अध्यात्म और मनोविज्ञान

अध्यात्म और मनोविज्ञान

अक्सर लोग वैराग्य के अभ्यास द्वारा मन का निग्रह करके ईश्वर प्राप्ति की बात करते हैं | यह प्रक्रिया अध्यात्म की प्रक्रिया है | यहाँ हम बात कर रहे हैं अध्यात्म और मनोविज्ञान के परस्पर सम्बन्ध की | क्या सम्बन्ध है आपस में अध्यात्म और मनोविज्ञान का ? क्या अध्यात्म के द्वारा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा सम्भव है ? किन परिस्थितियों में मनुष्य भ्रमित हो सकता है ? तो, सबसे पहले विचार करते हैं कि मनुष्य भ्रमित कब होता है ?

भय व आतंक के वातावरण में मनुष्य लक्ष्यच्युत हो जाता है, उसे कर्तव्याकर्तव्य का भान नहीं रहता, और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में कई बार वह ग़लत निर्णय ले बैठता है | यह भय किसी भी बात का हो सकता है | अक्सर सुनने में आता है कि प्रेम करने वाले नवविवाहितों को “ऑनर किलिंग” के नाम पर मौत के घाट उतार दिया गया | कहीं किसी दादी ने अपनी लड़की के सर से भूत का साया उतारने के लिये अपनी ही पोती की बलि दे दी | कहीं किसी पुत्र ने संपत्ति विवाद के चलते अपने माता पिता को ही मौत की नींद सुला दिया | कहीं विवाहेतर सम्बन्धों के कारण पति अथवा पत्नी ने अपने जीवन साथी की ही जान ले ली | इनमें ये मनोविकार कहीं समाज के भय से तो कहीं धर्म के भय से आ जाते हैं | कहीं बिना किसी भय के भी केवल झूठे अहंकार के कारण भी ऐसी स्थिति हो जाती है | कहीं किसी अन्य कारण से भी लोग अनुचित कर्म कर जाते हैं | जैसे अभी पिछले दिनों आमिर खान के शो “सत्यमेव जयते” में एक दिल दहला देने वाली घटना का पता चला कि एक दादा ने अपनी ही चार पाँच बरस की पोती को अपनी हवस का शिकार बना डाला, आदि आदि… ऐसी पाशविकताएँ क्या स्वस्थ मनोवृत्ति वाले लोग कर सकते हैं ? वास्तव में ऐसे लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग हैं | किसी न किसी प्रकार की कुंठा से ग्रस्त हैं ये लोग | कहीं कोई एथलीट खेल में प्रथम आने के लिये नशीली दवाओं का सेवन करता पकड़ा जाता है | यह प्रतिष्ठा का भय है | धर्म का भय, लोक मर्यादा का भय, जाति अथवा समाज का भय, मान प्रतिष्ठा का भय – किसी प्रकार का भी भय मनुष्य को विक्षिप्त कर सकता है | और इन सबसे भी बढ़कर होता है मृत्यु का भय | हम अपने रास्ते यातायात के नियमों के अनुकूल गाड़ी चला रहे हैं कि अचानक ऐसा होता है कि किसी दूसरी कार का ड्राइवर बिना आगे पीछे दाएँ बाएँ देखे गाड़ी सड़क पर ले आता है | उस समय दो ही बातें हो सकती हैं – यदि हममें समझदारी है, साहस है, तो हम सफ़ाई से अपनी गाड़ी एक ओर को बचाकर निकाल ले जाने का प्रयास करेंगे | इतने पर भी यदि दुर्घटना घट जाती है तो उसमें हमारा कोई दोष नहीं होगा | किन्तु यदि हममें साहस का अभाव है और हम आशंकित अथवा भयभीत हो जाते हैं तो हमारी गाड़ी किसी दूसरी गाड़ी से अवश्य ही टकराएगी और हम अपने साथ साथ दूसरी गाड़ी के ड्राइवर को भी दुर्घटना का शिकार बना देंगे | कभी कभी कुछ मन्दबुद्धि लोग सत्ता, धन या पद के दम्भ में भी लक्ष्यच्युत होकर उल्टे सीधे काम कर बैठते हैं | अभी हाल ही में गुवाहाटी में जो कुछ घटा, पहले भी ऎसी घटनाएँ घटती रही हैं – यह किसी प्रकार का भय न होकर झूठे दम्भ का परिणाम था | क्योंकि हमारे दम्भ पर, अहंकार पर, भय पर, क्रोध पर, मोह पर, लोभ पर हमारा नियन्त्रण नहीं है | आतंकित अथवा भयग्रस्त होकर किसी भी प्रकार का अनुचित कार्य कर बैठना भ्रमित होना है | इसी प्रकार मोहवश, क्रोधवश, लोभवश अथवा अहंकारवश मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है, भ्रमित हो जाता है | अतः इस भ्रम से मुक्ति पाने के लिये मन से मृत्यु का तथा अन्य किसी भी प्रकार का भय दूर करके, व्यर्थ के मोह, लोभ, क्रोध अथवा अहंकार से मुक्त होकर लक्ष्यप्राप्ति की ओर अग्रसर होना आवश्यक है | ज्ञानी पुरुष के साथ यह स्थिति नहीं आती, क्योंकि उसे पूर्ण सत्य अर्थात जीवन के अन्तिम सत्य का ज्ञान हो जाता है | जिसे यह ज्ञान नहीं होता उसे ही दिशा निर्देश की आवश्यकता होती है |

यही कार्य श्रीकृष्ण ने किया | अर्जुन ने जब दोनों सेनाओं में अपने ही प्रियजनों को आमने सामने खड़े देखा तो उनकी मृत्यु से भयाक्रान्त हो श्री कृष्ण की शरण पहुँचे “शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” तब भगवान ने सर्वप्रथम उनके मन से मृत्यु का भय दूर किया | मृत्यु को अवश्यम्भावी, देह को असत् तथा आत्मा को सत् बताते हुए अर्जुन को लोकमर्यादानुसार धर्ममार्ग पर चलते हुए लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग बताया | उनका लक्ष्य उन्हें बताया | थोड़ी फटकार देते हुए उनसे कहा कि जब तू अशोच्य के विषय में शोक करता है तो फिर बुद्धिमानों की भाँति बातें करने का नाटक क्यों करता है ? तू तो मुझे बिल्कुल उन्मत्त जान पड़ता है जो मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्पर भावों को एक साथ दिखा रहा है | जबकि वास्तवकिता तो यह है कि आत्मज्ञानी न तो मृत वस्तुओं के विषय में शोक करता है और न ही जीवित वस्तुओं के विषय में कुछ सोचता है | जिस प्रकार शरीर की कौमार, यौवन और जरा ये तीन अवस्थाएँ होती हैं उसी प्रकार एक चौथी अवस्था भी होती है – देहान्तर प्राप्ति की अवस्था | जिस प्रकार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करने पर आत्मा न तो मरती है और न ही पुनः उत्पन्न होती है, उसी प्रकार एक देह की समाप्ति पर आत्मा नष्ट नहीं हो जाती और न ही दूसरी देह में प्रवेश करने पर उसकी पुनरुत्पत्ति ही होती है : “अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत !” २/१३ स्वप्न व माया के शरीर की भांति ये सब शरीर अन्तवन्त हैं | जबकि आत्मा नित्य और निर्विकार है | अतः आत्मा को नित्य और निर्विकार मानकर तू युद्ध कर |

अर्जुन को अभी भी संशय था कि भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों के साथ युद्ध करना धर्मविरुद्ध होगा | इस संशय को दूर करने के लिये ही कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि आत्मा अकर्ता है | और जब आत्मा अकर्ता है तो उसके मरने, मारने, जलने, गलने जैसी क्रियाएँ हो ही नहीं सकतीं | ये सब तो स्थूल शरीर के धर्म हैं | और यदि आत्मा को लोकप्रसिद्धि के अनुसार अनेक शरीरों की उत्पत्ति और विनाश के साथ साथ उत्पन्न और नष्ट होता हुआ मान भी लें तो भी इस विषय में शोक करना उचित नहीं, क्योंकि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मर चुका है उसका पुनर्जन्म निश्चित है | अतः युद्ध करना धर्मसंगत है | और क्षत्रिय का तो धर्म ही युद्ध करना है | यदि तू युद्ध किये बिना ही पीछे हट गया तो तिरस्कार और दया का पात्र होगा | युद्ध करते करते यदि वीरगति को प्राप्त हुआ तो स्वर्ग में जाएगा और सौभाग्य से यदि जीत गया तो पृथिवी का भोग करेगा | वैसे भी तेरा अधिकार कर्म करने में है न कि कर्मफल में | इस प्रकार अर्जुन के मन से मृत्यु का भय दूर करने के लिये आत्मा के विषय में बताकर उसके मन में ज्ञान का बीजारोपण किया कृष्ण ने | क्योंकि डाक्टर या वैद्य का एक कर्तव्य यह भी है कि यदि मरीज़ के मन में उसकी बीमारी को लेकर किसी प्रकार का भ्रम है तो उस भ्रम को दूर करने के लिये वह मरीज़ को हर बात की सही सही जानकारी दे | और यही कार्य भगवान ने किया |

जब जब भी इस प्रकार के संशय की स्थिति आती है कि व्यक्ति को कर्म अकर्म का ज्ञान नहीं रहता तब तब श्रीकृष्ण जैसे ही किसी मनश्चिकित्सक की आवश्यकता होती है | रामचरितमानस में एक प्रसंग आता है कि जामवंत, हनुमान, अंगद आदि वानर सेना के साथ माता सीता का पता लगाने जाते हैं | बहुत समय व्यतीत हो जाता है किन्तु वे अपने कार्य में सफल नही हो पाते | सब सोचते हैं कि कार्य पूर्ण किये बिना यदि वापस गए तो सुग्रीव हमें जीवित नहीं छोड़ेंगे, और यदि यहाँ पड़े रहे तो वैसे ही भूख प्यास से हम सब मारे जाएँगे | क्या करें क्या न करें | वही किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति | तभी जटायु का भाई सम्पाति वहाँ आता है और बताता है कि माता सीता को रावण ने अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा हुआ है | मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, किन्तु तुम लोगों को राम का यह कार्य अवश्य करना चाहिये | वानर शत योजन सागर पार करके लंका जाने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे थे | जामवन्त को लगता था कि वे बूढ़े हो चुके हैं | अंगद और हनुमान भी सशंकित थे कि वे लोग सम्भवतः लंका नहीं जा पाएँगे | अपना बल ही वे भूल चुके थे | तब जामवन्त ने कहा :

“पवन तनय, बल पवन समाना, बुद्धि बिबेक बिग्यान निधाना |
कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होत तात तुम्ह पाहीं |
राम काज लगि तव अवतारा, सुनतहिं भयऊ पर्वताकारा ||” – किष्किन्धाकाण्ड

“हनुमान तुम चुप क्यों बैठे हो ? तुम्हारा बल तो पवन के समान है | बुद्धि, विवेक और विज्ञान के तुम निधान हो | संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जो तुम कर न सको | तुम्हारा तो जन्म ही भगवान के कार्य के लिये हुआ है |” इतना सुनकर हनुमान को अपनी शक्ति का ज्ञान हुआ और बोले “यदि ऐसा है तो मैं अभी जाता हूँ और सीता को देखकर वापस आता हूँ | कार्य पूर्ण होने पर मुझे भी हर्ष होगा – जब लगि आवौं सीतहि देखी, होहहि काजु मोहि हरष विसेषी – सुन्दरकाण्ड…” और वे तुरंत पर्वताकार होकर लंका की ओर चल दिये | इस प्रकार हनुमान के संशय को जामवंत ने दूर किया |

अर्जुन के साथ भी यही स्थिति थी | उन्हें भी मोहवश अपने लक्ष्य का भान नहीं रहा था | वही उन्हें बताना था | इसीलिये उन्होंने कहा कि समस्त कामनाओं का त्याग करके कर्तव्य कर्म करो | ज्ञानी व्यक्ति का यही लक्षण है | अर्जुन ने फिर संशय किया कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर आप मुझे हिंसा जैसे क्रूर कर्म में क्यों लगाते हैं ? भगवान ने उत्तर दिया कि तुम्हारा कर्तव्य कर्म युद्ध ही है | तीनों लोकों में मेरा तो कोई कर्तव्य कर्म नहीं है, फिर भी मैं कर्म करता हूँ | यदि मैं ऐसा नहीं करूँगा तो लोक मर्यादा का उल्लंघन होगा |

संशय अभी ही दूर नहीं हुआ था | अतः बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होने की प्रक्रिया आरम्भ हुई | अर्थात् सूक्ष्म मनोविज्ञान | सर्वप्रथम अर्जुन को भगवान ने विराट स्वरूप के दर्शन कराए | युद्ध में मरने वाले लोगों का समूह दिखाया | ताकि अर्जुन सोचने को विवश हो जाएँ कि यह युद्ध तथा यह जनहानि अवश्यम्भावी है | अतः धर्म की रक्षा हेतु युद्ध के लिये तत्पर होना ही पड़ेगा | प्रश्न मात्र राज्य प्राप्ति का ही नहीं था | प्रश्न था कि कायरतापूर्वक अन्याय तथा अत्याचार होते देखते रहना क्या उचित है ? अर्जुन सोचने को विवश तो हुए, किन्तु ऊहापोह की स्थिति फिर भी बनी ही रही | अतः भगवान ने एक लीला रची | भगवान ने सोचा अभी पूरा झटका नहीं लगा है | अतः एक दिन जब अर्जुन का रथ लेकर कहीं दूर गए हुए थे तो उनके पीछे कौरवों ने चक्रव्यूह का निर्माण कर दिया | उनकी योजना युधिष्ठिर को बन्दी बनाने की थी | क्योंकि अर्जुन के अतिरिक्त उनके किसी भाई अथवा उनकी सेना के किसी व्यक्ति को चक्रव्यूह का भेदन नहीं आता था | अर्जुन के सोलह वर्ष के पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदन तो आता था, किन्तु उससे बाहर निकलना नहीं आता था | कारण था कि अभिमन्यु जब सुभद्रा के गर्भ में थे तब अर्जुन ने सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन की विधि बताई थी, किन्तु सुनते सुनते सुभद्रा को नींद आ गई थी और उससे बाहर निकलने की विधि वे नहीं सुन पाई थीं | इसलिये अभिमन्यु बस चक्रव्यूह भेदना ही जानते थे | किन्तु उस समय उन्हें युद्ध में भेजने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था | अभिमन्यु बड़ी वीरता से लड़े | उनका सारथि मारा गया | रथ टूट गया | सारे अस्त्र समाप्त हो गए तो उन्होंने टूटे हुए रथ के पहिये को ही अपना अस्त्र बना लिया | किन्तु अंत में वह भी टूट गया और निहत्थे अभिमन्यु को कौरव सेना ने घेर कर मार डाला | सबसे बड़ी विडम्बना यह थी कि भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजन – जिन पर अर्जुन को अगाध श्रद्धा थी और जिन्हें वे धर्म तथा मर्यादा के रक्षक समझते थे तथा जिनके कारण ही वे युद्ध से विमुख हो रहे थे – चुपचाप ये सब अनाचार होते देखते रहे थे | अंततः अर्जुन का इन दोनों गुरुजनों पर से भी विश्वास उठ गया और वे युद्ध के लिये तत्पर हो गए और उन्होंने सूर्यास्त से पूर्व ही चक्रव्यूह का निर्माण करने वाले जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा कर ली और कृष्ण की सहायता से उसमें वे सफल भी हुए |

