मेरी बातें

कैसे धीर मेरा मन धराए

रात पूनम की, वो देखो चाँद झाँके बादलों से |
जब नहीं तुम पास, कैसे धीर मेरा मन धराए ||
शाम को सन सनन बहती ये हवाएँ गीत गातीं
और फूलों का मधुर अमृत ये जग पर हैं लुटातीं |
पर नहीं मुझको पवन के गीत या अमृत लुभाएँ
जब नहीं तुम पास, कैसे धीर मेरा मन धराए ||
वो समंदर की लहर भी कूल से मिल मुस्कुराती
गहन चुम्बन कूल का ले मस्त हो नर्तन दिखाती |
पर भला कैसे मेरा मन मुस्कुराए, गीत गाए
जब नहीं तुम पास, कैसे धीर मेरा मन धराए ||
स्वाति घन की बाट तकता सीप सा प्यासा मेरा मन
और चातक सम विकल रहते हैं प्यासे से ये खंजन |
फिर भला सावन की रिमझिम कैसे मेरे मन को भाए
जब नहीं तुम पास, कैसे धीर मेरा मन धराए ||

तुम क्या समझो तुम क्या जानो

घड़ी विरह की क्यों छल जाती, तुम क्या समझो, तुम क्या जानो |
अभिलाषाएँ क्यों छल जातीं, तुम क्या समझो, तुम क्या जानो ||
ढक लेता जब गहन अँधेरा इस रजनी के कोमल तन को
और इधर जग का हर प्राणी कर लेता जब बन्द नयन को |
नींद हमारे क्यों उड़ जाती, तुम क्या समझो तुम क्या जानो ||
असह प्रतीक्षा की घड़ियों में नहीं कोई जब साथी होता
चाँद बेचारा साथ हमारे रात रात भर को है जगता |
मगर चन्द्रिका क्यों जल जाती, तुम क्या समझो, तुम क्या जानो ||
प्रात उषा की स्वर्णिम किरणें आतीं करने जब उजियाला
हल हमारा देख पूछतीं बार बार तब नाम तुम्हारा |
पर वाणी चुप क्यों कर जाती, तुम क्या समझो, तुम क्या जानो ||

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मेरी बातें

अनकही कहानी

समझ न पाऊँ क्या समझाऊँ, नयनों में है छिपी कहानी |
नहीं चाहती शब्दों में मैं बंद करूँ अनकही कहानी ||
खुशियाँ मुझे मिली हैं इतनी जिनमें यह मन भरमाता है
कभी आँख मुसकाने लगतीं और कभी जल भर आता है |
डरती हूँ न कहीं खो जाए खुशियों की यह माल सुहानी ||
छा जाता है गहन कुहासा, कभी दर्द भी बढ़ जाता है
आशा और निराशा के दोराहे पर मन घबराता है |
सपनों का सागर है गहरा और आस की नाव पुरानी ||
कभी स्नेह दीपक ज्योतित हो मुझको राह दिखा जाता है
और कभी आशंकाओं का झोंका दीप बुझा जाता है |
तब मेरे साथी होते हैं सूनी मंज़िल, राह अजानी ||
मेरा जीवन भी दीपक सम सबको राह दिखाने हित है
और अन्त में स्नेहरहित हो खुद ही बुझ जाने के हित है |
किन्तु कभी फिर कोई करेगा ज्योतित दीपक जोत सुहानी ||

कल्पनाओं का पक्षी

मेरी कल्पनाओं का पक्षी पंख लगा उड़ता जाता है |
दूर दूर तक गगन चूमता, ऊँचा ही उठता जाता है ||
है कितना विशाल यह जग, इसमें परिचय का ठौर नहीं है |
पर परिचय पाने हित नित नित नव विचार मन में लाता है ||
दूर असीमित नभ में उड़ता, साँसों की असीमता लेकर |
उड़ते उड़ते अगर थका तो वहीं ज़रा वह रुक जाता है ||
उड़ना रुकना, फिर से उड़ना, सदा यही क्रम चलता रहता |
किन्तु थका होने पर भी वह कभी नहीं गिरने पाता है ||
गतिमय मन, गतिमय पग हर पल, पंखों में तूफ़ान समेटे |
अपना मीठा मतवाला स्वर खुले गगन में भर जाता है ||
देख इधर वह कभी झूमता, देख उधर वह कभी डोलता |
पर मंज़िल का भान नहीं है, इसीलिये उड़ता जाता है ||

