शुभ विजयादशमी

शुभ विजयादशमी

त्रातारो देवता अधिवोचता नो, मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः

वयं सोमस्य विश्वह प्रयासः, सुवीरा सो विद्भम आ वदेम ||

ऋग्वेद ८/४८/१४

हे देवगण हे रक्षकों, आशीष दो हमको सदा

हों जल्पना से रहित हम, आलस्य को त्यागें सदा |

हम सब ही हों सोमप्रिय, स्फूर्ति तन मन में रहे

और नायक भी हमारे धर्महित बोलें सदा ||

नव कल्पना, नव  ज्योत्स्ना, नव शक्ति, नव आराधना

आनन्द नव, जगजननि कर दे पूरी हर नव कामना ||

पाएँ विजय, पाएँ अभय, पाएँ हृदय सदय सदा

हों एक, मन में हो सदा सद्भाव और सत्कामना ||

आप सभी को विजय पर्व के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ…….

पूर्णिमा

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शाक्तवाद – गीता और दुर्गा सप्तशती

शाक्तवाद – गीता और दुर्गा सप्तशती

 

दुर्गा सप्तशती या श्रीमद्भगवद्गीता का जब भी अध्ययन करने बैठती हूँ तो बहुत से कथनों को पढ़कर कहीं न कहीं दोनों में दृष्टि का और कथनों का साम्य अनुभव होता है | दुर्गा सप्तशती शक्ति ग्रन्थ है और गीता ज्ञानपरक | इस प्रकार गीता यद्यपि शक्तिग्रन्थ नहीं है, फिर भी यह काव्य उस सर्वव्यापक ऐक्य को अंगीकार करता है जो सृष्टि में सर्वथा उपस्थित है, और काव्यात्मक भाषा के संकेत द्वारा इस बात का भी समर्थन करता है कि शक्ति सर्वस्याद्या है | उसका प्रभाव महान है | उसकी माया बड़ी कठोर और अगम्य है | तथा उसका माहात्म्य अकथनीय है | गीता और दुर्गा सप्तशती में स्थान स्थान पर ऐसे शब्द और भाव मिलते हैं जिनमें परस्पर समानता है | जैसे :

  • बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि – गीता ७/१०      सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते – सप्तशती ११/८
  • भूतानामस्मि चेतना – गीता १०/२२    चेतनेत्यभिधीयते – सप्तशती ५/१७
  • स्मृतिर्मेधाधृतिः क्षमा – गीता १०/३४   स्मृतिरूपेण संस्थिता – सप्तशती ५/६२,      महामेधा महास्मृतिः – सप्तशती १/७७ इत्यादि इत्यादि…

 शास्त्रों में शक्ति शब्द के प्रसंगानुसार अलग अलग अर्थ किये गए हैं | तान्त्रिक इसी को पराशक्ति कहते हैं और इसी को विज्ञानानन्दधन मानते हैं | वेद, शास्त्र, उपनिषद, पुराण आदि में शक्ति शब्द का प्रयोग देवी, पराशक्ति, ईश्वरी, मूलप्रकृति आदि नामों से ब्रह्म के लिये ही किया गया है | यह निर्गुण स्वरूप देवी ही जीवों पर दया करके स्वयं ही सगुण भावों को प्राप्त होकर ब्रह्मा विष्णु और महेश रूप से सृष्टि की उतपत्ति, पालन और संहार करती है | ब्रह्मवैवर्त पुराण में स्वयं भगवान् कृष्ण ने कहा है :

त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी, त्वमेवाद्या सृष्टिविधोस्वेच्छया त्रिगुणात्मिका |

कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयं, परब्रहमस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी ||

तेजःस्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा, सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा |

सर्वबीजरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया, सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमंगलमंगला ||

 अर्थात्, तुम्हीं विश्वजननी मूलप्रकृति ईश्वरी हो, तुम्हीं सृष्टि की उत्पत्ति के समय आद्याशक्ति के रूप में विराजमान रहती हो तथा स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो | यद्यपि तुम स्वयं निर्गुण हो तथापि प्रयोजनवश सगुण बन जाती हो | तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो | तुम परम तेजःस्वरूप हो और भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये शरीर धारण करती हो | तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सर्वाधार और परात्पर हो | तुम बीजस्वरूपा, सर्वपूज्या तथा आश्रयरहित हो | तुम सर्वज्ञ, सब प्रकार से मंगल करने वाली तथा समस्त मंगलों की भी मंगल हो | देवी सूक्त में स्वयं देवी ने कहा है : अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि, अहमादित्यैरुतविश्वदेवै: | अहं मित्रावरुणोभौ विभर्मि अहमिन्द्राग्नि अहमश्विनोभौ || अर्थात् मैं ही एकादशरुद्र रूप से विचरण करती हूँ | मैं ही समस्त देवताओं के रूप में अवस्थान करती हूँ | मैं ही आत्मा के रूप में अवस्थान करके मित्र और वरुण को धारण करती हूँ | मैं ही इन्द्र एवम् अग्नि को धारण करती हूँ | मैंने ही दोनों अश्विनीकुमारों को धारण कर रखा है | इसी प्रकार :

अहं सुवे पितरमस्य मूर्द्धानममयोनिरप्स्वन्तः समुद्रे |

ततो वितिष्ठे भुवनानि विश्वा उतामुन्द्याम् वर्ष्मणोपस्पृशामि ||

अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा |

परो दिवा पर एना पृथिव्यै तावती महिमा सम्बभूव ||

अर्थात्, सब भूतों के मूल कारण आकाश को मैं ही उत्पन्न करती हूँ | अपने परमात्मरूप से आकाशादि को प्रकाशित करती हूँ | मैं चैतन्यरूप से इस भुवन में व्याप्त हूँ | मैं ही प्रकृतिरूप से सबमें प्रविष्ट हूँ | मैं स्वाधीन हूँ | मेरे किसी कार्य में किसी दूसरे की सहायता की अपेक्षा नहीं रहती | मैं स्वयम् इस त्रिभुवन की सृष्टि करके इसके अन्दर और बाहर वायु की भाँति विराजमान हूँ | पृथिवी आदि सब स्थानों में मैं ही अपनी महिमा सहित अधिष्ठान करती हूँ | किन्तु मैं स्वयं निर्लिप्त हूँ |

 उपनिषदों में इसी को पराशक्ति के नाम से जानते हैं – “तस्या एव ब्रह्मा अजीजनत् | विष्णुरजीजनत् | रुद्रोऽजीजनत् | मरुद्गणा अजीजनन् | गन्धर्वाप्सरसः किन्नरा वादित्रवादिनः समन्तादजीजनन् | भोग्यमजीजनत् | सर्वमजीजनत् | सर्व शाक्तमजीजनत् | अण्डजं स्वेदजमुद्भिज्जम् जरायुजम् यात्किन्चित्प्राणि स्थावरजंगमं मनुष्यमजीजनत् | सैषा पराशक्तिः | – बह्वृत्तोपनिषद – अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, मरुद्गण, गन्धर्व, अप्सराएँ, किन्नर, समस्त भोग्य पदार्थ और अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज जो कुछ भी स्थावर जंगम मनुष्य आदि प्राणिमात्र हैं सब उसी पराशक्ति से उत्पन्न हुए हैं | ब्रह्मसूत्र के अनुसार “सर्वोपेतातद्दर्शनात्” प्रत्यक्ष देखा जाता है कि वह पराशक्ति सर्वसामर्थ्य से युक्त है |

 शक्ति का सिद्धान्त ही यह है कि वह सर्वस्याद्या अर्थात् सबकी आदिरूपा है | वही एक शक्ति है, अन्य किसी प्रकार की शक्ति है ही नहीं – एकैवाहं जगत्यत्र द्वीतीया का ममापरा – सप्तशती | वही सृष्टि की उत्पत्ति पालन और संहार करती है – त्वमीश्वरी देवी त्वं देवी जननी परा | त्व्यैतद्धार्यते विश्वं त्व्यैतत्सृज्यते जगत् | तव्यैतत्पाल्यते देवी त्वमस्यन्ते च सर्वदा | विसृष्टो सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने, तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये || – तुम ही ईश्वरी हो, तुम ही सब विश्व को धारण करती हो, उत्पन्न करती हो, पालन करती हो, तथा अन्त में इसका संहार भी करती हो – सप्तशती

 अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्, प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सद्भवाम्यात्ममायया – मैं अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी जन्मता और विनष्ट होता हुआ सा प्रतीत होता हूँ | साधारण व्यक्ति जो मेरे तत्व को नहीं समझते यह नहीं जान पाते कि यह सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर, नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा ही जगत् का कल्याण करने के लिये योगमाया से प्रकट होते हैं |

 वस्तुतः तो गीता पुरुषकथित काव्य है | किन्तु हिन्दूधर्म की ऐक्यप्रियता के कारण इसमें अनेक स्थानों पर शक्ति की महिमा पाई जाती है | जैसा कि अनेक स्थानों पर स्पष्ट है कि भगवान् की मूलप्रकृति शक्तिरूपा है | इसका ही उन्होंने इस प्रकार वर्णन किया है :

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्तिं मामिकाम्, कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृज्याम्यहम् |

प्रकृतिं स्वामवष्टम्य विसृजामि पुनः पुनः, भूतग्रामिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || – गीता ९/७-८

 चौदहवें अध्याय में इसी को महद्ब्रह्म कहा गया है | यही वह योगशक्ति है जिससे भगवान् समस्त जगत् को धारण किये हुए हैं | जिससे वे नाना प्रकार के रूप धारण करके मनुष्यों के सम्मुख प्रकट होते हैं, तथा इसी में आवृत्त रहने के कारण मनुष्य इन्हें पहचान नहीं पाते | इसी महाशक्ति का नाम योगमाया है | भगवान् जब किसी रूप में अवतीर्ण होते हैं तो अपनी उस योगमाया को चारों ओर फैलाकर स्वयम् उसमें छिपे रहते हैं | वास्तव में भगवान् का माया से आवृत्त हो जाना सूर्य का बादलों से ढक जाने के जैसा ही होता है | सूर्य का बादलों से ढक जाना कहा तो जाता है, लेकिन वास्तव में सूर्य नहीं ढकता बल्कि लोगों की दृष्टि पर ही बादलों का आवरण आ जाता है | यदि सूर्य वास्तव में ढक ही जाए तो ब्रह्माण्ड में कहीं उसका प्रकाश न हो | इसी प्रकार भगवान् माया से आवृत्त नहीं होते वरन् श्रद्धा व प्रेम के अभाव के कारण अज्ञानी मनुष्य इसी भ्रम में रहते हैं कि भगवान् भी हमारी तरह ही जन्मते व मरते हैं | इस प्रकार वास्तविकता तो यह है कि मूल प्रकृति को अपने अधीन करके अपनी योगशक्ति के द्वारा भगवान् अवतीर्ण होते हैं | मूल प्रकृति संसार को उत्पन्न करती है तथा भगवान् की यह योगमाया उनकी अत्यन्त प्रभावशालिनी ऐश्वर्यमयी शक्ति है – अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम्, जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् |

एतदयोसीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय, अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ||

