मौन समर्पण

मौन समर्पण

मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
निरन्तर विकसित होते एक पुष्प की भांति |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब फैलाती हूँ मैं अपने पंख
बाँटने को जगत में
प्रेम, दया, करुणा और आनन्द की छाया
ताकि ढक जाए मेरा समस्त दुःख, अकेलापन और चिंताएँ
उन पंखों के तले |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब मैं कर लेती हूँ स्वयं को एकाकार
अपने चारों ओर के वातावरण में |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब होती हूँ चुपचाप
खोई हुई अपने ही संसार में |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब बहते हैं अश्रु मेरे नेत्रों से
क्योंकि करते हैं ये मुझे शान्त |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब मैं शब्दों में सुनाती हूँ अपनी व्यथा कथा |
पर उस सबसे भी अधिक
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब मेरे पास नहीं होता कुछ कहने के लिये
जब मेरे पास नहीं होता कुछ करने के लिये
केवल एक अहसास होता है
निष्क्रियता और मौन समर्पण का |

शब्द अमरता पा जाते हैं

शब्द अमरता पा जाते हैं

शब्दों का अस्तित्व यही, पल भर में व्यर्थ वो हो जाते हैं
किन्तु मौन की भाषा को सब युगों युगों तक दोहराते हैं |
पल भर को एक कथा सुनाकर शब्द राह अपनी चल देते
किन्तु मौन में जड़े शब्द निज छाप अमिट पड़वा जाते हैं ||
शब्दों से कोलाहल बढ़ता, नित नवीन कोई घटना घटती
और विचित्र कोई अर्थ बताकर इतिहासों में गुम हो रहती |
किन्तु मौन के अर्थ अनेकों, शान्त हृदय से समझे जाते
और नया एक काव्य रचाकर अजर अमर वो हो जाते हैं ||
शब्दों का क्या, होठों पर आते ही बासी हो जाते हैं
और पकड़ ले अगर लेखनी, मूक चित्र तब बन जाते हैं |
किन्तु मौन की अथक साधना में है देखो कितनी क्षमता
भाव होठ तक आते आते अमृत ही बरसा जाते हैं ||
बिना मौन का साधन करके शब्द अगर होठों पर आते
अर्थहीन, बलहीन बने वे भाव नहीं पूरे कह पाते |
पालें मौन के गर्भ तो उनमें अनगिन भाव तरंगित होते
अमिट छाप तब छोड़ें मन पर, सार्थकता वे पा जाते हैं ||
इसीलिये अर्थों को खोजो मौन की गहराई में जाकर
मत उलझाओ शब्दों में उनकी उस अनुपम सुंदरता को |
शब्दों का अस्तित्व शून्य है, पल भर में ही खो जाएगा
मौन की भाषा में सजकर ही शब्द अमरता पा जाते हैं ||

प्रेम का लक्ष्य, बन जाना है मार्ग

प्रेम का लक्ष्य

प्रेम पहुँचता है अपनी पूर्णता पर
जब दो व्यक्ति
लाँघ जाते हैं सारी सीमाएँ प्रेम की
और खो जाते हैं एक दूसरे में
मिला देते हैं अपना अपना अस्तित्व
एक दूसरे में
रोप देते हैं बीज
नि:स्वार्थ मासूम प्रेम से युक्त नई सृष्टि का
और तब बन जाता है प्रेम
भक्ति और ध्यान
जो ले जाते हैं व्यक्ति को
मार्ग पर उसके चरम लक्ष्य के |
लक्ष्य ?
सांसारिक सुखों से ऊपर उठकर
संस्कारों का ऋण चुकाकर
मोक्ष की प्राप्ति का……

