मेरी बातें

अँधेरा उजाला

एक तरफ़ है घना अँधेरा, एक तरफ़ फैला उजियाला
उजियाले के आगे खड़ा अँधेरा हाथ पसारे रहता ||
कभी उजाला उसके दुर्बल हाथों पर कुछ सिक्के रखता
और कभी फिर ज़ेब काटने की भी उसे सज़ा दिलवाता |
अँधियारे के यौवन का वह कभी चीर भी हर ले जाता
तार तार कपड़ों में लख कर कभी लार भी वह टपकाता ||
खड़ा देख अपनी देहरी पर कुटिल प्यार से उसे बुलाता
मगर बाद में लहू लुहान हो जाने पर बाहर फिंकवाता |
पर आख़िर अँधियारा भी कब चुपचाप बना सब सहता
वह भी कालिख़ लगा उजाले को, वापस अपने घर आता ||
चली आ रही यही लड़ाई सदियों सदियों युगों से
अँधियारे को छुरा घोंप उजियाला है बस हँसता रहता |
मगर अँधेरा मरकर भी उजियाले पर है भारी पड़ता
उसके मुँह को नोच नोच कर अट्टहास वह करता रहता ||

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