Monthly Archives: July 2012

मौन समर्पण

मौन समर्पण

मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
निरन्तर विकसित होते एक पुष्प की भांति |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब फैलाती हूँ मैं अपने पंख
बाँटने को जगत में
प्रेम, दया, करुणा और आनन्द की छाया
ताकि ढक जाए मेरा समस्त दुःख, अकेलापन और चिंताएँ
उन पंखों के तले |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब मैं कर लेती हूँ स्वयं को एकाकार
अपने चारों ओर के वातावरण में |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब होती हूँ चुपचाप
खोई हुई अपने ही संसार में |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब बहते हैं अश्रु मेरे नेत्रों से
क्योंकि करते हैं ये मुझे शान्त |
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब मैं शब्दों में सुनाती हूँ अपनी व्यथा कथा |
पर उस सबसे भी अधिक
मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को सौन्दर्यवान
जब मेरे पास नहीं होता कुछ कहने के लिये
जब मेरे पास नहीं होता कुछ करने के लिये
केवल एक अहसास होता है
निष्क्रियता और मौन समर्पण का |

शब्द अमरता पा जाते हैं

शब्द अमरता पा जाते हैं

शब्दों का अस्तित्व यही, पल भर में व्यर्थ वो हो जाते हैं
किन्तु मौन की भाषा को सब युगों युगों तक दोहराते हैं |
पल भर को एक कथा सुनाकर शब्द राह अपनी चल देते
किन्तु मौन में जड़े शब्द निज छाप अमिट पड़वा जाते हैं ||
शब्दों से कोलाहल बढ़ता, नित नवीन कोई घटना घटती
और विचित्र कोई अर्थ बताकर इतिहासों में गुम हो रहती |
किन्तु मौन के अर्थ अनेकों, शान्त हृदय से समझे जाते
और नया एक काव्य रचाकर अजर अमर वो हो जाते हैं ||
शब्दों का क्या, होठों पर आते ही बासी हो जाते हैं
और पकड़ ले अगर लेखनी, मूक चित्र तब बन जाते हैं |
किन्तु मौन की अथक साधना में है देखो कितनी क्षमता
भाव होठ तक आते आते अमृत ही बरसा जाते हैं ||
बिना मौन का साधन करके शब्द अगर होठों पर आते
अर्थहीन, बलहीन बने वे भाव नहीं पूरे कह पाते |
पालें मौन के गर्भ तो उनमें अनगिन भाव तरंगित होते
अमिट छाप तब छोड़ें मन पर, सार्थकता वे पा जाते हैं ||
इसीलिये अर्थों को खोजो मौन की गहराई में जाकर
मत उलझाओ शब्दों में उनकी उस अनुपम सुंदरता को |
शब्दों का अस्तित्व शून्य है, पल भर में ही खो जाएगा
मौन की भाषा में सजकर ही शब्द अमरता पा जाते हैं ||

प्रेम का लक्ष्य, बन जाना है मार्ग

प्रेम का लक्ष्य

प्रेम पहुँचता है अपनी पूर्णता पर
जब दो व्यक्ति
लाँघ जाते हैं सारी सीमाएँ प्रेम की
और खो जाते हैं एक दूसरे में
मिला देते हैं अपना अपना अस्तित्व
एक दूसरे में
रोप देते हैं बीज
नि:स्वार्थ मासूम प्रेम से युक्त नई सृष्टि का
और तब बन जाता है प्रेम
भक्ति और ध्यान
जो ले जाते हैं व्यक्ति को
मार्ग पर उसके चरम लक्ष्य के |
लक्ष्य ?
सांसारिक सुखों से ऊपर उठकर
संस्कारों का ऋण चुकाकर
मोक्ष की प्राप्ति का……

बन जाना है मार्ग

मैं चाहती हूँ समझना उसे कुछ इस तरह
कि कर सकूँ मैं वार्तालाप उसके साथ
अपने मौन में
स्वयं के विकास के लिये |
इसीलिये मुझे आरम्भ करनी है अपनी यात्रा
यम नियम सत्य अहिंसा आस्तेय प्रत्याहार
और
प्राणायाम के साथ |
मुझे गतिशील करना है अपने अंगों को
खोलना है अपने शरीर को
अपने जोड़ों, माँसपेशियों को
देना है बल, एकाग्रता और एकता |
महसूस करना है
प्रवाहित होती अपनी श्वासों को
नासारन्ध्रों में
रहना है प्रकृतिस्थ, चेतना के साथ |
मुझे सुननी है ध्वनि अपने भीतर की
आती हुई बाहर को |
अनुभव करना है कि जो है बाहर वह है भीतर |
देखना है स्वयं को जाते हुए विचारशून्यता की ओर
स्थिर होते हुए भीतर से |
मुझे अनुभव करना है अपनी शान्ति का
सुनना है मौन के अनहद नाद को |
बन्द आँखों से देखने हैं चमकते हुए तारे
पर्वत नदी वृक्ष वन
सरिता मिलती हुई सागर में |
मुझे नहीं बनने देना है स्वयं को यात्रा
बन जाना है मार्ग
जो ले जाता है मिलाने
स्व को उस शाश्वत सत्य से…………

काफ़ी है

काफ़ी है

क्या करना लम्बी सरगम का, बस एक रागिनी काफ़ी है |
कुछ चित्र बनाए हैं, उनमें ही रंग भरो तो काफ़ी है ||
मुझको गीतों से भरी एक मिल जाए यामिनी जीने को |
क्या करना ढेरों साज़ों का, बस एक तार ही काफ़ी है ||
बस मन्द मन्द ये बहे हवा और मधुर राग गुनगुना उठे |
क्या करना है मलयानिल का, बस गन्ध प्यार की काफ़ी है ||
जीवन की धूप से निकली ध्वनि लय भर दे हर जड़ चेतन में |
क्या करना बरखा की रुत का, बस बूँद ओस की काफ़ी है ||
दीपों की जगमग में मन के भावों को रूप नहीं मिलता |
क्या करना इनका, दामिनि की बस एक लपक ही काफ़ी है ||

