Monthly Archives: July 2018

via Weekly Horoscope

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खग्रास चन्द्र ग्रहण

आज आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को कुछ ही देर बाद भारत के साथ साथ संसार के कई देश एक ऐसी अद्भुत खगोलीय घटना के साक्षी बनने जा रहे हैं जो खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार अब काफ़ी वर्षों तक नहीं दीख पड़ेगी | इस भव्य घटना को नासा के खगोल वैज्ञानिकों ने नाम दिया है Super Blue Blood Moon, अर्थात इस दिन सुपर मून, ब्लू मून और चन्द्र ग्रहण एक साथ दिखाई देंगे | वैज्ञानिकों के अनुसार चाँद और धरती के बीच की दूरी जब सबसे कम हो जाती है और चाँद पहले से अधिक बड़ा तथा चमकीला दिखाई देने लगता है तब उसे सुपर मून कहा जाता है | और चन्द्र ग्रहण वह स्थिति है जिसमें चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य तीनों एक ही सीधी रेखा में आ जाते हैं, इस स्थिति में चन्द्रमा के कुछ अथवा पूरे भाग पर धरती की छाया पड़ने से सूर्य की किरणों का प्रकाश उस तक नहीं पहुँच पाता जिसके कारण वह धुँधला दिखाई देने लगता है |

आज 23:54 पर ग्रहण का स्पर्श होगा, 25:52 पर मध्य काल और 27:49 अर्थात सूर्योदय से पूर्व 03:49 पर ग्रहण का मोक्ष | ग्रहण की कुल अवधि होगी तीन घंटे पचपन मिनट | माना जा रहा है कि यह ग्रहण सदी का सबसे अधिक अवधि का ग्रहण है | ग्रहण के समय चन्द्रमा मकर राशि और उत्तराषाढ़ नक्षत्र में होगा तथा बव करण और प्रीति योग होगा | चन्द्रमा के साथ मकर राशि में उच्च का मंगल गोचर कर रहा है तथा मकर से सप्तम भाव कर्क में सूर्य के साथ बुध का भी गोचर है |

इस विषय पर पूर्व में भी लिख चुके हैं | अतः पौराणिक कथाओं के विस्तार में नहीं जाएँगे | हमारे ज्योतिषियों की मान्यता है कि ग्रहण की अवधि में उपवास रखना चाहिए, बालों में कंघी आदि नहीं करनी चाहिए, गर्भवती महिलाओं को बाहर नहीं निकलना चाहिए अन्यथा गर्भस्थ शिशु पर ग्रहण का बुरा प्रभाव पड़ता है, तथा ग्रहण समाप्ति पर स्नानादि से निवृत्त होकर दानादि कर्म करने चाहियें | साथ ही जिन राशियों के लिए ग्रहण का अशुभ प्रभाव हो उन्हें विशेष रूप से ग्रहण शान्ति के उपाय करने चाहियें | इसके अतिरिक्त ऐसा भी माना जाता है कि पितृ दोष निवारण के लिए, मन्त्र सिद्धि के लिए तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ग्रहण की अवधि बहुत उत्तम होती है |

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ये सब खगोलीय घटनाएँ हैं और खगोल वैज्ञानिकों की खोज के विषय हैं | हम यहाँ बात करते हैं हिन्दू धार्मिक मान्यताओं की | भारतीय हिन्दू मान्यताओं तथा भविष्य पुराण, नारद पुराण आदि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चन्द्र ग्रहण एक ज्योतिषीय घटना है जिसका समूची प्रकृति पर तथा जन जीवन पर प्रभाव पड़ता है | कुछ ज्योतिषियों तथा पण्डितों द्वारा यहाँ तक कहा जा रहा है कि चन्द्रमा का लाल रंग होना बहुत अशुभ होता है तथा इसके कारण जल प्रलय और अग्निकाण्ड जैसी दुर्घटनाओं में वृद्धि हो सकती है | किन्तु हमारा अपना मानना है कि ग्रहण जैसी आकर्षक खगोलीय घटना से भयभीत होने की अपेक्षा इसके सौन्दर्य को निहार कर प्रकृति के इस सौन्दर्य की सराहना करनी चाहिए… क्योंकि इन सब बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, केवल जन साधारण की अपनी मान्यताओं, निष्ठाओं तथा आस्थाओं पर निर्भर करता है…

बहरहाल, मान्यताएँ और निष्ठाएँ, आस्थाएँ जिस प्रकार की भी हों, हमारी तो यही कामना है कि सब लोग स्वस्थ तथा सुखी रहें, दीर्घायु हों ताकि भविष्य में भी इस प्रकार की भव्य खगोलीय घटनाओं के साक्षी बन सकें… पूरा पढ़ने के लिए क्लिक करें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/27/super-blue-blood-moon-2/

