चिकित्सा का अधिकारी विक्षिप्त है मूढ़ नहीं

मैं महिलाओं की एक संस्था से जुड़ी हुई हूँ काफ़ी समय से, जो महिलाओं को उनके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का प्रयास कर रही है | इसके लिये हम जगह जगह हैल्थ चैकअप कैम्प्स लगाते हैं | मैं देखती हूँ कि कई महिलाओं को जब किसी दवा अथवा परहेज़ अथवा सन्तुलित आहार अथवा व्यायाम आदि के विषय में बताया जाता है तो उसका अनुसरण करने में वे असमर्थता व्यक्त करती हैं, क्योंकि अपनी जीवन शैली में किसी प्रकार का भी परिवर्तन – भले ही वह उनके तथा उनके परिवार के स्वास्थ्य के लिये हो – उन्हें अत्यन्त कष्टप्रद लगता है | ऐसे ही मेरे चाचा डाक्टर थे | अपने बचपन में जब कभी उन्हें मरीज़ों पर बिगड़ते हुए देखती थी तो सोचती थी कि चाचा ऐसा क्यों करते हैं ? उदाहरण के लिये कभी कोई मरीज़ कहता “अजी डागदर साब मन्ने तो अग्गरवाल डागदर कू दिखाया हा, वो कै रिया हा अक यो दवा तो फलाँ बीमारी की है | अजी तमने ठीक से देक्खा भी हा अक नईं ?” या ऐसा ही कुछ भी बेवक़ूफ़ीभरा सवाल | चाचा उन पर गुस्सा करते और कहते कि मुझ पर विश्वास है तो आओ मेरे पास, नहीं तो शहर में डाक्टरों की कमी नहीं है | बड़े होने पर समझ आया कि चाचा का ऐसा करना उचित था | मेरी अपनी एक परिचित महिला हैं जिन्हें बचपन से ही बार बार हाथ धोने की तथा छुआ छूत की भयंकर बीमारी है जिसके कारण और भी बहुत सी विकृतियाँ उनके स्वभाव में आ गई हैं | लेकिन हर मनश्चिकित्सक को परम मूर्ख समझती हैं इसलिये किसी मनोरोगविशेषज्ञ से परामर्श करना नहीं चाहती, और रोग बढ़ता जा रहा है | मेरे पति आयुर्वेदाचार्य और वास्तुविद हैं | मेरे एक मित्र एक बार अपनी पत्नी को लेकर उनके पास आए किसी रोग के इलाज़ के लिये जो दो बार आने के बाद ही घर बैठ गईं | क्योंकि डॉ. साहब ने तो व्रत रखने के लिये मना किया था, और उन्हें तो सप्ताह में कम से कम तीन दिन व्रत रखना ही किसी न किसी देवी देवता के नाम का | इसी प्रकार एक बार एक वास्तु के क्लाइंट पर उन्हें गुस्सा होते देखा, कारण था कि जहाँ कोई ढाँचा नहीं बनवाना था, मना करते करते वहाँ बनवा लिया था और वास्तु के सारा बैलेंस गड़बड़ा गया था | तब डॉक्टर साहब के पास भागे आए कि अब क्या करें ? इस पर मेरे पति का कहना था कि यदि उनके बताए अनुसार नहीं चल सकते तो किसी अन्य के पास चले जाएँ परामर्श के लिये, उनके पास न आएँ | इस प्रकार की बातों से यही समझ आता है कि यदि डाक्टर पर, उसकी दी हुई दवा पर विश्वास ही नहीं होगा, या उसके बताए अनुसार दवा और पथ्य नहीं लिया जाएगा तो मरीज़ को आराम कैसे होगा ? रोग से मुक्ति पाने की सबसे पहली शर्त है कि जिस डाक्टर वैद्य हक़ीम के पास जाएँ उसके इलाज़ पर पूर्ण आस्था हो तथा उसके हाथों आत्मसमर्पण की भावना मन में हो, ताकि वह आपका जो भी इलाज़ करे या जिन नियमों का पालन आपसे करने को कहे वह आप पूर्ण मनोयोग से कर सकें, तभी वह भी पूर्ण मनोयोग से इलाज़ कर सकेगा | यही कारण है कि जो लोग स्वयं को किसी डाक्टर से कम नहीं समझते प्रायः डाक्टर लोग भी उन्हें मूर्ख समझकर उनसे ठीक से बात करना पसंद नहीं करते | प्रस्तुत लेख में चर्चा का विषय यही है कि विक्षिप्त की चिकित्सा तो की जा सकती है, पर मूर्ख का क्या इलाज़ हो ?

प्रत्येक व्यक्ति युद्ध करता हुआ ही अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है | प्राणी का समस्त जीवन ही युद्धमय है | एक प्रकार से देखा जाए तो माँ के गर्भ में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिये, पनपने के लिये, यहाँ तक कि माँ के गर्भ से बाहर आने के लिये भी जीव को निरन्तर संघर्ष ही करते रहना पड़ता है | अतः युद्ध का आरम्भ तो माँ के गर्भ से ही हो जाता है | इस युद्ध से ही शरीर, इन्द्रिय और मन की विचित्र शक्ति की अभिव्यक्ति होती है | यदि मनुष्य में विजय प्राप्ति व आत्मप्रतिष्ठा की कामना होगी, उसमें स्वाभिमान होगा, तभी उसमें विचारशक्ति का विकास होगा | तभी वह कर्म में प्रवृत्त होगा | परिवार, समाज, जातीयता, राष्ट्रवाद आदि की सृष्टि इसी विचारशक्ति तथा कर्म का परिणाम होती है | इसी के कारण जीवों में आत्मीयता का बन्धन दृढ़ होता है | जिनमें आत्मरक्षा और आत्मप्रतिष्ठा की शक्ति अर्थात जीवनी शक्ति नहीं होती वे सृष्टिप्रवाह में पीछे रह जाते हैं या लुप्त हो जाते हैं |

इस जगत का विधान ही ऐसा है कि हर छोटा जीव बड़े जीव का, हर निर्बल सबल का आहार होता है | समान बली प्राणियों में भी परस्पर संग्राम चलता ही रहता है | जो विजय प्राप्ति के लिये जितना अधिक साधन संपन्न होता है उसका उतना ही प्रभाव अधिक होता है | इस आत्मप्रतिष्ठा और दूसरों को पराजित करने की चेष्टा में जगत में जो ज्ञान विज्ञान की उत्पत्ति होती है, जो प्राकृतिक शक्तियाँ मनुष्य को प्राप्त होती हैं, जो नए नए आविष्कार होते हैं, जो शिल्प वाणिज्य आदि का विस्तार होता है इस सबके मूल में मनुष्य का जीवन संग्राम ही तो होता है | एक आदर्श से दूसरे आदर्श का युद्ध, एक विचार से दूसरे विचार का युद्ध, मत से मतान्तर का युद्ध – यही संसार के प्रवाह का सनातन नियम है और इसी से सत्यं शिवम् सुन्दरं का विकास हुआ है |

इस सबके अतिरिक्त भी आँधी, तूफ़ान, बाढ़, भूकम्प, हिमस्खलन, अग्निकाण्ड आदि न जाने कितने प्रकार के विध्वंस होते रहते हैं | उत्पत्ति-विनाश, जय-पराजय, हानि-लाभ, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख जितने भी द्वन्द्व हैं उन सबसे हमारा नित्य परिचय है | यदि निरपेक्ष भाव से विचार किया जाए तो दुःख के बिना सुख, एक पक्ष की पराजय के बिना दूसरे पक्ष की जीत, एक की हानि के बिना दूसरे का लाभ हो ही नहीं सकता | ये समस्त द्वन्द्व, ये समस्त युद्ध हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं | किन्तु जब इस युद्ध की विकराल नग्न मूर्ति हमारे समक्ष प्रकट होती है और उसके अनिच्छित अनिष्टकारक परिणाम उन स्वजनों को खा डालना चाहते हैं जिन्हें हम अत्यधिक सम्मान करते हैं, जिन्हें हम सबसे अधिक प्यार करते हैं, जिन पर हमें अगाध श्रद्धा होती है, तब हमारा हृदय भय से, वेदना से, दुःख से व्याकुल हो उठता है | उस समय हमारी कर्तव्य बुद्धि, हमारी धीरता और स्थिरता नष्ट हो जाती है और हमारी विचार शक्ति मोहग्रस्त हो शून्य हो जाती है | यही हमारी कायरता का परिचायक है |

यही स्थिति कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन की हुई थी | न जाने कितने योद्धा अर्जुन के प्रचण्ड रण कौशल के समस्त परास्त हो चुके थे | उनकी अब तक की विजय पताका के नीचे न जाने कितने परम्परागत, सामाजिक व साम्प्रदायिक मूल्य दबे पड़े थे | न जाने कितने कुलों का विध्वंस करके उनके विजय मंदिर की नींव उठी थी | पर विजयोन्मत्त अर्जुन के हृदय में कभी ऐसी गम्भीर वेदना, ऐसी चुभन, ऐसी टीस नहीं उत्पन्न हुई थी | इस सबके लिये उनके पास अवकाश ही नहीं था | फिर आज यह वेदना क्यों थी ? आज यह भय क्यों था ? इस क्षोभ का, इस अपराधबोध का कारण क्या था ? इस सबका कारण थे उनके अपने स्वजन | आज तक के युद्धों में जिन कुलों का, जिन परम्पराओं का, जिन सम्प्रदायों का, जिन सामाजिक मूल्यों का विध्वंस हुआ था उससे उनका कोई सम्बन्ध अथवा कोई नाता नहीं था | वे उनके अपने नहीं थे – पराए थे | उन्हें तो बस उन पर विजय प्राप्त करनी थी – जो उन्होंने की भी थी | लेकिन अब जो युद्ध वे करने जा रहे थे वह युद्ध उनके अपने परिजनों के साथ था | अपने बन्धु बान्धवों के साथ था | उन्हें उन भीष्म पितामह के साथ युद्ध करना था जिनकी गोद में वे खेल कूद कर बड़े हुए थे | उन्हें उन आचार्य द्रोण से युद्ध करना था जिनकी शिक्षा और कृपा से वे संसार के सबसे महान धनुर्धर बने थे | उन महाराज धृतराष्ट्र और महारानी गान्धारी की संतानों को पराजित करना था जो उनके स्वर्गवासी पिता के सहोदर थे | उस युद्ध में दोनों ही पक्षों में उनके आत्मीय स्वजन थे | यही कारण था कि आज उन्होंने गंभीरतापूर्वक इस भयावह स्थिति पर विचार किया था कि विजय चाहे किसी भी पक्ष की हो, हारने वाला पक्ष भी तो उनके आत्मीयों का ही होगा | युद्ध में मरने वाले भी तो उनके अपने ही होंगे | इस युद्ध में लोप तो उनके अपने ही कुल, धर्म और जाति का होगा | जिस स्वधर्म – क्षात्र धर्म – का वे चिरकाल से पूर्ण निष्ठा से पालन करते आ रहे थे वही उन्हें आज अधर्म लगने लगा था | वे किंकर्तव्यविमूढ़ और धर्मसम्मूढ़चेता होकर भयानक यन्त्रणा का अनुभव कर रहे थे | एक विमोहित चित्त वाले के लिये स्व और पर में कितना अन्तर होता है |

