सारी रात

सुबह सुबह
खिड़की खुलते ही रसोई की
बारिश में भीगे हवा के झोंके ने
अपनी चादर में लपेट लिया
और भर दिया एक सुखद सा अहसास
मेरे तन मन में |
बाहर झाँका
वर्षा की बूँदों के सितार पर
हवा छेड़ रही थी मधुर राग
जिसकी धुन पर
पंछी गा रहे थे मंगल गान |
शायद मिल गई थी उन्हें आहट
किसी के आने की
तभी तो रात भर
मेघराज बजाते रहे थे ढोल नगाड़े
और मस्त बनी बिजुरिया
दिखलाती रही थी झूम झूम कर
मस्त नृत्य
सारी रात…

यह अद्भुत अनुराग मिल गया

दूर हुआ मन का सूनापन ऐसा कोई राग बन गया |
बाहर घोर कोलाहल, फिर भी नैनों का सम्वाद बन गया ||
आकुल व्याकुल था मन, जग का लेशमात्र भी भान नहीं था |
भाव और अनुभाव सुप्त थे, शब्दों का कुछ ज्ञान नहीं था ||
ऐसे में इस आकुल व्याकुल मन को कोई मीत मिल गया |
शब्द हो गए सार्थक, उनको भी मुखरित सम्वाद मिल गया ||
नयनों की कोरों पर गंगा जमुना का संगम अटका था |
चेतनता का लेश नहीं था, अंगों में आलस्य भरा था ||
पर सूनी आँखों के सपनों को जैसे आकार मिल गया |
और हृदय के भावों को जैसे मधुमय आधार मिल गया ||
नैनों की भाषा अनुपम है, इसका कोई मोल नहीं है |
और हृदय के भावों का शब्दों में होता तौल नहीं है ||
इन्हीं मौन सम्वादों से तो जीवन का यह राग बन गया |
और हृदय को स्नेह प्यारयुत यह अद्भुत अनुराग मिल गया ||

तुम हो मेरे साथ

तुम हो मेरे साथ हो जैसे तन छाया के साथ सदा |
हो कितना गहरा अँधियारा, पर नेह दीप है जला सदा ||
तुम ही मेरा श्रृंगार, तुम्हीं से सजती मेरी मधुशाला |
और प्रेम तुम्हारे के मधुघट से मिलती मुझको तृप्ति सदा ||
मन मन्दिर में विश्वासों के, उल्लासों के हर साज सजे |
मन के इकतारे पर केवल एक नाम प्रेम का बजे सदा ||
हो सच्चा जहाँ प्रेम, हर मुश्किल बन जाती है सरल वहाँ |
और प्रेम प्यार की बूँदों से अमृत बन जाता गरल वहाँ ||
चलते चलते जो धूप मिले तो छाँव प्रीत की मिले वहाँ |
मिट जाए प्यास व्याकुल मन की वो प्रीत सरोवर बहे वहाँ ||
मन के भावों को दिशा मिली, अनुराग भरा श्रृंगार मिला |
हो गई वेदना शान्त सकल, ऐसा हर पल का साथ मिला ||
मन से निकले हर एक शब्द ने गीत अनोखा आज रचा |
हर्षित मन की वीणा पर जिससे राग अनोखा आज सजा ||