इस प्रकार धीरे धीरे अर्जुन के मन का संशय तथा परिजनों की मृत्यु का भय दूर करके उन्हें युद्ध के लिये कटिबद्ध किया गया | जयद्रथ वध के समान ही महाभारत युद्ध में अनेक बार कृष्ण ने छल का सहारा लिया | जैसे “अश्वत्थामा मृतः” के शोर से शत्रुसेना में भगदड़ मचवा दी | भीष्म के सामने शिखण्डी को खड़ा कर दिया – इत्यादि इत्यादि… कारण – रोग को दूर करने के लिये कभी कभी कड़वी दवा भी देनी पड़ती है | मनःचिकित्सक भी अनेक बार अपने रोगियों के साथ सम्मोहन आदि की क्रिया करते हैं | भगवान को भी अपने एक मरीज़ अर्जुन के मन का विभ्रम दूर करके उन्हें युद्ध के लिये प्रेरित करना था | अतः जब जब अर्जुन भ्रमित होते – उनके मन में कोई शंका उत्पन्न होती – भगवान कोई न कोई झटका उन्हें दे देते | यही कारण था की महाभारत के युद्ध में प्रायः अधिकाँश नियमों को उठाकर ताक पर रख दिया गया था | क्योंकि उस समय की परिस्थितियों के अनुसार किसी प्रकार भी उस धर्मयुद्ध में विजय प्राप्त करके समस्त व्यवस्था को सुनियोजित रूप देना ही अर्जुन का लक्ष्य था | उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अर्जुन को समत्व बुद्धि अपनानी थी | उसे शत्रु मित्र छोटे बड़े सबके लिये समान भाव रखते हुए युद्ध में प्रवृत्त होना था | तभी एक ओर जहाँ वह दुर्योधन तथा दुशासन आदि कौरवों से युद्ध कर सकता था वहीं भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों के साथ युद्ध करने में भी उसका संकोच समाप्त हो सकता था | इसीलिये कृष्ण ने उसे योग का उपदेश दिया | यही थी अन्तर्मुखी होने की प्रक्रिया – सूक्ष्म मनोविज्ञान, और इसी से समझ में आ सकता था जीवन का मूल्य |

“नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पम्प्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || – २/४०” मनश्चिकित्सक का प्रथम कर्तव्य है रोगी को यथार्थ का ज्ञान कराना | आरम्भ ही अभिक्रम है – इस कर्मयोगरूप मोक्षमार्ग में अभिक्रम का नाश नहीं होता तथा चिकित्सा आदि की भाँति इसमें प्रत्यवाय अर्थात् विपरीत फल नहीं है | इस कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मरण रूप महान संसार भय से रक्षा करता है |

ध्यानयोग का बहिरंग साधन कर्म है | अतः जब तक ध्यानयोग पर आरूढ़ होने में समर्थ नहीं तब तक कर्तव्य कर्म अवश्य करते रहना चाहिये | जैसे जैसे ध्यानयोग के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती जाती है – मनुष्य के समस्त कर्म स्वतः ही समाप्त होते जाते हैं | यद्यपि कर्म कूप तालाब आदि छोटे जलाशयों की भांति अल्प फल देने वाले होते हैं – तो भी ज्ञान निष्ठा का अधिकार मिलने से पूर्व कर्म ही करते रहना चाहिये | साथ ही, न तो कर्मफल में तृष्णा होनी चाहिये और न ही “यदि कर्मफलं न इष्यते किं कर्मणा दुःखरूपेण |” भाव से कर्म में अनासक्ति ही होनी चाहिये | फलतृष्णा रहित पुरुषार्थ द्वारा कार्य किये जाने पर अन्तःकरण की शुद्धि होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है | अतः सिद्धि असिद्धि में समत्व भाव से कर्म करना चाहिये – समत्वं योग उच्यते | सकाम कर्म करने वाले तो कृपण होते हैं | इसी कृपणता के कारण मनुष्य विक्षिप्त होता है, भयभीत होता है – यह सोचकर कि उसके किये गए कर्म का फल उसे मिलेगा भी अथवा नहीं, और मिलेगा तो कितने समय में मिलेगा, कैसा मिलेगा – आदि आदि… अर्थात् उसमें वणिकबुद्धि आ जाती है | जब बुद्धि इस मोहात्मक अविवेक का उल्लंघन कर जाती है तब वह बिल्कुल शुद्ध हो जाती है | समाधि में अर्थात् चित्त के समाधान द्वारा विक्षिप्त हुई बुद्धि अचल और दृढ़ हो जाती है – स्थिर हो जाती है | अतः यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धि की स्थिरता चाहने वाले को इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है | यही है अध्यात्मयुत मनोविज्ञान | भारतीय जीवन दर्शन – भारतीय मनोविज्ञान – अध्यात्म पर ही आधारित है | भारतीय जन मानस में एक ही आस्था है “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” और इस प्रकार अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा अन्ततः मोक्षरूप परम पद को प्राप्त करना | इस लक्ष्य से थोड़ा सा भी च्युत होते ही मति विभ्रम हो जाता है | यही कारण था कि भगवान का विराट रूप देखकर जब अर्जुन भयभीत और भ्रमित हो गए तब भगवान ने उनसे यही कहा कि तू युद्ध करे या न करे, इन सबका अन्त तो अवश्यम्भावी है | फिर क्यों नहीं तू निमित्त मात्र होकर युद्ध करता ? मन:चिकित्सक का वास्तविक कार्य यही है – यथार्थ का ज्ञान कराना – मनुष्य को उसकी ज़मीन से जोड़ना |

इस प्रकार अर्जुन को यह जो अन्तर्मुखी बनाने की प्रक्रिया हुई यही है सूक्ष्म मनोविज्ञान | तदुपरान्त भगवान ने अर्जुन को आत्मस्वरूप के दर्शन कराए और धीरे धीरे ज्ञान का बीजारोपण किया | इस प्रकार उनके मन को परिवर्तित करके उन्हें त्याग और वैराग्य का मार्ग बताया | जिससे उनके मन के विभ्रम का, मोह का नाश हुआ और वे कर्तव्य कर्म में प्रस्तुत हुए | यह थी अध्यात्म के द्वारा अर्जुन की मनश्चिकित्सा | युद्ध के लिये कटिबद्ध अर्जुन ने स्वयं कहा “नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव || १८/७३” हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हुई | इसलिये मैं संशयरहित होकर स्थिरबुद्धि वाला हो गया हूँ और अब आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

सम्भवतः कुछ लोगों का विचार हो कि निष्काम कर्मयोग तो सन्यासियों के लिये होता है, गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिये, सामाजिक जीवन जीने वालों के लिये तो यह निष्काम कर्मयोग सम्भवतः उन्हें कर्म ही न करने दे | किन्तु यदि ऐसा होता तब तो अर्जुन – जो कि मोहवश क्षात्रधर्म से विमुख होकर गाण्डीव छोड़कर बैठ गए थे – गीता का उपदेश सुनकर सब कुछ छोड़ छाड़ कर सन्यासी हो जाते | किन्तु ऐसा नहीं हुआ | अपितु इस उपदेश को सुनकर ही उन्होंने आजीवन गृहस्थ रहकर अपने कर्तव्य का पालन किया | जब इस प्रकार आध्यात्म मार्ग से मन का विभ्रम दूर करके, उसे स्थिर करके कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त किया जा सकता है, तो भला क्यों नहीं किसी भी बड़े से बड़े अपराधी का ह्रदय परिवर्तन नहीं किया जा सकता इस प्रकार अध्यात्म परक मन:चिकित्सा के द्वारा ? यहाँ तक कि सम्पूर्ण समाज का ह्रदय परिवर्तन किया जा सकता है | और फिर तब किसी भी प्रकार के सामाजिक भय से, धर्म के भय से, लोक मर्यादा के भय से, जाति के भय से, मान प्रतिष्ठा के भय से, अथवा अन्य किसी भी प्रकार के मानसिक विकार से व्यक्ति को, समाज को मुक्ति प्राप्त हो सकती है और अनेक प्रकार के अपराधों को होने से रोका जा सकता है | इस प्रकार की अध्यात्मपरक मन:चिकित्सा का मार्ग कठिन अवश्य है, लंबा भी है, किन्तु इसके परिणाम भी उतने ही दूरगामी हैं |

आज़ादी

आज़ादी

आज़ादी का दिन फिर आया |
बड़े यत्न से करी साधना, कितने जन बलिदान हो गए |
किन्तु हाय दुर्भाग्य, न जाने कहाँ सभी वरदान खो गए |
आशाओं के सुमन न विकसे, पूरा हो अरमान न पाया ||१||
सोने के दिन बनने को थे, और चाँदी की सारी रातें |
धरती से आकाश मिलाने वाली हुईं बहुत सी बातें |
किन्तु रहा जैसे का तैसा, रंच न परिवर्तन हो पाया ||२||
बीत गईं कितनी ही गर्मी, सर्दी बीतीं, सरस बहारें |
भँवरे गूँजे कली कली पर, मगर रहीं फीकी गुन्जारें |
पात पुराने झरे बहुत, पर एक न नया सुमन सरसाया ||३||
वर्षा आई उमड़ घुमड़ कर, काली घनी घटाएँ छाईं |
गरजे घन कारे कजरारे, मगर बिजलियाँ ही बरसाईं |
मन का मानस रहा शुष्क ही, कभी न ओर छोर लहराया ||४||
बगिया भी है आँगन भी है, और गढ़े भी हैं हिण्डोले
पर मदमाती नहीं गुजरिया, कौन कहो फिर झूला झूले ?
मनभावन सावन फिर आया, लेकिन एक मल्हार न गाया ||५||
जगमग जगमग दीवाली के जाने कितने दीप जलाए |
नगर नगर और गाँव गाँव में हर घर आँगन सभी सजाए |
किन्तु कहाँ का गया अँधेरा, और कहाँ उजियाला छाया ?|६||
मतवाली होली भी आई, लेकिन राख़ उड़ाती आई |
कलित कपोलों पर गुलाल की लाली कहीं न पड़ी दिखाई |
ढोल बजे, नूपुर भी छनके, मगर न केसर का रंग छाया ||७||
नये नये अनगिन रंगों से देवमूरती गईं सँवारी
चन्दन अक्षत पुष्प चढ़ाए, और आरती गईं उतारी |
सत्य धर्म और शान्ति प्रेम का राग न लेकिन मिलकर गाया ||८||
महल सभी बन गए दुमहले, और दुमहले किले बन गए |
कितने मिले धूल में, लेकिन कितने नये कुबेर बन गए |
आयोगों का गठन हुआ, मन का संगठन नहीं हो पाया ||९||
फाड़ रहा है आज मनुज धरती सागर अम्बर की छाती |
चन्दा क्या, मंगल के ज्वालामुखि में भी है फेंकी बाती |
मनु के सुत ने मनुज कहाकर भी मानवता को बिसराया ||१०||
फिर भी है संतोष कि धरती अपनी है, अम्बर अपना है |
अपने घर को आज हमें फिर नई सम्पदा से भरना है |
किन्तु अभी तक हमने अपना खोया बहुत, बहुत कम पाया ||११||
ग्राथित हो रहे अनगिनती सूत्रों की डोरी में हम सारे |
होंगे सभी आपदाओं के बन्धन छिन्न समस्त हमारे |
श्रम संयम आर अनुशासन का सुगम मन्त्र यदि हमको भाया ||१२||

रुक्मिणी हरण

रुक्मिणी हरण

श्रीकृष्ण जन्म महोत्सव की बात आती है तो उनके जीवन की एक प्रमुख लीला – रुक्मिणी हरण की लीला – की चर्चा तो होगी ही | श्रीकृष्ण चरित्र की एक प्रमुख लीला है रुक्मिणी हरण की लीला | रुक्मिणी हरण की लीला एक ओर सांसारिक दृष्टि से जहाँ एक घटना भर है, वहीं कृष्ण की अन्य लीलाओं के समान इस लीला का भी आध्यात्मिक रहस्य है | सबसे पहले चर्चा करते हैं इस लीला की |

विदर्भ देश में भीष्मक नामक एक परम तेजस्वी और सद्गुणी राजा थे । उनकी राजधानी थी कुण्डिनपुर । उनकी एक पुत्री थी – रुक्मिणी जो पाँच भाइयों के बाद उत्पन्न हुई थी इसलिये सभी की लाडली थी । उसके शरीर में लक्ष्मी के शरीर के समान ही लक्षण थे इसलिये लोग उसे लक्ष्मीस्वरूपा भी कहा करते थे । रुक्मिणी जब विवाह योग्य हुईं तो भीष्मक को उसके विवाह की चिंता हुई । रुक्मिणी के पास जो लोग आते-जाते थे वे श्रीकृष्ण की प्रशंसा किया करते थे कि श्रीकृष्ण अलौकिक पुरुष हैं तथा समस्त विश्व में उनके सदृश अन्य कोई पुरुष नहीं है । भगवान श्रीकृष्ण के गुणों और उनकी सुंदरता के विषय में सुनकर रुक्मिणी मन ही मन उन पर आसक्त हो गईं और उन्होंने मन में निश्चय कर लिए कि वे विवाह करेंगी तो श्री कृष्ण के साथ ही | उधर कृष्ण को भी नारद से यह बात ज्ञात हो चुकी थी तथा रुक्मिणी के सौन्दर्य के विषय में तथा उनके गुणसम्पन्न होने के विषय में भी नारद उन्हें बता चुके थे | रुक्मिणी का बड़ा भाई रुक्मी कृष्ण से शत्रुता रखता था | वह अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह चेदि वंश के राजा तथा कृष्ण की बुआ के बेटे शिशुपाल के साथ करना चाहता था | इसका एक कारण यह भी था कि शिशुपाल भी रुक्मी के समान ही कृष्ण से शत्रुता रखता था | अपने पुत्र की भावनाओं का सम्मान करते हुए राजा भीष्मक ने शिशुपाल के साथ ही पुत्री के विवाह का निश्चय कर लिया और शिशुपाल के पास सन्देश भेजकर विवाह की तिथि भी निश्चित कर ली |

