सौभाग्यवती भव – अध्याय सोलह

सोलह – जवान होती सरोज

डा. साहब के घर रहकर भाभी का शरीर का ज़ख्म तो भर चुका था | हाँ, दिल का ज़ख्म गहरा था जिसका भरना आसान नहीं था | पर शायद उन्होंने उसे भूल जाने में ही सारे घर भर की भलाई समझी और जला हुआ ठीक हो जाने के बाद घर वापस आ गई थीं | उन्होंने पिताजी को भी माफ़ कर दिया था | हालाँकि सरोज नहीं चाहती थी कि भाभी पिताजी को माफ़ करें | एक बार दबी जबान में उसने भाभी से ऐसा ही कुछ कहा भी था | तब भाभी ने प्यार से उससे कहा था “अभी तू ये सब नहीं समझ सकती लाली… समझेगी एक दिन जब खुद किसी की पत्नी और किसी की माँ बनेगी…” और वास्तव में भाभी सही थीं… सरोज भी काफ़ी कुछ समझ गई थी… पर काफ़ी देर बाद…

आज बिब्बी के शरीर के पास पप्पू रग्घू के इंतज़ार में बैठी नीलम सोच रही थी कि बिब्बी जब भी कोई किस्सा सुनाने बैठती थीं अपनी शादी से पहले का, और काफ़ी हद तक बाद का भी, तो इतने सारे लोगों के होते हुए भी बिब्बी की दुनिया ख़ासतौर से तीन ही लोगों के इर्द गिर्द सिमट कर रहा जाती थी – भाभी, पिताजी और दादी – और उन लोगों की ही बातें बताने के लिये कुछ पात्र और थे, जिनमें थीं बुआ, फूफा जी, चाचा, चाची और कुछ और लोग – जैसे दरबारन – जिनके बारे में बिब्बी बताती थीं कि वे छिप छिप कर सिगार और शराब पिया करती थीं जान पहचान वालों से मँगवा कर और बेहद ख़ूबसूरत थीं – पड़ोस के बन्ने से छिप छिप कर मिला करती थीं – रात को कई बार कुछेक ने छत पर बन्ने के साथ देखा था उन्हें – और ये भी कि तब भी लोग बिब्बी की ख़ूबसूरती के सामने दरबारन की ख़ूबसूरती को फीका ही मानते थे… और इस बात का अफ़सोस दरबारन को हमेशा रहा… क्योंकि बिब्बी की शादी के बाद वो उनकी रिश्ते की जेठानी भी बन गई थी और कभी दम भरती थी कि जयन्त उस पर जान देते थे…

ख़ैर, ये बातें बाद में… अभी तो बात चल रही है सरोज की चढ़ती जवानी की… सरोज की फोटो देखकर चुलबुली मिनी ने अपनी माँ को आँख मारकर कहा था “देखा मम्मी, अम्मा कितनी ख़ूबसूरत थीं अपनी जवानी के दिनों में | हैं तो नीलम मौसी भी अम्मा के जैसी ही – बिल्कुल डुप्लीकेट लगती हैं अम्मा की – पर अम्मा की फोटो में जो बात है वो नीलम मौसी में…? ऊँ हूँ… कभी नहीं… अच्छा अम्मा, तुम्हारे आगे पीछे तो लड़के चाँस लेने को घूमते होंगे…? नहीं…?” मचलती हुई मिनी ने पूछा तो हेमा ने डपट दिया “चुप कर मरी, ऐसी मसखरी की बातें पूछें हैं कोई बड़ों से…?”

“तो क्या हुआ ? अम्मा ही तो हैं हमारी… बताओ ना अम्मा…” और हेमा के डाटते डाटते भी मिनी वहीँ सरोज के पलँग से सट कर स्टूल पर बैठ गई |

“अरी अब क्या सुनेगी… अब तो बस मरी ये टूटी हड्डियाँ भर बची हैं बस… अब क्या…” मन ही मन उन दिनों की मीठी यादों में खोती हुई और मन में गुदगुदाती हुई सरोज बोली |

“मिनी जा जाके अपना होमवर्क पूरा कर… मारूँगी नहीं तो… चल यहाँ से…” हेमा ने डाट कर मिनी को वहाँ से भगा दिया | शायद उसे लगा होगा कि दादी को बिना वजह परेशान करने में लगी हुई है | पर सरोज तो खो चुकी थी सरीन के खत में…

