कार्तिक स्नान पूर्णिमा / गुरु पर्व

आज कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी/पूर्णिमा है और कल गंगा स्नान की कार्तिक पूर्णिमा होगी | अपने बचपन और युवावस्था की कुछ स्मृतियाँ आज जागृत हो आईं | हमारे पितृ नगर नजीबाबाद से कुछ ही दूरी पर बिजनोर के पास नागलसोती गाँव – जहाँ हर वर्ष कार्तिक स्नान तथा गंगा दशहरा के अवसर पर पवित्र गंगा नदी में स्नान करने हेतु अपार जन समूह उमड़ उठता था – “था” इसलिए क्योंकि आज वहाँ क्या स्थिति होगी इसका भान नहीं | पूर्णिमा से एक दिन पूर्व ही लोगों का वहाँ पहुँचना आरम्भ हो जाता था | हमारे पिताजी और चाचा लोग भी सपरिवार ठहरने के लिए पहले से ही बड़ा सा टेंट लगवा लिया करते थे और आज यानी कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को दल बल के साथ पहुँच जाया करते थे मेले का आनन्द लेने तथा गंगा में स्नान के लिए | मेला आयोजन समिति की ओर से बड़े से रेतीले मैदान में कुकुरमुत्तों (मशरूम्स) की भाँति छोटे बड़े टेंट उगा दिए जाते थे जहाँ लोग विश्राम करते थे, खाते पीते थे और मेले का आनन्द लेते थे | कहीं मेला आयोजकों की ओर से तो कहीं कुछ विशिष्ट व्यक्तियों अथवा परिवारों की ओर से हलवाइयों की भट्टियाँ लगवा दी जाया करती थीं जहाँ वे लोग भण्डारे के लिए ताज़ी ताज़ी जलेबी और उड़द की दाल गंगा के रेतीले तट पर कुश्ती के दो दो हाथकी खिचड़ी बनाने में तत्पर रहते थे | साथ में होता था बथुए का रायता, आम का खट्टा अचार और मूँग-उड़द दाल के पापड़ | हमारे टेंट के बाहर भी एक बड़ी से भट्टी रहती थी जहाँ इसी प्रकार का भण्डारा दो दिन लगातार चलता रहता था | श्रद्धालुजन गंगा में स्नान करके आते और उन्हें ये समस्त भोज्य पदार्थ प्रसादस्वरूप वितरित किया जाता तो उनके मुखमण्डल पर अपार तृप्ति की आभा दीख पड़ती | साथ ही तरह तरह के खेलों का, कुश्ती आदि पहलवानी के करतबों का और जादू के खेल आदि का भी कार्यक्रम चलता रहता था | कितना उल्लासमय और आकर्षक वातावरण हुआ करता था |

ये तो कुछ भूली बिसरी यादें मित्रों के साथ साझा करने का मन हुआ | बहरहाल, कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को कार्तिकी पूर्णिमा तथा गंगा स्नान की पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है | पूर्णिमा का व्रत पूर्णिमा के दिन भी किया जा सकता है और चतुर्दशी के दिन भी | पूर्णिमा का व्रत किस दिन किया जाना है यह निर्भर करता है इस बात पर कि पहले दिन पूर्णिमा किस समय आरम्भ हो रही है और दूसरे दिन किस समय तक रहेगी | यदि चतुर्दशी की मध्याह्न में पूर्णिमा आरम्भ होती है तो उस दिन पूर्णिमा का व्रत किया जाता है | किन्तु यदि मध्याह्न के बाद किसी समय अथवा सायंकाल में पूर्णिमा आरम्भ होती है तो इस दिन पूर्णिमा का व्रत नहीं किया जाता, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस स्थिति में पूर्णिमा में चतुर्दशी का दोष आ गया है | इस स्थिति में दूसरे दिन ही पूर्णिमा का व्रत किया जाता है |

इस वर्ष आज यानी 22 नवम्बर गुरूवार को मध्याह्न से पूर्व 12:54 के लगभग पूर्णिमा का आरम्भ हो रहा है और कल प्रातः ग्यारह बजकर नौ मिनट तक रहेगी | अतः पूर्णिमा का व्रत आज ही रखा जाएगा और चन्द्र दर्शन के साथ व्रत दीपदानका पारायण हो जाएगा | इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि पूर्ण चन्द्र के दर्शन जिस रात्रि को हों उस दिन पूर्णिमा का व्रत रखा जाता है | पूर्णिमा का उत्सव तथा कार्तिकी पूर्णिमा स्नान कल यानी शुक्रवार को सम्पन्न होगा | इसी के साथ तुलसी विवाह भी सम्पन्न हो जाएगा | कुछ स्थानों पर इसे देव दिवाली के नाम से भी जाना जाता है और रात्रि को गंगा नदी में दीपदान तथा गंगा आरती के साथ साथ दीपावली के पर्व का समापन माना जाता है |

इस पूर्णिमा को महा कार्तिकी भी कहा जाता है, और यदि इस दिन भरणी अथवा रोहिणी नक्षत्र हों तो इस पूर्णिमा का महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है | साथ ही यदि चन्द्रमा और गुरु कृत्तिका नक्षत्र पर हों तो इसे महापूर्णिमा कहा जाता है | और यदि इस दिन चन्द्रमा कृत्तिका और सूर्य विशाखा नक्षत्र पर हो तो पद्मक योग बनता है जो अत्यन्त शुभ और प्रभावशाली योग माना जाता है | पद्मक योग कभी कभी ही बनता है | कल 16:40 तक कृत्तिका नक्षत्र और उसके बाद रोहिणी नक्षत्र होने से तथा शिव योग होने से इस वर्ष बहुत उत्तम योग बन रहे हैं |

माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध करके उसकी बसाई तीन नगरियों को ध्वस्त कर दिया था, इसलिए इस पूर्णिमा को त्रिपुरारी (त्रिपुर का अरि अर्थात शत्रु) पूर्णिमा भी कहा जाता है | ऐसी भी मान्यता है कि प्रलय काल में वेदों की रक्षा तथा सृष्टि के पुरुत्थान हेतु भगवान विष्णु का मत्स्यावतार भी इसी दिन हुआ था | इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करके दीपदान किया जाता है | दीपदान की प्रथा वास्तव में किसी भी प्रकार के तमस – अन्धकार – को दूर करने का प्रतीक है | ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन चन्द्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, सन्तति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छह कृत्तिकाओं का पूजन करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं |

सिख धर्म के संस्थापक प्रथम गुरु नानक देव जी का जन्म दिवस भी इसी दिन “प्रकाश पर्व” अथवा “गुरु पर्व” के रूप में मनाया जाता है | इस दिन सिख सम्प्रदाय के लोग गुरुद्वारे जाकर गुरुवाणी सुनते हैं और गुरु नानकदेव के बताए मार्ग पर चलने के संकल्प लेते हैं |

हम सभी के हृदयों से अज्ञान, निराशा, भय, दुर्भाग्य तथा अन्य भी किसी प्रकार के कष्ट का अन्धकार दूर हो गंगा आरतीताकि हम सभी गुरु नानक देव के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे, इसी कामना के साथ मन का दीप प्रज्वलित करते हुए दीपदान सहित सभी को कार्तिकी पूर्णिमा तथा “प्रकाश पर्व” और “गुरु पर्व” की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/11/22/kartik-purnima/

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