नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के तत्व

विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय पारम्परिक रूप से अष्टकूट गुणों का मिलान करने की प्रक्रिया में नाड़ी, योनि और गणों के साथ ही नक्षत्रों के वश्य का मिलान भी किया जाता है | पाँच वश्यों के अतिरिक्त समस्त 27 नक्षत्र चार तत्वों में भी विभाजित होते हैं | जिनमें से पाँचों वश्य तथा वायु तत्व के विषय में अपने पिछले लेख में संक्षेप में लिखा था | आज शेष तत्वों के विषय में…

अग्नि तत्व : अग्नि अर्थात वह तत्व जिसमें दाहकता हो – जलाने की सामर्थ्य हो, तेज हो, ताप हो | अग्नि देव सब कुछ भस्म कर देने की सामर्थ्य रखने के साथ ही प्रकाश का कारण भी होते हैं | समस्त ब्रह्माण्ड उन्हीं के तेज से प्रकाशित होता है | साथ ही गतिशीलता में भी अग्नि तत्व से सहायता प्राप्त होती है | अग्नि शुद्धीकरण का कारक भी है – जो कुछ भी अशुद्ध है अथवा अशुभ है उसे जला डालता है और शेष रह जाता है केवल शुद्धता और शुभत्व का प्रकाश | यह प्रतिभा का भी संकेत करता है | भूख तथा पाचन क्रिया भी इसी तत्व के द्वारा नियन्त्रित होती है |

इन्द्र तत्व : इन्द्र शब्द प्रतिनिधित्व करता है बादलों का और मिट्टी कीचड़ आदि का | पञ्चमहाभूतों में से आकाश और पृथिवी दोनों इन्द्र तत्व के अन्तर्गत आते हैं | इन्द्र को देवताओं, मेघों और वर्षा का राजा भी कहा जाता है | सर्वश्रेष्ठ के लिए भी इन्द्र शब्द का प्रयोग होता है | इन्द्र को ईर्ष्यालु प्रवृत्ति का माना जाता है | इस प्रकार के पौराणिक आख्यान उपलब्ध होते हैं कि जब भी इन्द्र को पता चलता था कि कोई व्यक्ति अथवा ऋषि अपने मोक्ष के लिए तपस्या कर रहा है तो इन्द्र को भय सताने लगता था कि तपस्या के द्वारा उस व्यक्ति में और अधिक शक्तियाँ आ जाएँगी तो उसे स्वर्ग में प्रवेश मिल जाएगा और तब वह इन्द्र को परास्त करके उसके साम्राज्य पर अधिकार कर लेगा | इसीलिए प्रायः वह दूसरों की तपस्या भंग करने के प्रयास में व्यस्त रहता था | अपनी प्रजा के वह पूर्ण स्नेह तथा समर्पण के भाव से ध्यान रखता था | निर्धन तथा ज़रूरतमन्दों के लिए इन्द्र को पिटा, भाई तथा सहायक के रूप में देखा जाता है | स्वर्ग में इन्द्र का साम्राज्य है, अमरावती इसकी राजधानी है, इसके उद्यान का नाम नन्दन वन है, ऐरावत हाथी तथा उच्चैश्रवा अश्व इसके वाहन माने जाते हैं | इन्द्रधनुष इन्द्र का धनुष है तथा पर्जन्य (मेघ) इन्द्र की तलवार है |

वेदों तथा पौराणिक ग्रन्थों में इन्द्र से सम्बन्धित अनेक आख्यान उपलब्ध होते हैं | जिनमें प्रमुख हैं कि इन्द्र दो अश्वों के द्वारा खींचे जाने वाले चमकीले सुनहरे रथ पर सवार होते हैं, उनके सबस प्रिय अस्त्र आकाश में दमकने वाली बिजली तथा पाश – इन्द्रजाल हैं – जो युद्धों में विजय दिलाने तथा अन्धकार और सूखे के दानवों को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त होते हैं | इसीलिए इन्द्र को पर्यावरण का देवता भी माना जाता है | मरुद्गण अर्थात वायु इनके मुख्य सहायक हैं | इनका प्रिय भोजन है सोमरस | इन्हें कश्यप और अदिति का पुत्र भी कहा जाता है |

वरुण तत्व : वरुण को जल का देवता माना जाता है | यह बारह आदित्यों (कश्यप और अदिति के बारह पुत्र) में से एक माने जाते हैं तथा समुद्र तथा पश्चिम दिशा का स्वामी – प्रतीचीं वरुण: पति: (महाभारत) – माने जाते हैं और प्रायः मित्र – एक आदित्य –  के साथ ही रहते हैं | इनका अस्त्र पाश माना जाता है | समस्त ब्रह्माण्ड, समस्त देवों तथा मनुष्य का स्वामी भी इन्हें माना जाता है – त्वं विश्वेसां वरुणासि राजा, ये च देवा: ये च मर्ता: (ऋग्वेद 2/27/10)

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/06/06/constellation-nakshatras-45/

 

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