बन जाना है मार्ग

मैं चाहती हूँ समझना उसे कुछ इस तरह
कि कर सकूँ मैं वार्तालाप उसके साथ
अपने मौन में
स्वयं के विकास के लिये |
इसीलिये मुझे आरम्भ करनी है अपनी यात्रा
यम नियम सत्य अहिंसा आस्तेय प्रत्याहार
और
प्राणायाम के साथ |
मुझे गतिशील करना है अपने अंगों को
खोलना है अपने शरीर को
अपने जोड़ों, माँसपेशियों को
देना है बल, एकाग्रता और एकता |
महसूस करना है
प्रवाहित होती अपनी श्वासों को
नासारन्ध्रों में
रहना है प्रकृतिस्थ, चेतना के साथ |
मुझे सुननी है ध्वनि अपने भीतर की
आती हुई बाहर को |
अनुभव करना है कि जो है बाहर वह है भीतर |
देखना है स्वयं को जाते हुए विचारशून्यता की ओर
स्थिर होते हुए भीतर से |
मुझे अनुभव करना है अपनी शान्ति का
सुनना है मौन के अनहद नाद को |
बन्द आँखों से देखने हैं चमकते हुए तारे
पर्वत नदी वृक्ष वन
सरिता मिलती हुई सागर में |
मुझे नहीं बनने देना है स्वयं को यात्रा
बन जाना है मार्ग
जो ले जाता है मिलाने
स्व को उस शाश्वत सत्य से…………

काफ़ी है

काफ़ी है

क्या करना लम्बी सरगम का, बस एक रागिनी काफ़ी है |
कुछ चित्र बनाए हैं, उनमें ही रंग भरो तो काफ़ी है ||
मुझको गीतों से भरी एक मिल जाए यामिनी जीने को |
क्या करना ढेरों साज़ों का, बस एक तार ही काफ़ी है ||
बस मन्द मन्द ये बहे हवा और मधुर राग गुनगुना उठे |
क्या करना है मलयानिल का, बस गन्ध प्यार की काफ़ी है ||
जीवन की धूप से निकली ध्वनि लय भर दे हर जड़ चेतन में |
क्या करना बरखा की रुत का, बस बूँद ओस की काफ़ी है ||
दीपों की जगमग में मन के भावों को रूप नहीं मिलता |
क्या करना इनका, दामिनि की बस एक लपक ही काफ़ी है ||

तुझको बड़ी दूर जाना है

अभी बढ़ाया पहला पग है, अभी न मग को पहचाना है |
अभी कहाँ रुकने की वेला, तुझको बड़ी दूर जाना है ||
कहीं मोह के विकत भँवर में फँसकर सब कुछ खो मत देना |
कहीं समझकर सबको अपना जाग जाग कर सो मत रहना |
तुझको सावधान रहकर ही सबके मन को पा जाना है ||
और न कोई साथी, केवल अन्तरतम का स्वर सहचर है
साधन पथ का पथिक मनुज है, और साधना अजर अमर है |
तब फिर कहो शिथिलता कैसी, कैसे कहो व्यस्त बाना है ||
परिचित निज दुर्बलताओं से, आदर्शोन्मुख श्वास श्वास पर
भय मत खाना मंझधारों से, बढ़ते जाना लहर लहर पर |
बाधाओं को दूर भगा निज लक्ष्य तुझे पाते जाना है ||
रजकण हिमगिरी ज्यों बन जाता, जलकण ज्यों सागर हो जाता |
जैसे एक बीज ही बढ़कर वाट विशाल होकर छा जाता |
उसी भाँति तुझको भी जग के सारे मग पर छा जाना है ||
हो उच्छृंखल या श्रद्धानत या स्वच्छन्द विचरने वाला |
जैसा है मानव मानव है, जग की प्रगति इसी पर निर्भर |
अपनी दुर्बलताओं ही में इसे नया सम्बल पाना है ||
भय बाधा से भीति मानकर आगे पीछे कदम हटाना
यह इस पथ की रीत नहीं है, नहीं वीर का है यह बाना |
ह्रदय रक्त से ही नवयुग की आशा का साधन पाना है ||
निरत साधना में जो अपनी उसे न सुध आती है जग की |
अविरत गति चलने वाले को चिंता कभी न होती मग की |
शूल बिछे हों या अंगारे, पथ पर बढते ही जाना है ||