 इस स्थावर जंगम जगत में जितने भी छोटे बड़े सजीव प्राणी हैं उन सभी की उत्पत्ति वृद्धि और स्थिति परा और अपरा प्रकृतियों के ही संयोग से होती है | अपरा प्रकृति ज्ञेय तथा जड़ होने के कारण ज्ञाता एवं चेतन रूप परा प्रकृति से भिन्न और निकृष्ट है, संसार की हेतुरूप है तथा इसी के द्वारा जीव का बन्धन होता है | इस समस्त चराचर विश्व का वाचक जगत शब्द है | इसकी उत्पत्ति तो भगवान् से ही है, स्थिति भी भगवान् में ही है और प्रलय भी उन्हीं में है | उसी प्रकार जैसे बादल आकाश से ही उत्पन्न होते हैं, आकाश में ही रहते हैं और वहीं विलीन भी हो जाते हैं – यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान, तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ||

 शक्तिवाद का दूसरा सिद्धान्त यह है कि माया बड़ी बलवान है | अहंकारी व्यक्ति उस पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता –

देवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया, मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते |

 गुणों का यह सारा जड़ दृश्य प्रपंच इस माया में ही है | इसीलिये इसे गुणमयी कहा गया है | यह माया भगवान् की अत्यन्त असाधारण तथा विचित्र शक्ति है | इसीलिये इसे देवी बताया गया है | भगवान् स्वयं ही इसके स्वामी हैं | अतः उनकी शरण में जाए बिना कार्य और कारणरूपा इस माया के रहस्य को पूर्ण रूप से नहीं जाना जा सकता | यही कारण है कि देवी को अबला समझकर बल के अहंकार से अन्ध चण्ड मुंड और शुम्भ निशुम्भ उन पर विजय नहीं पा सके | देवी की कठिन माया से पार पाने का एक ही मार्ग है – अनन्य व विनम्र शरणागति –

विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्वाद्येशु वाक्येषु च का त्वदन्या |

ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् || – सप्तशती

समस्त विद्याओं के, समस्त शास्त्रों के तथा ज्ञान के दीपक वेदों की एकमात्र तुम्ही कारणभूता हो | इस संसार को ममता रूपी गर्त में तुम्हारे अतिरिक्त और कौन घुमा सकता है |

 तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते | सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धि प्रयच्छति || – सप्तशती

वही देवी संसार को मोहित करती है और उत्पन्न करती है | याचना करने पर विशेष ज्ञान भी देती है तथा प्रसन्न होने पर ऋद्धि भी देती है | यह माया इतनी प्रभावशालिनी है कि –

यया त्वया जगत्सृष्टा जगत्पातात्ति यो जगत्, सोऽपि नीद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वर: |

विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च, कारितास्ते यतोऽतस्त्वाम् कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् || – सप्तशती

जगत् का स्रष्टा, पाता, संहर्ता सब तुम्हारे ही द्वारा निद्रित होते हैं | विष्णु ब्रह्मा महेश सबने तुम्हारे द्वारा ही शरीर ग्रहण किया है | अतः तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है | वेदादि शास्त्रों में जिस प्रकार ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों की आयु अलग अलग बताई गई है उसी के अनुसार उन तीनों की रात्रि का भी अलग अलग वर्णन मिलता है | यहाँ देवी की स्तुति करते हुए स्वयं ब्रह्मा कहते हैं कि हम तीनों ब्रह्मा विष्णु महेश की रात्रि व निद्रा तुम्हारे ही द्वारा नियत होती है | अर्थात् वह माया इतनी प्रबल है कि स्थावर जंगमादि से लेकर ब्रह्मादि त्रिमूर्ति तक को अपने वश में कर लेती है | इसी प्रकार ब्रह्मा में ब्राह्मी शक्ति, विष्णु में वैष्णवी शक्ति तथा शिव में शैव शक्ति भी उसी त्रिगुणमयी महाशक्ति का अंश हैं | यह विद्या अविद्या रूप त्रिगुणमयी महामाया बड़ी विलक्षण है | यह माया परमेश्वर से भिन्न नहीं है | वेदों और शास्त्रों में इसे ब्रह्मरूप बतलाया गया है – मायां तू प्रकृतिम् विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् – त्रिगुणमयी माया प्रकृति तथा मायापति महेश्वर हैं | तथा, सर्वं खल्विदं ब्रह्म, तथा, एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा, कर्माध्यक्षः सर्वभूतादिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च | अर्थात् जो देव सब भूतों में छिपा हुआ, सर्वव्यापक, सर्व भूतों का अन्तरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, सब भूतों का आश्रय, सबका साथी, चेतन, केवल और निर्गुण है वह एक है | वह शक्ति सबको आश्रय देने वाली है | यह समस्त जगत उसी का अंश है | वह विकारों से रहित है, परम प्रकृति है तथा आदिशक्ति है |

 हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै: न ज्ञायसे हरीहरादिभिरप्यापारा |

सर्वाश्रयाखिलमिदं जग्दंशभूतमव्याकृता हि प्रकृतिस्त्वामाद्या || – सप्तशती

वही त्रिगुणमयी शक्ति समस्त जगत का कारण है | साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या की जाए, स्वयं ब्रह्मा विष्णु महेश भी उसका पार नहीं पा सकते | प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ये तीनों देवता अपने अपने अधिकार के अनुसार ईश्वर माने जाते हैं | उनका ज्ञान एक ब्रह्माण्ड के देश और काल से ही परिच्छिन्न रहता है | अतः अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननी के अनादि अनन्त स्वरूप को समझ पाना उनके लिये भी दुष्कर है |

 या मुक्तिहेतुरविचिन्त्य महाव्रता च अभ्यस्यसेसुनियतेन्द्रियतत्वसारै: |

मोक्षार्थिभिः मुनिभिरस्तसमस्तदोषैः विद्यासि सा भगवती परमा हि देवी || – सप्तशती

वही मुक्ति का कारण परमविद्यारूपिणी है | इसी कारण मोक्षार्थी मुनिगण रागद्वेषादि समस्त दोषों का परित्याग करके संयतेन्द्रिय ब्रह्मतत्वानुसंधान की इच्छा से उसी का नमन करते हैं | वह अविचिन्त्य है तथा सर्वोत्कृष्टा है | यही भाव गीता में भी इस प्रकार है –

यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा, तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसमुद्भवम् |

अथवा बहुनैतेन किम् ज्ञातेन तवार्जुन, विष्टम्यामिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ||

समस्त जड़ चेतन में जो भी ऐश्वर्य, शोभा, शक्ति, बल और तेज आदि समस्त गुण प्रतीत होते हैं वे सब भगवान् के ही तेज के अंश हैं | उसी प्रकार जिस प्रकार बिजली की शक्ति से कहीं बल्व जलता है, कहीं रेडियो चलता है, अर्थात् भिन्न भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न कार्य होते हैं, किन्तु उनमें बिजली का ही अंश विद्यमान रहता है | इस समस्त जगत का सम्पूर्ण विस्तार भगवान् एन अपनी योगशक्ति के ही अंश से धारण किया हुआ है – एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्वतः, सोऽविकम्पेन योगेन सृज्यते नात्र संशयः |

 भगवान् की जो अलौकिक शक्ति है, जिसे देवता और महर्षिगण भी पूर्ण रूप से नहीं जान पाते, जिसके कारण स्वयं सात्विक, राजस एवं तामस भावों से अभिन्निमित्तोपादान कारण होने पर भी भगवान् सदा उनसे पृथक् बने रहते हैं, जिस शक्ति से सम्पूर्ण जगत को भगवान नियमों में चलाते हैं, जिसके कारण वे समस्त लोकों के महान ईश्वर, समस्त भूतों के सुहृद, समस्त यज्ञादि के भोक्ता, सर्वाधार और सर्वशक्तिमान हैं, जिस शक्ति से भगवान् इस समस्त जगत को अपने एक अंश में धारण किये हुए हैं और युग युग में अपनी इच्छानुसार विभिन्न कार्यों के लिये अनेक रूप धारण करते हैं तथा सब कुछ करते हुए भी सर्वथा निर्लेप रहते हैं, उस अद्भुत शक्ति के प्रभाव को तत्व से ही जाना जा सकता है |

 

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि गीता दर्शन सप्तशती में पूर्ण रूप से अभिव्यक्त है | तथा गीता दर्शन में शाक्तवाद दर्शन के रूप में उपदिष्ट है | भगवान् श्रीकृष्ण ने शक्ति के गुह्यतम रहस्यों की ओर स्थान स्थान पर संकेत किये हैं | क्योंकि प्रकृति के प्रभाव और उसकी महिमा से अनभिज्ञ रहने से उस परम सत्य का ज्ञान अधूरा रहा जाता है जो अद्वितीय है |

दुर्गा सप्तशती का आध्यात्मिक रहस्य

दुर्गा सप्तशती का आध्यात्मिक रहस्य

आज आश्विन नवरात्र के तृतीय और चतुर्थ नवरात्र का दिन है – अर्थात श्री दुर्गा सप्तशती में वर्णित देवी के चंद्रघंटा और कूष्मांडा रूपों की उपासना का दिन | पूरे नवरात्रों में उत्सव का वातावरण बना रहता है | कहीं डांडिया की धूम रहती है तो कहीं देवी के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जाती है | पूरे भक्ति भाव से दुर्गा सप्तशती में देवी की तीनों चरित्रों – मधुकैटभ वध, महिषासुर वध और शुम्भ निशुम्भ का उनकी समस्त सेना के सहित वध की कथाओं का पाठ किया जाता है | इन तीनों चरित्रों को पढ़कर इहलोक में पल पल दिखाई देने वाले अनेकानेक द्वन्द्वों का स्मरण हो आता है | किन्तु देवी के ये तीनों ही चरित्र इस लोक की कल्पनाशीलता से बहुत ऊपर हैं | दुर्गा सप्तशती किसी लौकिक युद्ध का वर्णन नहीं, वरन् एक अत्यन्त दिव्य रहस्य को समेटे उपासना ग्रन्थ है |

गीता ग्रंथों में जिस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञानकाण्ड का सर्वोपयोगी और लोकप्रिय ग्रन्थ है, उसी प्रकार दुर्गा सप्तशती ज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड का सर्वोपयोगी और लोकप्रिय ग्रन्थ है | यही कारण है कि लाखों मनुष्य नित्य श्रद्धा-भक्ति पूर्वक इसका पाठ और अनुष्ठान आदि करते हैं | इतना ही नहीं, संसार के अन्य देशों में भी शक्ति उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है | यह शक्ति है क्या ? शक्तिमान का वह वैशिष्ट्य जो उसे सामान्य से पृथक् करके प्रकट करता है शक्ति कहलाता है | शक्तिमान और शक्ति वस्तुतः एक ही तत्व है | तथापि शक्तिमान की अपेक्षा शक्ति की ही प्रमुखता रहती है | उसी प्रकार जैसे कि एक गायक की गायन शक्ति का ही आदर, उपयोग और महत्व अधिक होता है | क्योंकि संसार गायक के सौन्दर्य आदि पर नहीं वरन् उसकी मधुर स्वर सृष्टि के विलास में मुग्ध होता है | इसी प्रकार जगन्नियन्ता को उसकी जगत्कर्त्री शक्ति से ही जाना जाता है | इसी कारण शक्ति उपासना का उपयोग और महत्व शास्त्रों में स्वीकार किया गया है |

