ताओस पुएब्लो

अगले दिन यानी रविवार को पागोसा से ताओस के लिये रवाना होना था | पिछले दो दिनों से सुबह 7 बजते बजते कार में सवार हो जाते थे, लिहाज़ा रविवार को कुछ देर से जागने का सोचा गया | क्योंकि ताओस वहाँ से 157 मील की दूरी पर था, जो तीन घंटे से अधिक का समय नहीं लेती | तो रविवार को पागोसा में चाय नाश्ता करके 11 बजे के लगभग ताओस के लिये चल दिये, और जैसा सोचा था, दोपहर 2 बजे से कुछ पहले ही ताओस पहुँच गए थे | इस बार ताओस केवल पुएब्लो देखने के लिए ही आये थे, कयोंकि इससे पहले जब ताओस आये थे तो प्लाज़ा और दूसरी जगहें घूमने के चक्कर में इतनी देर हो गई थी कि पुएब्लो बंद हो चुका था | लिहाज़ा इस बार सोचा कि लंच बाद में करेंगे, पहले पुएब्लो देखकर आया जाए, और सबसे पहले वहीं का रुख़ किया | सौभाग्य से गाइडेड टूर का समय था, तो और दूसरे पर्यटकों के साथ हम भी गाइड के साथ हो लिये | ताओस पुएब्लो को यूनेस्को ने First Living World Heritage की श्रेणी में रखा है | जैसे भारत में पुराने ज़माने में गाँवों में मिट्टी के घर हुआ करते थे, यहाँ अभी भी उसी तरह के घर हैं, जिनमें सैंकड़ों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी ये लोग रहते आ रहे हैं – न यहाँ बिजली है न पानी… बहती नदी के पानी से अपनी रोजमर्राह की ज़रूरतें ये लोग पूरी करते हैं और सूरज ढलते ढलते अपने अपने घरों में घुस जाते हैं | पूरी तरह से प्राकृतिक वातावरण में जीते हैं ये लोग और इसी तरह भविष्य में भी रहना चाहते हैं | लगभग 25-30 आदिवासी नेटिव इन्डियन्स परिवार इस गाँव में रहते हैं जिनमें कई पीढ़ियों के लोग यानी पोते परपोते से लेकर दादा परदादा तक शामिल हैं और सब एक ही छत के नीचे रहते हैं | गाँव चारों तरफ से मिट्टी की चारदीवारी से घिरा हुआ है | घरों की छत पर जाने के लिये लकड़ी की सीढ़ियाँ इस्तेमाल की जाती हैं | खाना पकाने के लिये हर घर के बाहर मिट्टी का बड़ा सा तन्दूर बना हुआ है | यहाँ के इस ओवन में बेक की हुई ब्रेड्स लोकल बाज़ारों में भी बिकने के लिये आती हैं | इसके अतिरिक्त यहाँ के लोग पेंटिंग, फ़ोटोग्राफ़ी, मूर्तिकला, नृत्य-नाट्य, ड्रम बनाने, मिट्टी के बर्तन बनाने, मोतियों और तरह तरह के पत्थरों से आभूषण आदि बनाने और चमड़े के काम के बड़े अच्छे कारीगर हैं और यही सब इनके धनोपार्जन का ज़रिया भी हैं | गाँव में प्रवेश करते ही बड़ी खूबसूरत और गाँव वालों की कलात्मक रूचि का परिचय देती चर्च है, पर चर्च के फोटो लेने पर पाबन्दी है | ये लोग बहुत अधिक धर्मनिष्ठ लोग हैं और अपने पुराने रीति रिवाज़ों का कट्टरता से पालन करते हैं | जिस दिन कोई बड़ा धार्मिक आयोजन होता है उस दिन गाँव में पर्यटकों का प्रवेश वर्जित हो जाता है |

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हर घर के बाहर ऐसे ही गोल गोल बड़े बड़े मिट्टी के ओवन यानी तंदूर बने होते हैं…

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हिमशिखर के नीचे बसा गाँव….

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1619 में नेटिव इण्डियन मज़दूरों से स्पेनिश प्रीस्ट ने ये चर्च बनवाई थी जो बहुत विशाल थी, कहते हैं नेटिव इन्डियन्स के विद्रोह के समय इसमें काफ़ी तादाद में महिलाएँ और बच्चे आकर छिप गये थे जिस कारण इसे उन शरणार्थियों के साथ ही बम से उड़ा दिया गया था | आज बस इसका ये Bell Tower ही बाक़ी हैं, और यहाँ पर क़ब्रिस्तान बना दिया गया है क्योंकि सैंकड़ों औरतें बच्चे जो यहाँ शरण लिये हुए थे यहाँ ज़िन्दा दफ़न हो गये थे…

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ताओस पुएब्लो की रोमांचक यात्रा के बाद हम पहुँचे San Francisco De Asis Church, ये यहाँ की सबसे ज़्यादा फोटोग्राफ्ट चर्च मानी जाती है, यहाँ भी चर्च के भीतर की कलात्मकता के फोटो लेना तो वर्जित था, बाहर के ही कुछ फोटो ले सके……. ये चर्च के बाहर से ली गई फोटो…

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चर्च के भीतर से बाहर का दृश्य…

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चर्च के मुख्य प्रवेश के भीतर का भाग…

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चर्च का बाहरी भाग…

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चर्च के आस पास की कुछ बिल्डिंग्स… ये बिल्डिंग्स भी चर्च जितनी ही पुरानी हैं…

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