आओ हम सब झूला झूलें

आओ हम सब झूला झूलें

आज सुबह जब खिड़की से बाहर झाँका तो पार्क में लगे झूलों पर अचानक ही नज़र चली गई | सभी झूलों को रंग बिरंगे फूलों से सजाया गया था | पता लगा कि कल तीज का त्यौहार है इसलिए इन झूलों को अभी से सजाया जा रहा है क्योंकि कल सुबह से इन झूलों पर लड़कियाँ और महिलाएँ झूलना शुरू कर देंगी | आज सोसायटी में मेंहदी लगाने वाली को भी बुलाया गया है ताकि महिलाएँ और लड़कियाँ अपने अपने हाथों पैरों पर मेंहदी लगवा सकें | सब कुछ देखकर और सारी बात जानकर बहुत अच्छा लगा |

वैसे देखा जाए तो अब त्यौहारों में पारम्परिकता की कमी आई है, दिखावा बढ़ गया है | मँहगे से मँहगे उपहार देना और औपचारिकता के तौर पर कुछ देर के लिये “गेट टुगेदर” कर लेना ही त्यौहार माना जाने लगा है | जबकि अपने पुराने दिनों की याद करते हैं तो ध्यान आता है कि कई रोज़ पहले से बाज़ारों में घेवर मिलने शुरू हो जाया करते थे | बेटियों के घर घेवर तथा दूसरी मिठाइयों के साथ वस्त्र तथा श्रृंगार की अन्य वस्तुएँ जैसे मेंहदी और चूड़ियाँ आदि लेकर भाई जाया करते थे जिसे “सिंधारा” कहा जाता था | बहू के मायके से आई मिठाइयाँ जान पहचान वालों के यहाँ “भाजी” के नाम से बंटवाई जाती थीं | और इसके पीछे भावना यही रहती थी कि अधिक से अधिक लोगों का आशीर्वाद तथा शुभकामनाएँ मिल सकें | यों तो सारा सावन ही बागों में और घर में लगे नीम आदि के पेड़ों पर झूले लटके रहते थे और लड़कियाँ गीत गा गाकर उन पर झूला करती थीं | पर तीज के दिन तो एक एक घर में सारे मुहल्ले की महिलाएँ और लड़कियाँ हाथों पैरों पर मेंहदी की फुलवारी खिलाए, हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ पहने सज धज कर इकट्ठी हो जाया करती थीं दोपहर के खाने पीने के कामों से निबट कर और फिर शुरू होता था झूले के धमाल | दो महिलाएँ झूले पर बैठती थीं और बाक़ी महिलाएँ गीत गाती उन्हें झोटे देती जाती थीं और झूला झूलने के साथ साथ चुहलबाज़ी भी चलती रहती थी | सावन के गीतों की वो झड़ी लगती थी कि समय का कुछ होश ही नहीं रहता था | वक़्त जैसे ठहर जाया करता था इस मादक दृश्य का गवाह बनने के लिये |

हम सभी जानते हैं कि भारत त्योहारों और पर्वों का देश है | त्यौहारों का इतना उत्साह, इतने रंग सम्भवतः हमारे ही देश में देखने को मिलते हैं | यहाँ त्यौहार केवल एक अनुष्ठान मात्र नहीं होते, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक तारतम्य, प्राचीन सभ्यताओं की खोज एवं अपने अतीत से जुड़े रहने का सुखद अहसास भी होता है । बहुत सारे लोक पर्व इस देश में मनाए जाते हैं | इन्हीं पर्वों में से एक है तीज का पर्व | कल यानी २२ जुलाई को हरियाली तीज का उल्लासमय पर्व है | सबसे पहले तो इस पर्व की बधाई | श्रावण मास में जब समस्त चराचर जगत वर्षा की रिमझिम फुहारों में सराबोर हो जाता है, इन्द्रदेव की कृपा से जब मेघराज मधु के समान जल का दान पृथिवी को देते हैं और उस अमृतजल का पान करके जब प्यासी धरती की प्यास बुझने लगती है और हरा घाघरा पहने धरती अपनी इस प्रसन्नता को वनस्पतियों के लहराते नृत्य द्वारा जब अभिव्यक्त करने लगती है, जिसे देख जन जन का मानस मस्ती में झूम झूम उठता है तब उस उल्लास का अभिनन्दन करने के लिये, उस मादकता की जो विचित्र सी अनुभूति होती है उसकी अभिव्यक्ति के लिये “हरियाली तीज” अथवा “मधुस्रवा तीज” का पर्व मनाया जाता है | “मधुस्रवा अथवा मधुश्रवा” शब्द का अर्थ ही है मधु अर्थात अमृत का स्राव यानी वर्षा करने वाला | अब गर्मी से बेहाल हो चुकी धरती पर जल से बढ़कर और कौन सा अमृत हो सकता है ? वैसे भी जल को अमृत ही तो कहा जाता है |