तुझको बड़ी दूर जाना है

अभी बढ़ाया पहला पग है, अभी न मग को पहचाना है |
अभी कहाँ रुकने की वेला, तुझको बड़ी दूर जाना है ||
कहीं मोह के विकत भँवर में फँसकर सब कुछ खो मत देना |
कहीं समझकर सबको अपना जाग जाग कर सो मत रहना |
तुझको सावधान रहकर ही सबके मन को पा जाना है ||
और न कोई साथी, केवल अन्तरतम का स्वर सहचर है
साधन पथ का पथिक मनुज है, और साधना अजर अमर है |
तब फिर कहो शिथिलता कैसी, कैसे कहो व्यस्त बाना है ||
परिचित निज दुर्बलताओं से, आदर्शोन्मुख श्वास श्वास पर
भय मत खाना मंझधारों से, बढ़ते जाना लहर लहर पर |
बाधाओं को दूर भगा निज लक्ष्य तुझे पाते जाना है ||
रजकण हिमगिरी ज्यों बन जाता, जलकण ज्यों सागर हो जाता |
जैसे एक बीज ही बढ़कर वाट विशाल होकर छा जाता |
उसी भाँति तुझको भी जग के सारे मग पर छा जाना है ||
हो उच्छृंखल या श्रद्धानत या स्वच्छन्द विचरने वाला |
जैसा है मानव मानव है, जग की प्रगति इसी पर निर्भर |
अपनी दुर्बलताओं ही में इसे नया सम्बल पाना है ||
भय बाधा से भीति मानकर आगे पीछे कदम हटाना
यह इस पथ की रीत नहीं है, नहीं वीर का है यह बाना |
ह्रदय रक्त से ही नवयुग की आशा का साधन पाना है ||
निरत साधना में जो अपनी उसे न सुध आती है जग की |
अविरत गति चलने वाले को चिंता कभी न होती मग की |
शूल बिछे हों या अंगारे, पथ पर बढते ही जाना है ||

आओ हम सब झूला झूलें

आओ हम सब झूला झूलें

आज सुबह जब खिड़की से बाहर झाँका तो पार्क में लगे झूलों पर अचानक ही नज़र चली गई | सभी झूलों को रंग बिरंगे फूलों से सजाया गया था | पता लगा कि कल तीज का त्यौहार है इसलिए इन झूलों को अभी से सजाया जा रहा है क्योंकि कल सुबह से इन झूलों पर लड़कियाँ और महिलाएँ झूलना शुरू कर देंगी | आज सोसायटी में मेंहदी लगाने वाली को भी बुलाया गया है ताकि महिलाएँ और लड़कियाँ अपने अपने हाथों पैरों पर मेंहदी लगवा सकें | सब कुछ देखकर और सारी बात जानकर बहुत अच्छा लगा |

वैसे देखा जाए तो अब त्यौहारों में पारम्परिकता की कमी आई है, दिखावा बढ़ गया है | मँहगे से मँहगे उपहार देना और औपचारिकता के तौर पर कुछ देर के लिये “गेट टुगेदर” कर लेना ही त्यौहार माना जाने लगा है | जबकि अपने पुराने दिनों की याद करते हैं तो ध्यान आता है कि कई रोज़ पहले से बाज़ारों में घेवर मिलने शुरू हो जाया करते थे | बेटियों के घर घेवर तथा दूसरी मिठाइयों के साथ वस्त्र तथा श्रृंगार की अन्य वस्तुएँ जैसे मेंहदी और चूड़ियाँ आदि लेकर भाई जाया करते थे जिसे “सिंधारा” कहा जाता था | बहू के मायके से आई मिठाइयाँ जान पहचान वालों के यहाँ “भाजी” के नाम से बंटवाई जाती थीं | और इसके पीछे भावना यही रहती थी कि अधिक से अधिक लोगों का आशीर्वाद तथा शुभकामनाएँ मिल सकें | यों तो सारा सावन ही बागों में और घर में लगे नीम आदि के पेड़ों पर झूले लटके रहते थे और लड़कियाँ गीत गा गाकर उन पर झूला करती थीं | पर तीज के दिन तो एक एक घर में सारे मुहल्ले की महिलाएँ और लड़कियाँ हाथों पैरों पर मेंहदी की फुलवारी खिलाए, हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ पहने सज धज कर इकट्ठी हो जाया करती थीं दोपहर के खाने पीने के कामों से निबट कर और फिर शुरू होता था झूले के धमाल | दो महिलाएँ झूले पर बैठती थीं और बाक़ी महिलाएँ गीत गाती उन्हें झोटे देती जाती थीं और झूला झूलने के साथ साथ चुहलबाज़ी भी चलती रहती थी | सावन के गीतों की वो झड़ी लगती थी कि समय का कुछ होश ही नहीं रहता था | वक़्त जैसे ठहर जाया करता था इस मादक दृश्य का गवाह बनने के लिये |

हम सभी जानते हैं कि भारत त्योहारों और पर्वों का देश है | त्यौहारों का इतना उत्साह, इतने रंग सम्भवतः हमारे ही देश में देखने को मिलते हैं | यहाँ त्यौहार केवल एक अनुष्ठान मात्र नहीं होते, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक तारतम्य, प्राचीन सभ्यताओं की खोज एवं अपने अतीत से जुड़े रहने का सुखद अहसास भी होता है । बहुत सारे लोक पर्व इस देश में मनाए जाते हैं | इन्हीं पर्वों में से एक है तीज का पर्व | कल यानी २२ जुलाई को हरियाली तीज का उल्लासमय पर्व है | सबसे पहले तो इस पर्व की बधाई | श्रावण मास में जब समस्त चराचर जगत वर्षा की रिमझिम फुहारों में सराबोर हो जाता है, इन्द्रदेव की कृपा से जब मेघराज मधु के समान जल का दान पृथिवी को देते हैं और उस अमृतजल का पान करके जब प्यासी धरती की प्यास बुझने लगती है और हरा घाघरा पहने धरती अपनी इस प्रसन्नता को वनस्पतियों के लहराते नृत्य द्वारा जब अभिव्यक्त करने लगती है, जिसे देख जन जन का मानस मस्ती में झूम झूम उठता है तब उस उल्लास का अभिनन्दन करने के लिये, उस मादकता की जो विचित्र सी अनुभूति होती है उसकी अभिव्यक्ति के लिये “हरियाली तीज” अथवा “मधुस्रवा तीज” का पर्व मनाया जाता है | “मधुस्रवा अथवा मधुश्रवा” शब्द का अर्थ ही है मधु अर्थात अमृत का स्राव यानी वर्षा करने वाला | अब गर्मी से बेहाल हो चुकी धरती पर जल से बढ़कर और कौन सा अमृत हो सकता है ? वैसे भी जल को अमृत ही तो कहा जाता है |