रुक्मिणी को इस बात का पता लगा तो उन्हें बहुत दुःख हुआ और उन्होंने एक ब्राह्मण को कृष्ण के लिये अपना सन्देश द्वारिका भेजा | अपने सन्देश में उन्होंने स्पष्ट रूप से अपना प्रणय कृष्ण के प्रति व्यक्त किया | साथ ही यह भी बताया था उनका विवाह उनकी इच्छा के विपरीत शिशुपाल के साथ किया जा रहा है | उन्होंने पत्र में लिखा कि “मैंने आपको ही पति रूप में वरण किया है । मैं आपको अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती । मैं अपने कुल की प्रथा के अनुसार विवाह से पूर्व वधू के रूप में श्रृंगार करके नगर के बाहर स्थित गिरिजा देवी के मन्दिर में उनके दर्शन के लिए जाऊँगी | आपसे निवेदन है कृपया उसी समय आप मुझे वहाँ से भगा कर ले जाएँ और मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें | यदि ऐसा नहीं हुआ तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी |” रुक्मिणी का संदेश पाकर सन्देशवाहक ब्राह्मण को साथ ले भगवान श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर अकेले ही शीघ्र ही कुण्डिनपुर की ओर चल दिए । इधर बलराम को पूरी घटना का पता चला और यह भी ज्ञात हुआ कि कृष्ण अकेले ही चल दिए हैं रुक्मिणी को लाने तो युद्ध की आशंका हुई उन्हें और वे यादवों की सेना को लेकर कृष्ण की सहायता के लिये चल दिये | दूसरी ओर राजा भीष्मक का सन्देश पाकर शिशुपाल भी निश्चित तिथि पर दल बल के साथ बारात लेकर कुण्डिनपुर जा पहुँचा | शिशुपाल की बारात में जरासंध, शाल्व इत्यादि वे सभी राजा अपनी अपनी सेनाओं के साथ थे जो श्री कृष्ण से वैर रखते थे | सारा नगर शिशुपाल और रुक्मिणी के विवाह के लिये वन्दनवारों तथा तोरणों से सजा हुआ था तथा मंगल वाद्य बजाए जा रहे थे |

सन्ध्या समय रुक्मिणी विवाह के वस्त्रों में सज-धजकर गिरिजा देवी के मंदिर की ओर चल पड़ीं । उनके साथ उनकी सखियाँ तथा बहुत से अंगरक्षक भी थे । गिरिजा देवी की की पूजा करते हुए रुक्मिणी ने उनसे प्रार्थना की कि हे माँ, तुम तो समस्त जगत की माता हो, मेरी मनोकामना पूर्ण करो, आशीर्वाद दो मुझे कि श्रीकृष्ण मुझे यहाँ से ले जाएँ और पत्नी रूप में स्वीकार करें | पूजा अर्चना के बाद घर वापस लौटने के लिये रुक्मिणी अपने रथ पर बैठना ही चाहती थी कि वहाँ पहुँच चुके श्रीकृष्ण ने विद्युत गति से रुक्मिणी का हाथ पकड़ लिया और उन्हें खींचकर अपने रथ पर बैठा लिया और तीव्र गति से द्वारका की ओर चल पड़े । रुक्मिणी के हरण का समाचार तुरन्त राज्य भर में फ़ैल गया | क्रोधित शिशुपाल ने अपने मित्र राजाओं और उनकी सेनाओं के साथ कृष्ण का पीछा किया किन्तु बलराम और यदुवंशी सेनाओं ने उन सबको बीच में ही रोक लिया | भयंकर युद्ध हुआ | शिशुपाल तथा उसकी मित्र सेनाएँ पराजित और निराश होकर वापस अपने अपने राज्यों को लौट गईं | शिशुपाल को पराजित होकर भागते देख रुक्मी ने क्रोध में भरकर प्रतिज्ञा की या तो कृष्ण को बन्दी बनाकर लौटेगा, अन्यथा कुण्डिनपुर में मुँह नहीं दिखाएगा | रुक्मी और कृष्ण के मध्य युद्ध हुआ | रुक्मी पराजित हुआ | श्रीकृष्ण उसका वध करने ही वाले थे कि रुक्मिणी ने उन्हें रोक दिया और कहा कि आप अत्यन्त बलवान होने के साथ साथ कल्याण स्वरूप भी हैं | मेरे भाई का वध आपको शोभा नहीं देता | तब कृष्ण ने उसकी दाड़ी मूँछ काटकर और सर के बाल जगह जगह से उखाड़ कर उसे कुरूप बना दिया | बलराम को उस पर दया आई और उन्होंने कृष्ण को समझाया कि तुमने यह अच्छा नहीं किया । अपने सम्बन्धी को कुरूप बना देने जैसा निन्दित कार्य हम लोगों को शोभा नहीं देता | और बलराम ने स्वयं रुक्मी के बन्धन खोल दिए | अब बलराम को ध्यान आया कि जिस कन्या को वधू के रूप में ले जाया जा रहा है उसी के भाई के साथ इस प्रकार के आचरण से सम्भवतः उसे कष्ट होगा और हो सकता है वह अपने ह्रदय में कृष्ण के प्रति तथा उनके परिवार के प्रति कोई दुराग्रह पाल बैठे | यदि ऐसा हुआ तो कृष्ण का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रह पाएगा | अतः परिवार का ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते उन्होंने रुक्मिणी को समझाया कि तुम्हारे भाई के साथ जो कुछ कृष्ण ने किया उसके कारण मन में किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखना, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को अपने किये कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है | और इस प्रकार भविष्य के लिये वातावरण को विषाक्त होने से बचा लिया | क्योंकि गृहस्थ जीवन में यदि आरम्भ में ही मनों में किसी प्रकार की कटुता उत्पन्न हो जाए तो उसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होते | इस प्रकार रुक्मिणी हरण की घटना गृहस्थ जनों को यह सन्देश भी देती है कि अपने जीवन साथी के प्रति किसी प्रकार की कटुता अथवा दुराग्रह नहीं रखना चाहिये |

कृष्ण ने रुक्मिणी को द्वारिका ले जाकर उनके साथ विधिवत विवाह किया | रुक्मिणी के गर्भ से बाद में कामदेव के अवतार प्रद्युम्न का जन्म हुआ | शिवजी की तपस्या भंग करने पर जब शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था तो कामदेव की पत्नी रति ने अपने पति को जीवन दान देने की प्रार्थना शिव से की थी | और शिव ने उसे वरदान दिया था कि उसका पति कामदेव कृष्ण की सन्तान के रूप में पुनर्जन्म लेगा |

निम्बार्क सम्प्रदाय की पद्धति में रुक्मिणी को विशेष स्थान प्राप्त है | इस सम्प्रदाय में एक ओर तो गोलोकवासी राधा-कृष्ण की उपासना का विधान है तथा सुख विलास का स्थान अखण्ड वृंदावन को भी माना गया है, किन्तु दूसरी ओर द्वारिकापुरी को अपना धाम और रुक्मिणी जी को अपना इष्ट एवं गरुड़ जी को देवता माना गया है । इन दोनों बातों में सैद्धान्तिक विरोध है । किन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि एक ही श्री कृष्ण नाम के शरीर में तीन विभिन्न शक्तियों ने अलग-अलग प्रकार की लीला की । बृहत्सदाशिव संहिता में कहा गया है कि परब्रह्म की किशोर लीला का ऐश्वर्य वृंदावन में स्थित है । वह ही गोकुल में बाल रूप की लीला में स्थित है । वैकुण्ठ का वैभव मथुरा और द्वारिका में स्थित है । रास मण्डल में वेद ऋचाओं के द्वारा स्तुति किये जाने पर श्री कृष्ण जी ने उनके साथ लीला करने का वरदान दिया और उनके साथ वृंदावन में सात दिनों तक लीला करके वे मथुरा चले गये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने कंस का वध किया | कृष्ण के विरह में व्याकुल वेद ऋचा सखियाँ गोलोक धाम को प्राप्त हुईं । पृथ्वी का भार हरण करने की इच्छा से चक्रधारी विष्णु भगवान कुछ वर्षों तक मथुरा में रहे । इसके बाद वे द्वारिका गये और बाद में वैकुण्ठ में विराजमान हो गये । बृहत्सदाशिव संहिता के इस कथन से यह सिद्ध होता है कि राधा-कृष्ण का अनन्य उपासक यदि रुक्मिणी जी को अपना इष्ट बनाये तो यही कहा जा सकता है कि उसने सार और असार को एक ही में मिला दिया है । अर्थात सांसारिक राग जब भगवत चिन्तन का माध्यम बन जाता है तो वह राग ही प्रेम रस के रूप में परिणत हो जाता है । किसी भी क्रिया में प्रेम और ज्ञान दोनों की संगति आवश्यक है । निम्बार्क के अनुसार श्री कृष्ण ब्रह्म हैं, रुक्मिणी ज्ञान शक्ति और सत्यभामा क्रियाशक्ति हैं । इन दोनों की समाविष्ट पराशक्ति श्री राधा हैं ।

रुक्मिणी वास्तव में भक्ति और प्रेम का सामंजस्य हैं । वह भगवान की भक्त भी हैं और प्रेमी भी । बिना देखे, बिना मिले, कृष्ण के गुणों से, उनके स्वरूप से प्रेम कर बैठीं । प्रेम भी इतना प्रगाढ़ कि मन ही मन उन्हें अपना सर्वस्व तक समर्पित कर दिया । जब प्रेम ऐसा हो जाए – निष्ठा ऐसी हो जाए – तो परमात्मा को खोजने के लिए – सत्य को खोजने के लिये भटकना नहीं पड़ता । वह परमात्मा तो स्वयं ही हमें ढूँढता चला आता है । अर्थात पूर्ण निष्ठावान होकर, एकाग्रचित्त होकर यदि सत्य की खोज की जाए, ज्ञान प्राप्ति की कामना की जाए तो वह सत्य, वह ज्ञान हमें बहुत सरलता से उपलब्ध हो सकता है | रुक्मिणी ने मन में भगवान को सर्वोच्च स्थान दिया अतः भगवान ने स्वयं उनके जीवन में प्रवेश किया | और इस ईश्वर प्राप्ति के लिये रुक्मिणी ने बहुत सोच विचारकर एक विश्वासपात्र ब्राह्मण को सन्देश देकर कृष्ण के पास भेजा | अर्थात ईश्वर की प्राप्ति के लिये माध्यम अर्थात सत्य की प्राप्ति के लिये गुरु किसी ऐसे व्यक्ति को ही बनाना चाहिये जिसे स्वयम् ईश्वर सत्ता का ज्ञान हो – सत्य का ज्ञान हो | सच्चे गुरु का चित्त सदा सन्तुष्ट रहता है | उसे अपने पूर्व पुरुषों द्वारा स्वीकृत धर्म का पालन करने में भी कोई कठिनाई नहीं होती । वह समस्त धर्मों, समस्त विचारों का मनन करना जानता है | तथा सत्यान्वेषण और सत्यप्राप्ति की दिशा में शिष्य का भली भांति तथा उचित विधि से मार्ग दर्शन करता है |

रुक्मिणी भक्त भी हैं और प्रेमी भी । भक्ति और प्रेम के समक्ष सबसे बड़ी कठिनाई यही आती है कि जब मन सत्य में लीन होना चाहता है तो अन्य इन्द्रियाँ उसे अनेक प्रकारों के विकारों में भटकाने का प्रयास करती हैं । किन्तु मन तटस्थ हो, ध्यानावस्थित हो तो कोई भी विकार उसे प्रभावित नहीं कर सकता | रुक्मिणी रूपी मन का परमात्मा अकेला है और शिशुपाल आदि विकार पूरी सेना हैं । किन्तु मन अर्थात रुक्मिणी को तो केवल शाश्वत सत्य अर्थात ईश्वर की ही लगन लगी है, उसी के ध्यान में पूर्ण निष्ठा तथा एकाग्रता के साथ अवस्थित हैं वे | यही कारण है कि सत्य अर्थात परमात्मा स्वयं उसके समक्ष उपस्थित हो गया |

इस प्रकार रुक्मिणी हरण की लीला केवल एक लौकिक लीला ही नहीं वरन् कृष्ण की अन्य लीलाओं के समान इसमें भी बहुत गहन रहस्य छिपे हुए हैं, बहुत गूढ़ सन्देश छिपे हुए हैं |

श्रीकृष्ण चरित्र

श्रीकृष्ण चरित्र

प्रिय मित्रों, कल और परसों भगवान श्रीकृष्ण का जन्म महोत्सव हम सब मनाएँगे | कहीं लोग व्रत उपवास आदि का पालन करेंगे, कहीं भगवान कृष्ण की लीलाओं को प्रदर्शित करती आकर्षक झाँकियाँ सजाई जाएँगी तो कहीं भगवान की लीलाओं का मंचन किया जाएगा और कहीं मटकी फोड़ी जाएँगी | मन्दिरों में तो पिछले कई दिनों से सजावट का कार्य चल रहा है | बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन | वास्तव में श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व भारतीय इतिहास के लिये ही नहीं, विश्व इतिहास के लिये भी अलौकिक एवम् आकर्षक व्यक्तित्व है और सदा रहेगा | उन्होंने विश्व के मानव मात्र के कल्याण के लिये अपने जन्म से लेकर निर्वाण पर्यन्त अपनी सरस एवं मोहक लीलाओं तथा परम पावन उपदेशों से अन्तः एवं बाह्य दृष्टि द्वारा जो अमूल्य शिक्षण दिया था वह किसी वाणी अथवा लेखनी की वर्णनीय शक्ति एवं मन की कल्पना की सीमा में नहीं आ सकता | तथापि श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र, लीलाओं और उपदेशों पर तत्वतः विचार करने का ही प्रयास स्थालीमूलक न्याय से मैंने किया है |