मान्यता है कि पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने जब सौ वर्ष की घोर तपस्या करके शिव को पति के रूप में प्राप्त कर लिया तो श्रावण शुक्ल तृतीया को ही शिव के घर में उनका पदार्पण हुआ था | दक्ष के यज्ञ में पत्नी सती के होम होने के बाद क्रोध में दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करके शिव हिमशिखर पर तपस्या करने चले गए थे | उसी समय सती ने पर्वतराज हिमालय के यहाँ उनकी पत्नी मैना के गर्भ से पार्वती के रूप में जन्म लिया | वह कन्या उमा तथा गौरी के नाम से भी विख्यात हुई । उस समय नारद कन्या को आशीर्वाद देने आए और भविष्यवाणी करते गए कि इस कन्या का विवाह शिव के साथ होगा | इसे सुन पर्वतराज हिमालय सन्तुष्ट हो गए | पार्वती विवाह योग्य हुईं तो हिमालय ने नारद की भविष्यवाणी का स्मरण करके एक सखी के साथ पार्वती को हिमालय के शिखर पर तप कर रहे शिव की सेवा के लिये भेज दिया |

इसी बीच ब्रह्मा के वरदान से वारंगी और वज्रांग के यहाँ तारक नाम के एक पुत्र ने जन्म लिया | तारक जन्म से ही उत्पाती था | जब बड़ा हुआ तो उसने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए आसुरी तप किया | तारक के तप से शिव प्रसन्न हुए और औघड़दानी ने तारक से वर माँगने के लिये कहा | तारक ने शिव से वर माँगा कि करोड़ों वर्षों तक उसका समस्त लोकों में राज्य रहे | शिव से वर प्राप्त करने के बाद तारक और भी अधिक बलशाली एवं क्रूर हो गया | उसने समस्त देवलोक पर अधिकार कर लिया और देवताओं को तरह तरह से त्रस्त करना आरम्भ कर दिया | तारकासुर ने देवलोक में महासंहार मचा दिया | अब नारद ने उपाय बताया कि केवल शिव के वीर्य से उत्पन्न बालक ही तारकासुर का संहार कर सकता था | किन्तु शिव की पत्नी सती तो दक्ष के यज्ञ में होम हो चुकी थीं | पत्नी के बिना पुत्र कैसे उत्पन्न होता ? शिव कठोर तपस्या में लीन थे, इस स्थिति में उन्हें दूसरे विवाह के लिये कैसे मनाया जा सकता था ? तब देवताओं को एक उपाय सूझा | उन्होंने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिये भेजा | किन्तु शिव ने क्रोध में आकर कामदेव को ही भस्म कर दिया और हिमालय छोड़कर कैलाश पर्वत पर चले गए | तब नारद ने पार्वती से आग्रह किया कि वे शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये तपस्या करें | नारद के आग्रह पर १०० वर्षों तक पार्वती ने घोर तपस्या की | किन्तु शिव तपस्या में ऐसे लीन हुए कि पार्वती की तपस्या की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया | स्थिति यहाँ तक पहुँच गई की शिव की तपस्या में पार्वती को अपने तन का भी होश नहीं रहा | खाना पीना पहनना ओढ़ना सब भूल गईं | उसी स्थिति में उन्हें “अपर्णा” भी कहा जाने लगा | अन्त में पार्वती की तपस्या रंग लाई और अनेक प्रकार से पार्वती की परीक्षा लेने के बाद शिव उनसे प्रसन्न हुए और अपना तप पूर्ण करने के बाद पार्वती के साथ विवाह किया | शिव-पार्वती के मिलन से उत्पन्न कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया | मान्यता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया को ही शिव के घर में पार्वती पदार्पण हुआ था | यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि शिव पार्वती का पुनर्मिलन लोक कल्याण की भावना से हुआ था न कि किसी काम भावना के कारण | इसीलिये तो शिव ने उनके यज्ञ में बाधा डालने आए कामदेव को भी भस्म कर दिया था | अतः शिव पार्वती के मिलन का यह पर्व भी इसी प्रकार सात्विक भावना के साथ मनाया जाना चाहिये |

