Monthly Archives: June 2012

मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा

मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा

मैं आदिहीन, मैं अंत हीन, मैं जन्म मरण से रहित सदा |

मुझमें ना बन्धन माया का, मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा ||

जिस दिवस मृत्यु के घर में यह आत्मा थक कर सो जाएगी

तन लपटों का भोजन होगा, बन राख़ धरा पर बिखरेगा |

उस दिन तन के पिंजरे को तज स्वच्छन्द विचरने जाऊँगी

मेरी आत्मा मानव स्वरूप, फिर भी मैं शाश्वत सत्य सदा ||

जैसे सिकता के तट पर हो स्वर्गानुरक्त कोई वृक्ष खड़ा

धरती के आकर्षण को तज ऊँचा ऊँचा उठता जाता |

यों ही जीवन के आलिंगन को तज कर शाश्वत आत्मा मेरी

हो जाएगी वह मुक्त, अन्त से हीन, बंध से रहित सदा ||

था प्रथम सृष्टि का बीज गिरा जब धरती पर सदियों पहले

मेरा आस्तित्व रहा तब भी, मैं जीवित थी सदियों पहले |

जब जब भी प्रलय छा जाएगी, फिर नई सृष्टि जब जन्मेगी

तब भी मेरी ही कथा चलेगी सृष्टि पृष्ठ पर सदा सदा ||

मैं स्वयं प्रकृति का रूप बनी, और पुरुष रूप भी मैं ही हूँ

मैं हूँ असीम, मैं हूँ अनन्त, मैं पूर्णकाम, मैं काम रहित |

मैं तुहिन बिन्दु का मौन पात, मैं जीवन का सागर अपार

मैं एक चिरन्तन चिन्तक हूँ, हूँ जन्म मरण से रहित सदा ||

मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा

मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा

 

मैं आदिहीन, मैं अंत हीन, मैं जन्म मरण से रहित सदा |

मुझमें ना बन्धन माया का, मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा ||

जिस दिवस मृत्यु के घर में यह आत्मा थक कर सो जाएगी

तन लपटों का भोजन होगा, बन राख़ धरा पर बिखरेगा |

उस दिन तन के पिंजरे को तज स्वच्छन्द विचरने जाऊँगी

मेरी आत्मा मानव स्वरूप, फिर भी मैं शाश्वत सत्य सदा ||

जैसे सिकता के तट पर हो स्वर्गानुरक्त कोई वृक्ष खड़ा

धरती के आकर्षण को तज ऊँचा ऊँचा उठता जाता |

यों ही जीवन के आलिंगन को तज कर शाश्वत आत्मा मेरी

हो जाएगी वह मुक्त, अन्त से हीन, बंध से रहित सदा ||

था प्रथम सृष्टि का बीज गिरा जब धरती पर सदियों पहले

मेरा आस्तित्व रहा तब भी, मैं जीवित थी सदियों पहले |

जब जब भी प्रलय छा जाएगी, फिर नई सृष्टि जब जन्मेगी

तब भी मेरी ही कथा चलेगी सृष्टि पृष्ठ पर सदा सदा ||

मैं स्वयं प्रकृति का रूप बनी, और पुरुष रूप भी मैं ही हूँ

मैं हूँ असीम, मैं हूँ अनन्त, मैं पूर्णकाम, मैं काम रहित |

मैं तुहिन बिन्दु का मौन पात, मैं जीवन का सागर अपार

मैं एक चिरन्तन चिन्तक हूँ, हूँ जन्म मरण से रहित सदा ||

 

https://purnimakatyayan.wordpress.com/

 

मैं तो हूँ रागमयी श्रृंगारमयी

मैं तो हूँ रागमयी श्रृंगारमयी

मैं तो सर से पाँव तलक हूँ रागमयी, श्रृंगारमयी
अंग अंग में मादक नर्तन, और बनी मैं लास्यमयी ||
माथे पर बिंदिया टीका और बालों में गजरा सोहे
सर पर झूमर, कान में झुमका, करते मुझको गीतमयी ||
कंठ पुष्प का हार, भरे मादकता मेरे तन मन में
बाजूबंद की भीनी खुशबू करती है आल्हादमयी ||
कमर करधनी लटके, जिससे चाल चलूँ मैं मतवाली
छम छम पायल बिछुआ छनकें, करते मुझको तालमयी ||
अंग मेरे अनगिनती भूषण कलियों ने हैं पहनाए
चम्पा बेला और चमेली करतीं मुझको रागमयी ||
हैं दे डाले प्रकृति नटी ने अपने सारे रंग मुझे
मुक्त भाव से अपना जिनको, बन जाती संगीतमयी ||

सौभाग्यवती भव – उपसंहार

उपसंहार

नीलम भारी मन से नजीबाबाद से वापस आ गई थी बिब्बी की बरसी के बाद | नीलम को याद आ रही थी सरोज के स्कूल की पत्रिका में छपी सरोज की लिखी वो कविता जो उसने रिटायरमेंट से पहले लिख कर दी थी | कितना दर्द था उस कविता में | सरोज के संस्कारों के बाद विन्नी ने नीलम को दी थी पढ़ने को और खुद फूट फूट कर रो पड़ी थी | नीलम ने भी जब पढ़ी तो खुद को सँभाल नहीं सकी थी | इतना दर्द दिल से लगाए बैठी थीं और दुनिया को हँसाती थीं | कैसी थीं तुम बिब्बी…? क्यों थीं ऐसी…? किन क्षणों में गढ़ा थे तुम्हें भगवान ने…? कविता कुछ इस तरह थी:-

बहुत समय पश्चात हाथ में दर्पण लेकर खड़ी हुई
जाने क्या देखा दर्पण ने, भय से थर थर काँप उठा ||
दर्पण ने देखा यह चेहरा नहीं रहा अब कमल समान |
जिस पर गुन गुन गाते भँवरे गान भूल होते निष्प्राण ||
किसी प्रफुल्लित रक्तकुसुम सम छाई थी मुख पर लाली
किन्तु आज इन काले धब्बों ने विचित्र रचना कर डाली ||
मधु के भरे हुए प्यालों सी अलसाई सी ये अँखियाँ
भरी सुराही बनते बनते रह गई सूनी गागरिया ||
श्याम घटा सी लहराती अलकों की छाया कहाँ गई ?
बैठ जहाँ हर व्यथित पथिक को मिलता था विश्राम कभी ||
कोमल संगमरमरी बाँहें, प्रियतम का थीं उपाधान जो
जीर्ण शीर्ण और शुष्क हो चुके काष्ठखण्ड के हैं समान वो ||
कोयल सी वो कूक रसीली, वंशी सी वो तान सुरीली
आज बन चुकी रागहीन रसहीन बेसुरी कर्कश बोली ||
नागिन सा लहराता था तन, गजगामिनी सी मस्त चाल थी
कदलीथम्ब समान किन्तु यह आज देहयष्टि बन बैठी ||
बनी पिशाचिनी जैसी देखो इन्द्रलोक की एक अप्सरा
यही देखकर तो दर्पण भी भय से थर थर काँप उठा ||

अभी भी सोचती है नीलम तो बिब्बी का दर्द उसे रुला रुला जाता है……

बहरहाल, नीलम तो वापस आ गई थी बिब्बी की बरसी के बाद | उसकी माँ रह ही रही हैं उसके साथ पिछले क़रीब एक बरस से – साथ क्या – साथ की तरह | यों नीलम का अपना घर इतना बड़ा है कि उसकी माँ उसके साथ रह सकती हैं – पर आजकल हर किसी को तो अपनी आज़ादी चाहिये | ऐसे में माँ भी नहीं चाहती थीं किसी की आज़ादी में खलल डालना या किसी पर बोझ बनना | “लाली” की बात अलग थी… उसके साथ माँ का एक पूरा युग गुज़रा था – पर यहाँ नीलम की ससुराल में… यहाँ उन्हें अजीब सा लग रहा था सबके साथ एक घर में रहना | पर उन्हें धामपुर में भी अकेले नहीं छोड़ा जा सकता था | आखिर उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए नरेश ने पास ही एक दूसरे फ़्लैट खरीद दिया था माँ के लिये | सिर्फ़ एक “अकेलेपन” को छोड़ कर घर में सारी सुख सुविधाएँ भी मुहैया करा दी हैं – कलर टेलीविज़न, फ्रिज, आधुनिक स्टाइल का बाथरूम, गद्दे वाला डबल बैड, बात रूम में गीज़र, सजी सँवरी रसोई, बिजली जाने पर इन्वर्टर, टेलीफोन, मोबाइल, घर के काम के लिये बाई और वक़्त ज़रूरी के लिये कार और ड्राइवर भी | बस वहीं “आराम” से रहती हैं माँ | नीलम और नरेश कभी कभी वहाँ जाकर मिल आते हैं उनसे | यों फोन पर तो बात रोज़ ही हो जाती है – दिन में कई कई बार हो जाती है – और इस तरह उनका “अकेलापन” दूर हो जाता है…

उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ था | नीलम वहीँ माँ के पास बैठी थी | माँ का एकादशी का व्रत था और उन्होंने नीलम को कुट्टू के चीले खाने को बुलाया था | ईशू तो सुबह ही खाके स्कूल चली गई थी | माँ के पास बैठे बैठे ही नीलम के मोबाइल पर विन्नी का एस एम् एस आया “आज मदर्स डे पर तुम्हें बहुत बहुत प्यार माँ-सी… मेरे लिये तो बिब्बी के जाने के बाद अब तुम्हीं मेरी माँ की जगह हो…” नीलम ने माँ को बताया तो पूछ बैठीं “पप्पू रग्घू का कुछ हुआ ? उस मिनिस्टर से बात होनी थी न… कुछ बात आगे बढ़ी…?”

“कहाँ… ये सारे के सारे पोलीटीशियन बस ऐसे ही होते हैं अम्मा जी…” दुखी भाव से नीलम ने जवाब दिया “आपके साथ होंगे तो ज़ाहिर करेंगे कि आपसे बड़ा और कोई दोस्त है ही नहीं उनका | पर किसी काम के लिये बोल दो तो बगलें झाँकने लगते हैं | अब यहाँ विधायक जी ने कहा था की गवर्नर से मिलवाएँगे | पर जब गिरीश गया तो ऐसे बन गए जैसे कभी कुछ कहा ही नहीं था | सच अम्मा जी हमारा तो मन करता है कि इन सबको एक लाइन से खड़ा करके गोली से उड़ा दिया जाए | सबके सब एक थैली के चट्टे बट्टे हैं…” नीलम आवेश में बोलती जा रही थी और माँ हतप्रभ सी उसके चेहरे को देख रही थी |

“पता ना बेटा, तुम्हारे पिताजी के तो कैसे कैसे रिश्ते होते थे इन लोगों से | भूल गईं त्रिशला को ? वो तो कितनी बड़ी नेता थीं | लेकिन कितने आदर के साथ तुम्हारे पिताजी की बात मानती थीं | इसी तरह बच्चों के केस में जब तुम्हारे पिताजी पुलिस स्टेशन जाकर बैठ गए थे तब सारे के सारे ये पोलीटीशियंस थाने पर जाकर धरना देकर बैठ गए थे कि अगर गुरु जी के साथ ज़रा भी बादसलूकी हुई तो थाने को आग लगा देंगे | याद है थानेदार ने हाथ जोड़कर उन्हें घर भेजा था और तुम्हारे पिताजी शेर की तरह घर वापस पहुँचे थे | उन लोगों में जनसंघी भी थे और काँग्रेसी भी | जनसंघी भूल गए थे उस वक़्त कि तुम्हारे पिताजी काँग्रेसी थे और बराबर उनके साथ डटे रहे थे | क्या ज़माना था वो भी | अगर उन लोगों का साथ न होता तो न जाने क्या हो जाता… और वो ही क्या, तुम्हारे पिताजी और चाचा जी जब धामपुर शिफ्ट हुए थे तो तुम्हारी दादी बताया करती थीं कि इन लोगों की माली हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि आलतू फ़ालतू खर्च कर सकते | सो तुम्हारे पिताजी और चाचा जी ने सोचा कि पढ़ने तो नगीना जाना है धामपुर से | पर अगर रेल का किराया बचा सकें तो कुछ राहत मिल जाएगी | और इन लोगों ने पैदल ही नगीना आना जाना शुरू कर दिया | इनके जितने भी यार दोस्त थे सबके सब बड़े रईस लोग थे | और शहर में क्या दूर दूर तक धाक थी उन लोगों की | पर दोस्ती ऐसी थी कि उन लोगों ने भी क़सम खा ली कि दोनों पण्डित जी पैदल जाएँगे तो हम भी पैदल ही जाएँगे | और क्या, जब जब भी कोई परेशानी आई हर वक़्त साथ खड़े होते थे | तुम्हारे पिताजी का एक्सीडेंट हुआ तो सारे के सारे दोस्तों ने रात दिन एक कर दिया था और एक महीना मुरादाबाद अस्पताल में पड़े रहे थे | जयन्त के वक़्त में सब कैसे तुम्हारे पिताजी के साथ कंधे से कंधा सटाकर खड़े थे – भूल गईं ? और पप्पू रग्घू के केस के समय में – अगर शहर के लोगों का साथ न होता तो अकेले तुम्हारे पिताजी क्या कर लेते ? याद है तुम्हें उनके साथ बच्चों को ढूँढने में रात दिन एक कर दिया था लोगों ने | चिलचिलाती गर्मी और लू में तुम्हारे पिताजी के साथ जंगलों की ख़ाक छानते फिरते थे सबके सब…” माँ बोलती जा रही थी और नीलम को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था उनकी बातों का | कैसे समझाए उन्हें कि ज़माना बदल गया है अब | अब न वो दोस्त रहे, न वो नेता और न उस स्तर की राजनीति | ऊपर से नीचे तह हर कोई दागी है | बस पैसेका मीत है हर कोई “अम्मा जी तुमने तो आज़ादी की लड़ाई से लेकर पप्पू रग्घू तक का ज़माना देखा है | तुम्हारे हिसाब से आज भी लोग वैसे ही होंगे | पर सच बताएँ तो आज अगर पिताजी ज़िंदा होते तो इन भ्रष्ट पोलीटीशियंस को देखकर माता ही पीट लेते | और पॉलीटिक्स ही क्या, आज तो हर जगह यही हाल है | पिताजी सही वक़्त पर चले गए दुनिया से वरना बहुत दुखी होते आज के गिरते हुए नैतिक मूल्यों को देखकर | और सच बात तो ये है कि नैतिक मूल्यों का ह्रास तो उनके सामने ही शुरू हो चुका था | यदि ऐसा न होता तो क्या पप्पू रग्घू उस ज़ुर्म की सज़ा काट रहे होते जो उन्होंने किया ही नहीं ? हद से हद इस बात की सज़ा मिल जाती कि एक ज़ुर्म होते देखा था | खून का इलज़ाम तो न लगता | पर पिताजी और उस वक़्त के लोग, यहाँ तक कि हममें से कोई भी इस सबको समझ नहीं सका…”

“वो तो ठीक है बेटा, पर इन बच्चों का अब होगा क्या…?” नीलम की बात जैसे माँ के गले नहीं उतर रही थी |

“गोस्वामी जी से बात की तो है | देखो क्या होता है |”

“जो भी हो बेटा, कुछ तो करना ही पड़ेगा |”

और देखो वक़्त की बात, अभी दोनों माँ बेटी बात कर ही रही थीं कि गिरीश का फोन आ गया “मौसी जी फ़ाइल ऊपर पहुँच चुकी है | गोस्वामी जी को बोलो अब वक़्त आया है उनके कुछ करने का…” और माँ ने उसी वक़्त सारे देवी देवता मना डाले थे |

अगले कुछ दिन काफ़ी भाग दौड़ के थे – नीलम के लिये, नरेश के लिये, गोस्वामी जी के लिये – नरेश के कई चक्कर लगे गोस्वामी जी के साथ लखनऊ के | उधर जेल में लड़कों के अच्छे व्यवहार के कारण जेल से भी उनका अच्छा रिकार्ड लगा था फ़ाइल में | जेलर ने तो यहाँ तक लिख दिया था कि अगर इन दोनों को राज्यपाल से माफ़ी मिल जाती है तो जेल प्रशासन के लिये बेहद खुशी की बात होगी – क्योंकि ये दोनों ही बच्चे किसी का खून करना तो दूर – किसी दूसरी तरह का छोटा मोटा ज़ुर्म भी नहीं कर सकते – इनका दुर्भाग्य था कि ये इस केस में फँस गए | जमानत के दिनों में दोनों ही शान्ति के साथ जीवन बिताते रहे थे | कहीं किसी क्रिमिनल एक्टिविटी का रिकार्ड नहीं था दोनों का ही | और शहर के लोग तो दोनों से इतना प्यार करते थे कि मुक़द्दमे के सिलसिले में खुद भी भाग दौड़ करने में लगे हुए थे | रूपये पैसे से भी लोगों ने काफ़ी मदद की थी | लिहाज़ा वहाँ के एस एच ओ की रिपोर्ट भी अच्छी थी और इनकी रिहाई की वक़ालत कर रही थी |

उधर पप्पू रग्घू की बहुएँ मौसा जी और मौसी जी को भगवान मान उन्हीं का मुँह ताक रही थीं कि अब कुछ कर सकते हैं तो वही कुछ कर सकते हैं | आखिर रात दिन की ये भाग दौड़ रंग लाई और गवर्नर के सामने जब फ़ाइल पहुँची तो फ़ाइलें पढ़कर और लोगों से इस मुक़द्दमे के बारे में जानकर उनका माफ़ीनामा मंज़ूर कर लिया गया | नरेश ने लखनऊ से ही जानकारी दी थी नीलम को | नीलम ने दोनों बहुओं को फोन किया | ये खबर घर भर के लिये अप्रत्याशित खुशी की खबर थी | नीलम सोच रही थी कि “सौभाग्यवती भव” का आशीर्वाद कभी कभी सही भी हो जाता है | बिब्बी के लिये सही नहीं हुआ – माँ के लिये सही नहीं हुआ – पर उनकी दोनों बहुओं के लिये तो भगवान ने सच कर दिखाया | हे भगवान इसी तरह इस आशीर्वाद को सच करते रहना | वरना लोगों का विश्वास उठ जाएगा इस आशीर्वाद पर से और भविष्य में किसी बहू को भी चरण स्पर्श करने पर “सदा सुहागन रहो… दूधों नहाओ पूतों फलो…” के आशीर्वाद कोई बुज़ुर्ग नहीं देगा |

अब… एक बरस हो चुका है | लड़के दोनों जेल से बाहर आ चुके हैं | शुरू में “जेल” के नाम की वजह से कुछ दिक्क़तें हुईं ज़रूर दोनों को काम तलाशने में | जहाँ जाते थे लोग बात तो प्यार और सम्मान से करते थे, पर काम देने को कोई राज़ी नहीं होता था | पर दोनों के मधुर व्यवहार और ज़िंदादिल मिज़ाज़ के कारण अन्त में क़ामयाबी भी हासिल हुई | बड़े की नौकरी किसी कम्पनी में लग गई है और वो सपरिवार देहरादून चला गया है | कम्पनी वाले खुश हैं उसके काम से | एम कॉम पास है फर्स्ट डिवीज़न | पहले जेल जाने से पहले जहाँ नौकरी करता था वहाँ का रिकार्ड भी अच्छा था | तो तनखाह भी अच्छी है | छोटे ने पी सी ओ के साथ साथ जैनरेटर का कम भी कर लिया है | फोटोकापी की मशीन लगा ली है | कम्प्यूटर का कुछ काम और कुछ कम्पनियों के एकाउंट्स का काम शुरू कर दिया है | उसकी पत्नी की नौकरी अच्छी तरह चल रही है | बच्चों को भी अच्छे स्कूलों में दाखिल करा दिया गया है | पर आगे की राह अभी उतनी भी आसान नहीं है | इस पूरे मुक़द्दमे में और बिब्बी की बीमारी में काफ़ी कर्ज़ सर पर चढ़ चुका है | इसीलिये दोनों भाइयों ने तय किया है कि कोई फिजूलखर्ची नहीं करेंगे और हर महीने अपनी अपनी कमाई में से कुछ हिस्सा क़र्ज़ चुकाने में लगाएँगे | यानी कि तूफ़ान तो थम गया है – पर उसके दौरान जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई में तो अभी वक़्त लगेगा | फिर भी – राहत की साँस तो ली ही जा सकती है…………..

और चलते चलते… नीलम आज सोच रही है कि क्या वास्तव में बिब्बी की ज़िंदगी एक तूफ़ान थी ? लगता तो यही है | पैदा होते ही तूफ़ान आ गया था घर में जब पिताजी को पुलिस गिरफ़्तार करके ले गई थी और उसी दिन से सरोज “करमजली” और उसकी माँ “अभागिन” क़रार दे दी गई थी | फिर तो दोनों ही माँ बेटी ने तूफ़ानों का सामना किया | माँ उसी तूफ़ान की भेंट चढ़ गई | सरोज ने जैसे तैसे सौतेली माँ से निबाह किया पर सारी ज़िंदगी “करमजली” का ठप्पा अपने माथे से न उतार सकी | यों वो खुद भी किसी तूफ़ान से कम थी क्या ? बचपन से लेकर जवानी तक सारा सारा दिन घर में, मुहल्ले में, मिलने वालों के साथ बस धमा चौकड़ी, हँसी के ठहाके और मस्ती में भरकर नाचना गाना | ऐसी तूफ़ान की शादी हुई तो वहाँ भी सबको अपने साथ बहा ले गई और बह चला हर कोई उसके साथ उसकी मस्ती में मस्त होता | ज़िंदगी में जो चाहा वो कर दिखाया | किसी में साहस न था उसकी बात टालने का – इसलिये नहीं कि लोग उससे डरते थे… न न… प्यार करते थे उस ख़ूबसूरत चुलबुली राजकुमारी से बेइंतहा और उसका दिल नहीं दुखाना चाहते थे | पर उसके भाग्य के तूफ़ान ने वहाँ भी उसका पीछा नहीं छोड़ा और जंगलात की आग में उसका सब कुछ जलकर भस्म हो गया | जयन्त के साथ साथ सारी गृहस्थी – सारी खुशियाँ – सारी मस्ती उस आग में जलकर ख़ाक हो गए | न वो हवेली रही न वो राजसी ठाठ | सरोज की तूफ़ानी ज़िंदगी में अब कुछ ठहराव आ गया था तो बच्चों का मुक़द्दमा फिर से एक तूफ़ान लेकर सर पर आ खड़ा हुआ | और ये तूफ़ान इतना लम्बा था कि सरोज के अन्त के साथ ही थमा | पूरे चौबीस बरस लम्बा था | जब तक ज़िंदा रही हाथ पाँव मारती रही बाहर निकलने के लिये – पर आखिर को थक कर चूर हो गई और सदा सदा के लिये शान्ति की नींद सो गई | उसकी बलि लेने के साथ सारे तूफ़ान मानों एकदम से ही थम गए | मानों उसकी मौत का ही इंतज़ार कर रहे थे | एक-डेढ़ बरस के भीतर ही बच्चों का मुक़द्दमा भी खत्म हो गया | जेल से बाहर आकर उन्होंने अपनी अपनी गृहस्थियाँ भी सँभाल लीं | पर वो सरोज जिसे हर वक़्त यही आशीर्वाद मिले थे “सौभाग्यवती रहो, दूधों नहाओ पूतों फलो…” अन्तिम समय तक “करमजली” के संबोधन से छुटकारा पाने का ही प्रयास करती रही और असफल रही | पता नहीं बच्चे उसके तूफ़ानों से कुछ सबक ले पाएँगे या नहीं ? पता नहीं उसके त्याग और बहादुरी का सम्मान भी करेंगे या नहीं ? पिताजी ने ठीक ही तो कहा था ठेकेदार साहब से “पता नहीं कैसा भाग्य लेकर पैदा हुई है…”

आज नीलम को कुछ कुछ शान्ति का भी अनुभव हो रहा है – ये सोचकर कि चलो मरने के बाद ही सही – बिब्बी को कुछ तो संतोष हुआ होगा बच्चों को खुश और सुखी देखकर – और ये भी कि शायद ऊपर आकाश में अपनी “परी माँ और चन्दा मामा की सूत कातती माँ यानी कि सरोज की बुढ़िया नानी” के साथ जब भी वो नीचे देखती होंगी तो अपने दोनों बेटों और पोते पोतियों को सर उठाकर चलते देख सोचती होंगी कि उनकी तपस्या रंग ले ही आई आखिर…

और इधर नीलम की अम्मा जी, बिब्बी की भाभी, बच्चों की नानी – जिन्होंने अपनी आँखों से पूरा युग देखा – जीवन में हर तरह के उतार चढ़ाव देखे – सारा जीवन संघर्ष किया – आज उनके पास न कुछ काम है करने को न ही किसी तरह का कोई संघर्ष उनके जीवन में है | “बीवी जी” यानी नीलम की बुआ भी स्वर्ग सिधार चुकी हैं और अब उनकी भी दिन रात की खिच खिच नहीं है – शान्ति है | “खसमखाई” चाची कब की ऊपर चली गई थीं | अब चाचा भी नहीं रहे | “माता जी” यानी दादी भी कब की पञ्चतत्व में विलीन हो चुकी थीं और उनका रात दिन का “दुलहिन…” भी कभी का बन्द हो चुका था | जाते जाते आशीर्वाद देती गई थीं “सदा सौभाग्यवती रहो, भगवान तुम जैसी दुलहिन हर किसी को दे…” कितना सच हुआ आशीर्वाद ये तो भगवान ही जानता है |

दौड़ दौड़ कर पिताजी की पूजा की तैयारी भी अब नहीं करनी पड़ती – वो तो स्वर्ग में हरयाने वाली करती होगी | बड़ी भाग्यशाली थी हरयानेवाली जो पति के कन्धों पर सुहागिन चली गई – लाल साड़ी में लिपटी, भरी माँग, हाथ भरी चूड़ियाँ पहने | और अब तो पति भी उसके पास चला गया – अमर मिलन के लिये – सच्चा प्यार तो उसी से था न… बाक़ी सब तो ज़िम्मेदारियाँ थीं जिनका निर्वाह करते रहे मरते दम तक… रह गई वो… अकेलेपन की पीड़ा झेलती… पिताजी के यार दोस्तों और दूसरे आने जाने वालों के लिये रात दिन रसोई भी अब गर्म नहीं रखनी पड़ती… न ही किसी तरह की सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ हैं जो पिताजी के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर निबाही थीं…

सरोज की रात दिन की पढ़ाई और अपने पैरों पर खड़े होने की चिन्ता तो उसके ब्याह के साथ ही खत्म हो गई थी | पर दूसरी दूसरी चिंताएँ लग गई थीं – सरोज और जयन्त की फिज़ूलखर्ची से उन्हें रोकना, जयन्त को जिस जिस चीज़ के भी खाने का शौक़ था – उनके घर पहुँचने से पहले सब तैयार करके रखना और पास बैठाकर दोनों को प्यार से खिलाना, जयन्त की बीमारी पर रात दिन एक करके उनकी सेवा करना, जयन्त के बाद सरोज की गृहस्थी सँभाल कर उसके जीवन संघर्ष में उसका साथ देना, समाज के बेसिर पैर के रिवाज़ों की आग में सरोज को तिल तिल करके जलने से बचाने के लिये उसके भीतर साहस पैदा करना, बच्चों के ब्याह शादी की चिंताएँ और ब्याह शादी की ज़िम्मेदारियाँ, फिर बच्चों का मुक़द्दमा, जेल, भगवान से मिन्नतें करना कि दोनों को बरी करवा दें – सारी चिंताओं से मुक्ति पा चुकी हैं | बच्चे जेल से छूटकर आ चुके हैं और उनकी गाड़ी पटरी पर लौटने लगी है | सरोज भी नहीं रही अब जो उन्हें बात बात पर सौतेला मानती रही – पर जाते जाते माँ का दर्ज़ा दे ही गई – जब उस दिन भाभी मिलने गई थीं तो बिली थी आँखों में आँसू भरके “आज तुम्हारी बहुत याद आ रही थी भाभी | सच में भाभी अब बर्दाश्त नहीं होता | कुछ करो भाभी…” भाभी उस दिन वही सरोज की मनपसन्द कचरी बनाकर ले गई थीं | बहू को आवाज़ लगा सरोज ने कहा था “देखा हेमा, ये होती है माँ… कितना याद कर रही थी भाभी को और साथ में कचरी को भी… देखा माँ के दिल तक कैसी पहुँची मेरी आवाज़ ? खुद भी आ गईं कि भई बेटी ने पुकारा है और साथ में कचरी भी लेती आईं…” और भाभी ने सरोज का सर पहले की ही तरह अपनी गोद में रखकर सहलाना शुरू कर दिया था – उसी प्यार और स्नेह से… और अन्त में ज़मीन पर पड़े उसके निर्जीव शरीर के पास ही दोनों तरफ़ हाथ करके ऐसे बैठी हुई थीं जैसे लोगों से कह रही हों “सारी ज़िंदगी भाग दौड़ करती, बच्चों की चिन्ता में घुलती, सब पर प्यार लुटाती और सब्कप्यार पाती, अपनी मस्ती में सबको सराबोर करती, दुखों में भी दूधिया हँसी बिखेरती मेरी बेटी थक के सोई है – कुछ पल शान्ति के साथ सो लेने दो इसे – मत आवाज़ लगाओ…”

अब भाभी को बच्चों की भी फ़िक्र नहीं है कि क्या होगा उनका | अब मिनी और भरत वगैरा के लिये स्वेटर बुनने की भी ज़िम्मेदारी नहीं है – एक तो उम्र नहीं, दूसरे उनकी माँ बहुत होशियार है | नीलम तो है ही सुखी अपनी गृहस्थी में | अपने सारे फ़र्ज़ निबाह चुकी हैं वो | न कोई काम न ज़िम्मेदारी किसी तरह की | अब अगर कुछ है तो बस आराम और अकेलेपन की ऊब | बेटी दामाद अपने अपने झमेलों में व्यस्त | धेवते तूफ़ान के दौरान लगभग ढह चुकी अपनी अपनी गृहस्थियों के पुनर्निर्माण में व्यस्त | अपनी समस्याओं से दो चार होते इनके पास जब भी वक़्त होता है तो ये जाकर उस ७८ साल की बूढ़ी माँ और नानी से कुछ पल को मिल आते हैं और वो इतने में ही खुश हो लेती हैं – हमेशा के लिये उस पल भर की खुशी को अपने ममता के आँचल में बाँध लेती हैं | वरना तो उनका अपना ख़ाली घर भला और कमरे में लगा टी वी भला | बहुत हुआ मंदिर चली गईं | अब उनकी राहें अपने फ़्लैट से शुरू होकर सोसायटी के मंदिर पर जाकर खत्म हो जाती हैं… पर वो दिल से आब भी सबको यही आशीर्वाद देती हैं “सदा सुहागन रहो… दूधों नहओ पूतों फलो…”

सम्पन्न……………….

सौभाग्यवती भव – अध्याय छब्बीस

छब्बीस – पिताजी और सरोज का स्वर्गवास

पप्पू रग्घू को सेशन कोर्ट में दोषी क़रार दे दिया गया था और जज ने “आजीवन कारावास-टिल डेथ” की सज़ा सुना दी थी | निर्दोष होते हुए भी क्यों दोषी क़रार दे दिये गए और वो दोषी नरपाल क्यों खुला घूमता रहा इस बात का उत्तर न किसी वकील के पास था न किसी जज के पास | पर पिताजी, सरोज, भाभी और नीलम और साथ में लड़के इन प्रश्नों में उलझ कर रह गए थे | इन सबके “क्यों……….” निरुत्तर थे | भाग्य को यही मंज़ूर था, यही नियति थी इस परिवार की तो किया ही क्या जा सकता था ? बहरहाल अब आगे की कहानी………..

जज के सज़ा सुनाते ही कोर्ट में ही पुलिस गिरफ़्तार करके जेल ले गई थी | सरोज और पिताजी गए थे बिजनौर कोर्ट में और भाभी घर पर लड़कियों के पास थीं | फ़ैसला सुनते ही दोनों बाप बेटी जड़ बन गए थे | सरोज तो कुछ देर बाद सुबकने लगी थी पर पिताजी को तो जैसे कुछ होश ही नहीं था | शायद सोच रहे थे कि उनकी इस लाडली ने किसका क्या बिगाड़ा था जो इस पर सदा ही आफ़तों के पहाड़ टूटते रहे | शायद सोच रहे थे कि कहीं से कोई ऐसी शक्ति उन्हें मिल जाए जो वे अपनी इस बेटी को अपने साये से इस तरह ढाँप लें कि फिर कभी कोई ग़म उसे छू तक न सके | बस, यहीं वो लाचार थे | इधर पिताजी पत्थर की मूर्ति बने बैठे थे उधर सरोज अपना सुबकना भूल उनके लिये परेशान हो रही थी | कहीं उन्हें कुछ हो गया तो वो कहाँ जाएगी ? उसे कौन संभालेगा ? कौन सहारा देगा उसे ? वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति पिताजी का हाल देखकर परेशान था | निम्मी के ससुर भी थे वहाँ और वे पिताजी का बहुत सम्मान करते थे | पिताजी को शून्य से वापस वर्तमान में लाने के लिये जब सबके उपाय फेल हो गए तो निम्मी के ससुर ने “माफ़ करना गुरु जी, पर इस वक़्त आपको इसी दवा से सही किया जा सकता है…” बोलते हुए धाड़ धाड़ दो तीन ज़ोरदार थप्पड़ पिताजी के मुँह पर लगाए तो पिताजी जैसे सोते से जागे | कुछ पल वहाँ खड़े लोगों को ऐसे देखते रहे जैसे जानते ही न हों | फिर जैसे अचानक सारी बातें याद आ गईं और पिताजी ने इस तरह रम्भा कर रोना शुरू कर दिया जैसे कोई गाय अपना बछड़ा खो जाने पर रोती है | उनको रोता देख हर कोई रोने लगा | वो पंडित गंगा प्रसाद जिन्हें आज़ादी की लड़ाई के दिनों में जेल की सलाखें विचलित नहीं कर सकीं, वो पंडित गंगा प्रसाद जिन्हें उनकी पहली पत्नी का असमय स्वर्गवास न रुला सका, वो पंडित गंगा प्रसाद जिनकी आँखों से कभी अपने बच्चों की मृत्यु पर आँसू नहीं टपके, वो पंडित गंगा प्रसाद जो जवानी में विधवा हुई बेटी को साहस के साथ दुर्भाग्य से जूझना सिखाते रहे थे – वही पंडित गंगा प्रसाद आज अपने धेवतों और बेटी के इस दुर्भाग्य को सहन नहीं कर पा रहे थे और दहाड़ें मार मार कर रो रहे थे – साथ ही रुला रहे थे वहाँ मौजूद हर शख्स को | किसी ने उन्हें चुप करने की कोशिश नहीं की – यही सोचकर कि ज़िंदगी भर के रुके आँसुओं का सैलाब आज बह जाने दो – यही ठीक रहेगा इनकी सेहत के लिये | रोते रोते जब आँसुओं की नदी रक्त हो गई शायद, तब सरोज के कन्धे पर हाथ रखकर निराश स्वर में बोले “चलो लाली, वापस चलो… अब क्या रखा है यहाँ… चलो भाई अब आगे की सोचनी है…” और लुटे पिटे बाप बेटी घर वापस लौट आए थे |

अब तो जीती ज़िंदगी शायद स्वाहा होना था – बच्चों को न्याय दिलाने के प्रयास में | सब कुछ भूल कर सारा परिवार और परिचित जुट गए थे इसी काम में | हाईकोर्ट में जमानत के लिये अपील किया गया और जेल में चार महीने गुज़ारने के बाद बच्चों की जमानत हो गई | बिजनौर से सज़ा सुना दिये जाने के बाद फिर हाई कोर्ट में केस डाला गया | काफ़ी अरसा वहाँ फ़ाइल धूल चाटती रही | सरोज शुरू से अपने अन्तिम समय तक दोनों बेटों के साथ ढाल की तरह खड़ी रही और सरोज की ढाल बने रहे उसके भाभी और पिताजी | पर दोनों ही ढालें शायद कमज़ोर थीं – तभी तो बचा नहीं सके दोनों को सज़ा से- उस ज़ुर्म की सज़ा जो उन्होंने किया ही नहीं… आखिरी वक़्त में भी दरवाज़े पर टकटकी लगाए ही सरोज के प्राण निकले थे कि शायद अब आ जाएँ रिहा होकर……..

