शुभ प्रभात

Good Morning35

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शुभ प्रभात

मित्रों, होली तो हो ली… सारे मेहमान भी छुट्टियाँ बिताकर अपने अपने घरों को वापस लौट गए… तो क्यों अब आप सरीखे गुणी और स्नेही मित्रों से पुनः सम्पर्क साधा जाए… इसी आशा के साथ सभी को आज का शुभ प्रभात…

Good Morning36

HAPPY HOLI……

Have you ever noticed how, when we are experiencing negative emotions such as sadness, anger, fear, stress, irritation etc., we lose interest in everything? The food seems tasteless, plants and flowers look dull and lifeless, our surroundings appear to be pale and colorless… all our attention goes to those negative feelings and it starts affecting our overall personality. The body language changes, we start losing faith in the universal power, we start losing self-confidence, self-esteem becomes low and a lot of other damage takes place on conscious and subconscious levels that one can’t even fathom and we only come to know about it much later. But the good news is that all of this damage can be reversed! How? Hypnotherapy is the answer!

No one likes being in a negative state of mind… after a while it becomes tiring. No one likes being in a constant state of depression, stress, anger, fear or physical, mental or emotional weakness. Our true nature is to feel happy, courageous, loving and loved, free, relaxed and strong. And all of this can be achieved with hypnotherapy. Give it a try and bring back all flavors, light, love and colors to your life!

Have a happy Holi you all!

 By: Swasti S Sharma, CMS-CHt FIBH (USA)

Certified Medical Support Clinical Hypnotherapist

Certified Past Life Regression Therapist

E-mail: swasti.hypnotherapyindia@gmail.com

Cell: (+91)7042321200

 

Past life and reincarnation

Past life and reincarnation

 In year 1966 Dr Ian Stevenson’s book ‘Twenty Cases Suggestive of Reincarnation” was an important and positive turning point for the people who believed in past life and reincarnation. Dr Ian Stevenson’s past life researches, later based on past life regression therapy offered most credible evidences in favour of past life and reincarnation and gave much needed scientific credence to the subject.

 His researches turned the debate forever from spoof to proof. I feel blessed to be exposed to Dr. Stevenson’s work since long as it inspired me to learn hypnotherapy and become a full time Clinical Hypnotherapist and Past Life Regression Therapist.

 Written by: Swasti S Sharma, CMS-CHt FIBH (USA)

Certified Medical Support Clinical Hypnotherapist

Certified Past Life Regression Therapist

E-mail: swasti.hypnotherapyindia@gmail.com

Cell: (+91)7042321200

होली की शुभकामनाएँ…

कल छोटी होली है – होलिका दहन… और परसों “धूलहांडी” – हमारे तरफ की बोली में “धुलेण्डी” बोलते थे… जब बड़े हो जाते हैं और उम्र के एक ख़ास पड़ाव पर पहुँच जाते हैं और माता पिता कहीं दूर आसमान में बैठे हमें आशीर्वाद दे रहे होते हैं तब सच में अपना बचपन और बचपन के हुडदंग बहुत याद हो आते हैं | और होली तो है ही हुडदंग का – मौज मस्ती का त्यौहार…

याद आता है जब रंग की एकादशी यानी फाल्गुन शुक्ल एकादशी से ही होली का रंग शुरू हो जाया करता था | यों मालिनी नदी के पास गाँव में तो महीने भर पहले से फाग शुरू हो जाता था और रात रात भर उसके मस्ती भरे सुर हवा में तैरते रहते थे | पर रंग की एकादशी से तो हर किसी को छूट मिल जाती थी आते जातों को रंगने की | बच्चे इस छूट का ख़ासा लाभ उठाते थे…