उपासना केवल सगुण ब्रह्म की ही हो सकती है | क्योंकि जब तक द्वैत भाव है तभी तक उपासना सम्भव है | द्वित्व समाप्त हो जाने पर तो जीव स्वयं ब्रह्म हो जाता – अहम् ब्रह्मास्मि की भावना आ जाने पर व्यक्ति समस्त प्रकार की उपासना आदि से ऊपर उठ जाता है | द्वैत भाव का आधार सगुण तत्व है | सगुण उपासना के पाँच भेद बताए गए हैं – चित् भाव, सत् भाव, तेज भाव, बुद्धि भाव और शक्ति भाव | इनमें चित् भाव की उपासना विष्णु उपासना है | सत् भावाश्रित उपासना शिव उपासना है | भगवत्तेज की आश्रयकारी उपासना सूर्य उपासना होती है | भगवद्भाव से युक्त बुद्धि की आश्रयकारी उपासना धीश उपासना होती है | तथा भगवत्शक्ति को आश्रय मानकर की गई उपासना शक्ति उपासना कहलाती है | यह सृष्टि ब्रह्मानन्द की विलास दशा है | इसमें ब्रह्म पद से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाले पाँच तत्व हैं – चित्, सत्, तेज, बुद्धि और शक्ति | इनमें चित् सत्ता जगत् को दृश्यमान बनाती है | सत् सत्ता इस दृश्यमान जगत् के अस्तित्व का अनुभव कराती है | तेज सत्ता के द्वारा जगत् का ब्रह्म की ओर आकर्षण होता है | बुद्धि सत्ता ज्ञान प्रदान करके इस भेद को बताती है कि ब्रह्म सत् है और जगत् असत् अथवा मिथ्या है | और शक्ति सत्ता जगत् की सृष्टि, स्थिति तथा लय कराती हुई जीव को बद्ध भी कराती है और मुक्त भी | उपासक इन्हीं पाँचों का अवलम्बन लेकर ब्रह्मसान्निध्य प्राप्त करता हुआ अन्त में ब्रह्मरूप को प्राप्त हो जाता है |

शक्ति उपासना वस्तुतः यह ज्ञान कराती है कि यह समस्त दृश्य प्रपंच ब्रहम शक्ति का ही विलास है | यही ब्रह्म शक्ति सृष्टि, स्थिति तथा लय कराती है | एक ओर जहाँ यही ब्रह्मशक्ति अविद्या बनकर जीव को बन्धन में बाँधती है, वहीं दूसरी ओर यही विद्या बनकर जीव को ब्रह्म साक्षात्कार करा कर उस बन्धन से मुक्त भी कराती है | जिस प्रकार गायक और उसकी गायन शक्ति एक ही तत्व है, उसी प्रकार ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति में “अहं ममेति” जैसा भेद नहीं है | वेद और शास्त्रों में इस ब्रह्म शक्ति के चार प्रकार बताए गए हैं | जो निम्नवत् हैं :

तुरीया शक्ति – यह प्रकार ब्रह्म में सदा लीन रहने वाली शक्ति का है | यही ब्रह्मशक्ति स्व-स्वरूप प्रकाशिनी होती है | वास्तव में सगुण और निर्गुण का जो भेद है वह केवल ब्रह्म शक्ति की महिमा के ही लिये है | जब तक महाशक्ति स्वरूप के अंक में छिपी रहती है तब तक सत् चित् और आनन्द का अद्वैत रूप से एक रूप में अनुभव होता है | वह तुरीया शक्ति जब स्व-स्वरूप में प्रकट होकर सत् और चित् को अलग अलग दिखाती हुई आनन्द विलास को उत्पन्न करती है तब वह पराशक्ति कहाती है | वही पराशक्ति जब स्वरूपज्ञान उत्पन्न कराकर जीव के अस्तित्व के साथ स्वयं भी स्व-स्वरूप में लय हो निःश्रेयस का उदय करती है तब उसी को पराविद्या कहते हैं |

कारण शक्ति – अपने नाम के अनुरूप ही यह शक्ति ब्रह्मा-विष्णु-महेश की जननी है | यही निर्गुण ब्रह्म को सगुण दिखाने का कारण है | यही कभी अविद्या बनकर मोह में बाँधती है, और यही विद्या बनकर जीव की मुक्ति का कारण भी बनती है |

सूक्ष्म शक्ति – ब्राह्मी शक्ति – जो कि जगत् की सृष्टि कराती है, वैष्णवी शक्ति – जो कि जगत् की स्थिति का कारण है, और शैवी शक्ति – जो कि कारण है जगत् के लय का | ये तीनों ही शक्तियाँ सूक्ष्म शक्तियाँ कही जाती हैं | स्थावर सृष्टि, जंगम सृष्टि, ब्रह्माण्ड या पिण्ड कोई भी सृष्टि हो – सबको सृष्टि स्थिति और लय लय के क्रम से यही तीनों ब्रह्म शक्तियाँ अस्तित्व में रखती हैं | प्रत्येक ब्रह्माण्ड के नायक ब्रह्मा विष्णु और महेश इन्हीं तीनों शक्तियों की सहायता से अपना अपना कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न करते हैं |

स्थूल शक्ति – चौथी ब्रह्म शक्ति है स्थूल शक्ति | स्थूल जगत् का धारण, उसकी अवस्थाओं में परिवर्तन आदि समस्त कार्य इसी स्थूल शक्ति के द्वारा ही सम्भव हैं |

ब्रह्म शक्ति के उपरोक्त चारों भेदों के आधार पर शक्ति उपासना का विस्तार और महत्व स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है | समस्त जगत् व्यापार का कारण ब्रह्म शक्ति ही है | वही सृष्टि, स्थिति और लय का कारण है | वही जीव के बन्ध का कारण है | वही ब्रह्म साक्षात्कार और जीव की मुक्ति का माध्यम है | ब्रह्मशक्ति के विलासरूप इस ब्रह्माण्ड-पिण्डात्मक सृष्टि में भू-भुवः-स्वः आदि सात ऊर्ध्व लोक हैं और अतल-वितल-पाताल आदि सात अधः लोक हैं | ऊर्ध्व लोकों में देवताओं का वास होता है और अधः लोकों में असुरों का | सुर और असुर दोनों ही देवपिण्डधारी हैं | भेद केवल इतना ही है कि देवताओं में आत्मोन्मुख वृत्ति की प्रधानता होती है और असुरों में इन्द्रियोन्मुख वृत्ति की | इस प्रकार वास्तव में सूक्ष्म देवलोक में प्रायः होता रहने वाला देवासुर संग्राम आत्मोन्मुखी और इन्द्रियोन्मुखी वृत्तियों का ही संग्राम है | आत्मोन्मुखी वृत्ति की प्रधानता के ही कारण देवता कभी भी असुरों का राज्य छीनने की इच्छा नहीं रखते, वरन् अपने ही अधिकार क्षेत्र में तृप्त रहते हैं | जबकि असुर निरन्तर देवराज्य छीनने के लिये तत्पर रहते हैं | क्योंकि उनकी इन्द्रियोन्मुख वृत्ति उन्हें विषयलोलुप बनाती है | जब जब देवासुर संग्राम में असुरों की विजय होने लगती है तब तब ब्रह्मशक्ति महामाय की कृपा से ही असुरों का प्रभव होकर पुनः शान्ति स्थापना होती है | मनुष्य पिण्ड में भी जो पाप पुण्य रूप कुमति और सुमति का युद्ध चलता है वास्तव में वह भी इसी देवासुर संग्राम का ही एक रूप है | मानवपिण्ड देवताओं और असुरों दोनों के ही लिये एक दुर्ग के सामान है | आत्मोन्मुखी वृत्ति की प्रधानता होने पर देवता इस मानवपिण्ड को अपने अधिकार में करना चाहते हैं, तो इन्द्रियोन्मुखी वृत्ति की प्रधानता होने पर असुर मानवपिण्ड को अपने अधिकार में करने को उत्सुक होते हैं | जब जब मनुष्य इन्द्रियोन्मुख होकर पाप के गर्त में फँसता जाता है तब तब उस महाशक्ति की कृपा से दैवबल से ही वह आत्मोन्मुखी बनकर उस दलदल से बाहर निकल सकता है |

यह मृत्युलोक सात ऊर्ध्व लोकों में से भूलोक का एक चतुर्थ अंश माना जाता है | इसमें समस्त जीव माता के गर्भ से उत्पन्न होते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं | इसी कारण इसे मृत्यु लोक कहा जाता है | अन्य किसी भी लोक में माता के गर्भ से जन्म नहीं होता | मृत्यु लोक के ही जीव मृत्यु के पश्चात् अपने अपने कर्मों के आधार पर सूक्ष्म शरीर से अन्य लोकों में दैवी सहायता से पहुँच जाते हैं | मनुष्य लोक के अतिरिक्त जितने भी लोक हैं वे सब देवलोक ही हैं | उनमें दैवपिण्डधारी देवताओं का ही वास होता है | सहजपिण्डधारी (उद्भिज्जादि योनियाँ) तथा मानवपिण्डधारी जीव उन दैवपिण्डधारी जीवों को देख भी नहीं सकते | ये समस्त देवलोक हमारे पार्थिव शरीर से अतीत हैं और सूक्ष्म हैं | देवासुर संग्राम में जब असुरों की विजय होने लगती है तब ब्रह्मशक्ति की कृपा से ही देवराज्य में शान्ति स्थापित होती है |

ब्रह्म सत्-चित् और आनन्द रूप से त्रिभाव द्वारा माना जाता है | जिस प्रकार कारण ब्रहम में तीन भाव हैं उसी प्रकार कार्य ब्रह्म भी त्रिभावात्मक है | इसीलिये वेद और वेदसम्मत शास्त्रों की भाषा भी त्रिभावात्मक ही होती है | इसी परम्परा के अनुसार देवासुर संग्राम के भी तीन स्वरूप हैं | जो दुर्गा सप्तशती के तीन चरित्रों में वर्णित किये गए हैं | देवलोक में ये ही तीनों रूप क्रमशः प्रकट होते हैं | पहला मधुकैटभ के वध के समय, दूसरा महिषासुर वध के समय और तीसरा शुम्भ निशुम्भ के वध के समय | वह अरूपिणी, वाणी मन और बुद्धि से अगोचरा सर्वव्यापक ब्रह्म शक्ति भक्तों के कल्याण के लिये अलौकिक दिव्य रूप में प्रकट हुआ करती है | ब्रह्मा में ब्राह्मी शक्ति, विष्णु में वैष्णवी शक्ति और शिव में शैवी शक्ति जो कुछ भी है वह सब उसी महाशक्ति का अंश है | त्रिगुणमयी महाशक्ति के तीनों गुण ही अपने अपने अधिकार के अनुसार पूर्ण शक्ति विशिष्ट हैं | अध्यात्म स्वरूप में प्रत्येक पिण्ड में क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियों का संघर्ष, अधिदैव स्वरूप में देवासुर संग्राम और अधिभौतिक स्वरूप में मृत्युलोक में विविध सामाजिक संघर्ष तथा राजनीतिक युद्ध – सप्तशती गीता इन्हीं समस्त दार्शनिक रहस्यों से भरी पड़ी है | यह इस कलियुग में मानवपिण्ड में निरन्तर चल रहे इसी देवासुर संग्राम में दैवत्व को विजय दिलाने के लिये वेदमन्त्रों से भी अधिक शक्तिशाली है |