उससे पहले बहुत कुछ घट गया था | नीलम की एक अच्छे परिवार में शादी हो गई थी | उसके पति नरेश डाक्टर हैं और लोग कहते हैं कि अच्छे रुतबे वाले इन्सान हैं | पति और बेटी के साथ नीलम दिल्ली में रहती है | सरोज की छोटी बेटी गुड्डो की शादी भी कलकत्ता हो गई | पप्पू रग्घू ने भी एक कॉम पास कर लिया और अच्छी अच्छी कंपनियों में उनकी नौकरियाँ लग गईं | उनके अपने स्वभाव की वजह से शहर में उनका सम्मान पहले जैसा ही बना रहा | दोनों के यहाँ दो दो बच्चे भी पैदा हो गए | धीरे धीरे बीस बरस गुज़र गए और इस घटना को एक दुस्वप्न समझ कर सबने भुला देने की कोशिश की | सरोज को लगा कि अब एक बार से फिर सब ठीक हो रहा है | सरोज भी रिटायर हो चुकी थी और उसकी अच्छी ख़ासी पेंशन आ रही थी | नरेश ने कई बार पूछा भी केस के बारे में, क्योंकि नीलम उन्हें शादी से पहले ही सब कुछ बता चुकी थी | पर दोनों लड़कों को किसी वकील ने ही बता दिया था कि १२ साल तक अगर किसी केस की सुनवाई न हो हाई कोर्ट में तो केस अपने आप ही खत्म हो जाता है | नरेश को पता था कि ये ग़लत जानकारी कहीं से मिली है इन लड़कों को इसलिये बार बार वे टोकते रहे कि एक बार इलाहाबाद जाकर किसी अच्छे वकील से मिलकर सारी बात पता लगाओ | पर ये लोग बेफ़िक्र होकर बैठ गए | इस बीच लड़कों की तरक्कियाँ भी हो गई थीं और घर में एक बार फिर से ऐशो आराम के साधन इन लड़कों ने अपनी आमदनी से इकठ्ठा करने शुरू कर दिये थे | दोनों की अच्छी तनखाह और सरोज की अच्छी पेंशन – और क्या चाहिये था एक अच्छे लाइफ़ स्टाइल के लिये ? सब सोचने लगे कि सरोज के दिन एक बार फिर से बुहारने शुरू हो गए हैं | और सरोज की तरफ़ से बेफ़िक्र होकर पिताजी भी हमेशा के लिये चैन की नींद सो गए थे | सारी ज़िंदगी सबका भला करने वाली भाभी अब धामपुर में अकेली पड़ी रहने को मजबूर हो गई थीं | नीलम के यहाँ ज़्यादा जा नहीं सकती थीं – क्योंकि उसकी अपनी समस्याएँ थीं | दूसरे, माँ को शायद सँकोच भी था बेटी के यहाँ रहने में और उन्होंने खुद ही मना कर दिया था | ऐसे में धामपुर रहना उनकी मजबूरी हो गई थी | कभी कभी सरोज के यहाँ चली जाया करती थीं ये सोचकर कि भले ही सौतेली है, पर सगी से ज़्यादा किया है इसके लिये तो कुछ तो लिहाज़ करेगी – और वो करती भी थी | पर इसी बीच उससे एक ऐसी भूल हो गई जिसके लिये नीलम शायद उसे कभी माफ़ न कर पाती यदि बच्चों के साथ वो हादसा न हुआ होता |

पिताजी गुज़र चुके थे | उनके गुज़रने का जितना सदमा नीलम को था उतना ही सरोज को भी था | और सरोज तो इतनी बदकिस्मत रही कि आखरी वक़्त में बाप की शक्ल भी नसीब न हुई | अपने अन्तिम दिनों में बिस्तर पर पड़ी पड़ी सरोज पिताजी के कष्ट का अनुमान लगाती थी और साथ ही सोचती थी कि पिताजी भी तड़पे तो ज़रूर होंगे सरोज को एक बार देखने के लिये | नीलम ने बताया भी था कि कई बार पिताजी याद करते थे पप्पू रग्घू और सरोज को | २२ नवंबर सन् १९९० की ही तो बात है | पिताजी और भाभी धामपुर से आए थे | बड़ा भगोना भर कचरी बना कर लाये थे सरोज के लिये | जानते थे कि सरोज के घर में सभी दीवाने हैं भाभी की बनाई कचरी के | भाभी ने बताया था कि सारे सिंघाड़े वालों के पास घूम कर तब कहीं जाकर छाँट कर लाये थे सिंघाड़े – वो भी उस हाल में जबकि एक हाथ ने काम करना बिल्कुल ही बन्द कर दिया था | सरोज ने कहा भी था “इस हाल में क्या ज़रूरत थी बाज़ार में घूम घूम कर सिंघाड़े छाँटने की और फिर कन्धे पर लादकर लाने की ? यहीं मँगवा देत धनीराम से तो भाभी यहीं बना देतीं…”

“अरे तेरी भाभी को तो आदत है बीमारी को बढ़ा चढ़ा कर बताने की | ऐसा कुछ भी नहीं है | चल जा जल्दी से कचरी गरम करके खिला सबको | हमने भी नहीं खाई है अभी | और कल को भाई तुम्हारी भाभी नीलम के लिये बना लेगी | धनीराम से पाँच किलो सिंघाड़े मँगवा लेना | अभी तो सबके साथ मिलकर कचरी खाएँगे…” और दर्द को दबाकर पिताजी हँस दिये थे – वही मीठी मोहक हँसी जिस पर सरोज हमेशा लट्टू रहती थी | अकेले में भाभी ने बताया था कि पिछले छः महीने से पिताजी को हल्का हल्का बुखार रहता है और शरीर जैसे धीरे धीरे बेजान हुआ जा रहा है | एक हाथ तो बिल्कुल ही नहीं उठता | पेशाब वगैरा जाने पर भी पायजामे का नाड़ा भाभी को ही बाँधना पड़ता था | नहलाती भी भाभी ही थीं | वो तो दूसरे हाथ से भी पानी का भरा लोटा नहीं पकड़ सकते थे | टी वी में कोई प्रोग्राम देखा था भाभी ने कैंसर पर और पिताजी के लक्षण उस प्रोग्राम में बताए लक्षणों से बहुत मिलते थे | पिताजी से उन्होंने अपने मन का सन्देह नहीं बताया था | पर इसीलिये भाभी चाहती थीं कि पिताजी एक बार दिल्ली जाकर चेक अप करा लें | पर पिताजी दिल्ली जाने को तैयार ही नहीं होते थे | वो तो जब उन्हें लगा कि अब कहीं लेने के देने न पड़ जाएँ तब २० तारीख़ को अचानक बोले कि चलो भई अब दिल्ली चलो | भाभी ने कहा भी कि नीलम को फोन कर देते हैं | पर पिताजी ने मना कर दिया था ये कहकर कि वो बेकार में परेशान हो जाएगी ये सुनकर कि पिताजी बीमार हैं | भाभी की बात सुनकर सरोज ने समझाया था उन्हें कि ऐसा कुछ नहीं हो सकता पिताजी के साथ | वे चिंतित न हों | पर मन ही मन भय से वो भी सिहर उठी थी “अगर भाभी का शक सही निकला तो…?”

२३ नवंबर को शहर में बहुत बड़ा कार्यक्रम होता था हर साल – जिसमें पिताजी की मौजूदगी हर हाल में पूरा शहर चाहता था | सरोज को याद है कि किस तरह अपना दर्द भुलाकर पिताजी उस दिन मस्त रहे थे | दिन में पूजा और हवन करवाया | जिसमें काफ़ी तादाद में लोग इकठ्ठा हुए थे | दोपहर को भण्डारा था | रात को संकीर्तन था | संकीर्तन में लगभग एक घंटा पिताजी ने हारमोनियम बजाया – बिना रुके – उसी हाथ से जो उठता नहीं था | मस्त होकर भजन गाते रहे और लोग हमेशा की तरह भाव विभोर हो सुनते रहे | बाद में पिताजी को कुछ बोलना भी था | पिताजी अक्सर गीता, वेदान्त, उपनिषदों वगैरा पर बोला करते थे | उस दिन भी कुछ देर बोले | फिर अन्त में बोले “हो सकता है ये मेरी अन्तिम यात्रा हो नजीबाबाद की, हो सकता है आप लोगों से मिलना फिर सम्भव न हो | आप लोगों का ये स्नेह प्यार, ये सम्मान जो आप लोगों ने सदा मुझे दिया है – मैं मरते दम तक नहीं भूल सकूँगा…” और ये शब्द सुनकर हाल में बैठा हर इन्सान पहले तो चौंक उठा की ये गुरु जी आज कैसी बातें कर रहे हैं | पर फिर इन शब्दों को भी पिताजी की दार्शनिकता का एक अंश मानकर शान्त बैठे रहे | लोग हैरान थे ये देखकर कि जो गुरु जी अपने बाँए हाथ की एक उँगली तक नहीं हिला पाते थे – कन्धा जिनका बिल्कुल जाम हो चुका था – वही गुरु जी अपने उसी हाथ से एक घण्टे से बिना रुके हारमोनियम की धौंकनी फूँक रहे थे | हर कोई इसे पिताजी की तपस्या और नारायणी सेवा का प्रभाव और ईश्वर की कृपा समझ रहा था | कोई नहीं जानता था कि पिताजी के मुँह से निकले वे शब्द मात्र शब्द नहीं थे – शायद पिताजी जान चुके थे उस सत्य को – काश सरोज भी समझ पाती तो पिताजी के साथ साथ दिल्ली ही न चली जाती अन्तिम दिन उनके साथ गुज़ारने के लिये ? काश वो समझ पाती कि उस दिन के बाद कभी पिताजी उसके बुरे वक़्त में उसे सहारा देने के लिये उसके साथ नहीं होंगे… काश वो जान पाती कि अब पिताजी का बिल्ली आँखों का घूरना वो कभी नहीं देख पाएगी… पर ये होना ही नहीं था…

२४ तारीख़ की सुबह पिताजी और भाभी बस से दिल्ली के लिये रवाना हो गए थे | शहर से काफ़ी सारे लोग उन्हें बसपर छोड़ने के लिये पहुँचे थे | किसी को अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि पिताजी जैसे कर्मठ इंसान का एक हाथ काम करना बन्द कर चुका था | शाम तक पिताजी और भाभी दिल्ली पहुँच गए थे | नीलम ने पिताजी का हाल देखा तो घबरा गई वो भी | तीसरे दिन डाक्टर से समय मिला | सारा चेक अप हुआ और डाक्टर ने नरेश को अकेले में बुलाकर कह दिया “आज से बस एक महीने का खेल समझ लीजिए सारा… फिर भी ये ये ट्रीटमेंट करा लीजिए…”

पिताजी को कैंसर हुआ था जो अब अपने चरम पर पहुँच चुका था – पिताजी के शरीर को उसके अन्तिम पड़ाव तक पहुँचाने के लिये | उनकी सारी हड्डियाँ भरभरा चुकी थीं | कुछ शेष नहीं रहा था उनके शरीर में | दिल पर पत्थर रखकर नरेश ने नीलम को सब कुछ बताया था | उस दिन के बाद से दोनों की दुनिया ही बदल गई थी | माँ को कुछ बताया नहीं था | पिताजी जानना चाहते थे | आभास उन्हें था कि कुछ ऐसा उन्हें हुआ है जिसका कोई इलाज़ नहीं और अब बस कुछ ही दिनों के मेहमान हैं वो | पर नीलम और नरेश में साहस नहीं था उन्हें कुछ भी बताने का | सारा सारा दिन दोनों को बस एक ही काम रह गया था – पिताजी को ट्रीटमेंट के लिये ले जाना और उनका दिल बहलाए रखने की कोशिश करना | नरेश अपना सारा काम छोड़कर सारा समय बस पिताजी के ही साथ लगे रहते थे | कभी नीलम के साथ उन्हें अस्पताल ले जाना तो कभी उनके लिये अपने हाथ से परहेज़ का खाना बनाकर अपने सामने बैठाकर खिलाना छोटे बच्चों की तरह | तन मन धन से सेवा की थी पिताजी की | माँ ने भी पिताजी की बहुत सेवा की थी | खाना पीना सोना सब कुछ भूल गई थीं | इस बीच कोई दिन ऐसा नहीं गया था जब पिताजी ने सरोज और बच्चों की चर्चा न की हो | कई बार फोन पर नीलम बात कराती थी तो पिताजी यही कहते थे कि आराम हो रहा है इलाज़ से | शायद जानते थे कि सरोज के लिये आना आसान न होगा | और इसी तरह अपनी नाज़ों से पाली बिटिया को याद करते करते वो वक़्त भी आ गया जिसके लिये डाक्टर ने पहले से ही सचेत कर रखा था |

उस दिन नरेश को कहीं ज़रुरी काम से जाना पड़ गया था | दिन भर तो पिताजी से मिलने वाले आते रहे थे | धामपुर और नजीबाबाद से लोग अक्सर ही आते रहते थे पिताजी को देखने | उस दिन भी आए थे कई लोग | उन लोगों के जाने के बाद पिताजी की तबियत अचानक से बिगड़नी शुरू हो गई | नीलम ने तुरंत नरेश को फोन किया | इस बीच डाक्टर को बुलाकर पिताजी को इंजेक्शन भी लगवा दिया गया था | पर पिताजी समझ गए थे कि बुलावा आ गया है और अब जाना ही होगा दूसरी यात्रा पर | माँ और नीलम को अपने पास बैठाकर धीमी आवाज़ में बोले “अब ज़रूरत नहीं किसी दवा की | यहीं मेरे पास बैठकर जाप करती रहो बस |” और खुद भी जाप करना शुरू कर दिया | कुछ ही देर में नरेश भी पहुँच गए थे | पिताजी के पास बैठकर उनका हाथ सहलाने लगे तो पिताजी ने याचनापूर्वक पूछा “अब तो बता दो मुझे हुआ क्या है…?” पिताजी की अन्त समय की याचना नरेश नहीं टाल सके और बोले “शरीर बेकार हो चुका है अब आपका… कुछ नहीं रहा इसमें… छोड़ दो इसका मोह…” पिताजी हौले से मुस्कुराए – मानों कह रहे हों “मैं तो सदा से वीतरागी था… निष्काम कर्म करता आया सदा ही… दुनिया वालों की खुशी के लिये बस करता रहा सब कुछ… अपने इर्द गिर्द लोगों को उदास नहीं देख सकता था इसीलिये सारी दुनिया पर मस्ती लुटाता रहा… कभी मोह नहीं किया तो अब क्या मोह करूँगा…” नरेश ने देखा पिताजी की आँखें बन्द होने लग रही थीं – धीरे से पूछा “क्या हुआ…? नींद आई है…? सोना है…?”

“हाँ शायद…” धीमे से होंठ हिलाकर उसी चिर परिचित मोहक मुस्कान के साथ पिताजी ने जवाब दिया, और वहीं नरेश की गोद में सर रखकर लेट गए – सदा की नींद सोने के लिये… नीलम ने बताया था सरोज को कि पिताजी का शरीर ज़मीन पर रखा हुआ था और उनके चेहरे पर शान्तिपूर्ण मोहक मुस्कान हमेशा की तरह विराजमान थी – जैसे अभी आँखें खोलकर किसी बात पर कोई फुलझड़ी छोड़ देंगे |

रात को दो बजे ही नरेश का फोन आ गया था | सरोज को उस पल लगा था कि आज वास्तव में वो अनाथ हो गई थी | माँ गई थी तो पिताजी तो थे गोद में बैठाकर लाड़ लड़ाने के लिये | चाची बुआ सबके तानों से बचाने के लिये | फिर जयन्त चले गए तब भी पिताजी तो थे संकट की घड़ी में राह दिखाने के लिये और अपने आँचल से उसकी राह के काँटे बुहारने के लिये | लाला जी नहीं रहे तब भी कम से कम पिताजी तो साथ थे सर पर हाथ रखकर दुनिया वालों को बताने के लिये कि इधर नज़र उठाकर भी मत देख लेना – इसका बाप अभी ज़िंदा है | अब तो वो भी नहीं रहे… अब तो निपट अकेली रह गई वो इस भरी दुनिया में… अब कोई आगे नहीं आएगा उसको राह दिखाने… जीवन संघर्ष में दो क़दम उसके साथ चलने… पर उसके साथ तो शायद भगवान को जनम का बैर रहा है… ज़रा सा कुछ ठीक ठाक चलना शुरू होता है कि फिर कोई झटका दे देता है… और यही सब सोचते सोचते सरोज ने दिमाग को झटका और उठ खड़ी हुई पप्पू रग्घू के साथ दिल्ली की बस पकड़ने के लिये…

रग्घू ने और सरोज के चाचा जी ने चिता को मुखाग्नि दी थी | पप्पू अपने बाप और दादा जी को मुखाग्नि दे चुका था | तो यही सोचा गया कि नाना के कर्म रग्घू से करवाए जाएँ | तब सरोज ने सोचा था कि बड़ा तो दो जनों के कर्म कर चुका है | अब पिताजी के बाद मेरे कर्म भी रग्घू ही करेगा | क्योंकि रिवाज़ के मुताबिक़ दो लोगों के कर्म करने के बाद पप्पू अब किसी और का नहीं कर सकता था | पर क्या पता था कि सरोज के भाग्य में बेटे का हाथ लग्न ही नहीं लिखा था | पिताजी के तीजे के बाद सरोज और दोनों बेटे भाभी को लेकर नजीबाबाद चले गए थे | सारे कर्म रग्घू और चाचा जी ने वहीं किये थे पूरी श्रद्धा से और पूरे विधि विधान से | सरोज की इच्छा थी कि पिताजी का सारा काम उसी के घर से हो |

सब कुछ से निबट कर एक बार फिर सरोज जुट गई थी अपने काम में | पर अब बिल्कुल अकेली थी | भाभी का अब अधिक समय सरोज के पास ही गुज़रता था | दोनों क़रीब क़रीब सारी रात ही जागती थीं | दोनों की नींद न जाने कहाँ गायब हो चुकी थी | बस जब साथ होती थीं तो बीते दिन याद करके कभी हँस लिया करती थीं तो कभी रो लिया करती थीं | और इसी तरह ज़िंदगी की गाड़ी फिर से चलनी शुरू हो गई थी | उस बार भी हमेशा की तरह भाभी नजीबाबाद गई हुई थीं | हमेशा की ही तरह आपस में बतियाते दोनों का वक़्त कट रहा था | पर इस बार कुछ ऐसा हो गया था जो नहीं होना चाहिए था | नजीबाबाद में ही भाभी को “हरपीज़” हो गई और काफ़ी बुरा हाल हो गया उनका | सरोज को न जाने क्या सूझी – शायद एक बार फिर उसकी मति भ्रष्ट हो गई थी – या फिर उसकी अपनी समस्याएँ उस पर हावी थीं – बहरहाल जो हो – उसने फ़ौरन नीलम को फोन कर दिया “तू भाभी को आके लिवा ले जा | मेरे बस का नहीं कि स्कूल का भी देखूँ, इन पोते पोतियों को भी सम्भालूँ और साथ में भाभी की बीमारी का भी देखूँ…”

“बिब्बी ईशू के इम्तहान चल रहे हैं | ये हैं नहीं यहाँ | किसके सहारे छोड़कर आएँ ईशू को ? आप १७ तारीख़ तक सँभाल लो इन्हें, फिर हम आकर लिवा ले जाएँगे…” पर सरोज ने एक न सुनी और भाभी का सामान घर से बाहर रख दिया | उसे कहीं न कहीं इस बात का शक भी था कि धामपुर का मकान भाभी ने बेचा तो सरोज को उसके हिस्से का कम ही दिया और सारा का सारा नीलम को दे दिया | जबकि सच तो ये था कि नीलम ने कुछ लिया ही नहीं था उसमें से | ख़ैर, अगली सुबह महेंदर चाचा जी का फोन आया नीलम के पास कि “लल्ली तेरी माँ को तो सरोज ने घर से बाहर निकाल दिया और अब वो हमारे यहाँ हैं | पर यहाँ से भी वापस जाने की ज़िद कर रही हैं | तो हम इन्हें धामपुर छोड़ने जा रहे हैं | पर तू आके लिवा ले जा इन्हें…” नीलम को बहुत गुस्सा आया सरोज पर और न चाहते हुए भी उसने नरेश को फोन पर सारी बात बता दी | नरेश को भी गुस्से के साथ साथ आश्चर्य भी हुआ कि बिब्बी ने ऐसा क्यों किया ? उनके लिये क्या नहीं किया नीलम की माँ ने… सगी भी इतना नहीं करेगी… और उन्होंने कहा दिया नीलम से कि ईशू के एक्ज़ाम्स को मारो गोली और तुरन्त जाकर अम्मा जी को बुला कर लाओ और ये भी कि अब आगे से बिब्बी के साथ किसी तरह का कोई सम्बन्ध मत रखना… जो अपनी माँ की नहीं हो सकी वो किसकी होगी… और उसी दिन नीलम अम्मा जी को लिवाने चली गई थी और पूरी तरह ठीक और स्वस्थ हो जाने के बाद उनकी ज़िद पर फिर से उन्हें धामपुर छोड़कर आ गई थी… लेकिन बिब्बी को वो कभी माफ़ नहीं कर सकी थी इस बात के लिये…

उधर बिब्बी के यहाँ सब कुछ ठीक ठाक चल ही रहा था कि अचानक से फिर एक दुर्घटना घट गई | एक दिन सुबह सुबह – अम्मा जी वाली घटना के लगभग दो बरस बाद – घबराई हुई सरोज का फोन मिला नीलम को “नीलम, बहन बचा ले अपने भाँजों को…” नीलम कुछ समझ नहीं पाई कि सब कुछ ठीक ठीक चलते चलते अचानक से ये सब क्या हो गया ? नरेश अमेरिका से आए हुए थे और घर पर ही थे | वो भी समझ गए कि कुछ गड़बड़ ज़रूर है | नीलम ने पूछा “घबराओ मत बिब्बी, पहले बताओ तो हुआ क्या है…?”

“दोनों के अरैस्ट वारण्ट आ गए हैं… और अगर सरेंडर नहीं किया तो सब कुछ खत्म हो जाएगा…”

“क्या…? पर केस तो खत्म हो गया था… ये अब क्या हुआ…?” नीलम की भी आँखों के आगे अँधेरा सा छा रहा था और वो वहीं ज़मीन पर खम्भे के सहारे बैठ गई फोन पकड़े पकड़े |

“पता ना री… ना जाने किसने बीस साल बाद अब जाके केस खुलवा दिया फिर से और फ़ौरन हाई कोर्ट से अरैस्ट वारण्ट आ गए | अब तू ही कुछ कर सके है री | देख ले, तेरे तो भाई भी यही हैं और भान्जे भी | बचा ले इन्हें | कुछ कर | नरेश को कह कुछ करें | ले पप्पू बात करेगा…” और फोन पप्पू को पकड़ा दिया | अब तक नीलम के हाथ पाँव सुन्न पड़ चुके थे और पप्पू से बात करने की हिम्मत उसमें नहीं रही थी | फिर भी पूछा “क्या हुआ ? कैसे हुआ ये सब ?” और आगे बोलने की हिम्मत नहीं थी उसमें |

“बस पूछो मत मौसी | पता नहीं कैसे सब हो गया | हमें तो कुछ पता भी नहीं थे की केस री-ओपन हो रहा है | अब कुछ करो | मौसा जी को बोलो कुछ करें | हमें बचा लो मौसी…” घबराए स्वर में पप्पू बोल रहा था |

“हाँ देखता हैं…” आगे और कुछ न बोल सकी नीलम और फोन काट दिया | नीलम का हाल बेहाल हो चुका था | नरेश ने उसे ज़मीन से उठाकर सोफे पर बैठाया | सारी बातें जानकर बोले “कुछ करने की ज़रूरत नहीं है | भूल गई तेरी अम्मा जी के साथ क्या किया था इन लोगों ने ? भले ही सौतेली थीं, पर क्या नहीं किया इनके लिए ? और उन्हीं के साथ… इन्सानियत भी भूल गई थीं उस वक़्त…? मेरी क़सम है तुझे जो तू अपनी टांग अड़ाए इसमें…”

नीलम की आँखों से आँसुओं की झरी लगी हुई थी | धुँधली आँखों से नरेश को देखा | समझ नहीं पा रही थी किस तरह मदद करे इन बच्चों की ? क्या कहकर नरेश को समझाए ? दोनों की बीवियाँ हैं, बच्चे हैं, उनका क्या कुसूर ? फिर पापा की भी तो ये ज़िंदगी थे | जब तक ज़िंदा थे भाग दौड़ करते रहे इनके लिये | अब तो वो भी नहीं रहे | अब किससे क्या कहे ? और धीरे धीरे नीलम जैसे होश खोती जा रही थी | नरेश थे कि अपनी बात पर ही अड़े थे | तभी थोड़ी देर बाद फिर से पप्पू का फोन आ गया “मौसी आपने तो पलट कर फोन भी नहीं किया… कुछ तो करो… बचा लो हमें मौसी… मौसा जी चाहें तो कुछ लोगों से बात कर सकते हैं… काफ़ी जान पहचान है उनकी तो… अच्छा लो विन्नी से बात करो…” और विन्नी को पकड़ा दिया “हाँ नीलम मैं विन्नी बोल रही हूँ… देख बहन कुछ कर…”

नरेश की क़सम के बन्धन में बंधी और अपनी स्थिति से दुखी नीलम का नरेश का सारा गुस्सा विन्नी पर ही फट पड़ा “अब क्यों याद आई नीलम की ? उस वक़्त भूल गई थीं क्या बिब्बी जब हमारी माँ को हरपीज़ की बीमारी में घर से धक्का देकर निकला था ?” और फोन पर ही फूट फूट कर रो पड़ी |

“देख नीलम, बिब्बी और नानी जी के बीच क्या बात हुई मुझे तो पता नहीं | वैसे भी नीलम आज तो वक़्त नहीं था इन सारी बातों को उठाने का…” और ठक से फोन काटकर सरोज के पास जाकर बोली थी “अब कभी नीलम से बात की इस बारे में तो ठीक नहीं होगा…” उधर नीलम सारा दिन तो क्या, कभी भी उबर नहीं पाई थी इस सदमे से और अपराध बोध से – ये क्या कर दिया था उसने ? एक ही बाप की औलादें थीं दोनों | बिब्बी और जीजा जी ने तो माँ बाप जैसा लाड़ लड़ाया थे उसे | इन दोनों को ही तो राखी और भाई दूज करती थी | आज उन्हीं के साथ ऐसा कर दिया ? वो भी ऐसे वक़्त में जब उन्हें उसकी सख्त ज़रूरत थी ? ऐसे में तो दुश्मन भी काम आ जाते हैं… नरेश आपने ये करा दिया आज हमसे…? आखिर जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो महेंदर चाचा जी को फोन करके सारी बात बताई | ये तो नहीं बताया कि नरेश के कहने पर ऐसा किया, बस यही कहा कि गुस्से में थी तो कर बैठी | “बेट्टी जो किया ग़लत किया | ऐसा नहीं करना चाहिये था | तुझे पता है तेरे पीछे से भी यहाँ अभी तक लोग तेरी तारीफ़ ही करते हैं कि भई लड़की हो तो नीलम जैसी | तू तो लल्ली अभी तक शान है यहाँ की | तुझे ऐसा करना शोभा नहीं देता था | पर ख़ैर, अब जो भी हुआ हो गया | अब तू ऐसा करना कि सरोज से माफ़ी माँग लेना इस बात के लिये | और लड़कों की तू चिंता मत कर, सब ठीक हो जावेगा…”

नीलम ने अम्मा जी को भी फोन करके सब कुछ बताया तो उन्होंने भी यही कहा कि ग़लत किया | वो खुद भी जानती कि ग़लत किया उसने | वो तो कभी दुश्मन के साथ भी ऐसा नहीं कर सकती थी, और आज अपनी ही बहन के साथ…? अपने स्वभाव के विपरीत काम कर बैठी थी | पर अब पछताने से क्या होता ? किसी ने सच ही कहा है कि कुछ भी बोलने से पहले दस दफ़ा सोचना चाहिये कि उस बात का परिणाम क्या हो सकता है | शब्दों को नाप तोल कर और उचित समय पर ही मुँह से निकलने देना चाहिये, वरना इसी तरह पछताना पड़ता है | अब तो तीर कमान से निकल चुका था | और शायद नीलम के इस अपराध का भी योगदान था कि वक़्त रहते कुछ नहीं किया जा सका था और दोनों लड़के जेल चले गए थे | इसी सदमे से बिब्बी दिन पर दिन ख़ामोशी की गुफ़ा में सिमटती चली गईं | सारा परिवार अस्त व्यस्त हो गया | नीलम ने बिब्बी को फोन करके विन्नी के साथ हुई सारी बात बताई थी और माफ़ी भी माँगी थी अपने किये के लिये | सरोज ने यही कहा था “अरी अब तेरी बात का क्या बुरा मानूँगी ? पर अब तू कुछ कर | नरेश जी को बोल कुछ करने को…”

धीरे धीरे नरेश को अहसास हुआ था अपनी ग़लती का | क्योंकि स्वभाव उनका भी ऐसा नहीं था | गुस्से में वो भूल उनसे हो गई थी, पर अब उस भूल का प्रायश्चित भी करना था दोनों ही पति पत्नी को, और उन्होंने खुद ही वकीलों से बात करनी शुरू कर दी थी | सुप्रीम कोर्ट मामला गया | इस बीच सरोज अधरंग की चपेट में आ गई और हमेशा के लिये बिस्तरपर पड़ गई | उसकी तरफ देखने का भी साहस नीलम नहीं जुटा पाती थी | किस हाल को हो गई थी नीलम की वो परी जैसी राजकुमारी – जिसके लिये नीलम कभी सोचा करती थी कि काश उनके रूप का दस प्रतिशत भी उसे मिल जाता तो मज़ा आ जाता – वही उसकी बिब्बी – पूरा शहर किसी ज़माने में जिसकी सुंदरता का दीवाना था – चाहे हम उम्र लड़के लड़कियाँ हों या फिर उनके माँ बाप… कुदरत ने इतने सालों में तबीयत से पूरी फ़ुर्सत में गढ़ा था जिसका एक एक अंग और सारे रंग रूप लुटा दिये थे उस सूरत को बनाने में – गुलाब की पंखुड़ियों से खिले खिले गुलाबी गुलाबी होंठ… झील सी गहरी बोलती सी आँखें कि हर किसी का दिल चाहे उनमें डूब कर रह जाने का… खिलते कमल जैसे गोरे गोरे चेहरे पर गालों में पड़ते गड्ढे जिनमें फँसकर किसी का भी बाहर निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर… दूधिया मोती सी करीने से सजी दंतपंक्ति – खिलखिलाकर हँसती तो चमेली के फूलों की वर्षा सी होती लगती… सुराहीदार गर्दन जिसे देखकर अच्छे अच्छों को सुरूर आ जाए… रेशम जैसे मुलायम काले घने लम्बे बाल जिन्हें धोने के लिये कुर्सी पर बैठना पड़ता था और कमर पर नागिन सी लहराती बलखाती लम्बी चोटी किसी को भी डसने के लिये काफ़ी थी… बालों की एक लट मीना कुमारी के अन्दाज़ में माथे पर गिरती हुई गोरे चौड़े मस्तक को धूप छाँव की आभा प्रदान करती हुई… सुडौल गोरी संगमरमरी बाँहें… पहाड़ की चोटी से नुकीले वक्ष के उठान जिन पर नज़र पड़े तो फ़िसलती चली जाए और सँभलने का मौक़ा भी न मिले… एक एक सेंटीमीटर अनुपात में नपे हुए नितम्ब… सुन्दर गुलाबी पैर… कोयल सी मीठी पुरक़शिश आवाज़ – गाती तो फिज़ां में मस्ती घुल जाती… दुपट्टा कमर से कसकर पैरों में घुँघरू बाँध फ़िल्मी गानों की नक़ल करती डोलती तो धरा आकाश झूम उठते………………..