मान्यता है कि पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने जब सौ वर्ष की घोर तपस्या करके शिव को पति के रूप में प्राप्त कर लिया तो श्रावण शुक्ल तृतीया को ही शिव के घर में उनका पदार्पण हुआ था | दक्ष के यज्ञ में पत्नी सती के होम होने के बाद क्रोध में दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करके शिव हिमशिखर पर तपस्या करने चले गए थे | उसी समय सती ने पर्वतराज हिमालय के यहाँ उनकी पत्नी मैना के गर्भ से पार्वती के रूप में जन्म लिया | वह कन्या उमा तथा गौरी के नाम से भी विख्यात हुई । उस समय नारद कन्या को आशीर्वाद देने आए और भविष्यवाणी करते गए कि इस कन्या का विवाह शिव के साथ होगा | इसे सुन पर्वतराज हिमालय सन्तुष्ट हो गए | पार्वती विवाह योग्य हुईं तो हिमालय ने नारद की भविष्यवाणी का स्मरण करके एक सखी के साथ पार्वती को हिमालय के शिखर पर तप कर रहे शिव की सेवा के लिये भेज दिया |

इसी बीच ब्रह्मा के वरदान से वारंगी और वज्रांग के यहाँ तारक नाम के एक पुत्र ने जन्म लिया | तारक जन्म से ही उत्पाती था | जब बड़ा हुआ तो उसने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए आसुरी तप किया | तारक के तप से शिव प्रसन्न हुए और औघड़दानी ने तारक से वर माँगने के लिये कहा | तारक ने शिव से वर माँगा कि करोड़ों वर्षों तक उसका समस्त लोकों में राज्य रहे | शिव से वर प्राप्त करने के बाद तारक और भी अधिक बलशाली एवं क्रूर हो गया | उसने समस्त देवलोक पर अधिकार कर लिया और देवताओं को तरह तरह से त्रस्त करना आरम्भ कर दिया | तारकासुर ने देवलोक में महासंहार मचा दिया | अब नारद ने उपाय बताया कि केवल शिव के वीर्य से उत्पन्न बालक ही तारकासुर का संहार कर सकता था | किन्तु शिव की पत्नी सती तो दक्ष के यज्ञ में होम हो चुकी थीं | पत्नी के बिना पुत्र कैसे उत्पन्न होता ? शिव कठोर तपस्या में लीन थे, इस स्थिति में उन्हें दूसरे विवाह के लिये कैसे मनाया जा सकता था ? तब देवताओं को एक उपाय सूझा | उन्होंने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिये भेजा | किन्तु शिव ने क्रोध में आकर कामदेव को ही भस्म कर दिया और हिमालय छोड़कर कैलाश पर्वत पर चले गए | तब नारद ने पार्वती से आग्रह किया कि वे शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये तपस्या करें | नारद के आग्रह पर १०० वर्षों तक पार्वती ने घोर तपस्या की | किन्तु शिव तपस्या में ऐसे लीन हुए कि पार्वती की तपस्या की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया | स्थिति यहाँ तक पहुँच गई की शिव की तपस्या में पार्वती को अपने तन का भी होश नहीं रहा | खाना पीना पहनना ओढ़ना सब भूल गईं | उसी स्थिति में उन्हें “अपर्णा” भी कहा जाने लगा | अन्त में पार्वती की तपस्या रंग लाई और अनेक प्रकार से पार्वती की परीक्षा लेने के बाद शिव उनसे प्रसन्न हुए और अपना तप पूर्ण करने के बाद पार्वती के साथ विवाह किया | शिव-पार्वती के मिलन से उत्पन्न कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया | मान्यता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया को ही शिव के घर में पार्वती पदार्पण हुआ था | यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि शिव पार्वती का पुनर्मिलन लोक कल्याण की भावना से हुआ था न कि किसी काम भावना के कारण | इसीलिये तो शिव ने उनके यज्ञ में बाधा डालने आए कामदेव को भी भस्म कर दिया था | अतः शिव पार्वती के मिलन का यह पर्व भी इसी प्रकार सात्विक भावना के साथ मनाया जाना चाहिये |

इस प्रकार की तीन तीज आती हैं एक वर्ष में | हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज | कजरी तीज के अवसर पर दूध दही तथा पुष्पों से नीम की पूजा की जाती है और शिव पार्वती से सम्बन्धित गीत गाए जाते हैं | यह पर्व भाद्रपद कृष्ण तृतीया को मनाया जाता है | कजरी तीज से पूर्व रात्रि को महिलाएँ रात भर कजरी खेलती हं| |

सबसे कठिन पूजा होती है हरतालिका तीज की | तीन दिनों तक महिलाएँ व्रत रखती हैं | भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में हरतालिका तीज की पूजा होती है | कहा जाता है कि भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी ।

श्रावण शुक्ल तृतीया को राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरयाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश में समान रूप से हरियाली तीज का त्यौहार मनाया जाता है | इसमें पारम्परिक रूप से चंद्रमा तथा वट वृक्ष की पूजा की जाती है और लड़कियाँ तथा महिलाएँ सावन से सम्बन्धित लोक गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं | विविध प्रकार के पकवान इस दिन बनाए जाते है | कुछ स्थानों पर मेलों का भी आयोजन किया जाता है | नेपाल में भी यह त्यौहार इतने ही उत्साह के साथ मनाया जाता है और पशुपतिनाथ मन्दिर में पूजा अर्चना की जाती है | वृन्दावन में हरियाली तीज पर राधा कृष्ण की पूजा की जाती है उनके दिव्य प्रेम का सम्मान करने के लिये तथा इस कामना से कि सभी महिलाओं का उनके पति के साथ उसी प्रकार का दिव्य प्रेम सम्बन्ध बना रहे | साथ ही जिस प्रकार पार्वती को उनका इच्छित वर प्राप्त हुआ उसी प्रकार हर लड़की को उसका मनचाहा वर प्राप्त हो इस कामना से कुँआरी लड़कियाँ तीज का पर्व मनाती हैं |