अवतारवादी शास्त्रों की मान्यता के अनुसार कृष्ण षोडश कला सम्पन्न पूर्णावतार होने के कारण “कृष्णस्तु भगवान स्वयम्” हैं | श्रीकृष्ण का चरित्र अत्यन्त दिव्य है । हर कोई उनकी ओर खिंचा चला जाता है । जो सबको अपनी ओर आकर्षित करे, भक्ति का मार्ग प्रशस्त करे, भक्तों के पाप दूर करे, वही कृष्ण है । वह एक ऐसा आदर्श चरित्र है जो अर्जुन की मानसिक व्यथा का निदान करते समय एक मनोवैज्ञानिक, कंस जैसे असुर का संहार करते हुए एक धर्मावतार, स्वार्थ पोषित राजनीति का प्रतिकार करते हुए एक आदर्श राजनीतिज्ञ, विश्व मोहिनी बंसी बजैया के रूप में सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ, बृज वासियों के समक्ष प्रेमावतार, सुदामा के समक्ष एक आदर्श मित्र, सुदर्शन चक्रधारी के रूप में एक योद्धा व सामाजिक क्रान्ति के प्रणेता हैं । उनके जीवन की छोटी से छोटी घटना से यह सिद्ध होता है कि वे सर्वैश्वर्य सम्पन्न थे | धर्म की साक्षात् मूर्ति थे | संसार के जिस जिस सम्बन्ध और जिस जिस स्तर पर जो जो व्यवहार हुआ करते हैं उन सबकी दृष्टि से और देश, काल, पात्र, अवस्था, अधिकार आदि भेदों से व्यक्ति के जितने भिन्न भिन्न धर्म अथवा कर्तव्य हुआ करते हैं उन सबमें कृष्ण ने अपने विचार, व्यवहार और आचरण से एक सद्गुरु की भांति पथ प्रदर्शन किया है | कर्तव्य चाहे माता पिता के प्रति रहा हो, चाहे गुरु-ब्राह्मण के प्रति, चाहे बड़े भाई के प्रति अथवा गौ माता और अपने भक्तों के प्रति रहा हो, चाहे शत्रु से व्यवहार हो अथवा मित्र से, चाहे शिष्य और शरणागत हो – सर्वत्र ही धर्म का उच्चतम स्वरूप और कर्तव्यपालन का सार्वभौम आदर्श उनके आचरण में प्रकट होता है | राजनीति के क्षेत्र में उनकी अनुपम एवम् अद्वितीय राजनीतिक कुशलता व्यक्त होती है | समग्र विश्व के प्रति व्यवहार में उनका आचरण “अमानी मानदो मान्यः” अर्थात् अहंकार रहित होकर दूसरों को मान देने वाला सिद्ध होता है | राजनीति में भी किस प्रकार राग द्वेष से रहित होकर निष्पक्ष और निष्कपट व्यवहार किया जा सकता है इसका उदाहरण भी कृष्ण के व्यक्तित्व के अतिरिक्त और कहीं ढूँढे भी नहीं मिल सकता |

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव सामाजिक समता का उदाहरण है । श्रीकृष्ण ने नगर में जन्म लिया और गाँव में खेलते हुए उनका बचपन व्यतीत हुआ । इस प्रकार श्रीकृष्ण का चरित्र गाँव व नगर की संस्कृति को जोड़ता है | गरीब को अमीर से जोड़ता है | गो चरक से गीता उपदेशक होना, दुष्ट कंस को मारकर महाराज उग्रसेन को उनका राज्य लौटाना, धनी घराने का होकर गरीब ग्वाल बाल एवं गोपियों के घर जाकर माखन खाना आदि जो लीलाएँ हैं ये सब एक सफल राष्ट्रीय महामानव होने के उदाहरण हैं । कोई भी साधारण मानव श्रीकृष्ण की तरह समाज की प्रत्येक स्थिति को छूकर, सबका प्रिय होकर राष्ट्रोद्धारक बन सकता है । कंस के वीर राक्षसों को पल में मारने वाला अपने प्रिय ग्वालों से पिट जाता है । खेल में हार जाता है । यही है दिव्य प्रेम की स्थापना का उदाहरण । भगवान श्रीकृष्ण की यही लीलाएँ सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रप्रियता का प्रेरक मानदण्ड हैं । यही कारण है कि श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अनूठा, अपूर्व और अनुपमेय है । श्रीकृष्ण अतीत के होते हुए भी वर्तमान की शिक्षा और भविष्य की अमूल्य धरोहर हैं । उनका व्यक्तित्व इतना विराट है कि उसे पूर्ण रूप से समझ पाना वास्तव में कठिन कार्य है । हमारे अध्यात्म के विराट आकाश में श्रीकृष्ण ही अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों व ऊँचाइयों पर जाकर भी न तो गम्भीर ही दिखाई देते हैं और न ही उदासीन दीख पड़ते हैं, अपितु पूर्ण रूप से जीवनी शक्ति से भरपूर व्यक्तित्व हैं | श्रीकृष्ण के चरित्र में नृत्य है, गीत है, प्रीति है, समर्पण है, हास्य है, रास है, और है आवश्यकता पड़ने पर युद्ध को भी स्वीकार कर लेने की मानसिकता । धर्म व सत्य की रक्षा के लिए महायुद्ध का उद्घोष है । एक हाथ में बाँसुरी और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर महाइतिहास रचने वाला कोई अन्य व्यक्तित्व नहीं हुआ संसार में । कृष्ण के चरित्र में कहीं किसी प्रकार का निषेध नहीं है, जीवन के प्रत्येक पल को, प्रत्येक पदार्थ को, प्रत्येक घटना को समग्रता के साथ स्वीकार करने का भाव है | वे प्रेम करते हैं तो पूर्ण रूप से उसमें डूब जाते हैं, मित्रता करते हैं तो उसमें भी पूर्ण निष्ठावान रहते हैं, और जब युद्ध स्वीकार करते हैं तो उसमें भी पूर्ण स्वीकृति होती है |

कालिया नामक नाग को नाथने की लोक प्रसिद्द लीला का तात्पर्य यही है कि स्वार्थपरता, निर्दयता आदि ऐसे दोष हैं जो जीवन रूपी यमुना के निर्मल जल को विषाक्त कर देते हैं | जब तक शुद्ध सात्विक बुद्धि रूपी कृष्ण अपने पैरों से इन दोषों को कुचल कर नष्ट नहीं कर देता तब तक जीवन सरिता की सरसता एवं शुद्धता असम्भव रहेगी | इसी प्रकार गोपालों और ब्राह्मणों की कथा | कृष्ण ने अपने सखाओं को याज्ञिक ब्राह्मणों के पास अन्न प्राप्त करने भेजा | उनकी पत्नियों ने उन्हें सादर भोजन दिया | किन्तु उन नीरस वेदपाठी ब्राह्मणों ने उन्हें फटकार दिया | इस कथा का तात्पर्य यह है कि केवल दम्भ प्रदर्शन के लिये किया गया कर्मकाण्ड और वेदपाठ केवल आत्मप्रवंचना है | ममता और निरभिमानता ही जीवन का सार है | बालक ही भगवान का साकार रूप हैं | अतः प्रेमपूर्वक की गई बाल सेवा ही सच्ची ईश सेवा है | इसी प्रकार उनकी बाललीलाओं में सर्वत्र ही कोई न कोई रहस्य दृष्टिगोचर होता है | न केवल बाललीलाओं में, वरन् समस्त लीलाओं में ही कोई न कोई रहस्य, कोई न कोई अर्थ छिपा हुआ है | कृष्ण का चरित्र सौन्दर्य, शक्ति और शील का समन्वय था | अपनी शक्ति और सामर्थ्य से ही उन्होंने बृजवासियों को अनेक विपत्तियों से बचाया था | गोवर्धन पर्वत के नीचे समस्त ग्रामवासियों को एकत्र करके उन्हें घोर वर्षा से बचाते समय कृष्ण ने एक सेवक के रूप में कार्य किया था | दावानल में भस्म होते ग्वालों की रक्षा की | जाति समाज और देश की रक्षा के लिये कृष्ण ने हर सम्भव प्रयास किये | पूतना मोक्ष, नलकूबर और मणिग्रीव का उद्धार, द्रोपदी पर कृपा, दु:शासन को अपनी समस्त सेना युद्ध के लिये देकर अर्जुन की ओर से अकेले निहत्थे खड़े हो जाना, अपनी सेना का संहार होते देखकर भी विचलित न होना – यह सब कृष्ण जैसे योगी के लिये ही सम्भव था | अपने कुटुम्बीजन भी जब मिलकर नहीं बैठ सके तो उनका भी सर्वनाश ही हुआ – इससे भी यही स्पष्ट होता है कि यदि समाज को उन्नति के शिखर पर पहुँचाना है तो व्यर्थ की बातों को लेकर अशान्ति तथा वैमनस्य उत्पन्न करने से कोई लाभ नहीं होगा, ऐसा करने से तो विनाश ही होगा उन्नति नहीं | साथ ही समाज को यदि उन्नति की ओर अग्रसर होना है तो प्रत्येक व्यक्ति को व्यावहारिक भी होना होगा | कृष्ण-सुदामा का प्रसंग इसका उत्कृष्ट उदाहरण है | श्रीकृष्ण जैसा ऐश्वर्यसम्पन्न व्यक्ति सुदामा जैसे निर्धन व्यक्ति के तन्दुल निकालकर खा लेता है और सुदामा को ऐश्वर्यशाली बना देता है | यह घटना एक ओर जहाँ मित्रता में आस्था को दर्शाती है वहीं सामन्तवादी मनोवृत्ति का भी मखौल उड़ाती है और प्राणीमात्र में समता की स्थापना करती है | सुदामा अध्ययन, मनन, रचना-सर्जना में ऐसे डूबे कि बुद्धि वैभव को ही स्वधर्म मान उसी में जीवन की सार्थकता खोजने लगे | परिवार पालन के लिये धन की भी आवश्यकता होती है इस सत्य को वे भुला ही बैठे | परिग्रह और अभाव में अन्तर भुला बैठे थे सुदामा | जबकि आवश्यकता है दोनों में सन्तुलन स्थापित करने की | परिग्रह मत करो पर अभावग्रस्त भी मत रहो | श्री कृष्ण यह भी सिद्ध करना चाहते थे कि व्यक्ति को व्यावहारिक भी होना चाहिये |

श्रीकृष्ण को रसिक बिहारी, लीलाप्रिय, सहस्ररमणीप्रिय आदि न जाने कितने नामों से सम्बोधित किया जाता है, किन्तु श्रीकृष्ण एक नवीन प्रकार की नैतिकता को स्थापित करने वाले एक महान व्यक्तित्व थे | भौमासुर के विनाश के पश्चात् उसके द्वारा बन्दी बनाई गई सोलह हज़ार स्त्रियों को कृष्ण ने इसलिये स्वीकार किया क्योंकि वे जानते थे कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा | वे जानते थे कि एक अनाचारी की क़ैद से छूटी इन निर्दोष युवतियों को सदा के लिये कुलटा मान लिया जाएगा और कोई भी इनके साथ विवाह के लिये आगे नहीं आएगा | उनके सम्मान की रक्षा के लिये तथा समाज के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करने के लिये कृष्ण ने उन्हें स्वीकार किया | इसी प्रकार रासलीला | जो लोग कृष्ण को केवल रास रचैया भर मानते हैं वास्तव में वे लोग रास के अर्थ तथा मर्म को ही भली भांति नहीं समझ पाए हैं | कृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य करना कोई साधारण घटना नहीं है | भाव, ताल, नृत्य, छन्द, गीत, रूपक एवं लीलाभिनय से युक्त यह रास – जिसमें रस का उद्भव मन से होता है तथा जो पूर्ण रूप से अलौकिक और आध्यात्मिक है – वैष्णव परम्पराओं से लेकर जैन परम्पराओं तक समस्त चिन्तन परम्पराओं में ज्ञान का आलोक लेकर आया | समस्त ब्रह्माण्ड में जो विराट नृत्य चल रहा है प्रकृति और पुरूष (परमात्मा) का, श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य उस विराट नृत्य की ही तो एक झलक है । उस रास में किसी प्रकार की काम भावना नहीं है | कृष्ण पुरूष तत्व है और गोपिकाएँ प्रकृति तत्व । इस प्रकार कृष्ण और गोपियों का नृत्य प्रकृति और पुरूष का महानृत्य है । विराट प्रकृति और विराट पुरूष का महारास है यह | तभी तो प्रत्येक गोपी यही अनुभव करती है कि कृष्ण उसी के साथ नृत्यलीन हैं । सांसारिक दृष्टि से यह रासनृत्य मनोरंजन मात्र हो सकता है, किन्तु यह नृत्य पूर्ण रूप से पारमार्थिक नृत्य है | एक ओर महारास तो दूसरी ओर वस्त्रहरण द्वारा गोपियों को सामजिक मर्यादा का उपदेश | एक ओर जहाँ चीर हरण की लीला में प्रेम का सामूहिक विकास होने के साथ गोपियों के लिये लोकमर्यादा का उपदेश भी है तो वहीं रासलीला में कृष्ण तथा गोपियों के प्रेम का चरम उत्कर्ष बिंदु है जहाँ किसी भी प्रकार की शारीरिक अथवा मानसिक गोपनीयता अथवा रहस्य का आवरण नहीं रहता | राग योग की इस दशा में बृहदारण्यक का यह कथन सिद्ध होता है “जैसे पुरुष को अपने आलिंगनकाल में बाहर भीतर की कोई सुधि नहीं रहती उसी प्रकार जब उपासक प्राज्ञ द्वारा आलिंगित होता है तब वह अपनी सुध बुध खो बैठता है |”

कृष्ण गोपियों के प्रेम में आसक्त दिखाई देते तो हैं, किन्तु उनका वह आकर्षण भी उन्हें मथुरा में उनके कर्तव्य से विमुख नहीं कर पाता | इस प्रकार कृष्ण और गोपियों का प्रेम प्रसंग कामुकता का खण्डन करके लोकहित की भावना का समर्थन करता है | उनकी इसी भावना से प्रेरित होकर ही विरहाकुल राधा भी अपना विरह भूल ग्रामवासियों की सेवा में लग जाती हैं और एक सच्ची तथा निष्ठावान समाजसेविका बन जाती हैं | कृष्ण एक ऐसा विराट स्वरूप हैं कि किसी को उनका बालरूप पसन्द आता है तो कोई उन्हें आराध्य के रूप में देखता है तो कोई सखा के रूप में | किसी को उनका मोर मुकुट और पीताम्बरधारी, यमुना के तट पर कदम्ब वृक्ष के नीचे वंशी बजाता हुआ प्राणप्रिया राधा के साथ प्रेम रचाता प्रेमी का रूप भाता है तो कोई उनके महाभारत के पराक्रमी और रणनीति के ज्ञाता योद्धा के रूप की सराहना करता है और उन्हें युगपुरुष मानता है | वास्तव में श्रीकृष्ण पूर्ण पुरूष हैं ।

