मेरी बातें

प्रतीक्षा

सतत प्रतीक्षा, फिर भी मन को कितनी मधुर मधुर लगती है
व्याकुल मन है ठौर न पाता, आँखें रात रात जगती हैं |
सुख वैभव हो या फिर दुःख हो, जग के सारे कर्म करूँ मैं
पर तेरी सुधि बार बार आकर मेरे मन को हरती है ||
सुख होता चुप हो जाती हूँ, दुःख होता गाना गाती हूँ
क्योंकि विरह की घड़ी मेरे मन में अद्भुत से रंग भरती है |
विरह मिलन का खेल निराला, सुख दुःख का ये मेल निराला
भले निराशा छा जाए, पर मधुर आस मन को ठगती है ||

आओ चलें कहीं दूर

आओ चलें कहीं दूर, जगत की सीमाओं से पार कहीं
जहाँ न जग का भय, न हो परिचय की भी दीवार कोई |
हम तुम दोनों एक रहे, चिर मिलन यामिनी सजी रहे
पल भर को अलगाव न हो, और ना ही हो व्यवधान कोई ||
लगता जैसे दूर दूर रहते कई सदियाँ बीत चुकीं हैं
इक दूजे की राह को तकते तकते सदियाँ बीत चुकी हैं |
इस दूरी को सिमटाओ, है मन में अब कुछ धैर्य नहीं
मन हैं मिले हुए, पर तन की दूरी भी अब मानी नहीं ||
कँगनी पर कल युगल कपोतों को देखा, मन अकुलाया
मिला चोंच से चोंच उन्होंने नेह परस्पर बरसाया |
देख उन्हें मन चपल, नयन में चंचलता का वास कहीं
एक अतृप्त सी प्यास लिये मन, पाता है विश्राम नहीं ||
देखो लता वृक्ष पर चढ़कर झूम झूम कर इतराए
और कली भी भँवरे को पा मन ही मन में शरमाए |
निकट पतंगा देख दीप की शिखा झूमती आज कहीं
हम तुम दोनों मिलें यों ही, तो मन में रहे उमंग नई ||

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