एक तरफ़ जहाँ भाभी सरोज के रूप रंग को सजाने सँवारने में लगी रहती थीं – उसे एक से एक आकर्षक कुर्ते पायजामे, लहँगे कुर्ती, फ्राक पायजामे, गरारे, शरारे सिल सिल कर पहनाती रहती थीं – ऐसी फिटिंग कि उसके बदन पर किसी की नज़र पड़े तो बस फ़िसलती ही चली जाए और सामने वाला एक आह भरकर रातों को जागने को मजबूर हो जाए | कई बार बुआ ने भाभी को रोका था इस तरह के कपड़े सरोज को न पहनाएँ पर भाभी ने जवाब दिया था “मैं कुछ नया नहीं कर रही हूँ बीवी जी | ज़माने के साथ तो चलना ही पड़ेगा ना | अच्छे घर में ब्याह शादी करना हो तो अच्छे घरों के तौर तरीके भी तो सीखने होंगे ना… और देखो तो लगती कितनी प्यारी है… जैसे कोई राजकुमारी… सच बताऊँ बीवी जी मेरी सरोज तो किसी राजा घर जाएगी…”

“हाँ हाँ एक तू रानी और एक तेरी यो राजकुमारी… बस बस इत्ती ऊँची मत ना उड़ अक गिरे तो ज़मीन भी नसीब ना हो…”

और शायद बुआ की वो हाय पूरी तरह लगी थी सरोज को | वास्तव में इतनी ऊँची उड़ान भरी थी सरोज ने कि हर किसी के मुँह से बस यही निकलता था “भगवान इस राजकुमारी को बुरी नज़र से बचाना…” और भाभी पिताजी ने भी सहारा दिया था उसके पंखों में हवा भरने में | पर शायद हवा कम थी या फिर पंख ही कमज़ोर थे कि ऐसी गिरी कि बिल्कुल ही टूट गई | एक एक पंख छितरा के ना जाने कहाँ कहाँ को बिखर गया – सरोज की पहुँच से बहुत दूर कहीं – जिन्हें अब बीनना भी मुश्किल…

भाभी लगी थीं सरोज का भविष्य सँवारने की कोशिश में और सरोज कल्पनाओं के पंखों पर न जाने कहाँ उड़ी चली जा रही थी | पिक्चर देखने का शौक़ तो था ही | पिताजी को सिनेमा हाल के फ्री में पास मिलते थे | ठेकेदार पण्डित भगवानदास का सिनेमाहाल था और वे खुद थे स्कूल की मैनेजिंग कमेटी में | शहर के दूसरे लोगों की तरह वे भी पिताजी को बहुत मानते थे | इसीलिये सम्मानस्वरूप जो भी नई पिक्चर लगती थी उसके पास खुद ही भिजवा दिया करते थे घर पर | पिताजी सबको लेकर पिक्चर देखने जाते थे | दादी को बेहद शौक़ था पिक्चरों का | तो वे सबसे पहले तैयार होकर और सर से लेकर टखनों तक की चादर ओढ़कर रिक्शा में जाकर बैठ जाया करती थीं | भाभी बहुत कम जाती थीं | उन्हें लगता था कि अगर पिक्चर देखने चली गई तो घर के सारे काम रह जाएँगे | हाँ कभी रात का शो देखने जाते थे तो दादी नहीं जाती थीं – बस सरोज पिताजी और भाभी के साथ जाती थी और दोनों के बीच बैठकर पिक्चर देखा करती थी | पिक्चर देखते देखते उसे महसूस होता था जैसे उसके कन्धे पर कुछ छू रहा है | पीछे घूम कर देखती थी तो पाती थी कि रसिक हृदय पिताजी सरोज की पीठ के पीछे कुर्सी पर हाथ रखकर भाभी की गर्दन सहला रहे होते थे और भाभी अपने में सिकुड़ी जाती थीं | सरोज सोचती थी कि भाभी के कन्धे में दर्द हो रहा होगा तभी पिताजी सहला रहे हैं… बाद में जब समझना शुरू किया तब खुद ही शरमा कर हँस पड़ती थी और पिताजी के आशिक़मिजाज़ होने पर बलिहारी जाती थी… वापसी में रिक्शा में बैठे पिताजी पिक्चर के किसी रोमांटिक सीन की बात करते थे भाभी से और भाभी सकुचा कर बोलती थीं “कुछ तो शरम कर लो… बच्ची पास में है…”

