने पड़ेंगे न | याद रख लाली एक कहावत है कि दूती दूती कहाँ चली, खसम पूत कुसवाने चली…

“मतलब…?” मिनी की ही तारह भोलेपन से पूछा था सरोज ने |

“मतलब ये पगली कि जो लोग इधर की बात उधर करते हैं न उन्हें कभी चैन नहीं मिलता…” दोनों चाचियों ने तो किसी से कुछ नहीं पूछा था, पर सरोज ने भाभी की बात गाँठ बाँध ली थी |

इसी तरह की न जाने कितनी शरारतें… कितनी शैतानियाँ… भाभी कई बार प्यार से बोलती भी थीं “जवान होने को आई पर बचपना न जाने कब जाएगा…”

तो उस दिन भाभी ने कहा लोशन लगाने को और मन न होते हुए भी सरोज को वो लोशन लगाना ही पड़ा | सुबह नहा धोकर स्कूल की यूनीफार्म – नीले रंग की फ्राक पर सफ़ेद बैल्ट कसे और सफ़ेद जुराबें पहनकर जब रसोई से बाहर आई और कमरे में जाकर शीशा देखा तो मन ही मन झूम कर सोचने लगी – वाक़ई भाभी के नुस्खे होते तो असरदार हैं – अब तो रोज़ ही लगाऊँगी वो लोशन… कितना गुलाब जिस चमक रहा है चेहरा… “लाली देर हो रही है स्कूल को… जल्दी आके दूध पी लो…” और भाभी की आवाज़ सुन शीशा पलँग पर फेंककर बाहर आई तो भाभी हाथ में दूध का ग्लास और पीतल की प्लेट में मूँग की दाल लिये खड़ी थीं | वहीँ आँगन में पड़े तख़्त पर सरोज बैठ गई | नाश्ता कर चुकी तो भाभी ने उसके काले घने लम्बे बालों को कंघे से सुलझाकर दो मोटी मोटी चोटियाँ बनाईं और फिर यूनीफार्म के ही सफ़ेद रिबनों से उन्हें ऊपर फोल्ड करके रिबनों के फूल बना दिये | सरोज ने जूते पहने, बसता उठाया “भाभी आज वो कुर्ता सलवार पूरे कर दियो | हरिओम के गीतों में पहनूँगी…” भाभी को आदेश दिया और उछलती कूदती दरवाज़े से बाहर हो गई | “सच कितनी अच्छी अच्छी ड्रेसें बनाया करती थीं भाभी… और उस वक़्त तो सिलाई की मशीन भी नहीं थी भाभी के पास – सारा काम हाथ से ही करती थीं…” सरोज सोच रही थी “सिलाई कढ़ाई में तो हेमा भी भतेरी होशियार है | तभी तो इतना काम मिल जावे है उसे अपने स्कूल की मास्टरनियों का और मधु के स्कूल की मास्टरनियों का | पर वो मरी अरुणा ठगे बोहोत है | अब दोपहर को स्कूल से आने के बाद मुझे और बच्चों को खाना खिलाकर बर्तन भाँडे निबटाकर सिलाई लेके बैठ जावे है आजकल | एक मिनट की फ़ुर्सत ना है उसे भी | पर मरती क्या न करती… चार सौ रुपल्ली स्कूल से मिले हैं बस | क्या होवे है चार सौ में आजकल ? वो तो गर्ग प्रिंसिपल ने बच्चों की फ़ीस पूरी माफ़ करा दी है वरना तो और भी मुश्किल हो जाती | कहाँ से लाते हम फ़ीस ? अब नीना तो फिर भी महीने की बंधी अच्छी तनखाह ले आवे है – सरकारी महकमे में काम का योई तो फ़ायदा है – पर वो सारी निकल जावे है वकीलों के चक्करों में | मेरी पेंशन है तीन के क़रीब – उसमें से काफ़ी तो मेरे इलाज़ में ही निकल जावे है | थोड़ी बहुत बचे है सो उसी से जैसे तैसे घर का काम चले है | अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा | कल भाभी और नीलम आवेंगी तो बात करूँगी नीलम से | अब उस बेचारी ने तो रग्घू के हाथ मेरे वास्ते व्हील चेयर भी भिजवा दी है | पता ना कित्ते की आई होगी | हेमा की मशीन को भी पाँच हज़ार उसी ने दिये थे | कितना तो कर रही है | हमारे ही भाग ऐसे हैं तो क्या करें ? छोटी बहन का करने से तो गए उल्टा उससे करवा रहे हैं…”

“अम्मा देखो इस बार मेरे लहँगे पे मुझे सबसे ज़्यादा मार्क्स मिले…” सरोज सोच ही रही थी कि मिनी होमसाइंस की क्लास में अपनी गुड़िया के लिये बनाया लहँगा चोली लेकर सरोज को दिखाने आ पहुँची | “दिखइए…” मिनी के हाथ से लेकर सरोज ने वो लहँगा चोली घुमा फिरा कर देखा फिर खुशी से हँसती हुई हेमा को दिखाने लगी “देख हेमा मरी ने कितना अच्छा बनाया है | पता है मिनी जब में तेरे जितनी थी – बल्कन तुझसे भी बड़ी होऊंगी – भाभी ने मेरे लिये और मेरी गुड़िया के लिये एक जैसा लहँगा चोली बनाया था | एक काम कर, अभी उठा के रख दे | कल आवेंगी नानी और नीलम मौसी, उन्हें दिखइए | देखिये कितनी खुश होवेंगी दोनों…” मिनी की सफलता पर आज सरोज चहक रही थी | हमेशा यही होता है – मिनी पढ़ाई लिखाई में भी और इस तरह के कामों में भी बहुत होशियार है – बिलकुल अपनी माँ पर गई है | हर बार अपनी चीज़ें और इनाम लाकर दादी को दिखाती है और इसी बहाने दादी सरोज बिस्तर में पड़ी पड़ी भी कुछ देर खुश होकर चहक लेती है |

“अम्मा तुम नानी के बारे में बताती हो कि कितना कुछ करती थीं वे | पर अब उन्हें क्या हो गया ? कितनी अजीब सी नहीं लगतीं ?” बाल सुलभ जिज्ञासा से मिनी पूछने लगी |

“अरी यो भाग होवे है ना हमारा यो हमें कुछ भी बना सके है | परेशानियाँ झेलते झेलते भाभी बस एक ज़िंदा लाश बनके रह गई हैं | भूल गईं सब कुछ – सारी सज धज – अब मुझे हो देख ले ना | भीतर वाले कोठार में से वो लाल वाली एलबम तो निकाल के ला ज़रा | देख कुछ दिखाऊँगी तुझे | हेमा तू जा ऊपर से सन्दूक हटा दे तो ये निकाल लेवेगी | अभी उस दिन देखते देखते विन्नी निम्मी वहीँ रख गई थीं…”