आज होली है

कैसा मतवाला दिन आया

कैसा मतवाला दिन आया, रंग अबीर गुलालों वाला |
तन तो डूब गया रंगों में, पर मन को किसने रंग डाला ||१||
डाली डाली में थिरकन है, फूल फूल भी महक रहा है |
रंगों की चादर को ओढ़े पत्ता पत्ता चहक रहा है ||
गोरी के नयनों में अमृत का रंग किसने है भर डाला ||२||
आज धरा का वासंती आँचल रंगों में भीग रहा है |
दूध धुले गालों पर चांदी का रंग देखो चमक रहा है ||
किसको देखा, जो लज्जा से लाल हुआ मुख भोला भाला ||३||
कहती है धरती रंगों की एक प्यारी मदभरी कहानी |
ऐसे में बोलो फिर नभ से कैसे ना होगी नादानी ||
रंगों को छलकाकर किसने अद्भुत आज रास रच डाला ||४||
हर घर आँगन शोर मचा है, जग ये सारा रंग रचा है |
गोरी के कजरारे नयनों में मस्ती का रंग भरा है ||
मस्ती के मधुघट को देखो किसने आज रिक्त कर डाला ||५||

मनभावन त्यौहार

आज कौन इस पार, कौन उस पार है
राग रंग में रंगा मिलन का मनभावन त्यौहार है ||१||
कण कण है रंगीन नए रंग घोलता,
पात पात है मस्त पवन संग डोलता |
लहर लहर लहराता देखो कितना निर्मल नीर है
थिरक रही चांदनी गगन में, कौन कहो गंभीर है ?
वासंती धरती भी करती आज सरस मनुहार है
राग रंग में रंगा मिलन का मनभावन त्यौहार है ||२||
हरीतिमा भू पर भिखरी है, चटख रही है कली कली,
गूँज धमार और होली की गूँज रही है गली गली |
चेहरे चेहरे पर मुस्कानें, उर उर में उल्लास है
पग पग में नूतन नर्तन है, कैसा अद्भुत रास है ||
छाया है मधुमास चतुर्दिक, आज बसंत बहार है
राग रंग में रंगा मिलन का मनभावन त्यौहार है ||३||
आज अधूरा गीत न कोई रह जाए,
चुभने वाली बात न कोई कह जाए |
मिल कर बिछड़े आज न देखो जन कोई
जुडकर टूटे आज न देखो सपन कोई ||
देखो आज धूल ने भी तो किया हार सिंगार है
राग रंग में रंगा मिलन का मनभावन त्यौहार है ||४||

आज होली है

मन में नई उमंग भरो तो

जिससे यह तन मन रंग जाए ऐसा कोई रंग भरो तो |
प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||
यह दीवार घृणा की ऊँची आसमान तक खड़ी हुई है
भू पर ही जन जन में भू नभ जैसी दूरी पड़ी हुई है |
आँगन समतल करो, ढहाने का इसके कुछ ढंग करो तो
प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||
दुर्भावों का हिरणाकश्यप घेर रहा है सबके मन को
विषम होलिका लिपट रही है इस पावन प्रह्लाद के तन को |
सच पर आँच नहीं आएगी, जला असत्य अपंग करो तो
प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||
मुख गुलाल से लाल हुआ है, किन्तु न मन अनुराग रंगा है
रंग से केवल तन भीगा है, मन तो बिल्कुल ही सूखा है |
दुगना होगा असर, नियम संयम की सच्ची गंध भरो तो
प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||
एक दूसरे पर आरोपों की कीचड़ बस उछल रही है
पिचकारी से रंग के बदले गोली ही बस निकल रही है |
ये बेशर्म ठिठोली छोड़ो, मधुर हास्य के व्यंग्य भरो तो
प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||
खींचे कोई घूँघट का पट, हाथ पकड़ कर नीचे कर दो
मत रोको गोरी के मग को, उसे नेह आदर से भर दो |
राधा स्वयं चली आएगी, सरस श्याम का रंग भरो तो
प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||
भीतर से यदि नहीं रंग तो मिट्टी है मिट्टी का चोला
दुनिया का यह वैभव क्या है, हिम से ढका आग का गोला |
वहम और सन्देह तजो सब, मन में नई उमंग भरो तो
प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

