मेरी बातें

यह कैसा ताना बाना है

आलस्य भरा है अंगों में, नयनों में स्वप्न सुहाना है |
है कैसा अद्भुत दृश्य, अरे यह कैसा ताना बाना है ||
है मुझे ज्ञान काँटों में ही तो पुष्पों का है राज सदा
मैं इसीलिये तो जगती हूँ, हूँ सावधान मैं सदा सदा |
अब तुम भी जागो, समय व्यर्थ खोने का नहीं तुम्हारा है
है कैसा अद्भुत दृश्य, अरे यह कैसा ताना बाना है ||
मालूम मुझे कंकरीले पथ का छोर शान्ति पथ होता है
हर पल उल्लासपूर्ण निर्झर का गान वहाँ बस होता है |
उसको सुनकर तुम भूलोगे दुःख का जो गान तुम्हारा है
है कैसा अद्भुत दृश्य, अरे यह कैसा ताना बाना है ||
कम्पित नभ सूरज की ज्वाला में तप कर ही पाता है जीवन
फिर हर्षित होकर वह ही नभ बरसा देता जग में सावन |
डरना क्या यदि कोई बाधा पथ रोके आज तुम्हारा है
है कैसा अद्भुत दृश्य, अरे यह कैसा ताना बाना है ||

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मेरी बातें

पारस

मानव की सम्पत्ति अचल ये दुःख ही तो है जीवन में |
सुख का क्या है, आज तो है, कल रहे ना रहे जीवन में ||
सुख जाता है दुःख को देकर, दुःख जाता है सुख को देकर |
सुख देकर जाने वाले को साथ रखो निज जीवन में ||
सन्ध्या को जब सूर्य छिपे तो अम्बर रक्तवर्ण हो जाता
और अँधियारा इस जगती के कण कण में है छाता जाता |
इसी भाँति सुख जाते जाते रोम रोम रोमाँचित करता
किन्तु बाद में दुःख का गहन अँधेरा बढ़ता जीवन में ||
प्रातकाल के झुटपुट जैसा दुःख का रंग रूप होता है
सुख की स्वर्णिम किरणें जिसके बाद उजाला कर देती हैं |
दुःख पर हो अधिकार जिसे वह ही होता सुख का अधिकारी
सुख पाने हित दुःख पर भी अधिकार जमाओ जीवन में ||
सुख में है व्यसन प्रमाद, किन्तु दुःख में पुरुषार्थ चमकता है
सुख में जिन अपनों को भूले दुःख उनकी याद दिलाता है |
कुंदन के जैसा रूप दमकता दुःख की ज्वाला में तपकर
दुःख तो मनुष्य को मानव करने हित पारस है जीवन में ||

मेरी बातें

मन का बिरवा नाच उठा

कजरारी बरसात जो आई, मन का बिरवा नाच उठा |
रात रात भर सतरंगे सपनों में वह तो झूम उठा ||
सिहर सिहर पुरवैया चलती, धरती सारी लहराती |
वन में मोर मोरनी नाचें, कोयलिया गाना गाती ||
आसमान भी सात रंग की सुर सरगम सुन झूम उठा |
रात रात भर सतरंगे सपनों में वह तो झूम उठा ||
आज मेघ पर चढ़ी जवानी, बौराया सा फिरता है |
किन्तु पपीहा तृप्त हुआ ना, देखो कितना पगला है ||
दामिनि की तड़पन को लख कर वह मन ही मन हूक उठा |
रात रात भर सतरंगे सपनों में वह तो झूम उठा ||
जिस पपिहे की प्यास बुझा पाया ना कोई भी बादल |
अरी दामिनी, मधु की गागर से तू उसकी प्यास बुझा ||
घन की ताधिन धिन मृदंग पर कल का प्रात लो झूम उठा |
रात रात भर सतरंगे सपनों में वह तो झूम उठा ||

मेरी बातें

आज मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ

आज जीवन से सरल है मृत्यु बन बैठी यहाँ
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||
एक हो कोई समस्या उसका हल भी मिले
पर यहाँ तो कितनी चिंताओं के हैं विषधर खड़े |
इनके दाँतों के ज़हर से मनुज बचता ना यहाँ |
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||
भय के अनगिन बाज उसके पास हैं मंडरा रहे
और दुःख के व्याघ्र उसके पास गर्जन कर रहे |
इनसे बचने को नहीं कोई राह मिलती है यहाँ |
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||
जिसको समझा नाव वह तो बोझ से बोझिल कोई
चरमराता टूटता सा काष्ठ का एक खण्ड था |
है डुबा डाला भँवर में, आज मन रोता यहाँ
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||
आज नफ़रत के ज़हर का पान करता हर मनुज
और मानवता को तज कर देव बनता है मनुज |
कंठ है अवरुद्ध, ना जीता न मरता है यहाँ
और मानवता है चिंतातुर बनी बैठी यहाँ ||

मेरी बातें

व्यथा

उर है मेरा व्यथित कहो फिर कैसे गीत प्रीत के गाऊँ
रोती आँखों को कैसे मैं प्यार भरे सपने दिखलाऊँ ||
कहता है मन मेरा मुझसे कर पर पर विश्वास घनेरा
निज पर ही विश्वास मगर यह कर न सका आकुल मन मेरा |
नहीं आत्मविश्वास जगा फिर कैसे पर विश्वास जगाऊँ ||
पूजा श्रद्धानत मानव ने मानव मन के भोलेपन को
किन्तु हृदयहीन होकर उसने ही नोचा उसके कोमल तन को |
क्यों न कहो फिर मानवता को दानवता के सम मैं पाऊँ ||
मानव के इस छल बल से तो दानवता भी है डर जाती
और क्रूरता भी अचरज में पड़ी मनुजता को निहारती |
स्वयं बना मन शत्रु स्वयं का, कैसे कोई मीत बनाऊँ ||
नहीं व्यथा यह केवल मेरी, पीड़ा यह जन जन के मन की
करनी है सब दूर वेदना मुझको जगती के मानस की |
क्यों न आज मैं पहले निज में, फिर पर में विश्वास जगाऊँ ||