मैंने मग में एकाकी ही चलना सीखा

मैंने मग में एकाकी ही चलना सीखा,
किन्तु न जाने स्वप्न कहाँ से आ जाता है |
पगडण्डी है सँकरी, जिसमें पग उलझाएँ,
किन्तु न जाने पुष्प कहाँ से खिल जाता है ||
मेरा जीवन स्वप्न मात्र वह चरम सत्य था
मम निजत्व एकमात्र शूल में अन्तर्हित था |
मैंने मात्र तृणों का ही अवलम्बन चाहा
किन्तु न जाने महल कहाँ से बन जाता है ||
शूलमध्य ही पुष्प सदा होता विकसित है
और धूल में पड़ा सदा होता हर्षित है |
मैंने तो बस एक पुष्प ही पाना चाहा
किन्तु न जाने बाग़ कहाँ से बिछ जाता है ||
मैंने देखी रवि की किरणों में सुन्दरता
और अनुभव की धवल ज्योत्स्ना की शीतलता |
मैंने सूर्य चन्द्र तारों को ही पहचाना
किन्तु मध्य में व्योम कहाँ से आ जाता है ||
ऊदी बदली सदा साथ में मेरे रोई
और दामिनी सदा साथ मेरे मुसकाई |
मैंने तो बस ओस बिन्दु ही पाना चाहा
किन्तु न जाने सिन्धु कहाँ से बन जाता है ||

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4 thoughts on “मैंने मग में एकाकी ही चलना सीखा

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