Monthly Archives: June 2013

मेरी बातें

कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही

विरह मिलन की धूप छाँव में सुख दुःख के डग भरने वाला
और चढ़ाई उतराई में सदा अथक ही चलने वाला |
एक बूँद वाले जलघट में अगम सिन्धु भरने का चाही
धूल धूसरित भूखा प्यासा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
सुरभित वन उपवन गिरि कानन, जल खग कूजित झीलों वाली
समझ रहा जिसको तू मंज़िल, शिलाखण्ड वह मीलों वाली |
भग्न मनोरथ, पग पग पर दी तुझे दिखाई असफलता ही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
बात न पूछो तुम साथी की, ये बादल आते जाते हैं
जीवन की चंचल लहरों पर कब हम किसे रोक पाते हैं |
मधुर मिलन तो घड़ी दो घड़ी, पल भर ही पी की गलबाँही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
प्रिय प्रहसन ऊषा का पल भर, रह जाता देखा अनदेखा
दिन दोपहरी सन्ध्या रजनी, फिर अनन्त जीवन का लेखा |
सन्ध्या का संकेत समझ ले, जो तेरा पथ सम्बल राही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
आशाओं की चिता जलेगी, रथ टूटेंगे अरमानों के
दिन रहते काफ़िला रुकेगा, पंख जलेंगे परवानों के |
लेकिन बस तुम तुम्हीं रहोगे, और तुम्हारी मंज़िल राही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
पास रहे जब कभी न माँगा, अब तो हाथ बढ़ाने ही दो
रुक न सको तुम यदि तो अपनी याद यहाँ रह जाने ही दो |
मन की मन के बीच रह गई, हो न सकी अपनी मनमानी
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||

मेरी बातें

विधाता भी मानव के आगे शीश झुकाएगा

जग में बरसाओ नेह सरस, हर नयन कमल मुसकाएगा |
मन प्रेम सरोवर तब उछाह में भर, बहता ही जाएगा ||
मन की वीणा मस्ती में भरकर प्रेम रागिनी छेड़ेगी
मन प्रेम हिंडोले में चढ़कर फिर ऊँचा उड़ता जाएगा ||
चन्दा जब रातों को आकर अँधियारा दूर भगाएगा
तब दर्द भरे गीतों का कोई मोल नहीं रह जाएगा ||
हो कितनी ही यह धरा गगन से दूर, नहीं चिंता कोई
वो दूर क्षितिज के पास कहीं हर ओर छोर मिल जाएगा ||
चाहे कितना भी ज्ञान मिले, चाहे कितना विज्ञान बने
सब व्यर्थ नेह के आगे, प्रेमी आगे बढ़ता जाएगा ||
हो कितनी तेज़ चले आँधी, या कितने ही तूफ़ान उठें
है स्नेह भरा यदि दीपक में, अँधियारा टिक ना पाएगा ||
चाहे कितने मंदिर मस्ज़िद गुरद्वारे गिरजे बन जाएँ
पर नेहसिक्त मन के आगे कोई धर्म नहीं टिक पाएगा ||
मिल जाए कोई भूखा नंगा, बाहों में भरकर सहलाओ
लख इसे, विधाता भी मानव के आगे शीश झुकाएगा ||

चरम सत्य तू पा जाएगा

अहंभाव ही सबसे बड़ा सत्य जीवन का जग ने माना
बना हुआ मन क़ैदी इसका, पर न किसी ने इसको जाना ||
अहंभाव से पीड़ित, एकाकी हो जाने घबराता
निंदा और प्रशंसा दोनों ही से अपना मन बहलाता |
अपना हर प्रयास वह खुद को तुष्ट कराने हित ही करता
बना हुआ मन क़ैदी इसका, पर न किसी ने इसको जाना ||
अगर प्रशंसा मिले तो मन फिर फूला नहीं समाता है
अगर नहीं दे ध्यान कोई तो जीने से उकताता है |
इसीलिये तो निंदा पाने को भी है वह उत्सुक रहता
बना हुआ मन क़ैदी इसका, पर न किसी ने इसको जाना ||
मिले मान तो मन में खुशियों के अनगिनती पुष्प खिलाएँ
अगर मिले अपमान तो सारे आशाओं के दीप बुझाएँ |
मान और अपमान के ताने बाने में वह उलझा रहता
बना हुआ मन क़ैदी इसका, पर न किसी ने इसको जाना ||
किन्तु नहीं यह जीवन, इसके पार उतर कर देख ज़रा
अहंभाव को तजकर शिशु सम भोला बनकर देख ज़रा |
तब ही शाश्वत चरम सत्य के दर्शन फिर तू पा जाएगा ||