सरोज की बरसी पर नाथनी के लिये बैग में से कपड़े निकाल कर देती नीलम यही सब सोचकर ठण्डी आहें भर रही थी – कैसी काया का कैसा दर्दनाक अन्त… याद आ रहा था नीलम को सरोज और जीजा जी का प्रेमालाप… जीजा जी का सरोज के लिये पागलपन की हद तक प्यार… पिताजी का सरोज के प्रति लाड़… भाभी का सरोज के प्रति स्नेह… और अन्त में भाभी के वो शब्द “इस उम्र में यही देखना और बाक़ी था | किस तरह से बोल रही थीं बिब्बी के निर्जीव शरीर से लिपटी कि इससे तो भगवान मुझे उठा लेता… भगवान ऐसा ही दिलवाला होता तो बिब्बी के साथ ये सब होता ही क्यों ? आखरी वक़्त तक बच्चों की वापसी की राह देखती रही थीं उनकी आँखें | सुप्रीम कोर्ट से बस इतनी ही राहत मिली थी कि ३०२ की सज़ा ३०४ में तब्दील कर दी गई थी – यानी आजीवन कारावास “टिल डैथ” से घटाकर शायद दस या चौदह साल… वो भी काफ़ी भाग दौड़ के बाद… वरना पुनीत ने तो धोखा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी | वकीलों को पैसा देने के नाम पर घर का वो सामन बेचने को भी मजबूर कर दिया था उसने तो जो दोनों लड़कों ने अपनी कमाई से इकठ्ठा किया था | वो तो नीलम और विन्नी निम्मी वक़्त वक़्त पर मदद करती रहा करती थीं | वरना तो कहाँ से होता बिब्बी का इतना इलाज़ और साथ में वकीलों के खर्चे ? सरोज की क्रिया तक में भी आने की इज़ाज़त नहीं मिली थी दोनों को | तेरहवीं पर आए थे बस थोड़ी देर के लिये | तब भी नरेश से बोल कर गए थे “मौसा जी, राज्यपाल के यहाँ माफ़ीनामा दायर कर रहे हैं | कुछ करने की कोशिश करना…” तभी नीलम की नज़र हेमा और नीना पर पड़ी | दोनों ने रजनी बिब्बी के पैर छुए थे और उन्होंने आशीर्वाद दिया था “दूधों नहाओ, पूतों फलो, सौभाग्यवती रहो…” और सोचने लगी नीलम कि बिब्बी को भी तो हर कोई यही आशीर्वाद दिया करता था, पर हुआ क्या…? हे भगवान, इन दोनों बहुओं के लिये ये आशीर्वाद सच कर देना… सरोज की ही तरह नीलम भी आज सोच रही थी “अगर हमारे भाई पैदा होकर मरते चले गए तो क्या उसके लिये हम दोनों बहनें ज़िम्मेदार हैं ? पिताजी के भी बेटे थे वो – उनके लिये किसी ने कुछ क्यों नहीं बोला कि कैसा अभागा आदमी है कि एक भी बेटा नहीं बचा आखिरी वक़्त में मुँह में गंगाजल डालने के लिये ? क्योंकि वो मर्द थे ? अगर बिब्बी के सर से माँ का साया बचपन में ही उठ गया तो उसके लिये उन्हें करमजली ठहराया गया तो क्या पिताजी को भी करमजला नहीं ठहराया जाना चाहिये था ? क्या उनकी पत्नी नहीं थीं वो ? छोटी सी बच्ची के सर पर अगर सौतेली माँ लाकर बैठा दी गई तो क्या उस सोलह बरस की लड़की को भी उतना ही दुःख नहीं हुआ होगा दुहेजू और एक बच्ची के बाप के साथ शादी करते वक़्त जिसने अपनी आँखों में न जाने क्या क्या सपने सँजो रखे होंगे अपनी ससुराल और पति के बारे में ? क्या उसके घरवालों को भी उतना ही दोषी नहीं माना जाना चाहिये इस सबके लिये जिन्होंने जान बूझकर उसे नर्क में झोंक दिया ? अगर सरोज का पति उसे बीच रास्ते में ही धोखा देकर परम धाम चला गया तो क्या ग्रह नक्षत्रों की वजह से सारा दोष सरोज के ही सर मढ़ दिया जाना चाहिये ? बच्चों ने अगर उसकी नहीं सुनी और फँस गए उस केस में तो क्या वो उनका अपना दुर्भाग्य नहीं था ? क्यों सरोज ही दोषी ठहराई जाती रही हर दुर्भाग्य के लिये… हर दुर्घटना के लिये…?

और नीलम को अभी भी लग रहा था जैसे बिब्बी भीतर तिदरी में पलंग पर पड़ी हैं और कह रही हैं “इन दोनों को बचा ले री… तेरे भाई हैं तो और भान्जे हैं तो अब तो ये ही हैं… काश मैंने भाभी को सौतेला न समझा होता और पिताजी और भाभी का कहा माना होता तो क्यों कहलाती करमजली और अभागन…? दूधों नहाओ पूतों फलो और सौभाग्यवती रहो जैसे आशीर्वाद क्या मेरे लिये सच न होते अगर मैं…? सच मान मैं तो अब जीना भी ना चाहती | आज भी तेरे जीजा जी आए थे सपने में | कह रहे थे कि बहुत हो गया – बच्चों का मोह छोड़ और आ जा मेरे पास | मैंने तो कह दिया हमेशा की तरह कि तुम तो चले गए अपना सारा फ़र्ज़ भूलकर मुझे अकेले दम इन सबको पालने पोसने को छोड़ कर | अब मैं कैसे भूल जाऊँ अपना फ़र्ज़ ? ऐसा ही मेरा साथ चाहिये था तो कुछ बरस तो इंतज़ार किया होता… तुम्हारा दामन थामे साथ साथ चल पड़ती मैं भी… जीने की चाहत तो उसी दिन खतम हो गई थी जिस दिन तेरे जीजा जी गए थे – पर बच्चों के लिये जीती रही | शरीर को शरीर ना समझा और मन को मन ना समझा | बस लगी रही मशीन की तरह इन सबकी देख भाल में | पर अब बर्दाश्त ना होता री | हे भगवान थक गई हूँ बहुत… अब और बर्दाश्त नहीं होता… शान्ति चाहिये मुझे… दो घड़ी का आराम… ऊपर जाकर उनसे पूछूँगी ज़रूर कि मेरे साथ इतनी ही बेवफ़ाई करनी थी और बीच रास्ते में ही छोड़ना था मुझे तो फिर ब्याह की इतनी जल्दी क्यों मचाई थी ? उस मरे भगवान से पूछूँगी ज़रूर कि क्या औरत की योनि में जन्म लेना इतना बड़ा अपराध है कि उसकी इतनी बड़ी सज़ा दी जाए उसे ?” और बिब्बी की आवाज़ उसके कानों में गूँजती रही… गूँजती रही………… गूँजती रही………………….. और आज तक भी गूँज रही है “ऊपर जाकर एक बार उनसे पूछूँगी तो ज़रूर कि मेरे साथ इतनी ही बेवफ़ाई करनी थी और बीच रास्ते में ही छोड़ना था मुझे तो फिर ब्याह की इतनी जल्दी क्यों मचाई थी…? क्या औरत की योनि में जन्म लेना इतना बड़ा अपराध है कि उसकी इतनी बड़ी सज़ा दी जाए उसे………? क्या कभी आराम मिलेगा मुझे………………………………?

क्रमशः………………..

सौभाग्यवती भव – अध्याय पच्चीस

पच्चीस – पप्पू रग्घू की सज़ा

सरोज की बरसी में पहुँची नीलम सोच रही थी कि पिताजी उस दिन बिब्बी के पास से घर वापस पहुँचे तो कितने परेशान थे | माँ के बार बार पूछने पर भी कुछ बोल नहीं रहे थे | हाँ बार बार दरवाज़े की आहट न जाने क्यों ले लेते थे | न तो सरोज के घर ही फोन था न ही पिताजी के घर जो फोन करके हाल चाल पूछ लेते | भाभी ने खाना परस दिया था पर न तो नीलम ने ही न ही पिताजी ने एक कौर भी मुँह में दिया था अभी तक | भाभी ने बार बार कहा तो पिताजी ने दाल चावल मिलाने शुरू किये कि अचानक से दरवाज़े का कुंडा किसी ने खटखटाया | नीलम ने सोचा कि पिताजी कई बार दरवाज़े पर जाकर बाहर का ज़ायज़ा ले चुके हैं तो वे खुद ही जाएँगे इस बार भी | पर पिताजी दाल चावल से सने हाथ लिये ऐसे ही बैठे रहे | आखिर नीलम उठकर दरवाज़े पर गई | दरवाज़ा खोला तो वहाँ नीलम का रिक्शे वाला रशीद खड़ा था | झुँझलाकर नीलम बोली “क्या रशीद, अभी तो दस ही बजे हैं, अभी से आ गए तुम ? वक़्त का पता नहीं लगता क्या तुम्हें ?”

“मैडम में आपको कालेज के लिये ले जाने नहीं आया हूँ…” रशीद बोला | अब तक पिताजी भी हाथ धोकर उठकर दरवाज़े पर आ चुके थे | रशीद को देखकर पूछा “क्या आज जल्दी जाना है क्या ?”

“नहीं गुरु जी में कालेज के लिये नहीं आया हूँ…” थूक गटकता और अटकता अटकता रशीद बोल रहा था | आवाज़ उसकी काँप रही थी | नीलम और पिताजी हैरान थे उसका ये हाल देखकर | भाभी भी बाहर आ चुकी थीं | रशीद का हाल देखकर जल्दी से रसोई में जाकर पानी लेकर लाईं और उसे पीने को दिया | पानी पीकर कुछ शान्त हुआ तो इधर उधर देखकर कि कोई देख तो नहीं रहा आगे बोला “मैडम आज आप कालेज मत ना जाओ | पंगा हो गिया है उंगे तो | वो, नेमि का खून हो गिया है | किसी ने छुरा घोंपा है उसके पेट में | रामपाल की बिरादरी वाले बता रै है अक पप्पू रग्घू ने किया यो सब…”

“रशीद, होश में तो हो तुम ? जानते हो क्या बकवास कर रहे हो ? अरे पप्पू को तो मैं अभी घर पर छोड़कर आया हूँ दवा दिलाकर वैद जी से, और रग्घू सो रहा था दूसरे कमरे में | वो दोनों तो घर पर ही थे | देख रशीद सच सच बता क्या बात है…?” पिताजी ने रशीद का गिरेबान पकड़ लिया था और उनकी आवाज़ ऐसे आ रही थी जैसे कहीं बहुत दूर से बोल रहे हों | भाभी और नीलम ने पिताजी की पकड़ से रशीद को छुड़वाया तो पिताजी वहीँ दरवाज़े पर उकडूँ बैठ गए सर पकड़ कर | रशीद काफ़ी घबराया हुआ था | हकलाता हुआ बोला “मैडम मैं सच कै रिया हूँ | मुझे ना पता खून किसने किया | पर पप्पू, रग्घू, रामपाल और साथ में चार पाँच लौंडे और हे जिन्हें रक्शे पे चढ़ा के मैं ही भागा और उन्हें जाब्तागंज के बाहर जंगल में छोड़ के आया हूँ | रग्घू की शरट पे खून भी लगा हुआ था | मेरे रक्से की सीट पे भी लग गिया हा उसका दाग जो साफ़ तो किया मेंन्ने पर आप देख लो पूरी तरियों साफ़ ना हुआ अभी लौं | मैं भी भाग रिया हूँ जी इंगे से | पुलिस वालों ने देख लिया है मुझे उन लौंडों कू भगाते | मैं तो बस आपकू बताने चला आया हा | मत ना जइयो जी अभी कुछेक रोज कालेज…” और इतना कहकर रशीद तेज़ी से रिक्शे को लेकर वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गया | यहाँ इन तीनों की आँखों के आगे अँधेरा छा रहा था | दिल मानने को तैयार नहीं था कि पप्पू रग्घू ऐसा कर सकते हैं | पिताजी को तो ये भी समझ नहीं आ रहा था कि दोनों बच्चों को घर ही छोड़कर आए थे फिर कब में दोनों घर से निकल गए | भाभी ने पहले ही हाथ पाँव छोड़ दिए थे | रसोई में खाना वैसे ही उघड़ा पड़ा था और उस पर मक्खियाँ भिनभिनाना शुरू हो गई थीं |

“अब…?” घबराई हुई नीलम ने ज़मीन पर पंजों के बल उकडूँ बैठे पिताजी की तरफ़ देखकर पूछा |

“अब क्या…?” नीलम की आवाज़ से जैसे पिताजी कोकुछ होश आया | दीवार का सहारा लेकर पिताजी खड़े हुए – आज उनके पैर जवाब दे रहे थे | घूम कर देखा दोनों ने तो भाभी शून्य में ताकती खड़ी थीं और डर से उनका रंग बिल्कुल सफ़ेद पड़ चुका था | धीरे धीरे चलकर दोनों ने भाभी को झकझोरा | एक दूसरे को सहारा देकर तीनों भीतर बैठक में पहुँचे कि अब क्या किया जाए ? आखिर पिताजी बोले “देख लाली, में ज़रा थाने का चक्कर लगाकर आता हूँ | क्योंकि अगर रशीद का कहना सही है तो वहाँ ज़रूर कुछ न कुछ हलचल होगी | तू ऐसा कर अपनी माँ को लाली के यहाँ छोड़कर ज़रा कालेज का चक्कर लगाकर आ | फिर बैठकर सोचते हैं क्या किया जाए | और तुम भी जी अगर लाली को कुछ पता न हो अभी तक तो अपनी तरफ़ से कुछ मत ना बताना | परेशान हो जाएगी | पता नहीं क्या लिखा है किस्मत में उसकी भी | चलो जी चलो…” और सर पर टोपी रखकर पिताजी बाहर निकल गए | भाभी ने चप्पल पहनीं, नीलम ने भी सैंडल पाँव में डालीं – पर्स कन्धे पर लटकाया और घर का ताला लगा दोनों माँ बेटी सरोज के घर जा पहुंचीं | सरोज को अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया था | अलबत्ता वो डरी हुई ज़रूर थी | नीलम ने पूछा “पप्पू रग्घू कहाँ हैं ?”

“पता ना…” कुछ झुँझलाहट से और कुछ डरते हुए सरोज ने जवाब दिया “अभी पिताजी आए थे तो बोलके गए थे कि घर मत ना निकलियो | पर रग्घू के दोस्त आ गए और जबरदस्ती ले गए उसे |”

“और पप्पू…?”

“बाद में वो हरीश आया कि रग्घू को नेमि ने घेर लिया है और वो अकेला पड़ गया है तो वो भी उठकर भाग गया | मुझे तो कोई कुछ बताता ही नहीं कि बात क्या है | पर तू क्यों पूछ रही है ? और पिताजी आज सुबह सुबह क्यों बोलकर गए थे ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा क्या हो रहा है घर में | भाभी क्या है ये सब तुम ही बताओ न कुछ…”

“कुछ नहीं लाली तू चिन्ता मत कर | हम सब हैं न… सब ठीक हो जाएगा… जा तू जा नीलम…” और नीलम को भेजकर दरवाज़ा भीतर से बन्द कर लिया भाभी ने |

नीलम ने बाहर से ही कालेज के लिये रिक्शा पकड़ा | दिल में डर था कि पता नहीं क्या हुआ होगा और क्या होगा आगे, पर ऊपर से दिलेर बनी बैठी थी | अभी फाटक पार करके रेडियो तक ही पहुँची थी कि सामने से जैन सर और उनके ग्रुप के लोग तेज़ कदमों से चलते चले आ रहे थे | उन्होंने वहीं हाथ दिखाकर नीलम का रिक्शा रुकवा लिया “मैडम वापस लौट जाइए | आज कालेज जाना खतरे से ख़ाली नहीं | सारे लौंडे आपको ही तलाश रहे हैं | बिना मतलब आपके साथ कोई बदतमीज़ी कर बैठेगा | लौट जाइए आप | जा भाई रिक्शा, जा वापस ले जा मैडम को…” जैन सर बोले और खुद ही रिक्शा का हैण्डल पकड़ कर पीछे घुमाने लगे |

“एक मिनट…” रिक्शा में बैठे बैठे ही रिक्शा घुमाते रिक्शा वाले और जैन सर को रोकते नीलम बोली “पर क्यों…? हमें क्यों इस तरह ढूँढ रहे हैं…? बात क्या है…?”

“आपको नहीं पता ? अरे अब तक तो सारे शहर में फ़ैल गई होगी बात और आपको नहीं पता ? क्यों बेवकूफ़ बनाती हैं मैडम…?” गुप्ता सर बोले |

“हमें सच में कुछ नहीं पता…” नीलम अभी बोल ही रही थी कि वास्तव में हाथों में साइकिल की चेन और न जाने क्या क्या चीज़ें लिये हुए लड़कों के एक गुट ने इन सबको घेर लिया और ज़ोर ज़ोर से नारेबाज़ी करने लगे “नीलम मैडम वापस जाओ… अपने भान्जे वापस लाओ… राघव हाय हाय…” वगैरा वगैरा | सारे प्रोफ़ेसर डरे खड़े थे कि अगर कुछ बोले तो कहीं भीड़ इन्हें ही न धर ले | नीलम ने उन सबकी तरफ़ देखा और फिर खुद ही हिम्मत करके लड़कों में से एक का नाम लेकर बोली “नरेश क्या बात है ? ये सब क्या है ? पप्पू रग्घू क्या कालेज नहीं पहुँचे ? पर वो तो सुबह ही निकल गए थे घर से… फिर कहाँ गए दोनों…?”

“अबे रुको भाई रुको… मुझे लगता है नीलम मैडम को कुछ नहीं पता…” नरेश ने शोर मचाते लड़कों को रोका और फिर नीलम से पूछा “आपको सच में कुछ नहीं पता मैडम…?”

“क्या बात…?” नीलम ने आगे पूछा |

“मैडम यहाँ तो कालेज में बहुत बड़ा हादसा हो गया…”

“कैसा हादसा…?”

“मैडम वो नेमि का खून कर दिया किसी ने…”

“क्या…? नेमि का खून…? पर किसने…? और तुमलोग ये पप्पू रग्घू केलिए ऐसा क्यों बोल रहे हो…?”

“मैडम सबका यही कहना है कि उन्हीं दोनों ने किया है…”

“क्या…? हे भगवान अब क्या होगा…” घबराती हुई नीलम बोली तो कुछ लड़के फिर से उग्र हो उठे “अरे हट यार नरेश, मैडम ऐसे ना बतावेंगी कहाँ हैं इनके दोनों चहेते… ढंग से पूछना पड़ेगा इनसे… हट तू हट… इन्हें सब पता है… सारे ड्रामे हैं इनके… हट तू, हम पूछते हैं…” और नरेश और दूसरे प्रोफेसरों को पीछे धक्का देकर लड़कों का एक गुट रिक्शा की तरफ़ बढ़ा तो एक बार तो नीलम को सामने साक्षात् मौत नज़र आने लगी | फिर भीतर की सारी ताकत समेट कर चीखती हुई बोली “खबरदार कोई आगे बढ़ा तो… जब कह दिया हमें कुछ नहीं पता कुआ हुआ कैसे हुआ… हमें पता होता तो क्या हम आते यहाँ आते मरने…?” अब तक रिक्शे वाले को भी कुछ जोश आ गया था और रिक्शे के सामने अड़ गया “खबरदार जो किसी ने आगे बढ़ने की हिम्मत की… अगर किसी का खून हुआ है तो पुलिस में जाओ…यों औरतों के साथ बदतमीज़ी क्यों करते हो…? मत भूलो मुसलमान का रिक्शा है… जान दे देगा मुसलमान पर औरतको हाथ न लगाने देगा… देखता हूँ में भी कैसे आगे बढ़ते हो तुम लोग…”

अब तक नीलम की हिम्मत और रिक्शे वाले का रौद्र रूप देखकर जैसे दूसरे प्रोफेसर भी सोते से जाग गए थे | नरेश भी इन लोगों के साथ ही था | सबने मिलकर लड़कों की भीड़ को पीछे खदेड़ा | इस चक्कर में दो तीन लोगों के चोटें भी आ गईं | तभी मौके का फ़ायदा उठाकर रिक्शे वाला रिक्शा ले भगा | लेकिन उल्टी दिशा में भागा था तो न जाने कहाँ से घूमता घामता वापस बिब्बी के घर पहुँचा | भागती हुई नीलम को यही शोर सुनाई दिया “अरे जाओ मैडम, हम भी देख लेंगे कब तक छिपा कर रखेंगी आप उन दोनों को हम लोगों से | कभी न कभी तो हमारे पल्ले पड़ेंगे ही… देख लेंगे तब हम…”

नीलम अब तक वास्तव में बहुत अधिक डर चुकी थी और अब उसकी हिम्मत भी जवाब दे रही थी | समझ नहीं पा रही थी अब क्या किया जाएगा दोनों को बचाने के लिये | उसे लग रहा था भगवान ने भाई तो नहीं दिये थे पर ये दो भान्जे दिये थे | हर राखी और भाई दूज पर जीजा जी इनके राखी बँधवाते थे और टीका करवाते थे | उनके बाद भी यही नियम बदस्तूर ज़ारी रहा था | बिब्बी ग़लत थोड़े ही कहती हैं कि उसके तो भान्जे भी यही हैं और भाई भी | क्या इन्हें भी खो देगी ? क्या होगा इनका अब ? इसी सारी उधेड़ बुन के चलते वो घर वापस पहुँची तो वहाँ पुलिस पहुँच चुकी थी और सरोज और भाभी से पूछ ताछ कर रही थी | रिक्शा से उतर कर पर्स सँभालती ताबड़ तोड़ नीलम भीतर भागी और पुलिस वालों से बोली “देखिये हा अभी अभी कालेज गए थे | वहीं सब पता चला | लड़के तो हमें ही मारने को चढ़ गए थे | आप हम लोगों से क्या पूछ ताछ कर रहे हैं | हम तो खुद ही परेशान हैं | प्लीज़ आप लोग बाहर पिताजी के आने का तो इंतज़ार कीजिये…”

“देखिये मैडम, हम आपकी बहुत इज़्ज़त करते हैं | पर मामला नेता जी के बेटे का है तो ऊपर से भी दबाब आना शुरू हो गया है | अच्छा होगा अगर आप लोग आराम से दोनों को हमारे हवाले कर दें | और हम ऐसे ही नहीं आ गए हैं – देखिये थाने से हमें ये आर्डर मिला है…” कोई कागज़ दिखाता पुलिस वाला बोला | भाभी ने सरोज और नीलम को पकड़ कर एक तरफ़ बैठा दिया और पुलिस वाले से बोलीं “आप तलाशी ले लो भैया और अगर मिल जाएँ तो ले जाओ साथ में… हममें से कोई कुछ नहीं बोलेगा…”

“अजी हमें तो आपके घर की भी तलाशी लेने के आर्डर हैं | यहाँ की ले लें फिर आपके घर भी चलेंगे | घबराइए मत माता जी…” कुछ बदतमीज़ी से दूसरा पुलिस वाला बोला “और मैडम रेडियो वेडियो पे हमारे खिलाफ़ कुछ बोलना है तो बोल दो जाके | पर हम तो अपना काम खतम करके ही जावेंगे यहाँ से…” बड़े गन्दे तरीके से पुलिस वाला बोल तो नीलम चुप बैठने के सिवाय और कुछ न कर सकी | बिब्बी तो पहले ही जड़ बन चुकी थीं | इसी बीच पिताजी भी आ चुके थे और दोनों स्कूलों के सारे मास्टर मास्टरनियाँ, प्रिंसिपल, शहर के दूसरे लोग भी घर के भीतर इकठ्ठा हो चुके थे | खबर जंगल में आग की तरह फैल चुकी थी | नीलम ने देखा बिब्बी भाभी की गोद में बिल्कुल उसी तरह सिमटी बैठी थीं जैसे जीजा जी की मौत के वक़्त बैठी थीं…

पुलिस वालों ने घर की तलाशी ली – पर वहाँ इकठ्ठा हुए लोगों को देखकर फिर किसी तरह की बदतमीज़ी नहीं की | बाद में पिताजी को लेकर घर गए | वहाँ की भी तलाशी ली | आखिर पिताजी को वार्निंग देकर की जैसे ही लड़कों का कोई सुराग मिलेगा वो तुरन्त थाने में खबर देंगे – पुलिस वाले वापस लौट गए |

अब नीलम ने पिताजी को बताया कि क्या कुछ हुआ उसके साथ जब वो कालेज पहुँची और क्या कुछ कहा यहाँ घर में पुलिस वालों ने | पिताजी ने भी बताया कि वो थाने पहुँचे तो वहाँ नेमि के नाते रिश्तेदारों और उसके पार्टी वर्कर्स की भीड़ इकठ्ठा थी और नारेबाज़ी चल रही थी कि अगर जल्दी ही लड़कों को उनके हवाले नहीं किया गया तो वो थाने को आग लगा देंगे | हालत वाक़ई बेहद नाज़ुक थे | कालेज भी तो आज ही खुला था दो हफ़्ते की छुट्टियों के बाद कि फिर से अनिश्चितकाल के लिये बंद कर दिया गया था | बाक़ी सारे स्कूल भी अनिश्चितकाल के लिये बंद हो गए थे | शहर में कर्फ़्यू तो नहीं था पर स्थिति कर्फ़्यू जैसी ही थी | जब तक ये लड़के नहीं मिल जाते तब तक कभी भी दो गुटों में दंगा भड़क सकता था | पप्पू रग्घू के अलावा चार पाँच लड़कों के नाम और आ रहे थे जिनके लिये कहा जा रहा था कि उन्होंने न दोनों की मदद की थी इस काम में | अब सबके सामने यही समस्या सबसे बड़ी थी कि सबसे पहले तो लड़कों को कहीं से ढूँढकर लाया जाए और पता लगाया जाए कि सच्चाई क्या है | अगर वाक़ई ये लोग दोषी हैं तो फिर उधर कुछ किया जाए कि सज़ा कम से कम मिले | और अगर दोषी नहीं हैं तो फिर इन्हें बचाने के लिये कुछ किया जाए | साथ ही ये भी समस्या थी कि घरवाले पुलिस से पहले खिन से इन्हें ढूँढ लाएँ | क्योंकि यदि घरवालों से पहले कहीं अगर पुलिस के हत्थे चढ़ गए तो वो तो राजनीतिक दबाव के चलते मुज़रिम न होते हुए भी मुज़रिम बना देगी | क्या करें कुछ समझ नहीं आ रहा था | लड़के भी जब से भागे थे किसी ने कोई सम्पर्क नहीं किया था घरवालों से |

कालेज तो बन्द हो चुके थे पर नीलम को तो रेडियो की ड्यूटी के लिये जाना पड़ता था कभी सुबह, कभी शाम तो कभी रात को देर से भी घर वापस आती थी | उसने मासूस किया कि जब भी घर से बाहर आती जाती है तो कोई न कोई उसका पीछा करता है | घर आकर उसने बताया तो महेंदर चाचा जी ने बताया कि सादे कपड़ों में पुलिस वाले दोनों घरों पर तैनात हैं और बाक़ी लड़कों के घरों पर भी तैनात हैं कि कहीं ऐसा न हो कि घरवाले लड़कों के मिलने पर भी उन्हें पुलिस के हवाले न करें | घर पर आने जाने वाले हर इन्सान से पूछ ताछ होती थी कि वो कौन है, क्या करता है और यहाँ किसलिये आया है | मिलने जुलने वालों ने भी पुलिस से परेशान होकर इनके घर आना जाना लगभग बन्द ही कर दिया था | जो आता था वो भी डरते डरते आता था कि कहीं कोई कुछ पूछ ताछ न करने लग जाए | तो इस तरह पुलिस की निगरानी में अपने ही घर में क़ैदी बने दिन गुज़ार रहे थे | उधर सरोज न तो कुछ खाती पीती थी न ही कुछ बोलती थी | दोनों लड़कियाँ आ चुकी थीं | घर में जवान छोटी लड़की और बाहर सादे कपड़ों में पुलिस वाले – लिहाज़ा गुड्डो को भाभी अपने साथ ही लिवा लाई थीं | सरोज को कभी ज़्यादा ज़िद करके लड़कियाँ थोडा बहुत खिलाने की कोशिश करती थीं – – पर वो तो जैसे ज़िंदा लाश बन चुकी थी | नीलम ने सरोज को गौर से देखा तो दिल को धक्का लगा उसका हाल देखकर – उस परी जैसी राजकुमारी का क्या हाल हो चुका था सदमे झेलते झेलते | चेहरा अजीब सा हो गया था, दाँत मसूड़े छोड़ रहे थे, काले लम्बे घने बाल न जाने कब के पतझड़ के शिकार हो चुके थे, झील सी गहरी आँखें जो कभी हर किसी को डूबने को मजबूर करती थीं अब खुद गहरे काले गड्ढों में डूबती चली जा रही थीं, परेशानियों की तपिश झेलते झेलते गोरा गुलाबी रंग काला पड़ना शुरू हो चुका था | हँसना गाना सब भूल चुकी थीं – वरना जीजा जी के जाने के बाद अब तक भी सबका मन बहलाए रखने के लिये उसी तरह की शैतानियाँ, उसी तरह गाना बजाना – सब करती रहती थीं – अपना दुःख भूल कर | और अब ये क्या हाल हो गया था |

इधर पिताजी भी बदहवासों की तरह लड़कों को ढूँढते फिरे जाते थे | बदन जलाती लू और चिलचिलाती धूप में भी निकल जाते थे पता नहीं कहाँ कहाँ | कभी कोई बता देता कि नगीना के आस पास देखा जंगलों में छिपते छिपाते तो सुबह सुबह लाठी उठाकर और सर पर टोपी और कंधे पर गमछा डालकर चल पड़ते उसी तरफ़ | दो दो दिन वापस नहीं आते | घरवाले और यार दोस्त परेशान होते उनका ये हाल देखकर – कहीं कुछ हो हवा गया इन्हें तो क्या होगा | आखिर दोस्तों ने बारी बारी से साथ चलने का फ़ैसला किया | वाही लोग आकर बताते थे कि पागलों की तरह सड़कों और जंगलों की ख़ाक छानते फिरते हैं पण्डित जी कि कहीं तो मिलें बच्चे | राहगीरों से पूछते “भाई तुमने यहाँ किन्हीं चार पाँच लौंडों को तो भागते नहीं देखा…?” और वो राहगीर अगर झूठ भी बता देते कि हाँ जी… देक्खा तो हा… उंगे कू भाग रे है… बस फिर तो पिताजी उसी तरफ़ चल पड़ते और अपने हिसाब से पूरी ताक़त लगाकर आवाज़ लगानी शुरू कर देते – पप्पू… रग्घू… और जब कुछ हाथ नहीं आता तो वहीँ किसी पेड़ के नीचे निढाल होकर बैठ जाते | तब साथ के लोग उन्हें सान्त्वना देने की कोशिश करते | पिताजी और बाक़ी लोगों को ये डर भी था कि पुलिस के डर से कहीं कुछ उल्टा सीधा तो नहीं कर बैठे – ज़िंदा भी हैं या नहीं…? इधर घर पर पुलिस वालों ने परेशान किया हुआ था | रात बिरात वक़्त बेवक़्त पहुँच जाते कि हमें पता चला है कि लड़के आपको मिले हैं आज | बताओ कहाँ हैं | तंग आकर पिताजी एक दिन थाने जा पहुँचे और जम गए थानेदार के सामने “मैं बैठा हूँ आपके सामने | अप गिरफ़्तार कर सकते हैं मुझे जमानत के तौर पर | पर ये आए दिन की आपके डिपार्टमेंट के लोगों की बदतमीजियाँ हम लोग नहीं बर्दाश्त करेंगे | हम तो खुद ढूँढ रहे हैं बच्चों को | अरे बच्चों को ढूँढना आपका काम है – पर कर हम रहे हैं – क्योंकि फ़िक्र है हमें अपने बच्चों की – पता नहीं कहाँ हैं – किस हाल में हैं…?”

“क्यों खून करते वक़्त नहीं सोचा था ये सब उन लोगों ने ?” थानेदार – जो अभी नया नया ही आया था और जानता नहीं था पिताजी को और शहर के लोगों को – बोला तो पिताजी भड़क उठे “बिना किसी सबूत के आप कैसे कह सकते हैं कि खून उन्होंने ही किया है…?”

