बयार

यह जगत सदा परिवर्तनरत, मैं इसका आदि, अन्त भी मैं |
मैं हूँ एक नश्वर देह, मगर है मुझसे परे नहीं कुछ भी ||
मुझसे सूरज ने तेज लिया, चन्दा ने धवल ज्योत्सना ली |
सागर की बहती लहरों ने मुझसे ही तो चंचलता ली ||
मैं ही कल कल करती नदिया में बन प्रवाह विचरण करती |
मैं हूँ एक नश्वर देह, मगर है मुझसे परे नहीं कुछ भी ||
मैं हूँ ध्वनियों की ध्वनि, प्राणों का प्राण अरे मैं ही तो हूँ |
मैं संकल्पों का सार, मनुज की मानवता मैं ही तो हूँ ||
इस जग के हर इक कण कण में मैं ही हूँ सदा लीन रहती |
मैं हूँ एक नश्वर देह, मगर है मुझसे परे नहीं कुछ भी ||
मुझसे प्रकाश पाया जग ने, मुझसे ही जीवन गीत लिया |
हर प्रणय गीत के छन्द छन्द में है मेरा ही राग जगा ||
है मुझसे दूर भागता भय, मैं सब पर स्नेह लुटा देती |
मैं हूँ एक नश्वर देह, मगर है मुझसे परे नहीं कुछ भी ||
एशिया पब्लिशर्स, ए ३६, चेतक अपार्टमेंट्स, सेक्टर ९, रोहिणी, दिल्ली-८५ से प्रकाशित मेरे उपन्यास “बयार” से…

बयार

संयम का वरदान लिये और लज्जा की मुसकान लिये

अन्तर में मनुहार लिये वो करती हास विलास है |

भोलेपन के मधुर हास में ओ राही तू खो ना जाना

बौराई सी मृदु चितवन में खिला हुआ मधुमास है ||

प्रायः यह विषय सदा से ही गरमा गरम बहस का विषय रहा है कि स्त्री और पुरुष में कौन अधिक शक्तिशाली है | लेखक होने के साथ साथ एक नारी संगठन से जुड़ी होने के नाते मेरे लिये भी यह विषय उतना ही आकर्षक है | यह सार्वभौम सत्य है कि स्त्री सदा से ही पुरुष की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है | वास्तव में तो पुरुष की समस्त शक्ति नारी रूपा ही है – क्योंकि शक्ति स्त्री तत्व है | किन्तु स्त्री का बल उसकी कोमलता में होता है | जब भी वह पुरुष के सामान बलशाली अथवा कठोर बनने का प्रयास करेगी, कुछ न कुछ अमूल्य गँवा देगी | स्त्री में स्त्रीत्व का ही बल और साहस होना चाहिये | यदि स्त्री अपने विचित्र बल और साहस को पहचान जाए तो संसार का कोई पुरुष उसके साथ कुछ अनुचित करने का साहस कर ही नहीं सकता | किन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि स्त्री में आख़िर ऐसा क्या होता है जो पुरुष को उससे डरने के लिये विवश करता है ? उत्तर बिल्कुल सीधा सा है | वो गुण है स्त्री का स्त्रीत्व | पुरुष बिना रुके कितनी भी देर तक बहस कर सकता है, किन्तु अधिकाँश में जीत अन्त में स्त्री की ही होती है, भले ही वह उचित तर्क न प्रस्तुत कर सके | लाओत्से और उनके स्त्रीत्व से सम्बन्धित सिद्धान्त के विषय में चर्चा करते हुए ओशो ने स्पष्ट किया था “स्त्री स्वभावतः कोमल होने के कारण विजयी होती है | वह कभी झगड़ा नहीं करती, झगड़ने का प्रयास भर करती है और उसकी लड़ाई अप्रत्यक्ष किन्तु दृढ़ होती है | यदि वह किसी बात को नकारना चाहेगी तो मुँह से तो “हाँ” कहेगी, किन्तु उसका रोम रोम, उसकी हर क्रिया प्रतिक्रिया “नहीं” कह रहे होंगे | जिसमें इतनी अधिक गहराई हो उसे तुम किस प्रकार परस्त कर सकते हो ? यदि तुम स्त्री से प्रेम करते हो तो तुम्हारी पराजय निश्चित है | और देखा जाए तो यह अच्छी बात ही है कि कठोरता परस्त हो जाए और कोमलता विजयी हो जाए | क्योंकि दुष्टों पर विजय प्राप्त करने का यही एकमात्र उपाय है |”

