प्यार, एक मीठा अहसास

प्यार नहीं है शब्दों का कोई खेल, है बस मीठा अहसास |
जहाँ सभी भावों अनुभावों का हो जाता मात्र अभाव ||
कहीं शून्य में खो जाते दो प्रेमी, पल का भान न रहता |
सभी विचार तिरोहित होकर, हो जाते केवल आकाश ||
हरी घास का कोमल सा स्पर्श कभी रोमाँचित करता |
और कभी चन्दा की शीतल किरणें आग लगा जाती हैं ||
कभी तरसते कान कि कोई लेकर नाम पुकारे हर पल |
और कभी उद्विग्न बना जाता समीपता का अहसास ||
कभी किसी की मुसकानों में हैं गुलाल के रंग बिखरते |
और कभी मन में बसन्त की पीली सरसों खिल उठती है ||
कभी दिवाली की जगमग सी मीठी सी तकरार उपजती |
और कभी सावन की रिमझिम सा फिर नेह बरस जाता है ||
दो आत्माएँ जब ऐसे ही एक दूजे में घुल मिल जातीं |
दुई का सारा भेद मिटाकर सारे बन्धन खुल जाते हैं ||
नहीं जटिलता कोई रहती, प्रेम ध्यान तब बन जाता है |
और धरा आकाश मुदित मन अद्भुत रास रचा जाते हैं ||

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कहीं खो गया परिचय मेरा

इस जगती की भरी भीड़ में कहीं खो गया परिचय मेरा |
इसीलिये तो इतना आकुल, इतना व्याकुल है मन मेरा ||
मैंने कितने स्वप्न सजाए थे अपने परिचय के बल पर |
किन्तु भाव और ज्ञान मध्य ही रहे झूलते वे हर एक पल ||
जगी भोर के उजियाले में कहीं खो गया स्वप्न सलोना |
इसीलिये तो इतना आकुल, इतना व्याकुल है मन मेरा ||
जिन पर परिचय किया समर्पित, उनसे थीं मुझको आशाएँ |
किन्तु उन्होंने ही इच्छाओं के मग में डालीं बाधाएँ ||
इस जगती के कोलाहल में कहीं खो गया गान सुरीला |
इसीलिये तो इतना आकुल, इतना व्याकुल है मन मेरा ||
साँसों का राही अज्ञात दिशा में हर पल बढ़ा जा रहा |
जहाँ नहीं पहचान किसी को, उस पथ पर वह चला जा रहा ||
किन्तु प्रमाद भरी रजनी में कहीं खो गया मार्ग पुराना |
इसीलिये तो इतना आकुल, इतना व्याकुल है मन मेरा ||

भर लो रंगों से पिचकारी

प्रिय मित्रों, आज सभी ने जी भरकर फाग खेला – होली का त्यौहार मनाया – ख़ूब मन भरकर गुझिया दही भल्ले पापड़ी चाट खाई – इसी अवसर एक लिये एक रचना लिखी थी, जो होली की व्यस्तताओं के चलते पोस्ट नहीं कर सकी, अब समय मिला है सो पोस्ट कर रही हूँ – होली की रंगभरी उमंगभरी शुभकामनाओं के साथ…

भर लो रंगों से पिचकारी आज होली है
मुख पे मलने दो गुलाल, आज होली है |
तुम्हारा मुखड़ा होगा लाल, आज होली है
कि तन पे टेसू का है रंग लाल, होली है ||
ये कैसी मदमाती शाम आज आई है
किसी के प्यार का संदेसा आज लाई है |
तो बाँटो प्यार जग के कण कण में, होली है
रहे बहार ही बहार आज होली है ||
गीत फूलों में, कलियों में रागिनी है
डाल डाल बसन्ती बयार झूमती है |
कूक कोयल की सुनके हूक उठती है
पिया मिलन की आस मन में, आज होली है ||
काफ़ी बिरहा चैती और धमार गाते सब
ढोल ढफली झाँझ चंग हैं बजाते सब |
है भँवरा झूमता, कली भी संग डोलती है
कि मस्त मलय पवन महके, आज होली है ||
भाव मन में आज इन्द्रधनुष जैसे हैं
और उमंगों के तार झनझनाते हैं |
हरेक कंठ में मुखर ये आज रागिनी है
सजाओ गीतों भरी शाम आज होली है ||