आज होली है

आया फागुन

टहनी टहनी टेसू फूले, लो आया फागुन |
तन तो भीग गया रंगों में, पर मन उनके पास ||
डगर डगर में, नगर नगर में, उड़ता लाल गुलाल |
लेकिन रंगा नहीं मन जब तक, मेला सभी उदास ||
गले मिले पर मिला न उर तो व्यर्थ मिलन का खेल
दो तन बनें न अगर एक मन, तो कैसा विश्वास ||
जली होलिका नहीं, जल रही है होली हर साल |
हिरणाकुश हँस रहा ठठाकर, पर प्रह्लाद निराश ||
सबही के तो मुँह काले हैं, कहीं न रंच निखार |
सारी धरती लाल हो रही, काला सब आकाश ||
खिल न सकी कोई भी कलिका फिर कैसा मधुमास |
राग रंग है फीका, तब तक फीका हर्ष उलास ||

साथी देख जल रही होली

साथी देख जल रही होली |
शिखा अग्नि की लपक लपक कर कहती नभ के ऊपर जाकर
नवयुग की नारी आई है आज पहन रक्ताम्बर चोली ||
प्रेम प्यार का तरु मुरझाया, पतझड़ श्रद्धा के आँगन में
आज सभी के मुँह काले हैं, करते हैं बेशर्म ठिठोली ||
हुआ मरुस्थल स्नेह सरोवर, कंटक ही हैं सुमन डाल पर
रंग नहीं, ये पिचकारी भी फेंक रही बारूदी गोली ||
नहीं होलिका दहन हुआ, यह ममता का प्रह्लाद जला है
हिरणाकुश निर्द्वन्द्व, निरीह नृसिंह, कौन दे अक्षत रोली ||
आज हुलास विलास नहीं, आतंक और भय ही छाया है
सबही का मन मुरझाया है देख देख नित रक्तिम होली ||
बन्दूकों की गरज गूँजती मंदिर मसजिद गुरद्वारे में
मानव की कोमल काया की धू धू करती जलती होली ||
हो बंगाल असम हो या फिर उत्तर हो या झारखंड हो
अपनी अपनी ढफली पर हैं सभी गा रहे अपनी होली ||
आज जल रहा है नीलाम्बर, धधक रहे हैं भारी भूधर
और अग्नि से अंकमिलन हित आती है मानव की टोली ||
सृजन तत्व ने बन संहारी महाप्रलय की की तैयारी
आज मृत्यु है फाग खेलती ले प्राणों की कुमकुम रोली ||

प्रिय मित्रों, आज होली है… होलिका दहन की सन्ध्या… आज के दिन भगवान ने प्रह्लाद को बचाने के लिये नृसिंह का रूप धारण कर दुष्ट होलिका का वध किया था… तो आइये हम सब भी संकल्प लें कि जन जन के मन में प्रेम प्यार की सद्भावना भर दुर्भावों अभावों की होलिका को जलाकर भस्म करने का प्रयास करेंगे… समस्त नकारात्मकता का नाश करके सकारात्मक विचारों को स्थान देंगे… इसी कामना के साथ आप सभी को होली की अनेकशः हार्दिक शुभकामनाएँ… पूर्णिमा

मेरी बातें

देर कभी नहीं होती

कल शाम ही तो बताया था किसी ने
तारे गाते हैं मीठा गान |
रात के सन्नाटे में सो गया जब सूर्य
चादर तानकर चाँदनी की
तब हमने कान किये सतर्क
सुनने को वह मधुर गान |
लेकिन मेरे कान तो हो गए थे बधिर
सुन सुन कर हाहाकार नीतियों से पीड़ित लोगों का
कैसे सुन पाते वे तारों का वह मधुर गान ?
फिर कहा किसी ने, भोर की पहली किरण देखना
दिखाई देगी उसमें आशाओं की मृगमरीचिका |
भूखे नंगे बेसहारा लोगों को देख देखकर
नयन हो चुके संज्ञाशून्य
तभी तो आशावान सुनहरी किरणों में
दीख पड़ी निराशा की कालिमा |
सुना था, पुष्पों की सुगंध लाएगी महकता हुआ सन्देश
जिसमें निहित होंगे
जीवन के वे मूल्य, वे उच्चादर्श और मानवता
पर मैंने पाया हर पुष्प था बासी
जिसमें थी दुर्गन्ध दानवता, अनैतिकता और व्यभिचार की |
सोचने लगी बेबस होकर
क्या कभी सुन सकूँगी तारों का मधुर गान ?
देख सकूँगी सूर्यकिरणों में आशा की लालिमा ??
पा सकूँगी पुष्पों का वह महकता हुआ सन्देश ???
उत्तर दिया चेतना ने विहँसकर
हाँ, ऐसा होगा, अवश्य होगा
पर पहले निकाल तो लो कानों से हाहाकार की मेल
हटा फेंको आँखों से कुरूपता का आवरण
दूर भगाओ साँसों से बासी फूलों की दुर्गन्ध
याद रखो – देर कभी नहीं होती…