“अरे तो हम किसी दूसरे की औरत से बात थोड़े ही कर रहे हैं… अपनी बीवी से ही तो बोल रहे हैं… क्यों भई लाली…?” पिताजी शरारत से हँसते हुए पूछते और सरोज ऐसे “हाँ” में सर हिलती जैसे दादी अम्मा सब कुछ समझ रही थी… वैसे काफ़ी कुछ समझने भी लगी थी फिल्में देख देख कर और नई नई ब्याही गुटल की सुहागरात की बातें सुन सुनकर…

“हटो भी…” भाभी शरमाती हुई बोलतीं और पिताजी मीठी हँसी हँस देते | पिताजी हँसते थे तो उनके दूधिया क़रीने से जड़े हुए दाँतों की पंक्ति से मानों रोशनी की किरणें फूट फूट पड़ती थीं | सारी दुनिया की खुदाई एक तरफ़ और पिताजी की वो लुभावनी हँसी एक तरफ़… पिताजी की भूरी आँखों और उस मनमोहक हँसी का ही तो कमाल था कि शहर की जवान लड़कियों से लेकर पढ़ी लिखी मास्टरनियाँ तक उन पर मरती थीं | गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल जो पिताजी के साथ स्कूल में पढ़ी भी थीं – उनके बारे में तो लोग कहते थे कि उनका बस चले तो पति को छोड़ पिताजी के साथ आ बैठें | भाभी इन सब बातों को सुनकर हँस भर देती थीं – जानती थीं कि पिताजी आशिक़मिज़ाज़ तो हैं पर हैं एकपत्नीव्रती और परिवार का ख़याल रखने वाले | यों पिताजी को लड़कियों और औरतों के साथ चुहल करने में मज़ा बहुत आता था | एक बार तो स्कूल की मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग थी | पिताजी टीचर्स की तरफ़ से रिप्रेजेंटेटिव थे | असल में गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल पर किसी ने इल्ज़ाम लगाया था कि उनके किसी के साथ रिलेशन हैं तो वे लड़कियों का चरित्र क्या बनाएँगी ? इसी बात को लेकर इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई थी | वहाँ गम्भीर चर्चा चल रही थी कि पिताजी बीच में खड़े होकर बोलते हैं “अरे भाई क्या आप लोगों को कुछ अक्ल भी है ? उस भद्दे चेचक के दागों वाले आदमी के साथ इतनी ख़ूबसूरत बला का रिश्ता जोड़ रहे हो | अरे हमारे साथ जोड़ते तो कुछ बात भी थी… हम तो हैं ही स्कूल के वक़्त से ही इनके दीवाने… पर इन्होंने घास ही नहीं डाली…” और प्रिंसिपल बहन जी “क्या पंडत जी आप भी…?” कहकर और शायद मन ही मन खुश होती उन परेशानी के क्षणों में भी हौले से शरमा कर मुस्कुरा दी थीं और इस तरह हलके फुल्के माहौल में मीटिंग खत्म हो गई थी |

तो, ज़िंदगी गुज़रती जा रही थी अपनी रफ़्तार से | भाभी के साथ घटी उस दुर्घटना के बाद काफ़ी दिनों बड़े मामा जी और मामा जी वहाँ रहे थे | जब उन्हें लगा कि अब सब ठीक है और भाभी का मन अच्छा हो चला है – या जैसा कि सरोज सोचती है कि भाभी मन अच्छा होने का बस दिखावा भर कर रही थीं जिससे पिताजी को अपराधबोध न हो – तो संभल वाले वापस लौट गए थे | जाते जाते सरोज के लिये सोने की पतली पतली चार चूडियाँ और कानों के कुण्डल मक्खन सर्राफ़ से बनवाकर उसे पहना गए थे | सरोज कई दिनों तक मुहल्ले भर में दिखाती फिरी थी “मेरे मामा जी ने दिलवाए हैं… हैं न कितने सुन्दर…?”

