वैराग्य

“ये हिसंस्पर्शजा भोगा दु:खयोंनय एव ते, आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुध: |” (गीता ५/२२) – इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले भोग आदि और अन्तवान होने के कारण क्षणभंगुर होते हैं और इसीलिये दुःख का हेतु होते हैं | अत: विवेकी पुरुष इनमें आसक्त नहीं होते |

वास्तव में विषय सुख की क्षणिक प्रतीति मात्र ही होती है | वस्तुत: तो सम्पूर्ण सुख का भण्डार एकमात्र विज्ञानंदधन परमात्मा ही है | सम्पूर्ण प्रिय पदार्थों में उसी का सुख प्रतिबिंबित हो रहा है | यही कारण है कि भगवान ने दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र द्वारा अर्हता, ममता और वासना रूपी अति दृढ़ मूल वाले संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को काटने के लिये कहा है “अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला: | अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके || न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठिता | अश्वत्थमेनं सुविरूढ़मूलमसंगशस्त्रेण दृढेन छित्वा ||” (१५/२,३) – यह संसार एक विचित्र पीपल का वृक्ष है, जिसका महामूल तो ऊपर है, किन्तु इसके नीचे मनुष्यलोक में काफी दूर तक जड़ें फैली हुई हैं, जिनका मूल कारण वे कर्म हैं जिनके अनुसार बीज बोकर प्राणी स्वयं नवीन जन्म रूप फल प्राप्त करते हैं | सत्व रज तम आदि के विस्तार से नीचे ऊपर चारों ओर इसकी शाखाएँ फैली हुई हैं, जिनमें रूप रस गंध आदि कोमल कोंपलें हैं | निरन्तर परिवर्तनशील इस वृक्ष को न तो पकड़ा जा सकता है, न इसका आदि प्राप्त होता है न अंत, न ही वर्तमान का पूरा ज्ञान हो पाता है | अर्थात् इस संसार वृक्ष का जैसा स्वरूप शास्त्रों में वर्णित है और जैसा देखा सुना गया है, तत्वज्ञान हो जाने पर वैसा नहीं रहने पाता | उसी प्रकार जैसे आँख खुलने पर स्वप्न का संसार शेष नहीं रहता | क्योंकि न तो इसका ही ज्ञान है कि इसकी परम्परा कब से चली आ रही है और न ही इस बात का कुछ पता है कि कब तक यह इसी प्रकार चलता रहेगा | इसलिये इस अर्हता ममता वासना रूप अति दृढ़ मूलों वाले पीपल वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूपी अस्त्र द्वारा काट देना चाहिये | ब्रह्म लोक तक के भोग क्षणिक और नाशवान हैं, ऐसा विचार कर संसार के समस्त विषय भोगों में सत्ता, सुख, प्रीति और रमणीयता का न भासना ही दृढ़ वैराग्य रूपी अस्त्र है | तथा स्थावर जंगम रूप संसार के चिंतन का और अनादि काल से अज्ञान के कारण दृढ़ हुई अर्हता, ममता और वासना रूप मूलों का त्याग करना ही संसार वृक्ष को आमूल काटना है | इसके उपरान्त परमपद रूप परमेश्वर को भली भाँति खोजना चाहिये क्योंकि यही है मुक्तावस्था | अत: यथार्थ कल्याण की इच्छा हो तो साधक को यह जान लेना चाहिये कि जगत की कोई वास्तविकता नहीं है | न यह उत्पन्न हुआ है, न ही इसकी कोई सत्ता है, विचारपूर्वक देखा जाए तो यह केवल भ्रममात्र ही सिद्ध होता है | जिस प्रकार भ्रमवश आकाश में नीलेपन का आभास होता है उसी प्रकार जगत का भास् भी एक भ्रम ही होता है | समस्त दृश्य जगत नाशवान है और केवल दृश्य मात्र है | जब तक दृश्य आते रहेंगे मोक्ष दुर्लभ है | दृश्यों का अभाव होने पर ही शुद्ध आत्मा का दर्शन होता है |

वासना बड़ी प्रबल है | इसी कारण जीवों को संसार में भटकना पड़ता है | यही संसार में बंधन का कारण है | वासना तृष्णा अहंकार इन सबके आते ही संतोष आदि समस्त गुणों का सर्वथा अभाव हो जाता है | ये निर्मल अंत:करण को भी मलिन कर देते हैं | इनके मेघ यदि छा जाएँ तो दुःख रूपी बूँदों की ऐसी अपार वर्षा होती है कि आत्मा रूपी सूर्य का कहीं पता ही नहीं लगता | वासना तृष्णा अहंकार काम क्रोधादिरूपी सूत्र में जीव रूपी मोती को पिरोकर यह मन चैतन्यरूपी आत्मा को पहना देता है | फिर भला निवृत्ति कैसे हो सकती है ? जब तक भोग की इच्छा है तब तक बंधन है, और बंधन में शान्ति कहाँ ? सुख तो आत्मज्ञान से होता है | आत्मज्ञान के उदय होने पर दुःख का लेश भी नहीं रहता | सुख के निमित्त इन्द्रियों का आश्रय लेकर मूर्ख प्राणी उस अन्धकूप में जा गिरता है जिससे बाहर निकलने का मात्र एक ही मार्ग है – और वह है विषय सुख की असारता को जान लेना – अर्थात् वैराग्य | वैराग्य वास्तव में एक अत्यन्य गूढ़ विषय है | केवल विरक्त पुरुष ही इसे समझ पाते हैं | वैराग्य है क्या ? इसका स्वरूप कैसा है ? इसका मार्ग क्या है ? मुझ जैसी साधारण गृहस्थिन के लिये यह सब जान पाना वास्तव में बहुत कठिन है | किन्तु फिर भी जैसा कुछ गीता में पढ़ा उसी के आधार पर निरूपण करने का प्रयास किया है |

वैराग्य किसी स्वाँगविशेष का नाम नहीं है | किसी कारणवश या मूर्खता से घर परिवार का त्याग करके भगवा वस्त्र पहनकर, सर मुड़ाकर या जटा बढ़ाकर अथवा अन्य बाह्य चिन्हों को धारण करके यत्र तत्र भ्रमण करते रहना तथा “हम वीतरागी हैं” इस प्रकार की घोषणा करके अपनी पूजा करवाना वैराग्य नहीं है | इसका न तो स्वयं को ही कोई लाभ है और न ही समाज को | मन तो विषयों में रमा हुआ है किन्तु स्वाँग भरकर मिथ्याचार कर रहे हैं – यह कोरा दम्भ नहीं है तो और क्या है ? ऐसा व्यक्ति तो पाखण्डी भी नहीं कहा जा सकता | क्योंकि पाखण्डी तो दूसरों को ठगता है, पर ऐसा व्यक्ति तो स्वयं को धोखा देता है | इसी के लिये गीता में कहा गया है “कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् | इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ||” (३/६) – वस्तुत: वैराग्य की पराकाष्ठा तो उन्हीं पुरुषों में पाई जाती है जो जीवन्मुक्त हैं, जिन्होंने परमात्मरस में डूब कर विषय रस से स्वयं को सर्वथा मुक्त कर लिया है | साथ ही यह भी कहा गया है कि इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने पर विषय तो निवृत्त हो जाते हैं किन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं हो पाती | इसी कारण उसकी इन्द्रियाँ बार बार विषयों की ओर दौड़ती हैं और उसके अंत:करण को स्थिर नहीं होने देतीं | उदाहरण के लिये रोग अथवा मृत्यु के भय से अथवा अन्य किसी हेतु से विषयासक्त मनुष्य किसी एक या अधिक विषयों का परित्याग कर देता है | किन्तु यह निवृत्ति हठ, भय या अन्य किसी कारण से होने के कारण उनमें आसक्ति बनी ही रहती है | रोगी सोचता है कि शीघ्र उसका स्वास्थ्य ठीक हो और वह फिर से उस विषय का रसास्वादन कर सके | दम्भी मनुष्य लोगों को दिखाने के लिये विषयों का परित्याग कर देते हैं | भौतिक सुखों की कामना वाला मनुष्य अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति के लिये या अन्य किसी प्रकार के विषय सुख की प्राप्ति के लिये ध्यान काल में या समाधि अवस्था में दसों इन्द्रियों के विषयों का ऊपर से भी परित्याग कर देता है और मन में भी उनका चिंतन नहीं करता | तब भी भोगों के प्रति उसकी आसक्ति तो रहती ही है | यही ज्ञानी और अज्ञानी के इन्द्रिय संयम में भेद है | ज्ञानी – जो स्थितप्रज्ञ हो जाता है – को परमानन्द के समुद्र परमात्मा का साक्षात्कार हो जाने के कारण उसकी किसी भी सांसारिक पदार्थ में तनिक भी आसक्ति नहीं रहती | क्योंकि आसक्ति का कारण अविद्या है “अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशाः | अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषाम् |” (योग. २/३,४) अज्ञान, जड़ और चेतन की एकता की प्रतीति, आसक्ति, द्वेष और मरण भय ये पाँचों क्लेश कहलाते हैं | इन पाँचों में कारणभूत अविद्या ही है | अर्थात् अविद्या ही शेष चारों का भी कारण है | परमात्मा से साक्षात्कार होने पर इस अविद्या का अभाव हो जाता है | साधारण मनुष्यों को अज्ञानवश जो इन्द्रियों के भोगों में सुख की प्रतीति होती है वह भी उस परमात्मा के आनन्द के किस अंश का आभास मात्र ही है | जैसी अँधेरी रात में चमकने वाले नक्षत्रों में सूर्य के ही प्रकाश का आभास होता है, सूर्योदय होने पर उनका प्रकाश लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार उस परमानन्दस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति हो जाने पर भोगों में सुख की प्रतीति अथवा उनमें आसक्ति रहती ही नहीं | वह परमात्मतत्व स्वयं ही इतना अद्भुत, दिव्य, अलौकिक एवम् आकर्षक है कि उसकी प्राप्ति के पश्चात् इतनी तल्लीनता, मुग्धता और तन्मयता होती है कि मनुष्य को स्वयम् अपना ही भान नहीं रहता, फिर अन्य किसी वस्तु की कल्पना ही कैसे हो सकती है ? और यही वैराग्य की पराकाष्ठा है |