न्यू हिंदी नेट्वर्किंग एसोसिएशन

प्रिय मित्रों,

सर्वप्रथम तो आप सभी को होली की ढेर सारी रंगों भरी, उमंगों भरी हार्दिक शुभकामनाएँ…

हाल ही में हिन्दी के जाने माने साहित्यकार जनाब असग़र वजाहत की प्रेरणा से (जिनका “जिस लाहोर नहीं वेख्या…” नाटक जगप्रसिद्द है) हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के प्रचार प्रसार हेतु “न्यू हिन्दी नेटवर्किंग एसोसिएशन” नाम से एक संस्था का गठन किया गया है | संस्था के नाम “न्यू हिन्दी नेटवर्किंग एसोसिएशन” पर कुछ लोगों ने प्रश्न किया कि संस्था का नाम अंग्रेज़ी में क्यों है ? तो इसका कारण है कि संस्था का प्रमुख कार्य रहेगा हिंदी के उत्कृष्ट साहित्य का अन्य भारतीय भाषाओं के साथ साथ विदेशी भाषाओं में अनुवाद करवाके उनका प्रकाशन कराके विश्व के अन्य पाठकों तक पहुँचाना | आज स्थिति लगभग यह है कि भारतीय लेखकों द्वारा रचित अंग्रेज़ी साहित्य का यदि हिन्दी में अनुवाद हो जाता है तो हमारे प्रिय मित्र उसे बड़े मन से पढ़ते हैं और वह पुस्तक “बेस्ट सेलर” की श्रेणी में आ जाती है | यहाँ तक कि हमने देखा है कि हमारे अपार्टमेंट के सामने बाज़ार में जो दो पुस्तक विक्रेता बैठते हैं उनके पास भी एक भी पत्रिका या पुस्तक हिंदी भाषा की नहीं होती | बस अंग्रेज़ी पत्र पत्रिकाएँ और अंग्रेज़ी पुस्तकें ही वहाँ उपलब्ध होती हैं | हम जैसे लोगों को हिंदी की पुस्तकें मंगानी होती हैं तो उन्हें या तो “ऑर्डर” देते हैं या फिर अपने आप ही प्रकाशक से मंगा लेते हैं | न जाने क्यों हम हिंदी भाषी लोग ही हिंदी का साहित्य पढने में शर्म का अनुभव करते हैं ? हमारे ड्राइंगरूम की “बुक शेल्फ” में अंग्रेज़ी भाषा का साहित्य बड़ी शान से शोभायमान होता है, हिंदी की तो कुछ बिरली पुस्तकें ही उस अंग्रेज़ी साहित्य के मध्य से “मुँह निकालकर” बाहर झाँक रही होती हैं |

अक्सर ऐसा भी देखने में आता है कि हिंदी साहित्य या हिंदी संगीत के कार्यक्रमों का संचालन भी संचालक महोदय या महोदया अंग्रेज़ी में ही करते हैं | संगीत के कार्यक्रमों में कलाकार हिंदी अथवा भारत की अन्य भाषाओं-लोकभाषाओं के गीत, नृत्य अथवा शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम आदि प्रस्तुत करते हैं, लेकिन “एंकर” महोदय अंग्रेज़ी में “एंकरिंग” करते नज़र आते हैं | जबकि वहाँ उपस्थित श्रोता और दर्शकगण हिन्दी बोल भी अच्छी तरह लेते हैं और समझते भी हैं – क्योंकि आख़िर को हैं तो भारतीय ही – और हिन्दी हमारी मातृभाषा है | पर इसी भाषा के साथ इतना सौतेलापन किसलिये है – यह समझ से परे की बात है |