“जब तुम सुन्दर तो तुम्हारी हर चीज़ सुन्दर…” हर कोई यही जवाब देता था | और ये सच भी था – पूरा शहर सरोज की सुंदरता का दीवाना था | चाहे हमउम्र लड़के लड़कियाँ हों या फिर उनके माँ बाप | लड़कियाँ उससे दोस्ती करना चाहतीं तो लड़के उसे अपनी बनाकर अपने सीने में छिपा लेना चाहते हर किसी की नज़रों से बचाकर | और लड़कों के माँ बाप ? अपने घर की बहू बनाकर घर में उसके रूप का उजाला भरना चाहते और उसके अल्हड़पने पर निछावर हो जाना चाहते | कुदरत ने इतने सालों में तबीयत से पूरी फ़ुर्सत में गढ़ा था एक एक अंग सरोज का और सारे रंग रूप लुटा दिये थे उस सूरत को बनाने में – गुलाब की पंखुड़ियों से खिले खिले गुलाबी गुलाबी होंठ… झील सी गहरी बोलती सी आँखें कि हर किसी का दिल चाहे उनमें डूबकर बाहर न निकलने का… खिलते कमाल जैसे गोरे गोरे चेहरे पर गालों में पड़ते गड्ढे जिनमें फँसकर किसी का भी बाहर निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर… पिताजी जैसे दूधिया मोती से क़रीने से सजी दंतपंक्ति – जब मुस्कुराती तो चमेली के फूलों की वर्षा सी होती लगती… सुराहीदार गर्दन जिसे देखकर अच्छे अच्छों को सुरूर आ जाए… रेशम जैसे मुलायम काले घने लम्बे बालों की कमर पर लहराती बलखाती लम्बी नागिन सी चोटी किसी को भी डसने के लिये काफ़ी थी… बालों की एक लत मीना कुमारी के अंदाज़ में माथे पर गिरती हुई गोरे चौड़े मस्तक को धूप छाँव की सी आभा प्रदान करती हुई… सुडौल संगमरमरी बाँहें… पहाड़ की चोटी से नुकीले वक्ष के उठान जिन पर नज़र पड़े तो फिसलती चली जाए और सँभलने का मौक़ा भी ना मिले… एक एक सेंटीमीटर अनुपात में नपे हुए नितम्ब… सुन्दर गुलाबी पैर… कोयल सी पुरकशिश आवाज़ – गाती तो फिज़ां में मस्ती घुल जाती… दुपट्टा कमर से कसकर पैरों में घुँघरू बाँध फ़िल्मी गानों की नकल करती डोलती तो धरा आकाश झूम उठते… जहाँ खड़ी हो जाती अपने रूप रंग की रोशनी से उजाला भर देती और अपने चुलबुलेपन से रोतों को भी हँसा देती… नीलम को याद है बिब्बी का वो रूप रंग… फ़िदा थी वो उस राजकुमारी पर और सोचती थी काश बिब्बी के इस रूप का एक प्रतिशत भी उसे मिल जाता… बहरहाल…

सरोज ने सुनाया था वो किस्सा ख़ूब रस ले लेकर और नीलम भी सुनकर हँसी से लोट पोट हुई जाती थी | जिस मकान में ये लोग रहते थे उसके पास ही कुछेक मकान छोड़कर एक और परिवार रहता था – हरमेश सरीन का परिवार | दो तीन भाई बहन थे वे | बड़ा हरमेश ही था | दीवाना था सरोज का | पिताजी के पास ट्यूशन पढ़ने आया करता था | पिताजी सरोज को भी कुछ कुछ समझाने के लिये पास ही बैठा लेते थे | सरोज देखती थी कि हरमेश का मन पढ़ने में कम और सरोज को घूरने में ज़्यादा लगता था | पिताजी या तो कुछ समझते नहीं थे या फिर समझ कर भी बच्चों की नादानी समझकर ताल जाते थे | एक दिन की बात – सरोज स्कूल से घर वापस आ रही थी | स्कूल था तो सामने ही पर मेन गेट दूसरी तरफ़ को था | लिहाज़ा ढाली से सीढ़ियाँ चढ़कर तब घर के सामने वाली सड़क पर आया जा सकता था | घूम थोड़ा लम्बा हो जाता था और बीच में कुछ ख़ाली जगह पड़ जाया करती थी | वहीँ उस रोज़ हरमेश खड़ा था | हरमेश की बहन सुमन सरोज की अच्छी सहेली थी और दोनों साथ साथ ही आ रही थीं | रास्ते में ही हरमेश ने सरोज का हाथ कोहनी से पकड़ कर रोक लिया | सरोज हक्की बक्की – ये क्या है भई…? ज़िंदगी में पहली बार ऐसा कुछ हुआ था उसके साथ | सुमन की तरफ़ देखा अचकचाकर तो बस वो धीरे धीरे मुस्कुरा ही रही थी | वो शायद भाई के मन की बात जानती थी | सरोज का हाथ पकड़ कर हरमेश ने उसकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करनी शुरू कर दी | सरोज इस सबसे परेशान अपना हाथ छुड़ाने में लगी थी | तब हरमेश बोला “हाथ छोड़ने के लिये नहीं पकड़ा जाता सरोज… अब तो मरकर भी नहीं छूटेगा ये हाथ…”