उधर हर घर में दस दस दिन पहले से पकवान बनने शुरू हो जाया करते थे | उन दिनों बाज़ार के पकवानों का चलन नहीं था | साथ ही एक और रिवाज़ था, घर घर में कुँआरी लड़कियाँ गाय वाले घरों गोबर मँगाकर उससे बुरकल्ले बनाया करती थीं – घर में काम आने वाले जितने भी सामान होते हैं सबकी आकृतियाँ बुरकल्लों में बनाई जाती थी और सूखने पर उन्हें बाण में पिरोकर मालाएँ बनाई जाती थीं | फिर छोटी होली को दिन में माँ के साथ होली पूजन के लिए जाते थे | उन दिनों होली भी बहुत ऊँची बनाई जाती थी और अगर भूले से किसी के घर का कोई फर्नीचर जैसे चारपाई मेज़ कुर्सी वगैरह कुछ बाहर चबूतरे या छत पर रह गया तो वो उस होली पर ही रखा मिलता था | शहर के शरारती बच्चे चुपचाप उठाकर होलिका माता को भेंट कर आते थे | पर इस तरह की शैतानियों पर कभी आपस में तनातनी नहीं हुआ करती थी – नक़ली गुस्सा बच्चों पर उतार कर खो जाते थे सब होली की मस्ती में….

रात को होता था होलिका दहन – छोटे से हवन के बाद होलिका की अग्नि प्रज्वलित की जाती थी और गन्नों में जौ की बालियाँ बाँध कर उन्हें होली में जलाया जाता था | घरों में गन्नों के ढेर लगे रहते थे | पिताजी की लाडली होने के कारण हम भी हर जगह उनके साथ मौजूद रहते थे | होलिका दहन के बाद पिताजी के साथ घर वापस आते थे और घर पर शुरू होती थी संगीत और काव्य गोष्ठियाँ जो रात आठ नौ बजे से आरम्भ होकर सुबह छः बजे तक चलती थीं शहर के जितने भी संगीत कलाकार और कविगण थे और संगीत और कविताप्रेमी थे सबका जमावड़ा घर में हुआ करता था | रात भर फाग – काफी – धमार – चैती का रंग छाया रहता था और साथ में चलते थे माँ के हाथों के बनाए हुए पकवानों और चाय के दौर… सुबह सब अपने अपने घरों को लौटकर नित्यकर्मों से निबट कर निकल पड़ते थे होली का हुडदंग मचाने…

उधर होली पर रात भर टेसू के फूल पकाए जाते थे जो सुबह होते ही शहर के प्रतिष्ठित परिवारों में बांटने के साथ साथ होली के जुलूस में काम आते थे | गाड़ियों पर टेसू के फूलों के रंग से भरे ड्रम लादकर होली के जुलूस निकलते थे बाजे गाजे के साथ, ड्रमों में लगे होते थे लम्बे लम्बे पाइप और गाड़ियों सवार लोग ज़मीन से लेकर छतों तक रंगों की बौछार करते रहते थे…

दोपहर तक रंग खेलने के बाद सब घरों को वापस लौटकर नहा धोकर तैयार हो जाते थे कि इस बीच होली पर बनाया सूजी का हलवा शहर भर में बँटना शुरू हो जाता था प्रसाद के रूप में… हाँ एक प्रथा और थी, होलिका दहन के अगले दिन यानी फाग के दिन होली की आग लाकर उससे लोग अपने घरों के चूल्हे जलाते थे…

इन सारी प्रथाओं का कोई वैज्ञानिक या धार्मिक या आध्यात्मिक या किसी और तरह का महत्त्व भले न हो, पर आपसी भाईचारा बढ़ाने का उपाय ज़रूर होती थीं ये सारी प्रथाएँ…. महानगरीय सभ्यता के आवरण में ये सारी मस्तियाँ कहीं ग़ायब सी हो गई हैं… फिर भी होली तो होली ही है…. तो सभी को होली की रंग भरी – हुडदंग भरी हार्दिक शुभकामनाएँ……. गुझिया और टेसू के फूलों के रंगों के साथ……

Good Morning38