Monthly Archives: March 2014

मत समझो मैं दुर्बल हूँ

मत समझो मैं दुर्बल हूँ, मैं हूँ साहस से परिपूर्ण सदा |
हर नई डगर पर चलती हूँ मैं अटल इरादे लिये सदा ||
मुझमें कितनी ही रूप भरे, मुझमें कितने ही रंग भरे |
दे दिये प्रकृति ने मुझको अपने सारे ही वरदान अरे ||
मुझमें धरती सा धीरज, पर्वत सी ऊँचाई भी मुझमें |
मन की चंचलता के संग ही सागर सी गहराई मुझमें ||
हों कितनी बाधाएँ मग में, पर पग न कभी रुकते मेरे |
हों कितनी घोर निराशाएँ, विश्वास अडिग रहते मेरे ||
मैं अँधियारी राहों में निज प्रकाश फैलाती जाती हूँ |
हों मग में कितने काँटे, मैं बस पुष्प खिलाती जाती हूँ ||
हैं आँखों में चिंगारी, साँसों में तूफाँ भी मचल रहे |
पर मस्त हवा के झोंके भी मन के पंखों में उलझ रहे ||
मैंने सूरज की दाहकता से दाहकता भी पाई है |
और धवल ज्योत्स्ना से चन्दा की शीतलता भी पाई है ||
अंगों में मलय समीर, कोयलिया कूक रही है वाणी में |
और उल्लासों के निर्झर का है गान बसा मेरे मन में ||
मैं चेतनता बन थके हुए राही को राह दिखाती हूँ |
पा जाए वह अपनी मंज़िल, ऐसा उल्लास जगाती हूँ ||
मैंने न कभी रुकना सीखा, बस आगे बढ़ती रही सदा |
मत समझो मैं दुर्बल हूँ, मैं हूँ साहस से परिपूर्ण सदा ||

विश्व महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ…

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कोटि कोटि नमन

प्रिय मित्रों, कल विश्व महिला दिवस है | सर्वप्रथम तो अपने साथ साथ आप सभी को अनेकशः शुभकामनाएँ | नारी के कई रूप… कहीं माँ तो कहीं बहन, कहीं पत्नी तो कहीं सखी तो कहीं मार्गदर्शक… नारी के इन सभी रूपों को नमन करने के साथ साथ मैं शीश झुकाती हूँ मातृशक्ति को… क्योंकि सभी रूपों में इसी शक्ति की प्रधानता है… और साथ ही अपनी माँ की स्मृति में कुछ पंक्तियाँ… जो केवल मेरी ही माँ के लिये नहीं, समग्र मातृशक्ति के लिये समर्पित हैं… क्योंकि माँ तो बस माँ होती है…

तुम आज साथ नहीं मेरे
पर जहाँ भी हो
नमन तुम्हें है |
मेरे सुख में, दुःख में
सदा साथ थीं तुम मेरे |
जागीं मेरे साथ रातों को
जब मैं करती थी तैयारी
अपनी परीक्षाओं की
कहीं सो न जाऊँ मैं
इसलिये बीच बीच में
करती रहतीं मेरी क्षुधा शान्त |
हो जाती घर लौटने में देर
तुम भूखी प्यासी
बैठी मिलतीं मेरे इंतज़ार में |
स्नेह, त्याग और एकनिष्ठता की
साक्षात प्रतिमूर्ति तुम
प्रयासरत रहतीं मुझे सही मार्ग दिखाने को |
तुमने ही दिया सौन्दर्य
मिट्टी की इस काया को
सींच कर अपनी ममता से |
हाँ माँ
नहीं चुका सकती क़र्ज़ तुम्हारा
क्योंकि जानती हूँ
अभी भी नहलाती रहती हो तुम
अपने आशीर्वादों से
दूर गगन में बैठी
झाँकती हुई
तारों के मध्य से |
बिना माप तौल किये
बस बरसाती जाती हो
स्नेह जल |
कोटि कोटि नमन है माँ तुम्हें…

शब्द कम पड़ गए है कथन के लिये

क्या कहें क्या सुनाएँ भला आज हम,
शब्द कम पड़ गए है कथन के लिये |
भाव हैं, किन्तु अभिव्यक्त कैसे करें,
शब्द कम पड़ गए हैं कथन के लिये ||
तुम जो आए तो मीठे मधुर स्वर जगे,
कान में धीमे धीमे मंजीरे बजे |
झनझनाहट हुई मन के तारों में कुछ,
अनगिनत साज़ फिर मीठी धुन में बजे ||
एक मीठी सी सरगम यों बनती रही,
होश किसको रहा तब मनन के लिये ||
तुम चले, तो मचलती पवन चल पड़ी,
तुम रुके तो लहर भी है थम सी गई |
हँस दिये तुम, तो इठलाती बिजली हँसी,
चाँद की चाँदनी कुछ लजा सी गई ||
तब धरा पर पड़ी ओस की बूँद भी
तन तुम्हारे लगी एक छुअन के लिये ||
तुमको देखा तो पगलाए मन ने कहा,
रोक लेगा तुम्हें वो सदा के लिये |
पर क्या चन्दा को तारों भरी चाँदनी
रोक पाई कभी भी सदा के लिये ?
भोर की चाँदनी में नहाई किरण
बनती सोने की, जग के तपन के लिये ||
किन्तु फिर भी तुम्हारा वो पल भर मिलन
तृप्त कर देगा कुछ पल मेरी प्यास को |
फिर मिलन की सँजोए हुए आस मन
गुनगुनाएगा मीठे मधुर राग को ||
मध्य अपने जो मीठी वो बातें हुईं
यादें काफ़ी हैं उसकी नमन के लिये ||