Monthly Archives: February 2013

मेरी बातें

है समय अब भी संभल जा

ओ सरल नादान मानव है समय अब भी संभल जा |
बन्द कर दे आज तो यह खेल जीवन और मरण का ||
मन में मीठी कल्पना ले, नीड़ स्वप्नों में बनाकर
जा रहे उड़ते विहग संकेत सा करते गगन में |
चाँद भी खोया गगन में, जो बना सबका सहारा
बन्द कर दे आज तो यह खेल जीवन और मरण का ||
हैं थकित तन और मन, हैं थक चुकीं अभिलाष सारी
साँस भी चलती थकित सी, झूमती पुतली नयन की |
है बड़ी हलचल जगत में, मिट गया सौन्दर्य नभ का
बन्द कर दे आज तो यह खेल जीवन और मरण का ||
खेल होगा बन्द कब तक, कौन जीतेगा यहाँ
हर कोई इससे अपरिचित लड़खड़ाता खेलता |
जबकि सम्मुख हो रहा है खून सबके सुख सपन का
बन्द कर दे आज तो यह खेल जीवन और मरण का ||

व्यथा

उर है मेरा व्यथित कहो फिर कैसे गीत मिलन के गाऊँ
रोती आँखों को कैसे मैं प्यार भरे सपने दिखलाऊँ ||
कहता है मन मेरा मुझसे कर पर पर विश्वास घनेरा
निज पर ही विश्वास मगर यह कर न सका आकुल मन मेरा |
नहीं आत्मविश्वास जगा फिर कैसे पर विश्वास जगाऊँ ||
किया अन्धविश्वास मनुज ने मानव मन के भोलेपन पर
किन्तु बना बारूद फटा वह मनुष्यता के कोमल तन पर |
क्यों न कहो फिर मानवता को दानवता के सम मैं पाऊँ ||
मानव के इस छल बल से तो दानवता भी है डर जाती
और क्रूरता भी अचरज में पड़ी मनुजता को निहारती |
स्वयं बना मन शत्रु स्वयं का, कैसे कोई मीत बनाऊँ ||
नहीं व्यथा यह केवल मेरी, पीड़ा यह जन जन के मन की
करनी है सब दूर वेदना मुझको जगती के मानस की |
क्यों न आज मैं पहले निज में, फिर पर में विश्वास जगाऊँ ||

आज मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ

आज जीवन से सरल है मृत्यु बन बैठी यहाँ
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||
एक हो कोई समस्या उसका हल भी मिले
पर यहाँ तो कितनी चिंताओं के हैं विषधर खड़े |
इनके दाँतों के ज़हर से मनुज बचता ना यहाँ |
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||
भय के अनगिन बाज उसके पास हैं मंडरा रहे
और दुःख के व्याघ्र उसके पास गर्जन कर रहे |
इनसे बचने को नहीं कोई राह मिलती है यहाँ |
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||
जिसको समझा नाव वह तो बोझ से बोझिल कोई
चरमराता टूटता सा काष्ठ का एक खण्ड था |
है डुबा डाला भँवर में, आज मन रोता यहाँ
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||
आज नफ़रत के ज़हर का पान करता हर मनुज
और मानवता को तज कर देव बनता है मनुज |
कंठ है अवरुद्ध, ना जीता न मरता है यहाँ
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||

मेरी बातें

समय ही उत्तर देगा !!

ना जाने कितनी लाशें सो जाती हैं आए दिन
बसों में, रेलों में, सड़कों पर या कारों में
खेतों और खलिहानों में
नदी जोहड़ या गहरे कुँए में
मंदिर मस्ज़िद या गिरजे में
या फिर अपने ही घर में
नहीं कोई एक ठिकाना इनका |
बस एक धमाका
और उड़ जाते हैं परखच्चे |
एक ही धमाका काफ़ी है फाड़ने को ज़मीन |
एक ही धमाके से डोल उठता है
शेषनाग का भी सिंहासन |
खेतों में उगती हैं अन्न की जगह
रक्त रंजित लाशों की फसलें |
नदी जोहड़ कुओं का जल भी हो चुका है लाल |
किसी बूढ़ी माँ के बुढ़ापे की लाठी
किसी इकलौती पत्नी के माथे का चाँद
किसी दूध पीते बच्चे की मासूम उम्मीद
भस्म हो जाती है आग के इस खेल में |
किसी के झोले में रखी
अभी अभी खरीदी माँ की सफ़ेद धोती
हो जाती है बेटे के खून से लाल |
पत्नी की सिंदूर की डिब्बी
बच्चे के खिलौने
सब बिखर जाते हैं टूट कर |
और नाम हो जाता है दर्ज़ शहीदों की सूची में |
होती है घोषणा
परिवारवालों को चंद कागज़ी टुकड़े देने की
जो घरवालों के हाथ में आने से पहले ही
हो जाते हैं ग़ायब |
उस अभागिन माँ को
विधवा पत्नी को
मासूम बच्चे को
मुआवज़े में मिलती हैं घर घर की ठोकरें
और अपना हक़ पाने की अन्तहीन लड़ाई |
क्या कभी ख़त्म होगा
रक्तबीज की भाँति फैलता आतंकवाद ?
क्या कोई दुर्गा माँ उतरेगी भू पर ?
समय ही उत्तर देगा !!