दुर्गा सप्तशती उपासना काण्ड का प्रधान प्रवर्तक उपनिषद ग्रन्थ है | इसका सीधा सम्बन्ध मार्कंडेय पुराण से है | सप्तशती में अष्टम मनु सूर्यपुत्र सावर्णि की उत्पत्ति की कथा है | यह कथा कोई लौकिक इतिहास नहीं है | पुराण वर्णित कथाएँ तीन शैलियों में होती हैं | एक वे विषय जो समाधि से जाने जा सकते हैं – जैसे आत्मा, जीव, प्रकृति आदि | इनका वर्णन समाधि भाषा में होता है | दूसरे, इन्हीं समाधिगम्य अध्यात्म तथा अधिदैव रहस्यों को जब लौकिक रीति से आलंकारिक रूप में कहा जाता है तो लौकिक भाषा का प्रयोग होता है | मध्यम अधिकारियों के लिये यही शैली होती है | तीसरी शैली में वे गाथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं जो पुराणों की होती हैं | ये गाथाएँ परकीया भाषा में प्रस्तुत की जाती हैं | दुर्गा सप्तशती में तीनों ही शैलियों का प्रयोग है | जो प्रकरण राजा सुरथ और समाधि वैश्य के लिये परकीय भाषा में कहा गया है उसी प्रकरण को देवताओं की स्तुतियों में समाधि भाषा में और माहात्म्य के रूप में लौकिक भाषा में व्यक्त किया गया है |

राजा सुरथ और समाधि वैश्य को ऋषि ने परकीय भाषा में देवी के तीनों चरित्र सुनाए | क्योंकि वे दोनों समाधि भाषा के अधिकारी नहीं थे | तदुपरान्त लौकिक भाषा में उनका अधिदैवत् स्वरूप समझाया | और तब समाधि भाषा में मोक्ष का मार्ग प्रदर्शित किया :

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा, बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ||

तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्, सैषा प्रसन्ना वरदा नृणाम् भवति मुक्तये ||

सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी, संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ||

प्रथम चरित्र में भगवान् विष्णु योगनिद्रा से जागकर मधुकैटभ का वध करते हैं | भगवान् विष्णु की यह अनन्त शैया महाकाश की द्योतक है | इस चरित्र में ब्रह्ममयी की तामसी शक्ति का वर्णन है | इसमें तमोमयी शक्ति के कारण युद्धक्रिया सतोगुणमय विष्णु के द्वारा सम्पन्न हुई | सत्व गुण ज्ञानस्वरूप आत्मा का बोधक है | इसी सत्वगुण के अधिष्ठाता हैं भगवान् विष्णु | ब्राह्मी सृष्टि में रजोगुण का प्राधान्य रहता है और सतोगुण गौण रहता है | यही भगवान् विष्णु का निद्रामग्न होना है | जगत् की सृष्टि करने के लिये ब्रह्मा को समाधियुक्त होना पड़ता है | जिस प्रकार सर्जन में विघ्न भी आते हैं उसी प्रकार इस समाधि भाव के भी दो शत्रु हैं – एक है नाद और दूसरा नादरस | नाद एक ऐसा शत्रु है जो अपने आकर्षण से तमोगुण में पहुँचा देता है | यही नाद मधु है | समाधिभाव के दूसरे शत्रु नादरस के प्रभाव से साधक बहिर्मुख होकर लक्ष्य से भटक जाता है | जिसका परिणाम यह होता है कि साधक निर्विकल्पक समाधि – अर्थात् वह अवस्था जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय में भेद नहीं रहता – को त्याग देता है और सविकल्पक अवस्था को प्राप्त हो जाता है | यही नादरस है कैटभ | क्योंकि मधु और कैटभ दोनों का सम्बन्ध नाद से है इसीलिये इन्हें “विष्णुकर्णमलोद्भूत” कहा गया है | मधु कैटभ वध के समय नव आयुधों का वर्णन शक्ति की पूर्णता का परिचायक है | यह है महाशक्ति का नित्यस्थित अध्यात्मस्वरूप | यह प्रथम चरित्र सृष्टि के तमोमय रूप का प्रकाशक होने के कारण ही प्रथम चरित्र की देवता महाकाली हैं | क्योंकि तम में क्रिया नही  होती | अतः वहाँ मधु कैटभ वध की क्रिया भगवान् विष्णु के द्वारा सम्पादित हुई | क्योंकि तामसिक महाशक्ति की साक्षात् विभूति निद्रा है, जो समस्त स्थावर जंगमादि सृष्टि से लेकर ब्रह्मादि त्रिमूर्ति तक को अपने वश में करती है |

दूसरे चरित्र में सतोगुण का पुंजीभूत दिव्य तेज ही तमोगुण के विनाश का साधन बनता है | महिषासुर वध के लिये विष्णु एवं शिव समुद्यत हुए | उनके मुखमण्डल से महान तेज निकलने लगा : “ततोऽपिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वद्नात्तः, निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च |” और वह तेज था कैसा “अतीव तेजसः कूटम् ज्वलन्तमिव पर्वतम् |” तत्पश्चात् अरूपिणी और मन बुद्धि से अगोचर साक्षात् ब्रह्मरूपा जगत् के कल्याण के लिये आविर्भूत हुईं | यह है शक्ति का अधिदैव स्वरूप | यों पाप और पुण्य की मीमांसा कोई सरल कार्य नहीं है | जैव दृष्टि से चाहे जो कार्य पाप समझा जाए, किन्तु मंगलमयी जगदम्बा की इच्छा से जो कार्य होता है वह सबी जीव के कल्याणार्थ ही होता है | इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देवासुर संग्राम है | युद्ध प्रकृति की स्वाभाविक क्रिया है | यह देवासुर संग्राम प्राकृतिक श्रृंखला के लिये इस चरित्र का आधिभौतिक स्वरूप है | सर्वशक्तिमयी के द्वारा क्षणमात्र में उनके भ्रूभंग मात्र से असुरों का नाश सम्भव था | लेकिन असुर भी यदि शक्ति उपासना करें तो उसका फल तो उन्हें मिलेगा ही | अतः महिषासुर को भी उसके ताप के प्रभाव के कारण स्वर्ग लोक में पहुँचाना आवश्यक था | इसीलिये उसको साधारण मृत्यु – दृष्टिपात मात्र से भस्म करना – न देकर रण में मृत्यु दी जिससे कि वह शस्त्र से पवित्र होकर उच्च लोक को प्राप्त हो | शत्रु के विषय में भी ऐसी बुद्धि सर्वशक्तिमयी की ही हो सकती है | युद्ध के मैदान में भी उसके चित्त में दया और निष्ठुरता दोनों साथ साथ विद्यमान हैं | इस दूसरे चरित्र में महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी की रजःप्रधान महिमा का वर्णन है | इस चरित्र में महाशक्ति के रजोगुणमय विलास का वर्णन है | महिषासुर का वध ब्रह्मशक्ति के रजोगुणमय ऐश्वर्य से किया | इसीलिये इस चरित्र की देवता रजोगुणयुक्त महालक्ष्मी हैं | इस चरित्र में तमोगुण को परास्त करने के लिये शुद्ध सत्व में रज का सम्बन्ध स्थापित किया गया है | पशुओं में महिष तमोगुण की प्रतिकृति है | तमोबहुल रज ऐसा भयंकर होता है कि उसे परास्त करने के लिये ब्रह्मशक्ति को रजोमयी ऐश्वर्य की सहायता लेनी पड़ी | तमोगुण रूपी महिषासुर को रजोगुण रूपी सिंह ने भगवती का वाहन बनकर (उसी सिंह पर शुद्ध सत्वमयी चिन्मयरूपधारिणी ब्रह्मशक्ति विराजमान थीं) अपने अधीन कर लिया |

तृतीय चरित्र में रौद्री शक्ति का आविर्भाव कौशिकी और कालिका के रूप में हुआ | वस्तुतः सत् चित् और आनन्द इन तीनों में सत् से अस्ति, चित् से भाति, और आनन्द से प्रिय वैभव के द्वारा ही विश्व प्रपंच का विकास होता है | इस चरित्र में भगवती का लीलाक्षेत्र हिमालय और गंगातट है | सद्भाव ही हिमालय है और चित् स्वरूप का ज्ञान गंगाप्रवाह है | कौशिकी और कालिका पराविद्या और पराशक्ति हैं | शुम्भ निशुम्भ राग और द्वेष हैं | राग और द्वेष जनित अविद्या का विलय केवल पराशक्ति की पराविद्या के प्रभाव से ही होता है | इसीलिये शुम्भ और निशुम्भ रूपी राग और द्वेष महादेवी में विलय हो जाते हैं | राग द्वेष और धर्मनिवेशजनित वासना जल एवम् अस्वाभाविक संस्कारों का नाश हो जाने पर भी अविद्या और अस्मिता तो रह ही जाती है | यह अविद्या और अस्मिता शुम्भ और निशुम्भ का आध्यात्मस्वरूप है | देवी के इस तीसरे चरित्र का मुख्य उद्देश्य अस्मिता का नाश ही है | अस्मिता का बल इतना अधिक होता है कि जब ज्ञानी व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त करने लगता है तो सबसे पहले उसे यही भान होता है कि मैं ही ब्रह्म हूँ | उस समय विद्या के प्रभाव से “मैं” इस अस्मिता के लोकातीत भाव तक को नष्ट करना पड़ता है | तभी स्वस्वरूप का उदय हो पाता है | निशुम्भ के भीतर से दूसरे पुरुष का निकलना और देवी का उसे रोकना या इसी भाव का प्रकाशक है | निशुम्भ के साथ उस पुरुष तक को मार डालने से अस्मिता का नाश होता है | और तभी देवी के निशुम्भ वध की क्रिया सुसिद्ध होती है | यही शुम्भ निशुम्भ वध का गूढ़ रहस्य है | वास्तव में यह युद्ध विद्या और अविद्या का युद्ध है | इस तीसरे चरित्र में क्योंकि देवी की सत्वप्रधान लीला का वर्णन है | इसलिए इस चरित्र की देवता सत्वगुणयुक्त महासरस्वती बताई गई हैं | इस चरित्र के सत्वप्रधान होने के कारण ही इसमें भगवती की निर्लिप्तता के साथ साथ क्रियाशीलता भी अलौकिक रूप में प्रकट होती है |

