मेरी बातें

कितनी निष्ठुर है यह प्यास

अवसर आने पर पतझर ही बन जाता मधुमय मधुमास
और प्रकृति का कण कण मिलकर बनता बहुरंगी आकाश |
लेकिन कितने तार हैं टूटे मन की वीणा के अब तक
जग को इससे क्या, जग को तो लगता यह केवल परिहास ||
कितनी ही पत्थर की प्रतिमाएँ पूजो और शीश नवाओ
या कर लो ज्योतित इस मन को, आशाओं के दीप जलाओ |
हो कितनी ही वाणी रसमय, हो कितना ही हृदय भावमय
यह निष्ठुर जग क्या समझेगा इसमें भरा हुआ उल्लास ||
आज यहाँ हर जीने वाला जीने का प्रयास है करता
किन्तु सतत हारों में और अभावों में है प्रतिपल मरता |
कितने ही तुम नीड़ बनाओ, कितने ही तुम स्वप्न सजाओ
निरवंशी ही रह जाएगी हर प्यारी सी कोमल आस ||
आँसू का ही बोझ उठाया यहाँ हरेक हँसने वाले ने
और गहन सन्नाटे को है चीरा हर सोने वाले ने |
कितनी ही मदिरा छलकाओ, कितना ही अमृत बरसाओ
हर प्याला निज उम्र पी रहा, कितनी निष्ठुर है यह प्यास ||

मन की पीड़ा

पड़ी हुई बीमार उम्र थी, प्यार ने थामी उसकी ऊँगली
इसीलिये वेश्या बनने से बच गई मेरे मन की पीड़ा ||
जीवन एक पहेली, जिसको हमने केवल इतना समझा
इसकी व्यथा कथा को हर कहने सुनने वाला पछताता |
किन्तु तर्क को त्याग, भावना से मैंने इसको सुलझाया
इसीलिये अनबूझ पहेली को शिशु जैसा सहज बनाया ||
मानव मन तो ऋतुओं के सम चंचल सदा बना रहता है
अभी रुदन है, अभी हास्य है, हर पल परिवर्तन रहता है |
पर ममता ने चंचल तितली को है देखो स्नेह दे दिया
इसी हेतु इस वन उपवन में पुष्पों का यह नृत्य हो गया ||
हर घर आँगन रंगमंच है, और हर श्वास बनी कठपुतली
प्रेम डोर में बंधा नाचता बादल और थिरकती बिजली |
हो विश्वास या न हो किसी को, पर मेरी ये अटल धारणा
प्यार ने ही बंजर धरती में ये हरियाला बाग़ उगाया ||

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