हेमा की मदद से मिनी एक बहुत पुरानी लाल रंग की एलबम निकाल कर ले आई और सरोज को पकड़ा दी | सरोज ने एलबम में फोटो देखनी शुरू कीं | सारी फोटो गोंद से ऐसे कसके चिपकाई गई थीं कि फटना भी मुश्किल था उनका | हाँ वक़्त के साथ साथ धुँधली ज़रूर पड़ गई थीं | सरोज ने एक फोटो खोली और मिनी और हेमा को दिखाने लगी “ये देख, तू भी आ हेमा… ते देख ये हैं जयपुर वाले नरेंदर जीजा जी – संभल वाले बड़े मामा जी की लड़की हैं सावित्री जीजी, उनके हसबैंड | अब तो ख़ैर गुज़रे भी अरसा हो गया उन्हें | पता है बड़े ऊँचे पड़ पर थे किसी बड़ी फैक्ट्री में | फैक्ट्री की तरफ़ से कई बार रूस भी जाया करते थे | वहीँ से कैमरा खरीद कर लाए थे | मेरी शादी ना हुई थी तब तक | शादी मेरी हुई १५ मई को | हम सब संभल गए थे गर्मियों की छुट्टियों में – दो महीने हम सब वहीँ बितावें थे | ख़ूब मज़ा आवे था वहाँ | उस साल गर्मियों में तो शादी थी मेरी तो शादी से कोई दो महीने पहले भात नौतने गए थे हम सब – मतलब बुआ, चाची, चाचा जी, पिताजी, हरिओम, संतोष, महेश मामा और मामी, चाचा जी की अंजना और रजनी और मैं | भाभी ना गई थीं क्योंकि नीलम होने को थी | मेरे ब्याह के महीने भर बाद तो हो ही गई थी वो पैदा | ख़ूब हुड़दंग मचाया हम सबने वहाँ | तो ये जीजा जी फ़िदा थे मुझपे | और ये… ये देख…” पेज पलट कर अगली फोटो निकाली “देखा ? बता कौन है…?” सरोज ने चिहुंकते हुए पूछा तो हेमा और मिनी ध्यान से फोटो देखने लगीं – ख़ूब घेर वाला फ्राकनुमा कुर्ता और चूड़ीदार पायजामा पहने ऊपर से जाली का दुपट्टा और एक हाथ दरवाज़े की चौखट पर रखकर दूसरा कमर पर रखकर मानों किसी पर बिजली गिराना चाहती हो ऐसी अदा में बला की ख़ूबसूरत कोई फ़िल्मी हीरोइन खड़ी थी “अम्मा ये तो तुम हो…” मिनी और हेमा एक साथ चीख पड़ीं |

“हाँ मरी मैं ही तो हूँ…” खिलखिलाकर हँसती सरोज बोली | काफ़ी देर वैसे ही खिलखिलाती रही | फिर अचानक ख़ामोश हो गई और कुछ देर बाद बोली “अब बता कोई पहचान सकेगा आसानी से मुझे ? नहीं ना… तो फिर भाभी तो मुझसे भ बड़ी हैं – माँ हैं मेरी | ना जाने कितने बच्चे हो होके मरे तब कहीं जाके यो नीलम बची | फिर घर के क्लेश… हो ही जानी थीं ऐसी…” और सरोज की आँखों में फिर आँसू भर आए “तुझे पता है भाभी की आवाज़ तो बेहद महीन थी शुरू से ही | थोड़ी से भी ज़ोर से बोलें तो ऐसा लगे जैसे चीं चीं कर रही हों | पर माइक पर इतनी ज़ोर से ना बोलना पड़े है – तू तो जाने ही है | तो भाभी भी जाया करें थीं कहीं कुछ कुछ बोलने | रात दिन बस लिखने पढ़ने में ही लगी रहवें थीं… पर घरवालों को चैन ना था…”

बोलते बोलते सरोज चुप हो गई | बिजली आ चुकी थी और पंखा चलने लगा था | हेमा ने समझा अम्मा सो गई हैं दवा के नशे में तो धीरे से मिनी को वहाँ से बाहर कर दिया और वापस अपने काम में लग गई | सरोज की आँखें बंद ज़रूर थीं पर नींद गायब थी | याद आ रहा था उसे कि कितना कितना ख़याल रखती थीं भाभी | सरोज को तो अपने दोस्तों के साथ खेल कूद से ही फ़ुर्सत नहीं थी | जब खेल कूद से मन भर जाता तो दादी के साथ मिलकर सारे बच्चे भाभी की साड़ियां निकाल कर किसी किसी तरह से बाँध बूँध लेते और लग जाते या तो कोई नाटक खेलने या फिर पिताजी के साथ कोई पिक्चर देखकर आती सरोज तो उसकी हीरोइन की एक्टिंग करने लगती | एक कोई पिक्चर देखी थी – नाम याद नहीं | नसीम बानो और सहगल की थी | नसीम बानो काफ़ी माडर्न लड़की बनी थी उसमें – उल्टे पल्ले की साड़ी के पल्ला एक हाथ पे झूलता – दूसरे हाथ में पर्स – कढ़ाईदार ब्लाउज़ – बालों में एक फूल खोंसा हुआ – कहीं किसी पार्क में वो और सहगल कोई गाना गा रहे थे | सरोज को अब उस गाने के बोल याद नहीं, तब पूरा का पूरा गीत याद था | बस बन गई सरोज नसीम बानो और विपिन बन गया सहगल और लगे दोनों गा गाकर उनकी नकलें उतारने | फिर मीना कुमारी की किसी पिक्चर का गाना याद आ गया और मीना कुमारी की ही तरह एक हाथ में पल्ला लपेटे उसकी नक़ल शुरू कर दी | भाभी सरोज का ये सारा अल्हड़पना देखकर हँसती रहती थीं | बल्कि कभी कभी तो सरोज खुद उन्हें सामने बैठाकर डाँस करके दिखाया करती थी और भाभी उसकी बलाएँ लेती न अघाती थीं | धमा चौकड़ी मचाने के बाद सारे बच्चे अपने अपने घरों को चले जाते तो भाभी सारे कपड़े वापस तह लगाकर रखतीं ट्रंक में | सारा फैला हुआ सामन सिंघवातीं | फिर सरोज को हाथ मुँह साफ़ करके आने की हिदायत देतीं | सरोज भाभी के बनाए उसी घोल से मुँह साफ़ करती | चेहरा और हाथ चमक जाया करते थे |