मैं औरत ही रहना चाहूँ

फरवरी २०१४ में प्रकाशित एक रचना एक मित्र के अनुरोध पर…

मैं नहीं कोई प्रस्तर प्रतिमा, देवी सम जो पूजी जाऊँ |
मैं जीव शक्ति पूर्ण सदा एक औरत ही रहना चाहूँ ||
है नहीं कामना स्वर्गलोक की, भू पर ही है घर मेरा |
मुझको न बनाओ परलौकिक, है इसी लोक आँगन मेरा ||
हों पैर धरा पर टिके हुए, तो गिरने का ना भय रहता |
और ऊँचा उठने को अपनी ही जड़ का एक सम्बल मिलता ||
मुझमें हैं अनगिन रंग भरे, हूँ राग रंग का संगम मैं |
हैं मिले मुझे वरदान प्रकृति के सारे, जिनसे गर्वित मैं ||
बलखाती नदिया के जैसी मुझमें चंचलता भरी हुई |
पर सागर सी गहराई भी मेरी रग रग में छिपी हुई ||
आँधी सा मेरा वेग, मगर मन में एक नीरवता भी है |
हो अंगों में आलस्य, मगर मुझमें एक चेतनता भी है ||
है बिजली की दाहकता भी, मलयानिल की शीतलता भी |
हो मन्द समीर बहे जैसे, ऐसी बहती जाती मैं भी ||
मस्ती का मधुघट मुझमें है, हूँ नित उछाह से भरी हुई |
मैं मुक्त गगन में पंछी के सम नित ऊँची उड़ना चाहूँ ||
मैं नहीं कोई प्रस्तर प्रतिमा, देवी सम जो पूजी जाऊँ |
मैं जीव शक्ति पूर्ण सदा एक औरत ही रहना चाहूँ ||

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खुद ही कविता बनती रहती

हर पल करती नया खेल यह, मत समझो इसको कमज़ोर |
नित नव रचना रचने वाली, कैसे हो सकती कमज़ोर ?
हो कितना उदास इसका मन, पर हर पल मुसकाती रहती |
दूर गगन तक हाथ उठाए, सबको प्रेरित करती रहती ||
है इसका आकाश असीमित, जिसमें अनगिन तारे हँसते |
स्नेह प्रेम के इन तारों से जगत प्रकाशित करती रहती ||
प्यार मिले तो हँस देती है, नफ़रत में भी मुसकाती है |
सुख हो सुन्दर नृत्य दिखाती, पर दुःख में भी गाती रहती ||
चल देती अनजान डगर पर किसी अपरिचित हाथ को पकड़े |
भरे हुए विश्वास हृदय में, हर पल आगे बढ़ती रहती ||
अपनी मस्ती में खोई यह हर पल ऊँची उड़ती जाती |
मदमाती बयार हो जैसे, यों उन्मुक्त प्रवाहित रहती ||
है एक ऐसी लहर कि जिसके आर पार सब कुछ दिखता है |
इसीलिये तो इठलाती बलखाती सतत प्रवाहित रहती ||
किसी कली में प्राण फूँक अपना प्रतिबिम्ब बना देती है |
या फिर किसी बीज को पुष्प बना देने को तत्पर रहती ||
इसी कली को, इसी पुष्प को, नेह प्यार से सिंचित करती |
स्वावलम्बी एक वृक्ष बनेगा, यही प्रतीक्षा करती रहती ||
अपनी जड़ से जुड़ी हुई, सर ऊँचा किये डटी वह रहती |
नित नई रचना रचते रचते खुद ही कविता बनती रहती ||

आख़िर क्यों ???