मेरी बातें

मनुज हृदय

मोम समान द्रवित होता था मनुज हृदय जो, आज उसे पत्थर सम निर्मम होते देखा |
परहित निज जीवन तज सकता, उसी मनुज को आज उच्च प्रस्तर भवनों में रहते देखा ||
लगी प्यास जब उसको, नदी तीर वह आया, देखा उसने बहुत स्वच्छ था जल नदिया का
बहुत पिया जल किन्तु रहा प्यासा का प्यासा, क्योंकि रक्त मनुज का ही तो उसको भाता |
शोणित हित उसको हमने ललचाते देखा, आज उसे पत्थर सम निर्मम होते देखा ||
हरे भरे ये खेत और खलिहान अनूठे, करते आकर्षित उसको वरदान प्रकृति के
किन्तु भूख न मिटती उसकी मधुर अन्न से, भूख मिटा सकता वह केवल रजत स्वर्ण से |
हीरे मोती हित उसको अकुलाते देखा, उसे उच्च प्रस्तर भवनों में रहते देखा ||
कहता था वह सत्य बोलना धर्म परम है, मात पिता गुरुजन की सेवा लक्ष्य चरम है
आज वही है सत्य बोलने से घबराया, उसके मात पिता गुरुजन सब केवल माया |
पाकर माया मुदित भाव इठलाते देखा, आज उसे पत्थर सम निर्मम होते देखा ||
रात अमावस की जब दीवाली सजती है, अँधियारी वह रात पूर्णिमा सी जगती है
धन की देवी का करता है वह अभिनन्दन, लक्ष्मी को लक्ष्मी ही करता है वह अर्पण |
स्वर्ण बना है देव, उसे हर्षाते देखा, उसे उच्च प्रस्तर भवनों में रहते देखा ||

एक अजूबा

एक अजूबा हमने देखा खड़ा हुआ फुटपाथ पर
पगला पगला कहकर बच्चे फेंक रहे पत्थर उस पर |
वह था चीख चीख कर बोला सुनो, नहीं मैं पगला हूँ
मैं तुम सबके दादा जैसा, मत मारो पत्थर मुझ पर ||
बहुत दिनों से भूखा प्यासा फिरता गली गली मारा
तन पर चिथड़ा धोती डाले भीख माँगता था दर दर |
कभी कोई तो दया करेगा इसीलिये भागा फिरता
पर लोगों ने बंद किये दरवाज़े उसको धकिया कर ||
जिनके हाथों में पत्थर थे कुछ पल को वे ठहर गए
मगर तभी कोई चिल्लाया, बरसाओ पत्थर इस पर |
बोला, यह या तो है पगला, या फिर कोई चोर उचक्का
या फिर है आतंकवादियों का कोई मुखिया यह नर ||
कुछ पल सोचा बच्चों ने फिर बरसाए पत्थर उस पर
लथपथ हुआ खून से तत्क्षण संज्ञाशून्य गिरा भू पर |
कहीं हुआ दंगा है सुनकर आई टुकड़ी एक पुलिस की
दूर भगाया बच्चों को फिर डंडे का दिखला कर डर ||
ज्यों ही मिली ख़बर दंगे की, मंत्री जी पहुँचे तत्क्षण
शव को देखा, कुछ पल सोचा, बैठे गाड़ी में जाकर |
अगले दिन ये छपी ख़बर थी अखबारों में प्रथम पृष्ठ पर
वीर पुलिस ने ढेर किया एक आतंकी चौराहे पर ||