भाभी ने सरोज को बहुत कुछ सिखाया था | जब उसे पहली बार दादी के शब्दों में “लाल बुखार” आया था और खून देखकर घबरा गई थी और रोना शुरू कर दिया था तब भाभी ने ही उसे समझाया था कि इसमें घबराने की बात नहीं है, और ये भी समझाया था कि ऐसा होना हर लड़की के लिये क्यों ज़रूरी है | और ये भी कि अबसे हर महीने ऐसा ही हुआ करेगा और इसमें क्या करते हैं | और इसके न होने से क्या क्या बीमारियाँ हो सकती हैं – सब कुछ समझाया था तब कहीं जाकर सरोज सामान्य हुई थी | सरोज को अच्छी तरह समझाकर जब भाभी अपने कामों में लग गई थीं तब दादी ने कहा था कि अब दो दिन रसोई में मत जाना | नई नई बात थी, सो सारा दिन सोती ही रही थी | धीरे धीरे उसकी समझ में आ गया था कि इन दिनों शुरू के दो दिन वो अछूत रहा करेगी जैसे भाभी रहती हैं | भाभी को “लाल बुखार” आने पर दादी और पिताजी मिलकर रसोई का सारा काम करते थे | भाभी को खाना भी अलग बर्तनों में दिया जाता था | बाद में राख़ से रगड़ रगड़ कर उन्हें साफ़ किया जाता था | फिर तीसरे दिन घर भर में गंगाजल के छींटे मारे जाते थे शुद्धिकरण के लिये | सरोज भी धीरे धीरे इस सबकी अभ्यस्त हो चली थी | नीलम से एक बार सरोज ने इस घटना का ज़िक्र किया था कि आजकल तो लड़कियों को सब कुछ पता होता है, पता नहीं उसे क्यों कुछ पता नहीं था | नीलम को झुंझलाहट हुई थी उस समाज के बारे में सोचकर जहाँ लड़कियों से सब कुछ छिपाकर रखा जाता था, जहाँ लड़कियाँ अपने माँ बाप के सामने अपने शादी ब्याह की बात करते सकुचाती थीं | तब तो अभय, अनिल और विपिन के साथ सरोज की दोस्ती पर भी लोग बाग उँगलियाँ उठाते थे, पर उसके पिताजी और भाभी ध्यान ही नहीं देते थे किसी की बात पर – अपनी राजकुमारी को दुखी जो नहीं कर सकते थे – और फिर सरोज तो थी भी एक निहायत ही भोली भाली गुड़िया जैसी – माँ बाप के लाड़ और अपनी कल्पनाओं के संसार में मस्त अल्हड़ सुकुमारी…

इसी तरह भाभी ने ही उसे ब्रा पहननी सिखाई थी | एक दिन उसे पास बैठाकर इंचटेप से उसका नाप लिया और सफ़ेद मलमल के कपड़े की एक ब्रा उसके लिये सिली | उसकी कटोरियों पर हाथ से कढ़ाई की | फिर उसमें पीछे बाँधने के लिये डोरी लगाई और सरोज को समझाया कि कैसे बाँधते हैं | सरोज को याद है जब उस दिन वो काफ़ी देर तक कमरा भीतर से बंद करके बार बार उसी ब्रा को उतारती पहनती रही थी | बीच बीच में शीशे के सामने – जो आदमकद तो नहीं था पर जितना वो देखना चाहती थी उतना आराम से देखा जा सकता था – खड़ी होकर अपने वक्ष निहारती रही थी और बार बार हाथों से छू छू कर देखती रही थी – खुद अपने से ही शर्माती हुई – पर मन ही मन गुदगुदाती हुई सी… कभी शीशे से अपने दोनों वक्ष सटा लेती और तब जो कुछ उसे भीतर महसूस होता था उसका वर्णन करने के लिये उसे कभी शब्द नहीं मिल पाए थे – पर कुछ ऐसा था जो उसके खिले खिले रूप पर और निखार ला रहा था | अपने उठानों पर धीरे धीरे हाथ फिराती तो उस कसाव को छूकर उसे बड़ा आनंद मिल रहा था | भाभी शायद सब कुछ समझ गई थीं – या शायद उनकी भी आप बीती रही होगी – तभी चुपचाप अपने काम में लगी रही थीं और एक बार भी सरोज को आवाज़ नहीं लगाई थी | वो तो पिताजी आ गए थे और आदतन दरवाज़े से ही आवाज़ लगाईं थी “लाली… अरे भई कहाँ गई हमारी बंदरिया…?” सरोज ने जल्दी जल्दी कपड़े पहन दरवाज़ा खोला था कमरे का तब तक भाभी उनसे सामान ले चुकी थीं “पढ़ते पढ़ते थक गई थी तो मैंने ही सोने भेज दिया था… लो आ गई… संभालो अपनी बंदरिया को…” और सरोज भागकर पिताजी की धोती में दुबक गई थी – मानों भाभी से नज़र मिलाते शर्म आ रही थी | पिताजी हैरान थे आज सरोज का व्यवहार देखकर पर भाभी ने उन्हें आँखों आँखों में शायद सब कुछ समझा दिया था | तभी तो पिताजी सरोज का चेहरा अपने सामने करके बोले थे “भई देखो लाली, तुम्हारी भाभी चाहे जो कहे – पर हमें तो तुम बंदरिया ही अच्छी लगती हो… जाओ देखो क्या लाए हैं हम…” और नई नई जवानी की चंचलता, शर्म, हया सब भूलकर सरोज एक बार फिर बच्चों की तरह चहकने लगी थी |

बुआ जब भी आतीं तो माँ बेटी को ऐसे घुलते मिलते देख उनकी छाती पर साँप लोटने लगता | पर अभी उन्हें लगता था कि भाभी के खिलाफ़ बोलने का सही वक़्त नहीं था – सरोज और दादी दोनों ही उनके वश में थीं | तो वो मौक़ा तलाश रही थीं, और वो मौक़ा उन्हें उस दिन मिल गया था…

सरोज हर रोज़ की तरह वो लोशन मल रही थी मुँह पर और भाभी और दादी को सारे दिन के किस्से मज़े ले लेकर सुना रही थी | भाभी भी वहीँ आँगन में बैठकर सब्ज़ी काट रही थीं | जीराज पिट्ठी पीसने में लगा हुआ था उड़द की दाल की – पिताजी ने कहा था कि आज दही बड़े और गुझिया की चाट ज़रूर बनानी है | उसी सबकी तैयारी चल रही थी | आज कुछ लोग बाहर से भी आए हुए थे – जिनमें पिताजी के एक ख़ास दोस्त हरीश चाचा जी भी लखनऊ से आए हुए थे | कुछ और लोग भी थे | शहर में कोई संगोष्ठी थी उसी में भाग लेने वे सब आए थे | भाभी भी दिन में वहाँ गई थीं | उस दिन वे एक श्रोता की हैसियत से वहाँ गई थीं और जब घर वापस आईं तो सरोज के और उसकी सहेलियों के वही कार्यक्रम चल रहे थे | इत्तेफ़ाकन बुआ भी आई हुई थीं | भाभी घर आईं तो हरीश चाचा जी साथ ही थे और दोनों किसी बात पर हँसते बतियाते आ रहे थे | घर की लुगाई और पराए मर्द के साथ हँसी ठट्ठा…? बुआ के तो तन बदन में आग लग गई थी पर अपने मुँह बंद ही रखा था कुछ सोचकर |