इस प्रकार की तीन तीज आती हैं एक वर्ष में | हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज | कजरी तीज के अवसर पर दूध दही तथा पुष्पों से नीम की पूजा की जाती है और शिव पार्वती से सम्बन्धित गीत गाए जाते हैं | यह पर्व भाद्रपद कृष्ण तृतीया को मनाया जाता है | कजरी तीज से पूर्व रात्रि को महिलाएँ रात भर कजरी खेलती हं| |

सबसे कठिन पूजा होती है हरतालिका तीज की | तीन दिनों तक महिलाएँ व्रत रखती हैं | भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में हरतालिका तीज की पूजा होती है | कहा जाता है कि भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी ।

श्रावण शुक्ल तृतीया को राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरयाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश में समान रूप से हरियाली तीज का त्यौहार मनाया जाता है | इसमें पारम्परिक रूप से चंद्रमा तथा वट वृक्ष की पूजा की जाती है और लड़कियाँ तथा महिलाएँ सावन से सम्बन्धित लोक गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं | विविध प्रकार के पकवान इस दिन बनाए जाते है | कुछ स्थानों पर मेलों का भी आयोजन किया जाता है | नेपाल में भी यह त्यौहार इतने ही उत्साह के साथ मनाया जाता है और पशुपतिनाथ मन्दिर में पूजा अर्चना की जाती है | वृन्दावन में हरियाली तीज पर राधा कृष्ण की पूजा की जाती है उनके दिव्य प्रेम का सम्मान करने के लिये तथा इस कामना से कि सभी महिलाओं का उनके पति के साथ उसी प्रकार का दिव्य प्रेम सम्बन्ध बना रहे | साथ ही जिस प्रकार पार्वती को उनका इच्छित वर प्राप्त हुआ उसी प्रकार हर लड़की को उसका मनचाहा वर प्राप्त हो इस कामना से कुँआरी लड़कियाँ तीज का पर्व मनाती हैं |

