मैं दुखी हूँ ?

मैं दु:खी हूँ ?

मैं दु:खी हूँ, मैं व्यथित हूँ

समाधान चाहिये मुझे

अपने हर प्रयास में होती हूँ असफल

अनुभव होता है इस असफलता के कष्ट का

क्योंकि डूबी हुई हूँ मैं अपने कष्ट में आकण्ठ |

पर क्या सचमुच मैं दु:खी हूँ ?

झाँकती हूँ अपने भीतर और पाती हूँ

कि नहीं हूँ मैं दु:खी अपने लिये

मैं दु:खी हूँ, क्योंकि लोग चाहते हैं मेरा सुख |

मैं दु:खी हूँ, क्योंकि मुझे कोई दुःख नहीं |

मैं दु;खी हूँ, क्योंकि दु:खी हैं लोग

मेरी चिंता में |

मैं दु:खी हूँ, क्योंकि सोचती हूँ मैं औरों की |

मुझे तो जीना है इसी क्षण में

फिर अगले क्षण की क्यों चिंता हो मुझे ?

भविष्य की सफलता की क्यों चाहत हो मुझे ?

सम्भावित असफलता की क्यों सोच हो मुझे ?

मैं दु:खी हूँ,

क्योंकि मैं प्रदर्शित करना चाहती हूँ अपना दुःख…..

 

एक

सीमित है मेरा संसार, एक छोटे से अन्धकारपूर्ण कक्ष तक |

जब नहीं होता समाधान किसी समस्या का मेरे पास

बैठ जाती हूँ अपने इसी अँधेरे कक्ष में

आँसू की गर्म बूँदें ढुलक आती हैं मेरे गालों पर

मेरी छाती पर, मेरे हृदय पर

जानती हूँ मैं, कोई नहीं है वहाँ मेरे लिये

जानती हूँ मैं, कोई महत्व नहीं सत्ता का मेरी

जानती हूँ मैं, कुछ भी नहीं है मेरे वश में |

तब आती है हल्की सी परछाईं समर्पण की

रगड़ती हुई रीढ़ को मेरी

शांत करती हुई मांसपेशियों को मेरी

और किसी की स्नेहसिक्त वाणी देती है मुझे आश्वासन

“चिंता मत करो

मैं ही लाई हूँ तुम्हें यहाँ

मैं ही निकालूँगी तुम्हें यहाँ से |”

कौन है यह ? मेरी परम प्रिय आत्मा |

जब सारा संसार फेर लेता है आँखों को मेरी ओर से

जब सारा संसार उठा लेता है विशवास मुझ पर से

पुनः सुनाई देती है वही स्नेहसिक्त ध्वनि

“तुम अच्छी हो, श्रेष्ठ औरों से |

समय आ गया है त्यागने का सारे दुःख दर्द

समझो आँसू की उन गर्म बूंदों को

जो गिर पड़ी हैं हम दोनों के मध्य

और गिराओ उन्हें

और तब तुम हो जाओगी एक

मेरे साथ….”

मौन, नृत्य

मौन

कोई ध्वनि न हो हवा में, यदि वहाँ न हो कोई वृक्ष |

कोई अर्थ न हो मौन का, यदि वहाँ न हो कोई लक्ष्य |

मौन उत्पन्न होता है प्रेम में, मौन उत्पन्न होता है दया में

मौन उत्पन्न होता है आनंद में, और मौन उत्पन्न होता है संगीत में |

मौन, ऐसा गीत जो कभी गाया नहीं गया,

फिर भी मुखरित हो गया |

मौन, ऐसा सन्देश जो कभी सुना नहीं गया

फिर भी ज्ञात हो गया |

मौन, एक भाषा, जिसकी कोई लिपि नहीं |

मौन, एक नृत्य, जिसकी कोई मुद्रा नहीं |

मौन, स्थिरता की ऐसी ऊर्जा, जिसका कोई रूप नहीं |

मौन, एक शब्दहीन शब्द

इसीलिये नहीं हो सकती अनुचित व्याख्या इसकी |

प्रश्न केवल इतना ही

क्यों रुदन करते हैं हम जन्म लेते समय ?

