कहीं खो गया परिचय मेरा

इस जगती की भरी भीड़ में कहीं खो गया परिचय मेरा |
इसीलिये तो इतना आकुल, इतना व्याकुल है मन मेरा ||
मैंने कितने स्वप्न सजाए थे अपने परिचय के बल पर |
किन्तु भाव और ज्ञान मध्य ही रहे झूलते वे हर एक पल ||
जगी भोर के उजियाले में कहीं खो गया स्वप्न सलोना |
इसीलिये तो इतना आकुल, इतना व्याकुल है मन मेरा ||
जिन पर परिचय किया समर्पित, उनसे थीं मुझको आशाएँ |
किन्तु उन्होंने ही इच्छाओं के मग में डालीं बाधाएँ ||
इस जगती के कोलाहल में कहीं खो गया गान सुरीला |
इसीलिये तो इतना आकुल, इतना व्याकुल है मन मेरा ||
साँसों का राही अज्ञात दिशा में हर पल बढ़ा जा रहा |
जहाँ नहीं पहचान किसी को, उस पथ पर वह चला जा रहा ||
किन्तु प्रमाद भरी रजनी में कहीं खो गया मार्ग पुराना |
इसीलिये तो इतना आकुल, इतना व्याकुल है मन मेरा ||

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