आज की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं के निदान के लिये कृष्ण के चरित्र से प्रेरणा ली जा सकती है | आज के नेता लोग यदि कृष्ण की विलक्षण राजनीति को समझ जाएँ तो देश का कल्याण हो जाए | इसी प्रकार आज का युवा यदि समझ जाए कि कृष्ण ने जीवन से पलायन करने का अथवा निषेध का सन्देश कभी नहीं दिया तो बहुत सी कुण्ठाओं से मुक्ति पा सकता है | कृष्ण एक ओर जहाँ महान योगी थे तो दूसरी ओर ऐसे ऋषि भी थे कि जिन्होंने कभी वासना को महत्त्व नहीं दिया, जीवन के रस को महत्व दिया । वे सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान और सर्व का कल्याण व शुभ चाहने वाले हैं | अत्यन्त रूपवान होने के साथ साथ सत् असत् के ज्ञाता भी हैं । उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभासम्पन्न राजनीतिवेत्ता ही नहीं मिला वरन् एक महान कर्मयोगी और दार्शनिक भी प्राप्त हुआ, जिसका गीता ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है । आर्य जीवनचर्या का सम्पूर्ण विकास हमें कृष्ण के चरित्र में सर्वत्र दिखाई देता है । जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसे उन्होंने अपनी प्रतिभा के द्वारा प्रभावित नहीं किया | सर्वत्र उनकी अद्‌भुत मेधा तथा प्रतिभा के दर्शन होते हैं | एक ओर वे महान्‌ राजनीतिज्ञ, क्रान्तिविधाता, धर्म पर आधारित नवीन साम्राज्य के स्रष्टा राष्ट्रनायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं तो दूसरी ओर धर्म, अध्यात्म, दर्शन तथा नीति के सूक्ष्म चिन्तक, विवेचक तथा प्रचारक के रूप में भी उनकी भूमिका कम महत्व की नहीं है ।

महाभारत के युग में सामाजिक पतन के लक्षण दिखाई पड़ने लगे थे | गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वर्णव्यवस्था जन्मना जातियों के रूप में बदल चुकी थी । ब्राह्मण वर्ग अपनी स्वभावगत शुचिता, लोकोपकार भावना, त्याग, सहिष्णुता तथा सम्मान के प्रति तटस्थता जैसे सद्‌गुणों को भुलाकर संग्रहशील, अहंकारी तथा असहिष्णु बन चुका था । आचार्य द्रोण जैसे शस्त्र तथा शास्त्र में निष्णात ब्राह्मण अपनी अस्मिता को भूलकर और अपने अपमान को सहकर भी कुरुवंशी राजकुमारों को उनके महलों में ही शिक्षा देकर उदरपूर्ति कर रहे थे । कहाँ तो गुरुकुलों का वह युग था जिसमें महान से महान राजा महाराजाओं के पुत्र भी शिक्षा ग्रहण के लिए राजप्रासादों को छोड़कर आचार्यकुलों में रहते थे और त्याग, अनुशासन एवं संयम का जीवन व्यतीत करते थे | इसके विपरीत महाभारतयुग में ऐसा समय आया जब कुरुवृद्ध भीष्म के आदेश से द्रोणाचार्य ने राजमहल को ही विद्यालय का रूप दे दिया था । आज के विश्वविद्यालयों का सम्भवतः प्राचीन रूप यही था जहाँ शिक्षक को शिष्य द्वारा प्रदत्त शुल्क लेकर उसे पढ़ाना था । इस कुरुवंशीय विश्वविद्यालय का प्रथम स्नातक तो दुर्योधन ही था जिसके अनिष्ट कार्यों ने देश के भविष्य को दीर्घ काल के लिए अन्धकारपूर्ण बना दिया था । ऐसी दुर्व्यवस्था वाले कुरुराज्य को नष्ट करके पुनः उसी संयम, त्याग, काम-क्रोध-लोभ-मोह से रहित सर्वजनहितकारी व्यवस्था को पुनर्जीवित करना था | उनके समय में भारतवर्ष सुदूर उत्तर में गान्धार (आज का अफगानिस्तान) से लेकर दक्षिण की सह्याद्रि पर्वतमाला तक क्षत्रियों के छोटे-छोटे स्वतन्त्र किन्तु निरंकुश राज्यों में विभक्त हो चुका था । उन्हें एक सूत्र में पिरोकर समग्र भारतखण्ड को एक सुदृढ़ राजनीतिक इकाई के रूप में पिरोनेवाला कोई नहीं था । एक चक्रवर्ती प्रजापालक सम्राट्‌ के न होने से माण्डलिक राजा नितान्त स्वेच्छाचारी, प्रजापीड़क तथा अन्यायी हो गये थे। मथुरा का कंस, मगध का जरासन्ध, चेदि-देश का शिशुपाल तथा हस्तिनापुर के कौरव सभी दुष्ट, विलासी, दुराचारी तथा ऐश्वर्यमद में प्रमत्त हो रहे थे । कृष्ण ने अपनी नीतिमत्ता, कूटनीतिक चातुर्य तथा सूझबूझ से इन सभी अनाचारियों को जड़ से समाप्त करके धर्मराज की उपाधि धारण करने वाले अजातशत्रु युधिष्ठिर को आर्यावर्त के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर देश में चक्रवर्ती धर्मराज्य स्थापित किया | इसी प्रकार समकालीन सामाजिक दुरवस्था, विषमता तथा नष्ट हुए नैतिक मूल्यों के प्रति वे पूर्ण जागरूक थे । उन्होंने पतनोन्मुख समाज को ऊपर उठाया । स्त्रियों, शूद्र कही जाने वाली जातियों, वनवासियों, पीड़ितों तथा शोषितों के प्रति उनमें अशेष सम्वेदना तथा सहानुभूति थी । गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा आदि आर्यकुल की नारियों को समुचित सम्मान देकर उन्होंने नारी वर्ग की प्रतिष्ठा बढ़ाई ।

जिस प्रकार वे नवीन साम्राज्य निर्माता तथा स्वराज्यस्रष्टा युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए, उसी प्रकार अध्यात्म तथा तत्व-चिन्तन के क्षेत्र में भी उनकी प्रवृत्तियाँ चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुकी थीं । सुख और दुःख को समान समझने वाले, लाभ तथा हानि, जय और पराजय जैसे द्वन्द्वों को समान मानने वाले अनुद्विग्न, वीतराग तथा जल में रहने वाले कमलपत्र के समान वे सर्वथा निर्लेप तथा स्थितप्रज्ञ रहे । प्रवृत्ति और निवृत्ति, श्रेय व प्रेय, ज्ञान और कर्म, ऐहिक और पारलौकिक जैसी प्रत्यक्ष में विरोधी दीखने वाली प्रवृत्तियों में अपूर्व सामञ्जस्य स्थापित कर उन्हें निज जीवन में क्रियान्वित करना कृष्ण जैसे महामानव के लिए ही सम्भव था । उन्होंने धर्म के दोनों लक्ष्यों अभ्युदय और निःश्रेयस को सार्थक किया । अतः यह निरपवाद रूप में कहा जा सकता है और नि:संकोच स्वीकार किया जा सकता है कि कृष्ण का जीवन आर्य आदर्शों की चरम परिणति है । भारत में नाना सम्प्रदायों और भेदभावों के रहते हुए भी यदि एक केन्द्रीय मंच हो सकता है तो वह है श्रीकृष्णोपदिष्ट धर्ममार्ग | केवल इसी से हमारा राष्ट्रीय संगठन हो सकता है | श्रीकृष्ण के चरित्र में सर्वत्र समदर्शिता प्रकट होती है | सेवा भाव की वे साकार मूर्ति हैं | विश्वमंगल के लिये ही उन्होंने महाभारत जैसे भयंकर युद्ध का आयोजन कराया | अधर्म और अन्याय को समाप्त करने के लिये ही जरासंध और कंस का वध किया | बचपन से ही अनेक अलौकिक कार्य करके वे जनसाधारण की श्रद्धा और स्नेह के पात्र बन गए थे | वे सम्पूर्ण आर्यावर्त के सभी राजाओं के परम परामर्शदाता थे | उन्होंने अपने समय की कितनी ही अनावश्यक परम्पराओं को उखाड़ फेंका | गोवर्धनलीला इसका उदाहरण है | उन्होंने निरर्थक इन्द्रपूजा के विरुद्ध सार्थक गौपूजा की प्रथा चलाई | कृष्ण के युग में भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक नवीन विचारों, नवीन धार्मिक योजनाओं एवं नित्य नूतन आनन्द और मनोविनोद का वातावरण रहता था | उनकी महत्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उस युग के सर्वपूज्य विद्याविद एवं वयोवृद्ध महात्मा भीष्म ने भी युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया था |

इस प्रकार श्रीकृष्ण प्रेममय, दयामय, दृढ़व्रती, धर्मात्मा, नीतिज्ञ, समाजवादी दार्शनिक, विचारक, राजनीतिज्ञ, लोकहितैषी, न्यायवान, क्षमावान, निर्भय, निरहंकार, तपस्वी एवं निष्काम कर्मयोगी थे | वे लौकिक मानवी शक्ति से कार्य करते हुए भी अलौकिक चरित्र के महामानव थे |

भारतीय जनमानस में धार्मिक आस्था

भारतीय जनमानस में धार्मिक आस्था

हम प्रायः दो शब्द साथ साथ सुनते हैं – संस्कृति और धर्म | संस्कृति अपने सामान्य अर्थ में एक व्यवस्था का मार्ग है, और धर्म इस मार्ग का पथ प्रदर्शक, प्रकाश नियामक एवं समन्वयकारी सिद्धान्त है | अतः धर्म वह प्रयोग है जिसके द्वारा संस्कृति को जाना जा सकता है | भारत में आदिकाल से ही आदर्श व्यक्ति और आदर्श समाज के विकास के लिये धर्म का आश्रय लिया गया है | और धर्म की प्रधानता, धार्मिक प्रेरणा एवं धार्मिक भावनाओं का अन्य सब प्रेरणाओं पर प्रभुत्व केवल भारतीय संस्कृति की ही विशेषता नहीं है, अपितु यह सदा से ही मानव मन तथा मानव समाज की सर्वमान्य अवस्था रही है | भारत ने सम्पूर्ण धर्म का मूल वेद को स्वीकार किया है, अतः भारतीत दृष्टि के अनुसार जो वेदानुकूल है, वेद सम्मत है, वही धर्म है | वेदज्ञों की स्मृति तथा शील ही धर्म है, और यह शील तेरह प्रकार का है – ब्रह्मण्यता, देव-पितृ भक्ति, सौम्यता, अनसूयता, मृदुता, मित्रता, प्रियवादिता, सत्यता, कृतज्ञता, शरण्यता, कारुण्य, प्रशान्ति और वेदों के आचार तथा वेदों के वैकल्पिक विषयों में आत्मतुष्टि |

भारत एक धर्मप्राण देश है और यहाँ का जनमानस धर्म पर अवलम्बित है | जीवन के सभी छोटे बड़े कार्य यहाँ धर्म के आधार पर व्यवस्थित होते हैं | धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया है “धारयतीति धर्मः” अर्थात् समाज या व्यक्ति को धारण करने वाले तत्व को धर्म कहा जाता है | इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि “धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है | वास्तव में विश्व में विनाश की ओर जाने की प्रवृत्ति धर्मत्याग से ही आई है | प्राचीन समाज ने कहा “धर्मं चर” अर्थात् धर्म का आचरण करो, उसी से कल्याण होगा | आधुनिक समाज का नारा है “धर्म और ईश्वर की दासता से मुक्ति पाओ | यह दुर्बलता है | नियम बन्धन व्यर्थ हैं | मन स्वतन्त्र रहना चाहिये | मन की आज्ञा मानो |”

धर्म सदा एक ही है, अनेक नहीं हो सकता | अग्नि का धर्म उष्णता है, वह एक ही है, उसका अन्य कोई धर्म नहीं है | आज जो राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म, समाज धर्म, मानव धर्म आदि के नारे हैं वे सभी भ्रामक हैं | धर्म सौ दो सौ नहीं हो सकते | धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है ? दुःखहीन शाश्वत सुख पाने का भ्रान्तिहीन प्रयत्न ही धर्म है | धर्म का यही स्वरूप भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठित है | यही प्रयत्न मानव को अन्तर्मुखी बनाता है | जो प्रयत्न बहिर्मुख करता है वही अधर्म है | अन्तर्मुखी प्रेरणा भारत के जन जन में सर्वत्र देखने को मिल सकती है | धनी-निर्धन, पढ़ा लिखा-अनपढ़, हर व्यक्ति यही वाक्य कहता मिलेगा “अरे यह धन और धरती यहीं रह जाएँगे, कोई छाती पर रखकर नहीं ले जाएगा |” इस प्रकार सिद्ध होता है कि भारत के जन मानस में धर्म त्याग भावना के रूप में प्रतिष्ठित है | यह बात दूसरी है कि उसके अनुसार आचरण मुखर नहीं है |

भारत में उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक अनगिनत जातियाँ हैं | उन सबके अपने अपने कार्य व्यवहार हैं, रीति रिवाज़ हैं, जीवन यापन की अनेकों शैलियाँ हैं, अनेकों पूजा विधियाँ हैं, उपासना के पंथ हैं और अनेकों प्रकार के कर्म विस्तार हैं, तथापि उनका धर्म एक ही है | क्योंकि उन सभी को धर्म के दश लक्षण समान रूप से स्वीकार हैं – धृति क्षमा दामो अस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह, धीर्विद्या सत्यमक्रोध दशकं धर्मलक्षणं |” और यह जो कार्य व्यवहार में अनेकरूपता दिखाई देती है उसका कारण है स्वभावगत और परिस्थितिगत विभिन्नता | जीवन का क्षेत्र बहुत व्यापक है | मनुष्य को जन्म से मृत्यु तक अनेक अवस्थाओं को पार करना पड़ता है | अतः देश काल अवस्था पात्र आदि के भेद से व्यवहार में अनेकरूपता आ जाती है और कार्यक्षेत्र में प्रयत्नों के अनेक भेद हो जाते हैं | उदाहरण के लिये अन्तर्मुख होने का जैसा प्रयत्न पूजा के आसान पर हो सकता है वैसा भोजन के आसन पर नहीं | प्रत्येक कार्य में अन्तर्मुखता बनी रहे और मानसिक पवित्रता सुरक्षित रहे इसके लिये ही इतने कर्म विस्तार हैं |

