Monthly Archives: June 2017

मेघों ने बाँसुरी बजाई

स्रोत: मेघों ने बाँसुरी बजाई

Advertisements

मेघों ने बाँसुरी बजाई

मौसम ने अपनी ही एक पुरानी रचना याद दिला दी:-

मेघों ने बाँसुरी बजाई, झूम उठी पुरवाई रे |

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

उमड़ा स्नेह गगन के मन में, बादल बन कर बरस गया

प्रेमाकुल धरती ने नदियों की बाँहों से परस दिया |

लहरों ने एकतारा छेड़ा, कोयलिया इतराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

बूँदों के दर्पण में कली कली निज रूप निहार रही

धरती हरा घाघरा पहने नित नव कर श्रृंगार रही |

सजी लताएँ, हौले हौले डोल उठी अमराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

अँबुवा की डाली पे सावन के झूले मन को भाते

हर इक राधा पेंग बढ़ाए, और हर कान्हा दे झोंटे |

हर क्षण, प्रतिपल, दसों दिशाएँ लगती हैं मदिराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

15

 

 

 

बहारें

दो तीन दिनों से भारी उमस और बीच बीच में घिर आई घटाओं को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे तेज़ बारिश होगी | पर लगान वाला क़िस्सा हो रहा था… मेघराज झलक दिखलाकर अपनी प्यारी सखी मस्त हवा के पंखों पर सवार हो न जाने कहाँ उड़ जाते थे… पर आख़िरकार आज सुबह कुछ अमृत की बूँदें अपने अमृतघट से छलका ही दीं… मौसम कुछ ख़ुशनुमा हो गया… और इस भीगे मौसम में याद हो आई अपने बचपन की…

भले ही दिल्ली की इन गगनचुम्बी इमारतों में कोयल की पंचम या पपीहे की पियू पियू की पुकारें सुनाई नहीं देतीं… भले ही भँवरे की खरज की गुंजार को कान तरस जाते हैं… भले ही उन रंग बिरंगे छोटे बड़े पंछियों का सितार के तारों की झनकार सी मधुर आवाज़ों में सुरीला राग छिड़ना अब कम हो गया हो… फिर भी बरखा की रिमझिम वो पुरानी यादें तो ताज़ा करा ही देती है…

वो तीन चार महीने की अच्छी धुआंधार बारिश… वो पतनालों से गिरते पानी का किसी गड्ढे में इकट्ठा हो जाना और उसमें कागज़ की नाव बनाकर छोड़ना और ख़ुशी से तालियाँ बजाकर उछलना… स्कूल कॉलेज जाते छाते लेकर तो भी क्या मज़ाल कि भीगने से बच ही जाएँ… मेघराज अपना प्रेम कुछ इस अन्दाज़ में उंडेलते थे कि तन के साथ साथ मन भी भीज भीज जाता था… और भीगने से बचना ही कौन चाहता था…

वो घर से बैग में नमक छिपाकर ले जाना और रास्ते में किसी पेड़ से कच्ची अमियाँ तोड़कर हिलमिल कर नमक के साथ चटखारे लेकर खाते जाना… वो घर वापसी में छाते एक तरफ़ रख पीपल के चबूतरे पर बैठकर आपस में बतियाते हुए अपने बालों के रिबन खोल देना और गीली हवा के साथ अपनी जुल्फों को मस्ती में बहकने देना…

घर पहुँचते ही माँ की मीठी सुरीली रसभरी आवाज़ कानों में पड़ना “पूनम, आ गईं बेटा, आओ देखो हमने कितनी तरह की पकौड़ियाँ बनाई हैं, जल्दी से आ जाओ…” और बैग पटक गीले कपड़ों में ही रसोई में घुस जाना… भले ही पकौड़ियों के साथ माँ की मीठी फटकार भी क्यों न सुननी पड़ जाए “कितनी बार कहा बरसाती ख़रीद लो, पर तुम क्या कभी कुछ सुनोगी ?” फिर पापा की तरफ़ मुख़ातिब हो जाना “और तुम भी… कुछ नहीं कहते इसे… इतना सर चढ़ा रखा है… बीमार पड़ेगी ऐसे भीग कर तो मत बोलना…” और भूरी आँखों वाले पापा का मीठी हँसी हँसकर अपनी बिटिया को गले से लगाकर बोलना “अरी भागवान, चिन्ता मत करो, हमारी बिटिया को कुछ नहीं होगा…” और इसी तरह हँसते बतियाते दिन भर के हमारे कारनामों की जानकारी ले लेना… क्या कुछ याद करें… क्या कुछ भूलें… बहरहाल, उन्हीं दिनों की याद में प्रस्तुत हैं कुछ पंक्तियाँ…

हीरों के हारों सी चमकें फुहारें, और वीणा के तारों सी झनकें फुहारें |

धवल मोतियों सी जो झरती हैं बूँदें, तो पाँवों में पायल सी खनकें फुहारें ||

कोयल की पंचम में मस्ती लुटातीं, तो पपिहे की पीहू में देतीं पुकारें |

कली अनछुई को रिझाने को देखो षडज में ये भँवरे की देतीं गुंजारें ||

मेघों के डमरू की धुन सुनके मस्ती में बहकी हैं जातीं ये चंचल बयारें |

दमकती है बिजली तो भयभीत गोरी सी काँपी हैं जातीं ये चंचल बयारें ||

दिल की उमस से पिघलती हैं बूँदें, और मल्हारें गाती बरसती हैं बूँदें |

धड़कन सी देखो धड़कती हुई और मचलती हुई ये बरसती हैं बूँदें ||

मस्ती भरा मद टपकता है जिनसे, वो आमों की डालों पे लटकी हैं बौरें |

हरेक दिल में मदमस्त जादू जगाती और खुशबू उड़ाती ये लटकी हैं बौरें ||

कहो कैसे कोई उदासी में डूबे, जो मस्ती भरे गीत गाती बहारें |

कि रिमझिम के मीठे नशीले सुरों में हैं कितनी ही तानें सजाती बहारें ||

10