ईश्वर की माया से भ्रमित मनुष्य यह भूल जाता है कि युद्ध तो प्रत्येक क्षण उसके साथ है | उसके स्वयं के विचारों में ही निरन्तर युद्ध चलता रहता है | तब फिर वह बाहर के युद्धों से स्वयं को कैसे अलग कर सकता है ? युद्ध की भीषणता और अनिष्टकारी परिणामों का अनुभव होते हुए भी युद्ध से पूर्ण रूप से विलग नहीं हुआ जा सकता | अतः आदर्श का अनुसरण करते हुए चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिये, समाज में शान्ति स्थापना के लिये, उत्तरोत्तर विकास के लिये तथा आध्यात्मिक सभ्यता के विकास के लिये युद्ध आवश्यक हो जाता है | जैसे जैसे मनुष्य का हृदय शुद्ध होता जाता है, उसकी बुद्धि भी उतनी ही विकसित होती जाती है | तब उसमें कामना, वासना, तृष्णा, अहंकार सब नष्ट होकर युद्ध के प्रति स्वतः ही वैराग्य उत्पन्न हो जाता है | किन्तु तब उसके मन में एक नए युद्ध का सूत्रपात होता है – कर्मप्रवृत्ति के साथ सन्यास प्रवृत्ति का युद्ध, और युद्ध प्रवृत्ति के साथ त्याग की प्रवृत्ति का युद्ध | युगों युगों से संसार में विचारशील पुरुषों के साथ ऐसा ही होता आया है | इस प्रकार किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ये विचारशील पुरुष अन्ततोगत्वा भगवान की ही शरण जाते हैं, और इस प्रकार उनका भ्रम दूर होकर उन्हें दिशाज्ञान मिलता है |

अर्जुन के साथ भी यही हुआ था | अपने स्वजनों के, आत्मीयों के, अपने कुल के, अपनी परम्पराओं मान्यताओं व मूल्यों के विध्वंस की कल्पना से ही वे रोमांचित हो गए, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए – युद्ध करते हैं तो नाश है, नहीं करते हैं तो आत्मसत्ता लुप्त होती है – एक ओर कुआँ दूसरी ओर खाई | क्या करें क्या न करें ? “हे कृष्ण इन युयुत्सु स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं, मुख सूखा जाता है, मेरे शरीर में कम्प तथा रोमांच होता है, हाथ से गाण्डीवं गिरा जाता है, त्वचा में जलन होती है, तथा मन भ्रमित होने के कारण खड़ा रहने में भी असमर्थता का अनुभव कर रहा हूँ | यदि ये लोग भी मुझ पर आक्रमण करें तो भी, अथवा तीन लोक के राज्य के लिये भी मैं इन्हें मारना अथवा इनके साथ युद्ध नहीं करना चाहता, फिर क्या मैं इस पृथिवी के लिये इनसे युद्ध करूँगा ?” (गीता १/२८-३५) अर्जुन जानते थे कि उनके वे स्वजन आततायी थे, लोभी थे, कुल के नाशक तथा मित्र विरोधी थे, किन्तु फिर भी वे उन्हें मारना नहीं चाहते थे | धनुष छोड़कर बैठ जाते हैं | और अंत में किंकर्तव्यविमूढ़ हो कृष्ण की शरण जाते हैं “कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ़चेत:, यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे, शिष्यस्तेsहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” (२/७) – कायरता रूपी दोष से उपहत स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि मेरे लिये क्या कल्याणप्रद है | मैं आपका शिष्य आपकी शरण में हूँ, कृपया मेरा मार्गदर्शन करें | और तब मुस्कुराते हुए श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं “अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे, गतासूनगतासूँश्च नानुशोचन्ति पंडिता: |” (२/११) – बातें तो तू विद्वानों जैसी करता है और शोक उनके विषय में करता है जिनके विषय में नहीं करना चाहिये | जबकि ज्ञानी पुरुष जीवित अथवा मृत किसी विषय में भी शोच नहीं करते |

अब यहाँ पुनः एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि कृष्ण के लिये तो अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही समान थे, फिर उन्होंने यह पक्षपात क्यों किया कि दुर्योधन के साथ तो अपनी सेना भेज दी और स्वयम् अर्जुन के रथ का सारथि बनकर उनका मार्गदर्शन किया ? अपने दिव्य गीता ज्ञान से उनके मन का विभ्रम दूर किया ? इस प्रश्न के उत्तर के लिये हमें विस्तार में जाना होगा |

संसार में कोई भी कार्य अहेतुक नहीं होता | प्रत्येक कार्य का कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होता है | संसार में प्रत्येक प्राणी का जन्म भी किसी विशेष प्रयोजन से ही होता है | जब तक उसका वह प्रयोजन पूर्ण नहीं हो जाता उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता | भले ही उस प्रयोजन को पूर्ण करने के लिये, उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उसे कितनी ही बार इस जन्म मरण के चक्र में भ्रमण करना पड़े | यह भी सत्य है कि जगत में सुख दुःख दोनों का समान अस्तित्व है | जब तक दोनों की ही अनुभूति नहीं हो जाती तब तक कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता | किन्तु मनुष्य मात्र सुख की ही अभिलाषा करता है | इसका कारण है तत्वज्ञान के अभाव में, यथार्थज्ञान के अभाव में, सत्यज्ञान के अभाव में उसका भ्रमित हो जाना | इसी तत्वचिंतन के लिये, सत्य की शोध के लिये हमारे ऋषि मुनियों ने घोर तपस्या की | मानव का समस्त आध्यात्मिक प्रयास आत्मा परमात्मा आदि इन्द्रियातीत तत्वों का सन्देहरहित स्पष्ट और अविचलित शोध करने का ही रहा | पर यह बोध हठात् ही नहीं हो जाता | इसके तीन सोपान होते हैं – श्रवण अर्थात किसी तत्ववेत्ता आचार्य के उपदेशों का श्रवण, मनन अर्थात उन उपदेशों का चिंतन और निदिध्यासन अर्थात मनन की परिपक्व अवस्था “आगमेनानुमानेंन ध्यानाभ्यासरसेन च, त्रिधा प्रकल्पयन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् |” (योगसूत्र)

हम सब ही किसी न किसी स्तर पर असामान्य मनोवृत्ति रखते हैं | ईश्वर की महाशक्ति त्रिगुणमयी माया हमें आवृत्त कर देती है | बुद्धि पर माया का आवरण आ जाता है और हम सत्य-असत्य नित्य-अनित्य आदि का भेद नहीं जान पाते | यह असामान्यता भी दो प्रकार की होती है – एक वे जो स्वयं को महाज्ञानी, महाबाली समझते हैं और इसी अभिमान के मद में चूर हो अनाधिकार चेष्टा भी कर जाते हैं | तामसी वृत्ति की प्रधानता होने के कारण कर्तव्य कर्मों से ध्यान हटाकर निषिद्ध कर्मों की ओर आकृष्ट होते हैं | (गीता ३/२७, ९/१२, १६/४) पाखण्ड, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान इन आसुरी सम्पदा को प्राप्त हुए लोगों के लक्षण हैं | ऐसे मूर्ख लोग जगत का नाश ही करते हैं | ऐसे मूढ़ तामसी मनोवृत्ति वाले पुरुष ईश्वर को प्राप्त न होकर अधोगति को प्राप्त होते हैं | (गीता १६/२०) सत्वगुण में स्थित हुए पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को प्राप्त होते हैं | रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य अर्थात मनुष्यलोक में ही रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं | किन्तु तमोगुण में कार्यरूप निद्रा प्रमाद और आलस्यादि में स्थित हुए तामस पुरुष अधोगति को प्राप्त होते हैं | (गीता १४/१७,१८)

ज्ञान सत्वगुण संपन्न पुरुष को ही हो सकता है | शेष दो पुरुष साधारण श्रेणी में आते हैं | तामसी गुणों की वृद्धि होने पर पतन निश्चित है, किन्तु राजसी गुणों की वृद्धि होने पर कर्मफल की प्राप्ति मनुष्य का लक्ष्य होता है | किन्तु इस स्थिति में मूढ़ता नहीं आती, हाँ कभी विक्षिप्त भले ही हो जाए, जबकि तामसी वृत्ति की अधिकता होने पर मूढ़ता आती है | यद्यपि ये दोनों ही वृत्तियाँ असामान्य मनोवृत्ति की परिचायक हैं, तथापि दोनों में अन्तर है कि तामसी वृत्ति जहाँ मनुष्य का पतन करती है वहीं राजसी वृत्ति विकास की ओर अग्रसर करती है, क्योंकि मनुष्य अपने कर्म की सफलता, लक्ष्य की प्राप्ति की कामना करते हुए उसी के लिये प्रयत्नशील रहता है | तामसी मनोवृत्ति वाले जहाँ घमण्ड में चूर हो जाते हैं वहीं राजसी मनोवृत्ति वाले लोग लक्ष्य में विघ्न उपस्थित होने पर विमोहित हो जाते हैं, विक्षिप्त हो जाते हैं |

कोई भी वैद्य उस मूर्ख का इलाज़ नहीं कर सकता जो वैद्य को ही मूर्ख मान बैठे | विक्षिप्त की चिकित्सा तो की जा सकती है, क्योंकि उसे स्वयं यह भान नहीं होता कि उसे क्या करना है क्या नहीं अतः वह निष्कर्मण्य होकर बैठ रहता है | दुर्योधन मूढ़ था | इसीलिये जब कृष्ण सन्धिप्रस्ताव लेकर पहुँचे तो उस प्रस्ताव को स्वीकार करना तो दूर, उनका अपमान करके और यह कहकर कि युद्ध के बिना तो सूई की नोक बराबर ज़मीन भी मैं नहीं दूँगा, उन्हें वापस लौटा दिया | वह स्वयं को अजेय समझता था | ऐसे सर्वशक्तिमान को भला कोई क्या समझाता ? “प्रकृतेः गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु, तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् |” (३/२९) – प्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष गुण और कर्मों में आसक्त होते हैं | उन अज्ञानी पुरुषों को ज्ञानी पुरुष क्या कहा सकते हैं ?

दूसरी ओर अर्जुन थे | वे किंकर्तव्यविमूढ़ अवश्य थे पर मूर्ख नहीं थे | उनको मार्गदर्शन कराकर उनकी विक्षिप्ति दूर करके उन्हें धर्मयुद्ध के लिये प्रेरित किया जा सकता था | यही कारण था कि कृष्ण ने अर्जुन को चिकित्सा का अधिकारी माना दुर्योधन को नहीं | अहंकारी होने के कारण दुर्योधन न तो उनका उपदेश शान्तिपूर्वक पूर्ण मनोयोग से सुनता, न ही उस पर मनन कर सकता था, और पालन करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था | जबकि अर्जुन कातर भाव से पूर्ण निष्ठा के साथ कृष्ण की शरण आए थे | वे उनके उपदेशों को ध्यान से सुनकर, उनके मर्म को समझकर उनका पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करने में सक्षम थे | इस समस्त उदाहरण से स्पष्ट होता है कि वैद्य डाक्टर के पास तो पूर्ण शरणागत भाव से, पूर्ण समर्पण के भाव से जाना होता है, तभी वह उचित उपचार कर सकता है | जहाँ शंका हो, समर्पण का अभाव हो, वहाँ चिकित्सा का कोई लाभ हो ही नहीं सकता | अतः यह सत्य है कि चिकित्सा विक्षिप्त की तो की जा सकती है, मूढ़ की नहीं |

कृष्ण ने अर्जुन के विमोहित होने पर उनकी चिकित्सा की अध्यात्म के द्वारा मानसिक उपचार के साथ | पातंजल योगदर्शन के अनुसार मानसिक चिकित्सा का मूलभूत सूत्र है “योगाश्चित्तवृत्तिनिरोध:” तथा इसका साधन है “अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:” इसी बात को गीता में इस प्रकार कहा गया है “असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्, अभ्यासेन तू कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते |” (६/३५) यह मन चंचल है तथा कठिनता से ही वश में होता है | किन्तु अभ्यास से तथा अनिच्छारूप वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है | मन का विभ्रम दूर करने का एकमात्र यही उपाय है | एक बार अभ्यास और वैराग्य द्वारा इसमें सफलता प्राप्त हो जाए तो सारे मानसिक तनाव और विभ्रम नष्ट हो सकते हैं | सारी ग्रन्थियाँ सुलझ सकती हैं | और मनुष्य “ईश्वरप्रणिधानाद्वा” अनन्य भक्तिपूर्वक अपने जीवन के चरम लक्ष्य – उस परमात्मतत्व को प्राप्त कर सकता है |

