मेरी बातें

अनकही कहानी

समझ न पाऊँ क्या समझाऊँ, नयनों में है छिपी कहानी |
नहीं चाहती शब्दों में मैं बंद करूँ अनकही कहानी ||
खुशियाँ मुझे मिली हैं इतनी जिनमें यह मन भरमाता है
कभी आँख मुसकाने लगतीं और कभी जल भर आता है |
डरती हूँ न कहीं खो जाए खुशियों की यह माल सुहानी ||
छा जाता है गहन कुहासा, कभी दर्द भी बढ़ जाता है
आशा और निराशा के दोराहे पर मन घबराता है |
सपनों का सागर है गहरा और आस की नाव पुरानी ||
कभी स्नेह दीपक ज्योतित हो मुझको राह दिखा जाता है
और कभी आशंकाओं का झोंका दीप बुझा जाता है |
तब मेरे साथी होते हैं सूनी मंज़िल, राह अजानी ||
मेरा जीवन भी दीपक सम सबको राह दिखाने हित है
और अन्त में स्नेहरहित हो खुद ही बुझ जाने के हित है |
किन्तु कभी फिर कोई करेगा ज्योतित दीपक जोत सुहानी ||

कल्पनाओं का पक्षी

मेरी कल्पनाओं का पक्षी पंख लगा उड़ता जाता है |
दूर दूर तक गगन चूमता, ऊँचा ही उठता जाता है ||
है कितना विशाल यह जग, इसमें परिचय का ठौर नहीं है |
पर परिचय पाने हित नित नित नव विचार मन में लाता है ||
दूर असीमित नभ में उड़ता, साँसों की असीमता लेकर |
उड़ते उड़ते अगर थका तो वहीं ज़रा वह रुक जाता है ||
उड़ना रुकना, फिर से उड़ना, सदा यही क्रम चलता रहता |
किन्तु थका होने पर भी वह कभी नहीं गिरने पाता है ||
गतिमय मन, गतिमय पग हर पल, पंखों में तूफ़ान समेटे |
अपना मीठा मतवाला स्वर खुले गगन में भर जाता है ||
देख इधर वह कभी झूमता, देख उधर वह कभी डोलता |
पर मंज़िल का भान नहीं है, इसीलिये उड़ता जाता है ||

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