सूक्ष्म जगत् और स्थूल जगत् दोनों ही में ब्रह्मरूपिणी ब्रह्मशक्ति जगत् और भक्त के कल्याणार्थ अपने नैमित्तिक रूप में आविर्भूत होती है | राजा सुरथ और समाधि वैश्य के हेतु भक्त कल्याणार्थ आविर्भाव हुआ | तीनों चरित्रों में वर्णित आविर्भाव स्थूल और सूक्ष्म जगत् के निमित्त से हुआ | वह भगवती ज्ञानी भक्तों के लिये ब्रह्मस्वरूपा, उपासकों के लिये ईश्वरीरूपा, और निष्काम यज्ञनिष्ठ भक्तों के लिये विराट्स्वरूपा है :

त्वं सच्चिदानन्दमये स्वकीये ब्रह्मस्वरूपे निजविज्ञभक्तान् |

तथेशरूपे विधाप्य मातरुपासकान् दर्शनामात्म्भक्तान् ||

निष्कामयज्ञावलिनिष्ठसाधकान् विराट्स्वरूपे च विधाप्य दर्शनम् |

श्रुतेर्महावाक्यमिदं मनोहरं करोष्यहो तत्वमसीति सार्थकम् ||

जैसा कि पहले ही बताया गया है कि शक्ति और शक्तिमान में अभेद होता है | सृष्टि में शक्तिमान से शक्ति का ही आदर और विशेषता होती है | किसी किसी उपासना प्रणाली में शक्तिमान को प्रधान रखकर उसकी शक्ति के अवलम्बन में उपासना की जाती है | जैसे वेद और शास्त्रोक्त निर्गुण और सगुण उपासना | इस उपासना पद्धति में आत्मज्ञान बना रहता है | कहीं कहीं शक्ति को प्रधान मानकर शक्तिमान का अनुमान करते हुए उपासना प्रणाली बनाई गई है | यह अपेक्षाकृत आत्मज्ञानरहित उपासना प्रणाली है | इसमें आत्मज्ञान का विकास न रहने के कारण साधक केवल भगवान् की मनोमुग्धकारी शक्तियों के अवलम्बन से मन बुद्धि से अगोचर परमात्मा के सान्निध्य का प्रयत्न करता है | लेकिन भगवान् की मातृ भाव से उपासना करने की अनन्त वैचित्र्यपूर्ण शक्ति उपासना की जो प्रणाली है वह इन दोनों ही प्रणालियों से विलक्षण है | इसमें शक्ति और शक्तिमान का अभेद लक्ष्य सदा रखा गया है | एक और जहाँ शक्तिरूप में उपास्य और उपासक का सम्बन्ध स्थापित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर शक्तिमान से शक्तिभाव को प्राप्त हुए भक्त को ब्रह्ममय करके मुक्त करने का प्रयास होता है | यही शक्ति उपासना की इस तीसरी शैली का मधुर और गम्भीर रहस्य है |

विशेषतः भक्ति और उपासना की महाशक्ति का आश्रय लेने से किसी को भी निराश होने की सम्भावना नहीं रहती | युद्ध तो प्रकृति का नियम है | लेकिन यह देवासुर संग्राम मात्र देवताओं का या आत्मोन्मुखी और इन्द्रियोन्मुखी वृत्तियों का युद्ध ही नहीं था, वरन् यह देवताओं का उपासना यज्ञ भी था | और जगत् कल्याण की बुद्धि से यही महायज्ञ भी था | और इस सबके मर्म में एक महान सन्देश था | वह यह कि यदि दैवी शक्ति और आसुरी शक्ति दोनों अपनी अपनी जगह कार्य करें, दोनों का सामंजस्य रहे, एक दूसरे का अधिकार न छीनने पाए, तभी चौदह भुवनों में धर्म की स्थापना हो सकती है | और बल, ऐश्वर्य, बुद्धि और विद्या आदि प्रकाशित रहकर सुख और शान्ति विराजमान रह सकती है | भारतीय मनीषियों ने शक्ति में माता और जाया तथा दुहिता का समुज्ज्वल रूप स्थापित कर व्यक्ति और समाज को सन्मार्ग की ओर प्रेरित किया है | शक्ति, सौन्दर्य और शील का पुंजीभूत विग्रह उस जगज्जननी दुर्गा को भारतीय जनमानस का कोटिशः नमन् ||

दो कविताएँ

अर्थों को सार्थकता दे दें

शब्दों के उदास होने पर अर्थ स्वयं पगला जाते हैं |

आओ शब्दों को चहका दें, अर्थों को सार्थकता दे दें ||१||

दिल का दीपक यदि जल जाए, जीवन भर प्रकाश फैलाए

और दिये की जलती लौ में दर्द कहीं फिर नज़र न आए |

स्नेह तनिक सा बढ़ जाए तो दर्द कहीं पर छिप जाते हैं

आओ बाती को उकसा दें, प्रेममयी आभा फैला दें ||२||

शूलमध्य कुछ पुष्प खिलें तो उपवन का यौवन बढ़ जाए

और अनगिनत मस्त तितलियाँ उसके आस पास मंडराएँ |

होकर उनसे, कुछ भ्रमर वहाँ फिर आ जाते हैं

आओ उनका मिलन करा दें, स्नेह का कुछ सौरभ महका दें ||३||

बहते आँसू से लिख डाली जिसने अपनेपन की गीता

कैसे कह सकते हो उसको, वह है अपनेपन से रीता ?

होता है पीड़ित जब मन, कुछ गीत अधर पर आ जाते हैं

आओ, जिनको ढूँढा है, उन गीतों को भी कुछ चहका दें ||४||

 

 

 

पल पल मस्ती में गान किया करती हूँ

मैं सदा शून्य का ध्यान किया करती हूँ,

और अनहद का आह्वाहन किया करती हूँ ||१||

आशाएँ मेरी दृढ़ ज्यों खड़ा हिमाचल,

मानस का है प्रतिबिम्ब मेरे गंगाजल |

रोकेगा मेरी गति को कौन जगत में,

मैं गिरि को ठोकर मार दिया करती हूँ ||२||

मेरी गति में विद्युत् जैसा कम्पन है,

वाणी में सागर के समान गर्जन है |

बादल जैसा चीत्कार किया करती हूँ,

आँधी सा हाहाकार किया करती हूँ ||३||

जग के ये सूरज चंदा चमचम तारे,

पाएँगे क्या मेरा प्रकाश बेचारे |

मैं सदा गरल का पान किया करती हूँ,

और अमृत में स्नान किया करती हूँ ||४||

मुझको लख विस्मित होता है जग सारा,

क्या जाने वह मेरे सुख को बेचारा |

चिन्ताएँ मेरे पास नहीं आती हैं,

पल पल मस्ती में गान किया करती हूँ ||५||

कालिदास – वर्तमान परिप्रेक्ष्य में

कालिदास – वर्तमान परिप्रेक्ष्य में

 

कल कविता वाचक्नवी का एक बड़ा सारगर्भित लेख पढ़ने को मिला, जिसका शीर्षक था “संस्कृत : छन्दविज्ञान, सैद्धान्तिकी और कबीर” | भाषा और व्याकरण से सम्बद्ध यह लेख वास्तव में सराहनीय है | मैं सहमत हूँ इस लेख से | कविता जी ने बड़ी सरल शैली में भाषा की व्याकरणबद्धता को सिद्ध किया है और इसके लिये वे बधाई की पात्र हैं | कम से कम जो लोग स्वयं को “साहित्यकार” कहते हैं उन्हें तो भाषा – चाहे वह भाषा हिंदी हो, संस्कृत हो, अंग्रेज़ी हो या कोई भी भाषा हो – की शुद्धता और व्याकरण का ध्यान रखा ही चाहिए | इसी लेख में किन्हीं सज्जन का तर्क भी पढ़ने को मिला कि “एक ओर तो अमीर खुसरो और तुलसीदास आदि हैं जिन्होंने आम आदमी की भाषा को अपनाया और जनता में प्रसिद्ध भी हुए | दूसरी ओर कालिदास, भास आदि कवि महान तो कहे जा सकते हैं, किन्तु स्कूल, कालेज और पुस्तकालय तक ही सीमित होकर रह गए हैं अपनी भाषा की क्लिष्टता के कारण |” इन सज्जन का तर्क बड़ा विचित्र लगा | मैं अपने इस लेख में किसी भाषा अथवा उसकी व्याकरण की बात नहीं करूँगी, कविता जी ने अच्छी तरह से यह कार्य कर दिया है | मेरा यह लेख इस विषय से कुछ हटकर है, लेकिन इसे लिखने की प्रेरणा कविता जी के उन मित्र के कथन से ही प्राप्त हुई | माना खुसरो सूर तुलसी ने आम आदमी की “बोली” को अपनाया, लेकिन छान्दोबद्धता के साथ अथवा व्याकरण के साथ समझौता नहीं किया | साथ ही यह भी कि जिस प्रकार खुसरो या तुलसीदास आदि जन मानस के कवि हुए और आज तक भी सम-सामयिक माने जाते हैं, तो मैं कालिदास और भास आदि को भी उसी श्रेणी में रखना चाहूँगी | सर्वप्रथम तो ये कवि भी अपने समय में जन मानस के प्रसिद्द कवि हुए, दूसरी ओर तुलसी की ही भाँति ये भी आज तक भी सम-सामयिक हैं, यदि ध्यानपूर्वक इनकी रचनाओं को पढ़ा जाए | और जो सम-सामयिक हो उसकी प्रसिद्धि पर किसी प्रकार का प्रश्न चिह्न कैसे लगाया जा सकता है ? मैं कालिदास की अध्येता हूँ और वे मेरे प्रिय कवि हैं | तो मेरे विचार में एक बात आई कि कालिदास को अथवा किसी भी अन्य साहित्यकार को भाषा से ऊपर उठकर भावनाओं तथा निहित संदेशों को ध्यान में रखकर भी यदि पढ़ा जाए तो एक तथ्य स्पष्ट होता है कि हर साहित्यकार अपने देश काल का जन कवि होता है, उसी प्रकार जिस प्रकार कालिदास भारतीय संस्कृति और सभ्यता के जन कवि थे, आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे | उनकी रचनाएँ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी उतनी ही सम-सामयिक हैं जिस प्रकार उनके अपने समय में थीं | और इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिये मुझे यह लेख लिखने का साहस हुआ | महर्षि अरविन्द के अनुसार वाल्मीकि, व्यास और कालिदास प्राचीन भारतीय इतिहास की अन्तरात्मा के प्रतिनिधि हैं और सब कुछ नष्ट हो जाने पर भी इनकी कृतियों में भारतीय संस्कृति के प्राणतत्व सुरक्षित रहेंगे | इस कथन का तात्पर्य यही है कि वाल्मीकि और व्यास की भाँति कालिदास ने भी सत्यं शिवम् और सुन्दरं के अनुसन्धान का ही प्रयास किया है | भारतीय संस्कृति ने अपनी दीर्घकालीन साधना तथा अनुभव के आलोक में लोक संग्रह की भावना को ही प्रतिष्ठित किया है | कालिदास के साहित्य में भी सरल संस्कृत भाषा में यही लोक संग्रह मुखरित हुआ है | उन्होंने काव्य के महत्तम उद्देश्य “शिवेतरक्षतये” को ही अंगीकार किया है | वस्तुतः अशिव की क्षति और शिव की स्थापना करने वाला साहित्यकार ही सच्चा साहित्यकार कहलाता है | और यदि भावना प्रबल है तो इस शिव की स्थापना करने हेतु लेखन में भाषा की क्लिष्टता अथवा सरलता कुछ भी आड़े नहीं आता, बस पाठकों के समक्ष होती है तो उस रचना में निहित वही लोक संग्रह की भावना |

