मृत्यु सुन्दरी

श्राद्ध पर्व के अवसर पर सभी अपने अपने दिवंगत प्रियजनों को किसी न किसी रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं | हमारे भी श्रद्धा सुमन इन पंक्तियों के रूप में समर्पित हैं अपने पूर्वजों को…

मृत्यु सुन्दरी तो जीवन की प्यारी प्यारी दुलहिन है |
यह जग जिसकी प्रणय स्थली, और यही आनन्दवन है ||
यहीं जीव का बचपन बीता, और यहीं यौवन पाया
और यहीं इस बाला ने भी नित नित निज सौन्दर्य बढ़ाया |
उसकी लज्जा के आँचल में एक घातक सम्मोहन है
यह जग जिसकी प्रणय स्थली, और यही आनन्दवन है ||
प्रियतम को आकर्षित करने धीरे धीरे पग वह धरती
आगे बढ़ते, लज्जावश पीछे हटने का अभिनय करती |
इन मदमस्त अदाओं से वह देती नेह निमन्त्रण है
यह जग जिसकी प्रणय स्थली, और यही आनन्दवन है ||
इतना है आकर्षण इस आमन्त्रण में, जिसको लख जीवन
चल पड़ता है निकट उसी के, त्याग मोह माया का बन्धन |
कभी नहीं फिर पीछे लखता, मिल अदृश्य में जाता है
यह जग जिसकी प्रणय स्थली, और यही आनन्दवन है ||
मात पिता गुरुजन और प्रियजन सब ही यहाँ व्यर्थ हो जाते
और उसे फिर लगने लगते मिथ्या, जग के सारे नाते |
उसकी एकमात्र चिरसंगिनी केवल उसकी दुलहन है
यह जग जिसकी प्रणय स्थली, और यही आनन्दवन है ||

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भय

संसार में प्रायः हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में भय से ग्रस्त होता है | हम आप सभी किसी न किसी रूप में किसी न किसी भय के शिकार होते हैं | छोटे बच्चे को अपरिचित लोगों से भी लगता है, माता पिता से बिछुड़ने का भय लगता है | विद्यार्थी को भय होता है परीक्षा में अच्छे परिणाम का | अध्यापक को भय होता है कि उसके पढ़ाए विद्यार्थी परीक्षा में कैसा प्रदर्शन करेंगे | व्यापारी को भय होता है उसके व्यापार में कहीं घाटा न आ जाए | पोलीटिशियन को भय होता है कहीं अपने प्रतिद्वंदी से हार न जाए | किसी को यश और प्रतिष्ठा का भय होता है | व्यक्ति हर स्तर पर किसी न बात से भय से ग्रस्त रहता है | और तो और ये हमारे तथाकथित साधू सन्यासी भी आत्म प्रतिष्ठा छिन जाने के भय से त्रस्त रहते हैं और इसी कारण अनेक बार अकर्तव्य भी कर बैठते हैं | और इन अनेक प्रकार के भयों के पीछे काफ़ी हद तक हमारी दूसरों से आगे बढ़ने की कामना, अपने स्वीकार्य होने की कामना है, अपना महत्व प्रदर्शित करने की कामना, संग्रह की कामना, लालच, लोभ मोह आदि की भावनाएँ हैं | जीवन में प्रगति के लिये काफ़ी हद तक ये भावनाएं उचित भी हैं, लेकिन इनका ग़ुलाम बन जाना ही भय को जन्म देता है | और भय से ग्रस्त होने के कारण किसी चमत्कार की आशा में अनेक प्रकार के आडम्बरपूर्ण आचरणों में मनुष्य फंसता है – जैसे गुरुओं की तलाश में भटकता है, ज्योतिषियों से उपाय पूछता है, कुछ मनश्चिकित्सकों को अर्थलाभ कराते रहते हैं – आदि आदि | क्योंकि सहज रूप से जीवन जीने के लिये किसी भी भय आदि से मुक्त होना आवश्यक है |

वास्तव में तो प्रत्येक मनुष्य कुछ विशेष प्रवृत्तियों जैसे डरना, हँसना, अपनी रक्षा करना, नई बातों का ज्ञान प्राप्त करना, सामजिक होना, अपने महत्व को जानना और दूसरों को जताना, संग्रह करना, जीवन यापन के लिये धनोपार्जन करना, सम्भोग करना, सोना, भोजन करना, रचनात्मक कार्यों में स्वयं को प्रवृत्त करना, दया, करुणा आदि के साथ जन्म लेता है और ये प्रवृत्तियाँ उसकी प्रेरणास्रोत भी होती हैं | इनमें से कुछ प्रवृत्तियाँ पशुओं में भी पाई जाती हैं, जैसा कि कहा भी गया है “आहारनिद्राभयमैथुनश्च सामान्यमेतद्पशुभिर्नराणाम् |” आहार. निद्रा, भय और मैथुन ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं जो पशुओं और मनुष्यों में समान होती हैं, अर्थात जिन्हें मनुष्य की मूलभूत प्रवृत्तियाँ यानी basic instincts कहा जा सकता है | किन्तु अन्य प्रवृत्तियाँ केवल मानवीय प्रवृत्तियाँ होती हैं | ये प्रवृत्तियाँ बीजरूप में मनुष्य के स्वभाव में सदा विद्यमान रहती हैं, किन्तु फिर भी मनुष्य इनके वशीभूत अथवा इनका ग़ुलाम नहीं हो जाता | अपनी बुद्धि से वह इन प्रवृत्तियों की ऐसी व्यवस्था कर लेता है कि ये वृत्तियाँ उसके चरित्र निर्माण तथा व्यक्तित्व निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं | अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को इस प्रकार सँकुचित कर लेता है कि वे उसकी कार्य शक्ति का दमन न करते हुए उसे कल्याण के मार्ग पर प्रवृत्त होने में सहायता करती हैं | यही व्यवस्था योग कहलाती है तथा यही “समत्व” कहलाता है “समत्वं योग उच्यते” | तथा इस प्रकार प्रवृत्तियों में संतुलन के साथ कर्मों में कुशलता प्राप्त होती है जिसके कारण जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है “योगः कर्मसु कौशलम् |” इसी समबुद्धि के लिये गीता में कहा गया है “योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्।।“ (२/४८,५०) – निष्काम भाव से आसक्तिरहित होकर कर्म करने से सिद्धि असिद्धि में समानभाव होना ही योग कहलाता है | बुद्धिमान व्यक्ति सुकृत और दुष्कृत दोनों ही कर्मों में आसक्ति का त्याग कर देता है और इस प्रकार योग के द्वारा कौशल को प्राप्त करता है |

इस प्रकार यदि देखा जाए तो भय की स्थिति से भी मुक्ति उसमें अनासक्ति से ही आती है | साथ ही भय में यदि लिप्त न होकर उससे मुक्ति का प्रयास करेंगे तो निश्चित रूप से नयी स्फूर्ति और नवीन उत्साह का संचार होगा और नवीन पुरुषार्थ का संकल्प करके किसी कार्य में प्रवृत्त होंगे तो भय स्वयमेव दूर भाग जाएगा | इसी संतुलन को योग कहा जाता है | किन्तु जहाँ हमने इस भय को अपना साथी बना लिया, इसमें लिप्त हो गए, वहीं भय स्थाई बन जाता है | मनुष्य जब स्वयं को प्रतिकूलताओं और असफलताओं से युद्ध करने में अशक्त अनुभव करने लगता है तब उसका भय स्थाई हो जाता है | और स्थायित्व उसे और भी विशाल बना देता है | हमारा अज्ञान हमारे भय का साथी बन जाता है | और फिर मनुष्य भय की पूजा आरम्भ कर देता है | कभी चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण जैसी आकाशीय घटनाओं से भयभीत हो उनका प्रतीकार करने का प्रयास करता है, कभी भूत प्रेतों से मुक्ति का उपाय खोजता हुआ विनाश की ओर अग्रसर होता है | यहाँ तक कि पढ़े लिखे लोग भी अज्ञानवश इस प्रकार के उपायों के चक्कर में पड़ जाते हैं | विद्यार्थी परीक्षा देने जा रहा है या कोई व्यक्ति किसी इन्टरव्यू के लिये जा रहा है तो भले ही निश्चित स्थल पर पहुँचने में देर हो जाए, लेकिन मार्ग में पड़ने वाले मंदिर में माथा टेकने अवश्य जाएगा | क्योंकि अपनी सामर्थ्य पर विश्वास नहीं है | भय से बचने के इन उपायों के रूप में जब हम भय की पूजा आरम्भ कर देते हैं भय की प्रवृत्ति हमें अपने वश में लेती है | जबकि प्रयास यह होना चाहिये कि यह प्रवृत्ति हमारे वश में हो जाए | उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति को छिपकली से भय लगता है | उसे इस बात का ज्ञान है कि छिपकली न तो किसी को काट सकती है और न ही जब तक किसी खाने की वस्तु में उसे पकाया न जाए तब तक उसका विष ही किसी को प्रभावित कर सकता है | किन्तु नीम हकीम जैसे ज्योतिषियों और पण्डितों से सुन रखा है कि छिपकली शरीर के अमुक अंग पर गिरेगी तो अमुक कष्ट का सामना करना होगा, अमुक अंग पर गिरेगी तो अमुक कष्ट का सामना करना होगा | भय वहाँ से आरम्भ होता है | और यदि दुर्भाग्यवश छिपकली के शरीर के किसी अंग पर गिरने से कुछ अशुभ हो गया – जिसका कि उस बेचारी छिपकली से कोई लेना देना नहीं है – तब तो बस वह डर पक्का हो गया | फिर तो अगर दूर भी कहीं छिपकली दिखाई दे जाएगी तो आफत आ जाएगी | इसी प्रकार के अनेक भय – जिन्हें मनोवैज्ञानिक भाषा में फोबिया कहा जाता है – मनुष्य को जकड़े रहते हैं | और जितना हम भयभीत होते हैं उतना हमारा भय का क्षेत्र बढ़ता जाता है और जीवन का हर क्षण हमें मृत्यु का सन्देश देता जान पड़ता है |

