क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी

ये बरखा का मौसम सजीला रसीला, घटाओं में मस्ती हवाओं में थिरकन |

वो बलखाती बूँदों का फूलों से मिलना, वो शाख़ों का लहराके हर पल मचलना ||

नशे में है डूबी, क़दम लड़खड़ाती, वो मेघों की टोली चली आ रही है |

कि बिजली के हाथों से ताधिन ताधिन्ता, वो मादल बजाती बढ़ी आ रही है ||

पपीहा सदा ही पियू को पुकारे, तो कोयल भी संग में है सुर को मिलाती |

जवानी की मस्ती में मतवाला भँवरा, कली जिसपे अपना है सर्वस लुटाती ||

मौसम में ठण्डक, तपन बादलों में, वो अम्बुवा की बौरों से झरता पसीना |

सावन की रिमझिम फुहारों के संग ही, लो मन में भी अमृत की धारा बरसती ||

है पगलाई बौराई सारी ही धरती, चढ़ा है नशा पत्ते पत्ते भे भारी |

कि बिखराके सुध बुध को तन मन थिरकता, तो क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी ||

सावन

 

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