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई…

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस और कन्या भ्रूण-हत्या
एक ज्वलन्त समस्या

आज ८ मार्च है, और सारा विश्व नारी सशक्तीकरण का प्रतीक “अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस” मना रहा है | सर्वप्रथम तो आप सभी को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ |

पिछले दिनों दिल्ली में हुए गैंग रेप काण्ड ने न केवल देश की राजधानी और देश को झकझोर कर रख दिया, बल्कि दूर देशों में भी लोग हतप्रभ रह गए इस घटना से | “नैतिक और परम्परावादी” कहे जाने वाले लोग लड़कियों को शिक्षा देते है कि किस प्रकार के वस्त्र पहनें घर से बाहर जाते समय, किन किन सावधानियों का पालन करें, अकेली घर से बाहर न जाएँ, किस समय तक घर से बाहर रहे इत्यादि इत्यादि | जबकि ऐसे मामलों में न तो पीड़िता की उम्र कोई मायने रखती है, न उसका पहनावा, न यह कि वह किसके साथ आती जाती है, ऐसा कहने वाले लोग वास्तव में बीमार मानसिकता के लोग हैं जो महिला को उसके स्वतन्त्रता से जीने के जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित रखना चाहते हैं | इस काण्ड में तो न उस लड़की के वस्त्र “आपत्तिजनक” थे, न समय “इतनी रात” का हुआ था, न “अकेली” किसी ऑटो या टैक्सी में सफ़र कर रही थी, न वह कोई तथाकथित “ऐसी वैसी लड़की” थी, इस बार तो समस्त सावधानियों का पालन किया गया था, फिर भी उसके साथ ऐसा अमानवीय घृणित कार्य हुआ ? और उसके बाद शुरू हुआ राजनीति का चक्कर, पुलिस सरकार पर आरोपों प्रत्यारोपों का सिलसिला | अभी कल भी सुबह सुबह अखबार के पन्ने पलटे तो पता चला किसी मॉल से बाहर आई लड़की सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई | और कल ही क्या, लगभग हर रोज़ ही ऐसी कोई न कोई घटना अखबारों में पढने को मिल जाती है | सारा सारा दिन मन व्याकुल रहता है इस तरह की निंदनीय घटनाओं के विषय में जानकर और सोचने लगती हूँ क्या हम बिल्कुल राक्षस बनते चले जा रहे हैं ? क्या इंसानियत और सभ्यता हम बिल्कुल ही भुला बैठे हैं ? क्या हमारी सम्वेदनाएँ जड़ से समाप्त हो चुकी हैं ? क्या हम अपने परिवारों में लड़कों को यही शिक्षा दे रहे हैं ? और क्या हमारी पुलिस और सरकारें बिल्कुल ही निष्क्रिय और क़ानून व्यवस्था बिल्कुल लचर हो चुकी हैं ?

पर क्या हम ये मान कर बैठ जाएँ कि हमारा क़ानून कहीं न कहीं दोषियों को सज़ा देने में अभी उतना सशक्त नहीं है ? या हमारी पुलिस सतर्क नहीं है और हर लड़की हर महिला के साथ उसे और अधिक मुस्तैदी के साथ सड़कों पर होना चाहिये ? अथवा, क्या सरकार के भरोसे ही सब कुछ छोड़ दिया जाना चाहिये और इस तरह के घिनौने कृत्यों को राजनीति के दाव पेंचों में उलझा कर या ख़बरों का मसाला भर बनाकर भूल जाना चाहिये ? क्या हमें हमारी मानसिकता बदलने की आवश्यकता नहीं ? “अस्य देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः” का राग आलापने वाले तथा “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” का नारा देने वाले हम लोग ही अपने नैतिक मूल्यों और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना को भूलते चले जा रहे हैं | आवश्यकता है अपने इन्हीं मूल्यों को फिर से याद करने की | और यह कार्य हमें स्वयं ही करना होगा | कोई क़ानून, कोई पुलिस या कोई सरकार यह कार्य नहीं कर सकती | आज स्थिति यह है कि जिन परिवारों की लड़कियाँ महिलाएँ घर से बाहर काम पर जाती हैं तो रात को जब तक घर वापस नहीं आ जातीं घरवालों की जान अटकी रहती है | और रात ही क्या, दिन में भी हर लड़की का, हर महिला का मन भयभीत रहता है | खुद महिलाएँ जो स्वयं कार ड्राइव करती हैं उन्होंने निर्णय ले लिया है कि कार के शीशे नीचे नहीं करने हैं, दरवाज़े अच्छे से लॉक रखने हैं, और ग़ैरक़ानूनी होते हुए भी घर पहुँचने तक मोबाइल पर घरवालों से या मित्रों के संपर्क में बने रहना है ताकि यदि दुर्भाग्यवश कुछ उलटा सीधा घट जाए तो कम से कम परिवार के लोग और मित्र उन्हें खोज तो सकेंगे | इतना ही नहीं, आज जल्दी से किसी पर भी विश्वास करते नहीं बनता है | एक शक़ के माहौल में जी रही है आज की महिला |