मेरी बातें

हर नाता मतलब का नाता

जग में हर एक नाता है मतलब का नाता
इसीलिये पंछी को ये जग नहीं सुहाता ||
जगवालों ने सोने का पिंजरा बनवाया, और पकड़ कर पंछी को उसमें बैठाया
उसके पंख काटकर पिंजरा बन्द कर दिया, और बहुत सा दाना पानी उसमें भरवाया |
पर पंछी था उसमें बैठा रोता रहता
क्योंकि उसको जग का मायाजाल न भाता ||
स्वर्णकार के कौशल का था रूप अनूठा, वह मणिमण्डित अद्वितीय सोने का पिंजरा
उसमें पड़ा हुआ दाना हीरा मोती था, एक जौहरी ही जिसका मोल बता सकता था |
पर पंछी का पेट न हीरा मोती भरता
उससे था वह अपने जीवन का भय खाता ||
पिंजरे में गुमसुम बैठा वह सोच में डूबा, आता जाता हर प्राणी उसको तड़पाता
खेल खेल में कोई उसके पंख नोचता, और कोई ऊँगली से उसकी चोंच पकड़ता |
पर उसके आँसू पर कोई ध्यान न देता
बस हर कोई उससे अपना मन बहलाता ||
एक दिन यों ही उसने अपने पंख जो देखे, बढ़े हुए थे फिर से वे पहले के जैसे
फिर से उड़ जाने की मन में आस लिये वह, लगा टकटकी द्वार किनारे वह जा बैठा |
फिर से पंख काटने हित था द्वार खुला जब
अवसर देख उड़ा पंछी फिर पेंग बढ़ाता ||
पल भर को सब हाथों को मलते ही रह गए, पुनः पकड़ने हित फिर उसके पीछे भागे
कभी पुकारा झूठी देकर प्रेम दुहाई, और कभी एक भद्दी सी गाली भी दे दी |
पर पंछी ऊँचा ही ऊँचा उड़ता जाता
जग से शिक्षा पा फिर उसके हाथ न आता ||

गंगाजल खुद हव्य बन गया

कैसी अनबुझ प्यास है देखो, गागर है प्यासी की प्यासी |
तृप्तिमन्त्र भी काम न आए, गंगाजल खुद हव्य बन गया ||
मैंने अपने घर की क्यारी में एक नेहवृक्ष लगवाया
और प्यार के ही जल से था मैंने उसको खुद ही सींचा |
पर मौसम ने करी दुश्मनी, नन्हा प्रेमवृक्ष झुलसाया
तृप्तिमन्त्र भी काम न आए, गंगाजल खुद हव्य बन गया ||
बहते आँसू के संग देखो उम्र यहाँ है ढलती जाती
और अतृप्त कामना देखो घोर भँवर में डूबी जाती |
है पूनम की रजनी लेकिन घाम जेठ का है गरमाया
तृप्तिमन्त्र भी काम न आए, गंगाजल खुद हव्य बन गया ||
जिसने मन का मोती लूटा, सीपी का दुःख वह क्या जाने
जिसका है अस्तित्व मिट गया, कैसे सँभलूँ, वह क्या जाने |
कुछ तो भूल समर्पण में थी यौवन को जो शाप लगाया
तृप्तिमन्त्र भी काम न आए, गंगाजल खुद हव्य बन गया ||
भटक रहा मन कबसे बादल के समान सूने अम्बर में
और सदा मरता व्यक्तित्व मौन हो, जग के कोलाहल में |
झूठा स्नेहदान देकर यह कौन आज छल करने आया
तृप्तिमन्त्र भी काम न आए, गंगाजल खुद हव्य बन गया ||

मेरी बातें

धरती भी भय से थर्राती

अरे हुआ क्या, आज मनुज की रक्तपिपासा बढ़ती जाती |
नहीं जान का मोल किसी की, दानवता है बढ़ती जाती ||
इसके वहशीपन से आदमखोर दरिन्दे भी शर्माते |
इसके मुख पर दया नहीं, बस घोर क्रूरता ही मुसकाती ||
चीर हरण के साथ आज तेज़ाब भी मुख पे फेंका जाता |
ऐसा देख कुकृत्य, दु:शासन की भी हैं आँखें झुक जातीं ||
आज न कोई कृष्ण, हर तरफ़ क़ायर कौरव पाण्डव बैठे |
भीष्म द्रोण का काम नहीं, शकुनी की ही गोटी उलझाती ||
आज जगत के हाथों कितनी द्रौपदियाँ और कुन्ती बनतीं |
और बनी लावारिस कितने कर्णों की आत्माएँ रोतीं ||
चक्रव्यूह में फँस कितने अभिमन्यु बिना मौत मर जाते |
कितने अश्वत्थामाओं के मस्तक की है मणि छिन जाती ||
रक्तबीज के जैसे दानव रात और दिन बढ़ते जाते |
इनकी हुँकारों से तो धरती भी भय से थर्रा जाती ||