हरीश चाचा जी भाभी को छोड़कर किसी से मिलने चले गए थे | बुआ को आया देख भाभी ने उनके पैर छुए और बुआ ने आशीर्वाद दिया “जीती रह… भगवान करे जल्दी ही तेरी गोद में एक चाँद सा लल्ला खेले – मेरे हरिओम जैसा… भगवान करे इस घर के भाग जागें वरना हम तो…” और आगे क्या बोलना चाहती थीं सरोज नहीं समझी थी | पर शायद भाभी समझ गई थीं और बुआ को घर से बाहर जाने पर सफ़ाई देती बोली थीं कि वे तो जाना भी नहीं चाहतीं थीं पर पिताजी ने ज़िद की थी और अपनी क़सम दी थी इसीलिए गई थीं | वैसे भाभी कहीं भी जाती थीं तो चादर ओढ़कर जाती थीं | पर इस तरह के कार्यक्रमों में जाती थीं तो पिताजी की सख्त हिदायत थी कि इस तरह की वाहियातगिरी नहीं चाहिये | सलीके से चलना होगा | तो भाभी हरे रंग की लाल बार्डर वाली बनारसी साड़ी उल्टे पल्ले से पहनकर, बालों में नकली बालों का चुटीला लगाकर उसका जूड़ा बनाकर, जूड़े में सरोज ने जबरदस्ती एक फूल भी खोंस दिया था – नसीमबानो को देखा था न पिक्चर में, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और ब्लाउज़ में इत्र का फ़ाहा खोंसकर घर से निकली थीं | भाभी का ड्रेस सैंस काफ़ी कुछ उस ज़माने की हीरोइनों से मिला करता था – जब किसी फंक्शन में जाना होता था तब – वरना घर में तो सीधे पल्ले की करीने से बंधी हुई साड़ी और माँग में सिन्दूर और माथे पर छोटी सी लाल बिंदी – और बस… जबकि सरोज चाहती थी कि भाभी हर समय बनाव श्रृंगार करके रहा करें | तब भाभी भी कहती थीं “अरी पगली अब हमारे दिन कहाँ बनने संवरने के ? वैसे भी चूल्हे चौके में कहाँ ठहरता है बनाव श्रृंगार… और फिर तेरे भाइयों के जाने के बाद अब मन ही नहीं होता कुछ करने का…”

“फिर बाहर जाते पे क्यों करती हो…?”

“अब ये तो अपने पिताजी से पूछना | मानते ही नहीं तो क्या करूँ | अब तो लाली तुम लोगों का ज़माना है – तुम लोग करो अपने मन की | तुम्हारा जितना बटना मैंने किया हमारी माँ ने हमारा कब किया ? किया होता तो क्या मैं भी तेरी तरह गोरी न होती ?” फिर अपने ही मज़ाक पर मानों हँसती हुई बोलतीं “वैसे मैं तो जनम से ऐसी ही हूँ | हाँ तुझे को रूप मिला है – भगवान बुरी नज़र से बचाए – उसे बिगड़ने मत देना | तभी तो तुझे चेहरा साफ करने को ये कुछ कुछ देती रहती हूँ | सारा दिन बाहर भीतर करती रहती है | सूरज की गर्मी से रंग काला पड़ना शुरू हो जाता है | ये सब करती सहेगी तो सूरज की गर्मी का कोई असर नहीं होगा तेरे रंग पर | अरे भई बड़ी हो जा फिर तेरी शादी भी तो करनी है अच्छे से घर में…” भाभी चुहल करतीं तो अल्हड़ सरोज का गोरा गोरा मुखड़ा शर्म से लाल हो जाता और दोनों हाथों में मुँह छिपाकर शरमाकर बोलती “भाभी…” और भाभी हँसती हुई उसके सर पर चपत लगा देतीं |

तो, भाभी लग गईं खाना पकाने में | जीराज पिट्ठी पीस ही रहा था | बस बुआ को जैसे मौक़ा हाथ लग गया | भाभी के पास जाकर बोलीं “क्यों री संभल वाली, सारा नेम धरम भूल गई क्या…?”

“क्या हुआ बीवी जी…” सकपकाई भाभी ने पूछा तो बुआ कुछ गुस्से में बोलीं “यो जीराज पीस रिया है पिट्ठी | अरी कमबखतमारी तेरे हाथ टूट गए हैं क्या छिनाल राण्ड…?”

“पर बीवी जी वो तो अक्सर करता है… तुम्हारे भैया ही…”

“बस बस अब मेरे भाई पर बात मत ना डाल्लो | वो बिचारा इतना नेम धरम वाल्ला… माँ मेरी इतनी भगवान की भगत… और यो हो क्या रिया इनके साथ…?”

जीराज बुआ की बिना राई का पहाड़ बनाने की आदत को अच्छी तरह जानता था सो घबराकर सील से उठ गया था और हाथ धोने लगा था | सरोज भी घबराकर बाहर आँगन में आ गई थी कि आज ज़रूर कुछ न कुछ होगा | दादी ने बुआ को शांत करते हुए कहा “चुप हो जाओ कावेरी | क्यों बिना मतलब की बात बना रही हो ? करने दो न… हमेशा ही तो करता है… जीराज तुम करो…”

“राम राम राम राम… माँ… तुझसे यो उम्मीद ना ही मुझे अक तू इत्ती डरेगी इस सत्यानास्सन से अक सच्ची बात बोलते भी डरेगी…”

“कावेरी क्या हो गया है तुम्हें…?” अभी तक दादी बुआ को समझाने में ही लगी थीं | भाभी चुपचाप रसोई में घुस गई थीं कि माता जी अपने आप समझा लेंगी | दादी बुआ को समझा बुझाकर भीतर ले जाना चाहती थीं पर बुआ थीं कि टस से मस नहीं हो रही थीं | उनका नाटक बढ़ता ही जा रहा था “अरे बाहर भीत्तर आती ना थके है कभी पर घर गिरस्ती के कामों में थक जावे है… भेज रक्खा है संभल वाल्लों ने भी अक ले यो चमार की जात घर में घुसा ले और इसके हाथ से सबका धरम भिरस्ट करवा दे… उन चोद्दों की तो माँ की…” पीहर वालों के लिये इस तरह की भद्दी गाली सुनना शायद भाभी से बर्दाश्त नहीं हुआ और रसोई से बाहर आकर बोल पड़ीं “उन लोगों कि क्यों बीच में खींचती हो बीवी जी ? जो बात करनी है सीधे मुझसे करो ना | तुम्हारे भैया ने ही कह दिया है कि इस तरह के काम जीराज से करवा लिया करो | और फिर वो चमार नहीं है – दूधिया है – उसी के हाथों का निकाला दूध पीते हो तुम सब | और वो श्यामा गाय भी उन्हीं संभल वालों की भिजवाई हुई है जिन्होंने जीराज को भेजा है…”