वास्तव में यह मुद्दा है लिंग भेद का, महिलाओं को अपनी संपत्ति समझने का | हमारे समाज में पुरुषों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि वे महिलाओं से ऊँचे हैं | अपने परिवारों में बचपन से ही देखते आते हैं कि भाई बहनों में कितना मतभेद उनके लालन पालन में किया जाता है | एक कन्या गर्भ से बाहर आते ही स्वयं को उपेक्षित माहौल में पाती है | बोझ समझा जाता है उसे | अभी पिछले दिनों मेरे एक अभिन्न मित्र की बेटी के यहाँ दूसरी पुत्री ने जन्म लिया | बड़ी पुत्री जो लगभग नौ वर्ष की है अपनी छोटी बहन को देखकर बहुत खुश थी और उसका कहना था कि वो तो हमेशा से अपने लिये एक बहन ही चाहती थी | कारण पूछने पर उसने बालसुलभ भोलेपन से जवाब दिया “भैया होता तो वो मेरे साथ थोड़े ही खेलता, वो तो घर से बाहर अपने दोस्तों के साथ खेलता कूदता | अब मेरी बहन है तो वो मेरे साथ तो रहेगी न |” लेकिन बड़ा दुःख हुआ देखकर कि बच्ची की माँ और घर के दूसरे लोग बेहद दुखी थे | माँ को तो जैसे ही पता चला कि बेटी हुई तो उसने रोना शुरू कर दिया | परिवारजनों का कहना था कि यदि पहले से अल्ट्रासाउंड से पता लगा लेते कि लड़की है गर्भ में तो “कुछ उपाय” करते | जबकि सारा परिवार शिक्षित होने के साथ साथ बच्ची का भली भाँति लालन पालन करने में सक्षम भी है | ज़रा सोचिये जिस नवजात बच्ची के सामने ये सारी बातें की जा रही हैं उस बच्ची की भावनाओं पर कितना दुष्प्रभाव इन सब बातों का पड़ेगा ? क्या अपने अवाँछित होने का कष्ट उसे जीवन भर नहीं रहेगा ? क्या उसके समूचे व्यक्तित्व पर माँ की इस तरह की नकारात्मक सोच का दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा ? जबकि रिसर्च से यह सिद्ध हो चुका है कि बच्चा गर्भ में ही माँ की भावनाओं तथा उसकी बोली को पहचानने लगता है | ऐसे परिवारों में पल रहे लड़के क्या कभी सीख सकेंगे नारी का सम्मान करना ? और जब गर्भ में पल रही बच्ची को संसार में आने का अवसर ही नहीं दिया जाएगा तो कैसे रुकेंगे महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध ? क्योंकि इन अपराधों का एक बहुत बड़ा और ख़ास कारण है गर्भ में पल रहे बच्चे की लिंग जाँच कराके कन्या भ्रूण को समाप्त करवा देना |

आज हमारे देश में लैंगिग अनुपात भयावह रूप से असंतुलित हो चुका है | १००० लड़कों पर जहाँ हरियाणा में ८३० लड़कियों का अनुपात है वहीँ पंजाब में ८४६, राजस्थान में ८८३ और दिल्ली में ८६६ लड़कियाँ १००० लड़कों पर हैं | और यह समस्या केवल अशिक्षित अथवा पिछड़े वर्ग तक ही सीमित नहीं है, पढ़े लिखे तथा आधुनिक कहे जाने वाले परिवारों में भी यह समस्या समान रूप से विद्यमान है | उन परिवारों में कहा जाता है कि कुछ भी हो, पहला बच्चा तो बेटा ही होना चाहिये, क्योंकि वंश तो वही चलाता है | और बेटा जनने वाली माँ को परिवार के लिये भाग्यशाली बताया जाता है | आज एक ओर लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर उन पर भाँति भाँति की रोक लगाई जा रही हैं वहीं गर्भ में पल रही बच्चियों को संसार देखने तक का अवसर नहीं दिया जा रहा | इस परिवेश में पल रहा लड़का कैसे सीखेगा मातृ शक्ति का सम्मान करना ? और कैसे भयहीन रहेगी वह लड़की जिसे पता है कि वह परिवार में अवाँछित है ?