योगदर्शन में यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार भेद से वैराग्य की चार संज्ञाएँ उपलब्ध होती हैं | किन्तु ये सभी गूढ़ विषय हैं | साधारण रूप से वैराग्य के जो चार भेद किये गए हैं उनमें प्रथम है भय से उत्पन्न वैराग्य | भोग के साधनों में पाप और पाप का परिणाम दुःख समझकर उसके भय से विषयों में निवृत्ति भयजनित वैराग्य है | दूसरे प्रकार का वैराग्य होता है विचार से उत्पन्न वैराग्य “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः | उभयोरपि दृष्टोSन्तस्वनयोस्तत्वदर्शिभि: |” (गीता २/१६) असत की सत्ता नहीं है और सत का अभाव नहीं है इस प्रकार इन दोनों को तत्वज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा जाता है | इस प्रकार के विवेक के द्वारा उत्पन्न वैराग्य विचार से उत्पन्न वैराग्य कहलाता है | साधन करते करते जब भगवद्तत्व का अनुभव हो जाता है तब लोगों के प्रति स्वत: ही वैराग्य उत्पन्न हो जाता है | गृहस्थ साधक भी जब सबके साथ यथायोग्य प्रेम का व्यवहार करते हुए भी मन में वैराग्य की भावना ही रखता है तब वह भी विरक्त ही कहलाता है | राजा जनक इसी प्रकार के वीतरागी – विदेह – थे | अतः साधन के द्वारा इस प्रकार की विवेकयुक्त भावनाओं से भोगों के प्रति जो वैराग्य होता है वह साधन के द्वारा होने वाला वैराग्य कहलाता है | परमात्मतत्व की उपलब्धि हो जाने पर साधक को भगवद्तत्व के अतिरिक्त अन्य किसी में भी कुछ सार प्रतीत नहीं होता | यह स्थिति दृढ़ वैराग्य की स्थिति होती है |

वैराग्य चाहे किसी भी प्रकार का हो – होता परमात्मतत्व की खोज का साधन ही है | जो एक बार इस खोज में लग जाता है वह फिर पीछे मुड़कर नहीं देखता | अंत में उसी आदि पुरुष की शरण में चला जाता है, उसी में स्थित हो जाता है, जिससे इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त होती है “निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:, द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् |” (१५/५) – जो जाति, गुण, ऐश्वर्य और विद्या आदि के सम्बन्ध से तनिक भी अभिमान नहीं करते, जिनका मान प्रतिष्ठा अविवेक और भ्रम आदि भावों से लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रह जाता, विषयों के साथ सम्बन्ध होने पर भी जिनके अंतःकरण में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं होता, परमात्मा के स्वरूप में जिनकी नित्य स्थिति हो गई है, इच्छा-कामना-तृष्णा आदि का लेश भी जिनमें नहीं रह गया है, शीत-उष्ण निंदा-स्तुति मान-अपमान प्रिय-अप्रिय आदि द्वंद्वों के संयोग वियोग में जिन्हें लेशमात्र भी राग-द्वेष हर्ष-शोक आदि विकारों का अनुभव नहीं होता, तथा मूढ़ता या अज्ञान का जिनमें सर्वथा अभाव हो जाता है वे ही ज्ञानी महात्मा परमेश्वर की माया से विस्तार को प्राप्त हुए इस संसार वृक्ष से सर्वथा अतीत होकर उस परमपदरूप परमेश्वर को प्राप्त होते हैं |

वैराग्य प्राप्ति के लिये “इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च, जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् | असक्तिरनभिष्वंग: पुत्रदारगृहादिषु, नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||” ९१३/८,९) इस लोक और परलोक के भी समस्त भोगों में आसक्ति का सर्वथा अभाव, जन्म मृत्यु जरा व्याधि आदि में बार बार दोषों को देखना, पुत्र स्त्री घर धन आदि में आसक्ति तथा ममता का अभाव तथा प्रिय और अप्रिय दोनों की ही प्राप्ति में सदा सैम रहना आवश्यक है | अर्थात् अंतःकरण और इन्द्रियों के द्वारा भोग किये जाने वाले जितने भी विषय हैं वे अन्ततोगत्वा दुःख के ही हेतु हैं | अतः उनमें प्रीति का सर्वथा अभाव इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य होना है | इसी प्रकार जन्म का कष्ट भी सहज नहीं है | माता के गर्भ में लम्बे समय तक बंद रहने के बाद योनिद्वार से बाहर निकलने तक में यन्त्रणा भोगनी पड़ती है | जितनी योनियों में जन्म होता है उतनी ही बार जन्म दुःख भोगना पड़ता है | और अंत में मृत्यु के समय इस मानसिक यन्त्रणा को झेलना पड़ता है कि जिस शरीर को हमने इतनी ममता से पाला उसी अपने घर को जबरदस्ती अनिच्छा से छोड़कर जाना पड़ रहा है | बुढ़ापे की यन्त्रणा भी कुछ कम नहीं होती | शरीर व इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं किन्तु मन में लालसा समाप्त नहीं होती | और उस समय स्वयं को असहाय अवस्था में पाकर मृत्युतुल्य कष्ट होता है | व्याधि तो कष्टमय होती ही है | अतः इन चारों के दोषों को बारम्बार स्मरण करके देह के अभिमान से रहित हो जाना भी वैराग्य ही है |

वास्तव में तो एक चेतन आत्मा को छोड़कर प्रत्येक वस्तु में ये चारों ही दोष हैं | किसी भी वस्तु के जन्म अर्थात् प्राप्ति में कठिनाई होती है | बीमारी अर्थात् कोई ख़राबी हो जाने पर इलाज़ अर्थात् मरम्मत करानी पड़ती है | इतने पर भी उस पर बुढ़ापा आ ही जाता है – अर्थात् पुरानी पड़ जाती है | और अंत में उसकी मृत्यु हो जाती है – अर्थात् वह नष्ट हो जाती है | अतः प्रत्येक वस्तु में जन्म जरा व्याधि और मृत्यु का दोष देखकर उसमें प्रीति अथवा आसक्ति का अभाव हो जाना भी वैराग्य है | प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति अप्राप्ति आदि में समभाव रखना भी वैराग्य है | क्योंकि विषयों की प्राप्ति, उनका संरक्षण, उनका नाश सब ही तो कष्टप्रद हैं | श्रीमद्भागवत में कहा है “अर्थस्य साधने सिद्ध उत्कर्षे रक्षणे व्यये, नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ताभ्रमो नृणाम् |” (११/२३/१७)