कालिदास के व्यक्तिगत जीवन पर दृष्टिपात करने से एक तथ्य नितान्त स्पष्ट होकर सामने आता है कि जीवन अग्नि को प्रज्वलित करने के लिये सौन्दर्य के सुवर्ण का आकर्षण अत्यन्त आवश्यक है | हाँ मूल्यों की तुला पर उसे कभी आत्यन्तिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिये | सौन्दर्य सागर के आवर्त-विवर्त में से होकर शिवं के पुनीत आदर्श का पथ प्राप्त होता है और अन्ततः लौकिक प्रेयस के ऊपर पारलौकिक श्रेयस की उपलब्धि होती है | कालिदास ने प्रेम के आदर्श को बहुत ऊँचा माना है | उनकी समस्त रचनाओं में यही ध्वनित होता है कि काम का कर्तव्य से विरोध नहीं होना चाहिये | शिव अर्थात् मंगल का विरोधी काम भस्मावशेष कर दिया जाता है | जिस प्रेम में कोई बन्धन नहीं, कोई नियम नहीं, जो प्रेम नर-नारी को अकस्मात् मोहित करके संयम दुर्ग के भग्न प्राचीर के ऊपर अपनी जय पताका गाढ़ता है उस प्रेम की शक्ति को कालिदास ने स्वीकार तो किया है, किन्तु उसके हाथों आत्मसमर्पण नहीं कर दिया | उन्होंने दिखलाया है कि जो असंगत प्रेम सम्भोग हम लोगों को अपने अधिकार में कर लेता है वह स्वाभिशाप से खण्डित, ऋषि शाप से प्रतिहत और दैव रोष से भस्म हो जाता है | दुष्यन्त और शकुन्तला का बन्धन विहीन गोपन मिलन चिरकाल तक शाप के अन्धकार में विलीन रहा | शकुन्तला को आतिथ्य धर्म का विचार नहीं रहा | उस समय शकुन्तला के प्रेम का मंगल भाव मिट गया | दुर्वासा के शाप और शकुन्तला के प्रत्याख्यान द्वारा कवि ने यह सिद्ध किया है कि जो उन्मत्त प्रेम संसार की परवाह नहीं करता, सारा संसार उसके विरुद्ध हो जाता है और वह प्रेम थोड़े ही दिनों में दूभर हो जाता है | शकुन्तला और दुष्यन्त प्रेम के प्रथम आवेग में ही विवाह कर लेते हैं | किन्तु प्रेम का वास्तविक मूल्य उन्होंने नहीं पहचाना था | अतः कवि को उन्हें एक पाठ पढ़ाना था : “अतः परीक्ष्य कर्तव्यं विशेषात् सगतं रह:, अज्ञातहृदयेष्वेवं वैरी भवति सौर्हृदम् |”

कालिदास के अनुसार उत्थान की प्रक्रिया में यदि मानव का पतन हो भी जाए तो उसे फिर से उठने की चेष्टा करनी चाहिये | मृगया के लिये आश्रम में प्रवेश करने के बाद शकुन्तला को देखना दुष्यन्त का पतन था | राजधानी में आकर शकुन्तला को भूल जाना पतन की चरम सीमा थी | किन्तु उसके बाद कवि ने बड़े कौशल से उन्हें ऊपर उठाया है | किसी भी सुन्दर स्त्री को देखकर मोहित हो जाने की मधुकर वृत्ति उनमें नहीं है | एक असाधारण रूपमती युवती उनसे पत्नी भाव के अपने अधिकार की भिक्षा माँग रही है, दूसरी ओर धर्म का भय है | किन्तु शकुन्तला का स्मरण आने पर जब उन्हें विरह सताता है तब भी वे न्याय धर्म के अनुसार राज्य कार्य में संलग्न हैं | और अन्त में वे शकुन्तला से मिलकर महाभारत के दुष्यन्त के सामान गर्वपूर्वक यह नहीं कहते कि “यच्च कोपितयाऽत्यर्थं त्वयोक्तोऽन्यस्य प्रियं प्रिये, प्रणयिन्या विशालाक्षि तत्क्षांत ते मया शुभे |” अर्थात् मैंने आज अपने प्रेम से तुम्हारा क्रोध शान्त कर दिया है | अपितु उसके पैरों में गिरकर क्षमायाचना करते हैं | वे कोरे कामुक नहीं हैं | वे प्रेमी हैं, पुत्र वत्सल हैं, कवि हैं, चित्रकार हैं, और साथ साथ कर्तव्यपरायण राजा भी हैं |

 कालिदास वासनाजन्य प्रेम के पक्षपाती नहीं थे | शिव पार्वती का विवाह केवल रति सुख के लिये नहीं था | वरन् तारकासुर का संहार करने वाले परम तेजःपुंज कार्तिकेय के जन्म के निमित्त था | उनहोंने शिव और पार्वती के दैवी विवाह को मानवीय विवाह के प्रतिरूप में उपस्थित किया है | काम वासनाओं को जलाए बिना सच्चे स्नेह की उपलब्धि नहीं हो सकती | क्या ही अच्छा हो कि हम कालिदास के द्वारा कुमारसम्भव में प्रतिष्ठित विवाह के आदर्श को अपने आज के जीवन में उतार सकें तो ये पति पत्नी के बीच अन्यान्य विवादों के लिये स्थान ही नहीं रहेगा और पारिवारिक विघटन जैसी समस्याओं से छुटकारा प्राप्त हो सकता है | विवाह जीवन को व्यवस्थित करने की शैली है और संतानोत्पत्ति जीवन को संयमित करने का विधान | सन्तान की आवश्यकता तारकासुर नामक दैत्य का वध करने, अर्थात् जीवन के वासना रूपी शत्रु का वध करने के लिये होनी चाहिये, देश पर बोझ बनने के लिये नहीं | कुमारसम्भव का आदर्श हमें परिवार कल्याण की कल्याणकारी भावना आत्मसंयम द्वारा अपनाने की प्रेरणा देता है |

 महाकवि कालिदास की रचनाओं में सर्वत्र एक उदात्त नैतिकता अथवा आदर्श भारतीय मर्यादा का चित्रण हुआ है | भारत की इस नैतिक एवं कलात्मक संस्कृति का जो चित्रण कालिदास ने अपनी रचनाओं में किया है वह मानों सारे संसार के लिये आदर्शभूत है | शाकुन्तल के प्रथम अंक में ही शकुन्तला की पलकों और अधरों आदि का स्पर्श करते हुए भँवरे को देखकर दुष्यन्त कहते हैं “वयं तत्वान्वेषान्मधुकर हतास्त्वं खलु कृती” अर्थात् तत्व का अन्वेषण करते करते हम हार गए, किन्तु तुम कृतार्थ हो गए | इस कथन में इस सिद्धान्त की ओर कवि का सूक्ष्म संकेत है कि जीवन रूपी मधु की प्राप्ति तत्वान्वेषण बुद्धि द्वारा सम्भव नहीं | उस मधु के आस्वादन के लिये आवश्यकता है उस सहृदयता की जो उसके मार्मिक रहस्य का उद्घाटन कर सके और उसके रस का आस्वादन कर सके |

 कालिदास के अनुसार जीवन जीने के लिये है | उपभोग के लिये है | उसके आकर्षण से न तो व्यर्थ आँखें मूँदने की आवश्यकता है, न ही उसके दायित्वों से पलायन करने की | जीवन का सम्पूर्ण उपभोग सौन्दर्य रस का पान करते हुए तथा कर्तव्य पालन का सन्तोष करते हुए नि:शेष भाव से होना चाहिये | तथापि केवल बाह्य सौन्दर्य आत्यन्तिक रूप से हमारा साध्य नहीं है | मानव जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है पुनर्भव से मुक्ति तथा परमानन्द की उपलब्धि | अतः जीवन की उपलब्धियों का रस लेते हुए भी मानव को अन्तिम रूप में अनासक्त ही रहना है और आवागमन से मुक्ति पाने के उद्देश्य से अनुशासित होना है | इस प्रकार की मूल्य भावना से अनुप्राणित रहने वाला कवि कभी भी अपनी दृष्टि में सँकुचित नहीं रह सकता | वह मानवतावादी हो जाता है और मानव मात्र के लिये उसके ह्रदय का कोष खुल जाता है | इसीलिये कालिदास के ग्रन्थों में विश्व शान्ति के साधनों को यत्र तत्र खोजा जा सकता है | कालिदास मिट्टी के मनुष्य को स्वर्ग का देवता ही नहीं, वरन् लोकोत्तर मानव के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे | उनका विचार था कि अच्छे कर्म करने से मानव भी देवता हो सकता है और कर्मच्युत होने पर देवताओं को भी पृथिवी पर गिरना पड़ता है |

 वाल्मीकि मानवात्मा के विकास में भारतीय जाति की नैतिकता का परिचय देते हैं, व्यास बौद्धिक मनोवृत्ति की व्याख्या करते हैं तथा कालिदास भौतिक मनःस्थिति के प्रतिनिधि हैं | वे किसी महत्वशून्य युग के असावधान गायक नहीं हैं बल्कि एक जटिल और समृद्ध युग के पुरस्कर्ता हैं | विश्व के अन्य प्रमुख कवियों की भाँति कालिदास भी महाराज विक्रम के राजनीतिक परामर्शदाता, राजदूत एवं सन्धि विग्रह आदि के संयोजक रहे | इस प्रकार उन्होंने जीवन के सभी क्षेत्रों का व्यापक एवं गहन अनुभव प्राप्त किया था | इसी कारण वे रघु, दिलीप तथा अन्य रघुवंशी नरेशों जैसे प्रजावत्सलों की कल्पना कर सके | रघुवंश में वर्णित रघु की दिग्विजय समुद्रगुप्त तथा चन्द्रगुप्त द्वितीय की विजयों की प्रतिध्वनि है | कालिदास द्वारा वर्णित जन जीवन कितना समृद्ध एवं सन्तुष्ट था इसका परिचय चीनी यात्री फाहियान के वर्णनों में मिलता है | वह लिखता है – सारा भारतवर्ष सर्व धर्म समन्वय का आदर्श था, जन जीवन शान्त, सुरक्षित एवं निरपराध था | अतः बौद्धिक गवेषणा की दृष्टि से कालिदास ने सुनियोजित, सुनिबंधित एवं विधियों के संकलित तथा स्थिरीकृत शासन का परिचय दिया है | आज हमारे देश के लिये भी इसी प्रकार के विधियों के संकलन और स्थिरीकरण की आवश्यकता अनुभव हो रही है | जड़ीभूत हुए राष्ट्रीय मनोभाव को पुनः चैतन्य प्रदान करने के लिये हमें कालिदास के दिलीप और रघु जैसे शासक चाहियें | कालिदास हमें कला, विज्ञान, विधान, उपचारबद्ध तत्व विद्या तथा इन्द्रियनिष्ठ ऐश्वर्य का मार्ग बताते हैं |