क्यों नहीं जन्म ले सकते हम मौन भाव से ?

ताकि हमारी सत्ता ही बन जाए हमारा मोक्ष

और भाव बन जाए अभाव ?

 

नृत्य

मैं करती हूँ नृत्य

दोनों हाथ ऊपर उठाकर, आकाश की ओर

भर लेने को सारा आकाश अपने हाथों में |

चक्राकार घूमती हूँ

कई आवर्तन घूमती हूँ

गतों और परनों के, तोड़ों और तिहाइयों के

घूमते घूमते बन जाती हूँ बिन्दु

हो जाने को एक

ब्रह्माण्ड के उस चक्र के साथ |

खोलती हूँ अपनी हथेलियों को ऊपर की ओर

बनाती हूँ नृत्य की एक मुद्रा

देने को निमन्त्रण समस्त विशाल को

कि आओ, करो नृत्य मेरे साथ

मेरी लय में लय मिला, मुद्राओं में मुद्रा मिला

भावों में भाव मिला

और धीरे धीरे बढ़ती है गति

छाता है उन्माद मेरे नृत्य में

क्योंकि मुझे होता है भास अपनी एकता का

उस समग्र के साथ |

और मैं करती हूँ नृत्य, आनन्द में उस क्षण को जीने को |

मैं करती हूँ नृत्य, शिथिल करने के लिये मन को |

मैं करती हूँ नृत्य, खो देने को अपनी सारी उपलब्धियाँ |

मैं करती हूँ नृत्य, मिटा देने को सारी सम्वेदनाएँ |

मैं करती हूँ नृत्य, विस्मृत कर देने को सारा ज्ञान |

मैं करती हूँ नृत्य, अन्तिम समर्पण को स्वयं के |

प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…..

 

प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…..

 

माटी के ये दीप जलाने से क्या होगा, जला सको तो स्नेह भरे कुछ दीप जलाओ |

दीन हीन और निर्बल सबही के जीवन में स्नेहपगी बाती की उस लौ को उकसाओ ||

 प्रिय मित्रों, प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ | दीपमालिका में प्रज्वलित प्रत्येक दीप की प्रत्येक किरण आपके जीवन में सुख, समृद्धि, स्नेह और सौभाग्य की स्वर्णिम आभा प्रसारित करे…. और दीपावली के इसी शुभावसर पर प्रज्वलित दीप की जलती हुई कहानी उसी की जुबानी ………..