इसी प्रकार योगदर्शन में भी कहा गया है “परिणामतापसंस्कारदु:खैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दु:खामेव सर्वं विवेकिनः |” – परिणाम दुःख, ताप दुःख, संस्कार दुःख आदि दु:खों से मिश्रित होने के कारण विवेकी पुरुषों की दृष्टि में समस्त विषय सुख दुःख रूप ही हैं | गीता में कहा गया है “विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेSमृतोपमम् | परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||” (१८/३८) – विषय और इन्द्रियों के संयोग से जनित सुख भोग काल में तो अमृत के समान भासता है किन्तु परिणाम में विष के सदृश होता है |

अतः इस अपार संसार से मन हटाकर, इस लोक और परलोक के समस्त भोगों में वैराग्यवान होकर परमात्मा की प्राप्ति का प्रयत्न करना चाहिये | उस परमात्मा का ज्ञान हो जाना ही अटल समाधि या जीवन्मुक्त की अवस्था है | अतः विषयों की असारता, अस्थिरता और दुःखरूपता से उनके असत्य का निश्चय कर एकमात्र परमात्मतत्व को ही सर्वाधिष्ठान, पूर्णानन्दधन और सत्पदार्थ समझ कर श्रद्धा भक्ति और वैराग्यपूर्वक निरन्तर उसी का ध्यान करते रहने से अविद्या, आसक्ति और सब प्रकार के क्लेशों का तथा पाप और सम्पूर्ण दु:खों का सर्वथा अभाव हो जाता है | यही वैराग्य है | इसी से परम शान्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है |

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मेरी बातें

मिल कर बह लें साथ साथ ||

आओ जी लें साथ साथ, कुछ कह लें सुन लें साथ साथ |
हम दोनों सागर की दो लहरें, मिल कर बह लें साथ साथ ||
माना हम थे अनजान, मगर अब बने एक पथ के राही
एकाकीपन का भार चलो अब हल्का कर दें हम राही |
कुछ पल हैं हँसने के, इनको हम मिलकर जी लें साथ साथ
हम दोनों सागर की दो लहरें, मिल कर बह लें साथ साथ ||
उल्लासों की सारी निधियाँ आओ लय कर लें अपने में
और मधुर प्यार से करुणा की कुछ बूँदें भर लें अपने में |
स्नेहों के चुम्बन से एक दूजे को हम रंग लें साथ साथ
हम दोनों सागर की दो लहरें, मिल कर बह लें साथ साथ ||
जग के उपवन में जितनी ये वासन्ती शोभा फैल रही
पतझर के आते ही प्रियतम सारी सुषमा मुरझाएगी |
मुरझाना शाश्वत है, तो क्यों ना मिलकर खिल लें साथ साथ
हम दोनों सागर की दो लहरें, मिल कर बह लें साथ साथ ||

मनुहार

मनचाहे इठलाती रजनी में मीठी मनुहार करूँ |
तुम्हें रिझाने हित सगरी रैना पायल झनकार करूँ ||
है मुखर बहुत मेरी पायल, विरही मन भी सुन थिरक उठे |
तुम भी थिरको संग मेरे और मैं संयम से लयकार करूँ ||
चन्द्रकिरण संग तुम आए ऊषा के संग फिर जाओगे |
तुम रुक जाओ इसीलिये तो ऊषा का सत्कार करूँ ||
रजनी चंदा को रोक रही मलयानिल का लेकर सौरभ |
मैं भी अंगों में मलय गंध भर सारी रात विहार करूँ ||
अनुराग बिना तुम क्या जानो जीवन का घोर विराग भला |
बस यही तुम्हें समझाने हित मैं ता थेई थेई ततकार करूँ ||

गीता की समतामूलक दृष्टि

केवल भारत में ही नहीं, अपितु संसार भर में साम्यवाद चर्चा का विषय सदा ही रहा है | जन साधारण के अनुसार हर बात में समानता का भाव, हर प्राणी में समानता का भाव ही साम्यवाद है | और यदि व्यक्ति इस प्रकार की समतामूलक दृष्टि विकसित कर ले तो समाज में समस्त प्रकार के दुराचार, व्यभिचार आदि स्वत: ही समाप्त हो जाएँ और समाज एक स्वस्थ समाज बन जाए | किन्तु यदि विचारपूर्वक देखा जाए तो प्रतीत होता है कि इस संसार में, जहाँ हर ओर विषमता ही विषमता है – व्यवहार में समानता हो ही नहीं सकती, और ऐसा सोचना या ऐसा प्रयत्न करना ही व्यर्थ है कि प्रत्येक प्राणी में प्रत्येक व्यवहार में समानता हो | इस स्थावर जंगम में न तो सबके शरीर और रूप एक समान हैं, न बुद्धि, न बल, न ही स्वभाव और न ही गुणों में समानता है | अपने अपने स्वरूप, अपने अपने शरीर, अपने अपने स्वभाव गुण तथा बुद्धि व बल की सामर्थ्य के अनुसार ही हर किसी का व्यवहार होता है | ऐसी स्थिति में अलग अलग देश, काल, पात्र और पदार्थों में समानता का भाव असम्भव है | वास्तव में तो साम्यवाद का प्रमुख स्रोत भारतीय ऋषियों और मनीषियों की ही वाणी है जिसके अनुसार जीवन्मुक्त का प्रधान लक्षण ही समता है | यही सर्वोच्च साम्यवाद है, यही सच्ची एकता है, तथा यही उस परमेश्वर का स्वरूप भी है | ईशोपनिषद में कहा गया है “यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति, सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते | यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानत:, तत्र को मोह: क: शोक एकत्वमनुपश्यत: |” (६,७) – जो समस्त भूतों को आत्मा में ही देखता है तथा आत्मा को समस्त भूतों में देखता है वह किसी से भी घृणा नहीं करता | तत्ववेत्ता पुरुष के लिये जिस काल में सम्पूर्ण भूत प्राणी आत्मा ही हो जाते हैं, अर्थात् जब प्राणी सबको आत्मा ही समझने लगता है तब उस एकत्व को देखने वाले के लिये कहाँ शोक, कहाँ मोह ? ऋग्वेद के इस कथन में कितनी उदात्त भावना है “समानी व आकृति: समाना हृदयानि व:, समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति |” (१०/१९/१४) इसी प्रकार अथर्ववेद में “जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणां पृथिवी यथौकसाम्, सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनु: अनपस्फुरन्ती |” (१२/१/४५)

एक राष्ट्र एक परिवार की कल्पना – यही है वास्तविक साम्यवाद, यही है वास्तविक एकता | इस प्रकार शास्त्र की मर्यादा के अनुसार भगवत प्रीत्यर्थ या लोकसंग्रह की भावना से मोह और स्वार्थ से रहित होकर, न्याययुक्त विषमता का व्यवहार करते हुए भी सबमें उपाधिदोष से रहित ब्रह्म को समान भाव से देखना, तथा समस्त विकारों से रहित होकर समस्त द्वंद्वों में सर्वदा समतायुक्त रहना ही यथार्थ साम्यवाद है | यही परम कल्याण – परमात्मतत्व की प्राप्ति का साधन है | आज जिस साम्यवाद का हम ढोल पीट रहे हैं, जिस अनेकता में एकता के लिये रात दिन नारेबाज़ी कर रहे हैं – उस साम्यवाद में, उस एकता में ईश्वर अथवा एकता तो कहीं है नहीं | जिस धर्मनिरेपेक्षता पर रात दिन गरमागरम बहसें होती रहती हैं उसमें धर्म का नितान्त अभाव होकर मात्र सम्प्रदायवाद का महत्व है | स्वार्थमूलक होने के कारण आज का साम्यवाद हिंसामय हो गया है – भले ही वह हिंसा कायिक हो, मानसिक हो अथवा वाचिक हो | साम्यवाद के नाम पर राजनीति से प्रेरित और राजनेताओं द्वारा संचालित समितियों का गठन हो जाता है जो कागज़ों पर साम्यवाद के नोट्स बनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती हैं | इन समितियों का हर सदस्य साम्यवाद पर चर्चा पर मात्र अपना ही अधिकार समझता है, भले ही अपने उस अधिकार की प्राप्ति के लिये उसे अपने विपक्षी सदस्य अथवा दल को साम दाम दण्ड भेद किसी भी प्रकार से परास्त करना पड़े | अर्थात् अपने दल के विचारों पर अभिमान और दूसरों का अनादर इस साम्यवाद का प्रमुख अंग हो गया है | यह साम्यवाद का नारा आजकल की दलगत राजनीति का एक प्रमुख नारा बनकर रह गया है और हर दल इस नारे से अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगा हुआ है |

