HAPPY NEW YEAR…

new-year-wishes

आओ छेड़ें मधुर रागिनी, बीते कल को करें विदा अब

कुछ है रीता, कुछ है बीता, कुछ है खोया, कुछ है पाया | बीते कल में जाने हमने क्या कुछ खोया क्या कुछ पाया || क्या खोया ये ग़म ही क्यों हो, क्या पाया ये भ्रम ही क्यों हो | खोना पाना रीत जगत की, इसका भला…

स्रोत: आओ छेड़ें मधुर रागिनी, बीते कल को करें विदा अब

आओ छेड़ें मधुर रागिनी, बीते कल को करें विदा अब

कुछ है रीता, कुछ है बीता, कुछ है खोया, कुछ है पाया |

बीते कल में जाने हमने क्या कुछ खोया क्या कुछ पाया ||

क्या खोया ये ग़म ही क्यों हो, क्या पाया ये भ्रम ही क्यों हो |

खोना पाना रीत जगत की, इसका भला वहम ही क्यों हो ||

आशाओं से भरी सुबह का करना है अब स्वागत दिल से |

इसीलिये मस्ती में भरकर करें विदा अब बीते कल को ||

आओ छेड़ें मधुर रागिनी, मन के तारों को सहलाकर |

प्यार और उल्लास में भरकर बीते कल को करे विदा जो ||

गत वर्ष को आदरपूर्वक विदा करते हुए कल से आरम्भ होने वाले नव वर्ष की

सभी को हार्दिक एवं मांगलिक शुभकामनाएँ

%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ac

 

 

शुभ प्रभात

मोती जैसी ओस की बूँदों में भीगी सर्दियों की सुबह कुछ ऐसी लगती मानों भोर की बयार गुनगुनाती हुई कोहरे की चादर समेटने का प्रयास करती आई हो गर्म पानी से नहा कर कोहरे में लिपटी धूप का कुछ श्वेत कुछ धूमि…

स्रोत: शुभ प्रभात

शुभ प्रभात

मोती जैसी ओस की बूँदों में भीगी सर्दियों की सुबह

कुछ ऐसी लगती मानों भोर की बयार गुनगुनाती हुई

कोहरे की चादर समेटने का प्रयास करती

आई हो गर्म पानी से नहा कर

कोहरे में लिपटी धूप का

कुछ श्वेत कुछ धूमिल सा परिधान लपेटे |

पंछियों की चहचहाट के साथ गाती गुनगुनाती

दूर कहीं झनझनाते किरणों के तार की मीठी तान पर

अलसाया-इठलाया-मदमाता सा नृत्य दिखाती

नीचे बिछे हरितवर्णी मखमली क़ालीन पर

धीरे धीरे उतरती |

उसके साथ ही सफ़ेद रुई के गोले सा श्वेत सूर्य

आसमान की गोद से उछलकर

किसी चंचल शिशु जैसा उछलता कूदता

ठण्डी हवा के साथ नाचता / धूप की गेंद से खेलता

आ बैठता खिड़की की जाली पर |

इधर नर्म गुनगुनी धूप में

कोहरा भी अपनी ठण्ड मिटाने को

फैलाता अपनी बाहें, लेता अँगड़ाई

और फिर सिमट जाता धूप में सूखते रजाई गद्दों के बीच |

पर शीघ्र ही मस्ती में कुलाँचे भरता सूरज

पहुँच जाता है खिड़की के नीचे

इन कुछ पलों की भाग दौड़ से थका हारा / थोड़ा अलसाने के लिए |

धूप भी थक कर विश्राम करने हेतु

पुनः ओढ़ने लगती कोहरे की चादर

और एक छलावा सा दिखाती धीरे धीरे खिसक जाती

खिड़की के नीचे से होती हुई वापस अपने गाँव

दूर क्षितिज में गुम हो जाती |

तब अलसाई सी सन्ध्या तारों की चादर सजाए

अँधियारे के बिस्तर पर मानों सोने चली जाती |

लेकिन कुछ पल बाद ही

छा जाता साम्राज्य चन्दा की धवल चाँदनी का

जो कोहरे में सिमटी लजाती शर्माती

मोती जैसी ओस की बूँदों के साथ

धीरे धीरे नीचे उतरती आती

और दिन भर के उस मधुर अहसास को मन में सँजोए

खो जाती समस्त प्रकृति उसके ममताभरे आगोश में

मीठी लोरियों के साथ

देखने को मधुर सुहाने सपने…

सर्दियों की इस अलसाई सुबह का सभी को शुभ प्रभात…

%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a4%b9

 

 

 

मन में ऐसा भाव जगा है

पूज्य पिताश्री पं. यमुना प्रसाद कात्यायन (स्वर्गीय नहीं, क्योंकि वे सदा मेरे साथ हैं – पूर्ववत अपने नेहाशीषों की वर्षा करते), मेरे गुरु-सखा-भाई एकमात्र मेरे पिताजी… आज ही के दिन अपनी मीठी बात…

स्रोत: मन में ऐसा भाव जगा है