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होलिका दहन और रंगपर्व

कल होलिका दहन का पर्व है और सायंकाल सात बजकर सैतीस मिनट पर भद्रा की समाप्ति पर होलिका दहन का मुहूर्त आरम्भ होता है, और उसके बाद आरम्भ हो जाएँगी रंगों की मस्तीभरी बौछारें | होलिका दहन अर्थात सत्य, निष्ठा, विश्वास, आस्था, उदारता आदि सद्भावों की अग्नि में असत्य, अविश्वास, अनास्था, क्रूरता, घृणा, द्वेष, क्रोध रूपी दुर्भावों की होलिका का दहन | यों होलिका दहन के विषय में भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद तथा उनकी बुआ होलिका की कथा सभी जानते हैं |

दिति का पुत्र था दैत्यराज हिरण्यकशिपु, जिनकी सन्तान के रूप में भक्तर्षि प्रह्लाद का जन्म हुआ | हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके वर प्राप्त किया था कि वह अमर हो जाए और तीनों लोकों में कोई भी प्राणी उसका वध न कर सके | इस वर के कारण वह बहुत अधिक आततायी हो गया था और छल कपट तथा क्रूरता के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार जमा कर स्वयं को भगवान घोषित कर दिया था | दूसरी ओर उसका पुत्र प्रह्लाद अत्यन्त उदारमना था तथा भगवान विष्णु का परमभक्त था और सत्य, न्याय, सदाचार, निष्ठा तथा विश्वास के मार्ग पर चलकर अध्यात्म साधना में लीन रहता था |

अपने पुत्र की यही बातें हिरण्यकशिपु को नहीं भाती थीं, क्योंकि वह चाहता था कि अन्य प्रजाजनों की ही भाँति उसका पुत्र भी केवल उसे ही भगवान मानकर उसी की पूजा करे | प्रह्लाद ने जब अपने पिता तथा गुरुकुल में अपने दैत्य सहपाठियों को भी ईशभक्ति की सलाह दी तो हिरण्यकशिपु आपे से बाहर हो गया और उसने तरह तरह से प्रह्लाद का वध करने के प्रयास आरम्भ कर दिए | प्रह्लाद को भोजन में विष दिया गया, हाथी के पैरों तले रौंदने का प्रयास किया गया, नागदंश से उसे मारने का प्रयास किया गया | किन्तु भगवान विष्णु ने हर बार अपने भक्त के प्राणों की रक्षा ही की | यहाँ तक कि दैत्यपुरोहितों को माया से कृत्या बनाने का आदेश भी दिया गया जो स्त्री के आकार की अत्यन्त विशाल अग्नि की ज्वाला ही थी | किन्तु वह भी अपने ही ताप में जलकर भस्म हो गई |

हिरण्यकशीपु को जब इस बात का पता चला तो वह भयभीत हो उठा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि देवताओं ने उसका अन्त करने के लिए ही प्रह्लाद के रूप में यह मायाजाल बिछाया हो | और तब प्रह्लाद का वध करने के उपाय और भी अधिक तेज़ कर दिए गए | हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वर प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती | हिरण्यकशिपु ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि की ज्वाला में कूद जाए | वर के प्रताप से वह तो बच जाएगी किन्तु उसकी गोद में बैठे प्रहलाद का अन्त हो जाएगा | और होलिका ने ऐसा ही किया | किन्तु भगवान विष्णु ने यहाँ भी प्रह्लाद की रक्षा की और होलिका उस अग्नि में जलकर भस्म हो गई | इसी कथा को आधार बनाकर होलिका दहन का आयोजन किया जाता है – जो प्रतीक है इस तथ्य का कि सत्य का कभी अन्त नहीं हो सकता और असत्य तथा दुष्टता कभी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकते |

देखा जाए तो होलिका छल, कपट, दम्भ, लालच, क्रोध, घृणा, द्वेष आदि अनगिनत दुर्भावों की प्रतीक है जो प्रह्लाद रूपी निश्छलता, उदारता, निष्ठा, विश्वास, आस्था जैसे सद्भावों को जलाकर भस्म कर देना चाहती है | किन्तु यदि व्यक्ति का संकल्प दृढ़ है तो किसी प्रकार की होलिका भी उसके सद्गुणों को भस्मीसात् नहीं कर सकती |

होलिका दहन के बाद रंगों की वर्षा आरम्भ हो जाती है और उसके साथ उद्भव हो जाता है एक नवीन आनन्द का – एक नवीन उल्लास का | रंग हमारे जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं | व्यक्ति के जीवन में हताशा और निराशा भर गई हो तो रंगों का जादू उसे दूर करके नई ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है | हमारी भावनाओं के साथ – हमारे आवेगों के साथ रंगों का बहुत गहरा सम्बन्ध है | रंग प्रतीक हैं आकर्षण के, आनन्द के, हर्षोल्लास के | रंग प्रतीक हैं उन समस्त भूमिकाओं के – उन समस्त सम्बन्धों के – जिनका व्यक्ति अपने जीवनकाल में विभिन्न स्तरों पर विविध परिस्थितियों में निर्वाह करता है | और होलिका दहन के बाद रंगों का उत्सव इसी बात का संकेत है कि व्यक्ति को समस्त दुर्भावों को भस्म करके अपने विभिन्न प्रकार के उत्तरदायित्वों का पूर्ण आनन्द एवं उत्साह के साथ निर्वाह करना चाहिए |