आज के साम्यवाद की परिभाषा यह तो है कि सबको समान भोजन मिले, समान शिक्षा मिले, स्वास्थ्य के क्षेत्र में सबको समान सुविधाएँ प्राप्त हों, कोई भूखा नंगा न रहे, किसी को अस्पृश्य न समझा जाए, लिंगभेद न किया जाए | किन्तु चारों ओर दृष्टिपात करते हैं तो यही प्रतीत होता है कि यह सब साम्यवाद का नारा लगाने वालों का दिखावा और स्वयं को दूसरों से महान सिद्ध करने का उपाय मात्र ही है, आन्तरिक भेद भाव को दूर करने का प्रयत्न कोई भी नहीं कर रहा | इस सबका कारण यही है कि आज व्यक्ति के जीवन में तत्वज्ञान की अपेक्षा भौतिक सुखों का महत्व अधिक है | जबकि श्रुतिसम्मत साम्यवाद तत्वज्ञान और ईश्वरप्राप्ति के लिये किया गया एक उपाय है | जिसमें राग-द्वेष, मान-अपमान, लाभ-हानि, जय-पराजय, शत्रु-मित्र, निंदा-स्तुति, सुख-दु:ख जैसे द्वंद्वों के लिये कोई स्थान नहीं है | मनुष्य वाराम्बार इन द्वंद्वों के फेर में पड़ेगा, स्वभाव है उसका, किन्तु इनसे बाहर निकलने का प्रयास भी उसे ही करना होगा | शास्त्रसम्मत साम्यवाद में न अहंकार है, न ममता मोह, और न ही लोभ, यदि कुछ है तो वह है मात्र कल्याण प्राप्ति की वह उदात्त भावना जिसके रहते सबमें स्वत: ही समभाव बन जाता है | जहाँ कायिक, वाचिक या मानसिक किसी प्रकार भी किसी का कोई अहित हो ही नहीं सकता, क्योंकि भौतिक सुख या स्वार्थ की कोई भावना ही वहाँ नहीं रहती | वही साम्यवाद गीता को मान्य है | “सह वीर्यं करवावहे” तथा “सं वो मनांसि जानताम्” की उदात्त भावना यही है | सबमें इस प्रकार का समभाव रखने वाले व्यक्ति को गीता में योगी कहा गया है “सर्वभूतस्थामत्मानं सर्वभूतानि चात्मनि, ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: |” (६/२९) – योग द्वारा स्वयं को वश में करने वाला योगी क्योंकि जीवमात्र में समदर्शी हो जाता है इसलिये स्वयं को प्राणिमात्र में तथा प्राणिमात्र के दु:ख को स्वयं में अनुभव करता है | ऐसा योगी सबके साथ यथायोग्य सद्व्यवहार करता हुआ नित्य निरन्तर सभी में अपने स्वरूपभूत एक ही अखण्ड चेतन आत्मा को देखता है | यही समभाव से देखना है | जैसे वायु, तेज, जल और पृथिवी आकाश से ही उत्पन्न हैं, आकाश ही उनका परम आधार है, वे सब आकाश के ही एक अंश में स्थित हैं, और आकाश ही उन सबमें व्याप्त है, उसी प्रकार समस्त भूत आत्मा से ही उत्पन्न हैं, आत्मा ही उनका परम आधार है, वे सब आत्मा में ही स्थित हैं, और आत्मा ही उन सबमें व्याप्त है | इस प्रकार एकमात्र सर्वव्यापी अनन्त चेतन आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है इस प्रकार की समानता ही सब भूतों में आत्मा को देखना और सब भूतों को आत्मा में देखना है | यह सोचना कि समस्त क्रियाएँ मेरी ही कल्पना हैं और मैं परमात्मा से सर्वथा अभिन्न हूँ – समस्त जगत को आत्ममय देखना है |

इस प्रकार समता का सम्बन्ध प्रधानतया आन्तरिक भावों से है, सर्वत्र समदर्शन से है – समवर्तन से नहीं | इस समता का रहस्य इतना गूढ़ है कि कि क्रिया और व्यवहार में भेद रहते हुए भी इसमें कोई बाधा नहीं आने पाती | देश काल जाति और पदार्थों की भिन्नता के कारण बाह्य व्यवहार में भिन्नता तो न्यायसंगत और आवश्यक है | उदाहरण के लिये एक व्यक्ति बहुत सुखी है और एक व्यक्ति बहुत दु:खी | निश्चित रूप से दु:खी व्यक्ति का ही दुःख दूर करने का प्रयास किया जाएगा, सुखी तो सुखी है ही | ऐसे में व्यवहार में विषमता होनी स्वाभाविक है | किन्तु इस विषमता से वास्तविक समता में कोई बाधा नहीं आती | अर्थात् आपत्तिकाल में देश काल जाति और कुटुम्ब का अभिमान त्याग कर सबकी समभाव से सेवा करना ही वास्तविक साम्यवाद है | मोह, स्वार्थ अथवा आसक्तिवश देश काल पदार्थ जाती आदि में यदि विषमता का व्यवहार होता है तो वही वास्तविक वैषम्य है |

जो सर्वत्र समदृष्टि है, व्यवहार में अपना पराया होते हुए भी जो सर्वत्र समबुद्धि रहता है, जिसका समष्टिरूप समस्त संसार में आत्मभाव है वही सच्चा साम्यवादी है | गीता में कहा गया है “इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:, निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता: |” (५/१९) – समभाव में स्थित मन वाले जीवित अवस्था में ही सृष्टि-विजय कर लेते हैं, अर्थात् मुक्त हो जाते हैं | क्योंकि ब्रह्म पक्षपातरहित तथा समदर्शी है, इसलिये उसका अनुकरण करने वाले उसी में स्थित होते हैं |

तत्वज्ञानी सिद्ध पुरुषों का विषमभाव सर्वथा नष्ट हो जाता है | उनकी दृष्टि में सच्चिदानन्दधन परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी की सत्ता नहीं रहती | इसीलिये उनका सर्वत्र समभाव हो जाता है | सबके साथ एक सा व्यवहार तो कोई कर ही नहीं सकता, उसी प्रकार जैसे मनुष्य अपने हर अंग से समान कार्य नहीं कर सकता | किन्तु हर अंग में उसका आत्मभाव अवश्य रहता है | प्रत्येक अंग के सुख दुःख का अनुभव उसे समान भाव से होता है | प्रत्येक अंग से उसका स्नेह समान होता है | उसी प्रकार व्यवहार भेद होने पर भी ज्ञानी पुरुष का आत्मभाव और प्रेम सर्वत्र समान रहता है | इसीलिये जैसे किसी भी अंग में चोट लगने पर या उसकी संभावना होने पर मनुष्य उसके प्रतीकार की चेष्टा करता है उसी प्रकार समतावादी ज्ञानी पुरुष किसी भी जीव अथवा समुदाय पर विपत्ति पड़ने पर उसके प्रतीकार की यथायोग्य चेष्टा करता है | यही कारण है कि इस प्रकार से जिनकी सर्वत्र सम बुद्धि हो जाती है वे इसी जन्म में संसार को जीतकर जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं |

सत्व, रज, तम इन्हीं तीन गुणों में राग द्वेष मोहादि समस्त दोष समाहित हैं | समदृष्टि वाला ज्ञानी इन तीनों ही गुणों से रहित हो जाता है “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते | इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता: ||” (१०/८) – इस समस्त जगत को ईश्वर से व्याप्त देखने वाला पुरुष ही समतावादी होता है “ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् |” वास्तव में समता ही सर्वोच्च न्याय है, न्याय ही सत्य है, सत्य परमात्मा का स्वरूप है, और जहाँ परमात्मा है वहाँ नास्तिकता, अधर्म, काम, क्रोध, लोभ, मोह, कपट, हिंसा आदि दुर्गुणों के लिये स्थान ही नहीं रहता | वहाँ सम्पूर्ण अनर्थों का सर्वथा अभाव होकर स्वत: ही सद्गुणों का विकास हो जाता है | समता अमृत है तो विषमता विष | सर्वत्र परमात्मबुद्धि होने के कारण अत्यन्त विलक्षण स्वभाव वाले मित्र, शत्रु, सज्जन पापी आदि के आचरण स्वभाव व्यवहार आदि के भेद का जिस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जिसकी बुद्धि में किसी समय किसी भी परिस्थिति में, किसी भी निमित्त से भेद भाव नहीं आता, जो शत्रु से द्वेष नहीं रखता न ही मित्र से पक्षपात करता है, जो मान में उन्मत्त नहीं होता और अपमान से कर्तव्य विमुख नहीं होता, शीतोष्ण सुख दुःख सभी अवस्थाओं में समान रहता है वही समबुद्धि होता है | उसके मन में समस्त भूतों के प्रति स्वार्थ रहित स्वाभाविक मैत्री व दया का भाव होता है उसी प्रकार जैसे एक वृक्ष उस व्यक्ति को तो अपनी छाया और फल फूल प्रदान करता ही है जो उसे सींचता है, किन्तु उस व्यक्ति को भी प्रदान करता है जो उसे काटता है, उसके लिये दोनों समान होते हैं | वह व्यक्ति पूर्णकाम हो जाता है | वह प्रत्येक अवस्था में सन्तुष्ट रहता है | यही कारण है कि उसमें किसी भी प्रकार के दुर्गुण अथवा दुराचार की संभावना नहीं रहती |

साधारणत: मनुष्यों की स्थिति प्रकृति के कार्यरूप स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों में ही रहती है, अत: वे “स्वस्थ” नहीं होते, “प्रकृतिस्थ” होते हैं | इसीलिये वे प्रकृति के गुणों को भोगते हैं | अत: वे सुख-दुःख शत्रु-मित्र में समान नहीं रह सकते | गुणातीत पुरुष का प्रकृति और उसके कार्य से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता अत: वह “स्वस्थ” होता है | उसका सर्वत्र समभाव होता है | समभाव पुरुष की लोष्ट – गोबर मिट्टी से बना पिण्ड, अश्म – पत्थर और काँचन – सुवर्ण किसी में भी ग्राह्य अथवा त्याज्य बुद्धि नहीं होती | निंदा स्तुति सबमें समभाव रहता है | यही है यथार्थ साम्यवाद और इसी समतामूलक दृष्टि से मनुष्य अपने लिये तथा अन्यों के लिये भी कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है |

इस प्रकार गीता का साम्यवाद सर्वत्र ईश्वर के दर्शन कराता है | इसमें पग पग पर धर्म की पुष्टि तथा अहिंसा का प्रतिपादन होता है | स्वार्थ का इसमें लेश भी नहीं है | इसमें कहीं भी आन्तरिक भेद न होकर सर्वत्र आत्मा को अभिन्न देखने की शिक्षा है | इसका लक्ष्य है अभिमानशून्यता के द्वारा आध्यात्मिक सुख का अनुभव करके ईश्वर को प्राप्त करना | यदि आज के साम्यवादी गीता के समतामूलक सिद्धांत का एक अंश भी अपना लें तो ऊँच-नीच, छुआ-छूत, अपना-पराया जैसे समस्त झगड़े बहुत सीमा तक समाप्त हो जाएँ | प्राणिमात्र सुख व शान्ति का जीवन व्यतीत कर सके तथा हमारे मनीषियों की एक समान मन व वाणी होने की कामना पूर्ण हो जाए | इसी समतामूलक दृष्टि से विश्व में शान्ति सम्भव है | जब तक हमारे मनों में ईर्ष्या लोभ द्वेष आदि विषमताएँ भरी पड़ी हैं तब तक हम नि:शस्त्रीकरण पर, आतंकवाद पर, सीमाओं पर युद्ध विराम आदि पर कितनी भी चर्चाएँ कर लें, अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते | हमें अपने भीतर के सभी द्वंद्वों को शांत करना होगा, सभी विद्रोही भावों का दमन करना होगा, और अपनी उच्चतम आत्मा को जगाना होगा, तभी विश्व शान्ति सम्भव है | गीता सम्मत समता का यही लक्ष्य है |

मेरी बातें

कितनी निष्ठुर है यह प्यास

अवसर आने पर पतझर ही बन जाता मधुमय मधुमास
और प्रकृति का कण कण मिलकर बनता बहुरंगी आकाश |
लेकिन कितने तार हैं टूटे मन की वीणा के अब तक
जग को इससे क्या, जग को तो लगता यह केवल परिहास ||
कितनी ही पत्थर की प्रतिमाएँ पूजो और शीश नवाओ
या कर लो ज्योतित इस मन को, आशाओं के दीप जलाओ |
हो कितनी ही वाणी रसमय, हो कितना ही हृदय भावमय
यह निष्ठुर जग क्या समझेगा इसमें भरा हुआ उल्लास ||
आज यहाँ हर जीने वाला जीने का प्रयास है करता
किन्तु सतत हारों में और अभावों में है प्रतिपल मरता |
कितने ही तुम नीड़ बनाओ, कितने ही तुम स्वप्न सजाओ
निरवंशी ही रह जाएगी हर प्यारी सी कोमल आस ||
आँसू का ही बोझ उठाया यहाँ हरेक हँसने वाले ने
और गहन सन्नाटे को है चीरा हर सोने वाले ने |
कितनी ही मदिरा छलकाओ, कितना ही अमृत बरसाओ
हर प्याला निज उम्र पी रहा, कितनी निष्ठुर है यह प्यास ||

मन की पीड़ा

पड़ी हुई बीमार उम्र थी, प्यार ने थामी उसकी ऊँगली
इसीलिये वेश्या बनने से बच गई मेरे मन की पीड़ा ||
जीवन एक पहेली, जिसको हमने केवल इतना समझा
इसकी व्यथा कथा को हर कहने सुनने वाला पछताता |
किन्तु तर्क को त्याग, भावना से मैंने इसको सुलझाया
इसीलिये अनबूझ पहेली को शिशु जैसा सहज बनाया ||
मानव मन तो ऋतुओं के सम चंचल सदा बना रहता है
अभी रुदन है, अभी हास्य है, हर पल परिवर्तन रहता है |
पर ममता ने चंचल तितली को है देखो स्नेह दे दिया
इसी हेतु इस वन उपवन में पुष्पों का यह नृत्य हो गया ||
हर घर आँगन रंगमंच है, और हर श्वास बनी कठपुतली
प्रेम डोर में बंधा नाचता बादल और थिरकती बिजली |
हो विश्वास या न हो किसी को, पर मेरी ये अटल धारणा
प्यार ने ही बंजर धरती में ये हरियाला बाग़ उगाया ||