यहाँ एक तथ्य यह भी विचारणीय है कि मानव की प्रकृति भी उसी प्रकार विकारी है जिस प्रकार विश्व के अन्य पदार्थ विकारी हैं | इसीलिये मनुष्य आदर्शों से अलग भी हटता है और उन आदर्शों के नाम पर ही अपने दम्भ का प्रसार भी करता है | जब दम्भ के द्वारा आदर्श आच्छन्न हो जाते हैं तो महापुरुष उस दम्भ का संशोधन करते हैं और ये संशोधन ही नवीन सम्प्रदाय बन जाते हैं तथा धर्म के नाम से पुकारे जाने लगते हैं | दम्भ का संशोधन करने वाले महापुरुष समाज की तात्कालिक विकृति को दूर करने के लिये देश और काल की परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग साधनों को प्रमुखता देते हैं | कभी सत्य को, कभी अहिंसा को, कभी अस्तेय त्याग ब्रह्मचर्य आदि को | क्योंकि ये ही सार्वभौमिक धर्म हैं | इन नये सम्प्रदाय प्रवर्तकों ने कभी यह नहीं कहा कि वे कोई नया धर्म चला रहे हैं | महापुरुषों द्वारा इन्हीं सार्वभौमिक धर्मों की शिक्षा मानव को दी गई न कि किसी सम्प्रदाय विशेष की | किन्तु धर्म विमुख लोगों ने उनके इस मार्ग में रुकावटें डालीं और संकीर्ण साम्प्रदायिक भावों तथा असहिष्णुता को जन्म दिया | इसी ने जन मानस की नैतिक भावना को एक ऐसा बहाना दे दिया कि वह अपनी सर्वोच्च प्रकृति और नियम नीति के प्रति विद्रोह कर उठा | यहाँ तक जो कुछ कहा गया है वह धर्म का स्वरूप स्पष्ट करने के लिये कहा गया है | ऐसा नहीं है कि इस युग में धर्म पर से आस्था और विश्वास बिल्कुल ही उठ गया है | अधिकाँश जन मानस आज भी जीवन मरण, लोक परलोक, ईश्वरीय विधान आदि पर आस्था रखता है | नवीनता के बहाव में बहकर भी उसे यह होश अवश्य है कि उसकी सुरक्षा का एकमात्र साधन धर्म ही है | आज भी वह प्रेम, त्याग, सज्जनता, सहिष्णुता, दयालुता आदि में आस्था रखता है और यह मानता है कि सच्चा ईश्वरीय राज्य राम और कृष्ण के आदर्शों से ही प्राप्त हो सकता है | इन आदर्शों को प्राप्त करने के लिये गीता रामायण आदि से ही प्रेरणा प्राप्त हो सकती है | पुनर्जन्म और मुक्तिवाद की सम्पत्ति आज तक भी इस देश में सुरक्षित है |

सामान्य रूप से भारत में छः दर्शन प्रचलित हैं | इनमें एक वर्ग उन दर्शनों का है जो नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं | इनमें प्रमुख है चार्वाक सिद्धान्त | यह दर्शन केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है | ईश्वर की सत्ता नहीं मानता और शरीर को ही प्रमुख मानता है | आत्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करता | बौद्ध दर्शन प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण मानता है | विश्व के सभी पदार्थों को क्षणिक मानता है | यह भाव जगत के अन्तः स्वरूप और दृश्य स्वरूप दोनों को सत्य मानता है और यह भी स्वीकार करता है कि जगत की बाह्य और अन्तः सत्ता दोनों स्वतन्त्र हैं | जैन दर्शन कर्मवाद को प्रमुखता देता है, जगत को अनादि मानता है | सत् को उत्पत्ति और विनाश से रहित स्वीकार करता है | सम्यक् दर्शन, सम्यक् चरित्र और सम्यक् ज्ञान ही मोक्ष के साधन माने जाते हैं | ईश्वर की सत्ता और वेद की प्रामाणिकता को जैन और बौद्ध दोनों ही दर्शन स्वीकार नहीं करते |

दूसरा वर्ग आस्तिक दर्शनों का है | आस्तिक दर्शन ईश्वर की सत्ता स्वीकार करते हैं और वेद को प्रमाण मानते हैं | इनमें सर्वप्रथम वैशेषिक दर्शन है | यह ईश्वर और जीव को नित्य तत्व मानता है और वेद को ईश्वरीय वाणी स्वीकार करता है | न्याय दर्शन प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द को प्रमाण मानता है | शरीर और आत्मा को पृथक मानता है | वेद की प्रामाणिकता तथा ईश्वर के कर्तृत्व को स्वीकार करता है | सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष दो तत्वों को स्वीकार करता है | प्रकृति अचेतन है और पुरुष चेतन | प्रकृति और पुरुष के विवेक से निर्लिप्त स्वरूप का ज्ञान हो जाना ही मोक्ष का हेतु है | वेदों की प्रामाणिकता सांख्य को स्वीकार है | योग दर्शन सांख्य का ही सहयोगी दर्शन है | मीमाँसा कर्मकाण्ड का दर्शन है | इसका उद्देश्य ही शास्त्रों पर प्रबल निष्ठा उत्पन्न करके अधर्म की निवृत्ति तथा धर्म की प्रवृत्ति करना है | इन सबके अतिरिक्त द्वैतवाद और अद्वैतवाद आदि मान्यताएँ भी हैं | ये सब वैष्णव दर्शन कहे जाते हैं | शैव और वैष्णव दोनों दर्शन सविशेष ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं |

ये सभी दर्शन एकत्व में अनेकत्व और अनेकत्व में एकत्व का बोध कराते हैं | उपनिषदों और पुराणों के द्वारा वेदार्थ का विस्तार करके आचार्यों ने धर्म के व्यावहारिक एवं व्यापक रूप को व्यक्त करने का प्रयास किया है, और यही धार्मिक आस्था भारतीय जन मानस में व्याप्त है | आज हमारे समाज के मानस में पुराणों द्वारा प्रतिपादित आस्था व्याप्त है | हमारे जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जिस पर धार्मिकता का प्रभाव न हो | जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सोलह संस्कारों से सभी परिचित हैं | हमारे जन्म के समय गए जाने वाले सोहर, विवाह के अवसर के घोड़ी बन्ने, पर्वों और उत्सवों पर गए जाने वाले गीत सभी में धार्मिक आस्था झलकती है | नृत्य, लोक गाथाएँ, लोक संगीत सभी पूर्णतः धार्मिकता से ओत प्रोत हैं | भारत के किसी भी प्रान्त के निवासी – चाहे वे आदिवासी हों या जनजातियाँ हों – सभी के मनों में धार्मिक आस्था समान रूप से विद्यमान है | देव पूजा, श्राद्ध, पितृ पूजा सभी को स्वीकार्य है | चाहे कश्मीर के अमरनाथ हों या गुजरात के रंगनाथ, उदयपुर के द्वारकाधीश हों, कच्छ के सोमनाथ हों अथवा मध्यप्रदेश के महाकाल, तमिल के तिरुपति बाला जी हों या केरल के गुरुवयूर हों अथवा तमिलनाडु के पद्मनाभ, उड़ीसा के जगन्नाथ, बिहार के वैद्यनाथ, बंगाल की महाकाली, नेपाल के पशुपतिनाथ हों अथवा काशी के विश्वनाथ, अयोध्या के राम हों या मथुरा के कृष्ण – सभी में सारे ही भारतवासियों की पूर्ण आस्था है | बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार और रामेश्वर सभी हम सबके लिये दिव्य तीर्थ हैं | शिव, विष्णु, दुर्गा, सरस्वती, सूर्य, गायत्री सभी के उपास्य हैं | सन्ध्या उपासना और ब्रह्म विद्या में सभी की आस्था है | शिष्टाचार, अभिवादन और आशीर्वाद सर्वत्र एक ही रूप में स्वीकृत है | हमारे व्रतोत्सव होली दिवाली विजयदशमी जन्माष्टमी शिवरात्रि दुर्गा पूजा गणेश पूजा सभी हमारे धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं | स्वर्ग नरक देवलोक प्रेतलोक आदि की मान्यताएँ सिद्ध करती हैं कि इस धार्मिक आस्था के कारण ही भारत एक है, अखण्ड है | गौ की महत्ता और मातृ भूमि के प्रति स्वर्ग से भी बढ़कर आदर हमारी धार्मिक आस्था के आधार हैं | आदि शंकराचार्य, निम्बकाचार्य, बल्लभाचार्य, रामानन्द, चैतन्य, रामदास, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, कबीर, नानक, सूर, तुलसी, मीरा आदि द्वारा स्थापित की हुई धार्मिक आस्था ही आज भारतीय जन मानस में व्याप्त है और सदा व्याप्त रहेगी | आज जो संघर्ष और विघटनकारी स्थितियाँ हैं वे केवल धार्मिक आस्था के अभाव के कारण ही हैं | यदि हम अपने इन धार्मिक आदर्शों का पालन करना आरम्भ कर दें तो वर्तमान की बहुत सी समस्याओं का समाधान हो सकता है |

सार्वभौम धर्म

सार्वभौम धर्म

“ध्रियते लोकोऽनेन, वा धारयतीति धर्मः |”

अभी कल ही हमारी सोसायटी के सेक्रेटरी साहब हमसे बोले “डॉ. साहब अप तो इतने प्रोग्राम्स कराती रहती हैं, आप निश्चित रूप से किसी ऐसे ग्रुप को जानती होंगी जो जन्माष्टमी पर अपने मन्दिर में रात १२ बजे तक भजन कर्तन कर सके, लोग चाहते हैं कि मन्दिर में कुछ ऐसा हो |” सुनते ही मन में आया कि कहीं माता की चौकी जैसा ही कार्यक्रम तो नहीं चाहिये इन लोगों को ? आजकल यह भी एक चलन चल निकला है | कोई सामाजिक या धार्मिक पर्व हो, किसी के परिवार में कोई धार्मिक आयोजन हो, किसी के परिवार कोई शादी ब्याह हो या बच्चे का जन्म हो अथवा किसी अन्य प्रकार का मांगलिक कार्यक्रम हो, ऑर्केस्ट्रा पार्टी बुलाकर आधी आधी रात तक फुल वाल्यूम में माइक लगाकर फिल्मी गीतों की धुन पर माता के भजन, या अन्य देवी देवताओं के भजन गाए बजाए जाते हैं | ऑर्केस्ट्रा पार्टी में जो गायक गायिकाएँ आती हैं वे संगीत के ज्ञान से कोसों दूर होती हैं | और उन लोगों का वह सुर ताल से विहीन कानफोडू संगीत आधी आधी रात तक झेलना पड़ता है | और कई बार तो हद हो जाती है जब रात को बारह बजे तक भी इन लोगों का यह कार्यक्रम समाप्त नहीं होता | कभी कभी तो सारी सारी रात इस प्रकार के कार्यक्रम चलते रहते हैं | तब अन्ततोगत्वा कुछ लोग सौ नंबर पर फोन करके पुलिस को बीच में डलवाकर माइक बन्द कराते हैं | इस प्रकार फूहड़ता भरे कार्यक्रमों का आयोजन करते समय लोग – सभ्यता के नाते ही सही – इतना भी नहीं सोचते कि किसी के घर में कोई व्यक्ति अस्वस्थ हो सकता है, उस पर कितना विपरीत प्रभाव होगा इस शोर का ? किसी बच्चे की परीक्षा हो सकती है अगले दिन जिसके लिये उसे पढ़ाई करनी होगी, किसी को इंटरव्यू के लिये जाना हो सकता है अच्छी नौकरी की तलाश में – रात भर इस शोर के कारण क्या वे लोग अपनी परीक्षा अथवा इंटरव्यू की तैयारी कर पाएँगे ? और यदि व्यक्तिगत स्तर पर इस शोर को बन्द कराने का प्रयास कोई व्यक्ति करता है तो उसे “नास्तिक” की संज्ञा दे दी जाती है | कहीं कोई तथाकथित “धर्मगुरु” भांति भांति के आडम्बर अपनाने की सलाह अपने शिष्यों को देते दीख पड़ते हैं | कहीं कुछ धर्मगुरु स्वयं को “भगवान” तक घोषित कर देने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करते | तरह तरह के रूप धर कर भाले भक्तों को ठग कर धर्म के प्रति उनकी आस्था का मखौल उड़ाकर उन्हें ठगते हैं | धर्म में अंधी आस्था रखने वाली जनता ऐसे ढोंगियों के हाथों निरंतर ठगी जाती रहती है | कहीं धर्मपालन के नाम पर तो कहीं जाति के आधार पर छुआ छूत को प्रोत्साहन दिया जाता है | कहीं व्यक्तिगत शत्रुता निकालने के लिये या किसी अन्य लालच के कारण धर्म के नाम पर मासूम बच्चों को बलि चढ़ा दिया जाता है | कहीं कट्टरवाद को प्रोत्साहन दिया जाता है और “दूसरे” धर्मावलम्बियों के साथ आक्रामक व्यवहार किया जाता है | क्या यही सब कहलाता है धर्माचार ? क्या हमारे ऋषि मुनियों ने इसी प्रकार की फूहड़ता के प्रदर्शन को धर्म कहा था ? क्या दूसरों को कष्ट पहुँचाना अथवा दूसरों के साथ छल करना, दूसरों को धोखा देना, असत्य भाषण करना अथवा कट्टरवादिता – यही सब है धर्म का लक्ष्य है ? क्या इसी प्रकार के दम्भी, ठगवृत्ति, अज्ञानी व्यक्तियों को तत्ववेत्ता “धर्मगुरु” कहा जाता है ?

