उपहार

रात भर होती रही बारिश
न जाने क्यों क्रोध में भर
गरजते रहे मेघ
उनका क्रोध शांत करने हित
दिखलाती रही नृत्य
चमकती दमकती दामिनी |
भोर हुई तो
चारों तरफ़ लटकती दिखी
घने कोहरे की चादर |
चमकती ओस की बूँदों से
गीली धुली हुई घास |
और हर पुष्प के मध्य सोती
वर्षा की मोती जैसी बूँदें |
जो था उपहार रात का
अपनी सखी धरती को |

ये ओस के कण और वर्षा की बूँदें
समेट लेना चाहते थे प्रकृति के सभी रंगों को
अपनी बाँहों में
ताकि शाम को लगा सकें आकाश के मस्तक पर
इन्द्रधनुष का मुकुट |
धीरे धीरे अपनी अरुण किरणों को आगे किये
उदित होने का प्रयास कर रहे थे
भगवान सूर्यदेव |

उषा की वर्षाजल से भीगी रक्ताभ किरणों से
फूलों की पत्तियों पर
हरी हरी धुली हुई घास पर
आराम करती ओस की बूँदें
चमक रही थीं ऐसे
मानों चारों तरफ़ बिखरे हुए हों
लाल गुलाबी मूंगे |

फिर धीरे धीरे दिन चढ़ा
प्रियतम भास्कर ने हलके से हटा दी
कोहरे की चादर
और निहारने लगे प्रेयसि धरती का
प्रफुल्लित मुखमंडल
जिस पर बिखरे हुए थे
लाज के कारण पसीने के कण
ओस की बूँदों के रूप में |
किरणों के हाथों से
पोंछ डाला प्रियतम ने
प्रेयसि के मुख का वह स्वेद |
रात भर की विरहातुर धरती ने भी
उमंग में भर
उतार फेंकी कोहरे की चादर
हो गई पूर्ण रूप से निर्वस्त्र
लुटा दिया अपना समस्त सौन्दर्य
और समा गई अपने प्रियतम की बाँहों में |
पिघल गईं ओस रूपी लज्जा की बूँदें
खिल उठी धूप |
दो प्रेमी हुए तृप्त
अपने इस पुनर्मिलन से |
उनके इस पुनर्मिलन से
जागा नवीन उत्साह
हर जड़ चेतन में
और हो गई एक नवीन सृष्टि की रचना |

किन्तु नहीं था यह पुनर्मिलन शाश्वत
प्रियतम को जाना था
निशा के साथ करने अठखेलियाँ
अस्ताचल की ओर |
उपस्थित हुआ मेघों का रथ पुनः
चल दिये प्रियतम
तृप्त करने अपनी दूसरी प्रियतमा को |
किन्तु जाते जाते सौंपते गए
धरती के ऊपर
आकाश के मस्तक पर
इन्द्रधनुष का मुकुट कुछ पलों के लिये |

धरती ने देखा, प्रफुल्लित हुई
और फिर धीरे धीरे उसकी आँखों से बह चली
अश्रुधार
वर्षा और ओस की बूँदें बनी
जिनमें था घुला संतोष
“कुछ पल ही सही
प्रियतम का स्नेह तो मिला…”
और साथ ही था घुला विषाद
प्रियतम के वियोग का |
उसी विषाद को ढाँपने के लिये
ओढ़ ली फिर से कोहरे की चादर
जो थी वरदान प्रकृति का
अपनी सखी धरती को
पूर्ण सहनशक्ति के साथ
इस योग – वियोग को झेलने का…

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