त्याग

त्याग

श्रावण मास का आरम्भ हो चुका है २३ जुलाई को | उससे पहले दिन गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु पूजा का कार्यक्रम था जिसमें पूजा के बाद रात्रि भोज का आयोजन भी था | भोज में छेने की मिठाई रखी गयी थी | मेरी एक मित्र ने चार अदद छेने की मिठाई के अपनी प्लेट में रख लिये, ठण्डी साँस के साथ यह कहते हुए कि “आज तो जी भरके खा ही लूँ, कल से तो फिर पूरे सावन के लिये छेने की मिठाई छोड़ रही हूँ |” कारण पूछने पर बताया कि उनके बेटे का कहीं कुछ काम बनना है इसलिये भगवान को मनाने के लिये ऐसा संकल्प लिया है उन्होंने | और उनके साथ साथ उनके पतिदेव ने पूरे माह मदिरात्याग का संकल्प ले लिया | लेकिन जिस प्रकार ठण्डी साँस लेकर उन्होंने यह बात बताई उससे स्पष्ट था कि उन्हें छेने की मिठाई का एक माह के लिये त्याग करते हुए दुःख हो रहा था, क्योंकि उनकी सबसे अधिक मनपसंद मिठाई है और उनके पति जब तक रात को दो तीन पैग न लगा लें उन्हें नींद ही नहीं आती | इसी और इसी तरह की कुछ अन्य घटनाओं ने मुझे यह लेख लिखने को बाध्य किया | एक और मेरे परिचित हैं | उनके साथ कुछ समय कार्य किया | उन दिनों नवरात्र चल रहे थे | पता लगा उन्होंने चाय का त्याग किया हुआ था नवरात्र भर के लिये | ऑफिस में सबके लिये चाय आती थी और हर बार वे उल्टी गिनती करते थे “बस आज से सात दिन रह गए, आज से पाँच दिन रह गए…” कहने का अभिप्राय यह कि चाय का उन्होंने त्याग अवश्य कर दिया था पर मन उनका चाय में ही पड़ा रहता था हर समय | प्राय: ऐसा भी देखा जाता है कि अपनी किसी मनोकामना की सिद्धि के लिये किसी स्थान पर जाकर किसी सर्वाधिक प्रिय वस्तु का त्याग करने का भी संकल्प ले लेते हैं और फिर जीवन पर्यंत उस वस्तु की ओर देखते भी नहीं | बहुत से लोग अपनी सारी धन संपत्ति त्याग कर सन्यासी हो जाते हैं | किन्हीं कारणोंवश कुछ लोग कुछ पारम्परिक रीत रिवाजों का भी परित्याग कर देते हैं | अनेक प्रकारों से त्याग का आचरण संसार में लोग करते हैं | किन्तु क्या यही है वास्तविक त्याग ? त्याग की मूलभूत आत्मा क्या है ? देखा जाए तो त्याग का प्रचलित रूप तो यही है | “अन्धतम: प्रविशन्ति येSविद्यामुपासते, ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रता:” (ईशो. ९) – जो अविद्या की उपासना करते हैं वे अन्धकार में प्रवेश करते हैं, और जो विद्या में रत हैं वे उससे भी अधिक अन्धकार में रत हैं | इस प्रकार का वाचिक ज्ञानी निर्भय होकर विषय भोगों में प्रवृत्त हो जाता है | ज्ञान के नाम पर महा अज्ञान ग्रहण कर लिया जाता है | अतः यथार्थ कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को दृढ़ निश्चयपूर्वक मन वचन और कर्म पर संयम करके ज्ञान का अर्जन करना चाहिये | त्याग इस संयम का ही दूसरा नाम है | कहा भी गया है “ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्, तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् |” – ईश्वर से व्याप्त इस संसार में जो कुछ भी है उसका त्याग की भावना से – निर्लिप्त भाव से – उपभोग करना चाहिये, किसी अन्य के धन की इच्छा अथवा लालच नहीं करना चाहिये | त्यागसहित भोग की ऐसी उदात्त भावना विश्व की किसी अन्य संस्कृति में नहीं मिलेगी | यह सच्चा त्याग ही तो हमारा गौरव है और यही परमात्मा की प्राप्ति का प्रमुख साधन भी है | ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी अनासक्त रहता है | उसे हर स्थिति में संतोष रहता है | प्रारब्धवश अनिच्छा या परेच्छा से जो कुछ भी लाभ-हानि सुख-दुःख उसे प्राप्त होता है उस सबको ईश्वर का दयापूर्ण विधान समझ सदा समान भाव से सन्तुष्ट, निर्विकार एवं शान्त रहता है | यही कारण है कि कर्म करके भी वह व्यक्ति उनमें बँधता नहीं | “यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर:, सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते |” (गीता ४/२२) वास्तव में तो “सब कुछ ईश्वर का है” ऐसा सोचते ही त्याग स्वत: ही आ गया | जब सब कुछ परमात्मा का ही है तो फिर उसे अपना समझ कर भोगने की बात ही कहाँ रह गई ? और जिसका इस प्रकार का “अहंभाव” समाप्त हो जाता है वह स्वयम् ईश्वर का हो जाता है | और जो परमात्मा का हो जाता है उसके पास भोगने को फिर शेष ही क्या रहा जाता है ? जो व्यक्ति कहता है कि उसने अमुक वस्तु का त्याग कर दिया वह त्याग कर ही नहीं सकता, क्योंकि वास्तव में वह उस वस्तु पर अपना अधिकार मानता है | उसे ईश्वर की वस्तु या उसमें ईश्वर का वास नहीं मानता | त्याग वही व्यक्ति कर सकता है जो कह सके कि मेरा कुछ है ही नहीं तो मैं त्याग करूँ भी तो किस वस्तु का ? त्याग करने के लिये मेरा कुछ होना भी तो चाहिये | अतः त्याग कुछ छोड़ने से नहीं होता | त्याग उस सत्य के अनुभव से होता है कि जो कुछ है सब परमात्मा का है और सबमें परमात्मा विद्यमान है | जो मान लेता है कि जीवन के समस्त भोग, जीवन के समस्त रस, जीवन का समस्त आनन्द, जीवन का समस्त अमृत उस ईश्वर का है तो फिर न कुछ भोगने को शेष रहता है और न ही त्याग करने को, क्योंकि फिर तो वह व्यक्ति भी स्वयं परमात्मरूप हो जाता है | और उस स्थिति में वह कुछ करता नहीं – न त्याग न ही भोग, उस स्थिति में तो जो कुछ होता है वह प्रारब्धवश अनिच्छा या परेच्छा से घटित होता है |

जो लोग सांसारिक भोग विलास को ही सच्चा सुख समझकर केवल भौतिक उन्नति की चेष्टा में लगे रहते हैं वे इस परम सत्य को भूल जाते हैं कि विषयेन्द्रियजनित भौतिक सुख नाशवान हैं, क्षणिक हैं तथा परिणाम में सर्वथा दुःखरूप हैं | “परिणामतापसंस्कारदुखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च सर्वं विवेकिन: |” (योगदर्शन – साधनपाद १५) किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि मनुष्य कर्म का ही त्याग कर दे | वास्तव में देहधारी के लिये कर्मों का त्याग असम्भव है, अतः कर्मफल का त्याग ही वास्तवक त्याग है | “त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रयः, कर्मण्यभिप्रवृत्तोSपि नैव किंचित्करोति स: |” (गीता ४/२०) – जो कर्मफल में आसक्ति को त्याग कर नित्य तृप्त रहता है तथा जिसका सुख किसी वासना की पूर्ति पर आश्रित नहीं है वह प्रत्येक कार्य में प्रवृत्त होकर भी निष्कर्म रहता है | तथा “न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:, यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते |” (१८/११) और “श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते, ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् |” (१२/१२) मर्म को न जानकर किये हुए अभ्यास से परोक्ष ज्ञान – श्रवण व पठन से परमात्मा के स्वरूप का अनुमान – श्रेष्ठ है, परोक्ष ज्ञान से ईश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है, तथा ध्यान से भी श्रेष्ठ है समस्त कर्मों के फल को भगवदर्पण करना | क्योंकि भगवदर्पण कर्म करते समय पुरुष का चित्त कर्म करने के साथ साथ ईश्वर में भी लगा रहता है | यही कारण है कि गीता में मात्र ध्यान की अपेक्षा कर्मफल के त्याग को श्रेष्ठ बताया गया है | और इस प्रकार के त्याग से परम शान्ति प्राप्त होती है | क्योंकि अच्छा या बुरा जो भी फल मनुष्य को अपने कर्मों का प्राप्त होता है वह उसे ईश्वर की कृपा समझकर सहर्ष स्वीकार कर लेता है – बिना किसी सुख अथवा दुःख का अनुभव किये |

