Monthly Archives: September 2019

via ध्यान और इसका अभ्यास – स्वामी वेदभारती जी

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ध्यान और इसका अभ्यास – स्वामी वेदभारती जी

हिमालयन योग परम्परा के गुरु स्वामी वेदभारती जी की पुस्तक Meditation and it’s practices के कुछ अंश ध्यान के साधकों के लिए…

ध्यान क्या है

सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक समाज में लोग उन योग्यताओं में निपुण होते हैं जो अपनी संस्कृति के अनुसार कार्य करने और जीवन जीने के लिए उपयोगी होती हैं – जैसे: किस तरह वार्तालाप करना है, किस प्रकार के विचार होने चाहियें, किसी कार्य को किस प्रकार करना चाहिए, किस रूप में वस्तुओं को देखना परखना चाहिए और बाह्य जगत को किस प्रकार अनुभव करना चाहिए | जिस संसार में हम रहते हैं उसे समझने की प्रक्रिया में हम बायोलोजी (जीवविज्ञान), ईकोलोजी (पर्यावरण विज्ञान), कैमिस्ट्री (रसायन विज्ञान) जैसे विज्ञानों का अध्ययन करते हैं | किन्तु कोई विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय ऐसा नहीं है जिसमें सिखाया जाता हो कि अपनी अन्तःचेतना को – अपने भीतर के जगत को – कैसे जाना जाए | हम अपने भीतर और बाहर को जाने बिना केवल यही सीखते रहते हैं कि किस प्रकार अपने लक्ष्य को प्राप्त किया जाए, हमारे समाज की कार्यप्रणाली कैसी है और हमारे सामाजिक मूल्य क्या हैं | जिसका परिणाम होता है कि हम स्वयं को ही नहीं समझ पाते और दूसरों की सलाह और सुझावों पर आश्रित हो जाते हैं |

ध्यान एक पूर्ण रूप से पृथक, विलक्षण और नियमबद्ध प्रक्रिया है | लक्ष्य पर एकाग्रचित्त होने के लिए और स्वयं को शारीरिक, मानसिक और श्वास जैसे विभिन्न स्तरों पर समझने के लिए एक सरल सी प्रक्रिया है | जैसे जैसे ध्यान की अवधि बढ़ती जाती है वैसे वैसे आपको ध्यान के अनके सकारात्मक परिणामों का अनुभव होने लगता है – जैसे आप आनन्द में वृद्धि का अनुभव करने लगते हैं, आपको अपने मस्तिष्क की स्पष्टता में वृद्धि का अनुभव होने लगता है तथा चेतनता में वृद्धि का अनुभव होने लगता है | जैसे जैसे आप शान्ति का अनुभव करने लगते हैं वैसे वैसे आपके शरीर, स्नायु मण्डल और मस्तिष्क में तनाव के सारे लक्षण दूर होते जाते हैं |

आरम्भ में ध्यान चिकित्सकीय होता है अर्थात रोग निदान में सहायता करता है | यह स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार की माँसपेशियों तथा आपके स्वाधीन स्नायुतन्त्र के तनाव को दूर करता है, साथ ही मानसिक तनाव से भी मुक्ति दिलाता है | ध्यान का साधक शान्त मस्तिष्क को प्राप्त करता है और तनाव के प्रति मन की प्रतिक्रियाओं को कम करके रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है | आप देखेंगे कि कुछ दिनों के निष्ठा पूर्ण प्रयास से न केवल आपकी क्षुधा नियन्त्रित होगी बल्कि क्रोध जैसी कुछ प्रतिक्रियाओं पर भी नियन्त्रण होगा | ध्यान नींद की आवश्यकता में कमी लाने के साथ साथ शरीर और मस्तिष्क को भी और अधिक ऊर्जावान बनाता है |

प्रायः सभी लेखक, कवि और दार्शनिक अपनी सृजनात्मकता और कल्पनाशीलता में वृद्धि करना चाहते हैं | उनकी इच्छा होती है कि ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र का भली भाँति विस्तार हो | ध्यान एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है जिससे आपके दैनिक जीवन में आपकी जन्मजात प्रतिभा में वृद्धि होती है |

ध्यान का स्वास्थ्य पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है | आज के युग में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो किसी सीमा तक मानसिक विकारों से ग्रस्त होते हैं और जो उनकी अपनी सोच तथा भावनाओं की ही उपज होते हैं | हाल ही में वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस प्रकार के रोगों का निदान किसी प्रकार की परम्परागत औषधियों अथवा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा द्वारा नहीं किया जा सकता | क्योंकि जब रोग आपके मस्तिष्क अथवा किसी प्रकार की भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की देन है तो किसी प्रकार की बाह्य चिकित्सा ही किस प्रकार उसका निदान कर सकती है ? यदि आप अपने मस्तिष्क और भावनाओं को समझे बिना केवल बाह्य चिकित्सा पद्धति का ही सहारा लेते हैं तो आप सदा के लिए चिकित्सकों पर निर्भर हो जाते हैं | इसके विपरीत ध्यान की पद्धति आत्मनिर्भरता उत्पन्न करती है और जीवन में हर प्रकार की समस्याओं से प्रभावशाली ढंग से जूझने के लिए आवश्यक आत्मबल आपमें उत्पन्न करती है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/09/30/meditation-and-its-practices-3/

