मेरी बातें

देर कभी नहीं होती

कल शाम ही तो बताया था किसी ने
तारे गाते हैं मीठा गान |
रात के सन्नाटे में सो गया जब सूर्य
चादर तानकर चाँदनी की
तब हमने कान किये सतर्क
सुनने को वह मधुर गान |
लेकिन मेरे कान तो हो गए थे बधिर
सुन सुन कर हाहाकार नीतियों से पीड़ित लोगों का
कैसे सुन पाते वे तारों का वह मधुर गान ?
फिर कहा किसी ने, भोर की पहली किरण देखना
दिखाई देगी उसमें आशाओं की मृगमरीचिका |
भूखे नंगे बेसहारा लोगों को देख देखकर
नयन हो चुके संज्ञाशून्य
तभी तो आशावान सुनहरी किरणों में
दीख पड़ी निराशा की कालिमा |
सुना था, पुष्पों की सुगंध लाएगी महकता हुआ सन्देश
जिसमें निहित होंगे
जीवन के वे मूल्य, वे उच्चादर्श और मानवता
पर मैंने पाया हर पुष्प था बासी
जिसमें थी दुर्गन्ध दानवता, अनैतिकता और व्यभिचार की |
सोचने लगी बेबस होकर
क्या कभी सुन सकूँगी तारों का मधुर गान ?
देख सकूँगी सूर्यकिरणों में आशा की लालिमा ??
पा सकूँगी पुष्पों का वह महकता हुआ सन्देश ???
उत्तर दिया चेतना ने विहँसकर
हाँ, ऐसा होगा, अवश्य होगा
पर पहले निकाल तो लो कानों से हाहाकार की मेल
हटा फेंको आँखों से कुरूपता का आवरण
दूर भगाओ साँसों से बासी फूलों की दुर्गन्ध
याद रखो – देर कभी नहीं होती…

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2 thoughts on “मेरी बातें

  1. Dr.Sudhesh

    इस रचना में निराशापूर्ण वातावरण में आशा का सन्देश निहित है । कथ्य में यथार्थ और शिल्प में सादगी इस रचना के सकारात्मक पक्ष हैं ।

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