संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – एक ऐसी यात्रा – एक ऐसा चक्र जो निरन्तर गतिशील रहता है आरम्भ से अवसान और पुनः आरम्भ से पुनः अवसान के क्रम में – यही है भारतीय दर्शनों का सार जो निश्चित रूप से आशा और उत्साह से युक्त है – समस्त प्रकृति का यही तो नियम है | ये समस्त सूर्य चाँद तारकगण उदित होते हैं, इनका अवसान होता है पुनः उदित होने के लिए | समस्त प्रकृति रज:धर्मिणी है इसीलिए वह रजस्वला भी होती है | रजस्वला होने के कारण ही अपने गर्भ से समस्त वनस्पतियों इत्यादि को जन्म देती है | वनस्पतियाँ पुष्पादि सब जन्म लेते हैं – पतझर में सब झर जाते हैं – सूख कर नष्ट हो जाते हैं पुनः नवीन रूप में जन्म लेने के लिए | किसी प्रकार के नैराश्य के लिए वहाँ स्थान ही नहीं है – यदि कुछ है तो पुनः पुनः उदित होते रहने का – पुनः पुनः आरम्भ होते रहने का – नवांकुरों के पुनः पुनः पल्लवित होते रहने का उत्साह | मानव भी प्रकृति का ही एक अंग हैं और इसीलिए उसका भी जन्म-मृत्यु-ज़रा अवस्थाओं के कर्तव्यों को पूर्ण कर लेने के बाद अवसान हो जाता है – ताकि पुनः जन्म लेकर वह अपने शेष कर्मों को पूर्ण कर सके | ताकि यह उत्साह बना रहे और व्यक्ति समस्त बाधाओं को पार करते हुए अपने कर्ममार्ग पर निरन्तर गतिशील रहते हुए अग्रसर रहे – इसी के लिए संस्कारों की आवश्यकता का अनुभव हुआ |

तो इस प्रकार गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यन्त जितने भी संकार व्यक्ति के किये जाते हैं वे सभी इस जन्म से पुनर्जन्म तक की यात्रा के ही तो विभिन्न मार्ग और विभिन्न पड़ाव हैं | संस्कारों की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि व्यक्ति सरलतापूर्वक आनन्दित भाव से इस यात्रा में आगे बढ़ सके | अन्यथा जन्म तो पशु का भी होता है, और पशु भी उसी परमात्मतत्व का एक अतिसूक्ष्म अणु है, किन्तु – क्योंकि उसे संस्कारित नहीं किया जाता इसलिए वह “पशु के समान” व्यवहार करता है | “पशु के समान” इसलिए कहा क्योंकि यदि हम चाहें अपने पशुओं को भी संस्कारित कर सकते हैं –  उन्हें भी बहुत कुछ सिखा सकते हैं – व्यवहार करना सिखा सकते हैं | यही व्यवहार सिखाने की प्रक्रिया संस्कार कहलाती है | मनुष्य क्योंकि बुद्धि का प्रयोग अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक करता है इसलिए उसके लिए संस्कारों की प्रक्रिया कुछ अलग प्रकार की होती है |

ऋषि गौतम ने 40 संस्कारों का उल्लेख किया है | महर्षि अंगिरा 25 संस्कारों की बात करते हैं | कहीं कहीं 48 संस्कार भी उपलब्ध होते हैं | किन्तु वर्तमान में षोडश संस्कारों का उल्लेख प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है :

गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो जातकर्म च |

नामक्रिया निष्क्रमणो अन्न्प्राशनं वपनक्रिया: ||

कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भ: क्रियाविधि: |

केशान्त स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह: ||

प्रेताग्नि संग्रहश्चैव संस्कारा: षोडश स्मृता: || (व्यासस्मृति 1/13-15)

अर्थात सबसे प्रथम गर्भाधान संस्कार है जो जन्म से पूर्व का अर्थात गर्भ धारण करने के समय किया जाने वाला संस्कार है | उसके बाद कुछ संस्कार बच्चे के जन्म से पूर्व किये जाते हैं और कुछ बाद में अन्तिम यात्रा पर्यन्त समय समय पर किये जाते रहते हैं | अपने इस लेख में हम विवाह आदि संस्कारों का सूक्ष्म वर्णन करेंगे, किन्तु गर्भ से पूर्व तथा बाद के संस्कारों का विस्तार से विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे |

क्रमशः…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/06/21/samskaras-2/

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