वस्तुतः कर्तव्य का पालन और अकर्तव्य का त्याग ही सच्चा त्याग है – विशेष रूप से गृहस्थ धर्म का पालन करने वालों के लिये तो यही सत्य है | प्राय: लोग समझते हैं कि त्याग केवल सन्यासियों का ही धर्म है | परन्तु यह धारणा नितान्त अशुद्ध है | गृहस्थाश्रम में रहता हुआ भी मनुष्य त्याग के द्वारा परमात्मा को प्राप्त कर सकता है | हमारे वेदों, पुराणों तथा इतिहास ग्रंथों में ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं जहाँ साधारण गृहस्थी से लेकर बड़े बड़े राजा महाराजाओं तक ने त्याग के द्वार ईश्वर के दर्शन प्राप्त किये हैं | अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि ये कर्तव्य और अकर्तव्य कर्म क्या हैं ? आत्मोन्नति के लिये किये गए प्रयास कर्तव्य कर्म हैं, तथा आत्मोन्नति में जो कर्म बाधक बनते हैं वे अकर्तव्य हैं | चोरी, व्यभिचार, झूठ, कपट, हिंसा, अभक्ष्य भोजन, प्रमाद, आसक्ति, द्वेष, लोभ, भय, दम्भ, पराधीनता, दीर्घसूत्रता, अकर्मण्यता, माता पिता व गुरुजनों की अवहेलना, दूसरों की निन्दा स्तुति, प्रतिष्ठा की कामना – ये सभी आत्मोन्नति में बाधक होने के कारण निषिद्ध कर्म हैं, अकर्तव्य हैं |

निषिद्ध कर्मों के साथ साथ काम्य कर्मों का भी त्याग आवश्यक है | फल प्राप्ति के उद्देश्य से अथवा संकट आदि की निवृत्ति के उद्देश्य से किये गए उपासना आदि सकाम कर्म हैं | मोक्ष अथवा परमात्मतत्व की कामना करने वाले व्यक्ति को इनका भी त्याग करना चाहिये | किन्तु यदि इस प्रकार के कर्मों में लोक संग्रह की भावना निहित हो तो स्वार्थ त्याग कर ये कर्म अवश्य करने चाहियें | किन्तु इस प्रकार के सकाम कर्मों को करते हुए यह ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि इनके करने से किसी को कष्ट न पहुँचता हो | यदि इस प्रकार के कर्मों से किसी को कष्ट पहुँचता हो अथवा उपासना की परम्परा में किसी प्रकार की बाधा आती हो तब तो ऐसे कर्मों का त्याग अवश्य ही करना चाहिये | इसी प्रकार कर्मों में आलस्य तथा फल की इच्छा और तृष्णा का सर्वथा त्याग करना चाहिये | मान, प्रतिष्ठा, धन आदि जो अनित्य पदार्थ प्रारब्धवश प्राप्त हुए हों उनके बढ़ने की इच्छा आत्मकल्याण में बाधक होती है अतः उस इच्छा का त्याग करना चाहिये | यही इच्छा तृष्णा कहलाती है | गृहस्थी को गृहस्थ धर्म के निर्वाह के लिये अर्थ की आवश्यकता होती है, क्योंकि न केवल उसका अपना परिवार, अपितु शेष तीनों – ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम तथा समस्त जीवित प्राणियों के भरण पोषण का भार उसी पर होता है | अतः इस हेतु जितना धन चाहिये, उससे अधिक की कामना तृष्णा है | उस तृष्णा का त्याग करना चाहिये, न कि धनोपार्जन की भावना का | यदि मनुष्य धनोपार्जन की भावना का त्याग करके अकर्मण्य होकर बैठा रहा तो अपने धर्म का पालन किस प्रकार करेगा ? मनुष्य को चाहिये कि वह जीविकोपार्जन को अपना कर्तव्य समझे तथा लाभ हानि को समान समझते हुए उत्साहपूर्वक कर्म करता रहे | इस प्रकार से कर्म करने वाले पुरुष का कर्म लोभ तथा ईर्ष्या द्वेष से रहित होता है, अतः उसमें किसी प्रकार का दोष नहीं आने पाता |

अपने सुख के लिये किसी से भी धन आदि पदार्थों की कामना करना, अथवा यह कामना करना कि कोई हमारी सेवा करे, अथवा किसी प्रकार भी दूसरों से अपना स्वार्थ सिद्ध करने की मन में इच्छा रखना – इन सभी भावों का त्याग आवश्यक है | हो सकता है कि कभी ऐसा अवसर उपस्थित हो जाए कि किसी की सेवा या किसी के द्वारा भेंट आदि के रूप में प्रदत्त पदार्थों को स्वीकार न करने से किसी को कष्ट पहुँचता हो अथवा लोक मर्यादा भंग होती हो, तो उस अवसर पर स्वार्थ का त्याग करके केवल परहित के लिये उस सेवा अथवा भेंट आदि को स्वीकार कर लेना दोषयुक्त नहीं है | जैसे हमारा कोई मित्र हमें कोई भेंट देने की इच्छा रखता हो और इसमें उसे प्रसन्नता प्राप्त होती हो, अथबा हमारा पुत्र अपनी प्रसन्नता और कर्तव्य पालन के लिये सेवा करने की इच्छा रखता हो, तो या भेंट अथवा सेवा अवश्य स्वीकार कर लेनी चाहिये | क्योंकि इससे दूसरों को सुख प्राप्त होता है तथा लोक मर्यादा की रक्षा होती है |

समस्त कर्तव्य कर्मों में आसक्ति और फल की इच्छा का सर्वथा त्याग करना चाहिये | ईश्वर, माता पिता, गुरुजनों की सेवा व भक्ति, यज्ञ दान तप, अपने धर्मानुसार आजीविका का निर्वाह तथा शरीर सम्बन्धी खान पान और स्वच्छता आदि कर्तव्य कर्म हैं | इन सबमें आलस्य तथा समस्त कामनाओं का भी त्याग करना चाहिये | इस लोक और परलोक के समस्त भोगों को क्षणभंगुर, नाशवान तथा भगवान की भक्ति में बाधक मानकर किसी भी वस्तु की प्राप्ति के लिये ईश्वर से प्रार्थना नहीं करनी चाहिये | अपना अनिष्ट करने वालों के लिये भी मन में किसी प्रकार के अनिष्ट की कामना नहीं होनी चाहिये | ईश्वर की भक्ति करते हों तो उसका अभिमान नहीं होना चाहिये | गृहस्थी के लिये पञ्चमहायज्ञ नितान्त आवश्यक हैं, जो हैं देवयज्ञ अर्थात् अग्निहोत्र आदि, ऋषियज्ञ अर्थात् वेदपाठ, सन्ध्या, गायत्री आदि, पितृयज्ञ अर्थात् तर्पण आदि, मनुष्ययज्ञ अर्थात् अतिथि सेवा, और भूतयज्ञ अर्थात् बलिवैश्व | | इन सभी कर्मों का पालन निष्काम भाव से केवल लोकहित की कामना से करना चाहिये |

यदि समस्त पदार्थों व कर्मों में तृष्णा, फल की इच्छा, ममता तथा आसक्ति का सर्वथा त्याग कर भी दिया तो भी मनुष्य में सूक्ष्म वासना तथा त्याग रूपी कर्तव्य का अभिमान शेष रह जाता है | यदि इस अहंभाव तथा सूक्ष्म भावना का भी त्याग हो जाए तो ऐसा पुरुष विषयों का संसर्ग होने पर भी उनमें आसक्त नहीं होता | क्योंकि उसके निश्चय में परमात्मा के अतिरिक्त कुछ अन्य वस्तु शेष ही नहीं रह जाती | यह अन्तिम प्रकार का त्याग ही वैराग्य कहलाता है | ऐसा पुरुष शरीर सहित सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में वासना और अहंभाव को सर्वथा त्याग कर एक सच्चिदानन्दधन परमात्मा के स्वरूप में ही एकीभाव से नित्य निरन्तर दृढ़ स्थिति को प्राप्त कर पूर्ण परिपक्व अवस्था को प्राप्त होता है | यही वास्तव में सन्यासी कहलाता है – अर्थात् जो पूर्ण ज्ञान को प्राप्त हो चुका हो |