“ले अम्मा और सुन… सुन लिया ना कैसा ताना मारा इसने अपने पीहर का…? अब बोल… अब कर इसकी तरफ़दारी… अरे इसके घरवालों के टुकड़ों पे ना पल रिया मेरा भाई हाँ नईं तो… अरी लुच्ची राण्ड साफ़ साफ़ क्यूँ ना बोलती अक यारों से फ़ुर्सत ना है तुझे तो इससे काम करावेगी ही…”

“बीवी जी आप हद से आगे बढ़ी जा रही हो…”

“एल्लो बोल्लो, अब तू सिखावेगी छिनाल मुझे मेरी हद ? आन दे आज गंगा कू, ना तुझे चुटिया घसिटवाके घर से बाहर निकलवाया तेरा जलूस तो मेरा नाम भी कावेरी नईं… देख लिया माँ अपनी लाडली कू…? भौत इसी का कहे जा ही, लेल्ले परसाद अब…”

“तुम्हें हो क्या गया है बीवी जी जो यों… आज लड़कर आई हो क्या घर से…? कम से कम सरोज को तो देख लो कैसी सहमी खड़ी है इन बातों से…”

सबने देखा, सरोज वाक़ई दरवाज़े में डरी सहमी खड़ी थी | उसे देखकर बुआ ने और भी ज़ोर ज़ोर से बोलना शुरू कर दिया “अरे सब जान्नूँ हूँ मैं… ये दीददे खुले रेवें हैं मेरे और कान भी… अरे सारे नजीबाबाद में थू थू हो रई है छिनाल… एसई जवानी का बुखार है तो निकल जा ना मूँ काला करा के… सब जान्नें हैं अक उस कुत्ते हरीश के साथ क्या गुलछर्रे उड़ा के आई है… जा जाके पूछ ले सहर में किसी से भी… तुझे ना पता माँ कुछ भी, यो तो जब मुर्दाबाद में पढ़े ही तभी हरीश आया हा उंगे किसी ऐसेई काम कू, बस वहीँ से चक्कर चल रिया हा इसका हरीश के साथ… अरे तभी तो दुहेज्जू से बिया दिया घरवाल्लों ने अक नाक बची रेवेगी… अरे सारे करम पता लग गए हैं मुझे अमरू से…”

“क्या करम पता लग गए हैं मेरे अमरू से ज़रा मैं भी तो सुनूँ…” चरित्र पर लगाए इल्ज़ाम से भाभी तिलमिला गई थीं “अरे किस्मत फूटी थी मरी जो इस घर में आई – मरद की बीवी मर गई थी और सौतेली धी गोद में डाल दी थी मेरी… मेरा भगवान जानता है जो मैंने कभी इसे सौतेला या उन्हें दुहेजू समझा हो | तुम सबकी जी जान से सेवा की और तुम सब ही… माता जी तुम चुप क्यों हो…?”

दादी सर पकड़े ज़मीन पर बैठी थीं | लगता था जैसे उन पर बुआ की बातों का असर हो रहा था | बुआ ने दादी को देख, और अपनी बात बनते देख सर हिला हिलाकर फिर बोलने लगीं “हाँ सोतेल्ली… रंडुआ खसम… आ गई ना बात जुबान पे… अरी बिया तून्ने भी योई सोचके किया हा अक जी सोतेल्ली धी और रंडुआ खसम की जबान बंद रैवेगी… और तू जान्ने ही अक वो हरीश गंगा का दोस्त है… तुन्ने सोच्चा अक जी उससे भी वैसेई बनी रैवेगी… हाय हाय घर की इज्जत नीलाम करके रख दी इस छिनाल ने तो…”

जब भी इस तरह की कोई बात होती थी भाभी पर हिस्टीरिया का अटैक होता था | उस दिन भी इतना सब सुनकर और इतनी बुरी तरह अपमानित होकर भाभी खड़ी खड़ी काँपने लगी थीं | सरोज ने दौड़कर उन्हें संभाला पर वो धम्म से नीचे बैठ गईं | उनकी मुट्ठियाँ भिंचनी शुरू हो गई थीं | इस बीच हरीश चाचा जी, फूफा जी, पिताजी और दूसरे लोग दहलीज़ में पहुँच चुके थे और सब कुछ सुन चुके थे | भाभी का हाल देखा तो हरीश चाचा चुपचाप भाभी की तरफ़ बढ़े और सरोज के हाथ से पानी का ग्लास लेकर उनके मुँह पर छींटे मारने लगे | पिताजी चुपचाप सर झुकाए अपराधी बने खड़े थे – उनसे न कुछ बोलते बन रहा था न वहाँ खड़े होते – बहन आज सबके सामने अकारण ही उन्हें नंगा करने पर आमादा थी – माँ कुछ समझना नहीं चाहती थी – कुछ समझ ना पाते थे क्या करें – पर खड़े थे | फूफा जी भी अपनी पत्नी की इन हरकतों पर कुछ कहने सुनने लायक नहीं रहे थे लिहाज़ा उनके पास भी सर झुकाए खड़े रहने के अलावा कोई चारा नहीं था | हरीश चाचा जी को भाभी के मुँह पर पानी के छींटे मारते देख बुआ फिर बोलने लगीं “देख लिया अम्मा कित्ता लाड़ आ रिया है इस मर्दुए कू इस राण्ड पे… किस तरियों पानी मार रिया इस लुच्ची राण्ड के मूँ पे…”

“बहन जी बस…” अचानक से हरीश चाचा जी खड़े हुए और कड़क आवाज़ में बोले, फिर पिताजी की तरफ़ देखकर बोलने लगे “अगर मेरी अपनी बहन ने ऐसा किया होता तो लगाता एक उल्टे हाथ का और धक्का देता घर से बाहर | कभी का उससे सम्बन्ध खत्म कर चुका होता | घुसने ना देता कभी अपने घर में…”

अब अक फूफा जी साहस करके भीतर आ गए थे और उन्होंने गुस्से में आव देखा न ताव बस बुआ को झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया “हरामज़ादी मेरे ही पल्ले बांधनी थी… कहीं का नहीं छोड़ा इसने मुझे… ऐसी औरतें मेरे और सूरजप्रसाद की किस्मत में ही लिखी थीं…” और न जाने क्या क्या बोलने लगे फूफा जी | सारी शाम ख़राब हो चुकी थी | हरीश चाचा जी और बाक़ी के लोग बाहर निकल गए थे और जाते जाते पिताजी को बोलते गए थे “पण्डित जी, हमें ये उम्मीद नहीं थी कि आपके घर में भी ये सब देखने को मिलेगा… जाते हैं…”