एक प्रकार से देखा जाए भय किसी स्तर तक दुराचरण रोकने में सहायक भी होते हैं | कोई भी अनुचित कार्य करते समय मनुष्य को इस बात का भय सबसे पहले होता है कि किसी ने देख लिया या पकड़े गए तो क्या होगा | और इस प्रकार समाज में परस्पर संतुलन तथा शान्ति व्यवस्था स्थापित करने में भय की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है | परिवार में ही देख लीजिये – बच्चा यदि प्यार से कुछ ग़लत करने से नहीं मानता तो उसे किसी प्रकार का भय दिखाया जाता है और वह फिर उस ग़लती को नहीं दोहराता | बच्चा अज्ञान होता है इसलिये वहाँ यह भय दिखाना उचित ठहराया जा सकता है | किन्तु यदि समझदार लोगों को भी किसी भय के द्वारा दुष्कर्मों से रोकना पड़े तो फिर उन्हें समझदार नहीं कहा जा सकता | इस प्रकार भय का कारण मूल रूप से अज्ञान ही होता है |

अब प्रश्न यह है कि इस भय से मुक्ति कैसे प्राप्त की जाए ? शास्त्रों में भय के निवारण के लिये ईश्वर से प्रार्थना की गई है “अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं परोक्षात् | अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु |” (अथर्व. १९-१५-६) मित्र से, शत्रु से, ज्ञाताज्ञात से, दिन रात्रि अर्थात हर ओर से अभय हो | किन्तु केवल इस प्रार्थना से ही काम नहीं चलेगा | हाँ, इस प्रकार की प्रार्थनाओं से मनोबल में वृद्धि अवश्य होती है उर भय से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है | जिस प्रकार प्रतिकूलताओं से डरने की प्रवृत्ति मनुष्य की है उसी प्रकार प्रतिकूलताओं से युद्ध करने और अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने की भी प्रवृत्ति एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है | इसी प्रवृत्ति को यदि जागृत करके भय को जीतने का संकल्प व्यक्ति ले तो वह स्वतः ही निर्भय हो जाएगा | साथ ही लोभ मोह आदि प्रकृति की माया के मोह जाल से विमुक्त रहे तो भय के लिये स्थान ही नहीं रह जाएगा | “अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितः, दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् |” (गीता १६/१) भय से रहित होना, दूसरों की उन्नति के मार्ग को भी भयहीन कर देना, यज्ञ अर्थात मानव समाज के लिये हितकारी कार्य करना, स्वाध्याय, सरलता, अन्तःकरण की पवित्रता आदि दिव्य गुणों से अध्यात्म को प्राप्त हुआ व्यक्ति भयहीन हो जाता है |

व्यक्ति के साथ अनेक बार ऐसी प्रिय अप्रिय घटनाएँ घट जाती हैं जिनके विषय में उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी | यह मनुष्य के ज्ञान और विवेक पर निर्भर करता है कि उन घटनाओं से वह क्या सन्देश ग्रहण करता है | उपयुक्त सन्देश ग्रहण करके यदि आत्मा का परिमार्जन आरंभ हो जाएगा तो मनुष्य की सारी शंकाएँ भी लुप्त हो जाएँगी और उसका मन सहज प्रेम से भर उठेगा और तब भय के लिये स्थान नहीं रहेगा “प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः, मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ||” (गीता ६/१४) – स्थिर प्रज्ञ, भयरहित, ब्रह्मचर्य में लीन, मन को वश में किये हुए, सन्तुलित व्यक्ति सदा आत्मलीन रहता है तथा परमतत्व को प्राप्त होता है | तथा जो यह मान लेता है कि समस्त गुण त्रिगुणात्मिका प्रकृति से ही हैं वह अध्यात्म को प्राप्त हो जाता है और इसलिये भयहीन हो जाता है “बुद्धिज्ञानमसंमोह: क्षमा सत्यं दमः शमः, सुखं दु:खं भावोsभावो भयं चाsभयमेव च | अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोsयशः, भवन्ति मत्त एव च ||” (गीता १०/४,५)

इस प्रकार यदि बालक को बचपन से ही इन सब बातों की शिक्षा दी जाए और स्वयं अपने जीवन में भी इन मूल्यों को उतारा जाए तो भय आदि की कोई सत्ता ही नहीं रह जाती है | और इस प्रकार कर्म तथा निष्काम कर्मयोग के मार्ग को जानने वाला, कर्तव्य और अकर्तव्य के भेद को जानने वाला, भय तथा भयहीनता की स्थिति को जानने वाला तथा बन्धन और मुक्ति का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति वास्तव में परमात्मतत्व का अधिकारी होता है | “प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये, बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ||” (गीता १८/३०)

दिवंगत पूर्वजों के स्मरण का पर्व श्राद्धपर्व

मित्रों आज अनन्त चतुर्दशी का पर्व है जिसमें भवगान विष्णु के ही एक रूप अनन्त भगवान की पूजा अर्चना की जाती है | कल भाद्रपद पूर्णिमा से श्राद्ध पक्ष का आरम्भ होने जा रहा है | यों तो आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से पितृपक्ष का आरम्भ माना जाता है, किन्तु जिनके प्रियजन पूर्णिमा को परलोकगामी हुए हैं उनका श्राद्ध एक दिन पूर्व अर्थात भाद्रपद पूर्णिमा को करने का विधान है | कल से लेकर पितृविसर्जनी अमावस्या यानी आश्विन मास की अमावस्या तक समस्त हिन्दू समुदाय अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करेगा | हमारे यहाँ वर्ष का पूरा एक पक्ष ही पितृगणों के लिये समर्पित किया गया है | जिसमें विधि विधान पूर्वक श्राद्धकर्म किया जाता है | शास्त्रों के अनुसार श्राद्धकर्म करने का अधिकारी कौन है, विधान क्या है आदि चर्चा में हम नहीं पड़ना चाहते, इस कार्य के लिये पण्डित पुरोहित हैं | पण्डित लोगों का तो कहना है और शास्त्रों में भी लिखा हुआ है कि श्राद्ध कर्म पुत्र द्वारा किया जाना चाहिये | प्राचीन काल में पुत्र की कामना ही इसलिये की जाती थी कि अन्य अनेक बातों के साथ साथ वह श्राद्ध कर्म द्वारा माता पिता को मुक्ति प्रदान कराने वाला माना जाता था “पुमान् तारयतीति पुत्र:” | लेकिन जिन लोगों के पुत्र नहीं हैं उनकी क्या मुक्ति नहीं होगी, या उनके समस्त कर्म नहीं किये जाएँगे ? हमारे कोई भाई नहीं है, माँ का स्वर्गवास अब से चार वर्ष पूर्व जब हुआ तो पिताजी भी उस समय तक स्वर्ग सिधार चुके थे | हमने अपनी माँ को मुखाग्नि भी दी और अब उनका तथा अपने पिता का श्राद्ध भी पूर्ण श्रद्धा के साथ हम ही करते हैं | तो इस बहस में हम नहीं पड़ना चाहते | हम तो बात कर रहे हैं इस श्राद्ध पर्व की मूलभूत भावना श्रद्धा की – जो भारतीय संस्कृति की नींव में है |

भारतीय संस्कृति अत्यन्त प्राचीन है तथा आचारमूलक है | किसी भी राष्ट्र की संस्कृति की पहचान वहाँ के लोगों के आचरण से होती है | और भारतीय संस्कृति की तो नींव ही सदाचरण, सद्विचार, योग व भक्तिपरक उपासना, पुनर्जन्म में विश्वास तथा देव और पितृ लोकों में आस्था आदि पर आधारित है जिसका अन्तिम लक्ष्य है मोक्ष प्राप्ति अर्थात आत्मतत्व का ज्ञान | पितृगणों के प्रति श्राद्ध कर्म भी इसी प्रकार के सदाचरणों में से एक है | ब्रह्म पुराण में कहा गया है ‘देशे काले च पात्रे च श्राद्धया विधिना चयेत । पितृनुद्दश्य विप्रेभ्यो दत्रं श्राद्धमुद्राहृतम॥ – देश काल तथा पात्र के अनुसार श्रद्धा तथा विधि विधान पूर्वक पितरों को समर्पित करके दान देना श्राद्ध कहलाता है | स्कन्द पुराण के अनुसार देवता और पितृ तो इतने उदारमना होते हैं कि दूर बैठे हुए भी रस गंध मात्र से ही तृप्त हो जाते हैं | जिस प्रकार गौशाला में माँ से बिछड़ा बछड़ा किसी न किसी प्रकार अपनी माँ को ढूँढ़ ही लेता है उसी प्रकार मन्त्रों द्वारा आहूत द्रव्य को पितृगण ढूँढ ही लेते हैं | इसी प्रकार याज्ञवल्क्यस्मृति में लिखा है कि पितृगण श्राद्ध से तृप्त होकर आयु, सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, राज्य एवं सभी प्रकार के सुख प्रदान करते हैं “आयु: प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानी च, प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितां महा: |” (याज्ञ. स्मृति: १/२७०)