“हरमेश, मेरा हाथ छोड़ो, दुःख रहा है…”

“ओ, दुःख रहा है ? चलो छोड़ देते हैं | पर पहले एक वादा – कल दोपहर साढ़े दो बजे यहीं मिलोगी | बोलो हाँ…”

“साढ़े दो बजे” सुनकर सरोज को हँसी आ गई और उसने शैतानी में हाँ कर दी | घर वापस आई तो किसी काम में मन ही नहीं लगा | सोच रही थी क्या था वो सब ? सोचा भाभी को बता दे | पर फिर सोचा कि देखें कल क्या होता है | बाद में बताएँगे | इसी उधेड़बुन के चलते वो दिन जैसे तैसे गुज़ारा | अगले दिन स्कूल की तो छुट्टी थी पर सुमन आ गई थी सरोज को बुलाने | दोनों ढाली पर पहुँचीं तो हरमेश पहले से ही वहाँ खड़ा था | सुमन हरमेश और सरोज को अकेला छोड़कर पास ही कहीं जाकर बैठ गई | सरोज की धड़कनें तेज़ तेज़ चल रही थीं | समझ नहीं पा रही थी क्या होगा | दोनों कुछ देर चुप खड़े रहे | न तो हरमेश ही कुछ बोलने की हिम्मत जुटा पा रहा था न ही सरोज कुछ बोल पा रही थी | आखिर हिम्मत जुटा कर हरमेश ही बोला “सरोज मैं तुमसे… मेरा मतलब…” और फिर थूक गटक कर जल्दी से सरोज का हाथ पकड़ कर एक मुड़ा हुआ कागज़ उसके हाथ में रख दिया और चुपचाप वहाँ से चला गया | सरोज जहाँ बिल्कुल भोली थी वहीँ सुमन कुछ तेज़ चालाक थी | भाई का ये संकोच देखकर उसने माथा पीट लिया और हतप्रभ खड़ी सरोज के पास आकर उसके कन्धे पर हाथ रख दिया तब सरोज ने चौंक कर उधर देखा | कुछ देर वो समझ ही नहीं पाई कि ये सब हुआ क्या था | दोनों सहेलियाँ घर वापस लौट चलीं | सरोज के हाथ में वो पेपर उसी तरह जकड़ा हुआ था और हथेली के पसीने से काफ़ी भीग भी चुका था |

सुमन का घर पहले आता था सो वो रास्ते में ही रुक गई थी | सरोज खोई खोई सी चित्रलिखित सी ना जाने कब में घर के दरवाज़े पर पहुँच गई | पिताजी घर आ चुके थे और सरोज का ही इंतज़ार कर रहे थे | चाँस की बात थी कि बुआ भी आई हुई थीं |

“आ गई लल्ली…? आ जल्दी आ… देख तेरी भाभी ने पकौड़ियाँ बनाई हैं अँगूर के पत्तों की… आ जा जल्दी…” पिताजी की आवाज़ कानों में पड़ी तो सरोज को पता चला कि घर पहुँच चुकी थी | पिताजी की बात सुनकर धीरे से मुस्कुराई और सीधी रसोई में जा बैठी | भाभी सबको पकौड़ियाँ देने में लगी थीं | पिताजी ने खोई खोई सरोज को देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ | फिर उसके हाथ में पकड़े कागज़ पर नज़र गई – जो सरोज ने अभी तक फेंका नहीं था | “ये क्या है…?” पिताजी ने पूछा तो सरोज ने बिना पढ़े ही पिताजी को पकड़ा दिया | पिताजी ने खोलकर पढ़ा – सरोज की तरफ़ देखा – भाभी और बुआ असमंजस में पिताजी को ही देखे जा रही थीं | बुआ शायद कुछ समझ रही थीं तो प्रश्न दाग दिया “क्या बात है… सब ठीक तो है… देक्खूँ तो…” न जाने क्या बात आई पिताजी के मन में कि वो ठठाकर हँस पड़े | बुआ बार बार पर्चा देखने की ज़िद कर रही थीं | भाभी और सरोज असमंजस में पड़ी बस पिताजी का मुँह ताके जा रही थीं | आखिर पिताजी बोले “अरे कुछ नहीं बस… बाद में बात करेंगे… लाओ जी अभी तो पकौड़ी खिलाओ सरोज की भाभी…”