“अजी लड़के तो मिलें… सबूत भी अपने आप चलके आ जाएँगे…” बेशर्मी से हँसता हुआ थानेदार बोला | इसी बीच न जाने कैसे शहर में अफ़वाह उड़ गई कि गुरु जी को नया थानेदार गिरफ़्तार करके ले गया है | फिर क्या था – सारा शहर थाने के बाहर – गुरु जी को जल्दी नहीं छोड़ा तो थाने को आग लगा देंगे | अब समझ आया थानेदार को कि ग़लत आदमी से पंगा ले बैठा | बाहर आकर बोला “मैंने उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया है | वही आए हैं खुद चलकर यहाँ | आप लोग उन्हें ले जा सकते हैं…”

पिताजी बाहर आए “हाँ मैं खुद चलकर आया हूँ | इनके पुलिस वालों ने हमारा जीना हराम कर रखा है | हमारे घर आने जाने वाले हर इन्सान की तलाशी ली जाती है जैसे हर कोई खून का सबूत अपने साथ लिये घूम रहा है | वक़्त बेवक़्त दरवाज़ा खुलवाकर बगैर किसी सर्च वारण्ट के तलाशी लेने पहुँच जाते हैं | और अब तो ये आपके थानेदार साहब कहते हैं कि लड़कों ने वाक़ई खून किया है | कहते हैं कि लड़के मिल जाएँ तो सबूत जुटाना तो इनके बाँए हाथ का खेल है…” थानेदार समझ गया था कि बात बिगड़ सकती है | उसे अपने शब्द वापस लेते हुए वादा करना पड़ा कि आगे से किसी की तलाशी नहिंली जाएगी और न ही किसी लड़के के घरवालों को परेशान किया जाएगा | तब कहीं जाकर घर में चैन से बैठना नसीब हुआ सबको |

इसी सब में एक महीना गुज़र गया और अब घरवालों का शक यकीन में बदलने लगा कि लड़कों ने शायद कुछ सोसाइड वोसाइड कर लिया पुलिस वालों के डर से | उधर शहर में प्रदर्शन बढ़ते चले गए थे | क्योंकि कोई एक दो लड़कों की बात नहीं थी – आठ दस लड़के गायब हुए थे | जिनमें से पाँच का नाम तो मुज़रिमों में भी था | तभी एक दिन आशा की एक किरण दिखाई दी | डाक्टर साहब के यहाँ लखनऊ से सरोज के ननदोई का फोन आया “सारे लड़के हमारे पास आ गए हैं और हम यहाँ लखनऊ में ही सरेंडर करा रहे हैं इन्हें – क्योंकि दो दिन बाद गर्मी की छुट्टियों में कोर्ट बन्द हो जाएँगे और बिजनौर की जेल में पुलिस वाले नेता जी के दबाव के चलते इनके साथ कुछ भी कर सकते हैं | इसलिये इनका यहीं रहना ठीक रहेगा | वैसे इन्होने कुछ किया नहीं है | जिसने किया है वो आधे वक़्त इनके साथ ही था | बाद में कहीं गायब हो गया | आप जैसे ही रास्ता साफ़ देखें लखनऊ आ जाएँ…” और फिर एक दिन डाक्टर साहब के ही साथ पिताजी और महेंदर चाचा जी और कुछ और लोग लखनऊ केलिए रवाना हो गए | वहाँ पहुँचकर फूफा जी से पता चला कि ये पाँचों एक दिन सुबह सुबह घर पहुँचे | पिताजी ने उन्हें खबर कर ही दी थी सारी घटना की और बुआ जी कुछ दिन सरोज के पास रहकर भी जा चुकी थीं | लिहाज़ा इन्हें दरवाज़े पर देखते ही तुरन्त भीतर लेकर दरवाज़ा बन्द कर लिया | हालत खस्ता हो रही थी इनकी | दाढ़ी और बाल बढ़े हुए थे | कपड़े गंदे और फटे हुए थे | पैरों की चप्पलें जूते फटे हुए थे और पैरों में जगह आगाह ज़ख्म हो गए थे | इन्हें बैठाया | नाश्ता पानी देकर शान्त किया | नहलाया धुलाया | कपड़े बदलवाए | नाई को घर पर ही बुलाकर दाढ़ी बाल बनवाए गए | अखबार में इन पाँचों के फोटो भी छप चुके थे इसलिये घर से बाहर भेजने में डर था | तो घर पर ही छिपाकर रखा गया |

दो दिन तो इनमें से कोई कुछ नहीं बोला | तीसरे दिन पप्पू ने रोना शुरू कर दिया | तब उसे चुप कराते हुए रग्घू ने बताया कि नाना जी मना करके गए थे कालेज जाने के लिये | पर तभी कुछ लड़के आ गए और बोले कि अगर आज कालेज नहीं गया तो कभी तो जाएगा | तब नेमी क्या छोड़ देगा तुझे ? आज ही जाकर बात साफ़ क्यों नहीं कर लेता ? रग्घू ने सोचा कि चलो चला जाता हूँ और अपना इस्तीफ़ा भी दे आऊँगा | वो चला गया तो कालेज में घुसते ही पीछे से साइकिल की चेन, पंजे और छुरे लिये लड़कों ने इसके गुट के लड़कों को घेर लिया | इसी बीच पप्पू किपता लगा कि रग्घू चला गया है कालेज तो वो भी पीछे पीछे पहुँच गया | जाकर देखा तो वहाँ आपस में मार पीट चल रही थी | कुछ साथियों ने बीच मैं पड़कर सबको छुड़ाया और पप्पू रग्घू अपने दोस्तों के साथ क्लास की तरफ़ चल पड़े | तभी पीछे से कोई चिल्लाया “अरे जल्दी आओ… नेमि को रामपाल ने छुरा घोंप दिया…”

पप्पू के रोकते रोकते रग्घू उधर वापस भागा तो देखा कि नेमि के पेट से खून का फ़व्वारा बह रहा था | चाकू कोई निकाल चुका था पेट से | रग्घू ने सोचा इसे अस्पताल पहुँचाया जाए वरना मर जाएगा | और यही सोचकर अपनी गोद में उठाने लगा और साथ के लड़कों से भी मदद करने को कहा तो सबने कहा कि पागल है ? हम ही फँसेंगे | अच्छा यही होगा कि अभी हम सब भाग लें | पुलिस आ गई तो मुश्किल जो जाएगी | उस वक़्त तक रामपाल भी वहीं खड़ा था | नेमि को गोद से वापस नीचे रखकर सारे लड़के रशीद और दूसरे रिक्शों में चढ़कर वहाँ से भागे | रग्घू की शर्ट पर नेमि को उठाते हुए खून लग गया था | ज़ाब्तागंज के बाहर रिक्शेवालों ने इन्हें छोड़ दिया | वहीं रग्घू ने अपनी शर्ट और बनियान उतार कर फेंकी और रिक्शे वाले रशीद की शर्ट लेकर पहनी | इन्होंने एक बार घर आने की भी कोशिश की, पर तब तक पुलिस सारे में फ़ैल चुकी थी और पागल कुत्तों की तरह इन्हें तलाशने में लगी थी | इन्हें दर था कि अगर पुलिस की गिरफ़्त में आ गए तो वो तो इनके पास से छुरा भी बरामद करवा देगी | तब ये लोग जंगल के रास्ते ही निकल गए | पास में न पैसे थे न कपड़े | रास्ते में रामपाल से इनका झगड़ा हो गया कि साले तूने ये क्या किया ? तुझे अपने भाई का बदला लेना था तो बाद में ले लेता | हमारी लड़ाई में क्यों कूदा ? और इस झगड़े के चलते रामपाल इन्हें बीच रास्ते ही छोड़कर कहीं चला गया | अब इन्हें जंगलात के रास्तों का कुछ पता नहीं था | रास्ते में कुछ भी कच्चे पक्के फल मिल जाते तो तोड़कर खा लेते | कहीं किसी भी नदी या जोहड़ का पानी पी लेते प्यास लगने पर | कहीं कोई पुलिस वाला दिखाई दे जाता तो डर कर पेड़ों के आस पास कहीं छिप जाते | हर पुलिस वाला इन्हें ऐसा ही लगता था जैसे इन्हें ही ढूँढ रहा हो | और इस तरह रास्ता पूछते पूछते भटकते भटकते ये लोग क़रीब २५ दिन में यहाँ पहुँचे | फिर हमने अपने वकीलों से बात की | सारी बातें उन्हें समझाईं | सबका यही कहना है कि अगर तरीके से केस लड़ा जाए तो ये सब बाइज़्ज़त बरी हो जाएँगे | बहुत सारी ऐसी बातें हैं कि इन पर कोई मज़बूत केस नहीं बन सकता | अभी तो यहाँ सरेंडर करा दिया है | छुट्टियों के चक्कर में अभी बिजनौर भी ट्रांसफ़र नहीं हो सकता | और यही अच्छी बात है | क्योंकि पुलिस वालों का क्या है – वो तो अपने हथकण्डे अपना कर इनसे कुबूल करवा लेगी कि खूनी यही हैं | जैसे ही वहाँ कोर्ट खुलेंगे इनकी जमानत के लिये आप वहाँ एप्लाई कर दीजियेगा | एक बार जमानत हो जाए तो फिर सोचा जाए कि आगे क्या करना है | और ये सब बातें होने के बाद बच्चों से जेल में मिलकर नजीबाबाद वाले वापस लौट आए थे | रग्घू पप्पू के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं | दोनों यही कह रहे थे कि नाना जी हमें बचालो, हमने कुछ नहीं किया | वापस आकर पिताजी कई दिनों तक उनकी वो “बेचारी” शक्लें भुला नहीं सके थे | कुछ दिनों बाद कोर्ट खुले | इनकी जमानत की अर्ज़ी दी गई जो खारिज़ हो गई | फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट में अर्ज़ी लगाई गई और वहाँ से ज़मानत मिल गई | पर इस बीच कोर्ट खुलने के बाद इन्हें बिजनौर जेल में ट्रांसफ़र करना पड़ा क्योंकि केस वहीं का था | लखनऊ में तो फिर भी फूफा जी का रुतबा था तो काफ़ी ठीक था | पर यहाँ तो कुछ जान पहचान ही नहीं थी | बहरहाल, दो महीने की जेल काटकर आखिर इनकी जमानत हो गई और अदालती कार्यवाही शुरू हो गई | पिताजी ने रात दिन एक कर दिया इनकी भाग दौड़ का फ़ैसला सुना दिया | एक बार फिर अदालत परिसर में ही इन्हें दोबारा गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया | पिताजी और सरोज को सारी दुनिया लुटी हुई नज़र आने लगी थी | अबकी बार केस हाई कोर्ट में जाना था | जमानत भी वहीं से हुई दोबारा से – पर वही – दो महीने की जेल के बाद – क्योंकि यहाँ कोई नहीं जानता था कि किस तरह से केस लड़े जाते हैं इस तरह के | कहीं तो कमी रही जो निर्दोष होते हुए भी दोषी बना दिये गए और सज़ा मुक़र्रर कर दी गई | दूसरी तरफ़ वो रामपाल था जो खुला घूम रहा था | उसका नाम तक नहीं था इस पूरे केस में कहीं भी | ऐसा क्यों हुआ – इसका जवाब न किसी वकील के पास था और न किसी जज के पास…

क्रमशः……………….

सौभाग्यवती भव – अध्याय चौबीस

चौबीस – कालेज के इलेक्शन

सरोज की बरसी पर नीलम गई तो देखकर और दुःख हुआ कि दोनों बहुएँ अलग हो गई थीं | हालाँकि विन्नी निम्मी ने यही कहा कि अगर अलग रहकर प्रेम से रह सकती हैं तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है | पर नीलामको लग रहा था कि यही ग़लत हुआ | कम से कम दोनों साथ थीं तो बाहर वाले की किसी की हिम्मत तो नहीं होती घर की तरफ़ देखने की भी | याद आ रहा था नीलम को जब दीवाली पर बिब्बी को फोन किया था और वो बोली थीं “इन्हें समझा दोनों को – यों आपस में छोटी छोटी बात पर बुरा न माना करें | देख ले हमारे घर में चाची बुआ के झगड़ों के चलते ही मेरी ज़िंदगी बर्बाद हुई | अब मेरा क्या है – पता ना कितने दिनों की मेहमान हूँ ? और सच मान, मैं तो अब जीना भी ना चाहती | आज भी तेरे जीजा जी आए थे सपनों में | कह रहे थे कि बहुत हो गया… बच्चों का मोह छोड़ और आजा मेरे पास… मैंने तो कह दिया हमेशा की तरह कि तुम तो चले गए अपना सारा फ़र्ज़ भूलकर मुझे अकेले दम इन सबको पालने पोसने को छोड़के… अब मैं कैसे भूल जाऊँ अपना फ़र्ज़…? कह दिया मैंने कि ऐसा ही मेरा साथ चाहिए था तो कुछ बरस तो इंतज़ार किया होता… तुम्हारा दमन थामे साथ साथ चल पड़ती मैं भी | जीने की चाहत तो सच में उसी दिन खत्म हो गई थी जिस दिन तेरे जीजा जी गए थे – पर बच्चों के लिये जीती रही | शरीर को शरीर ना समझा और मन को मन ना समझा | लगी रही एक मशीन की तरह इन सबकी देख भाल में | पर अब बर्दाश्त ना होता री | उन दोनों का भी क्या पता कब तक आवेंगे वापस | ऐसे में अगर ये दोनों मिल कर रहवेंगी तो कम से कम बाहर वालों की तो हिम्मत ना होगी इधर देखने की… पर ना जी, छोटी वाली लो ज़रा ज़्यादा ही तेरा मेरा लगा रहवे है…” और नीलम सोचने लगी कि किसे क्या समझाए | समझाया तो तब भी था पप्पू रग्घू को –पर माने थे क्या ? अगर मान जाते तो ये दिन ही क्यों देखना पड़ता ? और यही उसने बिब्बी से बोल दिया था तो वो बोली थीं “हाँ री, किसे किसे क्या क्या समझाया जाए ? सच पूछ तो मुझे सबने कितना समझाया था तब कि अभी ब्याह की उम्र न है… पर मैं कहाँ मानी ? फिर बात बात पर भाभी और पिताजी समझते रहे… पर बुरा वक़्त जो आना था… ना मैंने सुनी ना तेरे जीजा जी ने | होना ही यही था री – अब क्या फ़ायदा इन बातों से ?” और फोन हेमा को पकड़ा सरोज सोचने लगी थी कि जयन्त के बाद एक बार तो जैसे सारी दुनिया ही उजड़ चुकी थी | बाद में फिर उसने खुद के बल बूते अपने बच्चों के साथ छोटी सी दुनिया बसा ली थी | विन्नी और निम्मी की शादियाँ भी अच्छे घरों में हो गई थीं | पप्पू रग्घू की भी पढ़ाई अच्छी चल रही थी | बारहवीं में दोनों ही फर्स्ट डिवीज़न से पास हुए थे | और रग्घू ने स्कूल में कॉमर्स में टॉप किया था | तभी दोनों का एडमीशन बिना किसी सिफ़ारिश के हो गया था डिग्री कालेज में | पर क्या पता था वहाँ भी शायद मेरी ही बदकिस्मती इनका पीछा कर रही थी – जैसा शकुन्तला बीवी जी बोल रही थीं |

हेमा चाय लेकर आ गई थी | मिनी भी ट्यूशन से वापस आ गई थी | विजय ने कहा था कि वो फ्री में पढ़ा दिया करेगी इसे हिस्ट्री का ट्यूशन | तो स्कूल से आने के बाद वहाँ चली जाती थी | रोज़ की तरह दादी के पास बैठी स्कूल के किस्से सुना रही थी | बता रही थी कि विजय मैडम के देवर पापा के साथ पढ़ते थे | वही बता रहे थे कि पापा बहुत अच्छी बाँसुरी बजाया करते थे | तब सरोज ने हँसकर उसे बताया “हाँ री, बिल्कुल अपने पापा यानी तेरे दादाजी पर गया था इस मामले में | फ़र्क बस इतना था कि उन्होंने बाक़ायदा सीखा था बाँसुरी बजाना अपने उस्ताद जी से, और ये खुद ही बजाता था – इसीलिये क्लासिकल नहीं बजा सकता था उनकी तरह – हाँ फ़िल्मी गाने बहुत अच्छे बजाता था |”

“तो अम्मा फिर छोड़ क्यों दिया पापा ने बाँसुरी बजाना ?”

“अरी वो कहाँ छोड़ने वाला था ? पर ये जो किस्मत होवे है ना – बहुत बड़ी चीज़ होवे है | अब बता तू वहाँ मंसूरी में इतने अच्छे अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़े थी – क्या ज़रूरत थी तुझे यहाँ लाकर पढ़ानेकी ? पर किस्मत… क्या करें इसका…?” तभी हेमा आ गई और सारी बात सुनकर मिनी से बोली “ज़्यादा परेशान मत ना कर अम्मा को | जा जाके अपना होमवर्क पूरा कर | तुम चाय पियो अम्मा | धनीराम…” और धनीराम की मदद से सरोज को बैठाकर चाय का प्याला सरोज के हाथ में पकड़ा दिया | चाय पी चुकी तो धनीराम की ही मदद से सरोज को वापस लेटाकर हेमा रसोई में चली गई | अब सरोज के पास सोचने के अलावा और क्या काम था | आज नीलम से भी तो बातों बातों में सरोज ने कहा था “भूल गई नीलम, क्या कहा था तेरे उस जैन प्रोफ़ेसर ने…?”

“वो बात हम कैसे भूल सकते हैं बिब्बी…?” नीलम ने जवाब दिया था और याद करने लगी थी वो दिन जब उसे कालेज में पता चला था कि आने वाले स्टूडेंट्स यूनियन के इलेक्शन्स में रग्घू सेक्रेटरी की पोस्ट के लिये खड़ा हो रहा था | रग्घू बी काम फ़ाइनल में था और पप्पू एम काम प्रीवियस में | सारा कालेज प्यार करता था इन दोनों को | तभी तो जब इलेक्शन हुए तो सारे स्टूडेंट्स ने ज़िद करके रग्घू को यूनियन के सेक्रेटरी के लिये जबरदस्ती खड़ा कर दिया था | घर में, जान पहचान वालों ने, सभी ने मना किया था इलेक्शन लड़ने के लिये | नीलम उसी कालेज में पढ़ाती थी | | स्टाफ के दूसरे प्रोफेसर्स ने कहा था नीलम से कि मैडम समझाइये अपने भाँजों को – बिना मतलब ये इलेक्शन विलेक्शन के चक्कर में पड़ रहे हैं | ख़ाहमख़ाह की गुटबाज़ी में फँसेंगे और कुछ नहीं | और जैन प्रोफ़ेसर ने तो मुँह में पान की गिलौरी घुमाते घुमाते साफ़ साफ़ कहा था “डाक्टर साहब, सीधी सच्ची बात है | देखो जी इलेक्शन उन लोगों को लड़ना चाहिये जिनके पास या तो ख़ूब सारा पैसा हो खर्च करने के लिये | या फिर गुण्डों का साथ हो | अब आप ही बता दीजिये इन दोनों में से क्या है आपके भाँजों के पास ? वो बड़ा वाला है राकेश, उसका हाल तो ये है कि रात को अकेले में घर से बाहर निकलते भी मूत निकलता है उसका | भूतों से उसे डर लगता है | किसी के हाथ में डंडा देख लेवेगा तो जाके माँ की गोद में छिपके बैठने की कोशिश करेगा | लौंडियों से बात करने को कहो तो वैसे शर्म से लाल हो जाता है उसका साँवला सलोना मुखड़ा | अरे वो तो आप भी जब कहीं उसके स्कूटर पर बैठकर जाती हो कौन सा खुश होता है आपको पीछे बैठाकर – पर मज़बूरी में जाना पड़ता है – वरना घर में सबकी डाट झेलनी पड़ेगी | अरे दुबे जी, मुझे तो उस दिन हँसी आ रही थी जब मैडम ने कहा कि ज़रा रेडियो तक लिफ्ट दे दो तो पलट के बोलते हैं जनाब “मौसी क्या है ? लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे कि लड़की को पीछे बैठाकर ले जा रहा है |” तब डाटा था मैडम ने पकड़के कि हम लड़की नहीं हैं मौसी हैं आपकी और ये बात सारा शहर जानता है | तब कहीं जाकर बड़ी मुश्किल से गए थे हुज़ूर…” और इतना बोलकर पान की पीक थूककर हो हो करके हँस पड़े थे जैन साहब |

“अजी उस दिन की याद है मुझे तो जैन साहब जब गुरु जी और मास्टरनी जी गाज़ियाबाद गए थे मैडम की चाची के दसवें में और राकेश को बोल गए थे मैडम के पास सोने के लिये…” दुबे जी ने बीच में टाँग अड़ाई “राकेश की मदर ने खाना बनाकर भेजा था मैडम के लिये घर से | पहले तो वे जनाब जाने को ही राज़ी नहीं थे – रात जो हो गई थी | ख़ैर, जैसे तैसे राज़ी हुए तो रास्ते में वो पीपल का पेड़ पड़ता है न – वहीँ कुंए पर…? बस सारा खाना फेंक दिया वहीँ और खड़े खड़े काँपने लगे | बाई चाँस मैं निकल रहा था उधर से | राकेश जी को काँपते जो देखा तो इतना तो समझ गया कि किसी बात से डर रहे हैं भाई साहब | पास जाकर कन्धे पर हाथ रखा तो तो एकदम से चौंक पड़े और भूत भूत करके चिल्लाने लगे | बड़ी मुश्किल से समझाया कि कोई भूत वूत नहीं है – दुबे का भूत है ये – तब कहीं जाकर जान में जान आई | फिर घबराकर घिघियाते हुए बोलते हैं “किसी दोस्त ने बताया था कि इस पेड़ पर भूत रहता है | और सर जब में खाना लेकर आ रहा था मौसी के लिये तो सच में वहाँ ऊपर भूत लटका हुआ था | वो देखिये भूत की फटी शर्ट | मैंने तो खाना उसे ही दे दिया | अब कम से कम मेरे पीछे तो नहीं आएगा…” सच बताता हूँ जैन साहब मैंने सर पीट लिया अपना | फिर दिखाया उन महाशय को कि वो देखिये ऊपर – वो भूत नहीं बन्दर है | और वो शर्ट भी किसी भूत की नहीं बल्कि वानरदेव किसी की उठा लाए हैं और फाड़ कर भुतहा बना दी है – तब जाकर उनकी जान में जान आई | अब कहें कि हमने तो मौसी का खाना फेंक दिया | अब क्या करें ? हमने कहा घबराओ मत | चलो हमारे साथ | नीचे से खुला पड़ा टिफिन उठाया | बन्द करके उनके हाथ में पकड़ाया और पास ही से रामकुमार से छोले पूरी लेकर उन्हें दी | फिर मैडम के घर तक छोड़ कर आया | क्यों मैडम याद आया कुछ…?”

“सब याद है सर…” नीलम ने जवाब दिया और वो किस्सा याद करके नीलम को भी हँसी आ गई थी |

“और वो छोटे जनाब – वो जो सेक्रेटरी बनने के ख़्वाब देख रहे हैं…?” माहेश्वरी जी काफ़ी देर से चुप बैठे सारी बातें सुन रहे थे तो बोल ही पड़े “वो तो साहब स्टूडियस हैं | थ्रूआउट फर्स्टक्लास रहे हैं | स्कूल टॉप किया है हमेशा ही | यहाँ भी पिछले साल टॉप किया था | तो किसी पंगे से उनका कोई मतलब वास्ता ही नहीं | असल में तो मैडम आपके दोनों भान्जे ऐसे हैं कि जिन्किलोग मिसाल देते हैं अपने बच्चों को कि बनना है तो राकेश और राघव के जैसा बनो | आपकी बहन जी और आपके पिताजी ने बड़े अच्छे से परवरिश की है दोनों की | अब ऐसे सॉफ्ट और इंटेलेक्चुअल लोगों का इलेक्शन के दंगल में क्या काम ? नहीं नहीं बताइये, है कुछ ?”

“और जानती हैं राघव के सामने कौन खड़ा हो रहा है ?” गुप्ता सर भी कुछ अपने सामान्य ज्ञान की जानकारी देना चाहते थे तो अपने माथे पर गिर आई घुँघराले बालों की लट को सीधे हाथ की उँगलियों से पीछे करते हुए बोले “ अरे वाही, नेता जी का सुपुत्र नेमी…”

“पर वो तो क्रिमिनल बैकग्राउण्ड का है ? उसे कैसे खड़ा किया जा सकता है यूनियन के इलेक्शन्स में ?” आश्चर्य में भरी नीलम ने पूछा |

“क्या मैडम आप भी…?” नीलम की नासमझी पर कुछ कुछ झुँझलाते हुए जैन सर बोले “अजी मैडम जी आजकल तो स्साली सारी की सारी पॉलिटिक्स इन क्रिमिनल्स से ही भरी पड़ी है | और फिर उसके बाप को भी तो फ़ायदा होगा अगर वो इलेक्शन जीत जाता है तो…”

“पर उस श्यामपाल वाले काण्ड के बाद तो नेता जी ने खुद ही अखबारों में निकलवा दिया था कि नेमिसे उनका अब कोई सम्बन्ध नहीं है ?” नीलम ने दलील दी |

“जी निकलवा तो दिया था…” गुप्ता जी ने नीलम की जिज्ञासा का समाधान किया “पर इन पॉलिटिक्स वालों की ये सब चालें होती हैं लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिये | उन्होंने देखा कि श्यामपाल के मर्डर का मामला काफ़ी उलझता जा रहा है, और असली आई विटनेस वो मिल का गार्ड इतना दिलेर है कि किसी से डरेगा नहीं तब उन्होंने जान बूझकर अखबार में वो सब निकलवा दिया | इस तरह लोगों के सवाल जवाब से बच गए, रात दिन के पुलिस के चक्करों से बच गए, और साथ में वक़्त मिल गया नेमि का रास्ता साफ़ करने के लिये | वैसे भी पुलिस तो ख़ैर क्या बिगाड़ सकती थी उनका – भई थानेदार भी तो उन्हीं की कौम का है – जेब में लिये घूमते हैं उसे तो नेता जी | हाँ पब्लिक का ज़रूर था – तो सहानुभूति बटोर ली कि दो बेटों में से एक नालायक निकल गया तो क्या – नेता जी इतने दूध के धुले हैं कि उससे सम्बन्ध ही समाप्त कर लिया | हमारा तो रात दिन का इन्हीं पोलिटिशियन्स के साथ उठाना बैठना है – आपको तो पता ही है | और मैडम जी अन्दर की बात तो ये है कि नेमि के इलेक्शन जीतने से नेता जी मज़बूत होते हैं | और वो किसी भी क़ीमत पर उसे जितवा कर ही रहेंगे – भले ही पीछे से साथ दें | तो कुछ भी हो सकता है इन इलेक्शन्स में…”

“और फाइनेंशल कंडीशन…?” जैन सर काफ़ी देर से कुछ नहीं बोले थे “देखिये हम मानते हैं कि आपके मौसा जी कभी शहर के राजा हुआ करते थे | ये साले मील वील वाले सब उन्हीं को दीमक की तरह चाट चाट कर आज लखपति बने बैठे हैं | इतनी इतनी फैक्टरियाँ बना ली हैं इन्होंने | वरना औक़ात क्या थी मादरचोदों की ? सारा शहर जनता है कि बाप इनका खोमचा लगया करता था | हिसाब क़िताब में अच्छा था तो ठेकेदार साहब ने अपने यहाँ मुँशी रख लिया था | बस जी, मुँशीपने में चाट गए धीरे धीरे करके सब कुछ स्साले… पर वो पुरानी बातें हैं मैडम | असल बात तो ये है कि आज की तारीख़ में फूटी कौड़ी नहीं है आप लोगों के पास इलेक्शन में खर्च करने को | और क्या क्या खर्च नहीं होता – दोस्तों और पार्टी वर्कर्स का खाना पीना – वो तो दोनों तरफ़ से लूटते हैं साले – पार्टी से भी और कैंडीडेट से भी | फिर कई बार वोटर्स को रिश्वत भी देनी पड़ती है – भले ही कालेज की स्टूडेंट्स यूनियन के ही इलेक्शन क्यों न हों… आगे भी तो इन्हीं कैंडीडेट्स के बल बूते चुनाव जीतने होते हैं पार्टीज़ को… तो समझाइये मैडम इन बच्चों को…”

“वो तो सब ठीक है सर, पर दोनों बच्चे तो हैं नहीं | अपना भला बुरा कुछ उन्हें भी तो सोचना चाहिये या नहीं ?” सर हिलते हुए नीलम ने जवाब दिया “आपको तो पता ही है हमारे घर में कोई किसी पर अपनी बात लादता नहीं | हर किसी को खुली छूट है जैसे चाहो अपनी ज़िंदगी बसर करो | ऐसे में इन दोनों से भी क्या कहा जा सकता है ?”

“भई देख लीजिये, हमारा काम था समझाना, सो हमने समझा दिया | आगे आपकी मर्ज़ी…” जैन सर ने पलट कर कहा और मेज़ पर से अपना रजिस्टर उठाकर चल पड़े क्लास में | नीलम को रेडियो जाना था तो रिक्शा लेकर उधर निकल गई | रात की ड्यूटी थी सो घर पहुँचते पहुँचते एक बज गया था रात का | उस दिन नीलम का मन नहीं लगा था काम में | समझ नहीं पा रही थी कि वाक़ई सारा स्टाफ सही बोल रहा था – इन लोगों को इलेक्शन से दूर ही रहना चाहिये ? या फिर ऐसे ही डरा रहे थे सब नीलम को ? ख़ैर, घर जाकर बात करेंगे पिताजी से – देखो क्या कहते हैं वो ? और सर झटक कर काम में लग गई थी “मीडियम वेव तीन सौ चौदह दशमलव चार सात मीटर यानी नौ सौ चौवन किलो हर्ट्ज़ पर………………….”

घर पहुँची तो हर रोज़ की तरह माँ पिताजी इंतज़ार में जाग रहे थे | हाथ मुँह धोकर फ्रेश हुई और माँ पिताजी को कालेज में हुई सारी बातें बताईं |

“तो ग़लत क्या कह रहे थे वेलोग ? सही तो कह रहे थे | पगला गए हैं ससुरे…” पिताजी ने जवाब दिया |

“फिर…?” नीलम ने पूछा |

“अब फिर क्या…? कल सुबह जाएँगे और समझा आएँगे कि अगर यही सब करना है तो आज से कालेज जाना बन्द | नाम कटा देंगे कालेज से | आखिर को गार्जियन हैं हम दोनों के…” और नीलम आश्वस्त होकर सो गई थी | सुबह पिताजी वहाँ गए तो पता चला कि दोनों ही घर पर नहीं थे | कालेज की छुट्टी थी उस दिन इतवार की तो नीलम घर पर ही थी | उधर बिब्बी भी घर पर ही थीं | पिताजी बिब्बी को सारी बातें समझा आए थे और आश्वस्त होकर घर पहुँचे थे कि लाली अपने आप समझा लेगी उन्हें | शाम को दोनों घर आवेंगे तो हम भी समझा देंगे | शाम को दोनों घर आए | पिताजी ने सारी ऊँच नीच समझाई | उनकी माँ ने कितना संघर्ष किया बच्चों की परवरिश में ये भी सब बताया | और दोनों वादा करके चले गए कि ठीक है इलेक्शन नहीं लड़ेंगे | पर ये क्या…? अगले दिन जब नीलम कालेज पहुँची तो वहाँ राघव के बड़े बड़े पोस्टर लगे हुए थे | दोस्तों से पूछ्कर राकेश और राघव को ढूँढा और डाटा तो दोनों ने मासूमियत के साथ बोल दिया “वो मौसी क्या है ना कि नोमिनेशन पहले ही फ़ाइल हो गया था | और अब तो नाम वापस लेने की तारीख़ भी निकल चुकी है | आप चिंता मत करो | हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे घर में किसी को कुछ परेशानी उठानी पड़े | और अगर जीत गए तो बाद में पोस्ट छोड़ देंगे | ये तो बस ऐसे ही मस्ती में कर लिया…” और घरवालों के पास अब वक़्त का इंतज़ार करने के सिवा और कोई रास्ता ही नहीं बचा था | बाद के कुछ दिन – क़रीब दस पन्द्रह दिन – चुनाव प्रचार में निकल गए थे | दिन दिन भर गाजे बजे के साथ कैंडीडेट्स का जुलूस निकलता था और रात रात भर स्टूडेंट्स के घर जाकर मिन्नतें करते थे कि भई हम ही सबसे अच्छे हैं | हमें ही जिताना | और अब तारीख़ आ पहुँची थी चुनाव की – यानी कि वोटिंग की | बिब्बी गुड्डो को लेकर भाभी के घर ही पहुँच गई थीं उस दिन सुबह सुबह ही | तीनों चारों भगवान से बस यही प्रार्थना करने में लगे थे कि रग्घू को इलेक्शन में जीत नहीं नसीब होनी चाहिये | सारे स्टाफ के साथ नीलम की भी ड्यूटी लगी थी पोलिंग बूथ पर | वो भी बस यही प्रार्थना कर रह थी मन ही मन कि हे भगवान सब कुछ शान्ति के साथ निबटा दो और राघव को जीतने मत देना | कालेज में चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात थी | डर था दो समुदायों में मार पीट का – नेमि की बिरादरी के लोग और श्यामपाल-रामपाल की बिरादरी केलोग खून के प्यासे थे एक दूसरे के – और कालेज के इलेक्शन से ज़्यादा सुरक्षित वक़्त और कोई हो ही नहीं सकता था आपसी दुश्मनी निकालने के लिये | और शायद पुलिस का डर ही था कि एकाधी झड़पों को छोड़कर इलेक्शन शांतिपूर्वक संपन्न हुए थे | क़रीब क़रीब हर स्टूडेंट ने वोट डाले थे | दो लड़कियाँ भी खड़ी हुई थीं चुनाव में | उसके बाद दो दिन की छुट्टियाँ थी | तीसरे दिन रिज़ल्ट आना था | इनके परिवार के साथ साथ हर किसी का दिल धड़क रहा था कि राघव का क्या होगा – उसके सामने शहर का सबसे नामी गुण्डा नेमि जो खड़ा हुआ था | पप्पू रग्घू तो सुबह से ही गायब थे दोस्तों के साथ सो सरोज भी पिताजी के घर ही पहुँच गई थी गुड्डो के साथ | भाभी ने खाना बना तो लिया था पर इन पाँचों में से किसी के भी हलक के नीचे कौर उतर नहीं रहा था | आखिर बना बनाया खाना ऐसे ही समेट कर रख दिया गया | दोपहर क़रीब दो बजे पप्पू रग्घू दोस्तों के साथ घर आ पहुँचे | बाहर ढोल बज रहे थे | पता चला जबरदस्त मात दी थी रग्घू ने नेमि को | सारे लड़के मिठाइयाँ खिला रहे थे और बाहर जीते हुए लड़कों का जुलूस निकाला जा रहा था | घरवाले समझ नहीं पा रहे थे कि रग्घू की इस जीत पर खुश हुआ जाए या सर पीटा जाए | पर दिखाने के लिये उन लोगों का साथ दे रहे थे | नीलम तो उन लोगों की “टीचर” भी थी और पप्पू रग्घू की वजह से “जगत मौसी” भी – तो उसे तो सब खींच कर बाहर ले गए और ठेले पर चढ़ा दिया | थोड़ी दूर जाकर नीलम ठेले से उतर गई और घर वापस आ गई |

इस बीच होली आ गई थी और रिज़ल्ट के अगले दिन से ही होली की छुट्टियाँ पड़ गई थीं | लगभग दो हफ़्ता छुट्टियाँ रही थीं | जयन्त के जाने के बाद वैसे ही इन लोगों की होली बेरंग और दिवाली फीकी पड़ गई थी – पर लोकोचार के लिये और लोगों के आग्रह को देखते हुए पिताजी को सब कुछ उसी तरह करना पड़ता था | हाँ अब हर होलीकी गोष्ठी में जयन्त को याद ज़रूर किया जाता था | क्योंकि वो और पिताजी तो जान होते थे हर महफ़िल की | इस बार भी हमेशा की ही तरह होली के हवन का जुलूस निकला, हर बार की तरह पिताजी ही हवन के साथ चले, हर बार की ही तरह रात को होली बंगाली गई, हर बार की ही तरह रंग का भी जुलूस निकला और पिताजी दोनों धेवतों के साथ,पर सब कुछ होते हुए भी पिताजी का मन शांत नहीं था | हलचल मची हुई थी दिल में | सरोज भी भाभी के साथ पकवान बनाती रही, पर भाभी, सरोज, नीलम और यहाँ तक कि बुआ भी मन ही मन बेहद परेशान थीं | किसी अनहोनी की आशंका से हर किसी का दिल काँप काँप उठता था | इसका एक कारण भी था – पिताजी और शहर के दूसरे लोगों को पता चला था कि नेमि अपने गुण्डों के साथ पप्पू रग्घू के गुट के लड़कों से झगड़ा करना चाहता था और सर पर कफ़न बाँध कर निकला था कि राघव ने इलेक्शन तो जीत लिया पर या तो राघव नहीं या वो नहीं | पुलिस को भी इस सुगबुगाहट का पता था और दोनों तरफ़ के कई संदेहास्पद लड़कों को गिरफ़्तार भी कर चुकी थी शान्ति बनाए रखने के लिये |

ख़ैर, होली आकर चली गई | पिताजी ने सारी बातें समझाकर सरोज से कहा कि बच्चों को कुछ दिन के लिये लखनऊ उनकी बुआ के पास भेज दिया जाए | भलाई इसी में है | सरोज तैयार भी हो गई थी | पर दोनों बच्चों और साथ के लड़कों ने सबको समझाने की कोशिश की कि ठीक है अभी लखनऊ चले जाएँगे – पर कभी तो वापस आएँगे वहाँ से | आप क्या समझते हैं कि नेमि चुप होकर बैठ जाएगा ? वो तो तब भी हमला कर सकता है | पति को खो चुकी सरोज बेटों की सलामती चाहती थी | लिहाज़ा अपने सर पर हाथ रखवाकर रग्घू से क़सम उठवाई कि जिस दिन कालेज खुलेगा वो जाकर अपने पद से इस्तीफ़ा दे देगा | माँ की क़सम तोड़ने का साहस रग्घू में नहीं था – और वो इसके लिये तैयार भी हो गया था |

इलेक्शन के पन्द्रह दिन बाद कालेज खुला | पप्पू उस दिन कालेज नहीं गया था | उसे डर लग रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि कालेज में झगड़ा हो जाए | डर के मारे उसे दस्त भी लग गए थे | उधर नीलम की क्लास भी बारह से तीन बजे तक होती थी सो उसका रिक्शा वाला उसे ग्यारह बजे लेने आता था | तब तक वो लंच वगैरा करके तैयार हो जाती थी | तो अभी तक वो भी घर पर ही थी | पिताजी का मन बेचैन हो रहा था अकारण ही – शायद आने वाले खतरे का अंदाज़ा उन्हें हो रहा था | वो एक चक्कर सरोज के घर लगा आए थे और पप्पू के दस्तों के विषय में जानकर उसे वैद्य जी से दवा भी दिलवा लाये थे | रग्घू के लिये सरोज ने बताया कि वो सो रहा है दूसरे कमरे में | पिताजी ने कुछ और नहीं पूछा और कुछ सोचते सोचते – या शायद शून्य में खोए – घर वापस आ गए थे | भाभी ने अरहर की दाल चावल बनाए थे और नीलम और पिताजी के लिये थाल में परोसे ही थे कि नीलम का रिक्शा वाला आ पहुँचा | फिर किसका खाना और कैसा खाना…. फिर तो जो कुछ हुआ वही सरोज की इस दर्दनाक मौत का कारण बना…………..