वास्तव में श्राद्ध प्रतीक है पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का | हिन्दू मान्यता के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्म के आरम्भ में माता पिता तथा पूर्वजों को प्रणाम करना चाहिये | यद्यपि अपने पूर्वजों को कोई विस्मृत नहीं कर सकता, किन्तु फिर भी दैनिक जीवन में अनेक समस्याओं और व्यस्तताओं के चलते इस कार्य में भूल हो सकती है | इसीलिये हमारे ऋषि मुनियों ने वर्ष में पूरा एक पक्ष इस निमित्त रखा हुआ है |

श्राद्धों की प्रथा प्रत्यक्ष रूप से वैदिक काल के बाद आरम्भ हुई | योगसूत्र में कहा गया “श्रद्धा चेतस: सम्प्रसाद: | सा हि जननीव कल्याणी योगिनं पाति |” अर्थात श्रद्धा मन की प्रसन्नता है तथा यही योगियों की माता के समान रक्षा करती है | पद्मपुराण में तो नवम् अध्याय से लेकर एकादश अध्याय तक केवल श्राद्ध पर ही चर्चा है – पितृवंश के विषय में विस्तार से चर्चा है, श्राद्ध कर्म की विधि आदि की सविस्तार चर्चा है | साथ इससे सम्बन्धित अनेक कथाएँ भी वहाँ प्राप्त होती हैं | महाभारत के शान्ति पर्व में भी श्राद्ध के महत्व की विस्तार से चर्चा उपलब्ध होती है | विष्णु पुराण में कहा गया है “श्राद्धं श्रद्धान्वित: कुर्वन्प्रीणयत्यखिलेजगत |” (३/१४/२) अर्थात श्रद्धा सहित श्राद्ध कर्म करने वाला व्यक्ति समस्त जगत को प्रसन्न कर देता है |

श्राद्ध शब्द का सामान्य अर्थ है श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म – “संपादन: श्रद्धया कृतं सम्पादितमिदम् |” जिस कर्म के द्वारा मनुष्य “अहं” अर्थात “मैं” का त्याग करके समर्पण भाव से “पर” की चेतना से युक्त होने का प्रयास करता है वही वास्तव में श्रद्धा का आचरण है | श्रद्धा का आचरण करता हुआ व्यक्ति समष्टि भाव को प्राप्त हो जाता है तथा समस्त भूतों में अपनी आत्मा को देखता है | श्रद्धावान व्यक्ति उदारमना होगा, करुणाशील होगा, मैत्री तथा कृतज्ञता के भाव से युक्त होता है, दानशील होता है | और यही कारण है कि ऐसे व्यक्ति की भावना समस्त जीवों के प्रति आत्मौपम्य की हो जाती है | अपने पूर्वजों के प्रति इसी श्रद्धापूर्वक दिया गया दान श्राद्ध कहलाता है – “श्रद्धया दीयते यस्मात्तस्माच्छ्राद्धम् निगद्यते |” इस प्रकार श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है और यही कारण है कि श्रद्धा और श्राद्ध में घनिष्ठ सम्बन्ध है | वैसे भी देखा जाए तो श्रद्धारहित कोई भी कर्म करने से दम्भ में वृद्धि होती है तथा कर्म में कुशलता का अभाव रहता है | अतः श्रद्धा तो दैनिक जीवन की मुख्य आवश्यकता है | माता पिता के प्रति श्रद्धा हमें विनम्र बनाती है तो गुरु के प्रति श्रद्धा हमें ज्ञानवान बनाती है – क्योंकि तब हम संशयरहित और समर्पण भाव से गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं | समस्त चराचर सृष्टि के प्रति यदि श्रद्धा का भाव मन में दृढ़ हो जाए तो मनुष्य किसी भी प्रकार के अनाचार अन्य जीव के साथ कर ही नहीं सकता, क्योंकि उसकी श्रद्धा उसे अन्य जीवों के प्रति उदारमना बना देती है | गीता में कहा गया है “श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रिय:, ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति | अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति, नायंलोकोsस्ति न पारो न सुखं संशयात्मनः ||” (४/३९,४०) – अर्थात आरम्भ में तो दूसरों के अनुभव से श्रद्धा प्राप्त करके मनुष्य को ज्ञान प्राप्त होता है, परन्तु जब वह जितेन्द्रिय होकर उस ज्ञान को आचरण में लाने में तत्पर हो जाता है तो उसे श्रद्धाजन्य शान्ति से भी बढ़कर साक्षात्कारजन्य शान्ति का अनुभव होता है | किन्तु दूसरी ओर श्रद्धा रहित और संशय से युक्त पुरुष नाश को प्राप्त होता है | उसके लिये न इस लोक में सुख होता है और न परलोक में |

इस प्रकार श्रद्धावान होना चारित्रिक उत्थान का, ज्ञान प्राप्ति का तथा एक सुदृढ़ नींव वाले पारिवारिक और सामाजिक ढाँचे का एक प्रमुख सोपान है | फिर पितृजनों के प्रति श्रद्धायुत होकर दान करने से तो निश्चित रूप से अपार शान्ति का अनुभव होता है तथा शास्त्रों की मान्यता के अनुसार लोक परलोक संवर जाता है | इसलिये इस श्राद्धपक्ष का इतना महत्व हिन्दू मान्यता में है | भारतीय संस्कृति एवं समाज में अपने पूर्वजों और दिवंगत माता पिता का इस श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा पूर्वक स्मरण करके श्रद्धापूर्वक दानादि के द्वारा उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किये जाते हैं | इस अवसर पर दिये गए पिण्डदान का भी अपना विशेष महत्व होता है | श्राद्ध कर्म में पके चावल, दूध और तिल के मिश्रण से पिण्ड बनाकर उसे दान करते हैं | पिण्ड का अर्थ है शरीर | यह एक पारम्परिक मान्यता है कि हर पीढ़ी में मनुष्य में अपने मातृकुल तथा पितृकुल के गुणसूत्र अर्थात वैज्ञानिक रूप से कहें तो जीन्स उपस्थित रहते हैं | इस प्रकार यह पिण्डदान का प्रतीकात्मक अनुष्ठान उनकी तृप्ति के लिये होता है जिन जिन लोगों के गुणसूत्र श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में विद्यमान होते हैं |

तो आइये श्रद्धापूर्वक अपने पूर्वजों का स्मरण करें और अमावस्या को पितृविसर्जन और महालया के साथ ही माँ भगवती को अपने घर आने का निमन्त्रण भी दें |

आत्म संयम

सुबह के काम काज से निबट कर चाय का प्याला लेकर बैठी थी कि एक पड़ोसी महिला का फोन आ गया “पूर्णिमा जी, आपके यहाँ आ गई बाई ?” ऐसा आज ही नहीं हुआ, कई बार होता है | ज़रा सी भी देर हो जाए कामवाली के आने में तो फोन आने शुरू हो जाते हैं | और यदि काम वाली आ जाती है और उससे उन महिलाओं की बात कराते हैं तो फोन पर ही उसे डाटना शुरू हो जाता है देर से आने के लिये | मैं सोचने लगती हूँ कि उनके इस गुस्से का कामवाली पर तो कोई असर हुआ ? सत्य तो यह है कि उस पर कोई प्रभाव उनके गुस्से का नहीं होता, हाँ उन महिलाओं की अपनी ऊर्जा का ह्रास अवश्य होता है | इसी तरह कहीं ट्रैफिक सिग्नल पर देख लीजिये – लाल बत्ती होगी लेकिन पीछे खड़ी गाड़ियों के हार्न बजने लगेंगे – जबकि निकलना होगा बत्ती हरी होने पर ही, पर सिग्नल पर खीझ ज़रूर निकालेंगे | कई बार तो ऐसी घटनाएँ भी सुन मिलती हैं कि किसी ने अपनी कार आगे निकाल ली तो उस पर जानलेवा हमला ही कर दिया | ऐसे ही न जाने कितनी बातें दिन प्रतिदिन के जीवन में देखने को मिलती हैं | और इस सबका कारण बहुत हद तक लोगों में धैर्य का अभाव है, आत्मसंयम का अभाव है, जिसके कारण क्रोध तथा अन्य अनेक प्रकार के विकार जन्म लेते हैं |

आत्मसंयम अर्थात मन को वश में करना, इन्द्रियों को वश में रखना | मन यदि वश में है तो किसी भी प्रकार का लोभ मोह व्यक्ति को पथ भ्रष्ट नहीं कर सकता | मनुष्य की पहचान उसके मन से ही होती है और मन की गति बहुत तीव्र होती है | मन पर नियन्त्रण रखने वाला व्यक्ति आत्मसंयम के साथ जीवन सुखपूर्वक व्यतीत करता है किन्तु अनियंत्रित गति के साथ दौड़ रहे मन के साथ जो चलता है उसे भारी कष्ट उठाना पड़ सकता है उसी प्रकार जैसे अनियन्त्रित गति से वाहन दौड़ाने पर दुर्घटना की सम्भावना होती है | उदाहरण के लिये एक छात्र को ही ले लीजिये | अपना कोर्स तैयार करते समय, परीक्षा की तैयारी करते समय यदि उसका मन इधर उधर भागेगा तो उसका मन पढ़ाई में नहीं लगेगा और परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने से वंचित रह जाएगा | परीक्षा भवन में भी बहुत से विद्यार्थी सब कुछ याद होते हुए भी केवल इसीलिये मात खा जाते हैं कि प्रश्नपत्र सामने आते ही धैर्य खो बैठते हैं और जल्दी जल्दी प्रश्नपत्र हल करने की घबराहट में या तो आधा अधूरा करके आते हैं या फिर ग़लत उत्तर लिख कर आ जाते हैं | यदि पढ़ाई करते समय ही उन्हें अपने मन पर नियन्त्रण रखना, भावनाओं पर नियन्त्रण रखना, धैर्य के साथ प्रश्नों को समझ कर उनका उत्तर देने की शिक्षा दी जाए तो उनके प्रदर्शन में बहुत सुधार हो सकता है |