गीता का भक्तियोग

नवरात्र चल रहे हैं और हर कोई ईश-भक्ति में डूबा हुआ है | सोचा एक बार विचार तो करके देखा जाए कि श्रीमद्भगवद्गीता भक्ति के विषय में क्या कहती है | महाभारत के भीष्मपर्व में कहा गया है : “गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रविस्तरै: | या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्मात् विनि:सृता ||” (महा. भीष्म. १३/१)

वास्तव में गीतोक्त ज्ञान की उपलब्धि हो जाने पर कुछ और जानना शेष ही नहीं रहता | गीता में अपने अपने स्थान पर कर्म, उपासना और ज्ञान तीनों का विशद और पूर्ण वर्णन है | तथापि यह सत्य है कि गीता एक भक्तिप्रधान ग्रन्थ है | उसका प्रारम्भ और पर्यवसान दोनों भक्ति में ही हैं | आरम्भ में अर्जुन “शाधि मां त्वां प्रपन्नम्” कहकर भगवान की शरण आते हैं और अंत में भगवान “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” कहकर शरणागति का ही समर्थन करते हैं | अर्थात सब कुछ त्याग कर एकमात्र भगवाना की शरण चले जाना भक्ति का ही एक अभिन्न अंग है “ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्परा:, अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते | तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्, भवामि नाचिरात्पार्थं मय्यावेषितचेतसाम् ||” (१२/६,७) – जो मेरे परायण हुए भक्तजन समस्त कर्मों को मुझमें अर्पण करके अनन्य ध्यानयोग से मेरा ही चिंतन करते हैं मृत्यु रूप संसार सागर से मैं उनका शीघ्र ही उद्धार करता हूँ |

निश्चित रूप से गीता की भक्ति अविवेकपूर्वक की हुई अन्धभक्ति अथवा अज्ञान से प्रेरित आलस्यमय कर्मत्यागरूप जड़ता नहीं है, वरन् क्रियात्मक और विवेकपूर्ण है | बारहवें अध्याय में भक्ति के लक्षण बताते हुए कहा गया है :
“मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय, निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः |
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरं, अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ||
अभ्यासेSप्यसमर्थोSसि मत्कर्मपरमो भव,मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि |
अथैतदप्यशक्तोSसि कर्तुं मद्योगमाश्रित:, सर्वकर्मफलत्यागं तत: कुरु यतात्मवान् ||” (१२/८-११)

इसी प्रकार भाव के लक्षण बताते हुए कहा है कि “अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च, निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुख: क्षमी | संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चय:, मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय: || अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:, सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: | सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो:, शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: संगविवर्जित: ||” (१२/१३,१४,१६,१८) गीता की भक्ति में न तो पाप को स्थान है न आलस्य को | जो शरणागत भक्त भगवदर्पण बुद्धि से समस्त कार्य करता है उससे पाप हो ही नहीं सकता | इसी प्रकार जो भक्त समस्त जगत को परमात्मा का स्वरूप समझकर सबकी सेवा करना अपना कर्तव्य समझता है वह निष्क्रिय आलसी हो ही नहीं सकता | इसीलिये कृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट कहा है “तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुसर युध्य च, मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् |” (८/७) – युद्ध करो, किन्तु मेरा स्मरण करते हुए और मुझी में मन और बुद्धि को अर्पित करके | यही तो है निष्काम कर्म संयुक्त भक्ति योग |

गीता में सर्वत्र कर्म में भक्ति का और भक्ति में कर्म का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है | गीता के अनुसार अनन्य भाव से भगवान के स्वरूप में स्थित होकर भगवान की आज्ञा मानकर भगवान के लिये मन वाणी और शरीर से समस्त कर्मों का आचरण करना ही भगवान की भक्ति है “स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नरः, स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दन्ति तच्छ्रुणु | यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्, स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ||” (१८/४५,४६) – अपने अपने स्वाभाविक कर्मों में लगा हुआ मनुष्य भगवतप्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है | जिस परमात्मा से समस्त भूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत उसी प्रकार व्याप्त है जिस प्रकार बर्फ़ जल से व्याप्त रहता है उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा अर्थात उसे ही अपना सब कुछ समझकर उसी का चिंतन करते हुए उसी की आज्ञा के अनुसार मन वाणी और शरीर से उस परमेश्वर के ही लिये अपने स्वाभाविक कर्तव्य कर्म का आचरण करते हुए मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है |

कल्याण प्राप्ति के मुख्य तीन उपाय हैं – निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग अर्थात सांख्ययोग और भक्ति अर्थात ध्यान योग | किन्तु उपासना रहित कर्म जड़ होने से कभी मुक्तिदायक नहीं हो सकते और न ही उपासना रहित ज्ञान प्रशंसनीय होता है | इस प्रकार गीता में भक्ति ज्ञान और कर्म दोनों में ही ओत प्रोत है | परमेश्वर को अंशी व सेव्य तथा स्वयं को अंश व सेवक मानकर फलासक्ति को त्याग कर जो कर्म किये जाते हैं वहीं निष्काम कर्मयोग होता है | और ब्रह्म में स्थित रहकर प्रकृति द्वारा होने वाले समस्त कर्मों को प्रकृति का विस्तार और माया मात्र मानकर ब्रह्म में जो अभेद स्थिति होती है वह है सांख्य योग | इन दोनों ही निष्ठाओं में भक्ति भरी पड़ी है |

शरणागत भक्त सदा कर्तापन के अभिमान से रहित होता है | वह एकीभाव से स्थित हुआ सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित परमात्मा को भजता हुआ, समस्त कर्म करता हुआ भी ईश्वर में वर्तमान होता है | क्योंकि उसके समस्त अनुभव ईश्वर के अतिरिक्त कुछ अन्य नहीं होते “सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:, सर्वथा वर्तमानोSपि स योगी मयि वर्तते ||” (६/३१)

उत्तम साधक सांसारिक कार्य करते हुए भी अनन्य भाव से परमात्मा का चिन्तन करते हैं | हम जैसे साधारण साधक परमात्मा में मन लगाने का प्रयत्न तो करते हैं, किन्तु अनभ्यास और आसक्ति के कारण ध्यानमग्न होते हुए भी उनका मन विषयों में चला जाता है | किन्तु जिन्हें भगवान से विशेष अनुरक्ति है वे भगवान का स्मरण करते हुए समस्त कार्य करते हैं और उन्हें समस्त चराचर जगत ईश्वरमय ही प्रतीत होता है “बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञान्वान्मां प्रपद्यते, वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ||” (७/१९)

इस प्रकार प्रेम भक्ति का एक अभिन्न अंग है | और यही अनन्य प्रेम ईश्वर को साकार रूप से प्रत्यक्ष कराता है | भक्त की दृष्टि में ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वगुणसंपन्न, सर्वसमर्थ, सर्वसाक्षी, और सत् चित और आनन्दधन होता है | अनन्य भक्ति ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन का साधन है “भक्त्या तु अनन्या शक्य अहमेवंविधोSर्जुन, ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ||” (११/५४) ऐसे ही अनन्य भक्तों के लिये नारदभक्तिसूत्र में कहा गया है “कंठावरोधरोमांचाश्रुभि: परस्परं लपमाना: पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च | तीर्थान्कुर्वन्ति तीर्थानि सुकर्मान्कुर्वन्ति कर्माणि सच्छास्त्रीन्कुर्वन्ति शास्त्राणि ||” (६८/६९) – ऐसे भक्त भक्ति में इतने भावविह्वल हो जाते हैं कि उनके कंठ अवरुद्ध हो जाते हैं अर्थात उनसे कुछ कहते नहीं बनता, उनकी आँखों से अश्रुधारा प्रवाहित होती है, तथा वे रोमांचित होकर परस्पर सम्भाषण करते हैं | ऐसे भक्त अपने कुल व पृथिवी को भी पवित्र करते हैं | वे जहाँ पहुँच जाते हैं वहाँ तीर्थ सुतीर्थ हो जाता है, जो कर्म वे करते हैं वे ही सत्कर्म हो जाते हैं, और जिन शास्त्रों का वे अध्ययन मनन अथवा उपदेश करते हैं वे ही शास्त्र सत् शास्त्र हो जाते हैं | पद्मपुराण में कहा गया है “आस्फोटयन्ति पितरो नृत्यन्ति च पितामहाः, मद्वंशे वैष्णवो जातः स नस्त्राता भविष्यति ||” पितृ पितामह प्रसन्न होकर नृत्य करते हैं कि हमारे वंश में भगवद्भक्त उत्पन्न हुआ है, वह निश्चित ही हमारा उद्धार करेगा | इस प्रकार के अनन्य भक्तों के लिये ईश्वर कभी अदृश्य नहीं होता क्योंकि वे सबमें ईश्वर को और सबको ईश्वर में देखते हुए एकीभाव से ईश्वर में लीन हो जाते हैं “यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति, तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ||” (गीता ६/३०)

गीता भगवान के साकार और निराकार दोनों ही रूपों को मानती है | (४/६-९, ९/११,२६,३४) भगवान कहते हैं कि मैं अविनाशी और अजन्मा होकर भी तथा समस्त भूत प्राणियों का ईश्वर होकर भी अपनी प्रकृति को आधीन करके योगमाया से प्रकट होता हूँ | जो पुरुष तत्व से यह जान लेता है कि मेरा वह जन्म और कर्म अलौकिक है वह पुनर्जन्म को न प्राप्त कर मुझे ही प्राप्त होता है | मेरे परम भाव को न जानने वाले मूढ़ लोग अपनी योगमाया से संसार के उद्धार के लिये विचरण करते हुए मुझे साधारण मनुष्य ही समझते हैं | शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ पत्र पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित ग्रहण करता हूँ | मेरी शरण आया हुआ आत्मा को मुझमें एकीभाव करके मुझे ही प्राप्त होगा |

ये सब उदाहरण ईश्वर के साकार स्वरूप के प्रतिपादक हैं | ईश्वर के निराकार स्वरूप के प्रतिपादक अंश (८/२१, ९/४-५, १२/३-४)

अस्तु; इस समस्त चर्चा का अभिप्राय मात्र यही है कि गीता में ईश्वर की भक्ति चाहे साकार स्वरूप की हो अथवा निराकार स्वरूप की हो – सर्वत्र एक ही आदेश है – भगवान की शरण होकर, भगवान की प्रसन्नता के लिये, भगवदर्पण बुद्धि से कर्म करते हुए अंत में स्वयं भगवान को प्राप्त हो जाता है – तद्रूप हो जाता है – भक्ति की इससे बड़ी महिमा और क्या होगी ? ऐसे भक्त सबमें आत्मरूप के ही दर्शन करते हैं | उनमें कोई तो शुकदेव जी की भाँति लोगों के उद्धार केलिए उदासीन बने विचरते हैं, कोई अर्जुन की भाँति ईश्वर की आज्ञानुसार आचरण करते हुए कर्तव्य कर्मों का पालन करते हैं | कोई गोपियों की भाँति अद्भुत प्रेमलीला में मत्त रहते हैं | और कोई जड़भरत की भाँति जड़ और उन्मत्त के समान चेष्टा करने लगते हैं | किन्तु होता सब कुछ ईश्वर की आज्ञानुसार ही है – कर्तापन का अहंकार वहाँ नहीं होता | यही वास्तविक भक्ति है |

गीता – कर्मयोग और मुक्ति

“गीता जैसा ग्रन्थ किसी को भी केवल मोक्ष की ही ओर कैसे ले जा सकता है ? आख़िर अर्जुन को युद्ध के लिये तैयार करने वाली वाली गीता केवल मोक्ष की बात कैसे कर सकती है ? वास्तव में मूल गीता निवृत्ति प्रधान नहीं है | वह तो कर्म प्रधान है | गीता चिंतन उन लोगों के लिये नहीं है जो स्वार्थपूर्ण सांसारिक जीवन बिताने के बाद अवकाश के समय ख़ाली बैठकर पुस्तक पढने लगते हैं, और न ही यह संसारी लोगों के लिए कोई प्रारम्भिक शिक्षा है | इसमें दार्शनिकता निहित है कि हमें मुक्ति की ओर दृष्टि रखते हुए सांसारिक कर्तव्य कैसे करने चाहियें | इसमें मनुष्य को उसके संसार में वास्तविक कर्तव्यों का बोध कराया गया है |” बालगंगाधर तिलक