कन्या भ्रूण हत्या – अर्थात जन्म से पूर्व गर्भ में ही कन्या संतान को मार डालने की प्रक्रिया आज एक ऐसी ज्वलन्त समस्या बन चुकी है जिसके समाधान के लिये जितने भी आन्दोलन चलाए जाएँ कम हैं | होता यह है कि हम लोग टी वी प्रोग्राम्स में, महिला संगठनों की मीटिंग्स वगैरा में इस विषय पर चर्चा तो ज़ोरों से करते हैं पर घर आते आते सब भूल जाते हैं | हम यह भी भूल जाते हैं कि नारी और पुरुष दोनों के सामान अनुपात से ही संसार आगे चल सकता है | किसी एक भी पक्ष को यदि नकार दिया गया तो इसका क्या हश्र हो सकता है इस बात का अनुमान ऊपर लिखे आँकड़ों से लगाया जा सकता है | यदि इसी तरह लड़कियों की जन्म दर गिरती रही तो सोचिये भविष्य में क्या होगा ? अभी कई प्रान्तों में दूसरे प्रान्तों से लड़कियाँ खरीद कर लाई जाती हैं जिससे कि उनके साथ लड़कों की शादी करके वंश को आगे चलाया जा सके | पर ऐसा कब तक होगा ? यदि इसी तरह कन्या भ्रूण की हत्या कराई जाती रही तो वो दिन दूर नहीं जब लाखों करोड़ों लड़के बिन ब्याहे रह जाएँगे | और उस समय देश में महिलाओं के प्रति अपराधों में कितनी वृद्धि होगी इसका तो अनुमान करके ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं | कितनी भयावह स्थिति होगी वह जब कोई भी महिला सुरक्षित नहीं होगी ? क्योंकि sex तो मनुष्य की besic instinct है | उसके लिए लड़कियों के अभाव में या तो वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, या फिर महिलाओं पर बलात्कार की घटनाओं में वृद्धि होगी |

कितने अफ़सोस व शर्म की बात है कि जिस नारी शक्ति की हम पूजा करते हैं – कभी दुष्टों का संहार करने वाली माँ दुर्गा के रूप में, तो कभी ज्ञान का प्रसार करने वाली माँ सरस्वती के रूप में और कभी धन की वर्षा करने वाली माँ लक्ष्मी के रूप में – उसी नारी शक्ति को हम संसार में आने से पूर्व ही मार डालते हैं | आज उसी “देवी” को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है | आज का पाखण्डी समाज अपनी “जन्मदात्री” को ही जड़ से उखाड़ फेंकने में लगा हुआ है – जो कि खुद इस समाज की जड़ है, नींव है | बेटी के नाम पर सौ-सौ कसमें खाने वाले ही आज उसे कष्ट पहुँचाने में लगे हुए हैं | और उससे भी बड़ी सच्चाई यह है कि बेटी को “पराया धन” मानने वालों ने उसे कभी ह्रदय से “अपना” माना ही नहीं | वह तो अपने माता पिता के घर तक में “दूसरे की अमानत” ही बनकर रही सदा | उनके होश सँभालते ही उन्हें बताया जाने लगता है कि उन्हें दूसरे घर जाना है | यहाँ तक कि बहुत से परिवारों में तो लड़की को उच्च शिक्षा भी केवल इसीलिये दिलाई जाती है कि वह एक योग्यता होगी अच्छा घर वर प्राप्त करने के लिये | और जैसा कि ऊपर भी लिखा है, ऐसा केवल अशिक्षित अथवा निम्न वर्ग में ही नहीं होता | बल्कि उच्च तथा शिक्षित वर्ग के लोग भी इसी परम्परा का वहन कर रहे हैं | यदि इस समस्या से मुक्ति पानी है तो सबसे पहली आवश्यकता है इस विषय में सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की | भ्रूण हत्या अथवा गर्भ का लिंग परीक्षण करने वालों के क्लीनिक सील किए जाने, उनका लाइसेंस निरस्त किये जाने तथा उन पर जुर्माना किए जाने के प्रावधान की आवश्यकता है । साथ ही आवश्यकता है प्रसव पूर्व जाँच तकनीक अधिनियम १९९४ को सख्ती से लागू किए जाने की । क्योंकि हमारे देश में तो हर कानून, हर सुविधा को अपने स्वार्थ के अनुसार तोड़ना मरोड़ना लोगों को अच्छी तरह आता है | यह विडंबना ही है कि जिस देश में कभी नारी को गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ, वहीं अब कन्या के जन्म पर उसके परिवार और समाज में दुख व्याप्त हो जाता है l सिर्फ बेटे की चाह में अनगिनत मांओं की कोख उजाड़ दी जाती है l पर क्या इस क्रूरता के लिए केवल डॉक्टर ही उत्तरदायी है जो प्रसवपूर्व लिंग जाँच करके इस हत्या को अंजाम देता है ? क्या वे माता पिता इस अपराध के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं जो सिर्फ़ और सिर्फ़ बेटा ही पाना चाहते हैं ? केवल कड़े क़ानून बनाकर ही इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता | जब तक हम अपनी संकीर्ण मानसिकता का त्याग नहीं करेंगे तब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता l बेटी के जन्म लेते ही हम इस सोच में तो पड़ जाते हैं कि कल यह बड़ी होगी तो इसके हाथों में मेंहदी भी रचानी पड़ेगी, इसके लिए “योग्य वर खरीदने” के लिये दहेज़ का प्रबंध भी करना होगा | किन्तु उसे स्वावलम्बी और शिक्षित भी बनाना है इस विषय में बहुत कम लोग सोचते हैं | लड़कियों को घर की लक्ष्मी या देवी कह देने भर से उसे उसके अधिकार और सम्मान नहीं मिल जाते l महिलाओं के सामजिक बहिष्कार के रूप में कन्या भ्रूण हत्या की समस्या आज भारत में विकराल रूप ले चुकी है और आज यह हज़ारों करोड़ रुपयों का व्यापार बन चुका है | जबकि १९९४ में लिंग जाँच करके कन्या भ्रूण को समाप्त करना सरकार की ओर से गैर कानूनी क़रार दे दिया गया है |