इस प्रकार आत्म संयम का अर्थ हुआ धैर्य | जीवन के हर क्षेत्र में धैर्यवान रहने की आवश्यकता है | प्रेम का क्षेत्र हो, व्यवसाय का क्षेत्र हो – कोई भी क्षेत्र हो – जब हम अपनी भावनाओं को उन्मुक्त रूप से प्रवाहित होने देते हैं तो अपनी बहुत सारी ऊर्जा समाप्त कर देते हैं | जो शक्ति कार्य करने में व्यय होनी चाहिये थी वह व्यर्थ की भावनाओं के प्रवाह में नष्ट हो जाती है | जब मन पूर्ण रूप से स्थिर एवं एकाग्र होता है तभी उसकी शक्ति सकारात्मक कार्यों में व्यय होती है | क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, स्वार्थ ये सब मन के भटकने के ही कारण हैं | और मन की इस भटकन के साथ कोई भी कार्य एकाग्रता से नहीं हो पाएगा | आत्म नियन्त्रण से प्रबल इच्छा शक्ति उत्पन्न होती है और प्रबल इच्छाशक्तिसम्पन्न व्यक्ति ही प्रगति पथ पर अग्रसर हो सकता है |

मनुस्मृति में इसी को अन्य रूप से कहा गया है तथा अध्यात्म के साथ जोड़ा गया गया है “धर्म शनैः संचनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिका:, परलोक सहायार्थ सर्वभूतान्यपीडयन् |” अर्थात जिस तरह दीमक अपने निवास के निर्माण के लिये धीरे धीरे बांबी बनाती है उसी तरह परलोक में अपने जीवन को सुधारने के लिये किसी भी अन्य जीव को कष्ट पहुँचाए बिना पुण्य कर्मों का संग्रह करना चाहिये | तथा “दृढ़कारी भृदुदन्ति: क्रूराचरैरसंवसन्, अहिंस्रो दमदानाभ्यो जयेत्स्वर्ग तथावत: |” अर्थात दृढ़ निश्चय, दयालु तथा आत्म संयमी व्यक्ति ही स्वर्ग का अधिकारी बनता है अर्थात मरणोपरान्त भी उसकी कीर्ति विद्यमान रहती है |

वास्तव में मन का सत्व, हृदय की विशालता और सौम्यता तथा उदारता, आत्म संयम, निष्कपट स्वभाव ये सब एक साथ मिलकर मानसिक पवित्रता कहलाते हैं “मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह:, भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते |” (गीता १७/१६) – मन को सदा प्रसन्न रखना अर्थात सत्व, मन में मधुर भाव रखना अर्थात सौम्यता, व्यर्थ सम्भाषण से बचना, आत्मसंयम तथा मन में किसी प्रकार की भी कुत्सित भावना उत्पन्न न होने देकर शुद्ध भावना समस्त कार्य करना ही मानसिक तप कहलाता है | ऐसा व्यक्ति दृढ़निश्चयी होता है |

निश्चित रूप से मन को वश में करना बहुत कठिन कार्य है “यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः, इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः | तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर:, वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||” (गीता २/६०,६१) – मन की चंचल गति यत्न करते हुए विवेकी पुरुष को भी अपने साथ बहा ले जाती हैं, अतः आत्मसंयम की नितान्त आवश्यकता है | क्योंकि जिसका मन शांत है और जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं वही परमात्मतत्व को प्राप्त कर सकता है |

इन्द्रियाँ जिसकी संयमित नहीं हैं उसके जीवन में निरन्तर विरोधी भावनओं की उत्पत्ति होकर अनेक दुराचारों को बल मिलता है | “ध्यायतो विषयान्पुंस: संगस्तेषूपजायते, संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोsभिजायते || क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः, स्मृतिभ्रन्शाद्बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||” (गीता २/६२,६३) – इन्द्रियों के विषयों का ध्यान करने से उस वस्तु में आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से उस वस्तु को येन केन प्रकारेण प्राप्त करने की इच्छा का जन्म होता है, और यदि उस वस्तु की प्राप्ति में किसी प्रकार की बाधा आ जाए तो क्रोध अथवा निराशा उत्पन्न होते है, क्रोध और नैराश्य विवेक को हर लेते हैं जिसके कारण स्मृति नष्ट होकर संभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, और मनुष्य के इस प्रकार स्मृतिनाश होते ही अर्थात भ्रमित होते ही करणीय अकरणीय का बोध समाप्त होकर मनुष्य का नाश हो जाता है | तथा “रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्, आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||” (२/६४) – संयत आत्मा वाला मनुष्य अपने वश में की हुई और राग तथा द्वेष से रहित इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ प्रसन्नता को प्राप्त होता है |

वास्तव में इन्द्रियों का विषयों से सम्बन्ध होना कोई दोष नहीं है, अपितु जीवन में प्रगति का एक सोपान है | क्योंकि इन्द्रियों द्वारा पदार्थों के गुणों का प्रत्यक्ष होने पर ही तो ज्ञान में वृद्धि होगी | किसी भी क्षेत्र में प्रगति के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है | किन्तु जब उस प्रत्यक्ष पर राग द्वेष का आवरण चढ़ जाता है वहीं बात बिगड़ जाती है | इस स्थिति में मनुष्य अपने छोटे से छोटे लाभ के लिये भी कोई भी बड़े से बड़ा दुष्कर्म कर सकता है | और यदि उस प्रत्यक्ष पर मोह का आवरण चढ़ गया तो आत्मीयों का बड़े से बड़ा दोष भी उसे दिखाई नहीं देगा | आलस्य का आवरण चढ़ गया तो कर्महीनता में वृद्धि होगी | ये सभी स्थितियाँ प्रगति में बाधक हैं | किन्तु राग द्वेष मोह आलस्य आदि किसी प्रकार के दोष से रहित इन्द्रियों के द्वारा जब पदार्थों के गुणों का मनुष्य प्रत्यक्ष करता है तो प्रत्येक पदार्थ के उचित मूल्य का ज्ञान हो जाता है और मनुष्य आनन्द तथा शान्ति को प्राप्त होता है | और आनन्दित तथा शान्तचित्त मनुष्य एकाग्रचित्त होकर अपने कार्य में लीन होगा तथा उन्नति को प्राप्त करेगा |

“असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्, अभ्यासेन तू कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ||” (६/३५) – निश्चित रूपसे मन को वश में करना बहुत कठिन है | किन्तु यह भी सत्य है कि वैराग्य के अभ्यास के द्वारा ऐसा किया जा सकता | “यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम्, ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् |” (६/२६) – अकारण ही अस्थिरता के कारण मन चंचल होता है तथा इधर उधर भागता हैं, किन्तु आत्मसंयम के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है |

यहाँ यह शंका उत्पन्न हो सकती है कि फिर तो मन को वश में करने के लिये व्यक्ति को सन्यासी ही हो जाना चाहिये | नहीं, वैराग्य का अर्थ यह कदापि नहीं है | एक गृहस्थी भी वैराग्य का अभ्यास कर सकता है – अपने समस्त कर्मों को निष्काम भाव से करके, अपने समस्त उत्तरदायित्वों की पूर्ति निरासक्त भाव से करके तथा “जैसा सुख दुःख का अनुभव मुझे होता है वैसा ही दूसरों को भी होता है” ऐसा जानकर सबमें समभाव से व्यवहार करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति वैराग्य का ही तो आचरण करता है | एक विद्यार्थी जब सब ओर से ध्यान हटाकर केवल अपने अध्ययन में ध्यान लगाता है तो वह भी वैराग्य का ही आचरण कर रहा होता है | मन में व्यर्थ की झुंझलाहट न लाना, लालच न करना, दूसरों की प्रगति से ईर्ष्या न रखना, अपरिग्रह आदि सभी वैराग्य के ही आचरण हैं | इस प्रकार के आचरण से इन्द्रियों पर स्वतः ही संयम हो जाता है | और इस प्रकार आत्म संयमित व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो जाता है, उसका हृदय शांत हो जाता है तथा आत्मज्ञान को प्राप्त होता है | यद्यपि ऐसा करना कठिन है, किन्तु यही वास्तविक निर्वाण भी है तथा जीवन में उत्तरोत्तर प्रगति का सोपान भी है | और इसके लिये अधिक कुछ नहीं करने की आवश्यकता है, बस प्रतिदिन कुछ पल ध्यान लगाने की आवश्यकता है | प्रतिदिन निश्चित समय पर स्वच्छ स्थान पर तथा शुद्ध आसन पर बैठकर, जहाँ तक सम्भव हो शान्त कक्ष में बैठकर, सब ओर से इन्द्रियों को हटाकर सर्वप्रथम श्वास को नियन्त्रित अथवा शान्त करने का प्रयास करें | क्योंकि श्वास-प्रश्वास की गति नियमित नहीं होगी तो ध्यान में एकाग्रता भी नहीं आएगी | इसके लिये आरम्भ में किसी योग्य प्रशिक्षक से श्वास प्रक्रिया की शिक्षा ली जा सकती है | अन्यथा स्वयं भी श्वास-प्रश्वास की गति का निरीक्षण किया जा सकता है | श्वास प्रक्रिया नियन्त्रित होने के बाद अपने लक्ष्य पर ध्यान एकाग्र करने का प्रयास करें, अध्यात्म वृत्ति के लोग अपने आराध्य पर ध्यान एकाग्र करें | आरम्भ में कठिनाई होगी, किन्तु धीरे धीरे ध्यान लगने लगेगा | ध्यान की ही अवस्था में अपने भीतर झाँकने का प्रयास करें | इस प्रकार शनैः शनैः लक्ष्य के प्रति एकाग्रता होगी और मन संयमित होगा | मन संयमित होने से तथा लक्ष्य के प्रति एकाग्रता आने से कार्यकुशलता में वृद्धि आएगी | और आत्मसंयम के द्वारा कार्य करते हुए लक्ष्य को प्राप्त हुआ जा सकता है | जैसा कि गीता में कहा गया है “कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्, अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् |” (५/२६) – काम क्रोध से रहित तथा चित्त को वश में किये हुए व्यक्ति को आत्मतत्व का ज्ञान हो जाता है |