क्रमशः………………….

सौभाग्यवती भव – अध्याय तेईस

तेईस – विधवा सरोज का संघर्ष

जयन्त के सारे संस्कार हो चुके थे | घर का माहौल गमगीन होना ही था | एक बात अच्छी थी – दुःख की इस घड़ी में शहर भर ने इस परिवार का साथ दिया था | कई परिवारों पर क़र्ज़ था ठेकेदार साहब के पैसे और उनके स्नेह का – जिसकी बदौलत आज काफ़ी लोग अच्छे से ज़िंदगी बसर कर रहे थे | फिर जयन्त जैसे ज़िंदादिल इंसान का मात्र ३२ साल की उमर में यों दुनिया से उठ जाना… जो कभी बुखार या जुक़ाम तक की चपेट में नहीं आया था उसी का यों इतनी भयंकर बीमारी झेलकर तड़प तड़प कर मरना… हर कोई आश्चर्यचकित था कि जयन्त के साथ ऐसा कैसे किया भगवान ने…? हर कोई ऊपर वाले के अन्याय को कोस रहा था | पर अब किसी बात से कोई लाभ नहीं था – पंछी तो उड़ चुका था पिंजरा तोड़ कर – उस सरोज के प्यार का पिंजरा तोड़कर जिसे पाने के लिये उसने ज़मीन आसमान एक कर दिया था… उस पिता के स्नेह का पिंजरा तोड़कर जिसकी दूसरी शादी से बड़ी उम्र में और काफ़ी मन्नतों के बाद वो पैदा हुआ था और जिसकी बुढ़ापे की लाठी था… उन भाभी और पिताजी की ममता का पिंजरा तोड़कर जिन्होंने इसी बात में सन्तोष कर लिया था कि अपना बेटा न हुआ तो क्या, दामाद तो लाख बेटों से बढ़कर मिला है, और जिसका मुँह देखकर दोनों जीते थे, जिनके घर में उसी से उजाला होता था…और उस नीलम के बालस्नेह का पिंजरा तोड़कर जिसे कभी हँसी हँसी में मौसी जी ने कह दिया था कि मैं तेरी बहन की सास तो तेरी भी सास और जयन्त तेरी बहन का पति तो तेरा भी पति, और इन सारी बातों का मतलब ना जानते हुए भी घोड़ा बने जयन्त की पीठ पर चढ़कर या उनके साथ उनके लाये खिलौनों से खेलकर जिसके बालमन को अपार शान्ति और सुख का अनुभव होता था… इतने सारे पिंजरों को खोलकर – इतने सारे नाते रिश्ते मोह ममता के तालों को तोड़कर निर्मोही बना चला गया था इतनी दूर जहाँ से वापसी का कोई प्रश्न ही नहीं था… सरोज को तो होश कहाँ से होना था ? उसका तो सर्वस्व लुट गया था | लाला जी, भाभी, पिताजी, नीलम और विन्नी सभी सारी दुनिया से कट चुके थे | जयन्त के साथ गुज़ारे गए वो सुनहरे दिन याद कर करके हर कोई मन ही मन रोता था | उस दिन फोन पर बात करते सरोज भावुक होकर बोली थी “पता ना री, मुझे तो याद ना आता कभी शान्ति से जीना नसीब हुआ हो | तेरे जीजा जी ने ज़रूर मुझे दुनिया भर की खुशी दी थी – जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था – रानी बनाके बैठाया था मुझे – अपने दिल की भी और घर की भी – पर बहुत जल्दी थक कर सो गए | अब बता होगी कोई ऐसी कि पति का महीना हुआ हो और वो खुद पढ़ने बैठ जाए ? ना पढ़ती तो पिताजी कहाँ से पालते मेरे बच्चों को ? फिर भी एक बार गाड़ी लाइन पे आ लगी थी – भले ही मेरे लिये मेहनत थी – पर चल रहा था | पता ना री भगवान को मुझसे ऐसा ही बैर था तो मुझे पैदा ही क्यों किया था ? सोचा था कि पप्पू रग्घू किसी लायक हो जावेंगे तो गंगा नहाऊँगी | उस मरे ऊपर वाले से ना देखा गया यो भी…” बोलते बोलते बिब्बी का गला भर्रा गया था ऐसा नीलम को लगा था – तभी उन्होंने फोन काट दिया था, और नीलम को एक एक करके सारी बातें याद आ गई थीं |

जयन्त का पहला महीना हुआ था | उनकी दोनों बहनें तब तक वहीं रुकी हुई थीं और भाई के जाने का दुःख पीकर कोशिश कर रही थीं कि सरोज को सँभाल सकें – सभी की तो लाडली थी वो | बुआ का भी रोज़ का आना जाना लगा ही रहता था | पर सरोज अभी तक भी सामान्य नहीं हो पा रही थी | होती भी कैसे ? पति तो बुरा भी हो तब भी विधवा होना कोई औरत नहीं चाहेगी – फिर जयन्त जैसा पति तो किसी बड़ी किस्मत वाली को ही मिल सकता है | सरोज ऐसी ही किस्मत वाली थी – पर उसका ये सौभाग्य अधिक नहीं टिक पाया | टिक जाता तो उसके माथे से करमजली और अभागिन का लेबल हमेशा के लिये उतर ना जाता ? और ये शायद भगवान को मंज़ूर नहीं था | उधर पिताजी और भाभी की परेशानी बढ़ गई थी | बेटे जैसे दामाद के जाने का सदमा तो था ही पर उससे भी बड़ी समस्या थी उसके परिवार के भरण पोषण की | बच्चों के ब्याह शादी तो नाना नानी कर देते जैसे तैसे, पर रोज़मर्रा के काम कर पाना उनकी सामर्थ्य के बाहर था | पिताजी एक इंटरमीडिएट स्कूल में लेक्चरार ही तो थे | कहाँ से लाते इतना ? जयन्त के ग़म में डूबी सरोज भी ये सब समझती थी कि पिताजी के कन्धों पर अब दो दो गृहस्थियों का भार आ पड़ा है | उसका तो अपना लाख का घर ख़ाक में मिल चुका था – कुछ अपनी नादानियों की वजह से और कुछ मुंशियों की धोखाधड़ी से | सरोज पढ़ी लिखी भी नहीं थी जो कहीं नौकरी ही कर लेती | इसी बीच यू. पी. बोर्ड के हाईस्कूल के फार्म भरने शुरू हो गए थे | पिताजी ने भाभी से मन्त्रणा की और स्कूल से एक फार्म लेकर पहुँच गए सरोज के पास | सब घरवालों को तिदरी में बुलाकर अटकते हुए बोले “देखो भाई, जो कुछ होना था उसके आगे तो किसी का कुछ वश था नहीं | पर अब आगे की सोचनी होगी लाली…”

“आगे की क्या…?” कुछ न समझती हुई सरोज भाभी और पिताजी के चेहरे ताकने लगी | औरों को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था |

“देखो, बच्चे जब तक ब्याह शादी के लायक होंगे तब तक क्या परिस्थिति बनती है कुछ नहीं कहा जा सकता | इन्सान सोचता कुछ है पर हो कुछ और जाता है | इसीलिये हम और सरोज की भाभी चाहते हैं कि सरोज फिर से पढ़ाई शुरू कर दे | कम से कम बच्चों की परवरिश तो कर सकेगी अपने हिसाब से…”

“मौसा जी क्या इतने बुरे दिन आ गए इस घर के कि ठेकेदार भगवानदास की इकलौती बहू और मास्टर गंगाप्रसाद की बेटी कहीं नौकरी करेगी दो वक़्त की रोटी के लिये ? जिस घर ने सैंकड़ों को रोटी दी उसी घर की बहू अब नौकरी करने निकलेगी ? जिस घर के सामने आते जाते लोग सर झुकाते थे उसी घर की बहू को अब लोगों के सामने सर झुकाना पड़ेगा ? आपने जो ज़िंदगी में किसी बात की परवाह नहीं की – आपकी बेटी को अब यों दर दर की ठोकरें खानी होंगी क्या ?” आवेश में भरी और आँखों से झर झर आँसू बहाती शीला बोले चली जा रही थी | कुछ पल को तो वहाँ बैठा हर इन्सान रोने लगा था | पर फिर पिताजी कुछ संयत हुए, लाला जी की कमर पर सान्त्वना का हाथ रखा और बोले “तुम ठीक कहती हो शीला | पर ऐसा था – अब वो सब बातें सपना भर बनकर रह गई हैं – तुम पता नहीं जानती हो सारी बातें या नहीं | अगर नहीं जानती हो दोनों तो लाला जी से पूछो एक बार – सब कुछ पता चल जाएगा | देखो बेटा, तुम्हारा तो भाई था वो, लाला जी की बुढ़ापे की लाठी था | और उस सबसे भी बढ़कर – हमारी लड़की की तो ज़िंदगी था वो | इसका तो संसार उसी तक सिमट कर रह गया था | बाहर क्या कुछ हो रहा है कभी इसने देखने की कोशिश भी नहीं की | उसने फूल की तरह सहेज कर रखा था हमारी लड़की को | और हम तो भूल ही गए थे कि हमारे कोई बेटा नहीं है | बेटा भी शायद इतना सुख न देता जितना उसने दिया | पर हमारी सबकी बदकिस्मती कि अधिक दिन साथ नहीं चल पाया | अब जो भी है, परिस्थिति का हिम्मत स सामना करना होगा | यहाँ जो कुछ था वो सब तो वक़्त की भेंट चढ़ गया | उसके लिये किसी को भी दोष देना बेकार है | बाक़ी अब समस्या ये है कि हमारी भी महीने की तनखाह कितनी है आप लोगों से कुछ छिपा नहीं है | ऐसे में हमारा तीन जनों का परिवार साथ में ये सब भी – मुश्किल तो होगा ही न ? अब संभल वालों को भी रोज़ रोज़ की बातों के लिये परेशान करना अच्छा नहीं लगता | तो हम चाहते थे कि अगर लाली अपनी पढ़ाई पूरी करके कहीं स्कूल में लग जाए तो कम से कम इस तरफ़ से तो हम बेफ़िक्र हो जाएँगे | बाद की बातें वक़्त आने पर देखी जाएँगी | वैसे जैसा लाला जी ठीक समझें…” और लाला जी की तरफ़ देखने लगे उत्तर की प्रतीक्षा में |

लाला जी ने छड़ी की मूठ से अपना सर उठाकर एक बार सबकी तरफ़ देखा | सरोज भाभी के कन्धे से सर टिकाए संज्ञाशून्य सी बैठी थी – उसकी आँखों के आँसू शायद सूख चुके थे ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई जानकर | शीला और किरन धीरे धीरे सुबक रही थीं भाई की याद में | बच्चे दूसरे कमरे में फ़र्श पर उदास बैठे थे | कुछ पल लाला जी भी बुत बने बैठे रहे – आवाज़ जैसे उनके कंठ से निकल ही नहीं रही थी | पिताजी धीरे धीरे उनकी कमर सहला रहे थे | आखिर गला खँखार कर धीरे धीरे लाला जी बोले “कह तो आप सही रहे हैं पंडित जी | पर सरोज से पूछ लीजिये एक बार वो क्या चाहती है ? ये सही है कि अब हमारी हड्डियों में भी दम ख़म नहीं रहा कि हम बची हुई दुकान या चक्की सँभाल सकें | कुछ तो जयन्त की माँ हमें तोड़ गई थी – रही सही कसर जयन्त ने पूरी कर दी | बच्चे अभी इस लायक हैं नहीं | आपकी भी माली हालत से हम पूरी तरह वाकिफ़ हैं | पर अगर सरोज को दुःख होगा ऐसा करने में तो जैसे भी होगा हम जाकर बैठेंगे दुकान पर और चक्की भी संभालेंगे | क्यों भई सरोज, तुम क्या चाहती हो ? देखो, तुम पर किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं है | वही करना जो तुम्हारा दिल कहे… वरना तुम्हारी सास और जयन्त की आत्मा हमें चैन से नहीं बैठने देगी…” और अधिक कुछ लाला जी नहीं बोल पाए | उनका सारा बदन काँपने लगा था | शीला बुआ ने उन्हें रसोई से पानी लाकर पिलाया |

सरोज जो अब तक भाभी के कन्धे से सर टिकाए शायद सोच रही थी कि उस वक़्त तो जब मैं ब्याह के लायक उम्र की भी नहीं थी तब उन्हें मुझे पाने की इतनी जल्दी लगी थी कि ज़मीन आसमान एक कर दिया था | सारा घर सर पर उठा लिया था कि सरोज के साथ शादी नहीं हुई तो ज़िंदगी भर कुंआरा रहूँगा | फिर क्यों इतनी जल्दी मुझे बीच रास्ते छोड़कर चले गए ? क्या वो मौत दुल्हनिया इतनी प्यारी थी कि अपनी इस दिल की रानी को छोड़ दिया उसके लिये ? या फिर शायद सोच रही थी कि ऊपर जाऊँगी तो उनसे पूछूँगी तो ज़रूर कि इतनी ही बेवफ़ाई करनी थी तो क्यों इतनी जल्दी मचाई थी शादी की ? पर शायद अब तक परिस्थिति को भाँपकर दिल ही दिल में कुछ ठान चुकी थी | भाभी के पास से उठी और पिताजी की कुर्सी के पास जाकर खड़ी हो गई और उनके कन्धे पर हाथ रखकर बोली “बताओ पिताजी कौन सा फार्म भरना है… मैं पढ़ाई पूरी करूँगी…” और पिताजी के कन्धे से लिपट कर फूट फूट कर रो उठी | जो आँसू उसने जैसे तैसे करके आँखों के दरीचों में छिपा रखे थे वही अब बाढ़ की शक्ल ले चुके थे | पिताजी ने भी उसे जी भरकर रो लेने दिया और चुप कराने की कोशिश नहीं की | काफ़ी देर रोती रही | शीला और किरन भी रो रही थीं | पिताजी, भाभी और लाला जी जैसे तैसे करके अपने आँसुओं को रोके हुए थे और पिताजी कसके सरोज को अपने सीने से लगाए उसकी पीठ सहला रहे थे |

सरोज की पढ़ाई शुरू हो गई | बुआ ने भाभी और पिताजी को काफ़ी बुरा भला कहा कि अभी महीना ही हुआ है और ये लोग ऐसा अनर्थ करने पर तुले हुए हैं | पर लाला जी ने कहा कि ध्यान मत दो पुजारिन जी की बातों पर | सरोज की दोनों ननदें भी वापस जा चुकी थीं | सरोज पढ़ाई करती थी पिताजी के साथ – स्कूल भी जाती थी | पीछे से गुंजन को भाभी सँभालती थीं | साथ में सबके लिये खाना बनाना, घर सँभालना, दूसरे बच्चों की पढ़ाई लिखाई देखना – सारी ज़िम्मेदारी भाभी ने अपने सर ले ली थी | कहीं भी आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था | अपने घर और सरोज के घर तक क़ैद कर दिया था खुद को | ज़िंदगी बोझ ही सही – पर चल निकली थी | सरोज ने तें साल में दसवीं और बारहवीं पास कर ली थी | सारा ग़म भूलकर मन लगाकर पढ़ाई की थी और दसवीं और बारहवीं दोनों में फर्स्टक्लास पास हुई थी वही सरोज जो कभी मर मर कर पढ़ाई करती थी | फिर टीचर्स की ट्रेनिंग की | और इस तरह दो बरस और गुज़र गए | इन पाँच सालों में न तो सरोज ने अपने शरीर पर ध्यान दिया और न ही अपनी भावनाओं का ही ख़याल किया | भूल गई कि कभी कैसे राज पाट थे | ज़हन में रहा तो बस यही कि पाँच पाँच बच्चों को पालना है | इन पाँच सालों में भाभी ने भी खुद को होम कर दिया सरोज के बच्चों की परवरिश में | हाँ रात को जब सरोज थक कर बिस्तर में लेटती थी तो जयन्त की यादों के सहारे मन की सारी थकान मिटाने की कोशिश ज़रूर करती थी | और इस तरह सन् ७१ में वहीं गर्ल्स स्कूल में प्राइमरी में उसकी नौकरी लग गई | बच्चों के भी दाखिले हो ही गए थे स्कूल में और इस तरह नए सिरे से सरोज की गृहस्थी चलने लगी थी |

बाक़ी सारे बच्चे पढ़ाई में ठीक चल रहे थे | बस बड़ी विन्नी का ही मन पढ़ाई में नहीं लगता था | सरोज उसे समझाती भी थी और अपनी ज़िंदगी से उसे सीख लेने को भी बोलती थी | पर उसके कानों पर जूँ न रेंगती थी | नीलम और विन्नी में ख़ूब पटती थी | विन्नी का दिल लगता था तो अपनी माँ की तरह ही तरह तरह की शरारतों में और सहेलियों के साथ मटरगश्ती करने में | या फिर माँ की ही तरह नाच गाना और नाटक करने में | उसकी हरकतों को देखकर सच में सरोज को अपने दिन याद आ जाते थे और उसकी तरफ़ से उसे डर लगने लगता था | पिताजी और भाभी भी समझाते थे पर वो उनकी भी न सुनती थी | नीलम १९ की हो गई थी और एम ए के फ़ाइनल ईयर में आ चुकी थी | पर विन्नी जो उससे मात्र नौ महीने ही छोटी थी अभी बारहवीं का ही इम्तहान दे रही थी | लिहाज़ा लाला जी ने सोचा कि उनकी आँखें बन्द होने से पहले अगर विन्नी की शादी कर दी जाए कहीं अच्छा लड़का देखकर तो वे चैन से मर सकेंगे | उनकी इच्छा कि देखते हुए मुज़फ्फरनगर के एक संपन्न परिवार में विन्नी की शादी कर दी गई पहली जून सन् १९७४ को | शादी के बाद एक बार फिर बुआ ने सरोज को याद दिलाने की कोशिश की कि वो करमजली है, अपशकुनी है, और उसे हर तरह के मांगलिक कार्यों से दूर रहना चाहिए | शुरुआत हुई भात के टीके से | बुआ के दो दो बेटे थे लिहाज़ा उनसे बड़ी भाग्यशाली औरत तो शायद ही दुनिया में कोई उन्हें दिखाई देती थी | वो अपने इसी भाग्यशाली होने का अहसान सरोज पर डालना चाहती थीं और उन्होंने सलाह दी कि सरोज भात का टीका उनके दोनों बेटों का करेगी | सरोज तैयार हो गई – आखिर भाई थे दोनों – फुफेरे ही सही | वो बुआ के घर जाकर भात नौत आई | शादी वाले दिन जब भात का आरता होने का वक़्त आया तो बुआ सबसे आगे हरिओम भैया को लेकर पहुँच गईं “अब क्या करूँ…? करमजली का ना तो कोई सगा भाई रहा ना सोतेल्ला… मेंन्ने कया अक तू फिकर क्यूँ करे है…? ये हैं ना दो दो… चल रे चल हरिओम चढ़ जा चोक्की पे… और ले यो रूपये डाल दिये आरते के बाद…”

“नहीं बुआ, हरिओम का भी आरता करूँगी, पर बाद में | पहले नीलम का आरता होगा | चल नीलम चढ़ चौकी पे…” बुआ को बीच में टोकते हुए बिब्बी ने कहा |

“लौंडिया का आरता करेगी ? अरी मत मारी गई क्या तेरी कमबखतमारी ? अरी पहले ही क्या कम बदशकुनियाँ हो रई हैं जो अब यो भिन्ना का आरता करके करेगी ?” आँखें चढ़ाती बुआ बोलीं | नीलम ने देखा कि बुआ के साथ साथ दूसरी औरतों के माथे पर भी शिकन पड़ गई थी | पर भाभी और पिताजी चुपचाप खड़े थे – शायद देखना चाह रहे थे कि उनकी बड़ी बेटी में अभी भी ताकत आई है या नहीं समाज के दकियानूसी रिवाज़ों के साथ लड़ने की |

“नीलम…” बहन को डाटती सरोज बोली “क्यों देर कर रही है ? मुहूर्त निकला जा रहा है आरते का…” और नीलम का हाथ पकड़ कर चौकी पर चढ़ा दिया | सारी औरतें हाय हाय कर उठीं – ऐसा अनर्थ ? ज़रूर संभल वाली की शह पर हो किसी को मेरे फ़ैसले पर ऐतराज़ है तो शौक़ से अपने घर वापस लौट जाए | मैं परवाह नहीं करती किसी की | मुझे भगवान ने भाई नहीं दिये तो न सही… मेरी बहन है तो और भाई है तो – यही है | अरे एक बाप की सन्तान हैं हम दोनों | इससे सगा और कौन होगा मेरे लिये ? और फिर विन्नी की शादी में पिताजी की मदद करने के लिये कोई आगे आया क्या ? जब सारे काम पिताजी ही कर रहे हैं तो क्यों न अपनी बहन को ही भाई की जगह दूँ…?” और सारी औरतें दम साध कर एक तरफ़ हट गई |

इसी तरह दूल्हे के आरते के लिये सबका यही कहना था कि नानी यानी भाभी करेंगी आरता – क्योंकि वो सुहागन हैं | पर भाभी नहीं मानीं “सरोज ने अकेले दम अपने बच्चों को पाल पास कर बड़ा किया | कितने संघर्ष झेले अकेली जान ने | उस वक़्त ये अपशकुनी नहीं थी अपने बच्चों के लिये जो अब हो जाएगी ? उस वक़्त कोई शुभ शकुनों वाली औरत आई आगे कि तू हट, मैं पालूँगी तेरे बच्चों को…? तेरे तो साए से भी दूर रहना चाहिये तेरे बच्चों को…? अरे नौ महीने पेट में रखकर तक़लीफ़ झेल कर पैदा किया जिन बच्चों को उन्हीं के लिये क्या माँ अपशकुनी हो जाएगी ? चल लाली तू चल… बोलने दे इन सबको… दूल्हे का आरता तो तू ही करेगी… अरे माँ की भी कोई हौंस होती है… चल तू…” और इस तरह सरोज ने ही अपना गुलाबी लहँगा पहन कर आरता किया दूल्हे का | नीलम देख रही थी कि आज भी बिब्बी कितनी निखरी निखरी लग रही थीं उस गुलाबी लहँगे में – बस एक माँग भरने की ही कसर बाक़ी थी | और बुआ ने तो बोल भी दिया “यो संभल वाल्ली एक के बाद एक अपशकुन करवाती जा रई है | पहले तो धी की चूड़ियाँ ना तोड़ने दीं | रंडवा होके भी राण्ड लुच्ची मरी बिन्दी लगावे है माथे पे, चूड़ियाँ पहने है, कानों में बाल्ली पहने है, रंग बिरंगी साड़ियां पहने है, अरे एक माँग की ही कसर बची है वो भी पूरी करवा देत्ती लुच्ची राण्ड कुलच्छनी… हमारे दरोगा के घर की तो नाक ही कटा के रख दी इस संभल वाल्ली ने और एक इस लल्ली ने | अपने ही नए नए रिवाज़ बनाए जा हैं दोनों जनी | करो भाई जो जी में आवे | हमें क्या | हम होवें ही कौन हैं…”

“जब तू जानती है इस बात को तो चुप करके क्यों नहीं बैठती ? क्यों ब्याह के वक़्त अपशकुन कर रही है इस तरह की उल्टी सीधी बातें करके ?” पिताजी ने बुआ को डाट कर चुप कराया | नीलम को अपने माँ बाप की यही बातें सबसे अच्छी लगती थीं – किसी भी गलत रिवाज़ के आगे घुटने टेकने वाले नहीं थे ये लोग |

बहरहाल विन्नी की शादी अच्छी तरह हो गई | और जैसा कि लाला जी को डर था – विन्नी की विदाई के कुछ रोज़ बाद ही वे भी सरोज को पिताजी और भाभी के हवाले छोड़ अपनी पत्नी और बेटे के पास चले गए | मिल जुल कर इन लोगों ने मँझली बेटी निम्मी की वक़्त आने पर शादी की | भाग्य के साथ अपनी लड़ाई सरोज भाभी और पिताजी के सहारे हिम्मत के साथ लड़ती चली जा रही थी | दो दो बेटियों की शादियाँ अच्छी तरह और अच्छे घरों में हो गई थीं तो सरोज भी अब राहत की साँस लेने लगी थी | और शायद सरोज की ज़िन्दादिली और परेशानियों से डरने के बजाय हिम्मत के साथ झेलने की उसकी आदत का ही परिणाम था कि जयन्त के बाद इतना बड़ा सदमा झेलने के बाद एक बार फिर से वो शहर भर की शान बन गई थी | स्कूल या शहर में कोई साँस्कृतिक कार्यक्रम हो, किसी के यहाँ शादी ब्याह हो, बच्चा पैदा होने का धमाल हो – कुछ भी हो – अपने तन मन की सारी थकान एक तरफ़ रखकर सरोज पूरे दिल से उन कार्यक्रमों में शिरकत करती थी | किसी के घर बच्चा पैदा होता तो सरोज खुशी से सबसे आगे हारमोनियम लेकर बैठ जाती और साथ में कोई ढोलक पर बैठ जाती और शुरू हो जाते सरोज के सोहर “बच्चे को नज़र न लग जाए चलो री कजरा आँज दें…” या “सोने का कँगना में नेगवा में लूँगी, नहीं तो भाभी ऐसी तैसी करूँगी…” कहीं शादी का जश्न होता तो सबसे पहला बुलावा सरोज को आता और कोई कहे न कहे वो खुद ही शुरू हो जाती “आंजूँ कजरिया नजर लगे ना…” या फिर “मण्डप में हौले से आना ओ सजनी दूल्हा बड़ा बेचैन | माथे की बिंदिया नाक की नथनी उड़ा दे न दिल का चैन…” वगैरा वगैरा…

सरोज हँसती थी – हँसाती थी, सरोज नाचती थी – नचाती थी, सरोज गाती थी गवाती थी – और साथ ही बुआ और उन जैसी कुछ दूसरी औरतों के तानों और चरित्र पर लगाए गए तरह तरह के इल्ज़ामों को इस कान सुन उस कान निकाल देती थी | और शायद उसका ये अल्हड़पना ही था या उसकी हँसी थी कि सारी समस्याओं का सामना साहस से करती आ रही थी – या फिर अपना ग़म ग़लत करने के लिये ज़िन्दादिली की शराब का सहारा ले रही थी | भाभी और पिताजी को सरोज के इस साहस से बहुत राहत महसूस होती थी | उन्हें लगता था कि कल अगर हम दोनों दुनिया से उठ भी गए तो ये हिम्मत के साथ अपने बच्चों की परवरिश कर लेगी | पर वे लोग शायद नहीं जानते थे कि भाग्य इतना भी अनुकूल नहीं था जितना वो समझ रहे थे | उनकी उस राजकुमारी को तो चिता तक जाते जाते भी राहत नहीं मिलनी थी | अन्त समय तक उसे तो लड़ते ही रहना था समाज से भी और भाग्य से भी… जो अक्सर उसके अनुकूल रहा ही नहीं कभी…

क्रमशः………………….