दूसरे दिन पिताजी के सारे स्टूडेंट्स आए थे ट्यूशन पर लेकिन हरमेश नहीं आया था | तीन चार दिन ऐसे ही गुज़र गए | सरोज समझ नहीं पा रही थी कि हरमेश आ क्यों नहीं रहा था | उस पर्चे में क्या लिखा था ये भी उसे मालूम नहीं था | आखिर उमेश से पिताजी ने एक दिन पूछ ही लिया “भई आजकल हरमेश नहीं आ रहा ? पता तो लगाओ क्या बात है ? कल बुलाकर लाना उसे…” और अगले दिन हरमेश पिताजी के पास पढ़ने आया था | दूसरे बच्चों के साथ सरोज भी बैठी हुई थी | पिताजी ने ज़ेब से वही पर्चा निकाला तो सरोज का दिल धक धक करने लगा – ना जाने पिताजी क्या करेंगे अब ? कितनी पागल है वो भी जो ये पर्चा चुपचाप बिना पढ़े ही पिताजी को थमा दिया… “मेरे सपनों की रानी, मेरा दिल हर पल तुम्हारे लिये ही धड़कता है | तुम हर वक़्त मेरे ख़यालों में बसी रहती हो | रातों को मेरे सपनों में आती हो | मुझे सारी रात सोने नहीं देतीं तुम | देखो अगर मेरे दिल पर ज़रा सा भी तरस आता है तुम्हें तो प्लीज़ किसी दिन ख़ूब देर के लिये मुझसे आकर मिलो | मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता – मर जाऊँगा तुम्हारे बिना | आज जयशंकर प्रसाद पढ़ते वक़्त मैं तुम्हें ही देखे जा रहा था | पढ़ने में मन ही नहीं लगता | अगर तुम मुझे नहीं मिलीं तो मैं जान दे दूँगा अपनी | लिखता हूँ ये ख़त तुम्हें दिल के लहू से, टुकड़ों में न बिखर जाए इतना ख़याल रखना | पढ़ कर फाड़ कर फेंक देना | किसी के हाथ न पड़ने पाए | तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा | तुम्हारा और सिर्फ़ तुम्हारा – आशिक़ |”

पिताजी ने चिट्ठी पढ़नी शुरू की तो पहले तो सरोज घबरा रही थी – पर फिर चिट्ठी में लिखी बातें सुनकर उसे हँसी भी आ रही थी | पिताजी पढ़ रहे थे और सरे स्टूडेंट्स हैरत में पड़े पिताजी को देख रहे थे | पिताजी पढ़ चुके तो किसी ने पूछ ही लिया “गुरू जी ये क्या था…?”

“कुछ नहीं, बस ऐसे ही रास्ते में पड़ा मिल गया था | किसी आशिक़मिज़ाज़ ने लिखा है | आजकल के लौंडे, अरे भई पहले पढ़ लिख लो बाद में सोचना ये इश्क विश्क के बारे में… हमने भी किये हैं अपनी उम्र में – पर पहले अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करके…” पिताजी मुस्कुराते हुए बोल रहे थे, सरोज नीचे मुँह किये हँस रही थी, सारे स्टूडेंट्स साँस रोके सुन रहे थे – और हरमेश…? वो नीचे मुँह झुकाए पसीना पसीना हो रहा था |

“फिर उसका क्या हुआ…?” नीलम ने पूछा तो सरोज पहले तो ख़ूब हँसी थी, फिर बताया था “कुछ दिन तो वो आया ही नहीं पढ़ने | बाद में आता भी था तो मेरे सामने नज़रें झुकाए रहता था | फिर तीजों पर उसकी झिझक दूर हुई थी झूला झूलते वक़्त… वो भी तेरे जीजा जी छेड़खानी कर रहे थे तो उनका साथ देते हुए | फिर तो सब ठीक हो गया था | उसे भी समझ आ गया था कि गलत जगह हाथ डाला था उसने…

क्रमशः……..

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