स्वामी विवेकानन्द ने कर्मयोग की दीपक से उपमा दी है – जिस प्रकार दीपक का जलना एवं उसके द्वारा प्रकाश का कर्म होना उसमें तेल, बाती तथा मिट्टी के विशिष्ट आकार – इन सभी की विशिष्ट सामूहिक भूमिका के द्वारा संभव होता है, उसी प्रकार समस्त गुणों की सामूहिक भूमिका से कर्म उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार फलों की सृष्टि भी गुणों का कर्म है न कि आत्मा का । इसी का ज्ञान वस्तुतः कर्म के रहस्य का ज्ञान है, इसे ही आत्म ज्ञान भी कहा गया है । तात्पर्य यह है कि संस्कारवश उत्तम-अनुत्तम कर्म में स्वतः ही प्रवृत्ति होती है, तथा संस्कारों के शमन होने पर स्वंय ही कर्मों से निवृत्ति भी हो जाती है, ऐसा जानना ही विवेकज्ञान कहलाता है । और यह ज्ञान उत्पन्न हो जाने पर अनासक्त भाव से कर्म होने लगते हैं, इन अनासक्त कर्मों को ही निष्काम कर्म कहा गया है । इस निष्काम कर्म के द्वारा पुनः कर्मों के परिणाम उत्पन्न नहीं होते । यही आत्म ज्ञान की स्थिति कही गयी है । इससे ही संयोग करने वाला मार्ग “कर्मयोग” कहा गया है । योग का साधारण अर्थ है जोड़ और यह धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे है । योग एक सीधा विज्ञान है । प्रायोगिक विज्ञान है । योग है जीवन जीने की कला । योग एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है जो कि मनोवैज्ञानिक है । यह एक पूर्ण मार्ग है । वास्तव में देखा जाए तो धर्म लोगों को बंधन में बाँधता है और योग सभी तरह के बंधनों से मुक्ति का मार्ग बताता है । अध्यात्म का मार्ग बताता है | अध्यात्म है क्या ? वह अनुभूति जहाँ सारी सीमाओं का अतिक्रमण हो जाता है, सब शब्द व्यर्थ हो जाते हैं, सारी अभिव्यक्तियाँ शून्य हो जाती हैं | तो जो कर्म जोड़ने का कार्य करे वह कर्मयोग है | और जब तक हम कर्म के द्वारा स्वयं से नहीं जुड़ते तब तक समाधि तक पहुँचना कठिन होगा और कर्मयोग को निष्ठा पूर्वक करने वाला व्यक्ति कर्मनिष्ठ है, कर्मयोगी है | इस योग में कर्म के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की जाती है । श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है । गृहस्थ और कर्मठ व्यक्ति के लिए यह योग अधिक उपयुक्त है । हममें से प्रत्येक किसी न किसी कार्य में लगा हुआ है, पर हममें से अधिकांश अपनी शक्तियों का अधिकतर भाग व्यर्थ खो देते हैं; क्योंकि हम कर्म के रहस्य को नहीं जानते । जीवन की रक्षा के लिए, समाज की रक्षा के लिए, देश की रक्षा के लिए, विश्व की रक्षा के लिए कर्म करना आवश्यक है । किन्तु यह भी एक सत्य है कि दु:ख की उत्पत्ति कर्म से ही होती है । सारे दु:ख और कष्ट आसक्ति से उत्पन्न हुआ करते हैं । कोई व्यक्ति कर्म करना चाहता है, वह किसी मनुष्य की भलाई करना चाहता है और इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि उपकृत मनुष्य कृतघ्न निकलेगा और भलाई करने वाले के विरुद्ध कार्य करेगा । इस प्रकार सुकृत्य भी दु:ख देता है । फल यह होता है कि इस प्रकार की घटना मनुष्य को कर्म से दूर भगाती है । यह दु:ख या कष्ट का भय कर्म और शक्ति का बड़ा भाग नष्ट कर देता है । कर्मयोग सिखाता है कि कर्म के लिए कर्म करो, आसक्तिरहित होकर कर्म करो । कर्मयोगी इसीलिए कर्म करता है कि कर्म करना उसे अच्छा लगता है और इसके परे उसका कोई हेतु नहीं है । कर्मयोगी कर्म का त्याग नहीं करता वह केवल कर्मफल का त्याग करता है और कर्मजनित दु:खों से मुक्त हो जाता है । उसकी स्थिति इस संसार में एक दाता के समान है और वह कुछ पाने की कभी चिन्ता नहीं करता । वह जानता है कि वह दे रहा है, और बदले में कुछ माँगता नहीं और इसीलिए वह दु:ख के चंगुल में नहीं पड़ता । वह जानता है कि दु:ख का बन्धन ‘आसक्ति’ की प्रतिक्रिया का ही फल हुआ करता है । गीता के जीवन-दर्शन के अनुसार मनुष्य बहुत महान है और असीम शक्ति का भण्डार है । वास्तव में गीता एक ऐसा पवित्र ग्रंथ है जो मनुष्य को सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है । मृत्यु के संभावित भय को दूर कर हमें कर्तव्यपरायण होने की शिक्षा देता है । मनुष्य को बताता है कि बिना फल की चिंता के किया गया कर्म सर्वश्रेष्ठ होता है । कर्म की सविस्तार चर्चा करते हुए गीता में कहा गया है “कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं न विकर्मण:, अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: |” (४/१७) – कर्म की गति गहन है | “करमन की गति न्यारी |” कर्म, अकर्म और विकर्म का परिपाक करके ही विचार करना चाहिये | याज्ञवल्क्य तथा अन्य स्मृतिकारों ने तो मानवता के पतन का करण ही यह बताया है कि यदि मनुष्य विधि नियम रूप से प्रतिपादित कर्मों का त्याग तथा निषिद्ध कर्मों की उपादेयता अर्थात इन्द्रियों को अनुशासित सीमा के अतिरिक्त प्रवाहित होने देगा तो मानवता का पतन निश्चित है “विहितस्यानुष्ठानात् निन्दितस्य च सेवनात् अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणाम् नरः पतनमृच्छति |” अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि कौन से कर्म कर्तव्य हैं और कौन से अकर्तव्य ? तथा मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है अथवा परतन्त्र ? और क्या भोग के बिना कर्मों का नाश और मुक्ति सम्भव है ? यद्यपि कर्म के रहस्य को समझने में बुद्धिमान पुरुषों की बुद्धि भी चकरा जाती है “किं कर्म किमकर्मेति कवयोSप्यत्र मोहिता: |” तथापि गीता में इसका अत्यन्त युक्तियुक्त वर्णन उपलब्ध होता है | गीता का तृतीय अध्याय तो कर्मयोग के नाम से ही जाना जाता है, किन्तु अन्य अनेकों स्थानों पर भी कर्म की चर्चा आई है, जो भक्तिमिश्रित है |

प्रकृति के दो स्वरूप हैं – विद्यात्मक और अविद्यात्मक | इनमें अविद्यात्मक प्रकृति का स्वरूप अज्ञान है | इसी अज्ञान से उत्पन्न अहंकार, आसक्ति आदि दोषों के वश में होकर मनुष्य प्रायः पाप में प्रवृत्त होता है | इस अविद्या के वश में न होकर मनुष्य जब ईश्वर द्वारा दिये गए अधिकार के अनुसार कार्य करता है तो वह सर्वतोभाव से सुखी रहकर अंत में परम सुख को प्राप्त करता है |

कर्म की तीन संज्ञाएँ बताई गई हैं – कर्म, अकर्म और विकर्म | इनमें पहली संज्ञा है कर्म | मन वाणी और शरीर से होने वाली विधिसंगत उत्तम क्रिया ही कर्म है | किन्तु ऐसी क्रिया भी कर्ता के भावों की भिन्नता के कारण अकर्म या विकर्म बन जाती है | जैसे फल की इच्छा से शुद्ध भावनापूर्वक जो यज्ञ तप दान सेवा आदि विधिसंगत उत्तम कर्म किया जाता है वह कर्म होता है | किन्तु यदि उन्हीं विधेय कर्मों के फल की कामना के रूप में अशुद्ध भावना है तो वह कर्म विधेय होते हुए भी उसमें तमोगुण आ जाने के कारण विकर्म बन जाता है “मूढ़ग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः, परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् |” (१७/१९) इसी प्रकार आसक्तिरहित भगवदर्पण बुद्धि से अपना कर्तव्य समझ कर जो कर्म किया जाता है, कर्तापन के अभिमान से रहित होकर जो कर्म किया जाता है वह अकर्म हो जाता है “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्, यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् | शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:, सन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ||” (९/२७,२८) इस प्रकार के भावार्थयुक्त अनेकों कथन गीता में यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं |

दूसरे प्रकार के कर्म विकर्म कहलाते हैं | ये कर्म निषिद्ध होने के कारण दुःखदायी होते हैं | ये कर्म निन्दित होते हुए भी यदि शुद्ध फल की कामना से किये जाएँ तो कर्म बन जाते हैं “जातस्य हि ध्रुवोर्मृत्यु: ध्रुवं जन्म मृतस्य च, तस्मादपरिहार्येSर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि |” (२/२७) जैसे कि हिंसा निषिद्ध कर्म है, किन्तु लोककल्याणार्थ यदि किसी आतंकी का वध करना पड़ जाए तो उसमें लोककल्याण की शुद्ध भावना निहित होने के कारण वह विकर्म भी कर्म की श्रेणी में आ जाता है | इसी प्रकार आसक्ति और अहंकार से रहित होकर शुद्ध भाव से किये गए विकर्म भी अकर्म हो जाते हैं “सुखसु:खे समं कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ, ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि |” (२/३८) तथा “यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते, हत्वापि सा इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते |” (१८/१७)

कर्मों की तीसरी संज्ञा है अकर्म | जो कर्म या कर्मत्याग किसी फल की उत्पत्ति का कारण न हो वह अकर्म हो जाता है “प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्, आत्मान्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते || दु:खेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्प्रह:, वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते || यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्, नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||” (२/५५-५७)

कर्ता के भावानुसार कर्म और विकर्म की भाँति अकर्म भी कर्म या विकर्म हो जाता है | यदि किसी व्यक्ति को कर्म त्यागने के पश्चात यह अभिमान आ जाए कि उसने तो कर्मों का त्याग किया है तो यह “त्यागरूप” कर्म हो जाएगा | इसी प्रकार स्वार्थ के कारण या दूसरों को ठगने के लिये कर्मत्याग विकर्म हो जाता है | “कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्, इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ||” (३/६) तथा “नियतस्य तु सन्यास: कर्मणो नोपपद्यते, मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तिते | दु:खमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन, स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ||” (१८/७,८)

कर्म की इन तीन संज्ञाओं के साथ साथ हमारे शास्त्रकारों ने कर्म के तीन रूप भी बताए हैं | इनमें प्रथम है संचित कर्म | अनेक जन्मों से लेकर अब तक के संगृहीत कर्म ही संचित कर्म कहलाते हैं | कर्म तब तक क्रियारूप में रहते हैं जब तक वे क्रियमाण होते हैं, और पूरा होते ही तत्काल संचित बन जाते हैं | संचित केवल प्रेरणा देता है, तदनुसार कार्य करने को बाध्य नहीं करता | कर्म करने में तो मनुष्य का वर्तमान समय का पुरुषार्थ ही प्रधान कारण होता है | यदि यह पुरुषार्थ संचित के अनुकूल होगा तो उसके द्वारा उत्पन्न हुई कर्म प्रेरणा में सहायक सिद्ध होगा, और यदि प्रतिकूल होगा तो उस कर्म प्रेरणा को रोक भी देगा | उदाहरण के लिये यदि वर्तमान में कोई व्यक्ति अच्छी संगति में रहता है और उसके संचित भी वैसे ही हैं तो वह सदा अच्छे कर्म ही करेगा, किन्तु संचित तो श्रेष्ठ हैं लेकिन वर्तमान में संगति अच्छी नहीं है तो उस व्यक्ति को अच्छे कर्म करने में कठिनाई होगी | पुरुषार्थ संचित के प्रतिकूल होने के कारण वह समय पर अच्छे कर्म करने से वंचित रह जाएगा |