भारतवर्ष में तो ईश्वर को भी अधिकाँश में मातृशक्ति के रूप में पूजा जाता है | चाहे वह माँ दुर्गा हों, सरस्वती हों, लक्ष्मी हों, यहाँ तक कि जो पुरुष देवता हैं उनकी उपासना के लिये भी उनकी नारी शक्ति का साथ में होना आवश्यक है, अन्यथा पूजा अधूरी मानी जाती है | संसार में अच्छे कार्य करने के लिये नारी के जैसी कोमलता आवश्यक है | इसलिये भारत में मातृशक्ति की उपासना एक अच्छी प्रक्रिया है | ईश्वर का प्रयास होता है हमें अपने नज़दीक बुलाने का, और इसीलिये वह एक रहस्यमयी सुगंध के रूप में सदा हमारे साथ चलता रहता है | अपने भीतर गहरे उतर कर ही उस सुगन्धित पुष्प का अनुभव किया जा सकता है | यह स्त्रीत्व नहीं तो और क्या है ? जितने भी ज्ञानी महापुरुष हुए हैं – गौतम बुद्ध और महावीर के उदाहरण लिये जा सकते हैं – सभी में स्त्री की गरिमा विद्यमान थी | यहाँ तक कि भगवान राम में भी स्त्री की कोमलता और मधुरता थी | भगवान कृष्ण में स्त्री और पुरुष शक्तियों का बहुत अच्छा सम्मिश्रण था | और भगवान शिव तो हैं ही अर्धनारीश्वर | इन सभी में स्त्री की वह गरिमा, मधुरता, प्रेम, और स्त्री शक्ति का वह रहस्य निहित है जो संसार के किसी भी अलैक्जैंडर अथवा नेपोलियन में नहीं था | यही कारण है कि मानवता पर इनका विस्तृत प्रभाव है | मानवता उनके समक्ष श्रद्धानत होती है | जबकि संसार पर विजय प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले सारे अलैक्जैंडर बुरी तरह असफल होते हैं – पराजित होते हैं | पुरुष शक्ति में उग्रता है इसलिये उसके समक्ष श्रद्धानत होने के स्थान पर उससे भयभीत हुआ जा सकता है | जबकि स्त्री शक्ति में दुर्गा भवानी की उग्रता होते हुए भी प्रेम और भावुकता की अधिकता होती है, इसीलिये वह अपनी ओर आकर्षित करती है और मानवता स्वतः ही उसके समक्ष श्रद्धानत हो जाती है | पौरुष कड़क होता है इसलिये दुर्बल होता है | टूट सकता है, झुक नहीं सकता | एडजस्ट नहीं कर सकता | हर हाल में बस तना रहना चाहता है | तो टूटना तो लाज़मी है | उसका अहम् इतना प्रबल होता है कि किसी भी प्रकार के समझौते के लिये वहाँ स्थान नहीं होता | जबकि मार्ग बस दो ही हैं – या तो टूट जाओ या झुक जाओ | स्त्रीत्व में लचीलेपन की शक्ति होती है – क्योंकि वह प्रत्येक परिस्थति में स्वयं को ढाल सकती है | जिसका सबसे प्रबल उदाहरण यही है कि विवाह के बाद लड़की पूर्ण रूप से अपरिचित एवं नवीन परिवेश में आती है और स्वयं को उसके अनुरूप बना लेती है | स्त्री की यही समझौतेवादी प्रकृति उसे शाश्वत बनाती है | ऐसी है मेरी यह “बयार”, जो सम्भव है आपको यत्र तत्र सर्वत्र देखने को मिल जाए |

तो आइये और बह जाइए मेरी इस “बयार” के प्रवाह में उन्मुक्त भाव से, जिसे प्रकाशित किया है एशिया पब्लिशर्स, ए ३६, चेतक अपार्टमेंट्स, सेक्टर ९, रोहिणी, दिल्ली-८५ ने…