तो आइये साथ मिलकर वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, घृणा जैसे अनेकों दुर्भावों की होलिका को भस्म करके समस्त प्रकार के सद्भावों के प्रह्लाद को जीवनदान दें, ताकि प्रकृति द्वारा प्रदत्त सभी प्रकार के रंगों की बौछारों से समस्त जड़ चेतन आनन्दित, आह्लादित और उत्साहित होकर झूम उठे…

होली की रंगभरी हार्दिक शुभकामनाएँ…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/02/28/holika-dahan/

 

शिव षडाक्षर स्तोत्रम्

कल फाल्गुन शुक्ल एकादशी थी – जिसे आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है | क्योंकि इस दिन आमलकी अर्थात आँवले के वृक्ष की पूजा अर्चना की जाती है इसलिए इसे आमलकी एकादशी कहते हैं | साथ ही इसी दिन से होली का रंगोत्सव भी आरम्भ हो जाता है, अतः इस एकादशी को रंग की एकादशी या रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है |

आज प्रदोष के व्रत का पालन किया जाएगा – मंगलवार है इसलिए आज का प्रदोष भौम प्रदोष है | एकादशी को सामान्य रूप से भगवान विष्णु की उपासना का दिन माना जाता है और प्रदोष को भगवान शंकर की उपासना की जाती है | देखा जाए तो दोनों एक ही परम सत्य के दो रूप हैं | देवाधिदेव भगवान शंकर और भगवान विष्णु दोनों को नमन के साथ सभी को कल से आरम्भ हो चुके होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ…

ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम् |

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् |

सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितन्नमामि ||

“ॐ नमः शिवाय” यह मन्त्र स्वयं में कितना पूर्ण है यह जानने के लिए प्रस्तुत है शिवषडाक्षर (ॐ न मः शि वा य) स्तोत्र :-

ॐकार बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः |

कामदं मोक्षदं चैव “ॐकाराय” नमो नमः ||

सभी योगियों के हृदयचक्र में जो ॐकार के रूप में विद्यमान हैं, योगीजन निरन्तर जिसका ध्यान करते हैं और जो समस्त प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने के साथ साथ मोक्ष के पथ पर भी अग्रसर करते हैं ऐसे उस परम तत्व को नमस्कार है – जिसे “ॐकार” के नाम से जाना जाता है | ॐकार संयुक्त वर्ण नहीं है अपितु स्वर, स्पर्श और ऊष्म वर्णों को अभिव्यक्त करने वाला पूर्ण बीजमन्त्र है – और इसी के बिन्दु अर्थात नाद पर – स्वर पर ध्यानावस्थित होकर ही परमात्मतत्व का ज्ञान किया जा सकता है ऐसी योगियों की मान्यता है | ॐ-कार के इसी महत्त्व के कारण ॐ-कार को योगीजन नमन करते हैं |

नमन्ति ऋषयो देवा नमन्ति अप्सरसां गणा: |

नरा नमन्ति देवेशं “नकाराय” नमो नमः ||

“न” अर्थात न-कार उस देवाधिदेव का प्रतिनिधित्व करता है जिसको समस्त ऋषिगण, समस्त देवता, समस्त अप्सराएँ और गण, तथा सभी मनुष्य अर्थात नर नमन करते हैं – अतः उस “न-कार” को हमारा नमस्कार है |

महादेवं महात्मानं महाध्यानपरायणम् |

महापापहरं देवं “मकाराय” नमो नमः ||

महादेव, परमात्मतत्व, नित्य अखण्ड ध्यान में लीन, समस्त पापों को हरने वाले देव का प्रतिनिधित्व “म” अर्थात म-कार करता है, अतः इस “म-कार” के प्रति हम श्रद्धानत हैं |

शिवं शान्तं जगन्नाथं लोकानुग्रहकारकम् |

शिवमेकपदं नित्यं “शिकाराय” नमो नमः ||

“शि” अर्थात शि-कार शिव अर्थात कल्याण, शान्तप्रकृति, समस्त चराचर के स्वामी, समस्त लोकों पर उपकार करने वाले, परमपद सत्य सनातन नित्य शिव का प्रतिनिधित्व करता है, अतः उस “शि-कार” के लिए हम नमन करते हैं |

वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कण्ठभूषणम् |

वामे शक्तिधरं देवं “वकाराय” नमो नमः ||

जिनका वाहन वृषभ है, जिनके कण्ठ का आभूषण है वासुकी, जिनके वामांग में स्वयं शक्ति विराजमान हैं – ऐसे देव का द्योतक है वर्ण “व” अर्थात व-कार, अतः “व-कार” के लिए हमारा नमस्कार |

यत्र तत्र स्थितो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः |

यो गुरु: सर्वदेवानां “यकाराय” नमो नमः ||

महेश्वर सर्वत्र स्थित हैं – सर्वव्यापी हैं तथा समस्त देवों के गुरु हैं, और “य” वर्ण अर्थात य-कार इन्हीं महादेव का द्योतक है – अतः य-कार के लिए भी हमारा नमस्कार |

षडाक्षरमिदं स्तोत्रं यः पठेच्छिवसन्निधौ |

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ||

भगवान शिव के सान्निध्य में बैठकर अर्थात भगवान शिव को अपने अन्तस् में विराजमान कर जो इस षडाक्षर स्तोत्र का पाठ करता है वह शिवलोक को प्राप्त करके शिव के साथ विचरण करता है अर्थात कल्याण को प्राप्त होता है |

इति श्री रुद्रयामले उमामहेश्वरसम्वादे शिवषडक्षर स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||

 

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/02/27/shiv-shadakshar-stotram/