सौभाग्यवती भव – अध्याय बाईस

बाईस – सरोज का वैवाहिक जीवन, जयन्त की बीमारी और स्वर्गवास

नीलम सरोज की बरसी में आई तो जानकर बड़ी ठेस लगी उसके दिल को कि बरसी में खर्च करने के लिये बहुओं के पास पैसे का काफ़ी अभाव था | होना भी था – छोटी सरकारी मुलाज़िम थी, पर उसकी तनखाह वकीलों और जेल के कर्मचारियों की रिश्वत में निकल जाया करती थी | बड़ी कुछ ख़ास नहीं करती थी | स्कूल में जाती थी, पर वहाँ मात्र चार सौ ही मिलते थे | इतने में भला इस मँहगाई के ज़माने में गुज़र की कोई सोच भी कैसे सकता है ? हाँ चौदह पंद्रह सौ सिलाई में ज़रूर कम लेती थी | पर दो दो बच्चों की पढ़ाई और घर का राशन पानी | तभी तो देहरादून के अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ते आए बच्चों को यहाँ सरकारी स्कूल में डाल दिया था जिससे कम से कम उनकी फ़ीस से तो बच गए थे | थोड़ा बहुत सहारा उसके भाई लगा देते थे, पर उनकी भी अपनी अपनी गृहस्थियाँ – कब तक करेंगे वो भी ? वो तो नीलम बरसी में देने के लिये कपड़े बर्तन साथ ले आई थी दिल्ली से ही और साथ में कुछ रकम भी लेती आई थी तो कुछ काम चल गया था | कुछ सहारा विन्नी निम्मी ने भी लगा दिया था | पर वो बात कहाँ थी जो मौसी जी की बरसी में थी ? भले ही मौसा जी को मौसी जी का आभाव बहुत खला था – पर दोनों बाप बेटों ने कोई कसर न छोड़ी थी | किसी शादी ब्याह में जैसे खर्च होते हैं वैसे ही दोंनों हाथों से लुटाया था मौसी जी के मरने में भी और बरसी में भी | अब तो कुल मिलाकर बड़ी दयनीय स्थितियाँ थीं | नीलम सोचने लगी कि ये वही घर है जहाँ कभी रूपये पैसे और ज़ेवर कपड़े के पहाड़ लगे रहते थे | और सोचने लगी कि बिब्बी ठीक ही कहती थीं कि अगर भाभी को अपना मान लिया होता तो काफ़ी कुछ बर्बाद होने से बच सकता था |

सरोज और जयन्त के दिन बड़ी मस्ती से गुज़र रहे थे | बिज़नेसकी कोई चिन्ता जयन्त को थी ही नहीं – हर काम के लिये अलग अलग मुँशी, ठेकेदार और दूसरे लोग लगे हुए थे | बस कभी कभार सब चक्कर मार आया करते थे | रुपया पैसा पानी की तरह बहता था घर में – इतना बड़ा डाका और बाढ़ झेलने के बाद भी – नहीं पता था कब तक ऐसे ही चलना था – पर लाला जी ने तिजोरियों की चाभियाँ सरोज की करधनी में लटका दी थीं – पिताजी और भाभी के मना करते करते भी | और इस बात पर एक बार फिर सरोज को लगा था कि भाभी तो सौतेली हैं ही – पिताजी भी उन्हीं के कहे में हैं | सरोज की खुशी नहीं देखी जा रही उनसे |

सरोज को याद था कितना राज किया था उसने | सास के रूप में भाभी की ही तरह अन्नपूर्णा मिली थीं – घर में जिस वक़्त भी कोई भी आ जाए – खाना खाए बिना नहीं जा सकता था | हर में खाना बनाने क लिये एक मिश्रानी जी और एक महाराज थे | पर खाना माता जी की ही निगरानी में बनता था | गज़ब का स्वाद होता था माता जी के बनवाए खाने में | जितना स्नेह उनके दिल में था वही सब खाने में घुल जाया करता था | दूध दही घी की कोई कमी नहीं थी – नदियाँ बहती थीं इनकी तो | कई सारी गायें दूध दे रही रहीं और घरवाले तो घरवाले, जंगल से आए मजदूर भी रात को बाड़े में खाना खाकर दूध पीकर और लाला जी और उनके परिवार के लोगों को दिल से दुआएँ देकर वहीं सो रहते थे | घर में सफ़ेद ज़री की साड़ियां सीधे पल्ले की सलीके से बाँधे माता जी सारा दिन सबका ख़याल रखती उधर से उधर डोलती सरोज को बड़ी प्यारी लगती थीं |

सारा घर पेड़ों से घिरा हुआ था लिहाज़ा दिन भर तरह तरह के पक्षी शोर मचाते रहते थे – कोयलों की कुहू कुहू तो साथ में कौवों की काँव काँव, कबूतरों के जोड़ों का सारा सारा दिन प्रेमालाप – गुटरगूँ, गोरैया की चीं चीं और गुरसल का चिल्लाना, घर के लोगों की बातों से बोल पकड़ कर तोतों और मैना का बोलना – और हाँ रात को कभी कभी उल्लू का भी आ बैठना किसी पेड़ पर और उसकी अजीब सी बोली सुनकर सरोज का ठहाके लगाकर हँसना और जयन्त का एकटक उस हँसी को देखते रहना – बदले में सरोज का शरमाकर खुद में सिमट जाना – सब कुछ आज भी सरोज को कल की सी बात लगती थी | पंछिपिताजी के घर में भी बहुत आते थे जामुन के पेड़ की वजह से और वो अक्सर भाभी से कटोरियों में दाना लेकर छत पर पहुँच जाया करती थी और “आओ आओ” करके पंछियों को नीचे बुलाकर उनके सामने दाना डाल दिया करती थी और फिर तन्मय होकर उनका दाना चुगना देखती रहा करती थी | यहाँ ससुराल में जितनी अधिक हरियाली उतनी ही बड़ी तादाद में पंछी भी |

सरोज सुबह नहा धोकर पूजा पाठ से निबट कर और नाश्ता पानी करके अपने लाव लश्कर के साथ भीतर जनानखाने के बरामदे में झूले पर बैठ जाती | वहाँ के पंछियों को भी उसकी आहट हो चुकी थी | झूले पर बैठी झोंटे लेती कि तभी कोई एक चिड़िया पेड़ से उतर कर नीचे आती | सरोज इंतज़ार करती कि अभी और भी पंछी आएँगे | धीरे धीरे एक एक करके काफ़ी सारे पंछी नीचे उतर आते | नौकरानी के हाथों से दाने की कटोरी लेकर सरोज उन पंछियों के पास प्यार से दाना फेंकना शुरू करती | पंछी पहले तो सर घुमा घुमा कर और आड़ा तिरछा करके सरोज की तरफ़ देखते – फिर अपनी अपनी बोली में मानों खुशी का इज़हार करते और निःशंक होकर दाना चुगने में लग जाते | कभी कभी सरोज झूले से उतर कर पंछियों के बीच में पहुँच जाती और सारे पंछी अपने पंख फड़फड़ाते उसके इर्द गिर्द डोलने लग जाते | बच्चों की तरह सरोज उनके बीच उछल कूद मचाती रहती | कभी झूले पर बैठी बैठी ही किसी पंछी को अपने पास बुलाती – ख़ासकर किसी तोते को – और उससे कुछ न कुछ बात करने की कोशिश करती | दूसरे पंछियों को शायद लगता कि ये तो बस एक को ही प्यार कर रही है | थोड़ी देर दाना चुगना भूल सरोज की तरफ़ देखते रहते – मानों शिकायत कर रहे हों कि हम क्यों नहीं ? फिर एक एक करके कोई झूले पर तो कोई सरोज के कन्धों पर उड़ कर बैठ जाते |

दिन गुज़रते गए | ठेकेदार की राज्यलक्ष्मी को उल्टियाँ आनी शुरू हो गई थीं और नीलम के पैदा होने के ठीक नौ महीने बाद अप्रेल सन् ५६ में सरोज ने विन्नी को जन्म दिया | उसके पीछे निम्मी और फिर पप्पू पैदा हुआ | तीनों बच्चों के पैदा होने पर कई कई दिनों तक घर में जश्न का माहौल रहा था | जयन्त तो थे ही खुले हाथ के – सरोज भी कुछ कम नहीं निकली | गरीब घर की बेटी थी | इतना सब देखने के प्रश्न ही नहीं था | यहाँ धन की नदियाँ बहती देखीं तो सँभाल नहीं पाई और दोनों हाथों से लुटाना शुरू कर दिया | घर में गाहे बगाहे किसी न किसी नाचने गाने वाली को बुलाने की प्रथा थी एक तरह से | जयन्त सरोज को इशारा करते और सरोज कभी गले का हार निकाल कर भेंट कर देती तो कभी ऊँगली की अँगूठी तो कभी तिजोरी में से कुछ भी निकाल कर दे देती और अपनी दरियादिली का परिचय देकर मन ही मन गर्व से झूम उठती | सरोज के सामने नौकरों की भी बन आई थी | मुँशी जी रोनी सूरत बनाकर खड़े हो गए “बहूरानी क्या करें ? कल बेटी को देखने वाले आ रहे हैं | हो सकता है यहाँ बात बन ही जाए | पर पास में पैसे नहीं इतने की उनका ठीक से स्वागत कर सकूँ…”

“तो परेशान क्यों होते हैं ? रुकिये ज़रा…” और चोटी को हाथ में लपेटती भीतर पहुँची, करधनी में लटकती तिजोरी की चाभी जो लाला जी ने पहले दिन ही उसे सौंप दी थी – निकाली और तिजोरी का ताला खोल उसमें से नोटों की गड्डी निकाल कर ले आई और मुँशी जी के हाथ पर रख दी | बहूरानी को “दूधों नहाओ पूतों फलो” का आशीर्वाद देते मुँशी जी जनानखाने से बाहर निकल गए | इसी बीच पिताजी और भाभी भीतर आ पहुँचे थे और सरोज और मुँशी की सारी बात जान चुके थे | भीतर जाकर माता जी के सामने सारी बातें उन्हें बताकर पिताजी सरोज से बोले “तुम्हें पता है इसी घर में नौकरी करते करते मुँशी जी ने कितना बड़ा बँगला बना लिया है ? कितना पैसा है इनके पास जानती हो ? ऐसे क्यों लुटाती रहती हो ठेकेदार साहब की मेहनत की कमाई ?” पिताजी को आया जान लाला जी भी भीतर आ गए थे | सारी बातें जानकर बोले “छोड़िये पंडत जी इन दुनियादारी की बातों को | अरे हमारे कौन कई कई बेटे हैं | ये एक ही तो बेटा बहू हैं हमारे | कर लेने दीजिये इन्हें मन की | हमने इतना कमाया किन लोगों के लिये है ? सारी उम्र नाते रिश्तेदार लूटते रहे पर समन्दर क्या ख़ाली हुआ ? सब कुछ इन्हीं का तो है – करने दीजिये – कुछ नहीं होगा – इतना है कि ये तो ये इनके पोते पड़पोते भी बैठ कर खाएँगे तो भी कम बहिन पड़ेगा |”

“समन्दर…” बिस्तर पर पड़ी पड़ी सरोज सोचती रहती थी कि पिताजी ने कौन सी गलत बात कही थी जो उसने उनकी की तरफ़ व्यंग्य से हँस कर देखा था ? सही तो कहा था | आज बिब्बी की बरसी पर ख़ाली पड़े इस छोटे से घर को देखकर नीलम सोच रही थी कि कहाँ चला गया वो “समन्दर” ? क्या समन्दर भी कभी इतना सूख सकता है कि किनारे खड़े लोग सूखे रह जाएँ ?

विन्नी हुई थी तो लाला जी ने सारे रिश्तेदारों को कपड़े, चाँदी के बर्तन और चाँदी के सिक्के भेंट में दिये थे | घर के नौकरों चाकरों और दूसरे कारिंदों को भी नए कपड़े बनवाए गए थे | कई दिनों तक घर में मेहमानों की भीड़ रही थी | पिताजी से पता चला थे कि ऐसे ऐसे रिश्तेदार आए थे कि नीलम को उनके रिश्ते याद कर आज भी हँसी आती है “जीजा जी की बहन शीला बुआ की ननद की ननद और उसकी जेठानी की बुआ की लड़की के पति…” वाह क्या रिश्ता बताया था शीला बुआ जी ने… और मालन और नाइन थीं कि एक के बाद एक जच्चा गए चली जा रही थीं नेग लेने के लिये –

“ननदिया आए गई लेके बधावा
पहला बधावा सटेसन पे बाजा, बाबा का जिया हुलसाया
कि लाडो आए गई लेके बधावा ||
दूजा बधावा सड़कों पे बाजा, भैया का जिया हुलसाया
कि बहना आए गई लेके बधावा ||
तीजा बधावा महलों में बाजा, मैया का जिया हुलसाया
कि बिटिया आए गई लेके बधावा ||
चौथा बधावा अँगना में बाजा, भाभी का जिया घबराया
लड़ाका आए गई लेके बधावा ||
पाँचवाँ बधावा कुठरिया में बाजा, होरल का जिया हुलसाया
कि बुआ मेरी आए गई लेके बधावा ||”घर की औरतें सोहर सुनतीं और हँसी से लोट पोट होती दोनों हाथों से नेग लुटाती जातीं |

विन्नी पैदा हुई थी तभी एक और बात भी हो गई थी | भाभी घर में टाँड की सफ़ाई कर रही थीं | सरोज की शादी से पहले जो दीवाली आई थी तभी की थी वहाँ की सफ़ाई | उसके बाद फिर सरोज की शादी और अपनी बीमारी में ऐसी उलझीं कि कुछ कर ही नहीं पाईं | आज जीराज को लगाकर टाँड पर चढ़ी सफ़ाई करवा रही थीं | अचानक हाथ में कुछ कागज़ आ गए | बेकार समझ कर फेंकने ही वाली थीं कि देखकर चौंक पड़ीं | फिर सफ़ाई आगे नहीं कर सकीं | शाम को पिताजी घर ऐ तो उन्हें वो कागज़ दिखाए | पिताजी सर पकड़ कर बैठ गए | दूसरे दिन बुआ घर आईं तो पूछा “लाली, सरोज और जयन्त की कुण्डलियाँ तुझे दी थीं – कहाँ हैं ?”

“वो तो मेंन्ने उप्पर टाँड पे डाल दीं हीं | ढूँढ लो… मिल जावेंगी उंगे ही…” बेशर्मी से हँसती बुआ बोलीं |

“फिर श्रीचन्द से क्या मिलवाया था ?” सख्ती से पिताजी ने पूछा |

“अरे उन्हें दी ही कहाँ हीं ? में तो वो नुक्कड़ वाले पंडत से दूसरी कुण्डली बनवा लाई ही जयन्त की और श्रीचन्द से मिलवा दीं हीं | जयन्त की असली कुण्डली तो मेंन्ने लल्ली के सुसराल वालों कू वापस दे दी ही…”

“तुझे पता है कितना बड़ा अनर्थ किया है तूने ?” गुस्से से पिताजी बोले |

“लो बोल्लो, अरे क्या बुरा किया मेंन्ने हैं ? यो तेरी लुगाई मरी लुच्ची राण्ड बिया होने देवे ही क्या लल्ली का ? कुण्डली बदलने से कमसकम उसका बिया तो हो गया – वरना जिन्दगी भर करती इसी की गुलाम्मी | यो तो चावे ही यो ही | पर में पूच्छूँ हूँ अक तू कब लौं इसका गुलाम बना रेवेगा भाई ?”

“देख लाली इसे बीच में मत खींच | अरे पता है तुझे ये असली कुण्डली दोनों कि नहीं मिल रहीं | कितना बड़ा वैधव्य योग पद है लाली की कुण्डली में जानती है तू ? कुछ उल्टा सीधा हो गया – भगवान न करे – तो क्या करेंगे हम ? ये क्या कर डाला तुने लाली ?”

“में न मान्नूँ इन योगों फोगों कू | में तो बस इत्ता जानूँ अक इस संभल वाल्ली के हथीन से निकालनी ही मुझे लल्ली तो मेंन्ने कर दिया जो मुझे ठीक लगा बस…”

भाभी और पिताजी ने उस दिन ना जाने कितने देवी देवता मना डाले थे कि हे भगवान सरोज की ज़िंदगी की खुशियाँ बनाए रखना | पर पत्थर के बुत भी क्या कभी पसीजे हैं ?

सरोज और जयन्त की गृहस्थी फल फूल रही थी | हर दो बरस पीछे एक बच्चा पैदा हो जाता था | उधर पिताजी और भाभी को दामाद के रूप में एक बेटा मिल गया था | वास्तव में वो दामाद न होकर बेटा ही थे | दशहरा दीवाली की पूजा होती तो सबसे पहले सरोज को लेकर भाभी के घर जाते, वहाँ पूजा करवाते, फिर अपने घर पूजा करवाते | लाला जी और माता जी खुशी खुशी इसकी इज़ाज़त दे देते थे | दीवाली पर भाभी का पूरा साथ देते थे दीवाली बनाने में | वसंत पंचमी की सारी भाग दौड़ अब जयन्त ने अपने कन्धों पर ले ली थी | भाभी जब केसरिया मीठे चावल बनातीं तो पिताजी और जयन्त लगातार रसोई में जमे रहते और बीच बीच में भाभी की मीठी झिड़की भी खाते रहते | रात की गोष्ठी में मेहमानों को खाने का सामान परसने के साथ साथ बाँसुरी पर मधुर धुन बजाकर श्रोताओं को झूमने को भी विवश कर देते | होली के पकवान पन्द्रह दिन पहले से बनने शुरू हो जाते थे और जयन्त भाग भाग कर सारा सामान इकठ्ठा करते थे | घर में तो कभी एक झोला भी न उठाया होगा नौकरों के होते, पर पिताजी के घर खुद सारा सामान जीराज और पिताजी के साथ कन्धे पर उठाकर लाते थे | होली के जुलूस में सबसे आगे पिताजी के साथ बैलगाड़ी पर टेसू के फूलों को पकाकर बनाए रंग से भरी पिचकारी लेकर चढ़ते थे और छतों पर खड़ी औरतों पर रंग बखेरते दोनों ससुर दामाद मस्त हो जाते | शहर की औरतें और लड़कियाँ भी जान बूझकर दोनों के रूप की एक झलक पाने को बेताब एक दूसरी से आगे निकल कर झाँकने की होड में लग जाती थीं | नीलम ने भी इन दोनों की ये मस्तियाँ देखि थीं और उन्हें देख हँसी से लोट पोट हो जाया करती थी | सच्ची कितने सुन्दर लगते थे दोनों तब… दोनों क्या तीनों… बाहर पिताजी और जीजा जी और भीतर मुहल्ले की औरतों और लड़कियों के साथ रंगों में सराबोर बिब्बी… रंगों में रंगकर जिनका रूप और भी खिल उठता था |

नीलम का जन्मदिन एक और ख़ास दिन हुआ करता था जीजा जी के लिये | कुछ दिन पहले से ही दावत की तैयारियाँ शुरू हो जाया करती थीं | फिर जन्मदिन वाले दिन सुबह पूजा और फिर दावत | सारा काम जीजा जी भाग भाग कर पूरी ज़िम्मेदारी से करते थे | नीलम की गुरुपूजा, अन्नकूट का भण्डारा, जन्माष्टमी के बाद नवमी का भण्डारा, तीज का सिंधारा – कोई त्यौहार पिताजी के घर पर ऐसा नहीं रह गया था जिसकी तैयारी जयन्त पूरे दिल से न करते हों – जैसे उनकी ससुराल का नहीं उनके घर का काम हो | और हाँ एक और ख़ास त्यौहार जो जयन्त को बहुत भाता था – हरियाली तीज | पहले बरामदे में पड़े झूले को माली से कहकर फूलों से सजवाते | उसकी चौकी पर फूल ही फूल बिछवा देते | फिर लहँगे गहनों से सजी सरोज को लेकर आते और अपने हाथों से झूले पर बैठाकर झोंटे देते | घर में उस दिन नाते रिश्तेदारनियों का और आस पास की औरतों के जमघट रहता था, फिर भी जब तक जयन्त खुद अपने हाथों से सरोज को झूला न झुला देते और उन औरतों लड़कियों के साथ सुर में सुर मिलाकर झूले के गीत न गा लेते तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता था | फिर सरोज के साथ भाभी के घर जाते | वहाँ भी उन्होंने बड़े कमरे में मज़बूत रंगीन झूले वाली रस्सी लाकर खुद ही सीढ़ी पर चढ़कर झूला बाँधा था और पीतल की पटरियाँ जिन पर रूई लगाकर शनील का गुदगुदा कपड़ा चढ़ा हुआ था लछमन ठठेरे से बनवाई थीं | वो पटरियाँ डाल देते झूला खोलकर और वहाँ भी औरतों लड़कियों का दिल जीतने आ खड़े होते दोनों ससुर दामाद | बाद में भाभी के हाथ का बना घेवर खाते | जयन्त की इन्हीं सारी बातों की वजह से तो पिताजी और भाभी उनकी बलैयां लेते न अघाते थे – मानों वो दामाद न हों बेटा हों | यों दिन में आते जाते दो तीन चक्कर लगाना तो रोज़ की ही बात थी ख़ैर सल्लाह जानने के लिये | और नीलम से तो ऐसा लगाव था वो उनकी साली न होकर बेटी या छोटी बहन हो | शहर में उन दिनों अच्छी चाकलेट और इलेक्ट्रोनिक खिलौने जैसे बैटरी या चाभी से चलने वाले खिलौने नहीं मिला करते थे | जीजा जी का दिल्ली आना जाना लगा रहता था | बस वहीं से खिलौने और चाकलेट लेकर आते और सामान घर पर पटक विन्नी को लेकर जा पहुँचते भाभी के घर | वहाँ फ़र्श पर बोरी बिछाकर बैठ जाते और दोनों बच्चियों के साथ चाकलेट खाते और बच्चा बने खिलौनों के साथ खेलते | सच बात तो ये थी कि जयन्त के प्यार से लबालब सीने में वास्तव में एक छोटे से मासूम बच्चे का दिल छिपा था जो इन दोनों बच्चियों के साथ मिलकर बाहर निकल आता था |

दशहरा और जन्माष्टमी को अखाड़ा निकला करता था जो आधी रात को हरिया हलवाई की दुकान पर पहुँचता था और वहाँ से मालन नदी पर जाकर सम्पन्न हुआ करता था | उस दिन हरिया हलवाई भी मिठाई नहीं बनाता था बस जलेबियाँ बनाता था | और जितना भी दूध होता था सारा का सारा बड़े बड़े कढ़ाहों में औटाने रख दिया जाता था और रात को जब अखाड़ा आता था तो सारे अखाड़े वालों का स्वागत मलाईदार दूध जलेबी के साथ किया जाता था | छोटे शहरों की बड़ी बड़ी मस्ती भरी बातें | अखाड़े में सबसे आगे होता था काँसे का थाल बजाता और घुटनों पर चलता “बिच्छू” | घुटनों से नीचे के पैर कभी पोलियो की भेंट चढ़ गए थे | घुटनों के बल रेंगता चलता था शायद इसीलिए उसका नाम “बिच्छू” पड़ गया था | काँसे का थाल बहुत अच्छा बजता था | साथ ही कुछ जड़ी बूटियों का इलाज़ भी करता था | सारे शहर का लाडला था – बच्चों का भी और बड़ों का भी | तो, अखाड़े की जान था “बिच्छू” | दूर से ही उसके काँसे के थाल की आवाज़ सुनकर सोते बच्चे जाग जाया करते थे कि अखाड़ा नज़दीक आ गया है | “बिच्छू” के पीछे होते थे बैण्ड बाजे वाले – उनके पीछे तलवारों, मुद्गरों और दूसरे हथियारों से करतब दिखाते अखाड़े के पहलवान और करतबबाज़ – उनके पीछे तीन हाथियों पर अखाड़े के महंत, पुजारी जी और पिताजी –पीछे मंत्रोच्चार करते पुरोहित और सबसे पीछे सजे धजे बच्चों की झाँकियाँ – बड़ा आकर्षक दृश्य होता था |

जयन्त की ड्यूटी होती थी बच्चों को इकठ्ठा करके अखाड़ा दिखने के लिये हरिया ताऊ जी की दुकान पर ले जाना और फिर ख़ैरियत से सबको उनके उनके घरों पर वापस पहुँचाना | उन्हें भी मज़ा आता था इस काम में | चार पाँच नौकरों को साथ लेते, बच्चों को इकठ्ठा करते, नीलम को लेते, बुआ के बच्चों को लेते, आस पड़ोस के बच्चों को भी इकठ्ठा कर लेते, नीलम और विन्नी की उँगलियाँ पकड़ते, किसी को कन्धों पर चढ़ाते, किसी को नौकर को पकड़ाते – और चल पड़ते बच्चों के जुलूस के साथ हरिया ताऊ जी की दुकान पर | वहाँ पहुँचने पर बच्चों को वही मलाईदार कढ़ाही का दूध मिट्टी के सकोरों में भरकर पिलाया जाता और फिर अखाड़ा आने तक बच्चों को वहीं सुला दिया जाता | “बिच्छू” के थाल की आवाज़ सुनकर बच्चे जागते तो फिर से उन्हें एक एक सकोरा दूध दे दिया जाता और फिर सब अखाड़ा देखने में मस्त हो जाते | इस बीच जयन्त भी तलवारबाज़ी का एकाधा करतब दिखा आते | थोड़ी देर वहाँ रूककर अखाड़ा आगे बढ़ जाता और जयन्त हरिया ताऊ जी की सामने वाली गली से बच्चों को लेकर निकल जाते उन्हें उनके घरों पर छोड़ने |

सब कुछ अच्छी तरह चल रहा था | सरोज के घर में दिन सोने के और रातें चाँदी की बनी हुई थीं | जयन्त जैसे गबरू जवान को पति के रूप में पाकर सरोज फूली नहीं समा रही थी तो जयन्त भी सरोज जैसी ख़ूबसूरत लड़की को पत्नी के रूप में पाकर निहाल हुए जाते थे | जयन्त के घरवाले मस्त थे गुड़िया जैसी बहू पाकर तो सरोज के पिताजी और भाभी बेटे जैसे दामाद की बलैयां लेते न अघाते थे |

इस बीच भाभी के घर में भी काफ़ी कुछ घाट गया था | बुआ का मकान था, जो उन्होंने किसी किराएदार को दिया हुआ था और वो ख़ाली नहीं कर रहा था | तब पिताजी ने ये कहकर मकान ख़ाली कराया कि उन्हें रहना है उस मकान में | पिताजी की बात वो टाल नहीं सके और ख़ाली कर गए | पर पिताजी को अपना स्कूल वाला अच्छा ख़ासा मकान छोड़कर उस घटिया से मकान में आना पड़ा था | मकान बड़ा तो उतना ही था पर उतना अच्छा नहीं था | इसी मकान में नीलम का छोटा भाई पैदा हुआ था – जिसका नाम रखा गया था पंडत, और बुआ ने सीना थोक थोक कर कहा था कि उनका मकान इतना भाग्यशाली है कि भाई की किस्मत में लड़का न होते हुए भी इस घर में आकर लड़का पैदा हुआ संभल वाली को | साथ ही ये भी कि अच्छा हुआ सरोज निकल गई घर से वरना यो भी न होता | और ये भी कि नीलम भाग्यशाली है कि अपने पीछे भैया ले आई | पिताजी और सरोज के घरवालों ने अच्छा ख़ासा जश्न मनाया था | नीलम, सरोज और जीजा जी के साथ साथ बाक़ी सबको भी वो जान से प्यारा था | पर घर भर की सारी खुशियाँ और बुआ की सारी दलीलें धरी की धरी रह गईं जब वो भी बस दो ढाई बरस का होकर भगवान को प्यारा हो गया | भाभी तो बिल्कुल ही जड़ बन गई थीं | फिर से उन्हें बेहोशी के दौरे पड़ने शुरू हो गए थे | पर इस बार उन्हें संभल नहीं भेजा गया था | बड़े मामा जी और छोटी मामी वहीं आ गए थे उनकी सेवा के लिये | डाक्टर साहब का परिवार, पिताजी, सरोज और जयन्त तो थे ही | सबने जी जान से भाभी की सेवा की और हर सम्भव प्रयास किया कि वो इस सदमे से उबर सकें | भाभी धीरे धीरे ठीक तो हो गई थीं पर उन्होंने घर से बाहर आना जाना बिल्कुल ही बन्द कर दिया था | गाय और जीराज वापस संभल भेज दिये गए थे क्योंकि पंडत गाय के साथ ख़ूब खेलता था | तो गाय को देखकर भाभी को वही सब बातें याद आती थीं | हाँ काम सारे उसी तरह कर रही थीं | इसी बीच दादी की बीमारी की खबर आई और पिताजी उन्हें नजीबाबाद लिवा लाए | उधर सरोज के छोटे बेटे रग्घू का जन्म हुआ सन् ६२ में और इधर सरोज की सास और दादी एक दिन के आगे पीछे स्वर्ग सिधार गईं | बड़े अच्छे ढंग से पूरे विधि विधान के साथ दोनों के कर्म किये गए |

सरोज के यहाँ सारी शानो शौकत शायद माता जी के भाग्य से ही थी | उनका स्वर्गवास होने के साथ ही जैसे घर से रौनक उठ गई थी | नीलम जब वहाँ जाती थी तो बिब्बी और नौकरों चाकरों के होते हुए भी घर जैसे ख़ाली ख़ाली सा लगता था | वो तुलसी का चबूतरा भी माता जी को याद करके आठ आठ आँसू रोता जान पड़ता था | हालाँकि सरोज बिल्कुल माता जी की ही तरह पूरे विधि विधान से तुलसी की आरती करती थीं | वो भी जब सज सँवर कर ऊपर से नीचे तक सोने से लदी सर ढके तुलसी के चबूतरे पर आती थी तो हर कोई बहूरानी को बस देखता ही रह जाता था | उसकी सुन्दरता की दाद हर कोई देता था पर शायद माता जी जैसा श्रद्धा का भाव उसके लिये मन में नहीं आता था किसी के – हाँ बच्चों जैसा स्नेह का भाव सबके मन में था | आज भी उसी तरह घण्टे घड़ियाल बजते थे | आरती कर चुकने के बाद सरोज भी माता जी की ही तरह पहले लाला जी को, फिर जयन्त को आरती और प्रसाद देती थी और बाद में जयन्त के हाथों से खुद प्रसाद लेकर आरती और प्रसाद का थाल नौकरों के हवाले कर देती रथी बाक़ी सब लोगों को देने के लिये | पर न जाने माता जी वाली रौनक कहाँ गायब हो गई थी |

धीरे धीरे लाला जी ने खुद को एकान्त में समेट लिया | लोगों से मिलना जुलना लगभग बन्द ही कर दिया था | ठेकेदारी और व्यवसाय का सारा बोझ अब जयन्त के कन्धों पर आन पड़ा | माता जी के मरने के बाद से जयन्त भी कुछ खोए खोए रहने लगे थे | मन बहलाने के लिये विन्नी को साथ लेकर भाभी के घर चले जाते थे और नीलम और विन्नी के साथ फिर से बच्चा बनने की कोशिश करते थे – और कभी कभी उस कोशिश में आँखों से आँसू भी बह निकलते थे | माँ का गम, बिज़नेस की ज़िम्मेदारी – न जाने कब में जयन्त ने शराब पीनी शुरू कर दी थी | पीते पहले भी थे – पर ना के बराबर – सिर्फ़ साथियों का साथ देने के लिये | पर अब कुछ ज़्यादा ही पीने लगे थे | सरोज को पता था | पिताजी को पता चला तो समझाया, पर सरोज और जयन्त साफ़ मुकर गए कि पिताजी को कहीं से झूठ पता चला है | ऐसा कुछ भी नहीं है | आखिरी दिनों में सोचने लगी थी सरोज कि काश तब पिताजी और भाभी से न छिपाया होता तो ये दिन न आता | पर ऐसे कितने सारे “काश…” थे उसके पास कि जिनका अब कोई समाधान नहीं था – वक़्त तो गुज़र चुका था… अब तो वो खुद भी अपनी आखरी साँसें गिन रही थी…

पिताजी ने लाला जी से कहा कि जयन्त को समझाएँ तो उन्होंने सुनी अनसुनी कर दी | भाभी और पिताजी के पास सर पकड़ कर बैठने के सिवा और कोई चारा न था | जयन्त ने इधर रोज़ रोज़ का आना भी कम कर दिया था | आते थे तो भाभी और पिताजी शराब छोड़ने के लिये समझाते थे – जो शायद उन्हें अच्छा नहीं लगता था | झूठ बोल जाते थे कि महेन्दरतो खुद पियक्कड़ है, फँसा रहा है उन्हें भी…

इसी तरह तीन बरस गुज़र गए | इन तीन बरसों में जयन्त ने बिज़नेस पर कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया | बस दोस्तों का साथ, बाँसुरी बजाना, गाना और गोष्ठियों में शिरकत करना | हाँ तीज त्यौहार पर भाभी के यहाँ पहले की ही तरह जाते रहे और सारे काम करते रहे | इसी बीच कत्थे के काम में जबरदस्त घाटा हो गया और जंगलात का उधार चुकाने के लिए और सरकार को भरने के लिये काफ़ी सारी ज़मीन ज़ायदाद बेचनी पड़ गई | जयन्त काम पर तो ध्यान देते नहीं थे – शराब और दोस्तों पर उड़ाने में ज़रूर लगे थे | यार दोस्त आए दिन अपनी ज़ेबें भरकर वहाँ से वापस लौटते थे | हर कोई अपनी अपनी समस्याएँ बताकर जयन्त से रकम हड़प कर जाता था | किसी को रकम तो किसी को ज़ेवर देकर उसकी समस्या का समाधान करने की सोचते थे | भाभी और पिताजी जयन्त और सरोज को बैठाकर कभी प्यार से तो कभी गुस्से से समझाने की नाकाम कोशिश करते रहते थे | लाला जी के कानों पर जूँ नहीं रेंगती थी | इसी बीच सन् ६५ में सबसे छोटी “गुंजन” पैदा हुई – जो भयंकर मूलों में पैदा हुई थी और जिसकी ग्रहों की शान्ति के लिये काफ़ी ज़ोर डाला था भाभी और पिताजी ने जयन्त पर – पर वे माने ही नहीं थे |

बेटी के जन्म की खुशियाँ अभी ठण्डी भी नहीं पड़ी थीं कि खबर मिली कि बाँसों के जंगल में भयंकर आग लग गई है और कई मज़दूर वहाँ फँसे हुए हैं | तुरंत शहर के लोगों और फायर ब्रिगेड के साथ जयन्त और पिताजी लालढांग पहुँचे | सारा बाँसों का जंगल तबाह हो चुका था | कई मज़दूर ज़िंदा जल गए थे | जो बचे थे उनमें से कई इतने ज़्यादा जल गए थे कि कुछ को तो बचाया ही नहीं जा सका था | पिताजी बताते थे कि बड़ा भयावह दृश्य था वहाँ का | जयन्त सर पकड़ कर नीचे बैठे थे और पिताजी तथा दूसरे लोग उन्हें सँभालने में लगे थे | पता नहीं क्या बात थी – लाला जी यहाँ भी नहीं आए थे – शायद एक डकैती और एक बाढ़ झेल चुके उस बूढ़े में अब इतना साहस नहीं रहा था कि इस दृश्य को देख पाता | जानें तो ख़ैर इतनी नहीं गई थीं – पर उस नुकसान की भरपाई करने में वो बड़ी हवेली, बाड़ा और सिनेमाहाल हाथ से निकल गया था | हवेली के इस छोटे सर्वेंट क्वाटर में परिवार को शिफ्ट होना पड़ा था | नीलम के सामने की ही बात है – बिब्बी इस मकान की तिदरी में भाभी की गोद में सर छुपाए गुमसुम पड़ी थीं और मौसा जी बैठक में अपनी छड़ी की मूठ पर ठोड़ी टिकाए जड़ बने बैठे थे | जयन्त मुँशी जी के साथ कागज़ी खानापूरी में लगे थे | बाद में पता लगा था कि मौसा जी को ज़ायदाद के बिकने का इतना सदमा नहीं पहुँचा था जितना उस मुँशी के धोके का – जंगल में आग उसी ने लगवाई थी और हवेली भी औने पौने दामों में खरीद ली थी – वो अलग बात है कि मौसा जी की हाय ऐसी पड़ी कि हवेली में आते ही एक एक करके उसके चारों लड़के भगवान को प्यारे हो गए और मुँशी पागल जैसा होकर ना जाने कहाँ चला गया | उसके घर की पाँच पाँच औरतें हवेली छोड़कर कहीं चली गईं | और हवेली रख रखाव के अभाव में धराशायी होकर आज खँडहर बनी पड़ी है |

नीलम को याद है जब बाड़ा बिक रहा था | श्यामलाल ने घर आकर सुनाया था वहाँ का सारा क़िस्सा | जयन्त वहाँ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे | इतनी सारी गाय भैंसें, दोनों घोडियां – सब कहाँ रहेंगी यही सोच सोच कर परेशान हो रहे थे | आखिर गाय भैंस तो लोगों को ऐसे ही दान कर दी थीं | कुँवर साहब को पता लगा कि बाड़ा बिकने को है | उन्होंने जयन्त को मना भी किया बाड़ा बेचने को और कहा कि अभी वो दे देंगे कुछ रकम – बाद में जयन्त उन्हें वापस कर सकते हैं – पर जयन्त किसी से उधार लेने को राज़ी नहीं हुए | आखिर उन्होंने कहा कि ठीक है तो दोनों घोड़ियाँ आप हमारे पास भेज दीजिए | और दिल पर पत्थर रखकर जयन्त इसके लिये राज़ी हो गए थे | नियत समय पर रियासत से दो सईस भेज दिये गए | दोनों माहिर थे घुड़सवारी में और साथ ही लोग कहते थे कि पगली से पगली घोड़ी को भी वश में करना जानते थे | फिर ठेकेदार साहब की तो दोनों घोड़ियाँ बहुत सीधी थीं – बिल्कुल घरेलू – बच्चे भी उनके साथ खड़े हो जाएँ तो डर नहीं किसी बात का |

दोनों घुड़सवार बाड़े में पहुँचे तो देखा दोनों घोड़ियाँ बिल्कुल शान्त खड़ी थीं | उनमें से एक ने काली घोड़ी की कमर थपथपाई और उस पर चढ़ने की कोशिश की तो उसने लात मारकर गिरा दिया | वो आदमी दूर जाकर गिरा | बड़ा आश्चर्य भी हुआ उसे कि आज ये उसके साथ क्या हो रहा था | आस पास के बच्चे और लोग तमाशा देखने खड़े हुए थे | सवारों ने उनकी तरफ़ देखा और झेंप कर हँस दिये | फिर से चढ़ने की कोशिश की तो फिर वही हुआ – घोड़ी ने इस बार फिर से गिरा दिया | तब दूसरे साथी ने उसे रोका और खुद कोशिश करने लगा तो उसके साथ भी वही हुआ | घोड़ी की इस हरकत पर गुस्सा भी आ रहा था और हँसी उड़ाते लोगों को देखकर अपनी असफलता पर झेंप भी आ रही थी दोनों को | इसी बीच जयन्त का वफ़ादार नौकर श्यामलाल दौड़ा दौड़ा घर पहुँचा और सारी बात जयन्त को बताकर बोला कि उनका चलना ही इस वक़्त ठीक रहेगा वरना काली किसी के क़ाबू में आने वाली नहीं | मन न होते हुए भी जयन्त को जाना पड़ा | जयन्त को दूर से ही आता देख दोनों ने हिनहिनाकर उसका मानों स्वागत करना शुरू कर दिया | दोनों के पास जाकर जयन्त ने उनकी पीठ सहलाई | उनकी आँखों में आज जयन्त को अपने दिल की उदासी नज़र आ रही थी | कुछ देर दोनों की पीठ सहलाते रहे | तभी गाँव से आया एक सईस बोला | आप हटिये साहब, इसे हम अभी बस में किये लेते हैं | स्साली को एक हन्टर मारा तो हो जाएगी सीधी अभी मिनटों में…”