कहने का तात्पर्य है कि, क्योंकि शिव पार्वती का यह सम्मिलन तीज के दिन ही हुआ था | सम्भवतः यही कारण है कि इस दिन सौभाग्यवती महिलाएँ अपने सौभाग्य अर्थात पति की दीर्घायु की कामना से तथा कुँआरी कन्याएँ अनुकूल वर प्राप्ति की कामना से इस पर्व को मनाती हैं | अर्थात श्रावण मास का, वर्षा ऋतु का, मानसून का अभिनन्दन करने के साथ साथ शिव पार्वती के मिलन को स्मरण करने के लिये भी इस हरियाली तीज को मनाया जाता है | जैसा कि सब ही जानते हैं, इस अवसर पर महिलाएँ और लड़कियाँ सज संवर कर, हाथों में सौभाग्य की प्रतीक मेंहदी लगाकर झूला झूलने जाती हैं | तो आइये हम सब भी मिलकर अभिनन्दन करें इस पर्व का तथा पर्व की मूलभूत भावनाओं का सम्मान करें | इस पर्व की मूलभूत भावनाएँ सामाजिक होने के साथ साथ आध्यात्मिक भी हैं – और वो इस प्रकार कि दाम्पत्य जीवन केवल काम भावना का ही नाम नहीं है, वरन पति पत्नी को परस्पर प्रेम भाव से साथ रहते हुए, एक दूसरे का सम्मान करते हुए, लोक कल्याण की भावना से जीवन व्यतीत करना चाहिए ताकि कार्तिकेय जैसा पुत्र उत्पन्न हो जो समाज को समस्त कष्टों से मुक्ति दिला सके | साथ ही सावन की मस्ती को न भूलें, क्योंकि जब सारी पृकृति ही मदमस्त हो जाती है वर्षा की रिमझिम बूँदों का मधुपान करके तो फिर मानव मन भला कैसे न झूम उठेगा……… क्यों न उसका मन होगा हिंडोले पर बैठ ऊँची ऊँची पेंग बढ़ाने का……..

औरत

औरत

मैं देखती हूँ खिड़की से बाहर
गिरती हुई ओस की बूँदों को
जैसे हो कोई मोती
गिरा हुआ कमलपत्र पर
शान्त, सुन्दर, आकर्षक
किन्तु नहीं कर सकती इस पर अधिकार |
नहीं जड़ा जा सकता इसका सौन्दर्य मेरी अँगूठी में |
देखना ही होगा पर्याप्त |
तभी में देखती हूँ
भोर के सूर्य की रक्तिम-स्वर्णिम किरणें
भर देती हैं इस मोती को इन्द्रधनुष के रंगों से |
तभी धीरे धीरे चढ़ती है धूप
कुम्हलाती हुई समस्त प्रकृति को
जिसके साथ ही
सूख कर नष्ट हो जाता है वो मोती
वो ओस की बूँद
जो थी
शान्त, सुन्दर, आकर्षक
गिरी हुई कमलपत्र पर
इन्द्रधनुषी रंगों से सजी |
ओस की बूँदें खो देती हैं अपना आकर्षण
अपनी शान्ति
अपना सौन्दर्य
वैसे ही, जैसे कोई छोटी बच्ची
खो देती है अपना शैशव
बढ़ती उम्र की धूप के साथ
झेलती हुई यातनाएँ
कुम्हलाती हुई, मसली जाती
और बन जाती है
“दुखियारी” औरत |

कजरारी बरसात

कजरारी बरसात

सावन की रिमझिम क्या प्यासी धरती को बहला पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
चढ़ी जवानी मेघ बावरे पर, बौराया सा बरसे
गरज तरस कर कहे पपीहे से, पागल अब क्यों तरसे |
हर बादल से प्यास पपीहे की बोलो क्या मिट पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
सिहर सिहर पुरवैया डोले, धरती भी पगलाई है
इठलाई धरती पर भी तो नई जवानी आई है |
फूला हारसिंगार, मगर क्या कोयल राग सुना पाएगी
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ?
बादल की ताधिन मृदंग पर कल का प्रात है चहक रहा
इन्द्रधनुष के सात सुरों की सरगम सुन वह बहक रहा |
मगर अन्हरिया रात गगरिया मधु की क्या छलका पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
आज मचा तूफ़ान भयंकर, गोरी के मन हूक उठी
लख कर यह व्यभिचार जगत में, आज प्रकृति भी विकल हुई |
स्वर्ग प्रेम ममता का धरती कहो कभी क्या बन पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
प्रेम देवता के मंदिर पर द्रुपद सुता का चीर हरण
नारी के सम्मान को तज कर, आज उसी का गर्भ पतन |
मातृ शक्ति के आराधन की रीत कभी क्या चल पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??
माँ की ममता से अमृत की धार बहे, नदिया उमड़े
हर घर आँगन साँझ सवेरे ममता का ही साज सजे |
मानव में माधव दीखे, क्या धरा स्वर्ग सी बन पाएगी ?
कजरारी बरसात कभी क्या मेरा मन हुलसा पाएगी ??

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता

गुवाहाटी की शर्मनाक घटना पिछले कुछ दिनों से काफ़ी चर्चा में है | सम्भवतः उसी के चलते बागपत की पंचायत ने फैसला सुनाया की लड़कियों को अकेले घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, किसी पुरुष सदस्य के साथ बाहर आना जाना चाहिये | महिला आयोग की चीफ ममता शर्मा ने भी कुछ उसी अंदाज़ में बयान ज़ारी कर दिया की लड़कियों के साथ ऐसी दुर्घटनाएँ पश्चिम के अंधानुकरण के कारण होती हैं | यों देखा जाए तो काफ़ी अरसे से गरमा गरम बहस का विषय रहा है कि नारी को समाज में उसका सम्मान किस प्रकार दिलाया जाए | स्त्री शक्ति को एक किनारे कर देने वाले कन्या भ्रूण की हत्या जैसे अपराध को किस तरह रोका जाए | ऐसा क्या किया जाए कि हर स्त्री समाज में स्वयं को सुरक्षित अनुभव कर सके | खुल कर साँस ले सके | अपनी इच्छानुसार जीवन जी सके | असम जैसी शर्मनाक घटनाओं को रोकने के लिये क्या उपाय किये जाएँ | और सम्भवतः ऐसी ही घटनाओं से घबराकर और यह सोचकर कि भविष्य में लड़कियों के साथ ऐसी घटनाएँ न घटें – बागपत में पंचायत ने निर्णय लिया कि लड़कियाँ घर से बाहर जाएँ तो किसी पुरुष सदस्य को अवश्य लेकर जाएँ | बहरहाल, बागपत की बात जाने देते हैं, पर क्या इस प्रकार की समस्याओं पर चर्चा करने भर से ही समस्या का समाधान हो सकता है ?

