न्यू हिंदी नेट्वर्किंग एसोसिएशन

प्रिय मित्रों,

सर्वप्रथम तो आप सभी को होली की ढेर सारी रंगों भरी, उमंगों भरी हार्दिक शुभकामनाएँ…

हाल ही में हिन्दी के जाने माने साहित्यकार जनाब असग़र वजाहत की प्रेरणा से (जिनका “जिस लाहोर नहीं वेख्या…” नाटक जगप्रसिद्द है) हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के प्रचार प्रसार हेतु “न्यू हिन्दी नेटवर्किंग एसोसिएशन” नाम से एक संस्था का गठन किया गया है | संस्था के नाम “न्यू हिन्दी नेटवर्किंग एसोसिएशन” पर कुछ लोगों ने प्रश्न किया कि संस्था का नाम अंग्रेज़ी में क्यों है ? तो इसका कारण है कि संस्था का प्रमुख कार्य रहेगा हिंदी के उत्कृष्ट साहित्य का अन्य भारतीय भाषाओं के साथ साथ विदेशी भाषाओं में अनुवाद करवाके उनका प्रकाशन कराके विश्व के अन्य पाठकों तक पहुँचाना | आज स्थिति लगभग यह है कि भारतीय लेखकों द्वारा रचित अंग्रेज़ी साहित्य का यदि हिन्दी में अनुवाद हो जाता है तो हमारे प्रिय मित्र उसे बड़े मन से पढ़ते हैं और वह पुस्तक “बेस्ट सेलर” की श्रेणी में आ जाती है | यहाँ तक कि हमने देखा है कि हमारे अपार्टमेंट के सामने बाज़ार में जो दो पुस्तक विक्रेता बैठते हैं उनके पास भी एक भी पत्रिका या पुस्तक हिंदी भाषा की नहीं होती | बस अंग्रेज़ी पत्र पत्रिकाएँ और अंग्रेज़ी पुस्तकें ही वहाँ उपलब्ध होती हैं | हम जैसे लोगों को हिंदी की पुस्तकें मंगानी होती हैं तो उन्हें या तो “ऑर्डर” देते हैं या फिर अपने आप ही प्रकाशक से मंगा लेते हैं | न जाने क्यों हम हिंदी भाषी लोग ही हिंदी का साहित्य पढने में शर्म का अनुभव करते हैं ? हमारे ड्राइंगरूम की “बुक शेल्फ” में अंग्रेज़ी भाषा का साहित्य बड़ी शान से शोभायमान होता है, हिंदी की तो कुछ बिरली पुस्तकें ही उस अंग्रेज़ी साहित्य के मध्य से “मुँह निकालकर” बाहर झाँक रही होती हैं |

अक्सर ऐसा भी देखने में आता है कि हिंदी साहित्य या हिंदी संगीत के कार्यक्रमों का संचालन भी संचालक महोदय या महोदया अंग्रेज़ी में ही करते हैं | संगीत के कार्यक्रमों में कलाकार हिंदी अथवा भारत की अन्य भाषाओं-लोकभाषाओं के गीत, नृत्य अथवा शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम आदि प्रस्तुत करते हैं, लेकिन “एंकर” महोदय अंग्रेज़ी में “एंकरिंग” करते नज़र आते हैं | जबकि वहाँ उपस्थित श्रोता और दर्शकगण हिन्दी बोल भी अच्छी तरह लेते हैं और समझते भी हैं – क्योंकि आख़िर को हैं तो भारतीय ही – और हिन्दी हमारी मातृभाषा है | पर इसी भाषा के साथ इतना सौतेलापन किसलिये है – यह समझ से परे की बात है |

दूसरी ओर आलम ये है कि हिंदी भाषा में लिखा हुआ साहित्यिक दृष्टि से उच्च कोटि का बहुत सा ऐसा साहित्य है जो अभी तक प्रकाशित भी नहीं हो सका है – “बेस्ट सेलर” तो दूर की बात है | रचनाकार प्रकाशक के पास जाता है तो वह पहले ही लाख़-डेढ़ लाख़ रूपये का तक़ाज़ा कर देता है – पुस्तक बिकने के बाद रॉयल्टी की तो भूल ही जाइए | हममें से काफ़ी लोगों की मानसिकता यह है कि विदेशों का ठप्पा लगकर यदि कुछ हमारे हाथ में आता है तो वह हमारे लिये कहीं अधिक महत्व का हो जाता है |

इन्हीं सब कारणों से सोचा गया कि यदि हमारा हिंदी भाषा के कुछ चुने हुए साहित्य का विदेशी भाषाओं में अनुवाद कराके विश्व के पाठकों के पास पहुँचाया जाए तो कैसा रहे ? और इसी बात को ध्यान में रखकर संस्था का गठन किया गया है | और क्योंकि हमें भारतीय पाठकों के साथ विदेशी भाषा भाषी पाठकों तक भी पहुँचना है, तो यही कारण है कि संस्था का नाम “न्यू हिन्दी नेटवर्किंग एसोसिएशन” रखा गया |

बहरहाल, संस्था के उद्घाटन के अवसर पर पूर्वी दिल्ली के सीताराम अपार्टमेंट में चौदह मार्च को सांय पाँच बजे से एक छोटी सी काव्य सन्ध्या का आयोजन “होली मिलन” के रूप में किया गया | कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे हिंदी के मूर्धन्य कवि, साहित्यकार और इतिहासवेत्ता श्री इबरार रब्बी | इस काव्य सन्ध्या में श्रीमती इन्दु राव, विज्ञान की प्रवक्ता श्रीमती ज्योति गौतम, प्रसिद्द कवि श्री राजीव जायसवाल, श्री मुकेश सिंह, ग़ज़लगो जनाब साहिल साहब, डॉ. सुमित्रा शर्मा, रोहतक से आए श्री निपुण सीकरी और संस्था के सचिव डॉ. दिनेश शर्मा ने होली के अनेकों रंगों में भीगी अपनी रंग बिरंगी रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं को होली के रंगों में रंग डाला | अब जहाँ इतने रसिक श्रोता बैठे हों और इतने बड़े बड़े कविगण उपस्थित हों वहाँ भला हम अपनी कविताएँ पढ़ने का लोभ कैसे संवरण कर सकते थे ? सो हमने भी बहती गंगा में हाथ धो डाला और अपनी कुछ रचनाएँ झेलने के लिये श्रोताओं को विवश कर ही दिया | जैसा कि ऊपर लिखा, मुख्य अतिथि थे श्री इबरार रब्बी – उन्होंने भी अपनी अन्य रचनाओं के साथ साथ श्रोताओं की फर्माइश पर “अरहर की दाल” शीर्षक से अपनी रचना कार्यक्रम के अन्त में प्रस्तुत की | इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष जनाब असग़र वजाहत साहब, संरक्षिका श्रीमती बानू बंसल और सीताराम अपार्टमेंट में प्रधान श्री कपूर साहब भी उपस्थित थे | कुल मिलाकर यह काव्य सन्ध्या बहुत मस्ती भरी रही |

भविष्य में होने वाली गतिविधियों की सूचना आप तक अवश्य पहुँचाते रहेंगे |

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