Monthly Archives: April 2019

via Weekly Horoscope

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हनुमान जयन्ती

हनुमान जयन्ती

कल चैत्र पूर्णिमा… विघ्नहर्ता मंगलकर्ता हनुमान जी की जयन्ती… जिसे पूरा हिन्दू समाज भक्ति भाव से मनाता है… आज रात्री सात बजकर सत्ताईस मिनट से लेकर कल सायं चार बजकर बयालीस मिनट तक चैत्र शुक्ल पूर्णिमा है… मान्यता है कि सूर्योदय काल में हनुमान जी का जन्म हुआ था | कल सूर्योदय पाँच बजकर पावन मिनट पर होगा, अतः इसी समय से रामदूत हनुमाना जी की पूजा आर्चना आरम्भ हो जाएगी | अस्तु, सर्वप्रथम सभी को हनुमान जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…

बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगता |

अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनूमत्स्मरणाद्भवेत् ||

हुनमान जी का स्मरण करने से हमारी बुद्धि, बल, यश, धैर्य, निर्भयता, आरोग्य, विवेक और वाक्पटुता में वृद्धि हो |

मनोजवं मारुततुल्यवेगम्, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् |

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्री रामदूतं शरणं प्रपद्ये ||

हम उन वायुपुत्र श्री हनुमान के शरणागत हैं जिनकी गति का वेग मन तथा मरुत के समान है, जो जितेन्द्रिय हैं, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, वानरों की सेना के सेनापति हैं तथा भगवान् श्री राम के दूत हैं |

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् |

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||

अत्यन्त बलशाली, स्वर्णपर्वत के समान शरीर से युक्त, राक्षसों के काल, ज्ञानियों में अग्रगण्य, समस्त गुणों के भण्डार, समस्त वानर कुल के स्वामी तथा रघुपति के प्रिय भक्त वायुपुत्र हनुमान को हम नमन करते हैं |

हनुमानद्द्रजनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः, रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रम: |

उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः, लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ||

एवं द्वादशनामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः,

स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्‌ |

तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्‌ ||

हनुमान, अंजनिपुत्र, वायुपुत्र, महाबली, रामप्रिय, अर्जुन (फाल्गुन) के मित्र, पिंगाक्ष – भूरे नेत्र वाले, अमितविक्रम अर्थात महान प्रतापी, उदधिक्रमण: – समुद्र को लाँघने वाले, सीता जी के शोक को नष्ट करने वाले, लक्ष्मण को जीवन दान देने वाले तथा रावण के घमण्ड को चूर्ण करने वाले – ये कपीन्द्र के बारह नाम हैं | रात्रि को शयन करने से पूर्व, प्रातः निद्रा से जागने पर तथा यात्रा आदि के समय जो व्यक्ति हनुमान जी के इन बारह नामों का पाठ करता है उसे किसी प्रकार का भय नहीं रहता तथा विजय प्राप्त होती है |

मंगलरूप हनुमान सबका मंगल करें… सभी को एक बार पुनः हनुमान जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/04/18/shree-hanuman-jayanti/

 

महावीर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ

महावीर जयन्ती

आज चैत्र शुक्ल त्रयोदशी है – भगवान् महावीर स्वामी की जयन्ती का पावन पर्व | सभी को महावीर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…

सभी जानते हैं कि महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें और अन्तिम तीर्थंकर थे | तीर्थं करोति स तीर्थंकर: – अर्थात जो अपनी साधना के माध्यम से स्वयं संसार सागर से पार लगाने वाले तीर्थों का निर्माण करें वह तीर्थंकर | तीर्थंकर वे साधक होते हैं जिन्होंने अपने क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा इत्यादि समस्त भावों पर विजय प्राप्त कर ली हो और अपने मन के भीतर के तीर्थ में निवास कर लिया हो – और यही स्थिति कैवल्य ज्ञान की स्थिति कहलाती है |  जैन धर्म में भी तीर्थंकर – अरिहन्त – जिनेन्द्र – उन चौबीस साधकों के लिए प्रयुक्त होता है जिन्होंने स्वयं तप के माध्यम से कैवल्यज्ञान प्राप्त किया |

आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद तीर्थंकर का कर्तव्य होता है कि वे अन्यों को भी आत्मज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करने का प्रयास करें | इसी क्रम में प्रथम तीर्थंकर हुए आचार्य ऋषभदेव और अन्तिम अर्थात चौबीसवें तीर्थंकर हुए भगवान् महावीर – जिनका समय ईसा से 599-527 वर्ष पूर्व माना जाता है | णवकार मन्त्र में सभी तीर्थंकरों को नमन किया गया है “ॐ णमो अरियन्ताणं” | समस्त जैन आगम अरिहन्तों द्वारा ही भाषित हुए हैं |

जैन दर्शन का सामान्य अभिमत है कि संसार की समस्त वस्तुओं में उत्पाद्य-व्यय-ध्रौव्य सतत् वर्तमान हैं | अर्थात् जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट भी होगा और उसकी स्थिति भी रहेगी | प्रत्येक वस्तु में नित्य और अनित्य दोनों की ही सत्ता भी सदैव ही रहती है | इस जगत का निर्माता कोई ईश्वर नहीं है | प्राकृतिक तत्वों के निश्चित नियमों के अनुसार सृष्टि का निर्माण स्वाभाविक रूप से होता रहता है और स्वाभाविक रूप से ही वस्तु के पर्यायों का परिवर्तन होता रहता है | अतः प्रत्येक वस्तु अनन्तधर्मात्मक है और संसार की समस्त वस्तुएँ सदसदात्मक हैं | यह संसार शाश्वत और नित्य है क्योंकि पदार्थों का अर्थात वायु, जल, अग्नि, आकाश और पृथिवी का मूलतः विनाश नहीं होता अपितु उनका रूप परिवर्तित होता रहता है | मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि मनुष्य “त्रिरत्न” के अनुशीलन और अभ्यास के द्वारा अपने पूर्वजन्म के कर्मफल का नाश करे तथा इस जन्म में किसी प्रकार भी कर्मफल संग्रहीत न करे | ये त्रिरत्न हैं : सम्यक् श्रद्धा अर्थात् सत् में विश्वास, सम्यक् ज्ञान अर्थात सद्रूप का शंकाविहीन और वास्तविक ज्ञान, तथा सम्यक् आचरण अर्थात बाह्य जगत के विषयों के प्रति सम सुख-दुःख भाव से उदासीनता | इसके साथ ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्चरित्र तथा सम्यग्चिन्तन की भावना पर भी बल दिया गया है | भारत के अन्य दर्शनों की ही भाँति जैन दर्शन का भी अन्तिम लक्ष्य निर्वाण प्राप्ति ही है | भगवान् महावीर ने जैन दर्शन की इस दृष्टि के द्वारा समाज को निर्वाण प्राप्ति का मार्ग दिखाने का प्रयास निरन्तर किया | और अन्त में – समस्त संसार यदि सम्यग्दर्शन, सम्यग्चरित्र तथा सम्यग्चिन्तन की भावना को अंगीकार कर ले तो बहुत सी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त हो सकती है – क्योंकि इस स्थिति में समता का भाव विकसित होगा और फिर किसी भी प्रकार की ऊँच नीच अथवा किसी भी प्रकार के ईर्ष्या द्वेष क्रोध घृणा इत्यादि के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जाएगा | इस प्रकार की उदात्त भावनाओं का प्रसार करने वाले भगवान महावीर को निम्न पंक्तियों के साथ शत शत नमन…

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार

तुम्हारी कर्म श्रृंखला देव सकल मानवता का श्रृंगार ||

तुमने दे दी हर प्राणी को जीवन जीने की अभिलाषा

ममता के स्वर में समझा दी मानव के मन की परिभाषा |

बन गीत और संगीत जगत को हर्ष दिया तुमने अपार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

तुमको पाकर रानी त्रिशला के संग धरती माँ धन्य हुई

विन्ध्याचल पर्वत से कण कण में करुणाभा फिर व्याप्त हुई |

तुमसे साँसों को राह मिली, जग में अगाध भर दिया प्यार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

तुम श्रम के साधक कर्म विजेता आत्मतत्व के ज्ञानी तुम

सम्यक दर्शन, सम्यक चरित्र और अनेकान्त के साधक तुम |

सुख दुःख में डग ना डिगें कभी, समता का तुमने दिया सार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

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