भारत में तो नारी का सदा ही सम्मान होता आया है | भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसने सारी दुनिया को सन्देश दिया कि जिस देश में नारी शक्ति को सम्मान दिया जाता है उसी देश में देवता भी निवास करते हैं | पर हम देवताओं की बात छोड़ भी दें तो भी क्या हमारे देश में परिवारजनों से यही संस्कार मिलते हैं कि राह चलती लड़कियों के साथ छेड़ छाड़ की जाए ? आज जो अधिकाँश माता पिता गर्भ में ही कन्या भ्रूण को समाप्त करवा देते हैं उसके पीछे और बहुत सी बीमार मानसिकताओं के साथ साथ एक यह भी कारण है कि कल को लड़की बड़ी होगी और घर से बाहर पैर रखेगी तो न जाने कैसा सलूक उसके साथ हो | अगर कहीं कुछ उलटा सीधा घट गया तो कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह जाएँगे | कल को उसके शादी ब्याह में भी समस्या खड़ी हो जाएगी यदि लड़के वालों को उसके साथ हुए किसी दुष्कर्म का पता लग गया |

एक ओर तो आज की नारी पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर वो सारे कार्य कर रही है जिन पर पुरुष कभी अपना एकाधिकार समझता था – आज वह पुलिस की नौकरी में भी है, तो हवाई जहाज भी उड़ा रही है, तो स्पेस में भी जा रही है, तो वैज्ञानिक भी है – और भी अनेकों कार्य जिनके विषय में पुरुष को भ्रम था कि स्त्री नही कर सकती क्योंकि वह स्वभावतः कोमल होती है, आज स्त्री वही सब कार्य पूर्ण कौशल के साथ कर रही है | दूसरी ओर उस पर तरह तरह की पाबन्दियाँ लगाई जा रही हैं | बहुत से पुरुषों को सम्भवतः यह बात हजम नहीं हो रही है कि स्त्री उनसे बढ़कर कैसे हो गई | और इसीलिये आदेश सुनाए जा रहे हैं कि लड़कियाँ घर से बाहर जाएँ तो किसी पुरुष सदस्य को साथ लेकर जाएँ | सम्भवतः वे स्त्री को याद दिला देना चाहते हैं कि वह स्वभाव से कोमल है इसलिये अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकती |

अपने वैदिक और पौराणिक इतिहास पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि उस समय की नारी न केवल उच्च शिक्षा सम्पन्न हुआ करती थी और सभाओं में शास्त्रार्थ कर प्रकाण्ड पण्डितों की भी बोलती बन्द किया करती थी, अपितु युद्ध कला जैसी विधाओं में भी पारंगत होती थी | पर्दा प्रथा नहीं थी – क्योंकि परदे को उन्नति के मार्ग में अवरोध माना जाता था | इसके साथ साथ पिता की संपत्ति में उसका बराबरी का अधिकार होता था | पूर्ण रूप से स्वावलम्बी अथवा शस्त्र-शास्त्रादि में पारंगत होने के बाद ही उसका विवाह किया जाता था | पूरा अधिकार होता था उसे की यदि उसका पति गलत है तो उसका त्याग कर दे | और इतना ही नहीं, आवश्यकता पड़ने पर स्त्री युद्ध भूमि में भी जाती थी और उसका युद्ध कौशल देखकर शत्रु भी दंग रह जाया करता था | और इसके लिए वैदिक अथवा पौराणिक सन्दर्भों का ही स्मरण करने की क्या आवश्यकता है ? झाँसी की रानी तो इसी युग की देन थीं | फिर क्यों स्त्री की सुरक्षा का नाम लेकर उस पर पाबन्दियाँ लगाई जा रही हैं कि घर से बाहर अकेली न जाए, किसी पुरुष सदस्य को साथ लेकर जाए ? क्यों उस पर हुए अमानुषिक अत्याचारों की भर्त्सना करने के बजाए उसको ही दोषी ठहराया जा रहा है कि उसके पहनावे के कारण उसके साथ ऐसा होता है ? क्यों नहीं प्रयास किया जा रहा राष्ट्रीय स्तर पर, सामजिक स्तर पर और पारिवारिक स्तर पर कि महिलाओं के विषय में लोग अपनी सोच सकारात्मक बनाएँ ? इस तरह की घटनाओं से डरकर उसी को दोषी मानकर अथवा उस पर पाबंदियाँ लगाकर तो आप न केवल उस लड़की के मन में हीन भावना भर रहे हैं बल्कि इन असामाजिक तत्वों की हिम्मत को बढ़ावा भी दे रहे हैं | ऐसे डरने से अच्छा होगा कि उसे “सेल्फ डिफेंस” की ट्रेनिंग दिलवाएँ | भले ही इस ट्रेनिंग के बाद भी वो जमकर इस प्रकार के लोगों से लड़ न सके, पर उसकी पहल से प्रभावित होकर दूसरे लोग उसके बचाव के लिये निश्चित रूप से आगे आएँगे | और यदि नहीं भी आए तो भी कम से कम पुलिस के आने तक तो अपना बचाव कर ही सकती है | साथ ही इस तरह उसके आत्मविश्वास में भी वृद्धि होगी | साथ ही लड़की को अच्छे संस्कार दें, ताकि उसकी सोच अच्छी और परिपक्व हो | उसे अच्छी शिक्षा देकर स्वावलम्बी बनाएँ | उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखें | क्योंकि एक स्वस्थ, शिक्षित तथा स्वावलम्बी स्त्री पर आसानी से कोई टेढ़ी नज़र नहीं डाल सकता | ऐसा करने से पहले दस बार सोचेगा | साथ ही अच्छी और परिपक्व सोच वाली, अच्छी तरह से पढ़ी लिखी गुणी, स्वस्थ, स्वावलम्बी तथा अपनी रक्षा करने में सक्षम लड़की ही अपने “आज और कल” के साथ साथ देश का भविष्य भी सँवार सकती है तथा ऐसी संतानों को जन्म दे सकती है जो अच्छे संस्कारों से युक्त हो |

इसी बात पर एक कहानी याद हो आती है | भगवान बुद्ध से एक बार वैशाली के लोगों ने प्रश्न किया था “भगवन, हमारे यहाँ शत्रु का हमला होने वाला है… क्या करें…?” उत्तर में भगवान बुद्ध ने सबसे पहला प्रश्न उन लोगों से किया “आपके राज्य में कृषि की क्या स्थिति है ?”