अहंकार

नित्य प्रति समाचार देखने पढ़ने पर एक तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आता है कि आज के व्यक्ति – विशेष रूप से हमारे नेतागण, सरकारी कर्मचारी, सामाजिक संगठनों के कर्ता धर्ता, बड़े बड़े महन्त मठाधीश ही नहीं, ऐसा व्यक्ति भी जिसे दो समय की रोटी के लिये जी तोड़ मज़दूरी करनी पड़ती है – सभी अधिकाँश में अहंकार में जी रहे हैं | एक ग़रीब व्यक्ति का अहंकार तो समझ में आता है – क्योंकि उसके पास अहंकार के अतिरिक्त कुछ और है ही नहीं जो वह किसी को दिखा सके | किसी सरकारी दफ़्तर में जाइए – वहाँ का चौकीदार भी इस तरह बात करेगा जैसे उसकी सहमति के बिना उस कार्यालय में कोई कार्य होता ही नहीं | ऐसे लोगों के अहंकार की उपेक्षा की जा सकती है, और करनी भी चाहिये | लेकिन तथाकथित “बड़े लोगों” के अहंकार का पोषण हम जैसे “आम आदमी” ही करते हैं | हममें से किसी को लगता है कि अमुक पोलिटिशियन की चमचागिरी करेंगे तो हमार काम बन सकता है | सरकारी कर्मचारी से काम निकालना है तो उसके अहंकार का पोषण भी करना ही होगा | धर्म क्षेत्र में तो अहंकारी मठाधीशों का अभाव नहीं है | यहाँ तक कि छोटे छोटे पुजारी तक – जिन्हें ठीक से मन्त्रोच्चार तक करना नहीं आता – बड़े गर्व के साथ जजमानों से अपने चरण स्पर्श कराते हैं | इस सबके पीछे है आम आदमी के ज्ञान का अभाव, और उससे भी बढ़कर भय, क्योंकि मनुष्य को अपने आप पर – अपनी सामर्थ्य पर विश्वास ही नहीं रह गया है | आत्मविश्वास में आई कमी से भय उत्पन्न होता है और उस भय के कारण किसी भी व्यक्ति को अपना मार्गदर्शक मान बैठते हैं | धर्मगुरु दुराचार करते पकड़े जाते हैं और उनका लोगों को मूर्ख बनाने का फलता फूलता व्यवसाय पल भर में धराशायी हो जाता है, लेकिन एक दुराचारी बाबा पकड़ा जाता है तो दो और अस्तित्व में आ जाते हैं | क्यों जानते हैं वे लोग कि जन मानस का अपने आप पर से विश्वास उठ गया है और उस आत्मविश्वास को पुनः जागृत करने हेतु उन्हें किसी न किसी ऐसे व्यक्तित्व की खोज है जिसे वे अपने से ऊपर मान सकें, गुरु मान सकें और उसकी उँगली पकड़ कर आगे बढ़ सकें | मैं किसी धार्मिक आस्था पर प्रहार नहीं कर रही हूँ | लेकिन स्थिति यह है इन धर्मगुरुओं के प्रवचनों में पण्डालों में जो भीड़ उमड़ती है तो बस सर ही सर दिखाई देते हैं | अपने “अनुयायियों” का इस प्रकार का पागलपन देखकर किसका अहंकार पोषित नहीं होगा ? और ये अहंकारी बाबा अपने आपको भगवान मान बैठते हैं | पर प्रश्न यह है कि इस प्रकार इन लोगों के अहंकारों का पोषण हम कब तक करते रहेंगे और कब तक इन्हें धर्म, राजनीति इत्यादि के नाम पर दुराचार करने की, भ्रष्टाचार करने की छूट देते रहेंगे ?

श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है “प्रकृतेः क्रियमाणानि गुनै: कर्माणि सर्वश:, अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते |” (३/२७) मनुष्य को देहादि प्राकृत पदार्थों में अहम् बुद्धि हो जाती है और वह इस अहंकार से आत्मा के स्वामित्व को भुलाकर प्रकृति के गुणों से किये जाने वाले कर्मों के विषय में “इनका कर्ता मैं हूँ” ऐसा मानने लगता है |

वास्तव में अहंकार अथवा गर्व स्वयं को दूसरों से अधिक महत्त्वपूर्ण, बलशाली समझने और दिखाने की भावना है | अर्थात अहं भाव | यही अहं भाव यदि उचित दिशा की ओर मोड़ दिया जाए तो देवत्व में भी परिणत हो सकता है, अनुचित दिशा में घूम गया तो अनर्थ करेगा | अहंकारी व्यक्ति हर बात का कर्ता धर्ता अपने शरीर को मानने लगता है और अपनी प्रत्येक सफलता का श्रेय भी उसी शरीरी “मैं” को देने लगता है | निमित्तमात्र जीव अहंकार में जो सोचता है, उसकी वाणी जो कथन करती है, जो कर्म वह करता है – अर्थात मनसा वाचा कर्मणा जो भी कुछ होता है उसमें स्वयं के अस्तित्व को ही देखता है और उसके मूलभूत आत्मतत्व से अपरिचित रहता है | जबकि “मैं” शरीर नहीं है, “मैं” है देह में देही अर्थात आत्मा की सत्ता | अध्यात्म मार्ग के अनुसार अन्तश्चतुष्टय में क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आते हैं | “अहं” मन, बुद्धि और चित्त तीनों से ऊपर है | सभी भारतीय दर्शन इन्द्रियों को जीतने की बात करते हैं | जैनियों के “अरिहंत” शब्द का भी अर्थ यही है – जिसने मन रूपी अरि अर्थात शत्रु का हनन कर दिया वह “अरिहंत” | बौद्ध दर्शन बुद्धि के अस्तित्व को श्रेष्ठ बताकर नित्यानित्य का भेद करने वाले विवेक से काम लेता है | ये दोनों दर्शन कर्मसिद्धान्त के आधार पर क्रमशः मन और बुद्धि पर नियन्त्रण को तत्वज्ञान मानते हैं | योग दर्शन चित्त पर अंकुश लगाता है “योगाच्चित्तवृत्ति: निरोध:” – चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है | यहाँ भी कर्मसिद्धांत ही मान्य है “योगः कर्मसु कौशलं |” चतुर्थ निर्गुण तत्व “अहंकार” है | जिस पर सभी दर्शन एक ही विचार रखते हैं – अहंकार से आच्छादित मन को जीतकर ही मोक्ष अथवा निर्वाण अथवा परमतत्व अथवा आत्मतत्व को प्राप्त किया जा सकता है | इसी प्रकार बुद्धि और चित्त से “अहं” भाव को मिटाकर निरहंकार कर्म की कुशलता पर बल दिया जाता है | किन्तु क्या “अहंकार” को सदा के लिये समाप्त किया जा सकता है ? मन, बुद्धि और चित्त जितने महत्त्वपूर्ण हैं “अहं” भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है | आत्मतत्व में अहं का एकात्म ही अहंकार का मूल तत्व है | “सोsहमस्मि” वह आत्मा मैं ही हूँ का भाव – परमात्मतत्व के साथ तद्रूप हो जाने का भाव भी “अहंकार” से ही आ सकता है | सहज रूप में देही अर्थात आत्मा की प्रेरणा से देह जो कर रहा है, जो कह रहा है, जो विचार कर रहा है वह “अहं” अर्थात “मैं” ही कर रहा है | अर्थात ईश्वरीय सत्ता से – आत्मा की सत्ता से – ही सब कुछ हो रहा है | किन्तु इस “सोsहमस्मि” को जब तक शरीर के स्तर तक सीमित रखा जाएगा तब तक यह “अहं” शक्ति को क्षीण ही करेगा, और क्षीण शक्ति वाला व्यक्ति अहंकार – घमण्ड – के वशीभूत होकर अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिये दुराचरण ही करेगा | यही “अहं” आत्मतत्व में समाहित होते ही शक्तिसंवर्द्धक बन जाता है और इस प्रकार “दैवत्व” को प्राप्त हो जाता है | यही कारण है कि गीता समस्त कर्मों को ईश्वरार्पण बुद्धि से करने की सलाह देती है | श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है : “यस्यात्मबुद्धि: कुणपे त्रिधातुके, स्वधी: कलत्रादिषु भौम इज्यधी: | यत्तीर्थबुद्धि: सलिले न कर्हिचिज्जनेषु अभिज्ञेषु स एव गोखर: ||” (दशम स्कन्ध) अर्थात् जो वात-पित्त-कफात्मक नाशवान देह को आत्मा समझता है, पुत्रादि को अपनी संपत्ति मानता है तथा पार्थिव प्रस्तरखण्ड आदि पदार्थों को पूज्य मानता है, जल को तीर्थ मानता है, वह किसी प्रकार भी ज्ञानवान नहीं कहा जा सकता | वह तो गाय का बोझ धोने वाले गधे के समान है | गीता सहित समस्त दर्शनों की यही मान्यता है और यही व्यवहारिक भी है |