कर्म का दूसरा रूप है प्रारब्ध | पाप पुण्य के संचित में से कुछ अंश एक जन्म के भोग के उद्देश्य से प्रारब्ध बनता है | इस प्रकार जब तक संचित शेष रहता है प्रारब्ध बनता रहता है, और संचय की समाप्ति होते ही मोक्ष हो जाता है | प्रारब्ध का यह भोग भी दो प्रकार का होता है | चित्त की भावनाओं के द्वारा किया गया भोग मानसिक होता है – जैसे सब प्रकार से सुखी होने के बाद भी कोई व्यक्ति चिंतित रहता है तो यह मानसिक भोग अथवा प्रारब्ध होता है | दूसरा रूप होता है सुख दु:खादि की प्राप्ति | यह दैवयोग अथवा स्वेच्छा से भी होता है – जैसे अचानक किसी दुर्घटना का घट जाना अथवा जान बूझकर आग में कूद जाना |

कर्म का तीसरा रूप है क्रियमाण | स्वेच्छा से किया गया कर्म क्रियमाण होता है और यह फलभोग के लिये बाध्य करता है | इस प्रकार संचित से प्रेरणा, प्रेरणा से क्रियमाण, क्रियमाण से पुनः संचित और उस संचित के अंश से प्रारब्ध – इस प्रकार कर्म प्रवाह जीवन में निरन्तर तब तक प्रवाहित होता रहता है जब तक एक एक संचित कर्म समाप्त नहीं हो जाता, और जब प्रारब्ध भोग कर सारा संचित समाप्त हो जाता है तब प्राप्त होती है मुक्ति | किन्तु इतना तो निश्चित है कि बिना भोग के मुक्ति नहीं, किन्तु यह भोग अथवा इसके लिये किया गया कर्म निष्काम होना चाहिये | क्योंकि सकाम होते ही फिर से वह संचित हो जाएगा |

अब फिर से प्रश्न उत्पन्न होता है कि निष्काम कर्म की परिभाषा क्या है ? गीता के अनुसार भगवदर्पण भाव से भगवत्प्रीत्यर्थ अनासक्त तथा फल की इच्छा से रहित होकर जो कर्म किया जाता है वह मुक्ति का साधन होता है | शास्त्रोक्त विधि से सकाम कर्म करने वाला उस सिद्धि को तो प्राप्त कर लेता है जिसके लिये उसने वह कर्म किया है, किन्तु मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता | गीता में यत्र तत्र सर्वत्र इसी आशय के कथन उपलब्ध होते हैं | निष्काम कर्म का महत्व बताते हुए गीता में कहा गया है “निहाभिक्रमनाशोSस्ति प्रत्यवायो न विद्यते, स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||” (२/४०) – इस निष्काम कर्मयोग में न तो आरम्भ का नाश है, न ही विपरीत फल का दोष है, अतः इस निष्काम कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मृत्यु के महान भय से उद्धार कर देता है | निष्काम भाव से कर्म करने का एकमात्र हेतु परमात्मतत्व की प्राप्ति रह जाता है | उसका लक्ष्य इंतना ऊँचा हो जाता है कि उसे बाहरी फलों का कोई ध्यान ही नहीं रहता | वह उस परमात्मतत्व के सामने जगत के बड़े से बड़े पदार्थों को भी तुच्छ समझता है “दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनन्जय, बुद्धो शरणमन्विच्छ कृपण: फलहेतव: ||” (२/४९)

इस प्रकार गीता में कहीं भी कर्महीनता का समर्थन नहीं मिया गया है, अपितु कर्म के लिये प्रेरित करते हुए उसे निष्काम भाव से करने का पक्ष लिया गया है | और गीता का निष्काम कर्मयोग सर्वथा भक्तिमिश्रित है तथा फल और आसक्ति का त्याग कर भगवान की आज्ञानुसार भगवदर्थ समत्व बुद्धि से शास्त्रविहित कर्मों को करना ही उसका स्वरूप है | और इसी कारण से वह मुक्ति का साधन है “सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय:, मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् | चेतसा सर्व कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः, बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: स ततं भव ||” (१८/ ५६,५७)

ईश्वर

भारत एक धर्मप्राण देश है और यहाँ का जनमानस धर्म पर अवलम्बित है | जीवन के सभी छोटे बड़े कार्य यहाँ धर्म के आधार पर व्यवस्थित होते हैं | धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया है “धारयतीति धर्मः” अर्थात् समाज या व्यक्ति को धारण करने वाले तत्व को धर्म कहा जाता है | इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि “धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है | ईश्वरोपासना की प्रवृत्ति भी प्रायः धर्म का ही एक अंग मानी जाती है | भारत में उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक अनगिनत जातियाँ हैं | उन सबके अपने अपने कार्य व्यवहार हैं, रीति रिवाज़ हैं, जीवन यापन की अनेकों शैलियाँ हैं, अनेकों पूजा विधियाँ हैं और अपने अपने उपासना के पंथ हैं | क्योंकि मानव मन एक ओर जहाँ धर्मभीरु होता है वहीं ईश्वरभीरू भी होता है | किन्तु एक प्रश्न प्रायः मन में उत्पन्न होता है कि जिस ईश्वर की हम उपासना करते है, उठते बैठते सोते जागते जिस ईश्वर का नाम जिह्वा पर आता है वह ईश्वर हे क्या ? क्या यह वही ईश्वर है जिसकी पूजा अर्चना हम मंदिरों अथवा अन्य पूजा स्थलों में करते हैं ? क्या प्रस्तर मूर्ति वास्तविक ईश्वर है ? क्या उसका कोई नाम रूप है ? वह कहाँ रहता है और कैसे इस चराचर जगत को संचालित करता है ? उसका आस्तित्व वास्तव में है भी या नहीं ? ऐसे ही अनेकों प्रश्न ईश्वर और तद्विषयक आस्था के लिये मनुष्य को विचलित करते रहते हैं | मानो ईश्वर कोई वस्तु है – खोजने वाले से भिन्न – उससे पृथक् | वास्तव में तो ईश्वर एक ऐसा चिरंतन शाश्वत सत्य है जिसको सत्यापित किया ही नहीं जा सकता | क्योंकि सत्य सिद्ध करने की आवश्यकता अथवा किसी के होने का प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता उस वस्तु अथवा पदार्थ अथवा व्यक्ति के लिये होती है जो असत्य होता है, अनित्य होता है | असत्य को सत्य सिद्ध करने का प्रयास करना पड़ता है | अनित्य को नित्य सिद्ध करने के लिये तर्क प्रस्तुत करने पड़ते हैं | और जो अनित्य होगा वह असत्य भी होगा | उसकी सत्ता में संशय होगा ही होगा | किन्तु जो नित्य सत्य है उसे सत्य सिद्ध करने का श्रम करने का कोई औचित्य ही नहीं है, क्योंकि वह तो नित्य है | ईश्वर को खोजने की अथवा पाने की तो बात करना ही व्यर्थ है, क्योंकि वह तो “मैं” में ही है | वह हमारा स्व है, हमारा आन्तरिक नियम है | वस्तुतः “वह” ही है, “मैं” या “हम” तो कल्पित हैं |

गीता में कहा गया है “कविं पुराणमनुशासितारमणोंरणीयांसमनुस्मरेद्य:, सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमस: परस्तात् |” (८/९) – जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबका नियन्ता अर्थात् अन्तर्यामी रूप से सब प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार शासन करने वाले, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म – अतिसूक्ष्म, सबका भरण पोषण करने वाले, अचिन्त्य स्वरूप, सूर्य सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप, अविद्या से अतिपरे, शुद्ध सच्चिदानन्दधन परमात्मा का स्मरण करता है वह उस दिव्य स्वरूप आत्मा को ही प्राप्त होता है |

यहाँ उस परम दिव्य पुरुष का महत्व प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि वह परमात्मा सब कुछ जानता है | भूत वर्तमान और भविष्य की स्थूल सूक्ष्म और कारण जगत किसी की ऐसी कोई प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष बात नहीं जिसको वह यथार्थ रूप में न जानता हो | इसीलिये वह सर्वज्ञ – कवि – है | वह सबका आदि है | उसके पहले न कोई था, न होगा और न ही उसका कोई कारण है | वही सबका कारण और सबसे पुरातन है इसलिये वह सनातन – पुराण – है | वह सबका स्वामी है, सर्वशक्तिमान है और सर्वान्तर्यामी है | वही सबको नियन्त्रित करता है और वही सबके शुभाशुभं कर्मों का यथायोग्य विभाग करता है | इसीलिये वह सबका नियन्ता – अनुशासित करने वाला – है | इतना शक्तिमान होने पर भी वह अत्यन्त ही सूक्ष्म है | जितने भी महान से महान सूक्ष्म तत्व हैं उन सबसे बढ़कर महान है और सबमें सदा व्याप्त है | इसी कारण सूक्ष्मदर्शी पुरुषों की सूक्ष्म से सूक्ष्म बुद्धि ही उसका अनुभव कर सकती है | इसीलिये वह सूक्ष्मतम – अणोरणीयांसं – है | इतना सूक्ष्म होने पर भी समस्त विश्व का आधार वही है | वही सबका धारक, पालक और पोषक – सर्वस्य धाता – है | सदा सबमें व्याप्त और सबके पालन पोषण में लगे रहने पर भी वह सबसे इतना परे और इतना अतीन्द्रिय है कि मन बुद्धि के द्वारा उसके यथार्थ स्वरूप का चिंतन ही नहीं किया जा सकता | मन और बुद्धि में जो विचार की शक्ति आती है उसका मूल स्रोत भी वही है और ये सब उसी की जीवन धारा को लेकर जीवित और कार्यशील रहते हैं | वह निरन्तर सबको देखता है तथा उनमें शक्ति का संचार करता है, किन्तु वे उसको नहीं देख पाते, इसीलिये वह अचिन्त्यरूप है | अचिन्त्य होने पर भी वह प्रकाशमय है | वह सदा सर्वदा सबको प्रकाशित करता रहता है | जैसे सूर्य स्वयं प्रकाशस्वरूप है और अपने प्रकाश से सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है वैसे ही वह स्वयम्प्रकाश परम पुरुष अपनी अखण्ड ज्ञानमयी दिव्य ज्योति से सदा सबको प्रकाशित करता है | इसी से वह सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाशस्वरूप – आदित्यवर्ण – है | ऐसा दिव्य, नित्य और अनन्त ज्ञानमय प्रकाश ही जिसका स्वरूप है उसमें अविद्या या अज्ञानरूप अन्धकार की कल्पना भी नहीं की जा सकती | जैसे सूर्य ने कभी अन्धकार को देखा ही नहीं वैसे ही उसका स्वरूप भी सदा सर्वदा अज्ञान रूपी तम से रहित है | घोर रात्रि के अत्यन्त अन्धकार को भी जैसे सूर्य का पूर्वाभास ही नष्ट कर देता है वैसे ही घोर विषयी पुरुष का अज्ञान भी उसके विज्ञानमय प्रकाश की उज्जवल किरणों से नष्ट हो जाता है | इसीलिये वह अविद्या से अतिपरे – तमस: पर: – है | ऐसे शुद्ध सच्चिदानदधन परमेश्वर का स्मरण करना चाहिये | श्वेताश्वतर उपनिषद में भी इससे मिलता जुलता मन्त्र है “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमस: परस्तात्, तमेव विदित्वाSति मृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेSयनाय |” – वह पुरुष जो सूर्य के सदृश प्रकाशस्वरूप, महान और अज्ञान रूपी अन्धकार से परे है उसको मैं जानता हूँ | उसको जानकर ही अधिकारी मृत्यु को लाँघता है | परमात्मा की प्राप्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं है | और यह परमात्मा की प्राप्ति किसी वस्तु की प्राप्ति नहीं है, यह है परमात्मतत्व का ज्ञान |

