मन में सदा हिलोरें भरतीं

मन में कितनी भरी उमंगें, ज्यों सागर में अनगिन लहरें |
भाव तरंगित होते, लगता मधुर गान हैं गाती लहरें ||
मन पंछी बन ऊँचे ऊँचे दूर गगन में उड़ना चाहे |
जहाँ न उसको भान रहे कुछ ओर छोर का, बस ये चाहे ||
स्वप्न बने हैं संगी साथी, जिनके संग वह उड़ना चाहे |
भावों के तूफ़ानों में भी अपनी राह बनाना चाहे ||
चाहे इतनी दूर पहुँचना, जहाँ न कुछ हो ठौर ठिकाना |
इतनी दूर बहे मन नदिया, जहाँ न हो कोई तीर किनारा ||
किन्तु नदी के जैसी मन की पीड़ा शब्दों में न समाती |
स्वतः तरंगित हुए लहर से भाव दूर तक बहते जाते ||
मन की नैया इन भावों की लहरों में है डगमग करती |
सधे हाथ हों, ऐसे नाविक की वह राह निहारा करती ||
कुछ बातों से मन है दुखता, कुछ बातों से मन है थकता |
पर फिर भी ये सभी उमंगें मन में सदा हिलोरें भरतीं ||

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