फूफा जी ने गुस्से में बुआ का हाथ पकड़ा और लगभग घसीटते हुए बुआ को लेकर बाहर निकल गए | जीराज पता नहीं कहाँ चला गया था – आधी रात कभी लौट कर आया था वो | इधर भाभी बेहोश पड़ी थीं – बदन अकड़ा हुआ – मुट्ठियाँ भिंची हुई – मुँह से झाग निकलते हुए – पिताजी ने भाभी की बेहोशी खोलने की कोई कोशिश नहीं की – बस सर पकड़ कर वहीँ भाभी के पास ज़मीन पर उकडूँ बैठ गए सर पर हाथ रखकर – जैसे भाभी के मरने का सोग मना रहे हों | सरोज वहीँ एक तरफ़ सहमी खड़ी थी | जीराज देर रात जब घर वापस आया तो काफ़ी कुछ ऐसा देखा कि अगले दिन ही केशव गार्ड के मार्फ़त संभल मामा जी के पास कुछ सन्देश भिजवा दिया था | दादी ज़मीन पर बैठी थीं और न जाने क्या सोच सोच कर बस हिलती चली जा रही थीं | वक़्त थोड़ी देर के लिये जैसे ठहर सा गया था | सब कुछ ख़ामोश … एक डरावना सन्नाटा हर तरफ़… हरेक के खयालों में एक अजीब सा तूफ़ान… कभी कभी बाहर पेड़ पर बैठा उल्लू बोलता था तो पता चलता था जैसे रात काफ़ी हो चुकी थी… वरना तो सबके दिलों में ही इतना तूफ़ान चल रहा था कि शायद हवा भी रुकी हुई थी ये सोचकर कि अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं… और किसी पेड़ का एक पत्ता तक नहीं हिल रहा था…

थोड़ी देर बाद जैसे दादी को कुछ होश आया और उठकर पिताजी के पास जाकर उनके कन्धे पर हाथ रखकर बोलीं “जो हुआ सो हुआ, भूल जाओ, अब कम से कम दुलहिन को तो होश में लाने की कोशिश करो… ऐसे तो मर जाएगी… रुक जाएगी साँस इसकी…” और वहीँ पिताजी के पास बैठकर सुबकना शुरू कर दिया | पिताजी दुःख, अपमान, क्रोध और अपराधबोध के समन्दर में दूबे हुए थे | बहन ने उन्हें किसी के सामने मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा था | दादी की बात सुनकर फटाफट उठे “अभी हमेशा के लिये इसे होश में ला देता हूँ… तुम सबके कलेजों में ठण्डक पड़ जाएगी… जा बुलवा ले अपनी कावेरी को…” और तेज़ी से रसोई में घुसे – और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता – मिट्टी के तेल की बोतल लाकर भाभी पर उलट दी और दीयासलाई की तीली सुलगा कर उनके ऊपर फेंक दीं – सरोज और दादी पिताजी को पकड़ कर रोकते रहे – चीखते चिल्लाते रहे – पर पिताजी के भीतर जैसे कोई भूत घुस गया था…

पिताजी घर से बाहर निकल गए | दादी ने बचाओ बचाओ चिल्लाना शुरू कर दिया था… सरोज चीख़ चीख़ कर रो रही थी… इस दोनों की चीख़ पुकार सुनकर भाभो ने छत से झाँका तो सन्न से रह गईं… भागी भागी नीचे आईं “ए लल्ली, जल्दी से कम्बल ला… जल्दी कर…” और इतने घबराई हुई सरोज भीतर से कम्बल लेकर आई, भाभो ने भाभी के बदन से जलते कपड़े तार तार करके खींच कर फाड़ कर उतार फेंके थे… ऊपर से नीचे तक बिलकुल नंगे बदन भाभी भाभी को अभी भी कुछ होश नहीं था… उनका निचला हिस्सा काफ़ी जल चुका था… भाभो ने भाभी को कम्बल में लपेटा | तब तक लाला जी भी आ चुके थे | दोनों ने कम्बल में लिपटी पहले की ही तरह बेहोश नंगी भाभी को गोद में उठाया “चल लल्ली डाक्टर साहब के उंगे चल…” और तीनों जल्दी से भाभी को लेकर डा. रस्तोगी के अस्पताल की तरफ़ चल पड़े…डी दादी दरवाज़ा पकड़े ना जाने कब तक वैसे ही खड़ी रही होंगी कोई नहीं जानता…

डा. साहब के दरवाज़े की घण्टी बजाई सरोज ने | तब तक कोई सोया नहीं था उनके घर… शायद कोई डिनर वगैरा चल रहा था… कोई ख़ास मेहमान आए हुए थे वहाँ… भीमसिंह ने दरवाज़ा खोला तो सरोज को उस वक़्त आया देख चौंक गया हैरान भीमसिंह डा. साहब को आवाज़ देने ही वाला था कि उसे दरवाज़े पर देर लगती देख सफ़ेद चमचमाता कुरता पायजामा पहने, हाथ में ड्रिंक का ग्लास पकड़े और होठों के बीच में सिगार दबाए डा. साहब खुद ही वहाँ पहुँच गए “सरोज आप…? क्या हुआ…? ये लोग कौन हैं…? बेटा आप… आप रो क्यों रही हैं…? आओ आओ भीतर आओ… पंडत जी कहाँ हैं…? कौन हैं ये…?” ढेरों सवाल दागते दागते डा. साहब ने इन लोगों के भीतर आने के लिये रास्ता छोड़ दिया और अपना ग्लास वहीँ लॉबी में पड़े तख़्त पर रखकर भीतर की तरफ़ चल दिये, इन लोगों को अपने पीछे आने का इशारा करके |

सब लोग भीतर पहुँचे | “भीमसिंह जल्दी से माता जी (अपनी पत्नी को वे ऐसे ही बुलाते थे – सरोज इन लोगों को दादी जी और दादा जी बुलाती थी) को बुलाकर लाओ…” और इन लोगों को बरामदे की तरफ़ आने का इशारा किया |