दूसरी ओर आलम ये है कि हिंदी भाषा में लिखा हुआ साहित्यिक दृष्टि से उच्च कोटि का बहुत सा ऐसा साहित्य है जो अभी तक प्रकाशित भी नहीं हो सका है – “बेस्ट सेलर” तो दूर की बात है | रचनाकार प्रकाशक के पास जाता है तो वह पहले ही लाख़-डेढ़ लाख़ रूपये का तक़ाज़ा कर देता है – पुस्तक बिकने के बाद रॉयल्टी की तो भूल ही जाइए | हममें से काफ़ी लोगों की मानसिकता यह है कि विदेशों का ठप्पा लगकर यदि कुछ हमारे हाथ में आता है तो वह हमारे लिये कहीं अधिक महत्व का हो जाता है |

इन्हीं सब कारणों से सोचा गया कि यदि हमारा हिंदी भाषा के कुछ चुने हुए साहित्य का विदेशी भाषाओं में अनुवाद कराके विश्व के पाठकों के पास पहुँचाया जाए तो कैसा रहे ? और इसी बात को ध्यान में रखकर संस्था का गठन किया गया है | और क्योंकि हमें भारतीय पाठकों के साथ विदेशी भाषा भाषी पाठकों तक भी पहुँचना है, तो यही कारण है कि संस्था का नाम “न्यू हिन्दी नेटवर्किंग एसोसिएशन” रखा गया |

बहरहाल, संस्था के उद्घाटन के अवसर पर पूर्वी दिल्ली के सीताराम अपार्टमेंट में चौदह मार्च को सांय पाँच बजे से एक छोटी सी काव्य सन्ध्या का आयोजन “होली मिलन” के रूप में किया गया | कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे हिंदी के मूर्धन्य कवि, साहित्यकार और इतिहासवेत्ता श्री इबरार रब्बी | इस काव्य सन्ध्या में श्रीमती इन्दु राव, विज्ञान की प्रवक्ता श्रीमती ज्योति गौतम, प्रसिद्द कवि श्री राजीव जायसवाल, श्री मुकेश सिंह, ग़ज़लगो जनाब साहिल साहब, डॉ. सुमित्रा शर्मा, रोहतक से आए श्री निपुण सीकरी और संस्था के सचिव डॉ. दिनेश शर्मा ने होली के अनेकों रंगों में भीगी अपनी रंग बिरंगी रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं को होली के रंगों में रंग डाला | अब जहाँ इतने रसिक श्रोता बैठे हों और इतने बड़े बड़े कविगण उपस्थित हों वहाँ भला हम अपनी कविताएँ पढ़ने का लोभ कैसे संवरण कर सकते थे ? सो हमने भी बहती गंगा में हाथ धो डाला और अपनी कुछ रचनाएँ झेलने के लिये श्रोताओं को विवश कर ही दिया | जैसा कि ऊपर लिखा, मुख्य अतिथि थे श्री इबरार रब्बी – उन्होंने भी अपनी अन्य रचनाओं के साथ साथ श्रोताओं की फर्माइश पर “अरहर की दाल” शीर्षक से अपनी रचना कार्यक्रम के अन्त में प्रस्तुत की | इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष जनाब असग़र वजाहत साहब, संरक्षिका श्रीमती बानू बंसल और सीताराम अपार्टमेंट में प्रधान श्री कपूर साहब भी उपस्थित थे | कुल मिलाकर यह काव्य सन्ध्या बहुत मस्ती भरी रही |