तृतीया चंद्रघंटा

तृतीया चंद्रघंटा

नवदुर्गा – तृतीय नवरात्र – देवी के चंद्रघंटा रूप की उपासना

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या, निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या |

तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ||

कल आश्विन शुक्ल तृतीया है – तीसरा नवरात्र – देवी के चन्द्रघंटा रूप की उपासना का दिन | चन्द्रः घंटायां यस्याः सा चन्द्रघंटा – आल्हादकारी चन्द्रमा जिनकी घंटा में स्थित हो वह देवी चन्द्रघंटा के नाम से जानी जाती है – इसी से स्पष्ट होता है कि देवी के इस रूप की उपासना करने वाले सदा सुखी रहते हैं और किसी प्रकार की बाधा उनके मार्ग में नहीं आ सकती |

माँ चन्द्रघंटा का वर्ण तप्त स्वर्ण के सामान तेजोमय है | इस रूप में देवी के दस हाथ दिखाए गए हैं और वे सिंह पर सवार दिखाई देती हैं | उनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, चक्र, जपमाला, त्रिशूल, गदा और तलवार सुशोभित हैं | अर्थात् महिषासुर का वध करने के निमित्त समस्त देवों के द्वारा दिए गए अस्त्र देवी के हाथों में दिखाई देते हैं |

ॐ अक्षस्नक्परशुं गदेषु कुलिशं पद्मं धनु: कुण्डिकाम्

दण्डं शक्तिमसिंच चर्म जलजं घंटाम् सुराभाजनम् |

शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननाम्

सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ||

शान्ति-सौम्यता और क्रोध का मिश्रित भाव महिषासुरमर्दिनी के इस रूप के मुखमंडल पर विद्यमान है जो एक ओर जहाँ साधकों को शान्ति तथा सुरक्षा का अनुभव कराता है तो दूसरी ओर आतताइयों को क्रोध में गुर्राता हुआ भयंकर रूप जान पड़ता है जो पिछले रूपों से बिल्कुल भिन्न है और इससे विदित होता है कि यदि देवी को क्रोध दिलाया जाए तो ये अत्यन्त भयानक और विद्रोही भी हो सकती हैं | इनकी उपासना के लिए मन्त्र है:

पिंडजप्रवरारूढा चन्द्र्कोपास्त्रकैर्युता, प्रसादं तनुते मद्यं चन्द्रघंटेति विश्रुता |

इसके अतिरिक्त ऐं श्रीं शक्त्यै नमः” माँ चन्द्रघंटा के इस बीज मन्त्र के जाप साथ भी देवी की उपासन अकी जा सकती है |

माता पार्वती के विवाहित स्वरूप को भी चन्द्रघंटा कहा जाता है | माना जाता है कि भगवान शिव से विवाह के पश्चात पार्वती ने अपने मस्तक पर अर्द्धचन्द्र के जैसा तिलक लगाना आरम्भ कर दिया था जिस कारण उनका नाम चन्द्रघंटा हुआ |

जो Astrologers भगवती के नौ रूपों को नवग्रह से सम्बद्ध करते हैं उनकी मान्यता है कि माँ भगवती का यह रूप शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है तथा जिनकी कुण्डली – Horoscope – में शुक्र से सम्बन्धित कोई दोष हो अथवा जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आती हो उन्हें देवी के इस रूप की पूजा अर्चना करनी चाहिए | साथ ही व्यक्ति की जन्म कुण्डली में द्वितीय और सप्तम भाव का प्रतिनिधित्व भी माँ चन्द्रघंटा को ही प्राप्त है |

माँ चन्द्रघंटा के रूप में भगवती सभी की रक्षा करें और सभी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

मूल मंत्र

||ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः ||

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता |
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता ||

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम् |

सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम् ||

मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम् |

खड्गगदात्रिशूलचापशरपदमकमण्डलुमाला वराभीतकराम् ||

पट्टाम्बरपरिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणि रत्नकुण्डलमण्डिताम ||

प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांतकपोलां तुंगकुचाम् |

कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम् ||

स्तोत्र पाठ

आपद्दुद्धारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम् |

अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम् ||

चन्द्रमुखी इष्टदात्री इष्टमन्त्रस्वरूपणीम् |

धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम् ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/09/30/tritiya-chandraghanta/