 

गुरु पूर्णिमा

मातृवत् लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका,

नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या ||

वास्तव में ऐसी श्रद्धा और प्रज्ञा से युत होती है गुरु की सत्ता – गुरु की प्रकृति – जो माता के सामान  ममत्व का भाव रखती है तो पिता के सामान उचित मार्गदर्शन भी करती है | आज गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व है – हमारे विचार से सभी पर्वों में सबसे उत्तम पर्व है गुरु पूर्णिमा का पर्व | क्योंकि गुरु अपने ज्ञान रूपी अमृत जल से शिष्य के व्यक्तित्व की नींव को सींच कर उसे दृढ़ता प्रदान करता है और उसका रक्षण तथा विकास करता है | तो सर्वप्रथम तो समस्त गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ |

हमारे देश में पौराणिक काल से ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूजा के रूप में मनाया जाता है | इसी दिन पंचम वेद “महाभारत” के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्मदिन भी माना जाता है और इसीलिए इसे “व्यास पूर्णिमा” भी कहा जाता है | और महर्षि वेदव्यास को ही आदि गुरु भी माना जाता है इसीलिए व्यास पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है | भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, पुराणों और उपपुराणों की रचना की, ऋषियों के अनुभवों को सरल बना कर व्यवस्थित किया, पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना की तथा विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र का लेखन किया । इस सबसे प्रभावित होकर देवताओं ने महर्षि वेदव्यास को “गुरुदेव” की संज्ञा प्रदान की तथा उनका पूजन किया । तभी से व्यास पूर्णिमा को “गुरु पूर्णिमा” के रूप में मनाने की प्रथा चली आ रही है | बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के पाँच सप्ताह बाद भगवान बुद्ध ने भी सारनाथ पहुँच कर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही अपने प्रथम पाँच शिष्यों को उपदेश दिया था | इसलिये बौद्ध धर्मावलम्बी भी इसी दिन गुरु पूजन का आयोजन करते हैं |

गुरुपूजा के अवसर पर न केवल गुरुओं का स्वागत सत्कार किया जाता था, बल्कि माता पिता तथा अन्य गुरुजनों की भी गुरु के समान ही पूजा अर्चना की जाती थी | वैसे भी व्यक्ति के प्रथम गुरु तो उसके माता पिता ही होते हैं |

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से प्रायः वर्षा आरम्भ हो जाती है और उस समय तो चार चार महीनों तक इन्द्रदेव धरती पर अमृत रस बरसाते रहते थे | आवागमन के साधन इतने थे नहीं, इसलिए उन चार महीनों तक अर्थात चातुर्मास की अवधि में सभी ऋषि मुनि एक ही स्थान पर निवास करते थे | और इस प्रकार इन चार महीनों तक प्रतिदिन गुरु के सान्निध्य का सुअवसर शिष्य को प्राप्त हो जाता था और उसकी शिक्षा निरवरोध चलती रहती थी | क्योंकि विद्या अधिकाँश में गुरुमुखी होती थी, अर्थात लिखा हुआ पढ़कर कण्ठस्थ करने का विधान उस युग में नहीं था, बल्कि गुरु के मुख से सुनकर विद्या को ग्रहण किया जाता था | गुरु के मुख से सुनकर उस विद्या का व्यावहारिक पक्ष भी विद्यार्थियों को समझ आता था और वह विद्या जीवनपर्यन्त शिष्य को न केवल स्मरण रहती थी, बल्कि उसके जीवन का अभिन्न अंग ही बन जाया करती थी | इस समय मौसम भी अनुकूल होता था – न अधिक गर्मी न सर्दी | तो जिस प्रकार सूर्य से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता तथा फसल उपजाने की सामर्थ्य प्राप्त होती है उसी प्रकार गुरुचरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञानार्जन की सामर्थ्य प्राप्त होती थी और उनके व्यक्तित्व की नींव दृढ़ होती थी जो उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती थी |

तो, हम सभी समस्त गुरुजनों के चरणकमलों में सादर अभिवादन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें | जय गुरुदेव…..

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः

गुरुर्साक्षाद्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः |

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानान्जन्शलाकया

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ||

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः |

अनेकजन्मसम्प्राप्तम कर्मबन्धविदाहिने

आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः ||

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् |

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधी साक्षिभूतम्

भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तन्नमामि ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/27/guru-purnima/