कैसे वीणा हाथ उठाऊँ

मन में है तूफ़ान भयंकर, कैसे इससे पार मैं पाऊँ |
अभी व्यथित है मेरा अन्तर, कैसे मन के तार मिलाऊँ ||
आज सुनाई पड़ता है बस चारों ओर अजब कोलाहल
कहीं कर रही देवी क्रन्दन, कहीं दनुज सम नर का नर्तन |
ऐसे कोलाहल में कैसे कहो मैं अपने मन बहलाऊँ ||
भीड़ भरे बाज़ारों में है कहीं फटे बारूद भयंकर
और पड़े क्षत विक्षत लाशों के देखो अम्बार भयंकर |
बनी दीपमालाएँ इन्हीं चिताओं की, क्या दीप जलाऊँ ||
पता नहीं कब ठण्डी होगी अनगिन लाशों की यह होली
रक्तपिपासा मनुज दनुज की ना जाने कब होगी पूरी |
रक्तपर्व ये देख मनुज के, भय से थर थर मैं थर्राऊँ ||
माना मादक राग बजाने हित वसन्त फिर आएगा
होली मेघ मल्हार और कजरी बिरहा रंग लाएगा |
किन्तु अभी हैं भय के साए, कैसे वीणा हाथ उठाऊँ ||

मेरी बातें

अँधेरा उजाला

एक तरफ़ है घना अँधेरा, एक तरफ़ फैला उजियाला
उजियाले के आगे खड़ा अँधेरा हाथ पसारे रहता ||
कभी उजाला उसके दुर्बल हाथों पर कुछ सिक्के रखता
और कभी फिर ज़ेब काटने की भी उसे सज़ा दिलवाता |
अँधियारे के यौवन का वह कभी चीर भी हर ले जाता
तार तार कपड़ों में लख कर कभी लार भी वह टपकाता ||
खड़ा देख अपनी देहरी पर कुटिल प्यार से उसे बुलाता
मगर बाद में लहू लुहान हो जाने पर बाहर फिंकवाता |
पर आख़िर अँधियारा भी कब चुपचाप बना सब सहता
वह भी कालिख़ लगा उजाले को, वापस अपने घर आता ||
चली आ रही यही लड़ाई सदियों सदियों युगों से
अँधियारे को छुरा घोंप उजियाला है बस हँसता रहता |
मगर अँधेरा मरकर भी उजियाले पर है भारी पड़ता
उसके मुँह को नोच नोच कर अट्टहास वह करता रहता ||

मेरी बातें

अभी शेष है

कितने ही दिन मास वर्ष युग कल्प थक गए कहते कहते
पर जीवन की रामकहानी कहते कहते अभी शेष है ||
हर क्षण देखो घटता जाता साँसों का यह कोष मनुज का
और उधर बढ़ता जाता है वह देखो व्यापार मरण का |
सागर सरिता सूखे जाते, चाँद सितारे टूटे जाते
पर पथराई आँखों में कुछ बहता पानी अभी शेष है ||
एक ईंट पर खड़ा महल है, तो दूजी पर कड़ी कब्र है
एक बार है लाश जी रही, एक बार मर रहा जीव है |
एक लहर जो चली कूल से, नाव तलक आ पार खो गया
जन्म मरण की इस द्विविधा में जीत हार तो अभी शेष है ||
एक दिये से सुबह जल उठी, एक दिये से रात ढल गई
एक हवा से चमन खिल उठा, एक हवा से कली बिखर गई |
किसी डाल पर पुष्प खिल गए, कोई सुमन संग धूल बन गई
संहारों और निर्माणों में जीवन का सच अभी शेष है ||
आज, आज का वर्तमान, पर कल का है अतीत कहलाता
और भविष्यत ? सिर्फ़ भूत का मूक गीत ही तो है गाता |
जीवन की चुटकी भर हलचल में हर एक पल मरण घुला है
पर हर बुझती हुई धड़कन में पीर पुरानी अभी शेष है ||