“क्या कहा ? हन्टर मार कर सीधा करोगे तुम लोग इन्हें ? अरे कोई हाथ लगाकर तो देखे इन्हें – खून पी जाऊँगा | तुम्हारी इतनी हिम्मत…?” दाँत पीसते जयन्त बोले |

“नहीं साहब वो… हमारा वो मतलब नहीं था साहब…” दोनों सईस हाथ जोड़े हकला रहे थे |

“फिर क्या मतलब था तुम्हारा…?” और दोनों की तरफ़ गुस्से से देखते हुए जयन्त ने दोनों घोड़ियों की गर्दन सहलानी शुरू कर दी | दोनों ने दोनों तरफ़ से जयन्त की गर्दन पर अपनी गर्दन टिकाई हुई थी | जयन्त दोनों को सहलाते जा रहे थे और बच्चों की तरह फूट फूट कर रोते जा रहे थे “हमें माफ़ कर देना… तुम्हें अपने से दूर भेजना पड़ रहा है… पर क्या करें, अब हम कहाँ रखेंगे तुम्हें…?” काफ़ी देर जयन्त इसी तरह रोते रहे और दोनों घोड़ियाँ अपनी अपनी गर्दन जयन्त की गर्दन पर रगड़ती रहीं मानों उन्हें सान्त्वना दे रही हों | रोते रोते जब मन का गुबार कुछ हल्का हुआ तो दोनों आदमियों को अपने पास बुलाया | खुद दोनों घोड़ियों को सहलाते रहे और और उनसे चढ़ जाने को कहा | वो दोनों भी शायद जयन्त की बात समझ गई थीं | इस बार कुछ पँगा नहीं हुआ और दोनों घुड़सवार घोड़ियों पर बैठकर वहाँ से बाहर निकल गए | जयन्त धूल उड़ाती ज़मीन को सूनी आँखों से निहार रहे थे | श्यामलाल की आवाज़ पर चौंके “साहब चलिये घर चलिये…”

“एँ… हाँ… चलो भाई अब यहाँ क्या बचा है…?” और लड़खड़ाते कदमों से बाहर निकल गए | एक बार पलट कर भी नहीं देखा | बाद में पता चला था कि काली ने वहाँ पहुँचकर खाना पीना छोड़ दिया था | इलाज़ भी कराया गया उसका पर बेकार गया | एक दिन भूखी प्यासी काली चल बसी | कुँवर साहब जानते थे कि कौन सा गम ले डूबा था उसे – पर वो कर भी क्या सकते थे ? जयन्त के पास खबर पहुँची तो कुछ नहीं बोले – बस खुद को कमरे में बन्द करके बैठ गए | सरोज ने काफ़ी देर उनके बाहर आने का इंतज़ार किया | जब नहीं आए तो दरवाज़ा पीटना शुरू किया | तब भी बड़ी मुश्किल से बाहर निकले थे | रो रोकर आँखें सूख चुकी थीं |

जयन्त इन सारे सदमों को झेल नहीं सके और एक दिन घर से गायब हो गए | सुबह सुबह विन्नी पिताजी के घर रोती रोती पहुँची | जाकर देखा तो हर में मातम सा छाया हुआ था | सरोज को कुछ पता नहीं था कहाँ गए रात बीच में | रात को तो अच्छे ख़ासे सोए थे | सुबह बाथरूम जाने को उठी तो उनका पलंग ख़ाली था | सोचा छत पर होंगे | छत पर गई तो वहाँ भी नहीं थे | दरवाज़े पर आई तो दरवाज़ा खुला हुआ था | बाहर जाकर झाँका तो दूर दूर तक कहीं अता पता नहीं था | फ़ौरन बच्चों को जगाया | लाला जी बैठक में सोते थे | उनका दरवाज़ा खटखटाकर जगाया और खबर दी तो वो जड़ बने छत ताकने लगे | तुरन्त सामने से राय को बुलाकर विन्नी को उसके साथ पिताजी के पास भेजा और वे लोग जैसे सोए थे वैसे ही उठकर दौड़े आए | राय की बीवी चाय बना लाई थी | यहाँ किसको होश था चाय का | लाला जी ने दो घूँट हलक से नीचे उतारी फिर मरी मरी आवाज़ में बोले “कोई पूंडरी जाकर देख आए…” नीलम को आज भी वो आवाज़ याद करके दहशत होती है – कितनी रोबीली कड़क आवाज़ आज मुर्दा बनी हुई थी | पिताजी ने डाक्टर साहब के यहाँ से सभी मिलने जुलने वालों के यहाँ फोन करके पता लगाया – जयन्त कहीं भी नहीं थे | दस बजे तक घर के बाहर लोगों की भीड़ जमा हो गई थी | जिन एकाध के पास कारें थीं उन्होंने गाड़ियां आस पास के गाँवों में दौड़ा दीं – पर जयन्त का कहीं पता नहीं लग सका | तीन दिन गुज़र गए इसी तरह | घर में मातम का सा माहौल – बच्चे बेगौरे से इधर उधर भटक रहे – वो तो भला हो डाक्टर साहब के परिवार का – नीलम के साथ उन बच्चों को भी वहीं बुलवा लिया था और जब तक जयन्त का पता नहीं लगा बच्चों को वहीँ रखा | आखिर डाक्टर साहब ने सलाह दी कि एक बार दिल्ली गोस्वामी जी और जयप्रकाश के यहाँ भी जाकर देख आया जाए – क्या पता वहीं गए हों… और पिताजी को अपनी गाड़ी में बैठाकर उसी वक़्त दिल्ली के लिये रवाना हो गए | सबसे पहले ये लोग जयप्रकाश के घर पहुँचे | शक सही निकला | वहीं गए थे पर इन लोगों के पहुँचने से पहले ही निकल गए थे | पता लगा कि बाज़ार का कुछ कर्ज़ हो गया था | चक्की और दुकानें बेचना नहीं चाहते थे कि बाद में लड़कों के काम आएँगी तो कुछ उधार माँगने आए थे | पाँच हज़ार रूपये उन्होंने दे दिये थे | अब सब लोग पहुँचे गोस्वामी जी के यहाँ | देखा तो वहीं बैठे थे सर झुकाए और उनकी पत्नी – जो इन्हें अपना भाई मानती थीं – समझाने में लगी थीं कि इस तरह घर से भागकर ठीक नहीं किया उन्होंने | पिताजी, डाक्टर साहब और जयप्रकाश को पहुँचे देखा तो शर्म से सर और नीचे गढ़ा लिया | सबने समझाया बुझाया और जैसे तैसे करके घर वापस लाये | भाभी को पता चला कर्ज़े का तो उनके पाँव तले की ज़मीन खिसक गई | इतना सारा सोना चाँदी, इतना ज़री का कपड़ा, जूतियाँ,जड़ाऊ छड़ियाँ, भारी भरकम बर्तन सब खत्म ? कैसे हुआ ? क्या हुआ ? शराब की भेंट चढ़ गया या किसी को दे दिया ? खोद खोद कर पूछा तो पता चला कि काफ़ी सारा सामान तो हवेली बिकते वक़्त निकाला ही नहीं जा सका था – क्योंकि लाला जी को तो कुछ होश था नहीं और जयन्त लगे थे ऊपर की भाग दौड़ में | जो साथ ला पाए थे उसमें से सारा दरबारन को उधार दे दिया था | दरबारन से पूछा तो पता चला कि अपनी और अपने बेटे की शराब के चक्कर में सारा ज़ेवर गलवा दिया था | भाभी और पिताजी को गहरा सदमा लगा | उसी आवेग में बहुत कुछ उल्टा सीधा भी सुना दिया बेटी दामाद को | पर अब कोई लाभ नहीं था इस सबका | डा. दरबारी को पता चला तो बीवी बेटे को घर से निकाल दिया | दरबारन बेटे के साथ अपने पीहर चली गई | पर अब किसी कहा सुनी का वक़्त नहीं था | अब ज़रूरत थी बाज़ार का क़र्ज़ चुकाने की | राशन वाला, कपड़े वाला, हलवाई – ना जाने किस किसका क़र्ज़ चढ़ा हुआ था | पिताजी के पास तो इतना था नहीं | फिर से संभल खबर भिजवाई गई और मामा जी ने आकर बाज़ार का क़र्ज़ चुकाया, साथ ही चक्की और दुकान ठीक करवाके जयन्त को उस पर बैठाया | एक मुँशी का भी इंतज़ाम करवाया | पर आफ़त अभी टली नहीं थी |

जयन्त ने पिताजी और मामा जिकी बात रखने के लिये चक्की पर भी बैठना शुरू कर दिया था और दुकान का काम भी देखना शुरू कर दिया था | पर काम कभी किया तो था नहीं लिहाज़ा काम में मन ही नहीं लगता था | न ही कभी व्यापार का हिसाब क़िताब देखा था | मुँशी जैसे चाहे करता रहता था | जयन्त को शायद शर्म भी आती थी दुकान पर बैठते हुए | जिसने सदा राज किया और जिसकी तिजोरियाँ हर किसी के लिये खुली रहती थीं वही आज दुकान पर बैठ रहा था ? लिहाज़ा शाम को जल्दी दुकान बढ़ाकर और चक्की बन्द करके घर आ जाते या फिर दोस्तों के यहाँ जा बैठते | पिताजी को सब मालूम था, पर इंतज़ार में थे कि कभी न कभी तो अक्ल आएगी ही जयन्त को | इसी तरह कुछ महीने और गुज़र गए और नीलम की दसवीं सालगिरह आ पहुँची |

नीलम की सालगिरह और गुरु पूर्णिमा का पर्व एक ही दिन होते थे | पिताजी का मन नहीं था इस बार कुछ ख़ास करने का | पर क्योंकि हमेशा गुरुपूजा भी होती आई थी इसलिये लोग चाहते थे कि कार्यक्रम रखा जाए | जयन्त ने इस बार भी भाग भाग कर सारे काम खुद ओने हाथों से ही किये | नीलम का जन्मदिन तो वैसे भी जयन्त के लिये सबसे ख़ास दिन होता था | पूजा और दावत की तैयारियाँ, लोगों को न्यौता देना, घर की सजावट – किसी काम में कोई कसर नहीं छोड़ी थी जयन्त ने | घर में सब सोचने लगे थे कि धीरे धीरे शायद जयन्त सामान्य होते जा रहे हैं | पूजा में अपने बाक़ी बचे कपड़ों में से सबसे मँहगा कुर्ता पायजामा निकाल कर पहना | सरोज को भी अच्छी तरह सजा सँवार कर लेकर गए थे | वो कहावत है न कि मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है – तो ये हाथी सवा लाख का न सही, पर मन से तो वैसा ही था | वहाँ सबको अपने हाथों से खाना भी परोसा | रात को संगीत गोष्ठी थी | सबकी फ़रमाइश पर बाँसुरी भी बजाई | उसके बाद पिताजी का जलतरंग था और फिर कौशल जी का गायन | आज न जाने क्या था कि जयन्त बाँसुरी बजा रहे थे तो सभी को ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें कहीं कुछ तकलीफ़ हो रही हो | पर वो थे कि बजाए चले जा रहे थे – बिल्कुल डूबे हुए थे |

बाँसुरी वादन समाप्त हुआ और पिताजी के जलतरंग की घोषणा हुई | पिताजी ने पहले से ही प्यालों में पानी भरकर ट्यूनिंग करके रखा हुआ था | फिर भी थोड़ा बहुत पानी कम ज़्यादा करके दोबारा से ट्यूनिंग की और यमन का आलाप जोड़ शुरू कर दिया | पता नहीं क्या हुआ – जयन्त ने फिर से बाँसुरी फिर से सँभाल ली और पिताजी के साथ जुगलबन्दी करने लगे –लोग वाह कर उठे | कुछ देर आलाप, जोड़, झाला बजा | झाला बजाते बजाते अचानक से बाँसुरी का स्वर काँपने लगा | कुछ गड़बड़ समझ पिताजी रुक गए | जयन्त की तरफ़ देखा | बाक़ी लोगों ने भी देखा | जयन्त की बाँसुरी के स्वर काँप रहे थे और वो इस बात से अनजान बजाए चले जा रहे थे – पर आँखों से पानी बह रहा था |पिताजी ने फ़ौरन उनके हाथ से बाँसुरी छीन ली | गोष्ठी वहीँ समाप्त हो गई | सरोज और भाभी रसोई में मेहमानों के लिये चाय बना रही थीं कि वहीं जाकर विन्नी और नीलम ने उन्हें सारी बात बताई | फिर किसकी चाय कैसी चाय – दोनों भागी भागी तिदरी में पहुँचीं और लोगों की भीड़ से निकल जयन्त के पास पहुँचीं तो देखा पिताजी जयन्त के मुँह पर पानी के छींटे मार रहे थे और जयन्त धीरे धीरे आँखें झपका रहे थे | डाक्टर साहब ने जयन्त का हाल देखकर महेन्दर को घर से अपना बैग लाने भेज दिया | वो तुरन्त रिक्शा पकड़ कर गए और बैग ले आए | डाक्टर साहब ने सीरिंज में कोई दवा भरकर इंजेक्शन लगाया और थोड़ी देर बाद जयन्त होश में तो आ गए पर निढाल हो चुके थे | असल में वे बेहोश तो हुए ही नहीं थे – वो तो दर्द की वजह से हिलने डुलने की स्थिति में नहीं थे न ही कुछ बोल पा रहे थे | पर धीरे धीरे कुछ सामान्य होने पर उन्होंने बताया कि कई दिनों से पेट में दर्द चल रहा था | आज सुबह भी हुआ था पर सरोज को बताया नहीं था – वो घबरा जाती | फिर नीलम की सालगिरह भी मनानी थी | बताया कि परसों जब बाज़ार से सामान ला रहे थे तब भी रास्ते में काफ़ी दर्द हुआ था और बड़ी मुश्किल से घर पहुँचे थे | पर खाना खाने के बाद दर्द ठीक हो गया था | अभी बाँसुरी बजाते बजाते अचानक उन्हें पेट में तेज़ दर्द महसूस हुआ | लेकिन गोष्ठी का मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहते थे इसीलिए जब पिताजी ने जलतरंग पर आलाप छेड़ा और जोड़ की तरफ़ बढ़े तो उन्होंने ये सोचकर फिर से बाँसुरी उठा ली कि शायद दर्द दब जाए और किसी को पता न चले |

सबने वो रात आँखों में ही निकाल दी इंतज़ार में | सुबह जयन्त को उनके घर ले जाया गया | लाला जी ने जयन्त का हाल देखा तो जयन्त के काम करने से जो थोड़ी बहुत राहत की साँस लेनी उन्होंने शुरू की थी – फिर से पहले वाली वीरानी उनके चेहरे पर छा गई | डाक्टर साहब ने बिजनौर सिविल सर्जन को फोन किया | दस बजते बजते सिविल सर्जन पहुँच चुके थे और डाक्टर साहब के अस्पताल में ही जयन्त के एक्सरे वगैरा करवाने शुरू कर दिये थे | इस बीच कुछ दवा भी शुरू कर दी गई थी जिसका असर उन पर होने भी लगा था और काफ़ी ठीक नज़र आ रहे थे | शाम तक सारे टैस्ट हो चुके थे | दोनों डाक्टर्स में क्या बातें हुईं किसी को नहीं पता | कुछ रिपोर्ट्स दो दिन बाद बिजनौर से आनी थीं | तब तक जयन्त को पूरा आराम करने और हल्का खाने की सलाह दी गई | उस दिन तो सरोज ने वैसा ही किया | पिताजी और भाभी रात को घर वापस आ गए थे | दूसरे दिन जब फिर से वहाँ पहुँचे तो देखा जयन्त सब्ज़ी पूरी खा रहे थे | भाभी और पिताजी ने पहले तो दोनों को जमकर फटकारा और फिर गुस्से में जयन्त के आगे से खाने की तश्तरी उठाकर बाहर फेंक कर मारी | जयन्त सिवाय खिसियानी हँसी हँसने के कुछ न कर सके थे | सरोज रुंआसी हो गई थी और बस यही कहा था “क्या करती, ज़िद करके बनवाया इन्होंने ये सब…” उसे शायद लगने लगा था कि उसके सुख के दिन अब पूरे हो गए और अब आगे संघर्ष करना है |

“ये ज़हर की ज़िद करेगा तो क्या ज़हर लाकर देगी…?” भाभी ने गुस्से से पूछा और सरोज भीतर जाकर रोने लगी | समझ नहीं आ रहा था उसे भी कि ऐसा क्या हो गया इन्हें जो इतना सारा परहेज़ करना पड़ रहा है |

तीसरे दिन बिजनौर से रिपोर्ट्स आ गई थीं | जयन्त के पेट में पानी भर चुका था | लीवर बिल्कुल खत्म हो चुका था | अब बस एक ही रास्ता बचा था – दिल्ली ले जाकर पेट का पानी निकलवाया जाए | अगला एक हफ़्ता डाक्टर साहब को दिल्ली में किसी बड़े मिनिस्टर की सिफ़ारिश लेने और ट्रेन के टिकट्स बुक कराने में लग गए | सिफ़ारिश के बगैर तो सुना दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में कई कई महीने के मरीज़ पड़े रहते थे और उन्हें कोई पूछता तक नहीं था | आखिर क़रीब हफ़्ता भर बाद डाक्टर साहब पिताजी और सरोज को लेकर दिल्ली के लिये रवाना हो गए | उधर संभल से मामा जी भी रवाना हो चुके थे | सुबह सुबह जयप्रकाश के घर जाकर घण्टीबजाई तो दरवाज़े पर इन सबको परेशानहाल खड़ा देखकर वो भी एक बार तो घबरा गए | भीतर ले जाकर बैठाया | पत्नी से नाश्ता पानी बनवाकर ज़िद करके सबको खिलाया | सारी बात मालूम होने पर अपनी गाड़ी में सबको बैठाकर अस्पताल जा पहुँचे | मिनिस्टर का सिफ़ारिशी पत्र था ही, ऊपर से डाक्टर साहब की भी अच्छी जान पहचान थी वहाँ, सो फ़ौरन वहाँ जयन्त को भर्ती करके इलाज़ की कार्यवाही शुरू कर दी गई | अस्पताल पहुँचते पहुँचते जयन्त का हाल और बिगड़ चुका था और वो एक क़दम भी चलने की स्थिति में नहीं रहे थे | सारा दिन अस्पताल की भाग दौड़ में निकल गया | गोस्वामी जी को भी बुलालिया गया था | किसी अच्छे सरकारी ओहदे पर थे और अस्पताल में उनकी भी ख़ासी जान पहचान थी | बहरहाल रात हो गई और अब वहाँ घर के किसी भी सदस्य के रुकने की मनाही थी | जयन्त काफ़ी घबराए हुए थे | उन्हें दिलासा देकर और सुबह जल्दी आने का वादा करके सब लोग जयप्रकाश के हर वापस आ गए | गोस्वामी जी अपने घर लौट गए थे | तय हुआ था कि वो सुबह दस बजे तक सीधे अस्पताल पहुँच जाएँगे | इन सबकी सारी रात आँखों में ही गुज़र गई थी | सुबह सरोज को जयप्रकाश की पत्नी के पास छोड़कर पिताजी जयप्रकाश, मामा जी और डाक्टर साहब के साथ अस्पताल पहुँचे साढ़े आठ बजे तो गोस्वामी जी को वहाँ देखकर सबको आश्चर्य हुआ | देखा तो जयन्त के वार्ड में हड़कंप मचा हुआ था |

हुआ ये कि सुबह जब नर्स जयन्त की सफ़ाई करने आई तो वो बिस्तर पर नहीं थे | नर्स ने पहले तो समझा कि टायलेट में होगा मरीज़ | काफ़ी देर इंतज़ार करने के बाद भी जब मरीज़ टायलेट से बाहर नहीं निकला तो उसने धीरे से टायलेट का दरवाज़ा खटखटाया तो वो एकदम से खुल गया | झाँककर देखा तो जयन्त वहाँ नहीं थे | तुरन्त ड्यूटी पर तैनात डाक्टर को खबर की गई | वो इत्तेफ़ाक़ से गोस्वामी जी को जानता था और ये भी कि ये मरीज़ गोस्वामी जी का रिश्तेदार है | उसने सबसे पहला काम किया गोस्वामी जी को फोन करने का | गोस्वामी जी ने सोचा कि जयन्त वहीं कहीं इधर उधर होंगे और ये डाक्टर नया है तो घबरा रहा है | तो वे जयप्रकाश के यहाँ किसी को फोन करने के बजाए खुद ही अस्पताल पहुँच गए | वहाँ पहुँच कर देखा तो सारा स्टाफ मरीज़ को ढूँढने में लगा हुआ था | अब तो गोस्वामी जी भी घबरा गए कि जयन्त गए तो गए कहाँ गए | वो तो ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे तकलीफ़ और कमज़ोरी की वजह से | इसी बीच ये सब लोग पहुँच गए अस्पताल और स्टाफ के साथ साथ इन लोगों ने भी ढूँढना शुरू कर दिया | अब तक बड़े डाक्टर्स भी आ गए थे | उन लोगों ने सोचा कि नर्स या किसी वार्ड ब्वाय ने कहीं कुछ बदतमीज़ी न कर दी हो, और उन लोगों को फटकारना शुरू कर दिया | अस्पताल वालों को सबसे ज़्यादा डर इस बात का था कि मिनिस्टर का मरीज़ है – कहीं कुछ उल्टा सीधा हो गया तो किस किसको जवाब देते फिरेंगे | दोपहर हो गई पर जयन्त का कहीं पता न लगा | पिताजी की सहनशक्ति अब जवाब देने लगी थी | उनकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा था | कहाँ ढूँढें… क्या करें… कुछ समझ न आता था | तभी पिताजी को पेशाब की हाजत हुई और वे अस्पताल के गेट के बाहर जाकर पास की किसी गली में पेशाब करने खड़े हुए तो देखा कोई आदमी लगभग बेहोश सा किसी खंभे के साथ बैठा हुआ है | पास जाकर देखा तो होश उड़ गए – ये तो जयन्त थे | पहलवान तो थे ही पिताजी – पेशाब वेशाब भूलकर आधे बेहोश और आधे होश में पड़े हुए जयन्त को कन्धे पर लादकर अस्पताल में लेकर पहुँचे | डाक्टरों ने तुरन्त बिस्तर पर लेटाया और कुछ इंजेक्शन वगैरा दिये | कुछ देर बाद पूरे होश में आए तो ज़मीन आसमान सर पर उठा लिया कि अस्पताल में नहीं रहना है – घर जाना है | कारण पूछने पर बताया कि जो मशीन पेट में डालकर पानी निकालेंगे वो उन्होंने देख ली है और उसे वो अपने पेट में नहीं डलवाएँगे किसी भी हाल में – भले ही मर जाएँ | काफ़ी समझाया – प्यार से भी और फटकार से भी | डाक्टर तो पहले ही डरे हुए थे कि पता नहीं ये मरीज़ आगे और क्या करेगा | ख़ैर, डाक्टरों को भी समझा बुझा कर मिन्नतें करके बाक़ी सब लोग तो रात को घर लौट आए पर पिताजी वहीं रुक गए और बाहर बरामदे में ही फ़र्श पर सो रहे | दिन भर की परेशानी और भूख के कारण शायद उन्हें नींद गहरी आ गई थी | सुबह सात बजे नर्स ने आकर उन्हें जगाया और बताया कि मरीज़ नर्स का हाथ छुड़ाकर बाहर भाग गया है और स्टाफ के लोग उसे पकड़ने गए हैं | पिताजी स्टाफ के लोगों के पीछे पीछे बाहर भागे और उसी खम्भे के पास जाकर हाँफते हुए जयन्त को धर दबोचा | उन्हें आश्वासन दिया कि ठीक है घर से एक बार सबको आ जाने दो फिर तुम्हें नजीबाबाद वापस ले जाएँगे | पिताजी को आश्चर्य हो रहा था कि जो शख्स अपने पैरों पर ठीक से चल नहीं पा रहा था और रंग जिसका पीला ज़र्द पड़ चुका था वो अस्पताल से बचने के लिये कैसे इतना भाग लिया था ? शायद यही लिखा था भाग्य में | सबके आने पर जयन्त को डिस्चार्ज कराया गया | अस्पताल वालों ने इनसे लिखवा लिया कि यहाँ किसी तरह की परेशानी हुई और सारा स्टाफ मरीज़ के साथ बहुत अच्छी तरह पेश आया था | और ये भी कि ये लोग अपनी मर्ज़ी से अपना मरीज़ ले जा रहे हैं – अस्पताल से इन्हें किसी तरह की कोई शिक़ायत नहीं है | भाग्य को कोसते और जयन्त को लेकर ये लोग वापस नजीबाबाद पहुँच गए | सरोज तो ये सब देखकर सभी कुछ भूल बैठी थी | बस सारा दिन गुमसुम बनी बैठी रहती थी | उसकी दोनों ननदें भी आ गई थीं | उन्होंने बच्चों की ज़िम्मेदारी और घर के खाने पीने का काम सँभाला और भाभी पिताजी ने जयन्त की तीमारदारी में दिन रात एक कर दिया |

अगले चार पाँच महीनों में जयन्त का हाल और बिगड़ता ही चला गया | जिसे कभी एक छींक तक नहीं आई थी ज़िंदगी में वही आज इस हाल में पड़ा था – देखने वालों को तरस आता था और भगवान के अन्याय को कोसते थे | काफ़ी रुपया पानी की तरह बहा दिया मामा जी ने | बिजनौर के सिविल सर्जन का इलाज़ चला | मँहगी से मँहगी दवाएँ – कई बार तो डाक्टर साहब को लखनऊ या दिल्ली से मँगवानी पड़ती थीं – पर सब लगे थे बुझते दिये की लौ को बचाने में…

और २५ दिसंबर १९६५ की मनहूस औबह से हालत ज़्यादा बिगड़ने लगी | सिविल सर्जन ने कोई नई दवा बताई थी जो छोटे डाक्टर साहब ने लखनऊ से मँगवाई हुई थी | दोनों डाक्टर भाई तो जयन्त का हाल बिगड़ने पर वहीं पहुँच गए थे और सिविल सर्जन को लेने गाड़ी भेजी हुई थी और उनका इंतज़ार हो रहा था | शाम को डाक्टर साहब के घर से खबर आई कि दवा आ गई है तो विन्नी और नीलम को दवा लाने भेजा गया | दोनों ही हालात की नज़ाक़त से वाकिफ़ थीं और घबराई हुई दवा लेने दौड़ पड़ीं | पीछे से शाम क़रीब चार बजे जयन्त का दर्द और बढ़ा | भाभी ने उन्हें अपनी गपड में छोटे बच्चे की तरह सँभाला हुआ था | “भाभी… एक बार बचा लो… अपनी सरोज के लिये ही सही… जो कहोगी करूँगा…” जयन्त के मुँह से निकला और भाभी की गोद में ही उन्हें खून की उल्टी हुई और फिर सर एक तरफ़ को लुढ़क गया | भाभी के मुँह से एक चीख़ निकली “जयन्त…………” और जयन्त के बेजान शरीर को कसके अपनी छाती से जकड़ लिया | सरोज पछाड़ खाकर गिर पड़ी जिसे शीला ने सहारा दिया | पल भर में घर भर में कोहराम मच गया | २६ साल की सरोज और ३२ साल के जयन्त… नीलम और विन्नी दवा लेकर आ चुकी थीं… दवा की शीशी नीचे गिर कर टूट गई और दोनों पत्थर बनी तिदरी में जा खड़ी हुईं… सब कुछ लुट चुका था…

पल भर में शहर भर में खबर फैल गई | देखते देखते घर के बाहर दूर तक लोगों का अथाह समुद्र नज़र आ रहा था | सबने अर्थी की तैयारी की | सुबह सुबह कारों और बसों के काफ़िले के साथ जयन्त का शरीर हरिद्वार ले जाया गया | लाला जी ने मुखाग्नि दी – पर पप्पू का भी हाथ लगवाया | पीछे से बुआ ने भाभी की गोद में लगभग बेहोश पड़ी सरोज का हाथ पकड़ कर उसकी चूड़ियाँ तोड़ने की कोशिश की “अरी अभागन अब इनका क्या काम ? तोड़ इन्हें… जब इन्हें देखने वाला ही न रहा… जनम की अभागन ही रही तू तो… करमजली किंगे की…”

“बीवी जी…” भाभी भी लगभग बेहोश सी ही थीं पर बुआ की इस हरकत पर ना जाने उनमें कहाँ से जान आ गई थी – पलंग पर मौत की घड़ियाँ गिन रही सरोज ने नीलम को बताया था कि भाभी की वो आवाज़ उसके कानों में अभी भी गूँजती है “बीवी जी… हाथ छोड़ो लाली का…” और जबरदस्ती सरोज का हाथ उनके हाथ से छुड़ा लिया था | बुआ के साथ साथ वहाँ बैठी सारी औरतें भाभी को ऐसे देखने लगी थीं जैसे भाभी पगला गई हों दामाद की मौत से “अरी तो क्या इन्हें एसेई रेने देवेगी कमबखतमारी…? अरी सारे लोकाचार भूल गई क्या…?” बुआ बोलीं |

“ये सब यहाँ नहीं होगा बीवी जी… और खबरदार जो आगे फिर कभी ऐसी हरकत की तो…”

“हे क्या पागलों की सी बात करने लग रई है संभल वाली…? निराले नए नए रिवाज़ बनावेगी क्या…?”

“हाँ…” सरोज को कसके अपने सीने से लगाती उसका सुरक्षा कवच बनी भाभी दृढ़ स्वर में बोलीं “हाँ इसके लिये नया रिवाज़ ही बनाऊँगी | अरे वो तो चला गया सब कुछ छोड़कर | सो गया शान्ति की नींद | प् गया सारे दुखों से छुटकारा | पर इसके आगे सारी ज़िंदगी पड़ी है | बच्चों को पालना है इसे अपने | ये चूड़ियाँ भी पहनेगी, बिंदी भी लगाएगी और ज़िंदा रहने की कोशिश भी करेगी…”

“हे… तो क्या बिया भी करवावेगी क्या इसका दूसरा…?”

“शरम आनी चाहिये बीवी जी आपको इस वक़्त ऐसी बातें करते | लाली होश में नहीं है… अभी जयन्त को लेकर गए हैं… और आप हो कि…” और लगभग बेहोश पड़ी सरोज को अपने सीने से लगाए भाभी फूट फूट कर रो पड़ीं | तभी मामी जी ने बीच में पड़कर आत आई गई कराई और भाभी को सर सहलाकर सान्त्वना देने की नाकाम कोशिश करने लगीं | पर सरोज जानती थी कि भाभी के उस एक क़दम ने उसकी हिम्मत बंधाई थी और जयन्त का महीना होते ही उसने बच्चों को पालने के लिये फिर से पढ़ाई करने का फ़ैसला कर लिया था – माँ बाप साथ थे तो किससे डरना था भला…

क्रमशः………….