“बहुत अच्छी भगवान, सिंचाई व्यवस्था बहुत अच्छी है, उत्तम किस्म के बीज किसानों को दिए जाते हैं, जिसके फलस्वरूप तीनों फसलें अपने निर्धारित समय पर और बहुत अच्छी होती हैं | किसानों से लगान नहीं के बराबर्लिया जाता है |”

“हूँ… और अर्थ व्यवस्था…?” भगवान ने आगे पूछा |

“बिल्कुल सुदृढ़ भगवान… खेती अच्छी तो अर्थ व्यवस्था अपने आप मज़बूत रहेगी | राजकोष भरा हुआ है | देश में कोई भूखा नंगा नहीं है | हर किसी के पास व्यवसाय है – रोज़गार है | हर किसी के लिये शिक्षा की पूर्ण व्यवस्था है |” लोगों का उत्तर था |

“और सैन्य व्यवस्था…?”

“भगवन, हमारी चतुरंगिणी सेना हर प्रकार के आधुनिक अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित है | शक्तिमान है तथा भली भाँति प्रशिक्षित भी है |”

कुछ देर भगवान सोचते रहे, फिर अचानक ही पूछ बैठे “अच्छा एक बात और बताएँ, राज्य में महिलाओं की क्या स्थिति है ?”

“हमारे यहाँ महिलाओं को न केवल पूर्ण स्वतन्त्रता है बल्कि पूरा पूरा सम्मान भी उन्हें प्राप्त है – फिर चाहे वह गणिका हो अथवा गृहस्थन…” लोगों का उत्तर था |

तब भगवान बुद्ध ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा “फिर आप किसी प्रकार की चिंता मत कीजिए | कोई भी शत्रु आपका कुछ अनर्थ नहीं कर सकता | जिस देश का किसान, युवा और नारी स्वस्थ हों, प्रसन्नचित्त हों, शिक्षित हों, स्वावलम्बी हों, सम्मानित हों, कोई भी शत्रु उस देश का किसी प्रकार का अनर्थ कर ही नहीं सकता |”

आज आवश्यकता है भगवान बुद्ध के इस्सी उपदेश का पालन करने की, न कि लड़कियों और महिलाओं पर अतार्किक रूप से रोक लगाने की – तभी स्वस्थ, सुन्दर और खुशहाल देश का सपना साकार हो सकेगा |

कन्या भ्रूण ह्त्या

कन्या भ्रूण ह्त्या

आज सुबह जब अखबार पढ़ने बैठी तो एक ऐसा समाचार पढ़ने को मिला कि मन प्रसन्न हो गया और साथ ही आशावान भी | समाचार छपा है कि हरियाणा (जींद) के गांव बीबीपुर में खाप महापंचायत ने वहाँ के युवा सरपँच सुनील जगलान के नेतृत्व में एक बहुत ही साहसिक कदम उठाया है | इस पंचायत में दो सौ महिला सदस्य शामिल हुईं और उन्होंने गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण पर रोक लगाने तथा कन्या भ्रूण गिराने को हत्या के बराबर का अपराध मानने की मांग की । साथ ही एक फोटो भी छपा है जिसमें एक महिला अपनी पाँच बच्चियों के साथ बैठी है और वह उन बच्चियों को ईश्वरीय कृपा मानती है | महिला सदस्यों की शिरकत और भ्रूण परीक्षण पर कोई फैसला – ऐसा इन खाप पंचायतों के इतिहास में पहली बार देखने को मिला है । देखा जाए तो एक ओर जहाँ हर कोई कन्या भ्रूण हत्या के विषय पर केवल परिचर्चा ही करता नज़र आता है वहीं इस खाप पंचायत ने इसे एक प्रकार से सामाजिक आन्दोलन का रूप दे दिया है | हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने बीबीपुर गांव के विकास के लिए एक करोड़ रुपये देकर ऐसी आवाज उठाने वाली महिलाओं का उत्साह बढ़ाया है । असंतुलित होते जा रहे लैंगिक अनुपात वाले हमारे देश में यह बहुत रचनात्मक पहल है । माना कि हरियाणा में सेक्स अनुपात सबसे अधिक असंतुलित है, किन्तु राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी कुछ अच्छी स्थिति नहीं है | १००० लड़कों पर जहाँ हरियाणा में ८३० लड़कियों का अनुपात है वहीँ पंजाब में ८४६, राजस्थान में ८८३ और दिल्ली में ८६६ लड़कियाँ १००० लड़कों पर हैं | और यह समस्या केवल अशिक्षित अथवा पिछड़े वर्ग तक ही सीमित नहीं है, पढ़े लिखे तथा आधुनिक कहे जाने वाले परिवारों में भी यह समस्या समान रूप से विद्यमान है | आज एक ओर लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर उन पर भाँति भाँति की रोक लगाई जा रही हैं वहीं गर्भ में पल रही बच्चियों को संसार देखने तक का अवसर नहीं दिया जा रहा | हरियाणा के इस गाँव से शिक्षा लेनी चाहिये |

