मेरी बातें

धरती भी भय से थर्राती

अरे हुआ क्या, आज मनुज की रक्तपिपासा बढ़ती जाती |
नहीं जान का मोल किसी की, दानवता है बढ़ती जाती ||
इसके वहशीपन से आदमखोर दरिन्दे भी शर्माते |
इसके मुख पर दया नहीं, बस घोर क्रूरता ही मुसकाती ||
चीर हरण के साथ आज तेज़ाब भी मुख पे फेंका जाता |
ऐसा देख कुकृत्य, दु:शासन की भी हैं आँखें झुक जातीं ||
आज न कोई कृष्ण, हर तरफ़ क़ायर कौरव पाण्डव बैठे |
भीष्म द्रोण का काम नहीं, शकुनी की ही गोटी उलझाती ||
आज जगत के हाथों कितनी द्रौपदियाँ और कुन्ती बनतीं |
और बनी लावारिस कितने कर्णों की आत्माएँ रोतीं ||
चक्रव्यूह में फँस कितने अभिमन्यु बिना मौत मर जाते |
कितने अश्वत्थामाओं के मस्तक की है मणि छिन जाती ||
रक्तबीज के जैसे दानव रात और दिन बढ़ते जाते |
इनकी हुँकारों से तो धरती भी भय से थर्रा जाती ||

कैसे वीणा हाथ उठाऊँ

मन में है तूफ़ान भयंकर, कैसे इससे पार मैं पाऊँ |
अभी व्यथित है मेरा अन्तर, कैसे मन के तार मिलाऊँ ||
आज सुनाई पड़ता है बस चारों ओर अजब कोलाहल
कहीं कर रही देवी क्रन्दन, कहीं दनुज सम नर का नर्तन |
ऐसे कोलाहल में कैसे कहो मैं अपने मन बहलाऊँ ||
भीड़ भरे बाज़ारों में है कहीं फटे बारूद भयंकर
और पड़े क्षत विक्षत लाशों के देखो अम्बार भयंकर |
बनी दीपमालाएँ इन्हीं चिताओं की, क्या दीप जलाऊँ ||
पता नहीं कब ठण्डी होगी अनगिन लाशों की यह होली
रक्तपिपासा मनुज दनुज की ना जाने कब होगी पूरी |
रक्तपर्व ये देख मनुज के, भय से थर थर मैं थर्राऊँ ||
माना मादक राग बजाने हित वसन्त फिर आएगा
होली मेघ मल्हार और कजरी बिरहा रंग लाएगा |
किन्तु अभी हैं भय के साए, कैसे वीणा हाथ उठाऊँ ||

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