सौभाग्यवती भव – अध्याय इक्कीस

इक्कीस – सरोज और जयन्त की शादी

पिताजी धामपुर पहुँच गए थे | बुआ और चाची भी पीछे पीछे धामपुर पहुँच गई थीं सपरिवार – शादी की तैयारियाँ जो करनी थीं | दोनों की जुबान पर आजकल शादी के गीत ही चलते रहते थे | कुनबे की भी सारी औरतें इनके साथ ढोलक मंजीरे लेकर बैठ जाया करती थीं जब भी वक़्त मिलता था | सरोज को पद्मा और रुकमन से ही फ़ुर्सत नहीं थी – जयन्त की बातों के अलावा और कोई विषय नहीं था सरोज के पास आजकल बातों के लिये | इस सारी हलचल में अगर कोई सबसे अलग थलग पड़े हुए थे तो वे थे पिताजी और भाभी | भाभी को तो घर के कामों से ही फ़ुर्सत नहीं थी | इतने सारे लोगों का खाना पकाना, घर की सफ़ाई, सबके कपड़े धोना वगैरा वगैरा – जो काम धामपुर में वे पहले करती थीं अकेले वही अब भी उन्हें अकेले ही करने पड़ रहे थे – बाक़ी सब लोगों पर तो शादी की मस्ती छाई हुई थी | पेट से थीं सो अलग | १५ मई की शादी थी और जुलाई के पहले हफ़्ते में गुरु पूर्णिमा के दिन नीलम पैदा हो गई थी | शादी के खर्च और पिताजी की परेशानी से अलग परेशान थीं | पर किसी को फ़िक्र नहीं थी इस बात की | पिताजी अपनी ही परेशानी में थे – शादी सर पर है – पैसा कहाँ से आएगा ? नतीज़ा ये हुआ कि बीमार पड़ गए | बुखार रहने लगा उन्हें | किसी से भी बात चीत बन्द कर दी उन्होंने | बस भाभी के साथ ही जो भी बातें होती होंगी वो उन्हें मालूम | रात भर सपने में या तो बड़बड़ाते थे या फिर घबराकर उठ बैठते थे और पसीने में भीग जाया करते थे | शादी की फ़िक्र के साथ साथ उनके दिल को सरोज के बर्ताव से भी ठेस लगी थी – पर चाह कर भी कुछ बोल नहीं सकते थे | पिताजी का ये हाल भाभी से देखा नहीं जा रहा था | आखिर उन्होंने संभल खत में सारी बातें लिखकर भेज दीं |

शादी को दो महीने बचे थे | संभल वालों कि अपने लड़की दामाद की चिन्ता थी सो बड़े मामा जी और मामी जी वेड, सावित्री और ओंकार के साथ आ गए थे | आते ही मामी जी ने घर का सारा काम सँभाल लिया था | ऊपर के काम के लिये जीराज के भतीजे फत्ते को भी बुलवा लिया था | साथ ही आते ही पिताजी को बोल दिया था कि पैसे की परवाह करने की कोई ज़रूरत नहीं | सरोज आपकी बाटी है तो हमारी भी भान्जी है | और आपकी इज़्ज़त हमारी भी तो इज़्ज़त है | आप बेफ़िक्री से सारे काम करो | सब ठीक हो जाएगा | और वास्तव में मामा जी ने अपनी बात पूरी की थी | सरोज की शादी में दिल खोलकर खर्च किया था | लड़के वालों ने हालाँकि साफ़ कह दिया था कि हम बस एक जोड़े में लड़की को विदा कराके ले जाएँगे – पर मामा जी ने ज़ेवर कपड़े में और बारातियों के लेने देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी | तभी तो आज तक भी उस ज़माने के जो लोग बचे हैं वे उस शादी को याद रखते हैं |

घर की पुताई शुरू हो गई थी | धर्मशाला की भी सफ़ाई पुताई शुरू कर दी गई थी और फ़कीरालाल जी ने सख्त हिदायत दे दी थी कि १८ मई तक किसी शादी की बुकिंग नहीं होगी धर्मशाला में | हलवाई बुलाकर उनके सामन की लिस्ट बनाई गई थी और मंडी से सामान लाकर इकठ्ठा करना शुरू कर दिया गया था | मिर्च मसाले कूटने छानने शुरू कर दिये थे कारीगरों ने | सामान भी काफ़ी आना था – आखिर को नगर के सबसे प्रतिष्ठित मास्टर गंगाप्रसाद की बेटी और थानेदार कन्हैयालाल की पोती की शादी थी | वो भी किसके साथ – ठेकेदार भगवानदास के बेटे के साथ – भला कोई मज़ाक बात थी ? पूरे चार दिन तीन रात तो बारात रुकनी थी | चार सौ बाराती आने थे | बारात में चार चार हाथी आने थे बारात की शोभा बढ़ाने | फिर पन्द्रह दिन की लग्न जानी थी और उसी दिन से टेले शुरू हो जाने थे | टेले एक बार शुरू हो जाएँ तो फिर सारे कुटुम्ब और जान पहचान वालों का सारा दिन का खाना पीना इसी घर में होना था | संभल भी जाना था भात नौतने मामा जी ने कहा भी था कि हम लोग तो यहीं हैं तो यहीं टीका कर दो, लेकिन बुआ और चाची नहीं मानी थीं | फिर सरोज का ज़ेवर भी संभल ही बनना था | तो बुआ, चाची, चाचा, उनके बच्चों और महेश मामा को लेकर मामा जी संभल रवाना हो गए | सरोज के लिये ज़ेवरों का डिज़ाइन दे दिया गया था | धूम धाम के साथ भात की रस्म पूरी हुई | सारे मुहल्ले की चूल नौत हुई भात के दिन | खूब नाच गाना हुआ | बाद में सबको कपड़े रुपयों के साथ टीका करके धामपुर वापस भेज दिया गया | मामा जी ने बनारस में अपने कपड़े वालों के पास सन्देश भिजवा दिया था कि लड़की की शादी है तो ज़री में जो भी अच्छी साड़ियां, लहँगे वगैरा हों सब लेकर धामपुर पहुँच जाएँ – और चार पाँच कपड़े वाले अपना अपना सामान लेकर धामपुर पहुँच गए थे | सारे कुटुम्ब के सामने प्रदर्शनी लगाई गई थी उस कपड़े की और फिर सबकी पसंद से सरोज के लिये साड़ियां लहँगे खरीदे गए थे | असल सोने चाँदी की ज़री के काम वाले कपड़े | पिताजी और चाचा अपनी हैसियत न होने के कारण इतना सब खर्च नहीं करना चाहते थे – पर एक तो बुआ चाची की बेशर्मी कि संभल वाले कर रहे हैं तो तुम्हें क्यों फ़िक्र ? उनका खर्च कराते डरते हो, ये नहीं सोचते कि लड़की किस घर में ब्याह कर जा रही है ? कुछ तो उसके कल की फ़िक्र करो कि वो भी ससुराल में सर उठाकर चल सके कि किसी भिखारी घर की नहीं है – वगैरा वगैरा… दूसरे, मामा जी ने साफ़ कह दिया था कि सरोज उनकी भांजी है और वो जो कुछ करेंगे पण्डित जी इसके बीच में कुछ नहीं बोलेंगे | लिहाज़ा पिताजी और चाचा के पास मुँह बन्द रखने के सिवा और कोई चारा नहीं रह गया था | और इसी गहमा गहमी में लग्न का दिन भी आ पहुँचा था | धर्मशाला, घर और फ़कीरालाल का घर रंगे पुते जगमग कर रहे थे | पुताई का सारा काम फ़कीरालाल ने ही कराया था | चाची के पीहर वाले, महेश मामा की ससुराल वाले सब फ़कीरालाल के यहाँ ठहरने वाले थे | संभल वालों को घर में रुकना था | बाक़ी सब लोग तो लोकल ही थे – चाहे नजीबाबाद के हों या धामपुर के | हफ़्ता भर से हलवाई बैठाए हुए थे – नजीबाबाद की और नाते रिश्ते वालों की भाजी बनाने के लिये | लग्न वाले दिन पूजा के बाद काफ़ी लोगों का खाना था | उसके बाद चाचा जी, फूफा जी, महेश मामा, हरिओम, तिरलोकी, धरमू और शहर के कुछ और लोग लग्न लेकर जाने वाले थे नजीबाबाद | सिव्हारा मिल की और रानी साहिबा के यहाँ की सारी गाड़ियाँ नजीबाबाद जाने के लिये तैयार की गई थीं | मेहमानों ने सुबह से ही आना शुरू कर दिया था और औरतों को घर में तथा मर्दों को फ़कीरालाल की बैठक में बैठाया जा रहा था | भीतर औरतें बन्ने बन्नी गाने में लगी हुई थीं | पूरी चहल पहल थी घर में |

सरोज आज सुबह ही नहा धोकर तैयार हो गई थी | भाभी ने मामा जी की लाई पीली साड़ी उसे पहनने को दी थी | सर धोकर और अभी अभी नहा कर आई सरोज के बदन की खुशबू सभी को मदमस्त कर रही थी | गीले अनसुलझे लम्बे बाल कुछ कमर पर फैले तो कुछ लटें सरोज के चेहरे से खेलती उसके लजाते चेहरे को धूप छाँव की आभा प्रदान कर रही थीं | प्रेमी पण्डित जी भी आ चुके थे और तिदरी में पूजन की वेदी बना दी थी | सरोज आकर पिताजी और भाभी के पास बैठ गई | आज से भाभी और मामी जी का काम कुछ हल्का हो गया था | आज से कम से कम खाने का काम तो हलवाइयों के ज़िम्मे था | बाक़ी के कामों के लिये फत्ते था ही |

प्रेमी पण्डित जी ने पूजा शुरू करवाई | “वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभा | निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा |” मंत्रघोष के साथ पूजा आरम्भ हुई | उसके बाद लग्नपत्रिका लिखी गई, रोली-अक्षत-चन्दन-केसर-पुष्पों से पत्रिका की पूजा की गई, उस पर “” लिखा गया और सतिये बनाए गए, फिर उसे गोल लपेट कर उस पर मौली लपेट दी गई और पण्डित जी ने पत्रिका सरोज की झोली में डाल दी | सरोज ने भाभी के हाथों में पकड़ाई और भाभी ने माथे से लगाकर चाचा जी को पकड़ा दी | सरोज के हाथ में उसी वक़्त कँगना बाँध दिया गया | अब उसके लिये घर से बाहर आना जाना बन्द हो गया था |

इधर सरोज को कँगना बंधा उधर दादी ने ढोलक की थाप पर मंगलगान शुरू किया “आओ री सुहागन नारी तुम सब मिलकर मंगलगान सुनाओ री | रक्षा करें गणनाथ दयानिधि, शंकर मंगल देवें री | अटल सुहाग रहे, वर ऐसा पार्वती मैया देवें री |” पिताजी भी पूजा समाप्त होने पर उठकर दादी के पास पहुँच गए और दादी के गले में बाँहें डालकर उनके सुर में सुर मिलाने लगे, और दादी और पिताजी की सुमधुर आवाज़ों में गाए इस मंगलगान से सारा वातावरण गुंजायमान हो उठा | सरोज के भी पूजा से उठते ही पद्मा और रुकमन उसे खींचकर अपने साथ ले गईं “आज तो नाचना ही पड़ेगा…”

“पर इसकी तो शादी है – दुलहन बनने वाली है – अब तो तुम लोगों का फ़र्ज़ है नाचना गाना…” भाभी भी पीछे पीछे आ पहुँची थीं और हँसते हुए पद्मा से बोलीं |

“ना ताई जी, आज तो नाचना ही पड़ेगा सरोज को…”

“हाँ हाँ सरोज चलो | तुम्हारी भाभी को खुद तो नाचना गाना आता नहीं – वो भला क्या जाने इस मस्ती को | ये संभल वाले बिल्कुल सूखे हैं इस मामले में | क्यों सरोज की मामी ठीक कहा न हमने ? अरे भई कम से कम बैठकर देख तो लो क्या करती है लाली हमारी | चलो लाली हारमोनियम लाकर दो | हम हारमोनियम बजाएँगे, रुकमन ढोलक और तुम्हारा नाच | चलो जल्दी करो…” भाभी की तरफ़ हँसती हुई दादी बोलीं और भाभी भी हँसती हुई मामी जी के साथ वहीँ एक तरफ़ बैठ गईं | आनन फानन में हारमोनियम और ढोलक सँभाल लिया गया | “क्या गाओगी लाली – शुरू करो…” दादी ने हारमोनियम पर कोई धुन छेड़ते हुए सरोज से पूछा और सरोज को और क्या चाहिए था – झट साड़ी का पल्ला कमर में खोंस पद्मा से घुँघरू लेकर पाँवों में बाँधे और जा खड़ी हुई बीच मैं | पिताजी ने उठकर हँसते हुए सरोज के सर पर एक मीठी सी चपत मारी और बाक़ी लोगों के साथ बाहर चले गए किसी काम से | अब बस घर की लड़कियाँ, ढोलक की थापें और इन लड़कियों और औरतों का धमाल | लाली ने गाना शुरू किया “रात राजा अकेली घबराए गई | तालों को जाते देखा, धोबन से मिलते देखा | हाय वो धोबन तुम्हारे मन भाए गई |” बाक़ी लड़कियों और औरतों ने सुर में सुर मिलाकर गाना शुरू कर दिया | सरोज को उस दिन इतनी मस्ती चढ़ी कि एक के बाद एक गानों पर नाचती रही – नाचती रही |

लग्नपत्रिका जाने के बारह दिन तक सरोज का रूप रंग और निखारने का प्रयास किया जाता रहा और घर और आस पड़ोस की औरतें रात दिन गाती रहीं –

“अम्बर बेल जनकपुर छाई री |
बाबा उनके पूछें लाडो कैसा वर ढूँढूँ री, दादी उनकी पूछें लाडो कैसा वर ढूँढूँ री |
लम्बा मत ढूँढो वो तो मंढे को गिरावे री, छोटा मत ढूँढो वो तो सब गुण खोटा री |
गोरा मर ढूँढो वाका अंग पसीजे री, काला मत ढूँढो वो तो कुल को लजावे री |
साँवला सलोना बन्ना मेरे मं भावे री |”

लगातार सात दिनों तक तो हलद बान ही होते रहे | हर रोज़ दस-ग्यारह बजे के आस पास सरोज को बीच आँगन में एक चौकी पर बैठाया जाता और उसके सामने मिट्टी की सरैयों में सरसों का तेल, दही, जौ का आटा, बेसन, काले तिल और हल्दी रखे जाते | कुछ सुहागिन महिलाएँ बारी बारी से दूर्वा में ये सारा सामान लेकर पहले सरोज के पैरों से सर तक छुआतीं और फिर सर से नीचे पैरों की तरफ़ | फिर उसके सर पर हाथ रखकर उसे “सदा सौभाग्यवती रहने” का आशीर्वाद देतीं | बाद में सरोज का बटन किया जाता और तब कहीं जाकर वो नहा पाती | इस बीच कुछ महिलाएँ मंगल गीत गाती रहतीं –

“देवी के भवन में ज्योति विराजे, आनन्द मंगल हो रहे जी |
देवी के भवन में हरियल पीपल, लाल ध्वजा फहरावे जी |
चौंसठ दिवला जलें भवना में, जगमग ज्योति समाए जी |
ब्रह्मा वेड पढ़ें भवना में, शंकर ध्यान लगावें जी |
जोई जोई ध्यावे सोई फल पावे, निष्फल कोई ना जावे जी |
अटल सुहाग सदा कर रखियो, ऐसा फल तुम दीजो जी |”

और इसी धींगा मस्ती के चलते बारात के आने का दिन भी आन पहुँचा था | ब्याह की तारीख़ से दो दिन पहले बारात आ पहुँची थी | रास्ते में रानी रत्ना देवी की सुगर मिल पर बारात के स्वागत की तैयारी राजकुमारी जी ने की थी | वहाँ से बारात धर्मशाला पहुँची | १३ तारीख़ से १६ तारीख़ तक ढोल नगाड़े और शहनाइयाँ बजती रहीं घर पर भी और धर्मशाला में भी | जयन्त ने सरोज से मिलने की इच्छा राखी थी, पर चाचा ने मना कर दिया था और उनके सामने बोलने का साहस किसी में नहीं था | बारात पहुँचने के बाद एक दिन सरोज को रंग चढ़ाया गया – नजीबाबाद से आई उसकी ननदें रंग चढ़ाने आई थीं | रंग के सामान के दस थाल जिनमें सरोज के लिये कपड़े, ज़ेवर, रूपये, मिठाई और फल वगैरा थे और बुआ और चाचा के बच्चों के लिये कपड़े थे – दस औरतें अपने सरों पर रखकर घर पहुँची थीं बाजे गाजे के साथ | रंग में आया सामान देखकर कुटुम्ब की औरतें दाँतों तले उँगली दबा रही थीं | भारी ज़ेवर और कपड़े – सरोज के भाग्य की सराहना कर रही थीं | इधर शीला और किरन रंग चढ़ा रही थीं उधर औरतें अपनी तान छेड़ने और सीटने देने में मशगूल थीं –

“ननदिया आई लेके साड़ी ओ लहँगा ||
एक टके की साड़ी लाई दो टके का लहँगा
मर गई मैं तो मैया, कहती तीन टका भी मँहगा ||
एक टके की नथनी लाई, दो टके का झुमका
मर गई मैं तो मैया, कहती तीन टका भी मँहगा ||
अरी खसमखाई कित्ते में लाई तू ननदोईया
हाँ मैं जानूँ तीन टके में, तीन ताका भी मँहगा ||

वगैरा वगैरा… और शीला और किरन सीटनों पर हँसती हुई सरोज को रंग चढ़ा रही थीं | सारा श्रृंगार जब हो चुका तो हर कोई नाचना गाना भूलकर बस सरोज का वो दिव्य रूप ही एकटक निहार रहा था और मन ही मन बोल भी रहा था “हे भगवान, बुरी नज़र से बचाना इसे…”

ख़ैर, दूसरे दिन सुबह मंढा रखा गया और शाम को बाद की रस्म हुई | बाग में मामा जी ने कोई कसर न छोड़ी थी – जयन्त को जड़ाऊ अँगूठी, भारी भरकम बर्तन और कामदार कपड़े, साथ के बारातियों के लिये भेंटें | दोनों तरफ़ से एक तरह से मुक़ाबला चल रहा था अच्छा ख़ासा | १५ को शादी थी | दूल्हे की सवारी हाथी पर बैठाकर निकाली गई | जयन्त का सबसे पसंदीदा रंग – क्रीम कलर के पायजामे पर सुनहरी ज़री वाली अचकन और जयपुरी जड़ाऊ जूतियाँ, कमर में गुलाबी दुपट्टे का पट्टा बंधा हुआ, सर पर गुलाबी पगड़ी, आँखों में काजल, माथे पर टीका – शहर में जिसने भी दूल्हे को देखा देखता ही रह गया | यों धर्मशाला घर के पास ही थी – पर बारातियों की इच्छा थी चढ़त करने की – सो पूरे शहर का चक्कर लगाकर बारात घर के दरवाज़े आई थी | सारे रास्ते इत्र छिड़कते और क़व्वाली गाते क़व्वाल, अखाड़े के करतब दिखाते लोग, बैण्ड बाजे वाले, नफ़ीरी वाले, रास्ते भर आतिशबाज़ी करते आतिशबाज़ी वाले जिन्हें ख़ासतौर पर मेरठ से बुलवाया गया था और सबसे आगे सिक्कों की बरसात करते जयन्त के लखनऊ वाले जीजा गोस्वामी जी | बारात क्या थी मानों किसी महाराजा की शाही सवारी थी | और यों क़रीब डेढ़ घण्टे में बारात घर के दरवाज़े पहुँची थी | रास्ते भर घरों की छतों पर चढ़े लोग इस शाही बारात को देखकर झूम रहे थे | दरवाज़े पहुँचने पर भाभी ने दूल्हे का आर्ट उतारा और औरतों ने एक बार फिर गाना शुरू कर दिया –

“बन्ना मेरा ख़ूब बना गुलहज़ारी |
बन्ना मेरा घोड़ी पे जब आए, बन्ने पे वारूँ लड़ियाँ सारी |
बन्ना मेरा सड़कों पे जब आए, बन्ने को देखे दुनिया सारी |
बन्ना मेरा चौकी पे जब आए, बन्ने पे वारूँ खुशियाँ सारी |
बन्ना मेरा बागों पे जब आए, बन्ने पे वारूँ सब फुलवारी |
बन्ना मेरा फेरों पे जब आए, बन्ने को मिल जाए दुलहिन प्यारी |”

औरतों के इसी गान के साथ साथ भाभी ने आरता पूरा किया और दूल्हे को मण्डप में ले जाया गया | सरोज की सहेलियाँ ज़ेवर-कपड़े और लाज के बोझ से दबी सरोज को भी लेकर मण्डप में पहुँच गईं और दूल्हे के पास बैठा दिया | बड़े बड़े केले के पेड़ खड़े करके मण्डप बनाया गया था और उसे पीले गेंदे के फूलों से सजाया गया था | दोनों और के पंडितों ने सस्वर मंत्रोच्चार आरम्भ किया | दोनों पक्षों के पण्डित अपनी अपनी विद्वत्ता का परिचय देने में लगे हुए थे – इधर प्रेमी पण्डित जी और उधर श्रीचंद पण्डित जी – दोनों ही अपने अपने शहरों के माने हुए विद्वान पण्डित – भला कोई भी पीछे कैसे रहता ? और इस तरह कन्यादान हुआ, मालाओं की अदला बदली हुई, सप्तपदी हुई, वचन भरवाए गए, और जयन्त ने अँगूठी से सरोज की माँग में सिंदूर भर दिया – जिसकी लाली से सरोज का शर्म से लाल चेहरा और भी दमक उठा | यों घर की लड़कियाँ और सरोज की ननदें बाक़ायदा दरवाज़े पर जयमाला करवानी चाहती थीं – पर चाचा ने मना कर दिया था “अरे ये कोई स्वयंवर नहीं हो रहा है जो जयमाला की जाएगी | हम लोग क्षत्रिय नहीं ब्राह्मण हैं, और ब्राह्मणों की ही तरह सरे रीति रिवाज़ होंगे…” और चाचा के सामने तो किसी का साहस ही नहीं था बोलने का | सो फेरों के वक़्त ही मालाओं की अदला बदली हुई |

दूसरे दिन विदाई से पहले पलंगचार हुआ, खेती बोई गई और दूल्हा दुलहन को सारे घरातियों ने सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद दिया | लोग घेरा बनाकर आते जोड़े से गाँठ बाँधे – सरोज और जयन्त के हाथों से धान लेते – पलंग के चारों ओर परिक्रमा करते धान बोये जाते – वापस आकर दूल्हा दुलहन के मस्तक पर तिलक लगते – कुछ रूपये नेग के तौर पर उनकी झोलियों में डालते और उनके सरों पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते “सदा सुखी रहो जयन्त, सदा सुहागन रहो सरोज, दूधों नहाओ पूतों फलो…” और सरोज और जयन्त के पास बैठे पिताजी और भाभी मन ही मन इतने सारे आशीर्वाद बच्चों के लिये मिलते देख सन्तुष्ट होते और खुशी के मोती उनकी पलकों की कोरों पर आकर टिक जाते | क़रीब डेढ़ दो घंटा ये कार्यक्रम चला | इसके बाद बारातियों की मिलनी हुई | और फिर दोपहर के खाने के बाद बारात विदा हो गई |

विदा के कुछ देर पहले जब सरोह ऊपर कमरे में फूट फूट कर रो रही थी तब भाभी पिताजी को नीचे से लिवा कर ले आई थीं और दोनों बाप बेटी को अकेले छोड़कर नीचे चली गई थीं | पिताजी काफ़ी देर तक अपनी लाडली के चेहरे को अपने सीने में छिपाए उसका सर सहलाते रहे थे और चोरी चोरी आँखों के मोती उसके बालों में पिरोते रहे थे | जब रो रोकर दोनों का दिल कुछ हल्का हो गया था तब पिताजी ने धीरे से सरोज को अपने सीने से हटाया और उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में भरकर प्यार से उसे समझाया “न रो लाली | अरे कहीं ज़्यादा दूर थोड़े ही जा रही हो | घर से बस दो कदम पर ही तो है ससुराल तुम्हारी | हर वक़्त हमारी आँखों के आगे ही तो रहोगी | चलो, विदा का समय हो रहा है | देखो, ठेकेदार साहब और उनके परिवार वाले बहुत सज्जन लोग हैं | बिटिया तुम्हारी पूरी कोशिश यही होनी चाहिये कि जितना हो सके उनका ख़याल रखना | कुछ भी ऐसा मत करना जिससे उनमें से किसी के भी दिल को ठेस लगे | जी जान से सबकी सेवा करना – अपनी भाभी की तरह | ऐसा करोगी तो हमारी भी आत्मा को शान्ति मिलेगी | चलो अब, मुहूर्त निकला जा रहा है…” आवाज़ भर्रा गई थी पिताजी की और भाभी को आवाज़ लगाकर खुद अपनी आँखें पोंछते नीचे उतर गए | भाभी ऊपर पहुँचीं, सरोज को सीने से लगाकर सान्त्वना दी और धीरे धीरे उसे नीचे ले आईं | नीचे आते आते भाभी ने बताया था “तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारे लिये कुछ लिखा है जो मैंने तुम्हारे बक्से में रख दिया है | वक़्त निकाल कर पढ़ लेना…” नीचे पहुँचीं तो जयन्त कुछ दूसरे बारातियों के साथ सीढ़ियों के पास हू खड़े थे | पिताजी ने सरोज का हाथ उनके हाथ में पकड़ाते हुए रुँधे गले से कहा था “जयन्त, बेटा हम जानते हैं कि सरोज में तुम्हारी जान बसती है | पर भूलना मत कि इसमें हम लोगों की भी जान बसती है…”

“आप कैसी बात करते हैं पिताजी ? मेरी पत्नी बाद में है ये – पहले तो आपकी बेटी है | और मैं भी आपका दामाद नहीं हूँ – बेटा हूँ आपका | मेरे लिये आज से मेरे दो माँ बाप हैं | हम दोनों हर वक़्त आपके साथ ही हैं पिताजी…” और सम्मान के साथ पिताजी के चरण स्पर्श किये | पिताजी ने जयन्त को दोनों हाथों से उठाकर सीने से लगा लिया | कुर्ते की बाँह से आँसू पोंछते रुँधे गले से आवाज़ लगाई “अरे चलो भई… कहाँ गए वो कहार…?” और कहारों ने आकर डोली का पर्दा उठा दिया | घर की औरतों ने सहारा देकर सरोज को डोली में बैठाया और कहार उठा ले चले दुलहिन की डोली – बेबस पिता भरी आँखों से डोली को दूर जाते निहारता रह गया – ख़ाली ख़ाली हाथ लिये – भाभी ने धीरे से पिताजी के कन्धे पर अपना हाथ रख दिया था और पिताजी ने भाभी के हाथ पर अपना हाथ रख दिया था – दूसरे को बेटी के विछोह की उस घड़ी में सहारा देने के लिये…

फैक्ट्री तक सरोज को चार कहार पालकी पर बैठाकर लेकर गए और जयन्त अपनी प्यारी घोड़ी पर सवार होकर पालकी के साथ साथ चले बाजे गाजे और सारे बारातियों के साथ | औरतें सरोज की विदाई से दुखी पर उसके अच्छे घर में ब्याहे जाने पर खुश होती किसी फ़िल्म का विदाई गान गाती मंडी के कुंए तक साथ साथ चलीं – “चार कहार काँधे डोली उठाएँ, चली लजाती दुलहनिया | पी के संग मनाओ रंगरलियाँ, अटल सुहाग हो दुलहनिया | भूल न जाना पीछे छोड़ीं संग सहेली दुलहनिया | मैया बाबा का घर सूना करके जाती दुलहनिया |” चाचा और मामा और जयन्त के दोनों बहनोई दुलहिन की पालकी और दुल्हे की घोड़ी के ऊपर सिक्कों की बरसात कर रहे थे उनके मँगलमय सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से |

बारात जा चुकी थी | पण्डित गंगाप्रसाद की लाडली और संभल वाली की सहेली, दादी के जिगर का टुकड़ा सरोज पी के घर जा चुकी थी और पीछे छोड़ गई थी कभी न खत्म होने वाली उदासी | जश्न खत्म हो चुका था | थके हारे सारे घराती आराम करने लगे थे | नाई मिलने वालों की भाजी बाँटना शुरू कर चुका था | पिताजी खुद को लुटा लुटा सा महसूस कर रहे थे – शायद इसलिये कि आज के बाद उनकी बेटी उनकी नहीं रही थी – उस पर उनका वो अधिकार नहीं रहा था | भाभी खुद को ख़ाली ख़ाली महसूस कर रही थीं – शायद इसलिये कि अब किसकी गलतियों पर किसे टोकेंगी ? किसे गुड़िया की तरह सजाने सँवारने के लिये नित नए जतन करेंगी ? दादी पेट पकड़ कर कोने में बैठी थीं – उनकी ज़िंदगी में सरोज से ही तो सारी खुशियाँ थीं |

ससुराल पहुँचने पर सरोज का पुरज़ोर स्वागत हुआ था | औरतों ने नव वधू के स्वागत में जी भर के गीत गाए थे | रात को सारी लड़कियाँ चुहल करती सरोज को उसके कमरे में ले गई थीं जहाँ फ़िल्मी अंदाज़ में सुहाग सेज सजाई गई थी | कुछ देर बाद जयन्त भी आ गए थे और सारी लड़कियाँ भाभी आने का नेग लेकर कमरे से भाग गई थीं | धड़कते दिल से सरोज जयन्त से मिली और फिर धीरे धीरे लाज के सारे बन्धन टूट गए और अरसे से मिलन की प्यासी दो आत्माएँ एक दूसरे में समा गईं |

दूसरे दिन सुबह बक्स में से कपड़े निकालने लगी तो फ्रेम किया हुआ कुछ लगा उसके हाथ | निकाल कर देखा तो वाही था जिसका ज़िक्र भाभी ने किया था | सरोज ने पढ़ना शुरू किया | जयन्त भी पास आकर बैठ गए और दोनों मिलकर पढ़ने लगे | अपनी लाडली के लिये पिताजी ने कविता के रूप में सुखी वैवाहिक जीवन की कामना की थी –

“प्यारी बिटिया, तुम जानती हो कि तुम्हारा ये बाप एक गरीब मास्टर है | तुम्हें और कुछ तो दे नहीं सकता, बस तुम्हारे सुखी वैवाहिक जीवन की कामना भर कर सकता है…

सुमुखि रहे तू चिर सुहागिनी ||
कम्पित कर से कम्पित स्वर से, झंकृत स्पन्दित तार तार से
मधुमय रसमय मनवीणा से
कोमल लय कोमल पुकार से गूँज रही ये मधुर रागिनी |
सुमुखि रहे तू चिर सुहागिनी ||
स्वर्ण वर्ण से निर्झरिणी में, तुहिन बिन्दु से वनस्थली में
सौरभ से अधखिली कली में
मैंने अंकित करी चाँदनी से तेरी चिरमिलन यामिनी |
सुमुखि रहे तू चिर सुहागिनी ||
उठो लाडली, प्रिय की प्रेयसी, स्वर साधन कर आओ रूपसि
नाचो, नाच उठें तारा शशि
ताल ताल पर बोल उठें ये रुनझुन नूपुर मधुर किंकिणी |
सुमुखि रहे तू चिर सुहागिनी ||
भाग्यवती मैं तुझको दूँ क्या, सोच रहा हूँ कहूँ, कहूँ क्या
पर यूँ ही कंगाल रहूँ क्या ?
इसीलिये तारों से झोली भर लाई है चपल यामिनी ||
सुमुखि रहे तू चिर सुहागिनी ||

ढेर से प्यार और शुभकामनाओं के साथ तुम्हारे – पिताजी…”

पढ़ते पढ़ते सरोज पिताजी को याद कर फूट फूट कर रोने लगी | जयन्त ने जैसे तैसे उसे चुप कराया और फ़ौरन नौकर को बुलाकर दीवार पर एक कील गढ़वाकर पिताजी की शुभकामनाओं के उस फ्रेम को ठीक पलंग के सामने लटका दिया था – सम्मान और प्रशंसा के साथ कि किस तरह एक पिता ने अपना दिल खोलकर रख दिया बेटी के सामने |

कई दिनों तक जश्न का माहौल रहा था | आए दिन किसी न किसी की दावत हुआ करती थी और किसी न किसी बाई का नाच | सरोज और जयन्त सज सँवर कर मेहमानों का स्वागत करते और बाई को ज़ेवर रुपया भेंट कर देते थे | दान देने के लिये ठेकेदार साहब ने तिजोरियों के ताले खोल दिये थे | कई दिन इसी तरह गुज़र गए | ऊँचे लोग ऊँचे ठाठ | सरोज जैसे हवा से बातें कर रही थी | सूबह सुबह मालन आ जाती थी | मालिश करवाके सरोज के नहा चुकने के बाद साड़ी लहँगा पहनने में उसकी मदद करती, बाल ठीक करके उनमें फूलों का गजरा लगाती, पाँव का महावर ठीक करती, पूरा श्रृंगार करती | उसके बाद नाश्ता पानी माता जी अपने सामने करातीं | फिर दोनों ननदें उसे जनानखाने की बैठक में ले जाकर बैठा देतीं | आने जानेवालियों का आशीर्वाद लेते लेते दोपहर हो जाती | खाने से निबट कर कुछ देर आराम फ़रमाया जाता | शाम को फिर से तैयार होकर जयन्त के साथ लाला जी के पास चली जाती बाहर बैठक में | वहाँ घर बाहर के नौकर चाकर और जंगलात से आए मज़दूर होते थे | सरोज के हाथों से सबको कुछ न कुछ दिलवाया जाता था | सारा सारा दिन घर में शीला, किरन और साथ की सारी लड़कियाँ पिताजी के ही घर की तरह धमा चौकड़ी मचाए रखतीं | दिन कैसे पंख लगाकर गुज़रते जा रहे थे पता ही नहीं चला | असल में सरोज की ससुराल वालों को बहू कम – गुड़िया ही ज़्यादा चाहिये थी – जिसे हर तरह से सजा सँवार कर रखा जाए और जिसके आने से घर में रौनक आ जाए और घर चमक उठे, चहक उठे | सरोज के रूप में उन्हें वही गुड़िया मिल गई थी | अपने भाग्य को सराहते न थकते थे माता जी, लाला जी, शीला और किरन | और जयन्त – उनकी तो जान बसती थी सरोज में | नीलम को याद है जब कभी सुबह को वो बिब्बी के घर पहुँच जाती थी तो मालन उन्हें तैयार कर रही होती थी और उस सबको देखकर नीलम को गुरुदत्त की फ़िल्म “साहब बीवी और गुलाम” की मीना कुमारी की याद आ जाती थी – फ़र्क बस यही था कि इस कहानी में साहब और बीवी तो थे पर गुलाम की ज़रूरत उस रूप में कभी नहीं पड़ी |

धीरे धीरे डेढ़ महीना गुज़र गया | पिताजी और भाभी धामपुर ही रुके हुए थे | भाभी का पैर भारी था इसलिये | संभल वाले वापस जा चुके थे | सरोज और जयन्त वहीं जाकर कुछ दिन उन लोगों के पास रुककर वापस आ गए थे | तभी एक दिन धामपुर से केशव गार्ड खबर लेकर आए – भाभी के लड़की पैदा हुई थी | बच्चा पैदा करने भाभी को संभल भेजा जा रहा था सावित्री जीजी के साथ कि वहीँ रास्ते में मुरादाबाद में बच्ची का जन्म हो गया था | बच्ची तो ठीक थी, पर भाभी काफ़ी बीमार थीं और उनके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी | बहन के आने की तो खुशी थी सरोज को पर भाभी का हाल जानकार उसे चैन नहीं मिल रहा था | न जाने क्यों, उसे लग रहा था कि उसकी शादी की भाग दौड़ के चक्कर में भाभी का ये हाल हुआ था | ससुराल वाले उसके दिल की बात समझते थे | और लाला जी ने जयन्त और सरोज को संभल भेज दिया भाभी के पास | सरोज को याद आया कि इसी तरह विनोद के पैदा होने पर पिताजी के साथ संभल आई थी और विनोद को हर वक़्त गोद में लेकर बैठी रहती थी | संभल पहुँचने पर इस बार तो पहले से भी ज़्यादा खातिरदारी हुई थी – जमाईराजा जो थे साथ में | सबसे मिलने जुलने के बाद सरोज और जयन्त को ले जाया गया भाभी के पास | सरोज तो बहन को देखकर खुश हुई ही – जयन्त उससे ज़्यादा खुश हुए थे – उन्होंने अपनी याद में पहला बच्चा देखा था और उन्हें लग रहा था कि वो उनकी साली नहीं है, बेटी है | तभी बातों बातों में पता चला कि भाभी का दूध बच्ची को नहीं दिया जा सकता और भाभी को अभी कुछ दिन संभल ही रुकना पड़ेगा | वहाँ दादी जी (डा. साहब की माता जी) भी आई हुई थीं | उन्होंने नवजात बच्ची को पालने की ज़िम्मेदारी ली जिद करके “आपके यहाँ कोई बच्चा बचता नहीं, क्या पता हमारे भाग्य से ही बच जाए…” सरोज और जयन्त बच्ची को पालना चाहते थे – सरोज का खून जो थी वो – पर संभल में सबने यही समझाया कि अभी अभी शादी हुई है – खेलने खाने के दिन हैं – बच्चे तो सारी उम्र ही खिलाओगे – सरोज क्या जानती थी कि कुछ दिन की चाँदनी है – बाद में तो सारी उम्र बच्चों के लिये संघर्ष करने में ही गुजरेगी…

क्रमशः…………..