कन्या भ्रूण हत्या – अर्थात जन्म से पूर्व गर्भ में ही कन्या संतान को मार डालने की प्रक्रिया | एक ऐसी ज्वलन्त समस्या जिसके समाधान के लिये बीबीपुर गाँव के लोगों की ही तरह देश भर में आन्दोलन चलाने होंगे | होता यह है कि हम लोग टी वी प्रोग्राम्स में, महिला संगठनों की मीटिंग्स वगैरा में इस विषय पर चर्चा तो ज़ोरों से करते हैं पर घर आते आते सब भूल जाते हैं | हम यह भी भूल जाते हैं कि नारी और पुरुष दोनों के सामान अनुपात से ही संसार आगे चल सकता है | किसी एक भी पक्ष को यदि नकार दिया गया तो इसका क्या हश्र हो सकता है इस बात का अनुमान ऊपर लिखे आँकड़ों से लगाया जा सकता है | यदि इसी तरह लड़कियों की जन्म दर गिरती रही तो सोचिये भविष्य में क्या होगा ? अभी कई प्रान्तों में बंगाल और असम तथा नेपाल से लड़कियाँ खरीद कर लाई जाती हैं जिससे कि उनके साथ लड़कों की शादी करके वंश को आगे चलाया जा सके | पर ऐसा कब तक होगा ? यदि इसी तरह कन्या भ्रूण की हत्या कराई जाती रही तो वो दिन दूर नहीं जब लाखों करोड़ों लड़के बिन ब्याहे रह जाएँगे | और उस समय देश में महिलाओं के प्रति अपराधों में कितनी वृद्धि होगी इसका तो बस अनुमान ही लगाया जा सकता है | कितनी भयावह स्थिति होगी वह जब कोई भी महिला सुरक्षित नहीं होगी ? क्योंकि sex तो मनुष्य की besic instinct है | उसके लिए लड़कियों के अभाव में या तो वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, या फिर महिलाओं पर बलात्कार की घटनाओं में वृद्धि होगी |

कितने अफ़सोस व शर्म की बात है कि जिस नारी शक्ति की हम पूजा करते हैं – कभी दुष्टों का संहार करने वाली माँ दुर्गा के रूप में, तो कभी ज्ञान का प्रसार करने वाली माँ सरस्वती के रूप में और कभी धन की वर्षा करने वाली माँ लक्ष्मी के रूप में – उसी नारी शक्ति को हम संसार में आने से पूर्व ही मार डालते हैं | आज उसी “देवी” को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है | आज का पाखण्डी समाज अपनी “जन्मदात्री” को ही जड़ से उखाड़ फेंकने में लगा हुआ है | बेटी के नाम पर सौ-सौ कसमें खाने वाले ही आज उसे कष्ट पहुँचाने में लगे हुए हैं | और उससे भी बड़ी सच्चाई यह है कि बेटी को “पराया धन” मानने वालों ने उसे कभी ह्रदय से “अपना” माना ही नहीं | वह तो अपने माता पिता के घर तक में “दूसरे की अमानत” ही बनकर रही सदा | उनके होश सँभालते ही उन्हें बताया जाने लगता है है कि उन्हें दूसरे घर जाना है | यहाँ तक कि बहुत से परिवारों में तो लड़की को उच्च शिक्षा भी केवल इसीलिये दिलाई जाती है कि वह एक योग्यता होगी अच्छा घर वर प्राप्त करने के लिये | और जैसा कि ऊपर भी लिखा है, ऐसा केवल अशिक्षित अथवा निम्न वर्ग में ही नहीं होता | बल्कि उच्च तथा शिक्षित वर्ग के लोग भी इसी परम्परा का वहन कर रहे हैं | यदि इस समस्या से मुक्ति पानी है तो सबसे पहली आवश्यकता है बीबीपुर के समान ही इस विषय में सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की | साथ ही आवश्यकता है प्रसव पूर्व जाँच तकनीक अधिनियम १९९४ को सख्ती से लागू किए जाने की । भ्रूण हत्या अथवा गर्भ का लिंग परीक्षण करने वालों के क्लीनिक सील किए जाने, उनका लाइसेंस निरस्त किये जाने तथा उन पर जुर्माना किए जाने का प्रावधान की आवश्यकता है ।

अभी हाल ही में टीवी पर आमिर खान का नया शो सत्यमेव जयते शुरू हुआ | जिस में पहला विषय ही कन्या भ्रूण हत्या के सन्दर्भ में उठाया गया | और उस शो में इस समस्या से सम्बंधित जो वास्तविक सत्य सामने आये वे वास्तव में दिल को दहला देने वाले थे | ऐसा नहीं कि इस कटु सत्य से लोग अनभिज्ञ थे, किन्तु कबूतर के समान आँखें मूँदे बैठे थे | सबसे अधिक कटु सत्य तो यह सामने आया कि इस जघन्य अपराध की शुरुआत डाक्टर्स के द्वारा ही की गई | ७० के दशक में जब जनसँख्या वृद्धि पर काबू पाने के उपाय खोजे जा रहे थे तब डाक्टर्स ने ही यह सुझाव दिया था कि यदि गर्भ में ही लिंग की जाँच कर ली जाए तो जिन लोगों को बेटी नहीं चाहिए उनका गर्भ गिराया जा सकता है और इस तरह काफ़ी हद तक जनसँख्या को बढ़ने से रोका जा सकता है | उस समय सम्भवतः इस प्रकार का सुझाव देने वाले डाक्टर्स को भी यह अनुमान नहीं रहा होगा कि इसके कितने भयावह परिणाम हो सकते हैं भविष्य में | क्योंकि हमारे देश में तो हर कानून, हर सुविधा को अपने स्वार्थ के अनुसार तोड़ना मरोड़ना लोगों को अच्छी तरह आता है | यह विडंबना ही है कि जिस देश में कभी नारी को गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ, वहीं अब कन्या के जन्म पर परिवार और समाज में दुख व्याप्त हो जाता है l सिर्फ बेटे की चाह में अनगिनत मांओं की कोख उजाड़ दी जाती है l पर क्या इस क्रूरता के लिए केवल डॉक्टर ही उत्तरदायी है जो प्रसवपूर्व लिंग जाँच करके इस हत्या को अंजाम देता है ? क्या वे माता पिता इस अपराध के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं जो सिर्फ़ और सिर्फ़ बेटा ही पाना चाहते हैं ? क्या इस जघन्य अपराध को सिर्फ कड़े कानून बनाकर और डाक्टर्स को सज़ा देकर ही रोका जा सकता है ? जब तक हम अपनी संकीर्ण मानसिकता का त्याग नहीं करेंगे तब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता l आवश्यकता है अपनी सोच बदलने की | बेटी के जन्म लेते ही हम क्यों सोच में पड़ जाते हैं कि कल यह बड़ी होगी तो इसके हाथों में मेंहदी भी रचानी पड़ेगी, इसके लिए “योग्य वर खरीदने” के लिये दहेज़ का प्रबंध भी करना होगा ? इसके बजाए यदि हर कोई उसे शिक्षित करके स्वाबलम्बी बनाने की दिशा में प्रयास करे तो सोच अपने आप बदल सकती है | इन सब दकियानूसी विचारधाराओं से मुक्ति पानी होगी | लड़कियों को घर की लक्ष्मी या देवी कह देने भर से उसे उसके अधिकार और सम्मान नहीं मिल जाते l महिलाओं के सामजिक बहिष्कार के रूप में कन्या भ्रूण हत्या की समस्या आज भारत में विकराल रूप ले चुकी है और आज यह हज़ारों करोड़ रुपयों का व्यापार बन चुका है | जबकि १९९४ में लिंग जाँच करके कन्या भ्रूण को समाप्त करना सरकार की ओर से गैर कानूनी क़रार दे दिया गया है |