मेरी बातें

फुटपाथ

ठण्ड की निर्मम भयानक रात में फुटपाथ पर दम तोड़ती हैं कितनी जानें
जैसे पाले में ठिठुरकर हरितवर्णी वृक्ष होकर पीतपत्रित सूख जाते |
जैसे हिम के भार से झुक बाँस टूटे, किन्तु हिम न जान पाए उस व्यथा को
रात दिन सड़कों के घर टूटे बिखरते, किन्तु आवागमन क्या रुकने है पाता ?|
दर्प से सर को उठाए चीड़ भी तो हिम की बाँहों में समर्पित टूट जाते
फिर भला फुटपाथ पर सोती ये जानें बाँह में फुटपाथ की क्यों न समाएँ ?|
तेज़ लू हो, या कि अंधड़ सर खड़ा हो, मन में भी तूफां भयंकर उठ रहा हो
पर नहीं हैं हारतीं इनसे कभी ये, आँधी तूफ़ानों को निज में हैं मिलातीं ||
तेज़ बारिश में फटे कपड़ों में सिमटीं, नभ से जब पत्थर बरसते टूट जातीं
पर सदा ही मस्त अल्हड़ सी ये जानें अपने होठों पर कभी उफ़ तक न लातीं |
रंग हो फागुन का, दीवाली की चमचम, या मुबारक़ ईद, शब ए रात हो या
मन के भावों को दबा निर्लिप्त सी ये योगी सम मानों समाधिलीन रहतीं ||

महामहिम

चकाचौंध पैसे की लेकर चन्दन की वो चिता है जलती
मगर उधर लकड़ी वाले के चूल्हे में भी आग न जलती |
इधर चिता में देसी घी के चार कनस्तर उल्टे जाते
पर ग़रीब ग्वाले के बच्चे गंदे नाले का जल पीते ||
यहाँ लाश के लिये चिता पर फूलों का गद्दा बिछ्वाते
पर माली काका के बच्चे पत्थर पर निज तन छिलवाते |
महामहिम के अन्तिम दर्शन को लोगों का ताँता जुड़ता
मगर कफ़न वाला जीते जी शूद्र बना बस ठोकर खाता ||
दस एकड़ ज़मीन में उनकी यादगार बनवाई जाती
मगर इसे जीते जी भी दो गज़ ज़मीन तक ना मिल पाती |
उनके तो नाती पोतों को भी जनता है शीश नवाती
पर इनके बच्चों की साँसें फुटपाथों पर बिखरी जातीं ||

मेरी बातें

मन में उल्लासों के पुष्प खिलें

पैरों में है नृत्य और प्राणों में हैं कुछ गीत भरे
मंज़िल निकट लगे, तब मन में उल्लासों के पुष्प खिलें ||
निरुद्देश्य मैं घूम रही थी, मंज़िल का कुछ होश नहीं था
मैं हूँ कौन, कहाँ आई हूँ, इसका भी कुछ बोध नहीं था |
भूत भविष्यत वर्तमान क्या है, इसका कुछ ज्ञान नहीं था
इसीलिये बढ़ती जाती थी मन में नई उमंग भरे ||
मैंने चाहा जीना हर एक पल को उसके पूर्ण रूप में
इसीलिये तो छोटे बच्चे सा भोलापन मेरे मन में |
हर एक पल था आह्लादपूर्ण, उल्लासपूर्ण, उत्साह भरा सा
इसीलिये अमृत की बूँदें अन्तर में हैं सदा झरें ||
नहीं कभी दौड़ी मंज़िल की धुन में मैं पागल होकर
नहीं कभी अकुलाई खोकरके अपना कोई भी पल |
इसीलिये तो मेरी राहें बनी रहीं गतिमान सदा
इसीलिये तो मंज़िल मुझको निज बाहों में आज भरे ||