“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च, निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुख: क्षमी | संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः, मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रियः ||” (गीता १२/१३,१४) प्राणिमात्र में जिसका द्वेष नहीं है, प्राणिमात्र के प्रति जिसका स्नेह का आचरण है तथा उनके सुख दुःख में जिसका करुणा का भाव रहता है, जिसका किसी वस्तु में मोह नहीं होता और इस कारण जो निरहंकारी हो जाता है, सुख में जो प्रमत्त नहीं होता और दुःख में जो त्रस्त नहीं होता – अर्थात जो सुख दुःख में समभाव रहता है, सदा सन्तुष्ट रहता है, योगी है, कर्मशील है, ईश्वरार्पित जिसकी मन और बुद्धि है वही परमात्मतत्व का अधिकारी होता है | और ऐसा व्यक्ति “असक्तिरनभिष्वंग: पुत्रदारगृहादिषु, नित्यं च समचित्त्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु |” (१३/९) पुत्र, स्त्री, घर आदि में अनासक्त होकर कर्तव्यपालन करता है, और मोह में पड़कर न्यायमार्ग से च्युत नहीं होता तथा हर अवस्था में समचित्त रहता है | “अहंकार बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता:, मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोsभ्यसूयका: |” (१६/१८) व्यक्ति बल अभिमान, काम, क्रोध आदि के कारण यह भी भूल जाता है कि हर जड़ चेतन में उसी आत्म तत्व का वास है | और “अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते |” (१८/५३) अहंकार, बल, अभिमान, काम, क्रोध, परिग्रह आदि को छोड़कर ममत्व से रहित होकर शांत पुरुष परमतत्व को प्राप्त करता है |

वास्तव में “अहंकार” जब तक शरीर स्तर पर रहेगा व्यक्ति को पराजय की ओर ही ले जाएगा | क्योंकि शरीर के स्तर पर अहंकार से क्रोध में वृद्धि होगी, वह स्वयं को अन्यों से श्रेष्ठ समझेगा, अपने से सुखी सम्पन्न व्यक्ति को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जन्म लेगी, और इस प्रकार वह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बनने के चक्कर में सबसे अलग पड़ जाएगा और उसके यश का नाश होगा |

अस्तु, अहंकार का शाब्दिक अर्थ है अहं की स्वीकृति अथवा अपने होने की अनुभूति | अपनी सत्ता की अनुभूति एक सापेक्ष क्रिया है | यह अनुभूति व्यक्ति को तभी होती है जब वह अपने से पृथक किसी वस्तु का, किसी अन्य व्यक्ति का, अपने भाव के अतिरिक्त किसी अन्य भाव का, अथवा अपने विचारों से अतिरिक्त किसी अन्य विचार का अनुभव करता है | यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है | और अपनी सत्ता की अनुभूति जब होती है तो दूसरों को प्रभावित करने की आकाँक्षा भी बलवती होती जाती है | अर्थात किसी अन्य के होने से अहंकार का जन्म होता है | किन्तु उस अन्य की उपस्थिति में जब ध्यान योगादि के प्रयास के द्वारा सहजता आ जाती है, बालक के जैसी अबोधता आ जाती है, तब वहाँ अहंकार नहीं रह पाता | देखा जाए तो जगत्स्रष्टा ब्रह्म ने भी स्वयं से पृथक किसी अन्य सृष्टि की अनुभूति की होगी और तभी “एकोsहम् बहुस्याम्” अर्थात अनेक रूपों में मैं ही विद्यमान हूँ की भावना विकित हुई होगी | इस प्रकार अहंकार की भावना कोई अनुचित भावना नहीं है | किन्तु बात फिर वहीं आ जाती है कि यह भाव शरीर के स्तर पर न होकर आत्मा के स्तर पर हो | उस स्थिति में अपनी सत्ता का भाव अर्थात “अहंकार” सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करेगा | जब अपने “अहंकार” अर्थात “मैं” की भावना को हम आत्मा के स्तर तक “विस्तृत” कर देंगे तो यही “अहंकार” जगत्कल्याण का निमित्त बन जाएगा | आज जिस प्रकार की विषम सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों का सामना जनसाधारण को करना पड़ रहा है उसका एक समाधान यह भी होगा कि समाज का हर व्यक्ति अपनी “मैं” की भावना को “आत्मा” के स्तर तक “विशाल” बना ले और आत्मैक्य तथा आत्मौपम्य के साथ साथ सम्यग्दृष्टि अर्थात सबके साथ समभाव की दृष्टि भी विकसित कर ले |

शिक्षा और जीवन निर्माण

जब भी कोई अपराध होता है तो अपराधी की शिक्षा दीक्षा पर उसका दोष मढ़ दिया जाता है | घर परिवार में भी कोई बच्चा बड़ों का कहा नहीं मानता, शैतानी करता है, बालपन में हठ करता है या झूठ बोलता है या कोई बात छिपाता है, या अन्य कोई सदस्य यदि परिवार की किसी मान्यता का उल्लंघन करता है तो मुँह से अनायास ही निकल जाता है “हमने तो ऐसे संस्कार नहीं दिये थे, न ही ऐसी शिक्षा दी, पता नहीं कहाँ से सीख कर आया है…” पर क्या वास्तव में हम अपने बच्चों को जीवन मूल्यों की सही सही शिक्षा दे रहे हैं ? क्या वास्तव में उन्हें ऐसी शिक्षा दी जा रही है जो उन्हें संस्कारी बनाए ? अभी कुछ दिन पहले की बात है, मैं अपने कमरे की खिड़की से बाहर खेलते बच्चों को देख रही थी | सभी बच्चे अच्छे अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे थे | लेकिन खेलते खेलते वे जिस भाषा का प्रयोग कर रहे थे, जिस प्रकार की गाली गलौज वे कर रहे थे – सुनकर दिमाग़ चकरा गया | पास में रहने वाली एक बुज़ुर्ग महिला ने बच्चों को इसके लिये टोका तो “सॉरी आंटी…” बोल तो दिया बच्चों ने, पर आंटी के वहाँ से हटने की प्रतीक्षा करते रहे | और ये देखकर मेरा आश्चर्य और भी बढ़ गया कि उन महिला के हटते ही बच्चों ने एकस्वर में बोलना आरम्भ कर दिया “यार ये आंटी क्यों हम पर इतना रौब झाड़ती रहती हैं ? क्या लगती हैं ये हमारी ?” और इसमें इन बच्चों को दोष नहीं दिया जा सकता | बच्चे अपने माता पिता को भी इसी तरह की बातें करते देखते हैं | हमारे पास में एक पार्क है जिसकी देखभाल एक बुज़ुर्ग व्यक्ति करते हैं | मालियों के साथ सारा सारा दिन खड़े रहकर पार्क को ठीक रखने का प्रयास करते हैं | वहाँ आने जाने वाए लोगों से भी कहते हैं कि पार्क को साफ़ सुथरा रखने और हरा भरा रखने में उनकी सहायता करें | पर कुछ बच्चे वहाँ जाकर गंदगी फैला देते हैं, फूल पत्ते तोड़ लेते हैं | इस पर उन बुज़ुर्ग को गुस्सा आता है | एक दिन उन्होंने कुछ बच्चों को डाट दिया | फिर क्या था, आनन फानन में बच्चों के माता पिता वहाँ एकत्र हो गए और उन पिता समान बुज़ुर्ग व्यक्ति से लड़ना झगड़ना आरम्भ कर दिया कि उनके बच्चे जो करते हैं वही करेंगे और ख़बरदार यदि उनके बच्चों को भविष्य में किसी बात के लिये रोका | तो जब माता पिता को इस प्रकार का व्यवहार करते देखेंगे बच्चे तो उसी का तो अनुसरण करेंगे | हमें याद है हमारे छोटे से शहर में बच्चे कोई भी अनुचित कार्य करने से डरते थे कि कहीं किसी गली मोहल्ले के किसी चाचा ताऊ ने देख लिये तो अच्छी ख़ासी डाट पड़ जाएगी | और उस स्थिति में बच्चों के घरवाले भी उन चाचा ताउओं का साथ देते थे जिनके साथ केवलमात्र गली मोहल्ले का रिश्ता होता था | सच में वे सारे ही मूल्य आज तिरोहित हो चुके हैं, खो चुके हैं |