शरीर के तीन रूप होते हैं – स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर | जो दीख पड़ता है वह स्थूल शरीर है | मृत्यु के समय जो साथ जाता है वह सूक्ष्म शरीर है | तथा जो माया में लय हो जाता है वह कारण शरीर है | जागृत अवस्था में स्थूल शरीर कार्य करता है, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर, और सुषुप्ति में कारण शरीर कार्य करता है | इसी प्रकार ईश्वर के भी तीन रूप कहे जा सकते हैं | महाप्रलय के समय उस ईश्वर का कारणस्वरूप होता है | उस समय केवल ईश्वर और उसकी प्रकृति रहते हैं, शेष समस्त जीव प्रकृति में लय हो जाते हैं | जीव में भी प्रकृति और पुरुष दोनों अंश हैं | चेतनता पुरुष का अंश है और अज्ञान प्रकृति का | ईश्वर का सूक्ष्म रूप सर्वत्र देखा जा सकता है | इसी का नाम आदि पुरुष है | सृष्टि का आदि कारण यही है | यही पुरुषोत्तम है | माया के कारण महाप्रलय में भी जीव मुक्त नहीं हो पाते | सृष्टि के आदि में वे पुनः अपने अपने कर्मफलों के अनुरूप विविध रूपों में जाग उठते हैं | इसका कारण ईश्वर का यही सूक्ष्म रूप होता है | ईश्वर का स्थूल रूप तो सब ही जानते हैं – शंख चक्र गदाधारी अथवा किसी अन्य स्वरूप में स्थित भगवान |

अर्जुन ने कृष्ण से सात प्रश्न किये थे “किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम, अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते | अधियज्ञ: कथं कोSत्र देहेSस्मिन् मधुसूदन, प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोSसि नियतात्मभि: ||” (८/१,२) – ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? अधिभूत क्या है ? अधिदैव क्या है ? अधियज्ञ कौन है तथा वह इस शरीर में कैसे है ? और युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत में आप किस प्रकार जाने जाते हैं ? इस पर श्री कृष्ण ने उत्तर दिया “अक्षरं परमं ब्रह्म स्वभावोSध्यात्मुच्यते, भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञित: | अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चाधिदैवतम्, अधियज्ञोSहमेवात्र देहे देहभूतां वर | अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्, य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ||” (८/३-५) – अक्षर ब्रह्म है, स्वभाव अध्यात्म है, शास्त्रोक्त त्याग कर्म है, नाश होने वाले पदार्थ अधिभूत हैं, समष्टिप्राणरूप से हिरण्यगर्भ – पुरुष – जो कि समस्त देवों तथा सृष्टि के आदि में वेदज्ञान द्वारा तथा समय समय पर हर प्रकार के ज्ञान की खोज करने वाले को प्रकाश देता है – अधिदैव कहलाता है, मनुष्य का मार्गदर्शक निराकार व्यापक विष्णु अधियज्ञ मैं हूँ, और जो पुरुष अन्तकाल में मेरा स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है |

इसको इस प्रकार भी समझा जा सकता है – निर्मल आकाश और सूर्य के मध्य में परमाणुरूप जल भरा रहता है जो दिखाई नहीं देता | सूर्य के ताप से भाप बनती है | भाप का घनत्व हो जाने से बादल बन जाते हैं | बादल में जब जल का घनत्व हो जाता है तो जल की लाखों करोड़ों बूँदें वर्षा के रूप में पृथिवी पर गिरती हैं | जब यही जल की बूँदें और अधिक घनत्व को प्राप्त होती हैं तो ओले या बर्फ़ बनकर बरसती हैं | बाद में गर्मी पहुँचते ही ये ओले या बर्फ़ गलकर जलरूप हो जाते हैं | तथा और अधिक गर्मी मिलने पर पुनः भाप बनकर आकाश में अदृश्य हो जाते हैं | और यह जल पुनः उसी परमाणु अवयक्त रूप में परिणत हो जाता है | इस प्रकार यही क्रम पुनः पुनः चलता रहता है | अब विचारणीय है कि यह परमाणु क्या है ? वह परमात्मा जो शुद्ध सच्चिदानन्द गुणातीत है | जिसमें यह संसार न तो कभी हुआ और न है | जो केवल अतीत परम अक्षर है – उसी प्रकार जैसे परमाणु रूप जल | शुद्ध ब्रह्म अर्थात् अधियज्ञ निराकार रूप से व्याप्त रहने वाला मायाविशिष्ट ईश्वर भापरूप जल है | अधिदैव, सबका प्राणाधार हिरण्यगर्भ ब्रह्मा भाप का घनीभूत रूप बादल है | सत्रह तत्वों का समूह – जिसे सूक्ष्म कहते हैं – हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का सूक्ष्म शरीर है | सृष्टि के जीव मानों जल की लाखों करोड़ों बूँदें हैं | जीवों की क्रिया वर्षा के समान है | और पंचभूतों की अत्यन्त स्थूल सृष्टि जल के ओले या बर्फ़ हैं | इस सृष्टि का स्वरूप इतना विनाशशील है कि थोड़ा सा भी ताप लगते ही जैसे ओले या बर्फ़ गलकर नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार यह विनाशशील सृष्टि क्षणभर में नष्ट हो जाती है |

अज्ञान से स्थूलता आती है – उसी प्रकार जैसे ठण्ड से ओले या बर्फ़ बनती है | स्थूल वस्तु भारी होती है इसलिये नीचे गिरती है | अज्ञान की स्थूलता से जीव का पतन होता है | किन्तु ज्ञान रूपी ताप मिलते ही अज्ञान का बोझ उतर जाता है और जैसे ओले या बर्फ़ गलकर भाप बनकर ऊपर उड़ जाते हैं उसी प्रकार ज्ञानवान होने पर जीव का भी उत्थान हो जाता है | इस प्रकार अज्ञान अध:पतन का कारण है और ज्ञान उत्थान का | जीवात्मा यदि शेष सीमा तक ऊपर उठ जाए तो उसके ज्ञान में सब कुछ परमेश्वर ही हो जाता है |

अज्ञान से अहंकार बढ़ता है जिसके कारण मनुष्य सांसारिकता में अधिक लिप्त रहता है | उसमें भी यदि उसमें तमोगुण की अधिकता होगी तो वह नीचे ही गिरता चला जाएगा – इसी को राक्षसादि की सृष्टि भी कहते हैं | रजोगुण सम होता है इसलिये मनुष्यादि में इसकी अधिकता होती है | सत्वगुण हल्का होता है इसलिये सतोगुणी मनुष्य का उत्थान होता चला जाता है “ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था:, मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:, अधो गच्छन्ति तामसा: |” दैवी सम्पदा ही सत्वगुण है | जैसे जैसे साधक में यह सम्पत्ति बढ़ती जाती है वह परमात्मा के निकट होता जाता है | इस प्रकार स्थूल सूक्ष्म सबमें वह एक ही परमात्मा है | ईश्वरीय शक्ति वास्तव में बहुत विलक्षण है | वह सर्वत्र सब कुछ करने में सदा समर्थ है | यही उसका ईश्वरत्व और विराट स्वरूप है | अब प्रश्न यह उठता है कि क्या शरीर ही परमात्मा है ? इसका उत्तर है कि है भी और नहीं भी | हमारे शरीर के साथ जो कुछ भी घटता है उसी को हम सत्य समझ बैठते हैं | क्योंकि हम शरीर को ही “मैं” मान बैठते हैं | किन्तु वस्तुतः “मैं” शरीर नहीं, “मैं” आत्मा है | अनुभूति आत्मा का विषय है न कि शरीर का | किन्तु जब तक शरीर “मैं” है तब तक समस्त जड़ चेतन ईश्वर है | और उस चराचर जगत की सेवा तथा उसे सुख पहुँचाना ही ईश्वर की सेवा तथा उसे सुख पहुँचाना है | किन्तु जब शरीर के साथ यह “मैं” भाव समाप्त हो जाता है तब यह ब्रह्माण्डरूपी शरीर भी ईश्वर नहीं रह जाता | जब तक शरीर अंश है तब तक “मैं” अंशी है | यथार्थ ज्ञान होते ही शरीर अंशी नहीं रह जाता, रह जाती है आत्मा – और तब ही उस शुद्ध ब्रह्म का साक्षात्कार होता है | यही कारण है कि इस अनित्य और असत्य शरीर रूपी “मैं” को नित्य और सत्य सिद्ध करने की आवश्यकता होती है, आत्मा को नहीं |

इस प्रकार, ईश्वर चाहे निराकार हो या साकार, यह समस्त चराचर सृष्टि उसी में अध्यारोपित है | जैसे रस्सी में साँप की प्रतीति होती है, मृगतृष्णा में जल की प्रतीति होती है, उसी प्रकार परमात्मा में संसार की प्रतीति होती है | और जब ज्ञान हो जाता है तो इस स्वप्निल संसार की असारता का बोध होता है | किन्तु जब तक इस यथार्थ का ज्ञान नहीं हो जाता तब तक मन वचन और कर्म से परमात्मा – चाहे वह निराकार हो या साकार – की इच्छानुसार कार्य आवश्यक है |

भगवान सत हैं, सात्विक हैं, शुद्ध तत्व हैं | वे माया की शुद्ध सत्व विद्या से संपन्न हैं | जीव अविद्या से युक्त है | जहाँ विद्या है वहाँ ज्ञान भी है | अज्ञान अथवा अन्धकार का वहाँ प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता | इस प्रकार ईश्वर गुणातीत है | साकार रूप में कण कण में विद्यमान होकर भी निराकारवत किसी को दिखाई नहीं देता | नारद संहिता में लिखा भी है “नाहं वसामि वैकुण्ठे, योगिनां हृदये न वा, मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद |”

सूक्ष्म ज्ञान के तत्वज्ञ उसे “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” कहते हैं | गीता के अनुसार “ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाSमृतमश्नुते, अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते | सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोSक्षिशिरोमुखम्, सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्, असक्तं सर्वभृत् चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च | बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च, सूक्ष्मत्त्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ||” (१३/१२-१५) – जो जानने के योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है वह आदिरहित परब्रह्म अकथनीय होने के कारण न तो सत् कहा जाता है और न ही असत् | वह सब ओर से हाथ पैर वाला, सब ओर से नेत्र सिर और मुख वाला तथा सब ओर से कान वाला है, क्योंकि जिस प्रकार आकाश वायु, अग्नि, जल और पृथिवी का कारणरूप होने से सबको व्याप्त करके स्थित है, उसी प्रकार परमात्मा भी सबका कारणरूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है | वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला होते हुए भी सब इन्द्रियों से रहित है | आसक्तिरहित और गुणों से रहित होता हुआ भी अपनी योगमाया से सबका धारण तथा सबका पोषण करता है तथा गुणों को भोगता है | वह समस्त चराचर भूतों के बाहर भीतर परिपूर्ण है | चर और अचर रूप भी वही है, साथ ही वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है – जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने के कारण साधारण मनुष्यों के ज्ञान में नहीं आता उसी प्रकार सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने के कारण साधारण मनुष्यों के ज्ञान में नहीं आता | सर्वत्र परिपूर्ण, सबमें व्याप्त तथा सबका आत्मा होने के कारण वह अत्यन्त समीप है, तथा अज्ञानी पुरुष उसको जान नहीं पाते इसलिये अत्यन्त दूर भी है | वह आदिरहित ब्रह्म अकथनीय होने के कारण न तो सत् है और न ही असत् |

