Bayar 1
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बयार

उग्रता और दृढ़ संकल्प शक्ति के साथ साथ भावुकता, लचीलेपन और कोमलता का एक संतुलित और निहायत ख़ूबसूरत सम्मिलन “नारी” जब तक “कन्या” रहती है, तटविहीन नदिया की भाँति उसका उन्मुक्त प्रवाह धरती के कण कण को, ब्रह्माण्ड को सरस बनाता जाता है | पर जिस दिन मिल जाती है सागर में, विस्मृत कर देती है अपने अस्तित्व को | सुगन्धित मलय पवन की मीठी “बयार” की भाँति बिना भेद भाव दिशा दिशा महकाती जाती है | क्या कोई सीमा मलयानिल की सुवासित और मदमस्त कर देने वाली “बयार” को बाँध सकती है ? किन्तु एक दिन ऐसा आता है जब दूसरों को बेसुध बना देने वाली वही “बयार” किसी की मधुर मुस्कान लख स्वयम् अपनी सुध बुध खो बैठती है | ऐसी है मेरी यह “बयार”, जो सम्भव है आपको यत्र तत्र सर्वत्र देखने को मिल जाए | जिसके विषय में इतना ही कहना चाहूँगी…

सरल नहीं पकड़ना / पुष्पों के गिर्द इठलाती तितली को |

हर वृक्ष पर पुष्पित हर पुष्प उसका है

तभी तो इतराती फिरती है कभी यहाँ कभी वहाँ / निर्बाध गति से |

बाँध सकोगे मुक्त आकाश में ऊँची उड़ान भरते पक्षियों को ?

समस्त आकाश है क्रीड़ास्थली उनकी

हाथ फैलाओगे कहाँ तक ?

कितने बाँध बना दो कल कल छल छल करती नदिया पर

उन्मुक्त प्रवाह से निकाल ही लेगी राह जहाँ तहाँ से

पहुँचने को प्रियतम सागर के पास |

स्वच्छन्द बहती मलय पवन की बयार के साथ

बहते चले जाओगे तुम भी किसी अनजानी सी दिशा में |

क्योंकि ये तितलियाँ, कल कल छल छल बहती नदिया,

खगचर, मलयानिल / मचलते हैं, प्रवाहित होते हैं

पूर्ण स्वच्छन्दता से, अपनी शर्तों पर…

प्रकाशक : एशिया पब्लिशर्स, ए ३६, चेतक अपार्टमेंट्स, सेक्टर ९, रोहिणी, दिल्ली-८५ से प्रकाशित मेरा नया उपन्यास “बयार”…