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था “जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चारित्रिक विकास कर सकें और वैचारिक सामंजस्य स्थापित कर सकें वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है |” आज जिस प्रकार समाज में भ्रष्टाचार, व्यभिचार, अन्य दुराचरण जैसे यौन दुराचारों आदि में वृद्धि होती जा रही है उसके समाधान के लिये आवश्यक है परम्परागत नैतिक मूल्यों के पुनरस्थापन की | आज भारत में बहुत से क्षेत्रों में विकास हुआ है | किन्तु यह भी सत्य है कि इस विकास ने व्यक्ति के आदर्श सम्भवतः छीन लिये हैं | बहुत से लोग इसके लिये पाश्चात्य जीवन शैली की नक़ल को दोष देते हैं | आधुनिक शिक्षा प्रणाली को दोष देते हैं | किन्तु वास्तविकता तो यह है कि बच्चों को नैतिक शिक्षा देने के लिये न तो आज के माता पिता के पास समय है न ही विद्यालयों में ऐसा कोई प्रावधान है | विद्यालयों में एक विषय “Social studies” के रूप में पढ़ाया अवश्य जाता है, पर वह भी केवल कोर्स पूरा करने तक | शैक्षणिक स्तर पर अधिकाँश बच्चे शत प्रतिशत के लगभग अंक लेकर उत्तीर्ण हो रहे हैं | लेकिन दूसरा सत्य यह भी है कि आज बच्चों को फ़िल्मी अभिनेताओं की पूरी जीवनियाँ रटी होती हैं, उनके हर दिन का हिसाब क़िताब उनके पास होता है, किस हीरो हीरोइन का किसके साथ चक्कर चल रहा है इसका पता होता है, पर हमारे देश के जो वास्तविक हीरो रहे हैं, उनके व्यक्तित्व के विषय में बहुत कम बच्चों को जानकारी होगी | क्योंकि हमारा सामाजिक वातावरण ही ऐसा बना हुआ है | आज जो शिक्षा बच्चों को दी जाती है उसका उद्देश्य होता है सफलता की अंधी दौड़ के साथ भागना | भौतिकता की अंधी दौड़ के साथ भागना | सोचना कुछ नहीं, बस भागना, भागना और भागना | हर कोई बदहवास सा बस भागे चला जा रहा है | मशीन बन गया है | बस एक ही भावना – जैसे भी हो दूसरों को पीछे छोड़ना है, चाहे उसके लिये कुछ भी क्यों न करना पड़े, कितने भी हथकण्डे क्यों न अपनाने पड़ें | जिसके कारण मानसिक रूप से नकारात्मकता पनपती जा रही है | नकारात्मक होने के कारण सहनशक्ति में कमी आ रही है | इस सबसे बचने के लिये अनेक तरह के नशों के शिकार बनते जा रहे हैं | जिसका परिणाम होता है चोरी, बलात्कार, हत्या आदि घिनौने अपराधों में फँसना | यदि सबसे पहले पारिवारिक स्तर पर और फिर स्कूल कालेज के स्तर पर बच्चों को नैतिक शिक्षा दी जाए, उनमें सत्य, दया, त्याग, न्याय जैसी उदात्त भावनाओं को विकसित करने का अवसर प्रदान किया जाए तब ही इस प्रकार की समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है |

हमारे देश में चार पुरुषार्थ और चार आश्रमों की व्यवस्था इसीलिये थी कि मानवीय भावनाओं में संतुलन तथा आचार विचारों में शुद्धि बनी रहे | हमारे देश में तो प्रेम के आदर्श को भी बहुत ऊँचा माना है | यह हमारे ही देश की मान्यता है कि काम का कर्तव्य से विरोध नहीं होना चाहिये | शिव अर्थात् मंगल का विरोधी काम भस्मावशेष कर दिया जाता है | जो असंगत प्रेम सम्भोग हम लोगों को अपने अधिकार में कर लेता है वह स्वाभिशाप से खण्डित, ऋषि शाप से प्रतिहत और दैव रोष से भस्म हो जाता है | यही कारण है कि हमारे देश में ऋषि वात्स्यायन ने काम शास्त्र पर विश्व के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ कामसूत्र की रचना की तो खजुराहो जैसे विश्व प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण भी हमारे ही देश में हुआ | यहाँ मनुष्य की यौन भावनाओं को basic instinct के रूप में स्वीकार तो अवश्य किया गया, किन्तु उन्हें अपवित्र या अश्लील न मानते हुए धर्म के साथ जोड़ा गया | यही कारण है कि संस्कारों के द्वारा बच्चों को गरिमा के साथ हर सम्बन्ध का निर्वाह करने की शिक्षा दी गई | प्राचीन भारत में शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति के ज्ञान के व्यवस्थित विकास के साथ बुद्धिमत्ता का विकास करना था | जैसा कि गीता में कहा भी गया है “ज्ञानं विज्ञानं सहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेsशुभात्” (९/१)

वास्तव में शिक्षा एक प्रकार की चेतना है और उसकी प्रकृति विकासशील है | देश काल की परम्पराएँ और परिस्थितियाँ उसे प्रभावित करती हैं | शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य होता है मनुष्य की अन्तर्हित शक्तियों, क्षमताओं और योग्यताओं का उचित रूप में परिवर्धन करना, विकास करना, पोषण करना | गीता के अनुसार शिक्षा समाज व राष्ट्र के नव निर्माण एवं पुनर्रचना का आधार स्तम्भ होती है | गीता के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य है कि विद्यार्थियों की क्षमताओं को इस प्रकार विकसित किया जाए कि वे अपने क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का उचित समाधान कर सकने में समर्थ हों | साथ ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिये व्यक्ति का सर्वतोमुखी विकास अर्थात शरीर, मन और आत्मा तीनों तत्वों का सामंजस्यपूर्ण विकास | “युज्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः, शान्तिं, निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति” (६/१५) अर्थात शरीर मन तथा कर्म में निरन्तर संयम का आभास करते हुए व्यक्ति आत्मानुभूति करने में समर्थ हो जाता है | इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही है | व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो गीता का कर्मयोग कर्मेन्द्रियों जिनमें हाथ पैर इत्यादि सभी की भूमिका रहती है – से सम्बन्धित है | ज्ञानयोग निश्चित रूप से मस्तिष्क के विकास से सम्बन्धित है | तथा भक्तियोग हृदय की उदात्त भावनाओं के विकास से सम्बद्ध है | यह भी निश्चित है कि मनुष्य की मौलिक आवश्यकताओं – भोजन, वस्त्र और निवास – की पूर्ति जब तक नहीं होगी तब तक हम उसके नैतिक विकास की भी कल्पना नहीं कर सकते | और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कर्म की आवश्यकता है | कर्म किये बिना कर्मफल से भी मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती “न कर्माणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोsश्नुते | न च सन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति |” (३/४) साथ ही कहा गया है मनुष्य को अपने प्राकृतिक गुणों के आधार पर ही कर्म करना पड़ता है “कर्मेनैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:, लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि |” (३/२०)

कर्म के लिये ज्ञान की आवश्यकता है और उत्सुकता को शांत करने वाला ज्ञान ही संस्कार बन जाता है | ज्ञान से हृदय की संस्कृति को सहयोग मिलता है | प्रेम व सत्य का ज्ञान एक दूसरे के पूरक एवं सहयोगी हैं | साथ ही ऐसे ज्ञान की प्राप्ति के लिये आत्मसंयम तथा इन्द्रिय निग्रह की सलाह दी गई है | क्योंकि नैतिक सिद्धान्तों के आधार पर ही सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक जीवन की प्रगतिशील पुनार्योजना सम्भव है | अतः शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिये कि विद्यार्थी सामाजिक बुराइयों को दूर करने में समर्थ हो | अर्थात चरित्र निर्माण, नैतिक विकास व हृदय की संस्कृति का निर्माण | क्योंकि शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य तो मुक्ति है “सा विद्या या विमुक्तये” | साथ ही विषयों की उपयोगिता के आधार पर शिक्ष दी जाए – जो व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ साथ उसके चरित्र निर्माण में भी सहयोग दें |

गाँधी जी ने भी गीता के ही आधार पर शिक्षा के मूलभूत सिद्धान्त बताए हैं कि सात से १४ वर्ष तक के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जानी चाहिये | शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिये | केवल साक्षरता ही शिक्षा नहीं कहलाती, एक अनपढ़ किसान भी नैतिक मूल्यों से युत हो सकता है और एक केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त व्यक्ति भी अत्यंत दुराचारी हो सकता है | शिक्षा ऐसी हो जो मानवीय गुणों का विकास करे ताकि मनुष्य के शरीर, हृदय, मन और आत्मा का सामंजस्यपूर्ण विकास हो सके | सभी विषयों की शिक्षा स्थानीय उत्पादन उद्योगों के माध्यम से दी जाए | साथ शिक्षा ऐसी हो जो नवयुवकों को बेरोज़गारी से मुक्त कर सके | जीवन यापन की समस्या नहीं रहेगी – अर्थात रोज़ी रोटी की समस्या, व्यक्ति का पेट भरा होगा, तब ही वह आत्म निर्माण और अध्यात्म की दिशा में प्रयास कर सकेगा |

इस प्रकार शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य होना चाहिये मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा में उपस्थित सर्वोत्तम गुणों का चहुँमुखी विकास ताकि उसका शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्तरों पर विकास हो सके | आज जो नैतिक शिक्षा पुस्तकों के माध्यम से विद्यालयों में दी जा रही है उसमें और वास्तविक जीवन शैली में बहुत बड़ा अन्तर है | दिन प्रतिदिन के जीवन में जब हर ओर भ्रष्टाचार, व्यभिचार और कुविचार ही दीख पड़ते हैं तो व्यक्ति तो उन्हीं पर ध्यान देगा, न कि किताबी शिक्षा पर | पुस्तकीय ज्ञान तो पुस्तक पढने के बाद तिरोहित हो जाता है | अतः नैतिक शिक्षा विद्यालयों में पुस्तकों के माध्यम से उपलब्ध नहीं हो सकती | उसके लिये समाज में इस प्रकार के आदर्श व्यक्ति के समक्ष होने चाहियें | इसके लिये योग्य गुरुओं का भी होना आवश्यक है | और परिवार में माता पिता से अच्छा गुरु और कौन हो सकता है | बच्चे के हृदय मन मस्तिषक तथा आत्मा को माता पिता ही स्पर्श कर सकते हैं | तो जीवन निर्माण की शिक्षा का आरम्भ घर से ही करना होगा | व्यक्ति की प्रथम पाठशाला परिवार की ओर से परिवार के भीतर रहते हुए ही जब इस प्रकार की नैतिक शिक्षा का आरम्भ होगा तभी उत्तरोत्तर इस दिशा में प्रगति की संभावना की जा सकती है |