 श्री अरविन्द के अनुसार – कालिदास के काव्य में भौतिक युग का पूर्ण प्रकर्ष है तथा उसमें रुग्णता, असंतोष एवं भ्रम भग्नता का नितान्त अभाव है, जो प्रायः भौतिकता की दीर्घकालीन उपासना के उपरान्त सदा उत्पन्न हो जाते हैं | कालिदास का निश्चित उद्देश्य शासकों एवं समाज को यह चेतावनी देना था कि यदि उनमें से कोई भी आधारभूत आदर्शों से स्खलित हुआ तो जीवन अस्त व्यस्त हो जाएगा | राज्य संचालन कल्पनाशील विवेक पर आधारित हो, मात्र कठोरता पर नहीं | अज का शासन कौशल इसका प्रमाण है |

 शाकुन्तल में कवि ने तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक जीवन का यथार्थ चित्रण किया है | उस समय वर्णाश्रम धर्म पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित था | ब्राहमण, क्षत्रिय,वैश्य, शूद्र हर वर्ग अपने अपने कर्तव्य धर्म का पालन करते हुए राष्ट्र की उन्नति में अपना अपना योगदान दे रहा था | परम्परागत कर्म निन्दित होते हुए भी त्याज्य नहीं समझा जाता था | शासक भयग्रस्त मनुष्यों की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझते थे तथा प्रजा के हित में तत्पर रहते थे | न्याय निष्पक्ष होने पर भी कठोर नहीं था | आज इसी प्रकार की व्यवस्था की आवश्यकता है | आज हमें चारों ओर अशान्ति, असहिष्णुता, अविश्वास, ईर्ष्या, द्वेष, असहयोग आदि ही दिखाई दे रहा है | इसका कारण है राष्ट्रीयता का अभाव | प्रान्तीयता, भाषावाद, जातिवाद, परिवारवाद आदि के नाम पर पनपने वाले संघर्ष केवल राष्ट्रीय भावना के अभाव में ही जन्म लेते हैं | कालिदास के रघुवंश, कुमारसम्भव, मालविकाग्निमित्र आदि में राजा, प्रजा, राज्य के अन्य कर्मचारी सभी को राष्ट्र धर्म का पालन करने का सन्देश मिलता है | राष्ट्रीय शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा राष्ट्र के आर्थिक समुन्नयन का रघुवंश में स्पष्ट संकेत है | रघुवंश के प्रथम सर्ग में ही समृद्ध राजभक्त ग्रामों का व्यापक वर्णन है | मेघदूत सारे राष्ट्र को एक स्नेह सम्बन्ध में बाँधने का प्रयत्न है | रघुवंश राजनीतिक समन्वय का प्रयास है तथा राष्ट्र की आर्थिक एवं औद्योगिक समृद्धि का मार्गदर्शक साधन हैं | कालिदास का स्वप्न भारत को निखिल विश्व का नायक बनाने का है : “सामन्तमौलिमणिरंजितपादपीठम्, एकातपत्रभवनेर्न तथा प्रभुत्वम् |” परन्तु कालिदास की यह प्रभुत्व कामना धर्म, ध्यान और योग पर आधारित है | जब तक प्रकृतिहित को शक्तिसत्ता का मूल नियामक मन्त्र नहीं किया जाता तब तक पुनर्भव का निराकरण नहीं हो सकता | शक्ति और सत्ता के इस लोक में एकदम न फँसकर पारलौकिक शान्ति एवं दिव्य आनन्द में समाहित होने को ही अन्तिम लक्ष्य समझें – यही कालिदास का दृष्टार्थ है |

 केवल राष्ट्रीय चेतना को ही परिष्कृत करने के कालिदास का प्रयास नहीं है | वे अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सहअस्तित्व के लिये भी कामना करते दिखाई देते हैं | भारत की चिरकालीन आध्यात्मिक साधना ही मानव मन को सुख शान्ति एवं सन्तोष दे सकती है | कालिदास ने जीवन के लिये एक सुनिश्चित योजना  की कल्पना की है | जिसके द्वारा “यावदभीप्सितार्थो” की सम्यक् सिद्धि की व्यवस्था है | उन्होंने प्रेयस के लिये श्रेयस की अवमानना नहीं की | सुन्दरं के लिये शिवं की कदर्थना नहीं की | युग युग का मानव मूलतः इसी संघर्ष में उलझता है और अन्त में मंगल मार्ग का वरण करके ही विकास की यात्रा में अग्रसर होता है | वस्तुतः लौकिक साधनाओं में प्राथमिकता का यही क्रम अंगीकार करके मनुष्य विश्व कल्याण की कामना कर सका है : “सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु, सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु |” इसी साधना का उपाय बताकर कालिदास ने अपने ग्रन्थों में राष्ट्र एवं विश्व के लिये सुख और शान्ति के समस्त साधन सन्निहित कर दिये हैं और इस तरह कालिदास न केवल अपने समय के अपितु सदा सदा के लिये सम-सामयिक बन जाते हैं | और निश्चित रूप से, जो सम-सामयिक होता है – “भाषा” की क्लिष्टता अथवा “बोली” की सरलता – कुछ भी उसकी प्रसिद्धि को कम नहीं कर सकते |

नवदुर्गा

नवदुर्गा

आज महालया है | पितृपक्ष का अन्तिम दिन अर्थात् पितृ विसर्जनी अमावस्या तथा माँ दुर्गा के आगमन का दिन | एक ओर अन्तिम श्राद्ध और दूसरी ओर माँ दुर्गा की पूजा अर्चना का आरम्भ | पितरों को श्रद्धा सहित अन्तिम तर्पण करके उन्हें विदा किया जाता है और इसी के साथ आरम्भ हो जाती है महिषासुर मर्दिनी के मंत्रोच्चारण के साथ नवरात्रों में माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना | कल से आश्विन नवरात्रों की धूम शुरू हो जाएगी | जगह जगह देवी के पण्डाल सजेंगे जहाँ दिन दिन भर और देर रात तक माँ दुर्गा की पूजा का उत्सव चलता रहेगा नौ दिनों तक, जिसका समापन दसवें दिन धूम धाम से देवी की प्रतिमा विसर्जन के साथ होगा |

नवरात्रि के महत्त्व के विषय में विवरण मार्कंडेय पुराण, वामन पुराण, वाराह पुराण, शिव पुराण, स्कन्द पुराण और देवी भागवत आदि पुराणों में उपलब्ध होता है | इन पुराणों में देवी दुर्गा के द्वारा महिषासुर के मर्दन का उल्लेख उपलब्ध होता है | महिषासुर मर्दन की इस कथा को “दुर्गा सप्तशती” के रूप में देवी माहात्मय के नाम से जाना जाता है | नवरात्रि के दिनों में इसी माहात्मय का पाठ किया जाता है और यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है | जिसमें ५३७ चरणों में ७०० मन्त्रों के द्वारा देवी के माहात्मय का जाप किया जाता है | इसमें देवी के तीन मुख्य रूपों – काली अर्थात बल, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा के द्वारा देवी के तीन चरित्रों – मधुकैटभ वध, महिषासुर वध तथा शुम्भ निशुम्भ वध का वर्णन किया जाता है |

महिषासुर मर्दन की कथा कुछ इस प्रकार है कि दानुकासुर के दो पुत्र थे – रम्भ और करम्भ | अत्यन्त बलशाली होने का वरदान प्राप्त करने के लिये दोनों भाइयों ने घोर तपस्या की | इन्द्र इनकी तपस्या से घबरा गए और उन्होंने मगरमच्छ का रूप धारण करके जल में तप कर रहे करम्भ का वध कर दिया | रम्भ को जब इस बात का पता चला तो उसने और भी कठिन तपस्या की और एक वरदान प्राप्त किया कि किसी भी युद्ध में न तो कोई मनुष्य उसे मार सके, न कोई देवता उसका वध कर सके और न ही कोई असुर | वर प्राप्त करने के बाद वर के मद में मस्त असुर यक्ष के उपवन में भ्रमण करने जा पहुँचा | वहाँ एक गाय भी घूम रही थी | असुर उस गाय पर मोहित हो गया और उसने महिष का रूप धारण करके उस गाय के साथ प्रेमक्रीड़ा आरम्भ कर दी | इसी बीच वास्तविक महिष वहाँ आ गया और रम्भ को पहचान कर उसका वध कर दिया | रम्भ ने मनुष्य, देवता और असुरों के हाथों न मारे जाने का वर तो माँगा था, किन्तु पशु भी वध न कर सके ऐसा वर नहीं माँगा था अपने अहंकार के कारण, इसलिये पशु के हाथों मारा गया | किन्तु वह गाय उस समय तक गर्भवती हो चुकी थी | अतः रम्भ की चिता में कूदकर उसने भी जान दे दी | उसके मृत शरीर से जो ज्वाला निकली उससे एक दैत्य बाहर निकला, जिसका सर भैंसे जैसा था और शेष शरीर मनुष्य जैसा | इस कारण उसका नाम पड़ा महिषासुर | महिषासुर महान बली था | उसने समस्त देवों और दैत्यों को युद्ध में परास्त कर दिया | स्वर्ग पर अधिकार करके सभी देवताओं को अपना दास बना लिया | तब देवताओं ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की और उनके साथ शिव और विष्णु के पास जा पहुँचे सहायता माँगने के लिये | बरह्मा, विष्णु और महेश महिषासुर के कृत्य से अत्यन्त क्रोधित हुए और इस त्रिमूर्ति के क्रोध से एक विचित्र नारीरूपा आकृति उत्पन्न हुई जिसे दुर्गा कहा गया | क्योंकि यह आकृति “दुर्गा” ब्रह्मा विष्णु महेश के क्रोध का परिणाम थी इसलिये अन्य सभी देवताओं की अपेक्षा अधिक बलशाली थीं | साथ ही इस आकृति के समस्य अंग प्रत्यंग भी विविध देवताओं के तेज से ही निर्मित थे इसलिये अवाभाविक रूप से अत्यन्त रूपवती भी थीं | दुर्गा को सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र भेंट में दे दिए – जैसे शिव ने अपना त्रिशूल, विष्णु ने अपना चक्र, वरुण ने शंख और पाश, वायु ने धनुष बाण, इन्द्र ने वज्र, यमराज ने दण्ड, प्रजापति ने स्फटिक माला, ब्रह्मा ने कमण्डल, सूर्य ने अपनी समस्त किरणों का तेज, काल ने ढाल और तलवार इत्यादि इत्यादि समस्त देवताओं ने भेंट किये | साथ ही हिमवान ने अपना सिंह सवारी के लिये भेंट कर दिया | “समस्त देवानां तेजोराशि समुद्भवा” दुर्गा और भी अधिक शक्तिशाली हो गई थीं | अब देवी देवताओं को महिषासुर से मुक्ति दिलाने चलीं | महिषासुर देवी पर मुग्ध हो गया और उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया | देवी ने कहा कि यदि वह उन्हें युद्ध में परास्त कर देगा तो वे उसके साथ विवाह कर लेंगी | युद्ध आरम्भ हुआ जो नौ दिनों तक चला | अन्त में दुर्गा ने चन्द्रिका का रूप धारण किया और महिषासुर को अपने पैरों के नीचे गिराकर उसका सर काट डाला | सम्भवतः इसी घटना की स्मृति में आश्विन मास शुक्ल प्रतिपदा से नौ दिनों तक दुर्गा पूजा का अनुष्ठान चलता है | पितृ पक्ष की अमावस्या को महालया के दिन पितृ तर्पण के बाद से आरम्भ होकर नवमी तक अनुष्ठान चलता है और दशमी को प्रतिमा विसर्जन के साथ अनुष्ठान का समापन होता है | इन नौ दिनों में दुर्गा के विविध रूपों की पूजा की जाती है | ये नौ रूप सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं |

“प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् |

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनी तथा सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ||

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता:, उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ||

प्रथम दिन अर्थात आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को शैलपुत्री की अर्चना की जाती है | शैलपुत्री का रूप माना जाता है कि इनके दो हाथों में से एक में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमलपुष्प होता है | भैंसे पर सवार माना जाता है | माना जाता है कि शिव की पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान देखकर उसी यज्ञ की अग्नि में कूदकर स्वयं को होम कर दिया था और उसके बाद हिमालय की पत्नी मैना के गर्भ से हिमपुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या करके पुनः शिव को पति के रूप में प्राप्त किया | यद्यपि ये सबकी अधीश्वरी हैं तथापि पौराणिक मान्यता के अनुसार हिमालय की तपस्या और प्रार्थना से प्रसन्न हो कृपापूर्वक उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं | यह दुर्गा का प्रथम रूप है | शक्ति का यह प्रथम रूप शिव के साथ संयुक्त है, जो प्रतीक है इस तथ्य का कि शक्ति और शिव के सम्मिलन से ही जगत का कल्याण सम्भव है |

दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी का है – ब्रह्म चारयितुं शीलं यस्याः सा ब्रह्मचारिणी – अर्थात् ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति करना जिसका स्वभाव हो वह ब्रह्मचारिणी | इस रूप में भी देवी के दो हाथ हैं और एक हाथ में जपमाला तथा दूसरे में कमण्डल दिखाई देता है | जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है, ब्रह्मचारिणी का रूप है इसलिये निश्चित रूप से अत्यन्त शान्त और पवित्र स्वरूप है तथा ध्यान में मग्न है | यह रूप देवी के पूर्व जन्मों में सती और पार्वती के रूप में शिव को प्राप्त करने के लिये की गई तपस्या को भी दर्शाता है | देवी के इस रूप को तपश्चारिणी भी कहा जाता है |

नवरात्र के तीसरे दिन चन्द्रघंटा देवी की अर्चना की जाती है | चन्द्रः घंटायां यस्याः सा चन्द्रघंटा – आल्हादकारी चन्द्रमा जिनकी घंटा में स्थित हो वह देवी चन्द्रघंटा के नाम से जानी जाती है | इस रूप में देवी के दस हाथ दिखाए गए हैं और वे सिंह पर सवार दिखाई देती हैं | उनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, चक्र, जपमाला, त्रिशूल, गदा और तलवार सुशोभित हैं | अर्थात् महिषासुर का वध करने के निमित्त समस्त देवों के द्वारा दिए गए अस्त्र देवी के हाथों में दिखाई देते हैं | यह क्रोध में गुर्राता हुआ भयंकर रूप है जो पिछले रूपों से बिल्कुल भिन्न है और इससे विदित होता है कि यदि देवी को क्रोध दिलाया जाए तो ये अत्यन्त भयानक और विद्रोही भी हो सकती हैं |

देवी का चतुर्थ रूप कूष्माण्डा देवी का माना जाता है | कुत्सितः ऊष्मा कूष्मा – त्रिविधतापयुतः संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः स कूष्माण्डा – अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है वे देवी कूष्माण्डा कहलाती हैं | इस रूप में देवी के आठ हाथ माने जाते हैं | इनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, सुरापात्र, चक्र, जपमाला और गदा दिखाई देते हैं | यह रूप देवी का आह्लादकारी रूप है और माना जाता है कि जब कूष्माण्डा देवी आह्लादित होती हैं तो समस्त प्रकार के दुःख और कष्ट के अन्धकार दूर हो जाते हैं | क्योंकि यह रूप कष्ट से आह्लाद की ओर ले जाने वाला रूप है, अर्थात् विनाश से नवनिर्माण की ओर ले जाने वाल रूप, अतः यही रूप सृष्टि के आरम्भ अथवा पुनर्निर्माण की ओर ले जाने वाला रूप माना जाता है |

देवी का पाँचवाँ रूप स्कन्दमाता का रूप माना जाता है और नवरात्रों के पञ्चम दिन इसी रूप की अर्चना की जाती है | इस रूप में देवी के चार हाथ माने जाते हैं और सिंह पर सवार मानी जाती हैं | इनके हाथों में कमण्डल, कमलपुष्प और घंटा सुशोभित हैं | एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | इस रूप में इन्हें सुब्रह्मण्य अथवा कार्तिक की माता माना जाता है, जिन्हें स्कन्द के नाम से भी जाना जाता है | शिवपुत्र कार्तिक अथवा स्कन्द का जन्म शिव और पार्वती के सम्मिलन का परिणाम था और तारकासुर के वध के निमित्त हुआ था | छान्दोग्यश्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, और उन स्कन्द की माता होने के कारण ये स्कन्दमाता कहलाती हैं | इसीलिये यह रूप एक उदार और स्नेहशील माता का रूप है |

देवी का छठा रूप कात्यायनी देवी का माना जाता है | इस रूप में भी इनके चार हाथ माने जाते हैं और माना जाता है कि इस रूप में भी ये शेर पर सवार हैं | इनके तीन हाथों में तलवार, ढाल और कमलपुष्प हैं तथा स्कन्दमाता की ही भांति एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुईं और महर्षि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया, इसीलिये “कात्यायनी” नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई | इस प्रकार देवी का यह रूप पुत्री रूप है | यह रूप निश्छल पवित्र प्रेम का प्रतीक है, किन्तु कुछ भी अनुचित होता देखकर कभी भी भयंकर क्रोध में आ सकती हैं |

देवी का सातवाँ रूप कालरात्रि का रूप माना जाता है | सबका अन्त करने वाले काल की भी रात्रि अर्थात् विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि है | इस रूप में इनके चार हाथ हैं और ये गधे पर सवार दिखाई देती हैं | इनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और पाश दिखाई देते हैं | एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | इस रूप में इनका वर्ण श्याम है तथा ये प्रतिकार अथवा क्रोध की मुद्रा में दिखाई देती हैं | यह मुद्रा में इनका भाव अत्यन्त कठोर तथा उत्तेजित दिखाई देता है | देवी का यह आक्रामक तथा नकारात्मक रूप है | यह रूप इस कटु सत्य का द्योतक है जीवन सदा आह्लादमय और सकारात्मक ही नहीं होता | जीवन का एक दूसरा पक्ष भी होता है जो दुष्टतापूर्ण, निन्दनीय, अन्धकारमय अथवा नकारात्मक भी होता है |

देवी का आठवाँ रूप है महागौरी का | माना जाता है कि महान तपस्या करके इन्होने अत्यन्त गौरवर्ण प्राप्त किया था | इस रूप में भी चार हाथ हैं और माना जाता है इस रूप में ये एक बैल अथवा श्वेत हाथी पर सवार रहती हैं | दो हाथों में त्रिशूल और डमरू हैं | दो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं | यह रूप अत्यन्त सात्विक रूप है और माता पार्वती का उस समय का रूप माना जाता है जब उन्होंने हिमपुत्री के रूप में शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिये घोर तपस्या की थी |

देवी का अन्तिम और नवं रूप है सिद्धिदात्री का | जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है – सिद्धि अर्थात् मोक्षप्रदायिनी देवी – समस्त कार्यों में सिद्धि देने वाला तथा समस्त प्रकार के ताप और गुणों से मुक्ति दिलाने वाला रूप है यह | इस रूप में चार हाथों वाली देवी कमलपुष्प पर विराजमान दिखाई देती हैं | हाथों में कमलपुष्प, गदा, चक्र और पुस्तक लिये हुए हैं | माँ सरस्वती का रूप है यह | इस रूप में देवी अज्ञान का निवारण करके ज्ञान का दान देती हैं ताकि मनुष्य को उस परमतत्व परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त हो सके | अपने इस रूप में देवी सिद्धों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों तथा देवताओं से घिरी रहती हैं | इस रूप की अर्चना करके जो सिद्धि प्राप्त होती है वह इस तथ्य का ज्ञान कराती है कि जो कुछ भी है वह अन्तिम सत्य वही परम तत्व है जिसे परब्रह्म अथवा आत्मतत्व के नाम से जाना जाता है |

इस प्रकार नवरात्रों के नौ दिनों में पूर्ण भक्तिभाव से देवी के इन रूपों की क्रमशः पूजा अर्चना की जाती है | मनोनुकूल फलप्राप्ति की कामना से देवी की अर्चना की जाती है | ये समस्त रूप सम्मिलित भाव से इस तथ्य का भी समर्थन करते हैं कि शक्ति सर्वाद्या है | उसका प्रभाव महान है | उसकी माया बड़ी कठोर तथा अगम्य है तथा उसका महात्मय अकथनीय है | और इन समस्त रूपों का सम्मिलित रूप है वह प्रकृति अथवा योगशक्ति है जो समस्त चराचर जगत का उद्गम है तथा जिसके द्वारा भगवान समस्त जगत को धारण किये हुए हैं |

शून्य

शून्य

क्या करना है पूर्ण पात्र का, उसका कोई लाभ नहीं है |

रिक्त पात्र हो, तो उसमें कितना भी अमृत भर जाना है ||1||

सकल सृष्टि है टिकी शून्य पर, और शून्य से आच्छादित है |

शून्य से है पाता प्रकाश जग, पूर्ण हुआ तो अन्धकार है |

क्या करना है आच्छादन का, मुझको तो प्रकाश पाना है |

पूर्ण हुई तो ठहर जाऊँगी, मुझे शून्य में बह जाना है ||2||

प्राणवायु भी शून्य कक्ष में बहती, सबको जीवन देती |

कक्ष भरा हो तो फिर वह भी भारी होकर दुःख पहुँचाती |

शून्य बने अस्तित्व, तो उसमें पीड़ा का कोई काम नहीं है |

क्या करना है निजता का, मुझको सर्वस्व लुटा जाना है ||3||

निजता तो है स्वार्थपरक, है जिससे अहंभाव ही बढ़ता |

और अस्तित्वविहीन रहे तो मन आनंदित हुआ झूमता |

पूर्णज्ञान से बढ़कर कोई और नहीं अज्ञान जगत में |

बन अज्ञानी मुझे शून्य में मिलकर नव प्रकाश पाना है ||4||

परम तत्व का भेद न जानूँ, चरम सत्य का तथ्य न जानूँ |

योगी और वियोगी में क्या भेद, न मैं यह भी पहचानूँ |

मेरा राग विराग बना मन में नीरवता भर जाता है |

शून्य हुई चेतनता, मुझको नीरवता में खो जाना है ||5||