पर इस भयावह सत्य को झुठलाया जा सकता है, बशर्ते कि बीबीपुर गान्व्केलोगों के समान ही हम सब मिलकर संकल्प लें कि न तो हम गर्भ में पल रहे बच्चे की लिंग जाँच कराएँगे और न अपने किसी परिचित या रिश्तेदार को ऐसा करने देंगे | साथ ही यह भी कि जो डाक्टर गर्भस्थ शिशु की लिंग जाँच करके कन्या भ्रूण की हत्या जैसा जघन्य अपराध करेंगे उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवाने का का प्रयास करेंगे | क्योंकि कन्या भ्रूण हत्या से न केवल महिलाओं के प्रति अपराधों में बढ़ोतरी होगी, बल्कि आने वाले समय में जब केवल पुरुष ही अधिक रह जाएँगे तो संसार का अन्त तो निश्चित ही है | अरे हमारा देश तो ऐसा देश है जहाँ तीन ख़ास ख़ास departments अनादिकाल से महिलाओं के ही पास हैं – सुरक्षा यानी Defense Ministry माँ दुर्गा के पास है, तो finance ministry अर्थात सहन का विभाग माँ लक्ष्मी के पास है, और ज्ञान विज्ञान और साहित्य संगीत का विभाग यानी knoeledge, entertenment & science ministry माँ सरस्वती के सौंपी गई है | फिर क्यों इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं हम ????????? हालाँकि इस विषय में बीबीपुर गाँव के अतिरिक्त पंजाब के एक गाँव ने भी आदर्श स्थापित किया है जहाँ १००० लड़कों पर १४०० लड़कियों का औसत है | केरल में १००० लड़कों पर १०८४ लड़कियों का अनुपात है |

अन्त में यही कहना चाहूँगी कि इन कलियों को मुस्कुराने का, खिलने का तथा अपनी सुगंध से संसार को सुगन्धित करने का अवसर दीजिए | ये कलियाँ ही तो पुष्प बनकर बाग की पहचान बनती हैं | यदि इन्हें ही उजाड़ दिया गया, खिलने से पहले ही तोड़ कर फेंक दिया गया, तो नवीन सृष्टि की रचना कैसे होगी ? इन्हें अबला मत समझिए | इसके आगमन पर शोक मत मनाइए – क्योंकि यह वही देवी है जिसे आप लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती के रूप में सदियों से पूजते आ रहे हैं | या फिर मान लीजिए कि आपकी वो देवी पूजा मात्र दिखावा है | मान लीजिए कि नारी शक्ति, नारी भक्ति, का जो नारा हम लगाते हैं वो खोखला है | आँगन में तुलसी के रूप में उसकी पूजा अर्चना बंद कर दीजिए | माँ का सम्मान करना बंद कर दीजिए | क्योंकि माँ भी तो नारी है है | रक्षा बन्धन और भाई दूज जैसे त्यौहारों का ढोंग बंद कर दीजिए, क्योंकि ये त्यौहार तो होते ही बहनों के साथ हैं……………..

पर नहीं मुझको पता

पर नहीं मुझको पता

गीत रच डाले अनेकों, सुर अनेकों हैं मिलाए |
पर नहीं मुझको पता है छन्द क्या और राग क्या ||
मूर्ति को सर नवाया या कि पत्थर को छुआ
कौन मेरा ध्येय, किसका नाम मैंने है लिया |
है मेरा आराध्य मेरा प्रेम और कर्तव्य मेरा
पर नहीं मुझको पता आदर्श की है बात क्या ||
सिन्धु की पहचान ना, ना ही पता कुछ बूँद का
कौन है वह सीप जिससे जन्म मोती का हुआ |
हो रही हूँ आज विह्व्हल देख नभ में बादलों को
पर नहीं मुझको पता है स्नेह की बरसात क्या ||
मोह के भ्रमजाल में पड़ जीव आकुल है मेरा
चाहता है लीन होना शून्य में वह सर्वदा |
बन्द हों या हों खुले, पट खटखटाए हैं सदा
पर नहीं मुझको पता है स्वर्ग की सौगात क्या ||

जीवन

सतत प्रवाहित सरिता के सम जीवन चलता जाता है |
पीछे नहीं लौटता, हर पल आगे बढ़ता जाता है ||
उद्वेगों की मस्त तरंगें उद्वेलित होती रहतीं
और मर्यादारूपी तट से टकराकर विचलित होतीं |
किन्तु समय की गति से उनका नियम कहीं खो जाता है
और स्वच्छन्द बना मन हर पल ऊँचा उड़ता जाता है ||
सुख या दुःख के झोंके जीवन में कुछ हलचल कर जाते
अनगिन रंगों और रूपों के अनुभव वे कुछ दे जाते |
आशा और निराशा ही हैं उसके सीप और घोघे
इनको ही पाकर वह तो नित नित लहराता जाता है ||
कितने मोड़ पड़े जीवन की धारा में, है किसे पता
कितने घटनारूपी जलचर छिपे यहाँ, है किसे पता |
किन्तु समय की तेज़ हवा में उठ गिर बहता जाता है
और अन्त में चरम लक्ष्य में वह फिर मिलता जाता है ||