जैन दर्शन और भारतीय समाज

पर्यूषण पर्व आरम्भ हो चुका है | पर्व का महत्व और लक्ष्य तभी पूरा होगा जब इस पर्व और जैन दर्शन में निहित व्यापक उदात्त भावनाओं को समझकर उनके सिद्धान्तों को अपने जीवन में उतारा जाए | भारत के सभी दर्शनों का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति रहा है | जैन धर्म भी इसका अपवाद नहीं रहा | जैन धर्म भी मूलतः निवृत्तिमार्गी है | इसके अनुसार समस्त सांसारिक सुख और यह जीवन दुःख मूलक है | इन दुखों से मुक्ति हेतु समस्त प्रकार की तृष्णाओं का त्याग करना आवश्यक है | जैन दर्शन का सामान्य अभिमत यह है कि संसार की समस्त वस्तुओं में उत्पाद्य-व्यय-ध्रौव्य सतत् वर्तमान हैं | अर्थात् जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट भी होगा और उसकी स्थिति भी रहेगी | प्रत्येक वस्तु में नित्य और अनित्य दोनों की ही सत्ता भी सदैव ही रहती है | इस जगत का निर्माता कोई ईश्वर नहीं है | प्राकृतिक तत्वों के निश्चित नियमों के अनुसार सृष्टि का निर्माण स्वाभाविक रूप से होता रहता है और स्वाभाविक रूप से ही वस्तु के पर्यायों का परिवर्तन होता रहता है | अतः प्रत्येक वस्तु अनन्तधर्मात्मक है और संसार की समस्त वस्तुएँ सदसदात्मक हैं | यह संसार शाश्वत और नित्य है क्योंकि पदार्थों का अर्थात वायु, जल, अग्नि, आकाश और पृथिवी का मूलतः विनाश नहीं होता अपितु उनका रूप परिवर्तित होता रहता है |

जैन धर्म अपने सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन में मनुष्य को ही उसके कर्म के लिये उत्तरदायी मानता है – और व्यावहारिक रूप से यही सत्य भी है | उसके समस्त सुख दुःख, मानापमान इत्यादि उसके अपने कर्मों का ही फल होते हैं और उसके यही कर्म उसके पुनर्जन्म का कारण बनते हैं | मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि मनुष्य “त्रिरत्न” के अनुशीलन और अभ्यास के द्वारा अपने पूर्वजन्म के कर्मफल का नाश करे तथा इस जन्म में किसी प्रकार भी कर्मफल संग्रहीत न करे | ये त्रिरत्न हैं : सम्यक् श्रद्धा अर्थात् सत् में विश्वास, सम्यक् ज्ञान अर्थात सद्रूप का शंकाविहीन और वास्तविक ज्ञान, तथा सम्यक् आचरण अर्थात बाह्य जगत के विषयों के प्रति सम सुख-दुःख भाव से उदासीनता |

जैन दर्शन के अनुसार ज्ञान भी पाँच प्रकार के होते हैं – मति अर्थात इन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान, श्रुति अर्थात श्रवण के द्वारा प्राप्त ज्ञान, अवधि जो दिव्य ज्ञान भी कहलाता है, मन पर्याय अर्थात ऐसा ज्ञान जिसके द्वारा अन्य व्यक्तियों के मन-मस्तिष्क की बात जानी जा सकती है, और कैवल ज्ञान अथवा पूर्ण ज्ञान | किसी भी वस्तु के अनन्त गुण होते हैं | यही स्याद्वाद अथवा अनेकान्तवाद या सप्तभंगी का सिद्धान्त है | स्याद्वाद अर्थात सापेक्षतावाद अर्थात किसी अपेक्षा से | यह किसी वस्तु के गुण को समझने अम्झाने और अभिव्यक्त करने का सापेक्षिक सिद्धान्त है | और अपेक्षा से कोई भी वस्तु सत् भी हो सकती है और असत् भी | और इसी विचार से वस्तु अनन्तगुणात्मक होती है | केवल मुक्त अथवा कैवल्य ज्ञान प्राप्त साधक ही वस्तुओं के इन अनन्त गुणों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं | साधारण मनुष्यों का ज्ञान आंशिक और सापेक्ष होता है | यह आंशिक ज्ञान ही नय कहलाता है | ये नय सत्य के आंशिक रूप होते हैं | इस प्रकार आंशिक और सापेक्ष ज्ञान से सापेक्ष सत्य की प्राप्ति सम्भव है, निरपेक्ष सत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती | सापेक्ष सत्य की प्राप्ति के कारण ही किसी वस्तु के सम्बन्ध में साधारण व्यक्ति का निर्णय पूर्ण रूपेण सत्य नहीं हो सकता | आज जो समाज में इतना मत-वैषम्य दीख पड़ता है उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि व्यक्ति बिना किसी तार्किक अबिव्यक्ति के केवल अपने विचारों को सत्य मानता है और दूसरे के विचारों की उपेक्षा करता है | जबकि तार्किक दृष्टिकोण यही है कि किसी एक व्यक्ति का विचार पूर्ण रूप से सत्य नहीं हो सकता | यदि ऐसा होता तो भगवान महावीर भगवतीय सूत्र में आत्मा की सत्ता के विषय में स्वयं तीन भंगों का उल्लेख न करते – स्यादस्ति, स्यान्नास्ति और स्यादवक्तव्यम् – अर्थात है भी, नहीं भी है और अवचनीय है | भिन्न भिन्न दृष्टिकोणों से देखे जाने के कारण प्रत्येक ज्ञान भी भिन्न भिन्न हो जाता है और प्रत्येक दृष्टिकोण अपने हिसाब से सही मूल्यांकन करता है | इसे ही जैन धर्म में स्याद्वाद या अनेकान्तवाद कहते हैं | जैसे आत्मा की सत्ता किसी के अनुसार है, किसी के अनुसार नहीं है, किसी के अनुसार है भी और नहीं भी, कोई कुछ भी कहने में असमर्थ हो सकता है, किसी अन्य की मान्यता हो सकती है कि है तो किन्तु अकथनीय है, किसी के विचार से है नहीं इसीलिये अकथनीय है, किसी अन्य के विचार से है भी और नहीं भी और इसीलिये अकथनीय है | जैन दर्शन के अनुसार आत्मा की सत्ता है और वह भिन्न भिन्न जीवों में भिन्न भिन्न है |

भारत के अन्य दर्शनों की ही भाँति जैन दर्शन का भी अन्तिम लक्ष्य निर्वाण प्राप्ति ही है | निर्वाण अर्थात जीव के भौतिक अंश का नाश | कर्मफलों से मुक्ति के द्वारा ही, उनका निरोध करके ही निर्वाण सम्भव है | और इन भौतिक तत्वों के दमन के लिये तपस्या व्रत आदि के द्वारा शरीर को कष्ट दिया जाना आवश्यक है | पञ्चमहाव्रतों का अनुशीलन भी आवश्यक है | जिनमें सर्वप्रथम है अहिंसा – जान बूझ कर या अनजाने में भी कायिक, वाचिक और मानसिक हिंसा नहीं करनी चाहिये | असत्य भाषण से बचना चाहिये | किसी अन्य की वस्तु की इच्छा नहीं करनी चाहिये | ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये | तथा किसी प्रकार का भी संग्रह नहीं करना चाहिये | आज की विषम सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों में इन पाँच महाव्रतों के पालन की नितान्त आवश्यकता है | कायिक वाचिक मानसिक हिंसा से मुक्त हो जाने पर क्रोध की भावना स्वत: ही समाप्त हो जाएगी और समाज में शान्ति व्याप्त होगी | असत्य नहीं बोलेंगे तो कुतर्क और विश्वासहीनता की स्थिति भी नहीं उत्पन्न होगी | किसी अन्य की वस्तु की इच्छा न करने से मन में लालच लोभ नहीं आएगा | और अपरिग्रह का पालन करने से तमाम चिन्ताएँ नष्ट हो जाएँगी | जब हम वस्तुओं का संग्रह करते हैं तभी उनकी सुरक्षा के उपाय सोचने पड़ते हैं और यह संग्रह तथा उसे बनाए रखने का विचार अनेक दुर्विचारों को जन्म देता है | वास्तविक ब्रह्मचर्य भी यही है कि मन से हर प्रकार के लोभ मोह से मुक्ति प्राप्त हो जाए |

पर्यूषण पर्व के दिनों में इन सभी व्रतों का पालन आवश्यक होता है | समाज और देश के लिये कितना श्रेयस्कर हो यदि न केवल दशलाक्षण पर्व के दिनों में बल्कि दिन प्रतिदिन के आचरण में हर व्यक्ति इन व्रतों का पालन करे | क्योंकि हिंसा, असत्य, चौरी, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, दोषारोपण, चुगली, असंयम आदि जो पाप बताए गए हैं वही आज देश और समाज को खोखला किये दे रहे हैं | उपरोक्त पाँच महाव्रतों के दिन प्रतिदिन के अनुशीलन से इन समस्त पापों से मुक्ति प्राप्त हो सकती है | और तब किसी प्रकार के अपराध के लिये स्थान ही नहीं रहेगा |