मेरी बातें

दूरी

कितनी दूर रहो तुम मुझसे, मन से दूर न जा पाओगे |
नयनों का पाकर आमन्त्रण स्वयं निकट तुम आ जाओगे ||
तुम गाओगे गीत प्रणय का किसी अपरिचित सन्ध्या में जब
बनी रागिनी आ जाऊँगी साथ तुम्हारा पाने पल भर |
उसी रागिनी को साजों में तुम उस रात बजा जाओगे
नयनों का पाकर आमन्त्रण स्वयं निकट तुम आ जाओगे ||
कभी निहारोगे दर्पण में करने हित श्रृंगार अनूठा
तभी नयन में आ जाऊँगी बन कर मैं आकार अनूठा |
और कभी सपनों में भी तुम उसी रूप को पा जाओगे
नयनों का पाकर आमन्त्रण स्वयं निकट तुम आ जाओगे ||
जितना तुमको था बहलाया उतना ही तुम रूठ गए थे
वन्दन हित जो पुष्प चढ़ाए, उनको भी तुम रौंद गए थे |
पर मेरी यादों की आँधी से खुद को महका जाओगे
नयनों का पाकर आमन्त्रण स्वयं निकट तुम आ जाओगे ||

प्रतिपल मेरे पास हो जैसे

तुम कितनी ही दूर रहो, पर प्रतिपल मेरे पास हो जैसे |
प्रतिपल जीवित एक आस है, तुम मेरी हर साँस हो जैसे ||
हो तन के संग जैसे छाया, अथवा देह प्राण के संग हो |
तुम वैसे ही साथ हो मेरे, वाणी के संग मन हो जैसे ||
नश्वर से इस महानगर में तुम्हें खोजती फिरती हर पल |
तुम वैसे ही साथ हो मेरे, नयनों में कोई स्वप्न हो जैसे ||
सिसकी मैं हर शब्द गान में, भटकी मैं हर एक तान में |
तुम वैसे ही साथ हो मेरे, वीणा के संग स्वर हो जैसे ||
किरण किरण में तुमको ढूँढा, कली कली से तुमको पूछा |
तुम वैसे ही साथ हो मेरे, पुष्पों में सुगन्ध हो जैसे ||
जब तक जीवित एक आस है, तभी तलक साँसों में गति है |
तुम वैसे ही साथ हो मेरे, दीपक में प्रकाश हो जैसे ||

मेरी बातें

उड़ते जाना अभी मुझे

चलते चलते कहाँ आ गई, नहीं तनिक है भान मुझे |
मगर नहीं ये मंज़िल मेरी, इतना है आभास मुझे ||
मैं हूँ ऐसा पुष्प, डाल से टूट गिरा जो माटी में |
उसके स्नेहिल स्पर्शों से गंध बिखेरी कण कण में |
मन में था संकल्प कि जग को महकाना है अभी मुझे ||
चाहें कितनी आँधी आएँ, चाहें कितने तूफाँ आएँ |
चाहें सारे पुष्प धूल में पात पात हो बिखर पड़ें |
लेकिन आँधी तूफ़ानों में उड़ते जाना भी मुझे ||
युगों युगों से चली आ रही, ठौर मिला ना तनिक मुझे |
थक कर हूँ मैं चूर हो गई, मगर नहीं विश्राम मुझे |
पग में छाले पड़े, मगर चलते जाना है अभी मुझे ||
जिसे खोजने निकली उसका पता नहीं है याद मुझे |
किससे पूछूँ, राह दिखाते अलग अलग हैं सभी मुझे |
अन्तर में है छिपा हुआ वह, मगर नहीं है ज्ञान मुझे ||

