मेरी बातें

आज अपने जीवन के ५८ वसन्त देखने के बाद ५९वें वर्ष में प्रविष्ट हुई हूँ | इस अवसर पर अत्यन्त स्नेहशील औए पूरी तरह से केयर करने वाले पति डॉ. दिनेश और प्यारी बिटिया स्वस्ति के साथ साथ ढेर सारे मित्रों ने भी हार्दिक शुभकामनाएँ दी हैं | उपहार भी भेंट किये हैं | सभी का बहुत बहुत धन्यवाद | पर इतने लोगों का प्यार और साथ मिलने के बाद भी न जाने क्यों पिताजी का अभाव हर पल खटकता रहता है | जब तक पिताजी जीवित थे मेरे पिता होने के साथ साथ मेरे मित्र और मार्गदर्शक भी थे | मेरे मुँह से बात निकलने से पहले ही समझ जाते थे क्या चाहती हूँ | ऐसी ऐसी बातें उनके साथ शेयर किया करती थी जैसी लड़कियाँ प्रायः अपनी माँ, बहनों या सहेलियों के साथ ही शेयर करना पसन्द करेंगी | यों तो उनकी याद हर पल बनी रहती है | पर अपना जन्मदिवस उनके बिना फीका लगता है | ये दोनों रचनाएँ उन्हें ही समर्पित है…

परिचय की यह शाश्वत परिणति

कितना था प्रगाढ़ वह परिचय, फिर क्यों उसकी ऐसी परिणति |
मुक्त हो चले सम्बन्धों से जैसे मनचाहा कोई अतिथि ||
तेरे मेरे इसके उसके सम्बन्धों से विचलित होता
कभी हर्ष में गुन गुन गाता, कभी क्षोभ से बेकल होता |
कहाँ गया वह हर्ष क्षोभ, यह कैसी बन बैठी है नियति ||
इसके हित था दिन भर थकता, उसके हित रातों को जगता
कभी इधर और कभी उधर वह मन के अश्व भगाता फिरता |
पर ना जाने कहाँ खो गए अश्व, कहाँ जा छिपा है वह अतिथि ||
परिचय का यह भ्रम बन्धन था बड़ा मधुर और बड़ा अनूठा
तब ही किसी अदृश्य शक्ति ने आकर वह भ्रम बन्धन तोड़ा |
और मिल गया सत्य सत्य में, परिचय की यह शाश्वत परिणति ||

बढ़ती जाती नई डगर पर

दिशाहीन मैं बढ़ती जाती ना जाने किस नई डगर पर |
है मंज़िल का ज्ञान न मुझको, बढ़ती जाती नई डगर पर ||
मग में घोर अँधेरा छाया, नहीं प्रकाश की कोई रेखा |
ठोकर खा पड़ डगमग करके गिर जाने का भय है खाता |
कैसे चलूँ न जानूँ, फिर भी बढ़ती जाती नई डगर पर ||
अनजाने में कहीं कोई दीवार जो मुझसे टकरा जाती
आहत हो मैं गिर जाती हूँ, सन्नाटे में चीख़ उभरती |
नहीं कोई पर सुन पाता, मैं बढ़ती जाती नई डगर पर ||
कितने आँधी तूफाँ आते, कितने बादल घोर गरजते
सागर की लहरों में भी हैं कितने अनगिन बल पड़ जाते |
शंकित व्याकुल मन से फिर भी बढ़ती जाती नई डगर पर ||
नहीं कोई जो दिशा बताए मुझको आज पकड़ कर उँगली
नहीं कोई जो दीप जलाए, मग में अँधियारी है कितनी |
दिशाहीन मैं एकाकी ही बढ़ती जाती नई डगर पर ||
मेरे मग का अँधियारा तुम दूर भगाते, दीप जलाते
और कभी फिर हाथ पकड़ कर मंज़िल की तुम राह दिखाते |
आज नहीं तुम साथ, अकेली बढ़ती जाती नई डगर पर ||

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