बड़ा सा आलीशान बंगला था डॉ. साहब का | घर में बाहर बड़ा सा चबूतरा चहारदीवारी से घिरा हुआ था | बीचों बीच एक गेट था | वहीँ घण्टी लगी हुई थी | पूरे शहर में एक तो इनका घर, एक ठेकेदार भगवान दास का घर और दो एक और ऐसे घर थे – बड़े बड़े आलीशान बँगले | सबसे पहले बिजली भी इन्हीं घरों में लगी थी | तो, डा. साहब के यहाँ इस बड़े से चबूतरे पर चढ़कर थोड़ा आगे बढ़ने पर बीचों बीच फिर एक बड़ा सा दो पल्लों वाला लोहे का फाटक था और उसके एक पल्ले में एक कोने में छोटा दरवाज़ा बना हुआ था | इसी छोटे से दरवाज़े से हर कोई बाहर भीतर आता जाता था | पूरा फाटक ज़रूरत पड़ने पर ही खुलता था | आज भीमसिंह ने वही पूरा फाटक खोल दिया था इन लोगों के भीतर आने के लिये…

भीतर पहुँचने पर दहलीज़ – जिसे ये लोग लॉबी कहते थे और जिसमें ख़ूबसूरत क़ालीन बिछा तख़्त पड़ा रहता था – को पार करके ख़ूब बड़ा आँगन था – जिसके दाहिनी तरफ़ रसोई, एक बड़ा ड्राइंग रूम जिसका दरवाज़ा दहलीज़ में खुलता था, और रसोई और ड्राइंग रूम के बीच में डाइनिंग रूम था और वहीँ से बाहर की तरफ़ जाकर मोटर गैराज थी | आँगन में आने पर बाक़ी तीन तरफ़ कमरे बने हुए थे और हर कमरे के बाहर बरामदा | आँगन के बीचों बीच गोल क्यारी बनी हुई थी जिसमें तरह तरह के रंग बिरंगे फूल हर वक़्त खिले रहते थे | सरोज को उस क्यारी के पास बैठना बहुत भाता था और वहाँ बैठी बैठी वो सपना सजाती थी कि कभी उसका घर भी ऐसा ही होगा | पर आज कोई सपना उसकी आँखों में नहीं था | आज तो भयंकर दहशत हावी थी उस पर और बस जैसे भी हो भाभी को ठाक कराना चाहती थी | आँगन के बाँईं तरफ़ के बरामदे में बिल्कुल बीचों बीच एक झूला लटका रहता था जिस पर डा. साहब की लड़कियों के साथ बैठकर सरोज सारा सारा दिन बतियाती रहती थी – वहीँ बैठे बीते ये लोग खाना भी खा लिया करते थे | झूले के पास ही ज़रा हटके एज तख़्त पड़ा था और उस पर भी एक ख़ूबसूरत क़ालीन बिछा था और गाव तकिये रखे थे | भीमसिंह ने गाव तकिये हटाकर कम्बल में लिपटे शरीर को लिटाने के लिये जगह बनाई | तब तक माता जी भी आ चुकी थीं | डा. साहब ने सिगार ऐश ट्रे में रखकर उस बेहोश बदन के मुँह पर से कम्बल हटाया तो सकते में आ गए… ये क्या… मास्टरनी जी…?

“क्या दुलहिन…?” दादी ने चौंक कर उधर देखा तो जैसे एक बार उन्हें अपनी आँखों पर कतई विश्वास ही नहीं हुआ | भाभी को इस हाल में देखकर भीमसिंह भी सकते में आ गया था और फटाफट बड़े भैया और छोटे भैया को भी धीरे से ड्राइंग रूम से बाहर बुला लाया था | बाक़ी के नौकर मेहमानों की आवभगत में लगे थे | दादा जी ने अंग्रेज़ी में कुछ कहा दोनों चाचा लोगों से और भाभी को बड़े चाचा जी गोद में उठाकर क्लीनिक के भीतर वाले रूम में ले गए | इस बरामदे से ही बाँए हाथ को घर के लोगों और अस्पताल के स्टाफ के लिये क्लीनिक, भीतर वाले कमरे और एक्सरे रूम में आते जाते थे | दोनों चाचा भाभी के साथ उस रूम में थे और दादा जी भी मेहमानों से इज़ाज़त लेकर वहाँ पहुँच गए थे | उस वक़्त कोई कम्पाउन्डर भी नहीं था क्लीनिक में सो दोनों चाचा ही बाहर भीतर आ जा रहे थे कुछ न कुछ सामान लेकर और भीमसिंह रसोई में कुछ अस्पताल का सामान उबाल रहा था |

भीतर दादाजी और चाचा लोग भाभी को बचाने की कोशिश कर रहे थे और यहाँ दादी जी परेशान हो रही थीं कि आखिर दुलहिन को हुआ क्या था ? बहुत लाड़ लड़ाती थीं वो भाभी का और बुआ को इससे भी जलन होती थी कि वो भाभी से पहले से नजीबाबाद में रहती थीं फिर भी डाक्टर साहब के घर उनका आना जाना नहीं हो सका था, और भाभी के आते ही उन लोगों के साथ बिल्कुल घर के सम्बन्ध हो गए थे | दादी बार बार पूछ रही थीं सरोज से कि कुछ तो बताओ ये सब हुआ कैसे ? बड़े भैया कहाँ हैं ? दादी कहाँ हैं ? आज बुआ तो नहीं आई थीं ? दादी जी भी जानती थीं कि बुआ आएँगी तो कुछ न कुछ झमेला तो होगा ही | पर सरोज थी कि दहशत के मारे उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे | बस धार धार आँसू रोए चली जा रही थी | दादी ने उसे अपने सीने से लगा रखा था | भाभो से पूछा कि आप लोग कौन हैं तब लाला जी न बताया “हम तो माता जी इनके पड़ोस में रेवें हैं… वो सुना होगा तुमने छोट्टी जाम्मन वाला मकान… वोई घर है जी हमारा… हम तो जी सोने की खात्तर गए है छत पे अक इनके हाँ से चिल्ल पुकार सुनाई पड़ी… छत से देक्खा तो यो दोंनों दाद्दी पोत्ती रोए चली जा हीं… चिक्खे जा हीं अक बचाओ बचाओ… तब में इसे अपनी घरवाल्ली कू लेक्के निच्चे पहोंचा तो यो सब देक्खा… धू धू करके जल रई हीं मास्टरनी जी… इन्ने कपड़े फाड़ के फेंक्के फेर कम्बल डाल्ला और इंगे लिआए जी…”

“आज बड़े भैया की बहन आई थीं क्या…?” दादी जी ने पूछा तो भाभो ने जवाब दिया “मुझे कुछ ना पता जी, मास्टरनी जी कईंकू गई हीं दिन में | बाद कू क्या हुआ कुछ ना पता…” भाभो और लाला जी इस तरह झुक झुक कर बात कर रहे थे जैसे उनके नौकर हों – उनके लिये तो रायबहादुर डा. रस्तोगी साहब के घर में घुसना ही एक सपने के पूरे होने के जैसा था… भले ही किसी कारण से आना हुआ वहाँ – पर देखने को तो मिला वो घर जिसकी गिनती शहर के कुछ गिने चुने घरों में होती थी…

हूँ… तोये बात है..” भाभो की बात से कुछ अनुमान लगाती और सरोज का माथा चूमती दादी बोलीं “रोओ मत लाली, सब ठीक हो जाएगा | कुछ नहीं होगा आपकी भाभी को | हम सब हैं ना… चिंता क्यों करती हो…?”