 मिट्टी का तन, पल भर जीवन, सदा मोम सा गलत रहता |

जलती बाती धरे हृदय पर सदा स्नेह में जलता रहता ||

धूमशिखा भी दीप्त दीप्ति से मिल बन जाती ज्योति सुहानी |

मैं हूँ दीप, सुनाऊँ तुमको अपनी जलती हुई कहानी ||१||

सुख दुःख दोनों जीवन साथी, एक दिया है एक है बाती |

किन्तु स्नेह के बिना व्यर्थ है दीप और दीपक की बाती |

स्नेह भरा है यह तन मेरा, ज्वाला से है पूर्ण जवानी ||२||

होती है दीवाली भू पर, जगर मगर दीपक जलते हैं

जैसे इस नीले अम्बर में झिलमिल तारकदल खिलते हैं |

मुझसे ही है रैन अमावस की पूनम सी हुई सुहानी ||३||

जाने कितनी नववधुओं का मैंने प्रथम मिलन देखा है

कितने कोमल गीत सुने हैं, कितना पग नर्तन देखा है |

अंगों की थिरकन देखी है, नयनों की चितवन अलसानी ||४||

मैंने मेहर सलीम अनेकों अपनी आँखों मिलते देखे |

और शेख़ अफ़ग़न भी कितने अपनी आँखों मिटते देखे |

बहुत मरमरी बाहें देखीं, कितनी ही सूरत नूरानी ||५||

साधक योगी, विरह वियोगी, मैं दोनों का बना सहारा

मैंने जग को राह देखाने में ही अपना जीवन हारा |

चाहे कितना क्षीण रहा, पर तन से नहीं पराजय मानी ||६||

किन्तु विचित्र विधाता, कितना अद्भुत यह विधान है तेरा

जो सारे जग को प्रकाश दे, उसी दीप के तले अँधेरा |

यह ही तो है उल्टी माया, और भाग्य की है मनमानी ||७||

सभी ओर मेरा प्रकाश है, सबकी आँखों में लौ मेरी

सारा तेज तेज है मेरा, और सकल दाहकता मेरी |

देखा मेरा सदा सभी ने स्नेहपूर्ण तन ज्योति सुहानी

सुनी नहीं है किन्तु किसी ने मेरी जलती हुई कहानी ||८||

प्रेम बन जाएगा ध्यान

प्रेम बन जाएगा ध्यान

मैंने देखा, और मैं देखती रही

मैंने सुना, और मैं सुनती रही

मैंने सोचा, और मैं सोचती रही

द्वार खोलूँ या ना खोलूँ |

प्रेम खटखटाता रहा मेरा द्वार

और भ्रमित मैं बनी रही जड़

खोई रही अपने ऊहापोह में |

तभी कहा किसी ने,

सम्भवतः मेरी अन्तरात्मा ने

तुम द्वार खोलो या ना खोलो

द्वार टूटेगा, और प्रेम आएगा भीतर

कब, इसका भान भी नहीं हो पाएगा तुम्हें |

हाँ, यदि करती रही प्रयास इसे पाने का

गणनाएँ और मोल भाव

तो लौटना होगा रिक्त हस्त

क्योंकि रह जाएगा वह बाहर ही द्वार के |

क्या होगा, इसका प्रश्न क्यों ?

कैसे होगा, इसका चिन्तन क्यों ?

कितना होगा, इसका मनन क्यों ?

छोड़ दो ये सारे प्रश्न, विचार, चिन्तन और मनन

प्रेम के प्रकाश को करने दो पार

सीमाएँ अपने समस्त तर्कों की

और तब, प्रेम बन जाएगा ध्यान |

ध्यान, जो तुम स्वयं हो

ध्यान, जो होगा तुममें

ध्यान, जो होगा तुम्हारे लिये

ध्यान, जो होगी तुम स्वयम् ||

 

 

 

 

 

आनन्द

आनन्द, अपरिचित, किन्तु परिचित बनी ऊर्जा |

एक स्वप्न, जिसमें है निवास मेरा |

एक स्थिति, जिससे है जुड़ाव मेरा |

एक ऐसी पूर्णता, जहाँ शेष है अभी कुछ और घटना |

निरन्तर लालसा सुखी रहने की |

क्या कभी अन्त होगा इस सबका ?

क्या निरन्तर सुखी रह पाएँगे हम

सुख की इस निरन्तर प्रगतिशील लालसा के साथ ?

नहीं, क्योंकि इसे पकड़ने के हर प्रयास के साथ

फिसलता जाएगा यह हाथों से हमारे |

जितनी लगाएँगे दौड़ इसकी ओर

उतना ही होता जाएगा यह दूर हमारी पहुँच से |

और रह जाएँगे हम मध्य मार्ग में ही |

पाना है इस ऊर्जा को यदि

तो समाप्त करने होंगे सारे प्रयास |

क्योंकि यह कहीं और नहीं, निहित है हममें ही |

प्रयास की दौड़ में हो जाते हैं हम दूर इससे |

वास्तव में आनन्द है ऐसा मोड़

जहाँ मनुष्य कर देता है बन्द द्वार सुखों के

क्योंकि उठ जाता है वह उनसे भी ऊपर ||