पर इस भयावह सत्य को झुठलाया जा सकता है, बशर्ते कि हम सब मिलकर संकल्प लें कि न तो हम गर्भ में पल रहे बच्चे की लिंग जाँच कराएँगे और न अपने किसी परिचित या रिश्तेदार को ऐसा करने देंगे | साथ ही यह भी कि जो डाक्टर गर्भस्थ शिशु की लिंग जाँच करके कन्या भ्रूण की हत्या जैसा जघन्य अपराध करेंगे उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवाने का प्रयास करेंगे | क्योंकि कन्या भ्रूण हत्या से न केवल महिलाओं के प्रति अपराधों में बढ़ोतरी होगी, बल्कि आने वाले समय में जब केवल पुरुष ही अधिक रह जाएँगे तो संसार का अन्त तो निश्चित ही है | अरे हमारा देश तो ऐसा देश है जहाँ तीन ख़ास ख़ास departments अनादिकाल से महिलाओं के ही पास हैं – सुरक्षा यानी Defense Ministry माँ दुर्गा के पास है, तो finance ministry अर्थात धन का विभाग माँ लक्ष्मी के पास है, और ज्ञान विज्ञान और साहित्य संगीत का विभाग यानी knoeledge, entertenment & science ministry माँ सरस्वती के सौंपी गई है | फिर क्यों इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं हम ? हालाँकि इस विषय में हरियाणा और पंजाब के कुछ गाँवों ने आदर्श भी स्थापित किया है जहाँ १००० लड़कों पर १४०० लड़कियों का औसत है | केरल में १००० लड़कों पर १०८४ लड़कियों का अनुपात है | लेकिन फिर भी मंज़िल अभी बहुत दूर है |