मैं हँस दूँ

मैं हँस दूँ, ये जग हँस देगा साथ में मेरे,
किन्तु रुदन को नहीं देख पाएगा कोई |
इसीलिये इस जग में रहकर मुझको अपना
सब आनन्द लुटाना और मुसकाना होगा ||
मेरा गायन गूँजे पर्वत की घाटी में
और सागर में मेरा कल कल नाद समाया |
किन्तु करूँगी रुदन तो होकर लीन पवन में
चूर चूर हो इधर उधर छितरा जाएगा |
इसीलिये इस जग में रहकर मुझको हर पल
मीठा राग सजाना और सुनाना होगा ||
आनन्दित ध्वनियों का उत्तर दें प्रतिध्वनियाँ
चीत्कार के उत्तर में संकोच उन्हें है |
मैं आनन्द मनाऊँ, जग ये साथ चलेगा
रही उदास तो पास न कोई भी फटकेगा |
इसीलिये इस जग में रहकर मुझको हर पल
कुसुम समान सदा ही खिलते जाना होगा ||
अमृत पीने के हित होते सबही उत्सुक
लेकिन गरल अकेले ही पीना पड़ता है |
कोई बाँटे भोज, तो कितने लोग जुड़ाएँ
किन्तु करे उपवास, तो सब निज राह को जाएँ |
इसीलिये इस जग में रहकर मुझको हर पल
अमृतमय यह भोज कराते जाना होगा ||
मिले सफलता तो सबही हैं साथ निभाते
पर निर्बल से जग में सबही आँख चुराते |
आगे बढ़ने वाले के अनुगामी बनते
पीछे रह जाने पर सब निज राह पकड़ते |
इसीलिये इस जग में रहकर मुझको हर पल
आगे ही आगे नित बढ़ते जाना होगा ||

मेरी बातें

कई रोज़ से पिताजी की याद बेहद सता रही थी, न जाने क्यों | पहली रचना उन्हीं के लिये…

प्राणों की निधियाँ हैं प्यासी

धन्यभाग हैं मैंने प्यार और अनुराग सभी का पाया |
फिर भी न जाने क्यों प्राणों की निधियाँ हैं प्यासी की प्यासी ||
नभ में जब गोधूली छाए, रंगों की गागर छलकाए
अनुरंजित नभ से मिलने को पंछी का जब मन ललचाए |
चन्दा की बिंदिया को लख कर जाने किसकी याद सताती
आज न जाने क्यों प्राणों की निधियाँ हैं प्यासी की प्यासी ||
मेरे इन प्यासे नयनों में एक बसा सुन्दर बचपन है
विजन विपिन से हृदय अयन में एक रचा सुन्दर मन्दिर है |
जीवन मरण परिधि को लख कर पग पग पर बढ़ रही उदासी
आज न जाने क्यों प्राणों की निधियाँ हैं प्यासी की प्यासी ||
भौतिक स्नेह तुम्हारा छूटा, तुम मिल बैठे महाशून्य में
किन्तु चिरन्तन सत्य बने तुम सदा साथ मेरे सुख दुःख में |
नेह अलौकिक लेकर तुमसे गान तुम्हारा मैं दोहराती
आज न जाने क्यों प्राणों की निधियाँ हैं प्यासी की प्यासी ||
मैं मधुकुसुमों वाली लतिका पतझड़ की पीड़ा से व्याकुल
मैं मृदुभावों वाली कविता लय के खो जाने से व्याकुल |
किन्तु तुम्हारी स्मृतियाँ ही मुझको जीवन राग सुनातीं
आज न जाने क्यों प्राणों की निधियाँ हैं प्यासी की प्यासी ||

नैया आगे बढ़ती जाए

बिना पाल पतवार ओ माँझी उम्र की नैया चलती जाए
कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||
कभी लहर के ऊपर उछले, कभी मध्य में भी छिप जाए
डूब डूब के फिर उतराए, मगर पार लगने न पाए |
मध्य धार में सन्ध्या के पंछी सम हर पल झूके खाए
कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||
धारा की पहचान नहीं है, नदिया का कुछ ज्ञान नहीं है
चहूँ ओर पानी ही पानी, होता तट का भान नहीं है |
अँधियारी रजनी है, तट भी पल भर को न उसे सुझाए
कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||
नए पुराने कर्मफलों की पूँजी की गठरी थी संग में
वह सारी ही पूँजी तिल तिल करके आज समाई जल में |
किया प्रमाद तो बार बार अब क्यों फिर हाथ मले पछताए
कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||
नहीं उसे अब ज्ञान दिशा का, नहीं उसे अब भान निशा का
कैसा उद्गम, कैसा संगम, नहीं उसे आभास विदा का |
अब तो जहाँ श्वास है टूटे, उसी घाट पर वह उतराए
कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||