मैं अपनाती हूँ

पुष्प मिलें कितने ही मुझको, कितने ही गलहार बनें
जीवन संग क्रीड़ा के हित शूलों को भी मैं अपनाती हूँ ||
जीवन एक अनबुझी पहेली, धूप छाँव की भ्रामक माया
ऊषा के ही संग चली आती है रजनी की भी छाया |
अवसर सुधापान के मुझको मिलते रहते जाने कितने
पर विष को भी सम्मानित करने के हित मैं अपनाती हूँ ||
पुष्पों की है नियति यही, दो दिन सुगन्ध सरसाते हैं
पर शूलों के घाव उम्र भर तक मन को सहलाते हैं |
मलय पवन के संग चली आती है पथ की धूल निराली
उसी धूल को सम्मानित करने हित मैं अपनाती हूँ ||
विरह मिलन की धूप छाँव नित करती रहती आँखमिचौली
तीव्र विरह में जल जाती है मिलन रास की भी तो होली |
लाज भरी यह सेज रात की कुछ पल ही अभिसार है करती
उसी याद को सम्मानित करने के हित मैं अपनाती हूँ ||

मेरी बातें

सरस्वती पूजन, निराला जयन्ती और बसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…….

कड़ाके की ठण्ड के बाद बसन्त ऋतुराज बसन्त की अगवानी करता बसन्त पञ्चमी का उत्सव प्रेम, सौहार्द और उल्लास का उत्सव है | इस दिन एक ओर जहाँ ज्ञान विज्ञान की दात्री माँ सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है वहीं दूसरी ओर प्रेम के देवता कामदेव और उनकी पत्नी रति का स्मरण भी किया जाता है | सभी जानते हैं कि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलं और ऋतुसंहार तथा बाणभट्ट के कादम्बरी और हर्ष चरित्र जैसे अमर ग्रंथों में उल्लास की इस ऋतु तथा प्रेम के इस पर्व का बड़ा सुरुचिपूर्ण वर्णन उपलब्ध होता है जबकि प्रेमीजन जीवन भर साथ साथ रहने का संकल्प लेते थे, या फिर बिरहीजन अपने प्रेमी अथवा प्रियतमा के शीघ्र मिलन की कामना करते थे | जहाँ Valentine’s Day की उमंगें मात्र एक दिन के लिये ही प्रेमीजनों के दिल की धड़कनें नहीं बढ़ाती थीं, वरन् बसन्त पञ्चमी से लेकर होली तक का समूचा समय प्रेम के लिये समर्पित होता था |आज भी बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, उत्तराँचल सहित देश के कई अंचलों में पीतवस्त्रों तथा पीतपुष्पों से सुसज्जित नर-नारी बाल-वृद्ध एक साथ मिलकर माँ वाणी के वन्दन के साथ साथ प्रेम के देवता की पूजा भी उल्लासपूर्वक करते हैं | इसका कारण यही है कि इस समय प्रकृति स्वयं समस्त सीमाएँ, समस्त बन्धन भुलाकर प्रेम में मदमस्त हो जाती है – सर्दियों की विदाई के बाद जब सब कुछ नया सा लगता है – चारों ओर प्रस्फुटित नवकलिकाएँ और उनके चारों ओर गुन गन कर मँडराते भँवरे तथा प्रकृति की रंग बिरंगी छटा देखकर मगन मन कुहू कुहू का गान सुनाती कोयल हर जड़ चेतन को प्रेम का राग आलापने के लिये विवश कर देती है | तभी तो बसन्त को ऋतुओं का राजा कहा जाता है | तो क्यों न हम सब भी बसन्त के इस मनमोहक संगीत में खो जाएँ | साथ ही आज ही के दिन महाकवि निराला का जन्मदिवस भी धूम धाम से मनाया जाता है | तो, सभी मित्रों को सरस्वती पूजन, निराला जयन्ती और भारतीय Valentine’s day बसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…….

संग फूलों की बारात लिये लो ऋतु बसन्त अब चहक उठी ||
कोयल की तान सुरीली सी, भौंरे की गुँजन रसभीनी
सुनकर वासन्ती वसन धरे, दुल्हिन सी धरती लचक उठी ||
धरती का लखकर नवयौवन, लो झूम उठा हर चरन चरन
हर कूल कगारों कछारों पर है मधुर रागिनी झनक उठी ||
ऋतु ने नूतन श्रृंगार किया, प्राणों में भर अनुराग दिया
सुख की पीली सरसों फूली, फिर नई उमंगें थिरक उठीं ||
पर्वत टीले वन और उपवन हैं झूम रहे मलयानिल से
लो झूम झूम कर मलय पवन घर द्वार द्वार पर महक उठी ||

प्रेम सहित – पूर्णिमा