आज 8 मार्च है अर्थात अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस | जिसका आरम्भ हुआ १९०८ में, जब न्यूयार्क की एक कपड़ा मिल में काम करने वाली लगभग 15 हजार महिलाओं ने काम के घंटे कम करने, बेहतर तनख्वाह और वोट का अधिकार देने के लिए प्रदर्शन किया था | इसी क्रम में 1909 में अमेरिका की ही सोशलिस्ट पार्टी ने पहली बार “National Women’s Day” मनाया था | वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं की अन्तर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का फैसला किया गया और 1911 में पहली बार 19 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया | इसे सशक्तीकरण का रूप देने हेतु ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में लाखों महिलाओं ने रैलियों में हिस्सा लिया | बाद में वर्ष 1913 में महिला दिवस की तारीख 8 मार्च कर दी गई और तब से हर 8 मार्च को विश्व भर में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है | इस महिला दिवस के अवसर पर अपने कथन के अंत में मैं बस यही कहना चाहूँगी कि WOW India की Volunteers के रूप में आज हम सब शपथ लें कि इन कलियों को मुस्कुराने का, खिलने का तथा अपनी सुगंध से संसार को सुगन्धित करने का अवसर देंगे | ये कलियाँ ही तो पुष्प बनकर बाग की पहचान बनती हैं | यदि इन्हें ही उजाड़ दिया गया, खिलने से पहले ही तोड़ कर फेंक दिया गया, तो नवीन सृष्टि की रचना कैसे सम्भव होगी ? इन्हें अबला मत समझिए | इसके आगमन पर शोक मत मनाइए – क्योंकि यह वही देवी है जिसे आप लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती के रूप में सदियों से पूजते आ रहे हैं | या फिर मान लीजिए कि आपकी वो देवी पूजा मात्र दिखावा है | मान लीजिए कि नारी शक्ति, नारी भक्ति, का जो नारा हम लगाते हैं वो खोखला है | आँगन में तुलसी के रूप में उसकी पूजा अर्चना बंद कर दीजिए | माँ का सम्मान करना बंद कर दीजिए | क्योंकि माँ भी तो नारी है | रक्षा बन्धन और भाई दूज जैसे त्यौहारों का ढोंग बंद कर दीजिए, क्योंकि ये त्यौहार तो होते ही बहनों के साथ हैं…

ये कन्याएँ ही हमारी मातृशक्ति हैं, जड़ें हैं ये संसाररूपी वृक्ष की, जो प्रकृति का समस्त रस लेकर उस रस से अपने इस वृक्ष को सींचती हैं ताकि वह पल्लवित और पुष्पित हो सके | ये जड़ें बल देती हैं अपने वृक्ष को बड़े से बड़े तूफ़ान में भी गर्व से सर को उठाए अडिग खड़े रहने का | जड़ और वृक्ष एक दूसरे की पहचान हैं, यदि इन जड़ों को ही खोखला कर दिया गया, सुखा दिया गया, या उखाड़ कर फेंक दिया गया तो किस तरह यह संसार रूपी वृक्ष खड़ा रहा पाएगा और हरा भरा रह पाएगा ??????

मैं मातृशक्ति हूँ तब ही तो पाला तुमको खुद दुःख सहकर
तुम हरे भरे ही रहो, तभी सींचा तुमको निज रस देकर |
तुम हरित वृक्ष हो उपवन के, हो पुष्प फलों से लदे हुए
पर मैं भी मूल तुम्हारी हूँ, सींचा तुमको निज रस देकर ||
मैं करती हूँ संघर्ष सदा, अँधियारे में ही जीती हूँ
तुम रहो अडिग, इस हेतु अरे पाषाणों से भी लड़ती हूँ |
मैं नहीं तुम्हें होने देती हूँ भान तनिक संघर्षों का
हो खड़े सगर्व तब ही भू पर, सींचा तुमको निज रस देकर ||
तुम इतराते हो अपने फल और फूल पत्तियों शाख़ों पर
रोते हो कभी पतझड़ में, तो हँसते वसन्त आ जाने पर |
मैं देती सारा सार तुम्हें माटी का, पोषण हेतु सदा
पा सको पूर्ण विस्तार, तभी सींचा तुमको निज रस देकर ||
मेरे ही कारण मिली तुम्हें ये छाँव और मदमस्त हवा
जिनसे पा लेता पल भर को ये थकित जगत विश्राम जहाँ |
मुझको भी मिलता है जीवन जब वृद्धि तुम्हारी होती है
हम दोनों का है साथ अमर, सींचा तुमको निज रस देकर ||
मत करना मुझे खोखला भीतर से, वरना दुःख पाओगे
सूखोगे तुम, अपनी करनी पर ठूँठ बने पछताओगे |
मेरा क्या, मेरा तो बिस्तर पाषाणखण्ड है सदा सदा
पर नहीं चाहती तुम सूखो, सींचा तुमको निज रस देकर ||
हम दोनों ही पहचान बनें एक दूजे की, है सत्य यही
मुझसे है साँस तुम्हारी, तुमसे जुड़ी हुई मैं, सत्य यही |
इस मेल से ही तुमको मिलते हैं पत्र पुष्प और हरियाली
मैं मातृ शक्ति हूँ, तब ही तो सींचा तुमको निज रस देकर ||