यदि नहीं, तो फिर धर्म है क्या ? धर्म का लक्ष्य क्या है ? तत्ववेत्ता धर्मगुरु किसे कहा जाना चाहिये ? निश्चित रूप से इन प्रश्नों का उत्तर खोजना कोई सरल कार्य नहीं है | क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति इन प्रश्नों का उत्तर अपनी अपनी रूचि, अपनी सुगमता तथा धर्म पालन की अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार देगा | किन्तु वास्तव में देखा जाए तो इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि परमात्मा के तत्व को यथार्थ रूप में जानने वाले तत्ववेत्ता महापुरुषों द्वारा दी गई जनकल्याणकारी शिक्षा ही धर्म है | तथा धर्म का अन्तिम लक्ष्य है प्राणिमात्र का कल्याण | गीता में इन महापुरुषों के लक्षण बताते हुए लिखा है :

“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च, निर्ममो निरहंकारः समदु:सुखः क्षमी |
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः मयार्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ||” गीता १२/१३-१४
….. द्वेष भाव एवं स्वार्थ से रहित, सबमें स्नेह करने वाला, दयालु, अनासक्त, अहंकार से रहित, सुख दुःख में समान, क्षमावान, योगी, यती, दृढ़निश्चयी तथा ईश्वरार्पित बुद्धि वाला मनुष्य ही तत्वज्ञ महापुरुष है | साथ ही :

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः, तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः |
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः, सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ||” गीता १४/२४-२५
….. जो आत्मभाव में स्थित रहकर सुख दुःख को समान समझता है तथा मिट्टी पत्थर और स्वर्ण में भी समता का भाव रखता है, जो धैर्यवान है, प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है, जो अपनी निंदा स्तुति में भी समान भाव रखता है, मान और अपमान में भी जो सम है, शत्रु और मित्र में भी जो समता का व्यवहार करता है तथा जो कार्य करते समय इस बात का अभिमान नहीं करता कि यह कार्य तो मैंने किया है वही पुरुष महापुरुष कहलाता है | उसी को तत्वज्ञान होता है | ऐसे ही पुरुषों के द्वारा दी गई शिक्षा धर्म कहलाती है |

धर्म का चरम लक्ष्य होता है संसार को हर प्रकार के ताप से मुक्त कर उसे अनन्त सुख की अन्तिम सीमा तक पहुँचाकर सदा के लिये आनन्दमय बना देना | जिस धर्म का लक्ष्य इतना पावन है, इतना विशाल है – उस धर्म में कट्टरवाद के लिये तो कोई स्थान रह ही नहीं जाता | फिर क्या कारण है कि आज मनुष्य मैं हिंदू हूँ, यह मुसलमान है, वह सिख है, वह ईसाई है – इस प्रकार के झगड़ों में पड़ा रहता है ? और इतने पर ही इतिश्री नहीं हो जाती | एक ही धर्म की विभिन्न शाखाओं के अनुयायी तथाकथित कट्टरवाद के नाम पर एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते रहते हैं | और इसी प्रयत्न के चलते गुण्डागर्दी, अराजकता, व्यभिचार और भ्रष्टाचार का साम्राज्य चारों ओर फैलता जा रहा है | इस स्थिति में क्या कोई भी सुखी और शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकता है ? आज समाज जो इस स्थिति में पहुँच गया है उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हम धर्म के उस उदात्त और पावन लक्ष्य को भूल चुके हैं जो हमारी भारतीय संस्कृति का मूलाधार था और जिसके लिये कहा गया था कि “अस्य देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा: |” धर्म के उस महान लक्ष्य से च्युत होकर धर्म को हमने सामन्तवाद, जातिवाद, अर्थवाद, राजनीतिवाद आदि के साथ जोड़ दिया है | हमारे “धर्मगुरु” भी इन्हीं सब बातों में उलझ कर रह गए हैं | अब समय आ गया है कि हम इस सबसे बाहर निकल कर एक बार फिर धर्म के उसी महान आदर्श की स्थापना का प्रयत्न करें |

धर्म के विषय में स्मृतियों, पुराणों, उपनिषदों आदि में पृथक पृथक परिभाषाएँ प्राप्त होती हैं, किन्तु अन्ततोगत्वा वे सभी परिभाषाएँ धर्म के उसी आदर्श का मार्ग प्रशस्त करती हैं जिसके अनुसार प्राणिमात्र को कल्याण की प्राप्ति हो | गीता में कहा गया है :
“अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः, दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जनम् ||
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपेशुनम्, दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ||
तेजः क्षमा धृतिः शोचमद्रोहो नातिमानिता, भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ||”

… सर्वथा भय का अभाव, आन्तरिक स्वच्छता, ज्ञान योग में दृढ़ स्थिति, इन्द्रियदमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सत्य – अन्तःकरण तथा इन्द्रियों द्वारा जो कुछ सोचा अथवा अनुभव किया गया उसी का कथन सत्य कहलाता है, अक्रोध, त्याग, शान्ति, मन वाणी अथवा कर्म से किसी को भी कष्ट न पहुँचाना, कर्तापन के अभिमान का त्याग, प्राणिमात्र में फल की भावना के बिना दयाभाव, अनासक्ति, लोक व शास्त्र विरुद्ध आचरण में लज्जा, तेज, क्षमा तथा धृति ये सब भीतर और बाहर दोनों की शुद्धि है | सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की, उस द्रव्य से प्राप्त अन्न से आहार की, तथा उत्तम आहार से विचारों के शुद्ध हो जाने के कारण यथायोग्य व्यवहार से आचरण की शुद्धि बाह्य शुद्धि है | तथा राग द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश करके अन्तःकरण की शुद्धि भीतरी शुद्धि है | ये सभी दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए पुरुष के लक्षण हैं | वस्तुतः आचरण ही धर्म का मूलभूत कारण है | इसी कारण मनु ने कहा है “आचारहीनं न पुनन्ति देवाः |” मनुस्मृति में लिखा है “धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचामिन्द्रियनिग्रह:, धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् |” – ६/९२ इसी प्रकार “अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:” – योग. २/३०

अहिंसा, सत्यभाषण, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य का पालन और भोग सामग्रियों का संचय न करना – ये पाँच यम हैं, तथा बाहर भीतर की पवित्रता, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और सर्वस्व ईश्वर के अर्पण करना – ये पाँच नियम हैं | इन सबका निष्काम भाव से पालन करना ही सच्चा धर्माचरण है | मनु के अनुसार वाचिक, शारीरिक और मानसिक पाप धर्मविरुद्ध आचरण हैं | ये तीनों ही पाप दु:खों का कारण बनते हैं | विष्णु स्मृति में लिखा है “त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः, कामक्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् |” – काम, क्रोध और लोभ ये तीनों मनुष्य के शत्रु हैं और नरक के द्वार हैं, अतः इन्हें त्यागना चाहिये | याज्ञवल्क्य ने भी लिखा है “विहितस्याननुष्ठानात् निन्दितस्य च सेवनात्, अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणाम् नरः पतनमृच्छति |” – धर्मानुरूप कर्मों का त्याग तथा निन्दनीय कर्मों के करने से मनुष्य का पतन होता है | धर्मपरायण व्यक्ति से ईश्वर स्वयं ही स्नेह करता है |

इस प्रकार कथनान्तर से सभी स्मृति पुराण उपनिषदों आदि में उसी व्यवहार को धर्म की संज्ञा दी गई है जिससे सत्त्वगुण की वृद्धि हो, अन्तःकरण की शुद्धि हो, तथा दिव्य गुणों का विकास हो | अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरभक्ति, सदसत् का यथार्थ ज्ञान, वैराग्य, मन व इन्द्रियों को वश में रखना, सहनशीलता, श्रद्धा, क्षमा, वीरता, दया, तेज – उस शक्ति को प्राप्त करने का प्रयत्न करना जिसके प्रभाव से विषयासक्त नीचप्रकृति व्यक्ति भी पापाचरण से हटकर श्रेष्ठ कार्य में लग जाएँ, सरलता, स्वार्थत्याग, ढोंग न करना, किसी की निंदा या चुगली न करना, निष्कपटता, विनय, धैर्य, नि:स्वार्थ सेवा, निर्वैरता तथा निर्भयता, समता, निरहंकारता, मैत्री, दान, कर्तव्यपरायणता, शान्ति – इच्छा और वासनाओं का अभाव होकर अन्तःकरण में निरन्तर प्रसन्नता का भाव रहना – इन्हें सभी ने धर्म माना है | इन्हीं के पालन से प्राणिमात्र का कल्याण संभव है | इन्हीं के पालन से परम पद की प्राप्ति तथा अलौकिक अभ्युदय के साथ साथ मुक्ति रूप परम कल्याण की प्राप्ति होती है | ऐसे ही पुरुषों के लिये कहा गया है “वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः, एतच्चतुर्विघं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् |”

आज हम अपने इस चिरकालीन धर्म के आदर्श को भूल चुके हैं | ऐहिक सुखों के पीछे पागल हो रहे हैं | आज हमने केवल भौतिक सुखों को ही धर्म का ध्येय मानने वाले मतों का अनुसरण आरम्भ कर दिया है | परमानन्द प्राप्ति के लक्ष्य को भूलकर हम केवल विविध भोगों की प्राप्ति के प्रयत्न को ही अपना कर्तव्य समझ बैठे हैं | हममें से अधिकाँश तो धन, नाम और यश प्राप्ति में ही अपना दुर्लभ और अमूल्य जीवन नष्ट कर देते हैं | जो उचित नहीं है – देश, जाति तथा समाज के लिये दुर्भाग्यपूर्ण है |

अस्तु; अपनी बुद्धि से लोक कल्याणार्थ धर्म का पालन ही श्रेयस्कर है | हमें समस्त प्रकार के दिखावे, ढोंग, आडम्बरों का त्याग करके पुनः उसी धर्म के आदर्श का स्मरण करके, उसके महत्व को भली भांति समझ कर उसका पालन करने की आवश्यकता है | तभी हमें सच्चा आनन्द और शान्ति प्राप्त हो सकती है | धर्म की उस भावना को स्मरण करके ही हम प्राणिमात्र का तथा स्वयं का भी कल्याण कर सकते हैं | केवल ऐहिक सुख बताने वाला धर्म वास्तविक धर्म हो ही नहीं सकता | अतः सार्वभौम धतं वही है जिसके पालन से महान से महान नित्य और निर्बाध आनन्द की प्राप्ति हो और जिसमें सबका अधिकार हो |

वेदान्त से आधुनिक हिंसक प्रवृत्तियों का समाधान

वेदान्त से आधुनिक हिंसक प्रवृत्तियों का समाधान

अखबारों में, टी वी पर, रेडियो पर आए दिन ही न जाने ऐसी कितनी घटनाएँ पढ़ने, देखने सुनने को मिल जाती हैं जिनके विषय में जानकार वास्तव में मन विचलित हो जाता है | कभी कभी तो मनुष्य की दूसरे मनुष्य अथवा जीवित प्राणी के प्रति क्रूरता देखकर आश्चर्य होता है कि कहाँ त्याग दी हमने अपनी मानवता ? कभी पता चलता है कि पति अथवा पत्नी ने विवाहेतर सम्बन्धों से खिन्न होकर अथवा किसी अन्य प्रकार की ईर्ष्या अथवा लालच के कारण अपने जीवन साथी की हत्या कर दी | कभी सम्पत्ति विवाद भाई भाई और पिता पुत्र के मध्य दुश्मनी हत्या जैसा जघन्य अपराध करवा देता है | आफिसेज़ में काम करने वालों के मध्य ईर्ष्या द्वेष का वातावरण बन जाता है | प्रतिद्वन्द्विता और ईर्ष्या द्वेष में अन्तर है | एक ओर जहाँ प्रतिद्वंद्विता के चलते लोगों की कार्यशैली में सुधार होता है, क्योंकि हर कोई स्वयं को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहता है और इस प्रकार कुछ नया, कुछ अच्छा सीखने की भावना भी बनती है, वहीं दूसरी ओर साथियों की प्रगति देखकर ईर्ष्या और द्वेष के चलते आपराधिक प्रवृत्तियों में वृद्धि होती है |

ये तो हुई ईर्ष्या द्वेष लालच और क्रोध आदि की बात | मिथ्या अहंकार और दम्भ के कारण भी आपराधिक घटनाओं में वृद्धि होती है | मनुष्य स्वयं को दूसरे व्यक्ति से बड़ा मानता है – कहीं प्रतिष्ठा में, कहीं धन सम्पत्ति आदि में तो कहीं ज्ञान के क्षेत्र में | और तब वह सामने वाले को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ता | और इतना ही नहीं, कभी कभी तो जिसे अपने से निम्न स्तर का समझता है उसके प्रति हिंसक भी हो जाता है | उच्च पद पर आसीन व्यक्ति अपने से निम्न पद वाले को घृणा की दृष्टि से देखता है | अभी कुछ दिन पहले किसी परिचित ने बताया कि उनकी किसी मित्र ने अपने यहाँ घरेलू काम करने वाली नौकरानी – जो मात्र चौदह बरस की बच्ची है – को बुरी तरह पीटा | सम्भव है उस बच्ची से कोई भूल हो गई हो | पर इसका यह अर्थ तो नहीं कि मालिक को यह अधिकार मिल गया कि नौकरों पर हाथ छोड़ बैठें | कोई भूल उस बच्ची की थी भी तो उसके माता पिता को बताना चाहिये था | एक दिन अपने ड्राइंग रूम की खिड़की से देखा कि एक छोटी सी बच्ची, यही कोई दस बरस की रही होगी, सोसायटी में ही किसी घर में करती है | उसकी मालकिन ने उसे तीन चार साड़ियाँ देकर नीचे पार्क में सुखाने के लिये भेजा | छोटी बच्ची – खेल में मन लगा हुआ – उसने तीन साड़ियाँ तो पौधों के ऊपर फैला दीं, लेकिन चौथी साड़ी के साथ खेलने लगी | उसे अपने तन पर लपेट कर नाचने लगी | अभी मैं उसके इस प्रकार से मस्ती भरे बालनृत्य को देखकर मन ही मन प्रसन्न ही हो रही थी कि अचानक से एक गरजती हुई आवाज़ कानों में पड़ी “कोयल…. ये क्या साड़ी ख़राब करेगी मेरी….? तेरी माँ भरेगी क्या इसका पैसा….?” और इसके साथ ही पार्क में आती उस महिला ने ज़ोरदार झापड़ उस बच्ची के नाज़ुक गाल पर रसीद कर दिया | एक पल को तो मैं सकते में आ गई | क्या कोई माँ अपने बच्चे को इस तरह मार सकती है ? यदि नहीं, तो फिर उस काम वाली बच्ची पर इतनी हिंसा क्यों ? और वह महिला कोई साधारण महिला नहीं है | वह योग की शिक्षा देती हैं, स्वयं को बहुत अधिक धार्मिक तथा मुझ जैसी मन्दिर न जाने वाली महिलाओं को हेय दृष्टि से देखती हैं | और तब मैं सोचने लगी कि क्या यही है हमारा धर्म ? क्या इस प्रकार का व्यर्थ का दम्भ ही धर्म कहलाता है ? काश हम अपनी दार्शनिक दृष्टि को भली भांति समझकर अपने आचरण में उतार पाते | हमारे दर्शनों की तो मान्यता ही रही है कि “धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ॥“ अर्थात धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को क्षमा कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना); ये दस धर्म के लक्षण हैं । साथ ही जो व्यवहार हमें अपने लिये बुरा लगता है वही व्यवहार हमें दूसरों के साथ कभी भी नहीं करना चाहिये – यह धर्म की कसौटी है । “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥“ प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ! यह सत्य भारत में ही उद्घाटित हुआ था | फिर क्यों हम इस प्रकार के भेद भाव को स्थान देते हैं अपने जीवन में ?