बुद्धि द्वारा परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान होता है और प्रतीत होने वाली प्रत्येक वस्तु में “वह नहीं है” ऐसा अभाव भी हो जाता है – इसी को वेदों में “नेति नेति” कहा गया है | इस प्रकार परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान बुद्धि का – अनुभव का – विषय है | और जो इस परम ज्ञान को प्राप्त हो जाता है वह “मैं” को छोड़कर स्वयं परमात्मतत्व हो जाता है | “जन्म कर्म च में दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः, त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोSर्जुन |” (४/९) तथा “भक्त्या तू अनन्या शक्य अहमेवंविधोSर्जुन, ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परंतप |” (११/५४) – अर्थात्, हे अर्जुन ! उस परमात्मा में अनन्य भक्ति से मेरे स्वरूप को जाना जा सकता है, तत्वज्ञानपूर्वक देखा जा सकता है तथा मेरे गुप्त दुर्ग में प्रवेश किया जा सकता है | अर्थात् जो पुरुष समस्त कर्तव्य कर्मों को ईश्वरार्पण बुद्धि से आसक्तिरहित होकर करता है तथा सम्पूर्ण भूतों में जो वैर भाव से रहित होता है वही ईश्वर का अनन्य भक्त है, उसे ही ईश्वर अर्थात् परमात्मा अर्थात् आत्मतत्व प्रत्यक्ष दिखाई देता है | वही तत्व के द्वारा उसका ज्ञान प्राप्त करके उसके साथ एकीभाव को प्राप्त हो सकता है | क्योंकि ईश्वर सबको घेरे हुए है | अज्ञान की मूर्च्छावश हम उसे देख नहीं पाते | हमारे पास ईश्वर की खोज का विचार तो है, किन्तु वह दृष्टि विकसित नहीं हुई है | कृष्ण के द्वारा “भक्त्या तू अनन्या शक्य अहमेवंविधोSर्जुन, ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परंतप |” कहे जाने का भी तात्पर्य यही है | अतः परम सत्य परमात्मा की खोज के लिये स्वयं में परिवर्तन लाना होगा | ईश्वर कोई बाह्य सत्य नहीं है | वह तो स्वयं के परिष्कार की अन्तिम चेतन अवस्था है | उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाना है |

वर्तमान सन्दर्भों में स्मृति ग्रन्थों की उपादेयता

वासन्तिक नवरात्रों के अवसर माँ भगवती की पूजा अर्चना के कार्यक्रम आरम्भ हो चुके हैं लगभग देश भर में | हर कोई पूर्ण उत्साह के साथ उमंग में भर कर नव वर्ष का स्वागत करने में लगा हुआ है | इस अवसर पर जिस दुर्गा सप्तशती का अनुष्ठान आदि हम सब करते हैं वह वास्तव में एक पुराण – मार्कंडेय पुराण का एक अंश है | यों तो मनोरथ सिद्धि के लिये श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ का अनुष्ठान किया जाता है | किन्तु ध्यान से यदि इसका अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि इसका केवल धार्मिक अथवा आध्यात्मिक महत्व ही नहीं है, अपितु जीवन के अन्य भी अनेक व्यावहारिक पक्षों के रहस्य का उद्घाटन करता है यह ग्रन्थ, क्योंकि इसमें दैत्यों के संहार की शौर्य गाथा के साथ साथ कर्म भक्ति और ज्ञान की त्रिवेणी भी है | इसके अनुष्ठान के लिये स्नानादि के द्वारा तन से पवित्र होने के साथ साथ मन की पवित्रता को भी आवश्यक बताया गया है | मन की पवित्रता से अभिप्राय यही है कि मन में किसी के प्रति भी किसी भी प्रकार की कुण्ठा, ईर्ष्या, द्वेष, आशंका, क्रोध आदि का भाव न रह जाए, तथा अनुष्ठान के पूरे नौ दिनों तक सदाचार, सत्य वचन, दया, क्षमा आदि का पालन करते हुए कायिक, वाचिक तथा मानसिक श्रद्धा से युक्त रहा जाए | इसी प्रकार हमारे जितने भी श्रुति स्मृति ग्रन्थ हैं उन सभी में मनुष्यता के विकास का स्रोत, सांस्कृतिक आधार तथा नैतिक निष्ठा के विषय में देश काल व अवस्था भेद से व्यापक वर्णन प्राप्त होता है | महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार श्रुति स्मृति द्वारा प्रतिपादित मार्ग का अनुसरण, सदाचरण, प्राणीमात्र में आत्मा का भाव रखते हुए आत्म प्रेम और शुद्ध संकल्प से की गई इच्छा ही धर्म का मूल है | “श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः | सम्यक् संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् |”

यहाँ श्रुति शब्द का अभिप्राय आदिज्ञान से है | सर्वप्रथम आत्मज्ञान तथा कार्यरूपी संसार का ज्ञान वेदमन्त्रों के रूप में मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को हुआ | इन्हीं मन्त्रों के संस्मरण से मनु याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों ने अपने संस्मरणों को स्मृति के नाम से प्रकट किया | वेद व्यास जी ने श्रुति स्मृति के सिद्धान्तों का १८ पुराणों में विस्तार किया है | धर्म के तत्व की प्रबोधक होने के कारण इन सभी का अध्ययन मानव जाति के लिये अपनी उच्च परिस्थिति तथा यथार्थ क्रान्ति का साधन है | श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की शक्ति की गहनता बताते हुए कर्म अकर्म और विकर्म परिपाक पर विचार करने का आदेश है – “कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यमबोद्धव्यं च विकर्मणः | अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ||” इस विचार का स्रोत वास्तव में स्मृति ग्रन्थ ही हैं | स्मृति ग्रन्थ यथार्थ रूप में मनुष्य के कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्देशक हैं | इसीलिये मनुष्य को चाहिये कि स्मृति गन्थों में देश काल भेद से जो सांस्कृतिक जीवन, व्यवहार, नीति और कर्म विपाक दिखाया गया है उसका ज्ञान अवश्य प्राप्त करे |

आज मनुष्य के नैतिक मूल्यों में बहुत अधिक फेर बदल हुआ है | इसी कारण इस पूरे युग की रूपरेखा बहुत तेज़ी से बदल रही है | आज का युग साइंस टेक्नॉलोजी का युग बन गया है | विश्व के उन्नत राष्ट्रों की श्रेणी में आने के लिये यह आवश्यक भी है | किन्तु इसका अर्थ यह कदाप नहीं कि हमारे मूलभूत स्मृतिसम्मत नैतिक मूल्य बिल्कुल ही रसातल में चले गए हैं | इन्हें पुनः उसी रूप में प्रतिष्ठित किया जा सकता है जिस रूप की कल्पना आज से हज़ारों वर्ष पूर्व हमारे ऋषि मुनियों ने की थी | आवश्यकता इस बात की है कि श्रुति स्मृतियों में जिन सांसारिक नित्य नैमित्तिक ग्राह्य कर्म, व्यावहारिक नैतिक और सांस्कृतिक कर्मों का विधान बताया गया है उनके ज्ञान के लिये हम सभी स्मृति ग्रन्थों का अनुशीलन करें | जैसे याज्ञवल्क्य ने लिखा है “विहितस्यानुष्ठानात् निन्दितस्य च सेवनात्, अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणाम् नरः पतनमृच्छति |” अर्थात् वधि नियम रूप से प्रतिपादित कर्मों का त्याग तथा निषिद्ध कर्मों की उपादेयता मनुष्य के पतन का कारण है |

अब विचारणीय प्रश्न यह है कि कौन से कर्म कर्तव्य हैं और कौन से अकर्तव्य | अपनी कल्पना और अपने अनुमान से कर्म और अकर्म का निश्चय करना निश्चित रूप से हास्यास्पद ही होगा | इस ज्ञान के लिये हमें स्मृति ग्रन्थों की ही शरण लेनी होगी | अर्जुन तो सर्वशास्त्रपारंगत और नीति व्यवहार में कुशल थे | फिर भी गीता में उन्हें श्रीकृष्ण ने अनुशासनात्मक उपदेश दिया “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणन्ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ |” उदाहरण के लिये “ऋतौर्भार्यामुपेयात्” अर्थात् सन्तानोत्पत्ति की इच्छा से ऋतुकाल में समागम शास्त्रसम्मत है | किन्तु “मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्” अर्थात् कामी बनने से तथा पत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्री के समागम से वीर्य विचलित होता है जिसके कारण आयु क्षीण होती है और संयम पूर्वक जीवन यापन से आयु में वृद्धि होती है | स्त्री जातिके सम्मान के लिये तथा मनुष्य को व्यभिचार से रोकने के लिये ही यह बात कही गई है | प्रायः चर्चा होती है कि एड्स जैसी भयानक बीमारियों से बचने के लिये उन्मुक्त एवम् अमर्यादित कामसंभोग को नियन्त्रित किया जाए | जबकि हमारे ऋषि मुनि सदियों पूर्व “मरणं बिन्दुपातेन…” के द्वारा यही बात कह चुके हैं | साथ ही अमर्यादित काम भावना पर नियन्त्रण करने से जनसंख्या वृद्धि की समस्या का समाधान भी स्वतः ही हो जाता है | पुराणों में तो गर्भाधान संस्कार से लेकर विवाह संस्कार तक को धर्म की संज्ञा दी गई है |

मनु ने राजधर्म और व्यवहार के विषय में भी विस्तार से लिखा है | मनु और याज्ञवल्क्य दोनों ने अध्यात्मनिष्ठा को ही राज विधान का निर्माता माना है | उनके अनुसार शासक को त्याग, वैराग्य तथा सद्गुणों से युक्त होना चाहिये | आत्मनिष्ठा के अभाव में राजा व प्रजा में समता की भावना आ ही नहीं सकती | मनुस्मृति के अन्त में लिखा है “धर्मस्य परमं गुह्यं ममेदं सर्वमुक्तवान्, सर्वमात्मनि सम्पश्येत् सच्चासच्च समाहितः |” इसी प्रकार याज्ञवल्क्य ने भी “अतो यदात्मनोऽपथ्यम् परेषां न तदाचरेत्” कहकर यही बताया है कि जिस बात से हमें कष्ट होता हो वह कभी अन्य के लिये भी न करें | शासक की योग्यता के विषय में याज्ञवल्क्य का कहना है कि शासक को स्मृति शास्त्रों का ज्ञाता, कृतज्ञ, कुलीन, महोत्साही तथा लक्ष्य के प्रति जागरूक होना चाहिये | नारदीय स्मृति के अनुसार राजनीति और राज संचालन के नियम भी धर्म हैं | उसके अनुसार शत्रु मित्र में समान व्यवहार करने की क्षमता संसदीय सभासद की पहली योग्यता है “समाः शत्रौ च मित्रे च नृपते: स्यु: सभासदः |” बृहस्पति ने सामप्रधान राजनीति और दान को धर्म बताया है | कात्यायन ने राजधर्म, आश्रय धर्म, दान धर्म और मर्यादा पालन को महत्व दिया है | पुत्रोपत्ति और दाय विभाग को भी धर्म का अंग माना गया है |

आज स्थिति यह है कि शासक वर्ग अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में पड़ा रहता है | सत्ता हथियाने की होड़ में कुकुरमुत्तों की तरह नित नए राजनीतिक दल खड़े हुए जा रहे हैं | वोट की राजनीति के चलते हर दल एक दूसरे पर दोषारोपण के फेर में पड़ा रहता है | और उनके इस सत्ता संघर्ष में पिसता जन साधारण है | क्या ही अच्छा हो कि स्मृति सम्मत मार्ग पर चलकर ही लोग सत्ता में आएँ |