भविष्य में होने वाली गतिविधियों की सूचना आप तक अवश्य पहुँचाते रहेंगे |

होली है

होली है, हुडदंग मचा लो, सारे बन्धन तोड़ दो |
और नियम संयम की सारी आज दीवारें तोड़ दो ||
कैसा नखरा, किसका नखरा, आज सभी को रंग डालो |
जो होगा देखा जाएगा, आज न रंग में भंग डालो ||
माना गोरी सर से पल्ला खिसकाके देगी गाली
तीखी धार कटारी की है, मत समझो भोली भाली |
पर टेसू के रंग में इसको सराबोर तुम आज करो
शहद पगी गाली के बदले मुख गुलाल से लाल करो ||
पूरा बरस दबा रक्खी थी साध, उसे पूरी कर लो
जी भरके गाली दो, मन की हर कालिख़ बाहर फेंको ||
नहीं कोई है रीत, नहीं है कोई बन्दिश होली में
मन को जिसमें ख़ुशी मिले, बस ऐसी तुम मस्ती भर लो ||
जो रूठा हो, आगे बढ़के उसको गले लगा लो आज
बाँहों में भरके आँखों से मन की तुम कह डालो आज |
शरम हया की बात करो मत, बन्धन ढीले आज करो
नाचो गाओ धूम मचाओ, पिचकारी में रंग भरो ||
गोरी चाहे प्यार के रंग में रंगना, मान उसका रख लो
कान्हा चाहे निज बाँहों में भरना, दिल उसका रख लो |
डालो ऐसा रंग, न छूटे बार बार जो धुलकर भी
तन मन पुलकित हो, कुछ ऐसा प्रेम प्यार का रंग भर दो ||

ऐसी होरी की न कौनो उपमा जहान में

मित्रों, होली का हुडदंग शुरू हो चुका है | यों रंग खेलने की होली १७ मार्च को है, पर बच्चों ने तो कई दिन पहले से ही आते जातों पर रंग फेंकना शुरू कर दिया था | और सदा से ही रंग की एकादशी के साथ ही बड़े भी एक दूजे को रंगने लग जाते हैं | तो होली के इस रंगारंग पर्व की रंग और मस्ती भरी ढेर सारी शुभकामनाएँ… “एडवांस” में…

ऐसी खेले होरी, कान्हा करे बरजोरी
कैसो निपट अनारी, मोरी बैयाँ दी मरोर है |
रंग डारो अबीर गुलाल भर मुठिया में
टेसू रंग भर छोड़े वो तो पिचकारी है ||
रंग डारे कान्हा, सारी चुनरी भिगाय देत
रंग भीगी चोली वाके तन से लिपट जात |
भीगी सारी, भीगी चोली, अब कहाँ जाए गोरी
कान्हा अब बाँकी चितवन से निहारे है ||
मन में उमंग भरी गोरी मुसकात देखो
ऊपर से मुँह भर भर देत गारी है |
धरती गगन हुए आज लाल लाल देखो
ऐसो चहुँदिसि आज उड़त गुलाल है ||
छेड़ करत कान्हा, गोरी मुख चूम लेत
मन में लजात गोरी, अँखियाँ तरेर देत |
काफी और फाग गाए, मन में हुलास भर
ऐसी होरी की न कौनो उपमा जहान में ||

मन में सदा हिलोरें भरतीं

मन में कितनी भरी उमंगें, ज्यों सागर में अनगिन लहरें |
भाव तरंगित होते, लगता मधुर गान हैं गाती लहरें ||
मन पंछी बन ऊँचे ऊँचे दूर गगन में उड़ना चाहे |
जहाँ न उसको भान रहे कुछ ओर छोर का, बस ये चाहे ||
स्वप्न बने हैं संगी साथी, जिनके संग वह उड़ना चाहे |
भावों के तूफ़ानों में भी अपनी राह बनाना चाहे ||
चाहे इतनी दूर पहुँचना, जहाँ न कुछ हो ठौर ठिकाना |
इतनी दूर बहे मन नदिया, जहाँ न हो कोई तीर किनारा ||
किन्तु नदी के जैसी मन की पीड़ा शब्दों में न समाती |
स्वतः तरंगित हुए लहर से भाव दूर तक बहते जाते ||
मन की नैया इन भावों की लहरों में है डगमग करती |
सधे हाथ हों, ऐसे नाविक की वह राह निहारा करती ||
कुछ बातों से मन है दुखता, कुछ बातों से मन है थकता |
पर फिर भी ये सभी उमंगें मन में सदा हिलोरें भरतीं ||