इस प्रकार त्याग का क्रमानुसार अभ्यास ही परमात्म प्राप्ति का एकमात्र साधन है | मन वाणी और शरीर से किसी को भी कष्ट न पहुँचाना, निंदा स्तुति मैथुन आदि का अभाव, तृष्णा का अभाव, इन्द्रियनिग्रह, ब्रह्मलोक टक्के समस्त पदार्थों में आसक्ति का अत्यंत अभाव, ममत्व बुद्धि – अर्थात यह मेरा है और यह पराया है – से संग्रह न करना, अहं – कर्तापन का अभिमान – का सर्वथा अभाव – ये सभी त्याग भावना के सोपान हैं | इस प्रकार के त्यागी मनुष्य का विषयों के साथ संसर्ग होने पर भी उनमें अनासक्ति बनी रहती है | उसका इस नाशवान अनित्य संसार से कुछ सम्बन्ध ही नहीं रहता | यद्यपि लोकदृष्टि से वह शरीर द्वारा कर्मरत रहता है तथा उसके कर्मों से संसार का हित ही होता है, किन्रू वह स्वयं में इस त्रिगुणमयी माया से सर्वथा अतीत हो जाता है | क्योंकि वह न तो गुणों के कार्यरूप में प्राप्त होने पर उनसे द्वेष करता है, और न ही उनसे निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है | उसका समस्त कर्मों में तथा कर्मफलों में समभाव हो जाता है | इस प्रकार अन्ततोगत्वा वह मनुष्य वैराग्य को प्राप्त हो जाता है | वह समस्त कर्म करता हुआ भी मन में वैराग्य का ही भाव रखता है “निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:, द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् |” (गीता १५/५) – नष्ट हो गया है मान और मोह जिनका, जीत लिया है आसक्ति रूप दोष को जिन्होंने, परमात्मा के स्वरूप में जिनकी निरन्तर स्थिति है, जिनकी कामनाएँ पूरी तरह नष्ट हो गई हैं, ऐसे सुख दुःख के द्वंद्वों से विमुक्त हुए ज्ञानी पुरुष ही उस अविनाशी परम पद को प्राप्त करते हैं | तम रज और सत्व तीनों गुणों के लक्षणों का वर्णन गीता में इस प्रकार बताया गया है :
“नियतस्य तु सन्यास: कर्मणो नोपपद्यते
मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तिते |
दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात् त्यजेत्
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् |
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन
संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्विको मत: |” (१८/७-९)
नियत कर्मों का त्याग करना उचित नहीं है | यह त्याग मोहवश अथवा आलस्यवश किया जाता है अतः यह तामस त्याग कहलाता है | यदि कोई मनुष्य कर्म को दुःखरूप मानकर शारीरिक कष्ट के भय से कर्मों का त्याग करता है तो वह राजस त्याग कहलाता है तथा उस त्याग का कोई फल नहीं प्राप्त होता | प्रत्येक कर्म को कर्तव्य कर्म मानकर उसमें अनासक्ति तथा फल की कामना का त्याग कर जो कर्म किये जाते हैं वही सात्विक त्याग कहलाता है | अर्थात कर्तव्य कर्मों का त्याग न करके उनमें आसक्ति और फल का त्याग ही सात्विक त्याग है |

अस्तु ! यह निश्चित है कि सात्विक त्याग द्वारा ही परमात्म की प्राप्ति होती है | त्याग का अभ्यास करके परिपक्व अवस्था को प्राप्त हुआ पुरुष इस क्षणभंगुर नाशवान संसार से उसी प्रकार कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता जिस प्रकार स्वप्न से जागा हुआ पुरुष स्वप्न के संसार से कोई सम्बन्ध नहीं रखता | ऐसा व्यक्ति शरीर से जो कुछ भी करता है उससे संसार का हित ही होता है, क्योंकि उसमें कामना, आसक्ति तथा कर्तृत्व का अभिमान न होने के कारण उसके समस्त आचरण लोक में प्रमाण स्वरूप माने जाते हैं | ऐसे पुरुषों के भाव से ही शास्त्र बनते हैं | वह पुरुष समस्त संसार को मृगतृष्णा के समान समझता है इसीलिये मान अपमान, निंदा स्तुति, हानि लाभ, हर्ष शोक सबमें समभाव हो जाता है |

मेरी बातें

आज अपने जीवन के ५८ वसन्त देखने के बाद ५९वें वर्ष में प्रविष्ट हुई हूँ | इस अवसर पर अत्यन्त स्नेहशील औए पूरी तरह से केयर करने वाले पति डॉ. दिनेश और प्यारी बिटिया स्वस्ति के साथ साथ ढेर सारे मित्रों ने भी हार्दिक शुभकामनाएँ दी हैं | उपहार भी भेंट किये हैं | सभी का बहुत बहुत धन्यवाद | पर इतने लोगों का प्यार और साथ मिलने के बाद भी न जाने क्यों पिताजी का अभाव हर पल खटकता रहता है | जब तक पिताजी जीवित थे मेरे पिता होने के साथ साथ मेरे मित्र और मार्गदर्शक भी थे | मेरे मुँह से बात निकलने से पहले ही समझ जाते थे क्या चाहती हूँ | ऐसी ऐसी बातें उनके साथ शेयर किया करती थी जैसी लड़कियाँ प्रायः अपनी माँ, बहनों या सहेलियों के साथ ही शेयर करना पसन्द करेंगी | यों तो उनकी याद हर पल बनी रहती है | पर अपना जन्मदिवस उनके बिना फीका लगता है | ये दोनों रचनाएँ उन्हें ही समर्पित है…

परिचय की यह शाश्वत परिणति

कितना था प्रगाढ़ वह परिचय, फिर क्यों उसकी ऐसी परिणति |
मुक्त हो चले सम्बन्धों से जैसे मनचाहा कोई अतिथि ||
तेरे मेरे इसके उसके सम्बन्धों से विचलित होता
कभी हर्ष में गुन गुन गाता, कभी क्षोभ से बेकल होता |
कहाँ गया वह हर्ष क्षोभ, यह कैसी बन बैठी है नियति ||
इसके हित था दिन भर थकता, उसके हित रातों को जगता
कभी इधर और कभी उधर वह मन के अश्व भगाता फिरता |
पर ना जाने कहाँ खो गए अश्व, कहाँ जा छिपा है वह अतिथि ||
परिचय का यह भ्रम बन्धन था बड़ा मधुर और बड़ा अनूठा
तब ही किसी अदृश्य शक्ति ने आकर वह भ्रम बन्धन तोड़ा |
और मिल गया सत्य सत्य में, परिचय की यह शाश्वत परिणति ||

बढ़ती जाती नई डगर पर

दिशाहीन मैं बढ़ती जाती ना जाने किस नई डगर पर |
है मंज़िल का ज्ञान न मुझको, बढ़ती जाती नई डगर पर ||
मग में घोर अँधेरा छाया, नहीं प्रकाश की कोई रेखा |
ठोकर खा पड़ डगमग करके गिर जाने का भय है खाता |
कैसे चलूँ न जानूँ, फिर भी बढ़ती जाती नई डगर पर ||
अनजाने में कहीं कोई दीवार जो मुझसे टकरा जाती
आहत हो मैं गिर जाती हूँ, सन्नाटे में चीख़ उभरती |
नहीं कोई पर सुन पाता, मैं बढ़ती जाती नई डगर पर ||
कितने आँधी तूफाँ आते, कितने बादल घोर गरजते
सागर की लहरों में भी हैं कितने अनगिन बल पड़ जाते |
शंकित व्याकुल मन से फिर भी बढ़ती जाती नई डगर पर ||
नहीं कोई जो दिशा बताए मुझको आज पकड़ कर उँगली
नहीं कोई जो दीप जलाए, मग में अँधियारी है कितनी |
दिशाहीन मैं एकाकी ही बढ़ती जाती नई डगर पर ||
मेरे मग का अँधियारा तुम दूर भगाते, दीप जलाते
और कभी फिर हाथ पकड़ कर मंज़िल की तुम राह दिखाते |
आज नहीं तुम साथ, अकेली बढ़ती जाती नई डगर पर ||