बयार

वो नृत्य करती थी अपनी संतुष्टि के लिये | चाहती थी कि समस्त ब्रह्माण्ड उसके साथ एकलय हो, समभाव हो, आनन्द में नाच उठे | करती थी नृत्य समग्र को स्वयं में समाहित कर देने के लिये और स्वयं को अनन्त में लीन कर देने के लिये | अपनी किसी उपलब्धि पर, किसी ख्याति पर अभिमान नहीं था उसे | उसका था ही नहीं वह सब, वह तो था समग्र का… अनन्त का… पर क्या समझा पाती किसी को यह सब ? यह सब तो बस पापा ही समझ सकते थे…
मैं करती हूँ नृत्य / दोनों हाथों को ऊपर उठाकर, आकाश की ओर
भर लेने को आकाश अपने हाथों में |
चक्राकार घूमती हूँ / कई आवर्तन घूमती हूँ
गतों परनों तोड़ों और तिहाइयों के |
घूमते घूमते बन जाती हूँ बिन्दु / हो जाने को एक
ब्रह्माण्ड के उस चक्र के साथ |
मैं खोलती हूँ अपनी हथेलियों को ऊपर की ओर
बनाती हूँ एक मुद्रा, देने को निमन्त्रण समस्त विशाल को
आओ / नृत्य करो मेरे साथ
लय में लय, मुद्राओं में मुद्राएँ और भावों में भावों को मिला
और धीरे धीरे बढती है गति / छाता है उन्माद नृत्य में मेरे
क्योंकि मुझे होता है आभास अपनी एकता का, उस समग्र के साथ |
और मैं करती हूँ नृत्य, आनन्द में जीने के लिये उस क्षण को |
मैं करती हूँ नृत्य, शिथिल करने के लिये मन को
खो देने को अपनी सारी उपलब्धियाँ
रजकण की भाँति बिखरा देने को स्वयं को अनन्त में
मिटा देने को सारी सम्वेदनाएँ
विस्मृत कर देने को सारा ज्ञान
तथा सत्य में अन्तिम समर्पण को…

एशिया पब्लिशर्स, ए ३६, चेतक अपार्टमेंट्स, सेक्टर ९, रोहिणी, दिल्ली-८५ से प्रकाशित मेरे उपन्यास “बयार” से…

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s