आज सुबह सुबह मन्दिर के बाहर हंगामा सुना तो कारण जानने की जिज्ञासा मन में हुई और जा पहुँची घटना स्थल पर | जाकर देखा कि कुछ लोग मन्दिर से कुछ दूर खड़ी एक कार को हटवाना चाहते थे | कार जिस लड़की की थी वह बाथरूम में थी और ऑफिस जाने के लिये तैयार हो रही थी | 8 बजे तक उसे घर से चले भी जाना था | उसकी माँ को ड्राइविंग आती नहीं | पास जाकर देखा तो कार मन्दिर से इतनी दूरी पर थी कि मन्दिर में आने जाने में कोई रुकावट नहीं थी | यदि दो लाइन बनाकर भी जाना होता तब भी पूरा रास्ता खुला था | और साथ में मन्दिर का मुख्य द्वार तो पूरी तरह ख़ाली था, वहाँ तो कोई वाहन नहीं खड़ा था | इस पर पण्डित जी और दूसरे भक्तगणों का तर्क था कि “कार भगवान जी की मूर्ति के सामने आ रही है |” जबकि ऐसा भी बिल्कुल नहीं था | ये सब देखकर मैं सोचने लगी कि धार्मिक स्थलों के नाम पर इस तरह की बेहूदा हरकतें आख़िर क्यों ? आख़िर कब तक ? मैं प्रायः देखती हूँ कि सर्दियों की दोपहर में धूप सकती महिलाएँ अपने भगवान जी की मूर्तियों के लिये सुन्दर सुन्दर स्वेटर फ्राक वगैरा बुनती रहती हैं “हमारे भगवान जी को ठण्ड लगती है न…” पत्थर की मूर्ति की सर्दी गर्मी का ख़याल रखना अपनी श्रद्धा का विषय है, इस विषय में मुझे कुछ नहीं कहना | लेकिन क्या कभी किसी ग़रीब नंगे का तन ढकने का विचार मन में आया ? मन्दिरों में होने वाले धार्मिक आयोजनों में छप्पन भोगों का प्रसाद लगाया जाता है, और यह प्रसाद केवल उन्हीं लोगों को प्राप्त हो सकता है जो इसके लिये तगड़ा चन्दा देते हैं | शेष लोगों को केवल हलवा-पूरी देकर वहाँ से भगा दिया जाता है | काश इस प्रकार के छप्पन भोग के स्थान पर ग़रीबों का पेट भरने की सोचें… नारायणी सेवा करें… यदि एक भी ग़रीब दुखियारे को गले से लगा लिया तो परमात्मा से साक्षात्कार इसी जन्म में इसी पृथिवी पर हो जाएगा… उसके लिये दूसरा जन्म लेने की या किसी दूसरे लोक में जाने की आवश्यकता नहीं… क्योंकि वास्तविक परमात्मतत्व तो हमारी अन्तरात्मा ही है… और यह आत्मा सृष्टि के हर कण में विद्यमान है… फिर मानव मानव में ये भेद क्यों ??? आख़िर क्यों ???

ना मन्दिर में, ना मस्ज़िद में, ना गिरजे या गुरद्वारे में |
उसको मत खोजो बाहर, वह तो हर एक दिल में बसता है ||
मन्दिर में पत्थर की मूरत को जी भरकर नहलाते हो |
आ जाए कोई प्यासा दर पर, तो उसको दूर भगाते हो ||
छप्पन चीज़ों का भोग तो उस प्रस्तर प्रतिमा को देते हो |
और “कर्म करो” गीता की ये शिक्षा भूखे को देते हो ?
ईश्वर की प्रतिमा को मौसम के सभी वस्त्र पहनाते हो |
पर एक ग़रीब नंगे का तन ढकने को न आतुर होते हो ||
ऊँची आवाज़ों में माइक पर ईश्वर अल्लाह जपते हो |
पर दीन हीन की करुण पुकारों से हरदम कतराते हो ||
ऐ काश कभी झाँको मन में, ऐ काश कभी आँखें खोलो |
अपनी आत्मा को झकझोरो, कातर को बाँहों में भर लो ||
गर ऐसा कर पाए, तो जानो ईश मिलेगा भू पर ही |
है नहीं अलग वह मानव से, है रचा बसा हर कण कण में ||

यही एक बस पाठ पढ़ाती

घहर घहर पुरवैया चलती, गुन गुन गाती पछुआ बहती |
पपिहा पिहू की टेर लगाता, कुहू कुहू कोयलिया गाती ||
भौंरे गुन गुन गुन गुन करते, कलियों पर मंडलाते रहते |
औत जवानी की मस्ती में हर पल फिर नादानी करते ||
हर वन उपवन महका जाए, हर घर आँगन मस्ती छाए |
धरती का ये हरा घाघरा, मस्त पवन संग उड़ता जाए ||
फूलों से ये लदी डालियाँ, मतवाली हों रास रचाएँ |
जिसको लख कर हर प्रेमी का, पागल सा मन बहका जाए ||
फागुन की मस्ती में डूबी प्रकृति नटी मन में हर्षाती |
रात आज की प्रेम पगी हो, यही सोच हर साज सजाती ||
मतवाली थी रात प्रणय की, यही सुबह की लाली कहती |
और दिवस के उजियाले में, फिर नूतन श्रृंगार रचाती ||
वासन्ती ये रुत मानव को, शाश्वत एक सत्य दिखलाती |
करो आज की चिंता, कल है किसने देखा, यही बताती ||
कल जो बीत गया, सपना था, यही एक पल चरम सत्य है |
इस पल की मस्ती में जी लो, यही एक बस पाठ पढ़ाती ||