मेरी बातें

फिर और किसी को देखूँ क्या

जब जी भर तुमको देख लिया, फिर और किसी को देखूँ क्या |
जब नयन सुधारस पान किया, फिर मय के प्याले चक्खूँ क्या ||
इन रक्तिम श्यामल नयनों ने ऐसा मधुमय रस बरसाया
जिससे मेरे उर के सूखे उपवन का कण कण सरसाया |
मेरा मधुमास मुझी में है, बाहर के उपवन देखूँ क्या
जब जी भर तुमको देख लिया, फिर और किसी को देखूँ क्या ||
अपने ही स्वर में गीत रचा, अपने हाथों निज भाग्य लिखा
अपने ही दर्पण में मुझको मेरा उज्जवल श्रृंगार रुचा |
सब स्वाँग भरे हैं मुझमें ही, फिर दर्शक बन कर देखूँ क्या
जब जी भर तुमको देख लिया, फिर और किसी को देखूँ क्या ||
तेरी मृदु चितवन से मेरा यह रीता घट परिपूर्ण हुआ
गरिमा का वैभव प्राप्त हुआ, सीमित में ही विस्तार हुआ |
खुल गईं ग्रन्थियाँ जब मेरी, फिर जग के बन्धन देखूँ क्या
जब जी भर तुमको देख लिया, फिर और किसी को देखूँ क्या ||

बुझने से पहले उकसा दो

सोने से पहले कुछ गा दो |
मेरे सोए अरमानों को अपने गीतों से बहला दो ||
साँसों की सँख्या सीमित है, जो एक दिवस चुक जाएगी
इस जग की भरी बजरिया में यह चंचल निधि लुट जाएगी |
इसलिये मूल्य समुचित इसका अवसर रहते ही भुगता दो ||
झूठा ही आश्वासन दे दो, मन ढाढस तो पा जाएगा
चाहे धुँधला ही सही, मगर कुछ तो प्रकाश छा जाएगा |
मेरे अन्तर की पीड़ा को तुम किसी भाँति कुछ सहला दो ||
वरदान न दो, अभिशाप सही, मेरे हित कुछ तो दे देना
अनुराग न दो, आक्रोश सही, मेरा अधिकार मुझे देना |
यदि स्नेह संदेशा दे न सको, तो उपालम्भ ही भिजवा दो ||
है ज्ञात सभी को स्नेहपूर्ण दीपक ही ज्योति दिखाता है
होते ही स्नेहविहीन किन्तु वह तम में ही खो जाता है |
इसलिये उसे दे स्नेहदान, बुझने से पहले उकसा दो ||

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