किसी भी राष्ट्र की आजीविका का मूलाधार कृषि होता है | भारत तो है भी कृषि प्रधान देश | यदि स्मृतियों में बताए नियम धर्म से खेती की जाए तो कृषि किसी भी महायज्ञ से कम नहीं है – जिसके द्वारा कीट पतंग, पशु पक्षी सभी की परितृप्ति होती है | धर्मपूर्वक खेती का रहस्य है कि हर कृषक सर्वप्रथम कीट पतंगादि से लेकर ऋषि, मुनि, तपस्वी सबके लिये अन्न का भाग अलग से निकाल कर समर्पित कर दे | इसका उद्देश्य मात्र यही है कि कोई भी जीवित प्राणी भूखा न रहने पाए | कहावत है कि भगवान किसी को भूखे पेट नहीं सुलाता | इस कहावत की सत्यता यही है | पाराशर ने द्विज मात्र को खेती करने का विधान बताया है कि पूर्ण विधि विधानपूर्वक यज्ञ आदि की क्रिया करके कृषि का आरम्भ किया जाना चाहिये | ऋग्वेद में कहा गया है “अक्षैर्मा दीव्य कृषिमित्कृषस्व” ऋग्वेद ७/८१५ अर्थात इन्द्रियों के भोगों में मत खेलो, कृषि में मन लगाओ |

अत्रि स्मृति में शुद्धता का विशेष स्थान है “आचारेषु व्यवस्थानं शौचमित्यभिधीयते, प्रशस्ताचरणं नित्यमप्रशस्तविवर्जनम् |” विष्णु स्मृति में बताया गया है कि भगवदुपासना से सब प्रकार के पापों से मुक्ति प्राप्त होती है | साथ ही काम क्रोध व लोभ कि नर्क का द्वार बताया गया है “त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: | कामक्रोधस्तथा लोभः तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् |” धार्मिक आचरण तथा पारस्परिक सम्बन्धों का भी सविस्तार वर्णन है |

मर्यादा त्यागी के लिये प्रायश्चित का विधान है | प्रायश्चित न करने पर नर्क में जाना पड़ता है तथा पुनर्जन्म में शरीर में चिह्न, शारीरिक विकृति अथवा असाध्य रोगों की सम्भावना हो जाती है | गौतम ने दाय का निर्णय तथा स्त्री धर्म की विशिष्टता के विषय में बताया है | कहीं संस्कारों की आवश्यकता तथा पञ्च महायज्ञ आदि का वर्णन करते हुए धार्मिक गृहस्थ जीवन, वानप्रस्थ तथा संन्यास की विधि बताई गई है तो कहीं इष्टापूर्ति का माहात्म्य बताया गया है | यज्ञ, धर्मशाला, जलाशय आदि के निर्माण को धर्म कहा गया है | अत्रि स्मृति में नित्य धर्म, प्राणायाम आदि को महत्व दिया गया है |

इस प्रकार देखा जाए तो प्रायः सभी स्मृतियों की विषय वस्तु एक ही है – मानव मात्र को सदाचारयुक्त जीवन यापन का पाठ पढ़ाना | किन्तु फिर भी किसी स्मृतिकार ने संस्कारों को अधिक महत्व दिया है, किसी ने राजधर्म को, किसी ने व्यवहार को, तो किसी ने कर्म विपाक आदि को | ऋषियों द्वारा प्रणीत इन स्मृतियों का उद्देश्य है कि प्राणिमात्र का जीवन प्रकृति के अनुरूप हो, जिससे प्राणिमात्र का हित हो | जब तक मानव स्वाभाविक गति से धर्मानुकूल चलता रहता है तब तक व्यवहार का अनुशासन नहीं होता, किन्तु धर्म के मार्ग से विचलित होने पर उसे व्यवहार के अनुशासन में बाँधने की आवश्यकता होती है | यही स्मृतियों का सार है | हाँ स्मृतिकारों के अभिप्राय को समझने के लिये देश काल व अवस्था का ध्यान अवश्य रखना चाहिये | उदाहरण के लिये कृषि को स्मृतिकारों ने महायज्ञ माना है, क्योंकि अन्न मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है | साथ ही कृषि यज्ञ का अनुष्ठान करने से मनुष्य का पुरुषार्थ बढ़ता है : अन्नादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात – तैत्तिरीयोपनिषद

बात है भी उचित | युवावस्था में निरर्थक बैठकर परावलम्बी बन समाज पर बोझ बनने से अच्छा है स्वयं के तथा समाज के लिये अन्न उत्पन्न किया जाए | आज का युवक शहरों के आकर्षण के कारण गाँव में खेती करना अपना अपमान समझता है और पूर्वजों की उस खेती से पीछा छुड़ाकर शहरों की ओर भागता है | शहर में आकर जब उसे पता चलता है कि वह तो मृग मरीचिका के पीछे खिंचा चला आया है तब वह पछताता है | किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है | वह शहर के लिये तो अयोग्य रहता ही है, गाँव वापस जाकर खेती के योग्य भी नहीं रहता | स्मृतियों का उपरोक्त सन्देश इस प्रकार के युवकों के लिये अवश्य ही मार्गदर्शक है | किन्तु यही कृषिकर्म संन्यास में त्याज्य है | क्योंकि इस अवस्था में पुरुषार्थ करने की इतनी सामर्थ्य नहीं रह जाती | इसी प्रकार बच्चे के लिये जहाँ माँ का दूध पथ्य व प्रकृति के अनुकूल है, वहीं बड़े होने पर धरती माँ से उत्पन्न अन्न ही उसकी शक्ति है |

अस्तु, आज यदि मानव नैतिक मूल्यों से च्युत् होता जा रहा है, यदि हमारे शासक राजधर्म व व्यवहार के दिव्य आदर्शों से विमुख हो रहे हैं, यदि आज चारों ओर भ्रष्टाचार अनाचार तथा अराजकता का ताण्डव हो रहा है तो इस सबका एक प्रमुख कारण यह है कि हम स्मृतिसम्मत अनुशासन को भूल चुके हैं | आज मानव मात्र को उस अनुशासन में बंधने की आवश्यकता है | तब ही गिरते हुए मानवीय मूल्यों में सुधार सम्भव है |

अस्तु ! वासन्तिक नवरात्रों के उपलक्ष्य में बस यही कामना है कि हम सब सद्बुद्धि हों ताकि करणीय और अकरणीय का भेद समझ उचित दिशा में आगे बढ़ें…

मेरी बातें

नवसंवत्सर

आंध्रप्रदेश में युगादि अथवा उगडि तिथि कहकर इस सत्य की उद्घोषणा की जाती है कि भारतीय नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा से ही आरम्भ होता है, न कि पहली जनवरी से । आज से लगभग २०६९ वर्ष पूर्व अर्थात ईसा से ५७ वर्ष पूर्व मालवा के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था और उस विजय को अमर बनाने के लिये विक्रम सम्वत का प्रवर्तन किया था । भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध हैं । उन्होंने ९५ शक राजाओं को पराजित करके भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था । राजा विक्रमादित्य की विशाल सेना से विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे । ज्ञान-विज्ञान, कला, संस्कृति को विक्रमादित्य ने बहुत प्रोत्साहन दिया था | धन्वन्तरी जैसे महान वैद्य, वाराहमिहिर जैसे प्रकाण्ड ज्योतिषी, तथा कालिदास जैसे महान कवि उनकी सभा के नवरत्नों में थे |

यह अत्यन्त प्राचीन सम्वत गणित की दृष्टि से भी अत्यंत सुगम है, क्योंकि इस सम्वत के अनुसार तिथि अंश दिनमान आदि सभी की गणना सूर्य-चन्द्र की गति पर आधारित हैं, और इस प्रकार यह पूर्ण रूप से वैज्ञानिक भी है | प्राचीन काल में नवीन सम्वत चलाने की विधि थी कि जिस नरेश को भी अपना संवत चलाना होता था उसे सम्वत आरम्भ करने से एक दिन पूर्व उन सब प्रजाजनों का ऋण अपनी ओर से चुका देना होता था जिन्होंने किसी से भी किसी प्रकार का ऋण ले रखा हो, और ऐसा राजा लोग प्रायः अपनी विजय के उपलक्ष्य में करते थे | महाराज विक्रमादित्य ने पहले शकों को पराजित किया और फिर देश के सम्पूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस व्यक्ति का रहा हो, स्वयं देकर अपने नाम से इस सम्वत का आरम्भ किया था, जो सम्राट पृथिवीराज के शासन काल तक चला | आज भले ही ईसवी सन का बोलबाला जीवन के हर क्षेत्र में हो, किन्तु भारतीय संस्कृति की पहचान यह विक्रम सम्वत ही है और विवाह मुंडन गृह प्रवेश जैसे समस्त शुभ कार्यों तथा श्राद्ध तर्पण आदि सामाजिक कार्यों का अनुष्ठान इसी सम्वत की भारतीय पंचांग पद्धति के अनुसार ही किया जाता है |

इस वर्ष विक्रम सम्वत २०७० – जिसे “विजय” नाम से जाना गया है – का शुभारम्भ कल अर्थात १० अप्रेल २०१३ को चैत्र मास शुक्ल प्रतिपदा को रेवती नक्षत्र और वैधृति योग में हुआ है, किन्तु १० अप्रेल को प्रतिपदा तिथि का उदय सूर्योदय से न होकर अपराह्न ३ बजे के पश्चात हुआ है इसलिये ११ अप्रेल को नव सम्वत्सर का आरम्भ माना गया है जिसमें चंद्रमा आश्विन नक्षत्र में आ गया है | पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण आरम्भ किया था, इसलिये भी इस तिथि को नव सम्वत्सर के रूप में मनाया जाता है | भारत में वसन्त ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिये भी उत्साहवर्द्धक है क्योंकि इस ऋतु में प्रकृति में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं तथा चारों ओर हरियाली छाई रहती है और प्रकृति नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा अपना नूतन श्रृंगार करती है, तथा ऐसी भी मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को दिन-रात का मान समान रहता है | राशि चक्र के अनुसार भी सूर्य इस ऋतु में राशि चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रविष्ट होता है | यही कारण है भारतवर्ष में नववर्ष का स्वागत करने के लिये पूजा अर्चना की जाती है तथा सृष्टि के रचेता ब्रह्मा जी से प्राथना की जाती है कि यह वर्ष सबके लिये कल्याणकारी हो | और इसीलिये चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को कलश स्थापना कर नौ दिन के लिये माँ दुर्गा की तीन महत्वपूर्ण रूपों – दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती – पूजा अर्चना का आरम्भ होता है | नौवें दिन यानी नवमी को यज्ञ इत्यादि करके माँ भगवती से सभी के लिये सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है । इन नौ दिनों तक बहुत से लोग व्रत उपवास आदि भी करते हैं | इस प्रकार भारतीय संस्कृति और जीवन का विक्रमी संवत्सर से गहन सम्बन्ध है |

मेरी बातें

चैत्र नवरात्र – जब प्रकृति में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं और ग्रीष्म का आरम्भ होता है – देश के लगभग हर भाग में किसी न किसी रूप में उत्साह के साथ मनाए जाते हैं | आन्ध्र हो, महाराष्ट्र हो, बंगाल हो, छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश या हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, हरयाना, उत्तर प्रदेश – कोई भी भाग हो – हर भाग में धूम धाम से किसी न किसी नाम से ऋतु के इस परिवर्तन का स्वागत किया जाता है तथा शक्ति और उसके तीन महत्वपूर्ण रूपों – माँ दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती – की उपासना की जाती है |

तो आइये हम सब भी मिल जुल कर इस प्राकृतिक परिवर्तन के सुख का अनुभव करें और ईश्वर को धन्यवाद दें | आप सभी को वासन्तिक नवरात्र, उगडी, चैती चाँद, गुडी पड़वा तथा बैसाखी की हार्दिक शुभकामनाएँ | “विजय” नामक भारतीय विक्रम नव सम्वत्सर जीवन के हर क्षेत्र में आपको विजय प्रदान कर सफलता का सुख अनुभव कराए |