हमारे वेदों में यज्ञ यागादि पर बल दिया गया है | यज्ञ का संकल्प लेते समय एक मन्त्र बोला जाता है “आनोभद्राक्रतवोयन्तुविश्वतोदब्धासोअपरीतासउद्भिदः । देवानोयथासदमिद्वृधेअसन्नप्रायुवोरक्षितारोदिवेदिवे ॥“ ऋग्वेदसंहिता, मण्डल १, सूक्त ८९, ऋचा १ प्रस्तुत मन्त्र का शाब्दिक अर्थ है कि जो भी हमारे लिये कल्याणकारी हों, हिंसा से रहित हों, किसी भी प्रकार के व्यवधान से रहित हों तथा शत्रु का नाश करने वाले हों ऐसे यज्ञ हमें चारों ओर से प्राप्त हों तथा उन यज्ञों के देवता हमारा कभी त्याग न करें, प्रतिदिन हमारी रक्षा करें और सदैव हमें परिवर्धित करते रहें, हमें उन्नत बनाते रहें | लगभग ये सभी यज्ञ प्रतिदिन किये जाने वाले कर्मकाण्डों की श्रेणी में आते हैं | किन्तु यदि व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो हमारे भीतर रहने वाले सद्विचार तथा उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग ही वास्तविक यज्ञ हैं | यहाँ विचारणीय यह है कि इन यज्ञों में व्यवधान डालने वाले शत्रु कौन हैं | हमारे भीतर निहित आसुरी प्रवृत्तियाँ तथा सत्कर्म से विचलित करने वाले विचार वास्तविक शत्रु हैं | हमारे यज्ञ उन आसुरी शक्तियों का नाश करने वाले हों – यही भावना उपरोक्त मन्त्र में निहित है | अर्थात कल्याणकारी सत्कर्मों की प्रेरणा हमें सभी दिशाओं से, सभी सत्पुरुषों से प्राप्त हो और हमारे ये सत्कर्म हमारे भीतर की समस्त आसुरी अथवा मानवताविरोधी प्रवृत्तियों को नष्ट करे ताकि हम सभी सदा उन्नति की ओर अग्रसर रहें | इस प्रकार मानव मात्र के कल्याण की कामना ही इन यज्ञों तथा इन ऋचाओं के मूल में निहित है | जबकि आजकल लगभग सभी यज्ञों का लक्ष्य, सभिप्रकार के धर्माचरणों का लकी केवल भौतिक सुखों की उपलब्धि रह गया है | हमारे किसी कृत्य से किसी को कष्ट होता है तो होता रहे, हमें तो येन केन प्रकारेण अपना काम निकालना है | बस हम और हमारा परिवार | यहाँ तक कि आजकल अधिकाँश धर्मगुरु भी अपने “परलोक” के लिये उतने चिन्तित नहीं होते जितना दूसरों के “परलोक सुधार” के लिये |

वास्तव में व्यक्ति के मन में तीन जिज्ञासाएँ होती हैं जिनका वह समाधान चाहता है | तीन प्रकार के प्रश्न उसके मानस में घुमड़ते रहते हैं – मैं कौन हूँ ? यह जगत क्या है तथा इसका स्वरूप क्या है ? मेरा इस संसार के साथ सम्बन्ध क्या है ? और इन्हीं जिज्ञासाओं के कारण अस्तित्व में आए विविध दर्शन | आचार अर्थात आचरण और क्रिया तथा विचार अर्थात सोचना ये दो अंग हैं किसी भी दर्शन के | धर्म विविध दर्शनों के बाह्य रूप कहे जा सकते हैं | यद्यपि आजकल इस “धर्म अथवा सम्प्रदाय” को ही दर्शन की संज्ञा दी जाने लगी है | और उसका प्रमुख कारण है कि आज का मनुष्य भौतिकता की अंधी दौड़ में इस हद तक व्यस्त हो चुका है कि उसके पास चिन्तन मनन के लिये अवकाश ही नहीं रह गया है | अत: धर्म के रूप में उसे जो कुछ भी ठोस अथवा व्यावहारिक दीख पड़ता है उसी का पालन करके वह सन्तोष अनुभव कर लेता है | और यही कारण है कि किसी-न-किसी धर्म की ओर सदा से ही लोगों का अनुराग रहा है | जो लोग धर्म का आदर नहीं करते उन्हें नास्तिक कहा जाता है तथा उन्हें सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता | धर्मों की प्रवृत्ति का मूल स्रोत दार्शनिक होते हुए भी हम इस उस गुरु की खोज में लगे ही रहते हैं | किन्तु ये धर्मप्रचारक गुरु दार्शनिक ज्ञान का अभाव होने के कारण लोगों की जिज्ञासाओं का समाधान करने में असफल रहते हैं | और इसी के कारण विविध धर्म और सम्प्रदायों के मध्य धार्मिक तथा साम्प्रदायिक क्लेश की स्थति बन जाती है | रूढ़िवाद पनपता है | दम्भ अपने पैर पसारने लगता है | किन्तु सत्य तो यह है कि आत्मा की ज्ञानपिपासा दार्शनिक विचारों से ही शान्त होती है, न कि धर्म से | क्योंकि सभी धर्मों का मूलाधार दार्शनिक विचार ही हैं | और इस प्रकार ज्ञात होता है की किसी एक ही ध्येय की खोज में एक ही निर्विवादित और सर्वजनानुभूत मार्ग – सत्य, दया, मैत्री आदि – का अनुसरण करने वाले इन समस्त धर्म सम्प्रदायों का मूलाधार एक ही है | यही वेदान्त है | वेदान्त अर्थात समस्त ज्ञानों के प्रति निष्ठा, समस्त ज्ञानों का पर्यवसान, समस्त ज्ञानों का निष्कर्ष | इस प्रकार वेद अर्थात ज्ञान, विवेक, विचार आदि का निष्कर्ष, उनका परिणाम ही वेदान्त है | और निष्कर्ष अथवा परिणाम में किसी प्रकार के द्वंद्व के लिए स्थान ही नहीं होता | यही है अद्वैतवाद | जिसने प्रकृति और जीव दोनों को एक करके ब्रह्म में ही एकाकार कर दिया |

देखा जाए तो एकता न हो तो सब कुछ समाप्त हो जाए | वैदिक चिंतकों की दृष्टि में मनुष्य देह भौतिक तत्वों से बना है, परंतु उसमें निहित चेतना शक्ति का स्रोत आत्मा है । संसार की रचना में जिन गुणों का, तत्वों का, परमाणुओं का मेल होता है जब उनमें किसी प्रकार का असंतुलन अथवा बिखराव की स्थिति आ जाती है तो वही स्थिति प्रलय की स्थिति कही जाती है | यही कारण है की प्रत्येक दर्शन में इस एकता का अन्वेषण दृष्टिगत होता है | कहीं स्थूल जगत और त्रिगुणात्मक प्रकृति का मेल दिखाई देता है, तो कहीं ईश्वर सत्ता और जीव सत्ता में परस्पर सान्निध्य का भाव दिखाई देता है, कहीं प्रकृति और पुरुष दो तत्वों को मानकर उन्हीं में समस्त संसार समाहित कर दिया गया, और कहीं – वेदान्त में – अद्वैतवाद में – प्रकृति और पुरुष का भेद मिटाकर उन्हें एक करके ब्रह्म में ही लीन कर दिया गया | और यही कारण है कि वेदान्त में लगभग सभी की आस्था है |

वेदान्त-दर्शन एक ऐसा दर्शन है जिसे मनीषियों ने कुछ आध्यात्मिक सत्यों के आविष्कारक ऋषियों द्वारा स्वतःस्फूर्त कथनों का संग्रह करके क्रमानुसार व्यवस्थित ढंग से विकसित किया | बाद में इसी को प्रमुख आधार मानकर दर्शन की कई शाखायें विकसित हो गईं | उनमें से तीन मत – द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैतवाद ऐसे मत हैं जो सम्पूर्ण वेदान्त दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं | संक्षेप में कहा जाय तो द्वैतवाद के अनुसार जीव-जगत और ईश्वर सभी एक दूसरे से पृथक हैं | ईश्वर प्रेमस्वरूप है, वह ही इस जगत का सर्जक, पालक और संहारक है | विशिष्टाद्वैत में यह माना जाता है कि अस्तित्व की प्रत्येक वस्तु चाहे वह कितनी भी क्षुद्र क्यों न हो, उस पूर्ण का अंश है जो पूर्ण अर्थात ईश्वर है | अद्वैत दर्शन दृढ़ता से यह घोषित करता है कि केवल ब्रह्म अथवा ईश्वर का ही अस्तित्व है | अज्ञान के कारण ही हम लोग जीव और जगत को ईश्वर से भिन्न देखते हैं | ये सभी मार्ग सत्य हैं | क्योंकि एक ही सत्य को विभिन्न दृष्टिकोण से देखते हैं, तथा पहले अपने को दूसरों से बिल्कुल पृथक समझने का जो भ्रम सबमें विद्यमान होता है उसे क्रमशः दूर करते हुए ये सभी मत विश्व को एकता के लक्ष्य तक पहुंचा देने में समर्थ हैं |

समस्त जगत को ब्रह्मस्वरूप अर्थात आत्मस्वरूप देखना ही वास्तविक दर्शन है तथा किसी भी धर्म का मूलाधार भी है | जिसके अनुसार प्रत्येक प्राणी की आत्मा एक ही है – वही परब्रह्म – अतः व्यक्ति को किसी पर दया का भाव रखे बिना मानव सेवा या प्राणिमात्र की सेवा करनी चाहिये | किसी अन्य पर दया का भाव आते ही भेद आ जाता है | यह मुझसे नीचा है इसलिए मैं इसके लिये कुछ भी कर रहा हूँ | साम्य भाव में स्थित पुरुष के मन में ऐसा विचार आएगा ही नहीं |

व्यावहारिक दृष्टि से भी देखें तो यदि हम चाहते हैं कि संसार में अबाध गति से प्रेम का झरना प्रवाहित होता रहे, परस्पर मेल मिलाप रहे, परस्पर द्वंद्व का अभाव हो जाए तो एकता ही एकमात्र उपाय है | जिन दो वस्तुओं के मध्य अथवा दो प्राणियों के मध्य अन्तर का – द्वित्व का भाव रहेगा वहाँ प्रेम का उतना ही अभाव रहेगा | जिस प्रकार ईश्वर में परम प्रेम रूप भक्ति की इच्छा रखने वाले को स्वयम् ईश्वररूप हो जाना होता है – अपने तथा उस ईश्वर के मध्य भेद को मिटा देना होता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियों के साथ अथवा समस्त वस्तुओं के साथ प्रेम स्थापित करने के लिये ह्रदय में तद्वदेव भाव को स्थान देना होगा | अन्यथा जितना प्रेम स्व से होगा उतना पर के साथ विकसित नहीं हो पाएगा और जाने अनजाने किसी न किसी प्रकार का अपराध, अनाचार होने की सम्भावना बनी रहेगी | “आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति |” यही रहस्य है अद्वैतवाद का, वेदान्त का, वसुधैव कुटुम्बकम् का – और इसी से सम्भव है मानव मात्र का कल्याण | “आत्मवतसर्वभूतेषु य: पश्यति स पण्डित: |” वेदान्त को यदि समझना है तो सर्वप्रथम स्व के साथ साथ पर को भी समझना होगा | आत्मैक्य की भावना लानी होगी | जब तक पर के सुख-दुःख को स्वयं का सुख-दुःख नहीं समझेंगे तब तक पर के लिये कुछ करने का सोचेंगे भी कैसे ? अन्य के साथ स्वयं का तादात्म्य किये बिना हम अन्य के कष्ट अथवा प्रसन्नता के विषय में जान तो सकते हैं किन्तु उसका अनुभव नहीं कर सकते | इस प्रकार समस्त विश्व के प्रति सद्भाव लाने के लिये वेदान्त के मार्ग को अपनाना श्रेष्ठ उपाय है | वेदान्ती को जीवनमुक्त कहने का भी यही अभिप्राय है कि उसने व्यष्टि को समष्टि में विलीन कर दिया है, समष्टि और व्यष्टि के मध्य किसी प्रकार के भेद ही नहीं रह गया है |

ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, छूत-अछूत, अथवा जाति, धर्म, सम्प्रदाय का भेद तथा उन भेदों के कारण उत्पन्न क्लेश तथा लड़ाई झगड़ों को यदि जड़ से समाप्त करना है तो इस अद्वैतवाद के मार्ग पर चलना ही होगा | और वेदान्त का सार यदि समझने का प्रयास किया जाए तो यह बाह्य विभन्नता अथवा पार्थक्य को मिटाने की बात नहीं करता | अपितु विविधता में एकता का पक्षधर है | क्योंकि जब तक धूप नहीं होगी तब तक छाया का बोध कैसे होगा ? जब तक अभाव नहीं होगा तब तक भाव का ज्ञान कैसे होगा ? यही है विविधता में एकता | बाह्य स्तर पर जब तक भेद नहीं होगा तब तक आन्तरिक अभेद का दर्शन सम्भव ही नहीं | और यह बाहर भीतर का भेद जब समझ आ जाता है तो उसकी दृष्टि में बाह्य भेद स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं | भेद रहते हुए भी उसे सब कुछ अपना सा प्रतीत होने लगता है | आज मानव जाति जातिगत, वर्गगत, सम्प्रदायगत – न जाने कितने भेदों के कारण पारस्परिक कलह में डूबती जा रही है | एक ओर हम अपने वेदान्त दर्शन पर अभिमान करते हैं तो दूसरी ओर इस व्यर्थ के ऊँच नीच के तथा अन्यान्य भेदों के गर्त में सब कुछ नष्ट कर देने पर भी तुले हुए हैं | तत्व से हम कितनी दूर पहुँच चुके हैं | आवश्यकता है “आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योअर्जुन:” की उदात्त भावना स्वीकार करने की | और जिस दिन यह भावना आ जाएगी उस दिन न परस्पर ईर्ष्या द्वेष की भावना नहीं रहेगी, न किसी प्रकार के लोभ के लिये स्थान रहेगा, न किसी प्रकार के ऊँच नीच की भावना वहाँ पनप सकेगी | द्वंद्व रहेगा ही नहीं | और जब द्वंद्व ही नहीं रहेगा तो फिर किसी भी प्रकार के अत्याचार, अनाचार आदि के लिये भी जगह नहीं रह जाएगी |