कहने का तात्पर्य है कि, क्योंकि शिव पार्वती का यह सम्मिलन तीज के दिन ही हुआ था | सम्भवतः यही कारण है कि इस दिन सौभाग्यवती महिलाएँ अपने सौभाग्य अर्थात पति की दीर्घायु की कामना से तथा कुँआरी कन्याएँ अनुकूल वर प्राप्ति की कामना से इस पर्व को मनाती हैं | अर्थात श्रावण मास का, वर्षा ऋतु का, मानसून का अभिनन्दन करने के साथ साथ शिव पार्वती के मिलन को स्मरण करने के लिये भी इस हरियाली तीज को मनाया जाता है | जैसा कि सब ही जानते हैं, इस अवसर पर महिलाएँ और लड़कियाँ सज संवर कर, हाथों में सौभाग्य की प्रतीक मेंहदी लगाकर झूला झूलने जाती हैं | तो आइये हम सब भी मिलकर अभिनन्दन करें इस पर्व का तथा पर्व की मूलभूत भावनाओं का सम्मान करें | इस पर्व की मूलभूत भावनाएँ सामाजिक होने के साथ साथ आध्यात्मिक भी हैं – और वो इस प्रकार कि दाम्पत्य जीवन केवल काम भावना का ही नाम नहीं है, वरन पति पत्नी को परस्पर प्रेम भाव से साथ रहते हुए, एक दूसरे का सम्मान करते हुए, लोक कल्याण की भावना से जीवन व्यतीत करना चाहिए ताकि कार्तिकेय जैसा पुत्र उत्पन्न हो जो समाज को समस्त कष्टों से मुक्ति दिला सके | साथ ही सावन की मस्ती को न भूलें, क्योंकि जब सारी पृकृति ही मदमस्त हो जाती है वर्षा की रिमझिम बूँदों का मधुपान करके तो फिर मानव मन भला कैसे न झूम उठेगा……… क्यों न उसका मन होगा हिंडोले पर बैठ ऊँची ऊँची पेंग बढ़ाने का……..

औरत

औरत

मैं देखती हूँ खिड़की से बाहर
गिरती हुई ओस की बूँदों को
जैसे हो कोई मोती
गिरा हुआ कमलपत्र पर
शान्त, सुन्दर, आकर्षक
किन्तु नहीं कर सकती इस पर अधिकार |
नहीं जड़ा जा सकता इसका सौन्दर्य मेरी अँगूठी में |
देखना ही होगा पर्याप्त |
तभी में देखती हूँ
भोर के सूर्य की रक्तिम-स्वर्णिम किरणें
भर देती हैं इस मोती को इन्द्रधनुष के रंगों से |
तभी धीरे धीरे चढ़ती है धूप
कुम्हलाती हुई समस्त प्रकृति को
जिसके साथ ही
सूख कर नष्ट हो जाता है वो मोती
वो ओस की बूँद
जो थी
शान्त, सुन्दर, आकर्षक
गिरी हुई कमलपत्र पर
इन्द्रधनुषी रंगों से सजी |
ओस की बूँदें खो देती हैं अपना आकर्षण
अपनी शान्ति
अपना सौन्दर्य
वैसे ही, जैसे कोई छोटी बच्ची
खो देती है अपना शैशव
बढ़ती उम्र की धूप के साथ
झेलती हुई यातनाएँ
कुम्हलाती हुई, मसली जाती
और बन जाती है
“दुखियारी” औरत |

कजरारी बरसात

कजरारी बरसात

सावन की रिमझिम क्या प्यासी धरती को बहला पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
चढ़ी जवानी मेघ बावरे पर, बौराया सा बरसे
गरज तरस कर कहे पपीहे से, पागल अब क्यों तरसे |
हर बादल से प्यास पपीहे की बोलो क्या मिट पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
सिहर सिहर पुरवैया डोले, धरती भी पगलाई है
इठलाई धरती पर भी तो नई जवानी आई है |
फूला हारसिंगार, मगर क्या कोयल राग सुना पाएगी
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ?
बादल की ताधिन मृदंग पर कल का प्रात है चहक रहा
इन्द्रधनुष के सात सुरों की सरगम सुन वह बहक रहा |
मगर अन्हरिया रात गगरिया मधु की क्या छलका पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
आज मचा तूफ़ान भयंकर, गोरी के मन हूक उठी
लख कर यह व्यभिचार जगत में, आज प्रकृति भी विकल हुई |
स्वर्ग प्रेम ममता का धरती कहो कभी क्या बन पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
प्रेम देवता के मंदिर पर द्रुपद सुता का चीर हरण
नारी के सम्मान को तज कर, आज उसी का गर्भ पतन |
मातृ शक्ति के आराधन की रीत कभी क्या चल पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
माँ की ममता से अमृत की धार बहे, नदिया उमड़े
हर घर आँगन साँझ सवेरे ममता का ही साज सजे |
मानव में माधव दीखे, क्या धरा स्वर्ग सी बन पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??