इसी बीच मोटी मिश्रानी जी भी आकर खड़ी हो गई थीं और अपना ही राग अलापने लगी थीं “हमने तो कई बार समझाया पंडत जी को भी और माता जी को भी अक पुजारन की बातों में मत ना आया करो | क्यों अपना घर ख़राब करने पर्तुले हुए हो ? वो तो अपने उन सीधे सादे जेठ जिठानी को ही ना निभा सकी | पर हमारी कोई सुने तब ना | सोचते होंगे अक इस मिश्रानी को क्या हक़ हमारे घर के मामलों में बोलने का…”

“अब इन सब बातों का वक़्त नहीं है मिश्रानी जी | अप्प वहाँ मेहमानों को संभालिये | खाना खा के जाने लगें तो हमें बता दीजियेगा | माफ़ी माँग लीजियेगा हमारी तरफ़ से | वैसे उन लोगों को पता है | डा. साहब ने बता दिया है | आप बस इन लोगों के लिये चाय बनाकर दे जाइये और लाली के लिये गरम दूध और साथ में कुछ खाने के लिये…” मिश्रानी जी को हिदायत देकर दादी जी फिर से लाली को सान्त्वना देने में लग गईं | लाला जी और भाभो वहीँ फ़र्श पर बैठने लगे तो दादी जी ने जबरदस्ती उन्हें उठाकर मूढ़ों पर बैठाया | दोनों ने सकुचाते हुए चाय नाश्ता किया | सरोज की साँस फूल चुकी थी रोते रोते तो दादी जी ने अपने हाथों से उसे गरम दूध पिलाया तब जाकर थोड़ी शांत हुई | फिर जो कुछ उसने बताया उसे सुनकर वास्तव में दादी जी का दिल दहल गया था |

भीतर भाभी शायद होश में आ चुकी थीं और पता चला कि लगातार रोए चली जा रही थीं | दादा जी दादी, भाभो और सरोज को उस कमरे में लिवा ले गए | भाभी को कुछ इंजेक्शन वगैरा लगे हुए थे | दादी जी और भाभो उन्हें चुप कराने में लगे थे | सरोज भी भाभी के मुँह पर प्यार से हाथ फिराती फूट फूट कर रो रही थी “भाभी रोओ मत तुम | तुम ठीक हो जाओगी जल्दी से फिर हम दोंनों संभल चलेंगे | नहीं रहेंगे यहाँ | सब गंदे लोग हैं यहाँ… पिताजी भी… में किसी से भी बात नहीं करूँगी…”

दादा जी ने दादी को समझाया कि भाभी नीचे से काफ़ी जल चुकी हैं क्योंकि जलता हुआ पेटीकोट वहाँ चिपक गया था, और जब इन लोगों ने कपड़े खींच कर निकाले तो वहाँ से जलती हुई खाल भी खिंच आई थोड़ी सी जिससे ज़ख्म भी हो गया है और ठीक होने में कुछ वक़्त लगेगा | अच्छा हो संभल खबर भिजवा दी जाए और जब तक कोई वहाँ से आता है तब तक दुलहिन को अपने पास ही रखा जाए…

ट्रिंग ट्रिंग… अभी ये लोग बात कर ही रहे थे कि दादा जी के फोन की घण्टी बज उठी | दादा जी ने फोन उठाया, बात की, फिर झुँझलाते हुए दादी को बताया “थाने से फोन था | महाराज जी बीवी को आग लगाकर खुद थाने जाकर बैठ गए कि भई अपनी बीवी को ज़िंदा आग की लपटों के हवाले करके आए हैं क्योंकि हमारी माँ और बहन यही चाहती थीं… अब आप हमें अरेस्ट कर लीजिए और फाँसी चढ़ा दीजिये… वाह… क्या ऊँची सोच है…? सारी दुनिया को रास्ता दिखाते हैं और खुद…? वो तो थानेदार अच्छी तरह वाकिफ़ है पण्डित से सो बोला जो भी हुआ उसे भूल जाइए और घर जाइए | घर के झगड़े घर ही में निबटाने की कोशिश कीजिये | दूर दूर तक लोग आपको पूजते हैं | ऐसा कुछ मत कीजिये कि आपके उस सम्मान को कोई ठेस लगे | अब रो रहे हैं वहाँ फोन पर कि पत्नी और बच्ची को क्या मुँह दिखाएँगे | ये सारी बातें पहले सोचने की होती हैं न कि बाद में पछताने की… ख़ैर आप सँभाल लीजियेगा | क्या फ़ायदा हम गुस्से में कुछ उल्टा सीधा बोल बैठें तो…” ये लोग पिताजी को अपने बड़े बेटे की तरह मानते थे और उसी तरह लाड़ भी लड़ाते थे और गलत होने पर डाट भी देते थे | पिताजी भी इन लोगों का अपने माता पिता की ही भाँति सम्मान करते थे |

उसके बाद कुछ दिन सरोज, भाभी और पिताजी वहीँ रहे थे | फूफा जी को वहीँ बुलाकर सारी बातें समझाई गई थीं और दादी को फूफा जी धामपुर छोड़ आए थे तब पिताजी सरोज और भाभी को लेकर घर गए थे | उधर जीराज के लौटने पर जब उसे दादी से सारी बातें पता लगीं तो उसने तुरन्त केशव गार्ड के हाथ संभल खबर भिजवा दी थी कि चाचा जी जल्दी से आकर बुआ को ले जाएँ… यहाँ उनकी जान को ख़तरा है… और दो इदं बाद ही बड़े मामा जी और मामी जी आ गए थे सरोज और भाभी को लिवाने… भाभी ज़ख्म ठीक होने तक बड़े घर ही रही थीं और दादी और बुआ लोगों ने उनकी ख़ूब सेवा की थी और उनका मन भी बहलाने की कोशिशें की थीं | पिताजी भाभी से लिपट कर ख़ूब रोए थे | दादा जी और दादी ने भी काफ़ी लानत मलानत की थी पिताजी की | पिताजी को अहसास तो था अपनी भूलों का… पर आज सरोज सोचती है कि काश कभी दादी और बुआ ने पिताजी के दिल का दर्द समझने की कोशिश की होती या कभी भाभी को ही समझने की कोशिश करता… पर कौन करता… आखिर को भाभी भी थी तो औरत ही… यानी कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में “अबला नारी…”

क्रमशः………..

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