प्राकृतिक आपदा

अभी उत्तराखण्ड में बादल फटने से, तेज़ बारिश से काफ़ी तबाही हुई है | यहाँ तक कि हज़ारों साल पुराने केदारनाथ मन्दिर – जो कि बारह ज्योतिर्लिंगों में माना जाता है – का भी बड़ा हिस्सा बह गया है | एक पूरे क़स्बे – “रामबाड़ा” – का नामो निशान तक नहीं बचा | हज़ारों की तादाद में चारों धाम की तीर्थयात्रा के लिये निकले हुए यात्री फँसे हुए हैं | कितने लोग लापता हैं | कितनों की जानें जा चुकी हैं | प्राकृतिक आपदा के सामने कोई विज्ञान काम नहीं करता | पर क्या कभी हमने विचार करने का कष्ट किया कि इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाएँ आती किसलिये हैं ? इसलिये, क्योंकि हम प्रकृति का सम्मान करना नहीं जानते | प्रकृति से जो हमें मिला है उसे हम अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान उसे नष्ट करना भी अपना अधिकार मान बैठते हैं | वनप्रदेशों की कटाई की बात यदि जाने भी दें – हालाँकि वो एक बहुत बड़ा ख़तरा है पर्यावरण के लिये, पर्वतीय स्थलों पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से उग आए होटलों और रिहायशी इमारतों की बात यदि नहीं भी करें, तो भी बहुत दुःख होता है यह देखकर कि हम जैसा आम आदमी वन प्रदेशों और पर्वतीय प्रदेशों का सम्मान करना नहीं जानता | हम लोग परिवार के साथ पहाड़ी स्थलों की सैर के लिये जाते हैं और वहाँ कूड़ा करकट फैलाकर आ जाते हैं | पोलीथिन के बैग्स, पान मसालों के ख़ाली पाउच, कुरकुरे और ऐसी ही अनेकों प्रकार की नमकीनों के ख़ाली पैकेट्स इन पहाड़ी स्थलों की सड़कों पर जहाँ तहाँ बिखरे मिल जाते हैं | जिस भी ज़मीन पर ये पैकेट्स डाले जाएँगे, यदि इन्हें वहाँ से उठाया नहीं गया तो वहाँ पड़े पड़े उस ज़मीन को बंजर बना देंगे | बिना सोचे समझे अंधाधुंध जो व्यावसायीकरण किया जा रहा है इन प्रदेशों का उसके चलते ये सब हो रहा है | कोई देखने वाला नहीं है, कोई पूछने वाला नहीं है | पहले जहाँ गंगा मन्दाकिनी भागीरथी आदि नदियाँ कल कल का नाद सुनाती अपने पूर्ण प्रवाह में मस्ती में भर नृत्य किया करती थीं – जिसे देख हर जड़ चेतन मस्ती में भर झूम उठता था – वहीं लोगों के लालच के चलते अब इमारतें बनती चली जा रही हैं – पहचानना भी मुश्किल हो गया है कि यहाँ कभी कोई नदी भी बहती रही होगी | लोग भूल चुके हैं कि प्रकृति जीवन्त सत्ता है | उसकी सत्ता के अभाव में हम अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकते | माना जो हुआ बहुत दुखद हुआ | न जाने कितने परिवार इस आपदा में नष्ट हो चुके हैं | न जाने कितनों के अपने उनसे बिछड़ गए गए हैं | पर साथ ही यह भी सच है कि प्रकृति का इस प्रकार से दोहन, इस प्रकार उसका अपमान – क्यों न बदला लेगी प्रकृति हमसे अपने इस अपमान, उपेक्षा और दोहन का ??????

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