मेरी बातें

पर फिर भी हो मुग्धमना मैं करती गुँजन

सन्ध्या को जब पवन बहे सन सन सन सन सन
राग सुरीला सुनकर हो जाती मैं अनमन |
कितना आकुल कितना व्याकुल मेरा अन्तर
पर फिर भी हो मुग्धमना मैं करती गुँजन ||
भूली बिसरी वीणा मैं निज हस्त संभालूँ, धीरे धीरे उसके तारों को सहलाऊँ
सारे स्वर हैं शुद्ध सुरीले पहले जैसे, पर एकाकी यों ही घुट घुट कर रह जाते |
वीणा को फिर शयन कराती होकर अनमन
पर फिर भी हो मुग्धमना मैं करती गुँजन ||
वीणा ही क्या, मैं भी तो उसके ही जैसी, जिसका अन्तर शुद्ध सुरीले तारों जैसा
झन झन करता तुम्हें पुकारे कब आओगे, सावन की रिमझिम का मीठा गान सुनोगे |
हर सन्ध्या मन के तारों को करती निश्चल
पर फिर भी हो मुग्धमना मैं करती गुँजन ||
शरद रात्रि हो या वासन्ती भोर जगी हो, दीवाली की जगमग हो, होली का रंग हो
या मेघों का दामिनि के संग नृत्य रचा हो, पर मन के भावों से हो तुम सदा अपरिचित |
तब मन की तानों की गति को करती सीमित
पर फिर भी हो मुग्धमना मैं करती गुँजन ||

गन्ध तेरे प्यासे हाथों की

मन को थी पुलकित कर देती गन्ध तेरे प्यासे हाथों की
और मुझे बन्दी कर देती गन्ध तेरी महकी साँसों की |
खिलती थी कामना पुष्प सम जब वह खुशबू सहलाती थी
और मुझे निज मादकता से नित नित आलोड़ित करती थी ||
इन्द्रधनुष वन उपवन पर्वत झरने नदिया बहता पानी
लगता मुझको सबमें है वह गन्ध बसी हर एक पल रहती |
मेरी मन वीणा के तारों में जो मृदु संगीत समाया
उसको पुनः पुनः झंकृत करने को हर पल थी वह उत्सुक रहती ||
किन्तु आज संगीत गीत सब थकित हुए हैं मौन पड़े
और एकाकीपन से घबराकर हर पल मैं व्याकुल रहती |
एक बार फिर उन ही प्यासे हाथों से मुझको सहला दो
सर से पैरों तक सरसा दो गन्ध उन्हीं महकी साँसों की ||

मेरी बातें

तुम क्या जानो

जीना क्या है तुम क्या जानो |
वह लगी कली जो खिली नहीं, मंडराए जिस पर अली नहीं |
जो अपने को पी गई आप चुपचाप, जुबां तक हिली नहीं |
दे जन्म विधाता ने
उसका छीना क्या है तुम क्या जानो ||
संयम जिसका दुःख से कातर, दुःख धीरज सीमा से बाहर |
होठों पर अमृत की मिठास, अन्तर में भर खारा सागर |
सपने पलकों में बाँध
गरल पीना क्या है तुम क्या जानो ||
हमने पाए अरमां अथाह, तड़पाए चाहों के उछाह |
साधन की इतनी मिली भीख, अपनी अक्षमता बनी दाह |
संतोष सुई से, चिथड़ा उर
सीना क्या है, तुम क्या जानो ||
हम चिर प्यासे यह शाप नहीं, हम विवश एक बस पाप यही |
हो जन मरण ही जीवन की जो माप, कहीं अनुताप नहीं |
पर साँस साँस पर मर मर कर
जीना क्या है तुम क्या जानो ||

अपना क्या है

जो कुछ है सो तेरा ही है, मुझमें मेरा अपना क्या है |
तेरा तुझको ही दे दूँगी, मुझको इसमें रखना क्या है ||
कौन कहे जाने किस युग से चली आ रही कथा पुरानी
सबने सुनी, सभी ने समझी, मगर रही जानी अनजानी |
उलझ रहा मन, समझ न पाता, सच क्या है और सपना क्या है ||
मेरे मन की अभिलाषाएँ इस सारी जगती में छाईं
व्याप्त यहाँ के कण कण में है मेरी कल्पना की परछाईं |
पाप पुण्य और स्वर्ग नरक के तापों से फिर तपना क्या है ||